परिचय
RAS प्रारंभिक परीक्षा के अर्थशास्त्र खंड में पिछले कुछ वर्षों से पर्यावरण और सतत विकास का हिस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है — और यह कोई संयोग नहीं है। जलवायु परिवर्तन अब केवल एक पारिस्थितिक चुनौती नहीं, बल्कि एक आर्थिक चुनौती भी बन चुका है: यह GDP वृद्धि की गुणवत्ता को, राजकोषीय प्राथमिकताओं को, और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रवाह की दिशा तक को प्रभावित करता है। भारत ने ग्लासगो में COP-26 में जो "पंचामृत" लक्ष्य घोषित किए, कार्बन बाज़ार जो अब आकार ले रहे हैं, और संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) पर भारत की प्रगति को मापने वाला NITI Aayog का SDG इंडिया इंडेक्स — ये सभी विषय अब पारंपरिक "समष्टि अर्थशास्त्र" प्रश्नों जितने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं। यह गाइड हरित GDP और पर्यावरणीय अर्थशास्त्र की बुनियादी अवधारणाओं से शुरू होकर, SDG इंडिया इंडेक्स, पंचामृत लक्ष्य व नेट-ज़ीरो प्रतिबद्धता, कार्बन क्रेडिट व कार्बन बाज़ार, हरित वित्त व हरित बॉन्ड, पर्यावरणीय स्वीकृति-प्रणाली में हुए सुधारों, तथा राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (NAPCC) तक — इस पूरे परिदृश्य को क्रमबद्ध ढंग से समझाती है।
मुख्य अवधारणाएँ
1. हरित GDP और पर्यावरणीय अर्थशास्त्र की मूल अवधारणाएँ
पारंपरिक GDP एक गंभीर सीमा से ग्रस्त है — यह किसी वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं व सेवाओं के मूल्य को गिनता तो है, लेकिन उस उत्पादन के दौरान हुई प्राकृतिक संसाधनों की क्षति या पर्यावरणीय हास की कोई कटौती नहीं करता। यदि कोई वन काटकर लकड़ी बेची जाती है, तो GDP में केवल लकड़ी की बिक्री जुड़ती है, जबकि उस वन के नष्ट होने से जो पारिस्थितिक सेवाएँ (जल संग्रहण, मृदा संरक्षण, कार्बन अवशोषण) खोई गईं, उनका कोई ऋणात्मक समायोजन नहीं होता। हरित GDP (Green GDP) इसी कमी को दूर करने का प्रयास है — यह पारंपरिक GDP में से प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण और पर्यावरणीय क्षति की लागत घटाकर एक अधिक यथार्थवादी आर्थिक कल्याण-मापक प्रस्तुत करता है। संयुक्त राष्ट्र का पर्यावरण-आर्थिक लेखांकन तंत्र (System of Environmental-Economic Accounting, SEEA) इसी दिशा में एक अंतरराष्ट्रीय सांख्यिकीय ढाँचा है, जिसे भारत सहित कई देश धीरे-धीरे अपना रहे हैं; भारत में सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) प्राकृतिक पूँजी लेखांकन (Natural Capital Accounting) की दिशा में प्रायोगिक कार्य कर रहा है, यद्यपि हरित GDP को अभी तक भारत के आधिकारिक मुख्य आँकड़े के रूप में प्रकाशित नहीं किया जाता।
पर्यावरणीय अर्थशास्त्र में कुछ अवधारणाएँ बार-बार परीक्षा में पूछी जाती हैं। बाह्यताएँ (Externalities) वे लागतें या लाभ हैं जो किसी लेन-देन में शामिल न होने वाले तीसरे पक्ष पर पड़ते हैं — प्रदूषण एक क्लासिक ऋणात्मक बाह्यता (Negative Externality) है, क्योंकि कारखाना अपनी उत्पादन-लागत में प्रदूषण की सामाजिक लागत को शामिल नहीं करता। इसका समाधान पिगोवियन कर (Pigouvian Tax) से सुझाया जाता है — प्रदूषण की मात्रा पर सीधा कर लगाकर निजी लागत को सामाजिक लागत के बराबर लाना। इसी से जुड़ा है प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle), जो भारत के पर्यावरण न्यायशास्त्र और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal) के निर्णयों में बार-बार उद्धृत होता है — जिसने प्रदूषण फैलाया, उसे ही सफाई और क्षतिपूर्ति की लागत वहन करनी होगी।
दूसरी महत्वपूर्ण अवधारणा है सावधानी सिद्धांत (Precautionary Principle) — जब किसी गतिविधि से गंभीर या अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय क्षति की आशंका हो, तो वैज्ञानिक निश्चितता की कमी को उस गतिविधि को रोकने के विरुद्ध तर्क के रूप में प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए — अर्थात् "पूर्ण प्रमाण मिलने तक इंतज़ार" करने के बजाय एहतियाती कदम पहले उठाए जाएँ। इसके विपरीत छोर पर पर्यावरणीय कुज़नेट्स वक्र (Environmental Kuznets Curve) की परिकल्पना है, जो सुझाती है कि आर्थिक विकास के शुरुआती चरणों में पर्यावरणीय क्षति बढ़ती है, लेकिन एक निश्चित आय-स्तर के बाद, जब समाज स्वच्छ तकनीक व नियमन को वहन कर पाता है, प्रदूषण घटने लगता है — यानी क्षति और आय के बीच एक उल्टे-U आकार का संबंध। अंत में, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का मूल्यांकन (Ecosystem Services Valuation) वनों, आर्द्रभूमियों व नदियों जैसी प्राकृतिक संपत्तियों को मौद्रिक मूल्य देने का प्रयास है, ताकि नीति-निर्माण में उन्हें केवल "मुफ्त संसाधन" के बजाय वास्तविक आर्थिक पूँजी के रूप में गिना जा सके।
2. सतत विकास लक्ष्य (SDGs) और भारत की प्रगति — SDG इंडिया इंडेक्स
संयुक्त राष्ट्र ने 2015 में 2000-2015 की सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों (MDGs) की जगह 17 सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals, SDGs) अपनाए, जिन्हें 2030 तक हासिल किया जाना है। MDGs के विपरीत, जो मुख्यतः विकासशील देशों में सामाजिक विकास पर केंद्रित थे, SDGs सार्वभौमिक हैं — ये सभी देशों (विकसित और विकासशील दोनों) पर लागू होते हैं और सामाजिक, आर्थिक व पर्यावरणीय, तीनों आयामों को एक साथ समेटते हैं। कुल 17 लक्ष्यों के अंतर्गत 169 उप-लक्ष्य (targets) निर्धारित हैं — गरीबी उन्मूलन (SDG 1) और भुखमरी-मुक्ति (SDG 2) से शुरू होकर, स्वच्छ ऊर्जा (SDG 7), जलवायु कार्रवाई (SDG 13), जलीय जीवन (SDG 14) व भूमि पर जीवन (SDG 15) जैसे स्पष्ट रूप से पर्यावरण-केंद्रित लक्ष्यों से होते हुए, अंत में लक्ष्यों के लिए वैश्विक साझेदारी (SDG 17) पर समाप्त होते हैं।
भारत में SDGs की प्रगति मापने के लिए नीति आयोग (NITI Aayog) प्रतिवर्ष SDG इंडिया इंडेक्स जारी करता है, जो राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को उनके प्रदर्शन के आधार पर स्कोर व रैंक प्रदान करता है। SDG इंडिया इंडेक्स 2023-24 में भारत का समग्र स्कोर 71 रहा, जिसमें केरल और उत्तराखंड संयुक्त रूप से शीर्ष स्थान (स्कोर 79) पर रहे। यह सूचकांक राज्यों को उनके संयुक्त स्कोर के आधार पर चार श्रेणियों में बाँटता है — आकांक्षी (Aspirant), प्रदर्शक (Performer), फ्रंट रनर (Front Runner) और अचीवर (Achiever, स्कोर 100 पर)। समानांतर रूप से, संयुक्त राष्ट्र सतत विकास समाधान नेटवर्क (UN SDSN) द्वारा प्रकाशित वैश्विक Sustainable Development Report में भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति भी दर्ज होती है — 2025 की रिपोर्ट में भारत को 166 देशों में 99वाँ स्थान (स्कोर 67) प्राप्त हुआ, जो दर्शाता है कि घरेलू सुधार की गति के बावजूद वैश्विक तुलना में अभी भी काफ़ी दूरी तय करनी शेष है।
परीक्षा की दृष्टि से यह याद रखना ज़रूरी है कि SDG इंडिया इंडेक्स (NITI Aayog, राष्ट्रीय स्तर पर राज्यों की तुलना) और वैश्विक Sustainable Development Report (UN SDSN, देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय तुलना) — ये दो अलग-अलग सूचकांक हैं, जिनके स्कोर और रैंकिंग-प्रणाली भिन्न हैं, और अभ्यर्थी अक्सर इन दोनों को गड्डमड्ड कर देते हैं।
3. जलवायु परिवर्तन और अर्थव्यवस्था — पंचामृत लक्ष्य और नेट-ज़ीरो 2070
नवंबर 2021 में ग्लासगो में आयोजित COP-26 शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री ने भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को पाँच बिंदुओं के रूप में प्रस्तुत किया, जिन्हें सामूहिक रूप से "पंचामृत" (पाँच अमृत तत्व) कहा जाता है। ये लक्ष्य हैं: (1) 2030 तक भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावाट (GW) तक पहुँचाना; (2) 2030 तक अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का 50% नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से पूरा करना; (3) 2030 तक अनुमानित कुल कार्बन उत्सर्जन में एक अरब टन की कमी करना; (4) 2030 तक अर्थव्यवस्था की कार्बन उत्सर्जन तीव्रता (Carbon/Emission Intensity) को 2005 के स्तर की तुलना में 45% तक घटाना; और (5) 2070 तक शुद्ध शून्य (नेट-ज़ीरो) कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करना।
यहाँ "उत्सर्जन तीव्रता" शब्द को ध्यान से समझना आवश्यक है — इसका अर्थ प्रति इकाई GDP पर होने वाला उत्सर्जन है, कुल उत्सर्जन नहीं। अर्थात् भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ती रहेगी और कुल उत्सर्जन भी अल्पकाल में बढ़ सकता है, परंतु प्रति इकाई आर्थिक उत्पादन पर उत्सर्जन की मात्रा घटानी होगी — यह विकासशील देश की स्थिति को स्वीकार करते हुए एक व्यावहारिक मध्य मार्ग है, जो "समान किंतु भिन्न उत्तरदायित्वों" (Common but Differentiated Responsibilities, CBDR) के सिद्धांत से मेल खाता है। नेट-ज़ीरो 2070 का लक्ष्य भी इसी तर्क का विस्तार है — विकसित देशों की तुलना में बीस साल बाद, यह मानते हुए कि भारत को अभी भी गरीबी उन्मूलन व औद्योगीकरण के लिए विकास की गुंजाइश चाहिए।
इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions, NDC) को समय-समय पर अद्यतन किया जाता है, और वर्ष 2030 तक 2.5 से 3 अरब टन CO₂ के बराबर अतिरिक्त कार्बन सिंक (वन व वृक्ष आवरण के माध्यम से) बनाने का लक्ष्य भी इसी पंचामृत ढाँचे का हिस्सा है। परीक्षा में अक्सर इन पाँच आँकड़ों — 500 GW, 50%, 1 अरब टन, 45% और 2070 — को आपस में उलझा दिया जाता है, इसलिए इन्हें क्रम में याद रखना बेहद ज़रूरी है।
4. कार्बन क्रेडिट और कार्बन बाज़ार (Carbon Markets)
कार्बन क्रेडिट एक ऐसा व्यापार-योग्य प्रमाणपत्र है जो धारक को एक निश्चित मात्रा (सामान्यतः एक टन CO₂ के बराबर) ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का अधिकार देता है, या यह प्रमाणित करता है कि उतने उत्सर्जन को कम किया या अवशोषित किया गया है। कार्बन बाज़ार दो मुख्य प्रकार के होते हैं। अनुपालन बाज़ार (Compliance Market) सरकारी विनियमन के तहत काम करता है, जहाँ उद्योगों को उत्सर्जन की एक सीमा (कैप) दी जाती है और वे अतिरिक्त कटौती कर बचे हुए क्रेडिट को उन कंपनियों को बेच सकते हैं जो अपनी सीमा पार कर रही हैं — इसे "कैप-एंड-ट्रेड" प्रणाली कहा जाता है। दूसरी ओर, स्वैच्छिक बाज़ार (Voluntary Market) में कंपनियाँ अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी या स्वैच्छिक जलवायु प्रतिबद्धताओं के तहत कार्बन क्रेडिट खरीदती हैं, बिना किसी कानूनी बाध्यता के।
भारत में ऊर्जा संरक्षण अधिनियम में 2022 के संशोधन के बाद कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (Carbon Credit Trading Scheme, CCTS), 2023 अधिसूचित की गई, जो भारत के अपने घरेलू कार्बन बाज़ार की नींव रखती है। इसे बिजली मंत्रालय की देखरेख में ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) द्वारा क्रियान्वित किया जा रहा है, और यह पहले से चल रही परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड (Perform, Achieve and Trade, PAT) योजना — जो ऊर्जा-गहन उद्योगों की ऊर्जा दक्षता में सुधार के लिए ट्रेड-योग्य ऊर्जा बचत प्रमाणपत्र (Energy Saving Certificates) जारी करती है — को कार्बन बाज़ार के साथ एकीकृत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। ऐतिहासिक रूप से भारत क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत स्वच्छ विकास तंत्र (Clean Development Mechanism, CDM) के तहत भी बड़ी संख्या में कार्बन क्रेडिट परियोजनाओं का मेज़बान रहा है, जिसने भारतीय उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाज़ार से परिचित कराया।
5. हरित वित्त और हरित बॉन्ड (Green Finance and Green Bonds)
हरित वित्त (Green Finance) उन वित्तीय साधनों और निवेशों को कहा जाता है जो विशेष रूप से पर्यावरण-अनुकूल परियोजनाओं — नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, स्वच्छ परिवहन, जल प्रबंधन — के वित्तपोषण हेतु निर्धारित होते हैं। इसका एक प्रमुख साधन है हरित बॉन्ड (Green Bonds), जो सामान्य ऋण-पत्रों की तरह ही काम करते हैं, परंतु जुटाई गई राशि का प्रयोग विशेष रूप से हरित परियोजनाओं के लिए ही किया जाना अनिवार्य होता है। भारत सरकार ने अपना पहला सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड (Sovereign Green Bond) वित्त वर्ष 2022-23 के बजट में घोषित किया और उसी वर्ष जारी भी किया — भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) इसे भारत सरकार की ओर से जारी करता है, और इससे प्राप्त राशि केंद्र सरकार की चयनित हरित बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में लगाई जाती है।
भारत सरकार के सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड फ्रेमवर्क के तहत यह सुनिश्चित किया जाता है कि जुटाया गया धन जीवाश्म ईंधन, परमाणु ऊर्जा या बड़े जलविद्युत जैसी परियोजनाओं में न लगे, बल्कि सौर व पवन ऊर्जा, हरित परिवहन (जैसे मेट्रो रेल), जल दक्षता और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी परियोजनाओं तक सीमित रहे। इसके अतिरिक्त, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने भी कॉर्पोरेट क्षेत्र के लिए हरित बॉन्ड जारी करने से संबंधित प्रकटीकरण मानदंड निर्धारित किए हैं, और RBI ने बैंकों को हरित जमा (Green Deposits) स्वीकार करने की रूपरेखा भी जारी की है। वैश्विक स्तर पर, विकसित देशों से जलवायु वित्त की उपलब्धता एक विवादास्पद मुद्दा रहा है — पेरिस समझौते के तहत नए न्यू कलेक्टिव क्वांटिफाइड गोल (New Collective Quantified Goal, NCQG) के अंतर्गत विकसित देशों के लिए 2035 तक विकासशील देशों को वार्षिक 300 अरब अमेरिकी डॉलर की सहायता का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिसे भारत सहित कई विकासशील देशों ने अपर्याप्त बताया है।
6. पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ और व्यापार सुगमता (Environmental Clearances and Ease of Doing Business)
भारत में किसी भी बड़े औद्योगिक, खनन, बुनियादी ढाँचा या निर्माण परियोजना को शुरू करने से पहले पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment, EIA) प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है, जो पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत जारी EIA अधिसूचना, 2006 द्वारा शासित है। परियोजनाओं को उनके संभावित पर्यावरणीय प्रभाव के आधार पर श्रेणी A (जिनकी स्वीकृति केंद्र स्तर पर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा दी जाती है) और श्रेणी B (जिनकी स्वीकृति राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण, State Environment Impact Assessment Authority — SEIAA द्वारा दी जाती है) में बाँटा जाता है। यह विकेंद्रीकरण छोटी व मध्यम परियोजनाओं की स्वीकृति-प्रक्रिया को तेज़ करने के लिए किया गया था।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने पर्यावरणीय स्वीकृति-प्रणाली को अधिक पारदर्शी व तेज़ बनाने के लिए कई सुधार किए हैं। PARIVESH (Pro-Active and Responsive facilitation by Interactive, Virtuous and Environmental Single-window Hub) पोर्टल एक ऐसा एकीकृत ऑनलाइन मंच है, जो पर्यावरण, वन, वन्यजीव व तटीय नियमन क्षेत्र (Coastal Regulation Zone) से जुड़ी सभी स्वीकृतियों के लिए एकल-खिड़की (single-window) व्यवस्था प्रदान करता है, जिससे आवेदकों को कई अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर नहीं काटने पड़ते और स्वीकृति की समय-सीमा तय होती है। साथ ही, केंद्र सरकार ने पर्यावरण संबंधी कई कानूनों के तहत मामूली, गैर-गंभीर उल्लंघनों को अपराधमुक्त (Decriminalisation) करने की दिशा में भी कदम उठाए हैं — इसका उद्देश्य व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business) बढ़ाना है, जबकि गंभीर पर्यावरणीय उल्लंघनों पर दंड-प्रावधान बनाए रखना है। ये सुधार इस समझ पर आधारित हैं कि प्रक्रियागत देरी और अनिश्चितता निवेश को हतोत्साहित करती है, परंतु पर्यावरण संरक्षण के मूल उद्देश्य से समझौता किए बिना ऐसी दक्षता लाई जानी चाहिए।
7. राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (National Action Plan on Climate Change, NAPCC)
भारत ने 2008 में राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (NAPCC) जारी की, जो जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत की पहली समग्र राष्ट्रीय रणनीति थी। यह आठ राष्ट्रीय मिशनों के माध्यम से क्रियान्वित होती है, जो शमन (Mitigation) और अनुकूलन (Adaptation) दोनों पहलुओं को समेटते हैं: (1) राष्ट्रीय सौर मिशन — सौर ऊर्जा क्षमता विस्तार पर केंद्रित; (2) उन्नत ऊर्जा दक्षता के लिए राष्ट्रीय मिशन — जिसके अंतर्गत ही PAT योजना संचालित होती है; (3) सतत आवास हेतु राष्ट्रीय मिशन — शहरी नियोजन व भवन-दक्षता से जुड़ा; (4) राष्ट्रीय जल मिशन — जल संरक्षण व दक्ष उपयोग पर केंद्रित; (5) हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण हेतु राष्ट्रीय मिशन; (6) हरित भारत के लिए राष्ट्रीय मिशन — वनावरण विस्तार व पारिस्थितिकी बहाली पर केंद्रित; (7) सतत कृषि हेतु राष्ट्रीय मिशन — जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों को बढ़ावा; और (8) जलवायु परिवर्तन हेतु सामरिक ज्ञान के लिए राष्ट्रीय मिशन — अनुसंधान व ज्ञान-नेटवर्क को सुदृढ़ करने पर केंद्रित।
NAPCC को क्रियान्वित करने में केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है — प्रत्येक राज्य को अपनी विशिष्ट भौगोलिक व आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप राज्य जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (State Action Plan on Climate Change, SAPCC) तैयार करनी होती है, जो NAPCC के व्यापक ढाँचे के भीतर काम करती है। राजस्थान जैसे राज्यों के लिए, जहाँ सौर व पवन ऊर्जा की व्यापक संभावना है, साथ ही मरुस्थलीकरण व जल-संकट जैसी चुनौतियाँ भी हैं, यह ढाँचा विशेष रूप से प्रासंगिक है। परीक्षा की दृष्टि से आठों मिशनों के नाम व उनके केंद्रीय फोकस-क्षेत्र को याद रखना सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रश्न प्रायः किसी विशिष्ट मिशन को उसके सही फोकस-क्षेत्र से मिलाने के रूप में पूछे जाते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
- हरित GDP पारंपरिक GDP में से प्राकृतिक संसाधन क्षरण व पर्यावरणीय क्षति की लागत घटाकर प्राप्त होता है; संयुक्त राष्ट्र का SEEA ढाँचा इसका अंतरराष्ट्रीय आधार है।
- प्रदूषक भुगतान सिद्धांत, सावधानी सिद्धांत और पर्यावरणीय कुज़नेट्स वक्र — ये तीन अवधारणाएँ पर्यावरणीय अर्थशास्त्र में बार-बार पूछी जाती हैं।
- SDGs — 17 लक्ष्य, 169 उप-लक्ष्य, समयावधि 2015-2030, MDGs (2000-2015, 8 लक्ष्य) की जगह अपनाए गए।
- SDG इंडिया इंडेक्स 2023-24 (NITI Aayog): भारत का स्कोर 71; केरल व उत्तराखंड संयुक्त रूप से शीर्ष (स्कोर 79)।
- वैश्विक Sustainable Development Report 2025 (UN SDSN): भारत 166 देशों में 99वें स्थान पर, स्कोर 67।
- पंचामृत लक्ष्य (COP-26, ग्लासगो, नवंबर 2021): 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता, 50% ऊर्जा नवीकरणीय स्रोतों से, उत्सर्जन में 1 अरब टन की कमी, उत्सर्जन तीव्रता में 2005 से 45% कमी — सभी 2030 तक; तथा 2070 तक नेट-ज़ीरो।
- कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS), 2023 — ऊर्जा संरक्षण अधिनियम के तहत भारत का घरेलू कार्बन बाज़ार; BEE द्वारा क्रियान्वित; PAT योजना से जुड़ी।
- भारत का पहला सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड वित्त वर्ष 2022-23 में जारी हुआ; RBI इसे केंद्र सरकार की ओर से जारी करता है।
- पेरिस समझौते के NCQG के अंतर्गत विकसित देशों के लिए 2035 तक विकासशील देशों को वार्षिक 300 अरब डॉलर सहायता का लक्ष्य।
- EIA अधिसूचना 2006 के तहत परियोजनाएँ श्रेणी A (केंद्र, MoEFCC) व श्रेणी B (राज्य, SEIAA) में बँटी हैं; PARIVESH पोर्टल एकल-खिड़की स्वीकृति व्यवस्था है।
- NAPCC (2008) के आठ राष्ट्रीय मिशन — सौर, ऊर्जा दक्षता, सतत आवास, जल, हिमालयी पारिस्थितिकी, हरित भारत, सतत कृषि, सामरिक ज्ञान; राज्य स्तर पर SAPCC इसे क्रियान्वित करती है।
परीक्षा टिप्स
- SDG इंडिया इंडेक्स (NITI Aayog, राज्यवार) और वैश्विक Sustainable Development Report (UN SDSN, देशवार) को कभी न मिलाएँ — दोनों के स्कोर, रैंकिंग-आधार और जारीकर्ता भिन्न हैं।
- पंचामृत के पाँचों लक्ष्यों को क्रम से याद रखें — 500 GW, 50%, 1 अरब टन, 45%, 2070 — परीक्षा में इन आँकड़ों को आपस में बदल कर भ्रामक विकल्प बनाए जाते हैं।
- "उत्सर्जन तीव्रता में कमी" और "कुल उत्सर्जन में कमी" को समान न समझें — तीव्रता प्रति इकाई GDP पर उत्सर्जन को दर्शाती है, कुल मात्रा को नहीं।
- कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS) और PAT योजना को जोड़ने वाली कड़ी को समझें — दोनों ऊर्जा संरक्षण अधिनियम व BEE से संबंधित हैं, परंतु एक ऊर्जा-दक्षता प्रमाणपत्रों पर केंद्रित है और दूसरी व्यापक कार्बन बाज़ार पर।
- NAPCC के आठ मिशनों के नाम व फोकस-क्षेत्र को मिलान-आधारित (matching-type) प्रश्नों के लिए बारीकी से याद रखें।
पंचामृत को याद रखने के लिए संख्याओं की एक घटती-बढ़ती शृंखला बनाएँ: "500-50-1-45-70"। सोचें — 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता (सबसे बड़ी संख्या, क्षमता का लक्ष्य), 50% ऊर्जा नवीकरणीय स्रोतों से (आधा हिस्सा), 1 अरब टन उत्सर्जन में कमी (एक बड़ी कटौती), 45% तीव्रता में कमी (लगभग आधे के करीब, पर अलग आधार वर्ष 2005 से), और अंत में 70 यानी 2070 में नेट-ज़ीरो। ध्यान दें: पहले चार लक्ष्य 2030 तक हैं, पाँचवाँ अकेला 2070 तक — यही एक अपवाद परीक्षा में सबसे ज़्यादा जाँचा जाता है।
अभ्यर्थी अक्सर यह मान लेते हैं कि "SDG इंडेक्स में भारत का स्कोर" एक ही आँकड़ा है, जबकि वास्तव में दो पूरी तरह अलग सूचकांक मौजूद हैं। SDG इंडिया इंडेक्स नीति आयोग द्वारा जारी किया जाता है और भारत के 28 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों की आपस में तुलना करता है — इसमें भारत का समग्र राष्ट्रीय स्कोर 2023-24 में 71 था, और केरल-उत्तराखंड शीर्ष पर रहे। इसके विपरीत, Sustainable Development Report संयुक्त राष्ट्र सतत विकास समाधान नेटवर्क (UN SDSN) द्वारा प्रकाशित होती है और भारत की तुलना विश्व के 166 अन्य देशों से करती है — इसमें भारत 2025 में 99वें स्थान पर रहा (स्कोर 67)। दोनों सूचकांकों के स्कोर अलग होने का कारण यह है कि दोनों में शामिल संकेतक, भार (weights) व तुलना-समूह (राज्य बनाम देश) भिन्न हैं — परीक्षा में जब भी कोई प्रश्न "भारत का SDG स्कोर" पूछे, सबसे पहले यह देखें कि प्रश्न राज्यों की तुलना (NITI Aayog) की बात कर रहा है या देशों की वैश्विक तुलना (UN SDSN) की।
Q1. हरित GDP की अवधारणा पारंपरिक GDP से किस प्रकार भिन्न है?
✅ हरित GDP, पारंपरिक GDP में से प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण और पर्यावरणीय क्षति की अनुमानित लागत घटाकर प्राप्त किया जाता है, जिससे आर्थिक कल्याण की अधिक यथार्थवादी तस्वीर मिलती है।
Q2. SDG इंडिया इंडेक्स 2023-24 में भारत का समग्र स्कोर कितना था, और कौन-से राज्य शीर्ष पर रहे?
✅ भारत का समग्र स्कोर 71 था; केरल और उत्तराखंड संयुक्त रूप से स्कोर 79 के साथ शीर्ष पर रहे।
Q3. भारत के "पंचामृत" जलवायु लक्ष्यों में से 2070 तक हासिल किया जाने वाला लक्ष्य क्या है, और शेष चार लक्ष्यों की समय-सीमा क्या है?
✅ 2070 तक शुद्ध शून्य (नेट-ज़ीरो) कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य; शेष चार लक्ष्य (500 GW क्षमता, 50% नवीकरणीय ऊर्जा, 1 अरब टन उत्सर्जन कटौती, 45% उत्सर्जन तीव्रता में कमी) 2030 तक हासिल किए जाने हैं।
Q4. भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS), 2023 किस अधिनियम के तहत अधिसूचित हुई और इसे कौन-सी संस्था क्रियान्वित करती है?
✅ यह ऊर्जा संरक्षण अधिनियम (2022 के संशोधन के बाद) के तहत अधिसूचित हुई और ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) द्वारा क्रियान्वित की जाती है।
Q5. NAPCC के अंतर्गत आने वाले आठ राष्ट्रीय मिशनों में से किन्हीं तीन के नाम बताएँ।
✅ राष्ट्रीय सौर मिशन, उन्नत ऊर्जा दक्षता के लिए राष्ट्रीय मिशन, तथा हरित भारत के लिए राष्ट्रीय मिशन (कुल आठ मिशनों में से कोई भी तीन स्वीकार्य: इनमें सतत आवास, जल, हिमालयी पारिस्थितिकी, सतत कृषि और सामरिक ज्ञान मिशन भी शामिल हैं)।
सारांश
पर्यावरण और सतत विकास अब भारतीय अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा नीति-चर्चा का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। हरित GDP और पर्यावरणीय अर्थशास्त्र की अवधारणाएँ — बाह्यताएँ, प्रदूषक भुगतान सिद्धांत, सावधानी सिद्धांत — यह समझने की नींव रखती हैं कि पारंपरिक आर्थिक मापक प्रकृति की लागत को क्यों नज़रअंदाज़ करते हैं। संयुक्त राष्ट्र के 17 SDGs पर भारत की प्रगति दो अलग-अलग किंतु पूरक सूचकांकों से मापी जाती है — घरेलू स्तर पर NITI Aayog का SDG इंडिया इंडेक्स (2023-24 में स्कोर 71) और वैश्विक स्तर पर UN SDSN की Sustainable Development Report (2025 में 166 में से 99वाँ स्थान)। जलवायु मोर्चे पर, COP-26 में घोषित पंचामृत लक्ष्य — 500 GW क्षमता, 50% नवीकरणीय ऊर्जा, 1 अरब टन उत्सर्जन कटौती व 45% तीव्रता कमी (सभी 2030 तक), और 2070 तक नेट-ज़ीरो — भारत की जलवायु कूटनीति और घरेलू नीति दोनों को दिशा देते हैं, जिन्हें कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS) और सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड जैसे वित्तीय व बाज़ार-आधारित उपकरणों से सहारा मिलता है। साथ ही, PARIVESH पोर्टल व अपराधमुक्तीकरण जैसे सुधार पर्यावरणीय स्वीकृति-प्रणाली को व्यापार-सुगमता के अनुरूप बनाने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि 2008 की NAPCC आज भी आठ राष्ट्रीय मिशनों के माध्यम से भारत की मूल जलवायु-रणनीति की रीढ़ बनी हुई है। RAS प्रारंभिक परीक्षा के लिए, पंचामृत के पाँच आँकड़े, दोनों SDG सूचकांकों का अंतर, और NAPCC के आठ मिशनों के नाम — इन तीन आधारों पर पकड़ मज़बूत रखें।
⚡ त्वरित रिवीजन — One-Liners
- •GDP = C + I + G + (X−M); यह एक वर्ष में देश की सीमा के भीतर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य है।
- •भारत की पहली पंचवर्षीय योजना 1951-56 में 'हैरोड-डोमर' मॉडल पर आधारित थी।
- •RBI की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को हुई; 1949 में राष्ट्रीयकरण; मुख्यालय मुंबई।
- •भारत में GST 1 जुलाई 2017 से लागू; 101वें संशोधन (2016)।
- •GDP = देश की भौगोलिक सीमा के भीतर एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं/सेवाओं का बाजार मूल्य।