परिचय
RAS प्रारंभिक परीक्षा के "आर्थिक अवधारणाएँ एवं भारतीय अर्थव्यवस्था" खंड में मुद्रास्फीति (Inflation) सबसे अधिक बार पूछे जाने वाले विषयों में से एक है, क्योंकि मौद्रिक नीति, RBI के कार्य, राजकोषीय नीति और यहाँ तक कि राजस्थान से जुड़े मूल्य-रुझान जैसे कई अन्य विषय भी अंततः इसी अवधारणा से जुड़ते हैं। सरल शब्दों में, मुद्रास्फीति का अर्थ है किसी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के सामान्य मूल्य-स्तर में समय के साथ होने वाली निरंतर वृद्धि। यहाँ "निरंतर" शब्द महत्वपूर्ण है — किसी एक वस्तु की कीमत में खराब मानसून के कारण अचानक एक बार की उछाल मुद्रास्फीति नहीं कहलाती; असली मुद्रास्फीति तब मानी जाती है जब महीने-दर-महीने वस्तुओं और सेवाओं की पूरी टोकरी की कीमतें व्यापक रूप से और लगातार बढ़ती रहें। चूँकि मुद्रा ही वह माध्यम है जिससे लोग यह टोकरी खरीदते हैं, इसलिए कीमतों में निरंतर वृद्धि का अर्थ मुद्रा की क्रय-शक्ति में गिरावट भी है — यानी अब वही सौ रुपये पहले से कम वस्तुएँ खरीद पाते हैं। मूल्य-स्तर की यह घटना और क्रय-शक्ति की यह घटना एक साथ जुड़ी होने के कारण ही मुद्रास्फीति लगभग हर आर्थिक नीति-विषय के केंद्र में आ जाती है, जिसे RAS अभ्यर्थियों को समझना आवश्यक है।
मुख्य अवधारणाएँ
1. मुद्रास्फीति वास्तव में क्या है?
औपचारिक रूप से, मुद्रास्फीति को किसी अर्थव्यवस्था के सामान्य मूल्य-स्तर में निरंतर वृद्धि के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसे आमतौर पर एक माह या एक वर्ष की अवधि में प्रतिशत परिवर्तन दर के रूप में मापा जाता है। इसके विपरीत स्थिति, जब सामान्य मूल्य-स्तर लगातार गिरता है, उसे अपस्फीति (Deflation) कहा जाता है, जबकि मूल्य-वृद्धि की दर के धीमा पड़ने (परंतु कीमतें वास्तव में न गिरने) को विमुद्रास्फीति (Disinflation) कहा जाता है — यह अंतर परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है क्योंकि विद्यार्थी अक्सर "कीमतों का गिरना" और "मुद्रास्फीति दर का गिरना" को एक-दूसरे से भ्रमित कर बैठते हैं।
2. कारण के आधार पर मुद्रास्फीति के प्रकार
अर्थशास्त्री मूल्य-वृद्धि के पीछे मांग और आपूर्ति में से किस पक्ष की भूमिका अधिक है, इस आधार पर मुद्रास्फीति को वर्गीकृत करते हैं।
माँग-प्रेरित मुद्रास्फीति (Demand-Pull Inflation) तब होती है जब अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की समग्र माँग, उनकी आपूर्ति क्षमता की तुलना में तेज़ी से बढ़ती है। इसे प्रायः "बहुत अधिक पैसा बहुत कम वस्तुओं के पीछे" के रूप में समझाया जाता है। यह स्थिति तब उत्पन्न हो सकती है जब घरेलू आय में तेज़ वृद्धि हो, सरकारी खर्च तेज़ी से बढ़े, ऋण सस्ता और सुलभ हो जाए, या निर्यात के कारण घरेलू उत्पादन का बड़ा हिस्सा विदेशी बाज़ारों की ओर मुड़ जाए और घरेलू खरीददारों के लिए कम बचे। चूँकि आपूर्ति तुरंत इतनी मांग के अनुरूप नहीं बढ़ सकती, विक्रेता अल्पकाल में अधिक उत्पादन करने के बजाय कीमतें बढ़ाकर प्रतिक्रिया देते हैं।
लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति (Cost-Push Inflation) इसके विपरीत आपूर्ति पक्ष से उत्पन्न होती है। यहाँ कीमतें इसलिए बढ़ती हैं क्योंकि वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन की लागत बढ़ जाती है — जैसे मज़दूरी में वृद्धि, कच्चे तेल या औद्योगिक धातुओं जैसे प्रमुख कच्चे माल की कीमतों में उछाल, या आपूर्ति-श्रृंखला में व्यवधान के कारण कच्चा माल दुर्लभ और महँगा हो जाना। उत्पादक इस बढ़ी हुई लागत का बोझ ऊँची कीमतों के रूप में उपभोक्ताओं पर डाल देते हैं, भले ही माँग में विशेष परिवर्तन न हुआ हो। अंतर याद रखने का सरल तरीका: माँग-प्रेरित मुद्रास्फीति में खरीददार वस्तुओं के लिए होड़ करके कीमतें ऊपर "खींचते" हैं, जबकि लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति में उत्पादक बढ़े हुए लागत-बोझ के कारण कीमतों को ऊपर "धकेलते" हैं।
3. मात्रा/दर के आधार पर मुद्रास्फीति के प्रकार
मुद्रास्फीति को इस आधार पर भी वर्गीकृत किया जाता है कि कीमतें कितनी तेज़ी से बढ़ रही हैं, क्योंकि हल्की मुद्रास्फीति को प्रायः बढ़ती अर्थव्यवस्था की सामान्य और यहाँ तक कि स्वस्थ विशेषता माना जाता है, जबकि अत्यंत तीव्र मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर सकती है।
रेंगती/मंद मुद्रास्फीति (Creeping/Mild Inflation) कीमतों में धीमी, क्रमिक वृद्धि को दर्शाती है, जो आमतौर पर वार्षिक आधार पर एकल अंकों में कम होती है। इसे सामान्यतः प्रबंधनीय माना जाता है, और सीमित मात्रा में इसे स्वस्थ, बढ़ती अर्थव्यवस्था का संकेत भी माना जाता है क्योंकि यह जमाखोरी के बजाय खर्च और निवेश को प्रोत्साहित करती है।
चलती मुद्रास्फीति (Walking Inflation) मध्यम किंतु स्पष्ट रूप से तेज़ मूल्य-वृद्धि दर को दर्शाती है। इस स्तर पर कीमतें इतनी तेज़ी से बढ़ने लगती हैं कि उपभोक्ता और व्यवसाय अपने व्यवहार में बदलाव करना शुरू कर देते हैं, और नीति-निर्माता भी इस पर बारीकी से ध्यान देने लगते हैं।
सरपट मुद्रास्फीति (Galloping Inflation) कहीं अधिक गंभीर और तीव्र मूल्य-वृद्धि है, जो दोहरे अंकों या उससे अधिक तक पहुँच सकती है और अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से अस्त-व्यस्त कर सकती है — यह बचत को नष्ट करती है, निवेश निर्णयों को विकृत करती है और निश्चित आय वाले परिवारों की क्रय-शक्ति को कुचल देती है।
अति-मुद्रास्फीति (Hyperinflation) सबसे चरम श्रेणी है, जिसमें कीमतें असाधारण रूप से तेज़ गति से — कभी-कभी दिन-प्रतिदिन या घंटे-दर-घंटे — बेकाबू होकर बढ़ती हैं। मुद्रा इतनी तेज़ी से अपना मूल्य खो देती है कि वह प्रभावी रूप से मूल्य-संचयन के विश्वसनीय साधन के रूप में कार्य करना बंद कर देती है, और ऐसी अर्थव्यवस्थाओं में लोग प्रायः नकदी को तुरंत खर्च करने की जल्दी में रहते हैं या वस्तु-विनिमय अथवा विदेशी मुद्रा का सहारा लेने लगते हैं।
4. भारत में मुद्रास्फीति का मापन: CPI और WPI
भारत मुख्य रूप से दो सूचकांकों के माध्यम से मुद्रास्फीति को मापता है, और यह जानना कि प्रत्येक सूचकांक क्या मापता है — तथा नीति के लिए कौन-सा सूचकांक अधिक महत्वपूर्ण है — इस पूरे विषय के सबसे परीक्षा-उपयोगी बिंदुओं में से एक है।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index, CPI) घरों द्वारा उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं — जैसे खाद्य पदार्थ, ईंधन, आवास, वस्त्र, स्वास्थ्य-सेवा, शिक्षा आदि — की एक निश्चित टोकरी के लिए भुगतान की गई कीमतों में औसत परिवर्तन को खुदरा स्तर पर वास्तविक रूप में मापता है। चूँकि CPI यह दर्शाता है कि सामान्य उपभोक्ता बाज़ार में वास्तव में क्या भुगतान करते हैं, इसे जीवन-यापन की लागत का अधिक सटीक संकेतक माना जाता है, और भारत के मौद्रिक नीति प्राधिकरण आधिकारिक रूप से CPI आधारित मुद्रास्फीति को ही लक्ष्य बनाते हैं।
वहीं दूसरी ओर, थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index, WPI) वस्तुओं की कीमतों में औसत परिवर्तन को थोक अथवा उत्पादक स्तर पर मापता है — यानी वस्तुओं के खुदरा दुकानों तक पहुँचने से पहले, पहले बड़े व्यापारिक सौदे के बिंदु पर कीमतें। WPI में विनिर्मित उत्पादों, प्राथमिक वस्तुओं और ईंधन/ऊर्जा का प्रभुत्व होता है, और महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सेवाओं को बिल्कुल भी शामिल नहीं करता। WPI का व्यापक रूप से उत्पादक स्तर पर मूल्य-रुझानों को ट्रैक करने और उपभोक्ताओं तक पहुँचने से पहले बन रहे लागत-दबावों को समझने के लिए उपयोग किया जाता है, परंतु भारत में मौद्रिक नीति लक्ष्य निर्धारित करने के लिए इसका उपयोग नहीं किया जाता।
5. RBI का मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचा
भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम में संशोधन के बाद, भारत ने औपचारिक रूप से एक लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचा (Flexible Inflation Targeting Framework) अपनाया, जिसके अंतर्गत भारत सरकार, RBI के परामर्श से, एक केंद्रीय बिंदु और उसके दोनों ओर एक सहनशीलता बैंड (tolerance band) वाली एक संख्यात्मक मुद्रास्फीति सीमा निर्धारित करती है। इस लक्ष्य को पूरा करने की जिम्मेदारी मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee, MPC) की होती है — एक सांविधिक, बहु-सदस्यीय समिति जिसमें RBI के अधिकारी और बाहरी विशेषज्ञ शामिल होते हैं — जो समय-समय पर बैठकें करके नीतिगत रेपो दर और अन्य मौद्रिक उपकरण तय करती है ताकि CPI मुद्रास्फीति को लक्ष्य बैंड के भीतर रखा जा सके। यदि मुद्रास्फीति निर्धारित अवधि तक सहनशीलता बैंड से बाहर रहती है, तो RBI को सरकार को यह स्पष्ट करना आवश्यक होता है कि लक्ष्य क्यों चूका और सुधारात्मक कदम के रूप में वह क्या करने वाला है। यह ढाँचा मौद्रिक नीति के प्रति पहले की अधिक विवेकाधीन प्रवृत्तियों से एक महत्वपूर्ण बदलाव दर्शाता है, और RAS अभ्यर्थियों को याद रखना चाहिए कि इस लक्ष्यीकरण ढाँचे का आधार CPI है, WPI नहीं।
6. मुद्रास्फीति नियंत्रण के उपाय
सरकारें और केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के लिए मुख्यतः तीन व्यापक श्रेणियों के उपकरणों का उपयोग करते हैं।
मौद्रिक उपाय (Monetary Measures) केंद्रीय बैंक द्वारा अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति और ऋण की उपलब्धता को कम करने के लिए उठाए गए कदम हैं। रेपो दर — वह दर जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक धन उधार देता है — बढ़ाने से पूरी अर्थव्यवस्था में उधार लेना महँगा हो जाता है, जिससे खर्च और निवेश हतोत्साहित होते हैं और माँग-प्रेरित मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। इसी तरह, नकद आरक्षित अनुपात (CRR) या सांविधिक तरलता अनुपात (SLR) बढ़ाने से बैंकों को अपनी जमाराशि के बड़े हिस्से को उधार देने के बजाय सुरक्षित रखना पड़ता है, जिससे मुद्रा आपूर्ति और सख्त हो जाती है।
राजकोषीय उपाय (Fiscal Measures) सरकार द्वारा अपने बजट के माध्यम से उठाए गए कदम हैं। सरकारी व्यय में कमी करना, सब्सिडी घटाना, या कराधान बढ़ाना — ये सभी अर्थव्यवस्था में समग्र माँग को कम कर सकते हैं, जिससे माँग-प्रेरित दबाव कम होता है। राजकोषीय उपाय मौद्रिक उपायों की तुलना में धीमी गति से काम करते हैं क्योंकि इनके लिए आमतौर पर विधायी या बजटीय प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है।
आपूर्ति-पक्षीय उपाय (Supply-Side Measures) माँग पक्ष के बजाय उत्पादन और उपलब्धता के पक्ष से मुद्रास्फीति पर प्रहार करते हैं। किसी दुर्लभ वस्तु के आयात को उदार बनाने से उसकी घरेलू उपलब्धता बढ़ती है और कीमतें नीचे लाने में मदद मिलती है; सरकार के पास रखे खाद्यान्न के बफर स्टॉक से भंडार जारी करने से खाद्य मुद्रास्फीति को तेज़ी से कम किया जा सकता है; और आपूर्ति-श्रृंखला की दक्षता में सुधार या उत्पादन-वितरण में बाधाओं को दूर करने से लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति के मूल कारणों का समाधान किया जा सकता है।
7. संबंधित अवधारणाएँ: अपस्फीति और स्टैगफ्लेशन
अपस्फीति (Deflation) मुद्रास्फीति के ठीक विपरीत है — सामान्य मूल्य-स्तर में निरंतर गिरावट। कीमतों का गिरना उपभोक्ताओं के लिए लाभकारी लग सकता है, परंतु निरंतर अपस्फीति को आमतौर पर अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक माना जाता है क्योंकि यह खर्च को हतोत्साहित करती है (लोग यह सोचकर खरीद टालते हैं कि कीमतें और गिरेंगी), व्यावसायिक राजस्व और लाभ को दबाती है, और गिरते उत्पादन, गिरती मज़दूरी तथा बढ़ती बेरोज़गारी के दुष्चक्र को जन्म दे सकती है।
स्टैगफ्लेशन (Stagflation) एक असामान्य और विशेष रूप से कठिन संयोजन है — उच्च मुद्रास्फीति का ठहरी हुई आर्थिक वृद्धि और उच्च बेरोज़गारी के साथ एक साथ घटित होना। सामान्य परिस्थितियों में मुद्रास्फीति और बेरोज़गारी विपरीत दिशाओं में चलते हैं — मज़बूत माँग जो कीमतें बढ़ाती है, आमतौर पर रोज़गार भी पैदा करती है। स्टैगफ्लेशन इस प्रवृत्ति को तोड़ देता है, जो आमतौर पर किसी गंभीर आपूर्ति-पक्षीय झटके (जैसे तेल की कीमतों में तीव्र उछाल) से उत्पन्न होता है, जो एक साथ लागत बढ़ाता है (मुद्रास्फीति को ऊपर धकेलता है) और उत्पादन को बाधित करता है (वृद्धि और रोज़गार को नीचे धकेलता है)। चूँकि मुद्रास्फीति से लड़ने वाले पारंपरिक मौद्रिक उपकरण (ब्याज दरें बढ़ाना) वृद्धि को और धीमा कर देते हैं, और वृद्धि बढ़ाने वाले उपकरण (ब्याज दरें घटाना) मुद्रास्फीति को और भड़का देते हैं, इसलिए स्टैगफ्लेशन को नीति-निर्माताओं के लिए सबसे कठिन परिस्थितियों में से एक माना जाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
- मुद्रास्फीति को किसी निश्चित अवधि में सामान्य मूल्य-स्तर में प्रतिशत परिवर्तन दर के रूप में मापा जाता है, प्रायः वर्ष-दर-वर्ष या महीने-दर-महीने आधार पर।
- भारत की मौद्रिक नीति आधिकारिक रूप से CPI आधारित मुद्रास्फीति को लक्षित करती है, WPI को नहीं — यह RBI अधिनियम के संशोधन पर आधारित लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचे के तहत होता है।
- मौद्रिक नीति समिति (MPC) वह सांविधिक निकाय है जो मुद्रास्फीति को सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य बैंड के भीतर रखने हेतु नीतिगत रेपो दर तय करने के लिए जिम्मेदार है।
- WPI की टोकरी में सेवाएँ शामिल नहीं होतीं, जबकि CPI में होती हैं — यह दोनों सूचकांकों के बीच सबसे मूलभूत संरचनात्मक अंतरों में से एक है।
- माँग-प्रेरित मुद्रास्फीति अत्यधिक माँग से उत्पन्न होती है; लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति उत्पादन लागत बढ़ने से उत्पन्न होती है — वास्तविक दुनिया में दोनों एक साथ भी हो सकती हैं।
- अपस्फीति सामान्य मूल्य-स्तर में निरंतर गिरावट है, जबकि विमुद्रास्फीति केवल मूल्य-वृद्धि दर के धीमा पड़ने को दर्शाती है — विमुद्रास्फीति में कीमतें अब भी बढ़ रही होती हैं, बस धीमी गति से।
- स्टैगफ्लेशन में उच्च मुद्रास्फीति, ठहरी हुई वृद्धि और उच्च बेरोज़गारी एक साथ होते हैं — यह ऐसा संयोजन है जिसे परंपरागत आर्थिक सिद्धांत आसानी से नहीं समझा पाता।
- अति-मुद्रास्फीति (Hyperinflation) मुद्रास्फीति की सबसे चरम श्रेणी है, जिसमें मुद्रा का मूल्य कुछ ही दिनों में ढह सकता है।
परीक्षा टिप्स
- जब प्रश्न में "अत्यधिक माँग", "ऋण विस्तार" या "बढ़ती आय" के कारण मूल्य-वृद्धि का वर्णन हो, तो उसे माँग-प्रेरित मुद्रास्फीति समझें; जब मज़दूरी, इनपुट लागत या आपूर्ति-व्यवधान का वर्णन हो, तो उसे लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति समझें।
- याद रखें कि भारत के आधिकारिक मुद्रास्फीति लक्ष्य के लिए CPI का उपयोग होता है — प्रश्नों में अक्सर लक्ष्यीकरण ढाँचे के समान कथन में WPI को गलती से डालकर भ्रमित करने की कोशिश की जाती है।
- अपस्फीति (कीमतों का गिरना) और विमुद्रास्फीति (मूल्य-वृद्धि दर का धीमा होना) को कभी न मिलाएँ — ये दोनों पेचीदा बहुविकल्पीय विकल्पों में अक्सर आपस में बदल दिए जाते हैं।
- चार दर-आधारित श्रेणियों को गंभीरता के क्रम में याद रखें: रेंगती < चलती < सरपट < अति-मुद्रास्फीति, और किसी दिए गए परिदृश्य को सही श्रेणी से मिलाने के लिए तैयार रहें।
- स्टैगफ्लेशन से जुड़े प्रश्न आमतौर पर मुद्रास्फीति और बेरोज़गारी/ठहरी वृद्धि के असामान्य सह-अस्तित्व की पहचान पर केंद्रित होते हैं — एक ही परिदृश्य में दोनों लक्षणों को जोड़ने वाले वाक्यांशों पर ध्यान दें।
कल्पना करें मुद्रास्फीति एक सीढ़ी चढ़ रही है: बिल्ली (रेंगती) धीरे-धीरे रेंगती है, आदमी (चलती) सामान्य गति से चलता है, जिराफ़ (सरपट) दौड़ता-भागता है, और घोड़ा (अति-मुद्रास्फीति) बेकाबू होकर सरपट भाग जाता है। वाक्यांश याद रखें — "बिल्ली रेंगती है, आदमी चलता है, जिराफ़ सरपट दौड़ता है, घोड़ा बेकाबू हो जाता है" — यह क्रम रेंगती (Creeping) → चलती (Walking) → सरपट (Galloping) → अति-मुद्रास्फीति (Hyperinflation) की सही बढ़ती गंभीरता के क्रम से मेल खाता है।
भारत में सबसे अधिक भ्रमित करने वाली जोड़ी है CPI और WPI। CPI (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) खुदरा स्तर पर मापता है कि आम उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं की एक निश्चित टोकरी के लिए वास्तव में क्या भुगतान करता है, और यही सूचकांक भारत के आधिकारिक मुद्रास्फीति लक्ष्य तथा मौद्रिक नीति समिति के निर्णयों का आधार है। WPI (थोक मूल्य सूचकांक) इसके विपरीत थोक/उत्पादक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों को मापता है — यानी वस्तुओं के खुदरा बाज़ार तक पहुँचने से पहले की कीमतें — और महत्वपूर्ण रूप से यह सेवाओं को अपनी टोकरी में शामिल नहीं करता। याद रखें: CPI = उपभोक्ता + खुदरा + सेवाएँ शामिल; WPI = उत्पादक + थोक + सेवाएँ शामिल नहीं। जब भी प्रश्न में "मौद्रिक नीति लक्ष्य" या "सेवाओं सहित टोकरी" का उल्लेख हो, उत्तर CPI ही होगा, WPI नहीं।
प्र.1. घरेलू आय और सरकारी खर्च में तीव्र वृद्धि के कारण समग्र माँग अर्थव्यवस्था की आपूर्ति क्षमता से अधिक हो जाती है, जिससे कीमतें बढ़ती हैं। यह किस प्रकार की मुद्रास्फीति है?
✅ माँग-प्रेरित मुद्रास्फीति (Demand-Pull Inflation) — यह तब उत्पन्न होती है जब समग्र माँग वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति क्षमता से तेज़ी से बढ़ती है, जिसे प्रायः "बहुत अधिक पैसा बहुत कम वस्तुओं के पीछे" कहा जाता है।
प्र.2. भारत की मौद्रिक नीति समिति लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचे के तहत आधिकारिक रूप से किस मूल्य सूचकांक को लक्षित करती है — CPI या WPI?
✅ CPI (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) — यह खुदरा, उपभोक्ता-स्तरीय कीमतों को दर्शाता है और भारत के आधिकारिक मुद्रास्फीति लक्ष्य का आधार है, जबकि WPI सेवाओं को शामिल नहीं करता और थोक/उत्पादक कीमतों को मापता है।
प्र.3. निम्नलिखित को बढ़ती गंभीरता के क्रम में व्यवस्थित करें: चलती, अति-मुद्रास्फीति, रेंगती, सरपट।
✅ रेंगती → चलती → सरपट → अति-मुद्रास्फीति, जो क्रमशः तेज़ और अधिक विघटनकारी मूल्य-वृद्धि दरों को दर्शाता है।
प्र.4. उच्च मुद्रास्फीति के ठहरी हुई आर्थिक वृद्धि और उच्च बेरोज़गारी के साथ एक साथ घटित होने के असामान्य संयोजन को क्या कहा जाता है?
✅ स्टैगफ्लेशन (Stagflation) — यह आमतौर पर किसी गंभीर आपूर्ति-पक्षीय झटके से उत्पन्न होता है जो एक साथ लागत बढ़ाता है और उत्पादन बाधित करता है, तथा मुद्रास्फीति व बेरोज़गारी के बीच सामान्य विपरीत संबंध को तोड़ देता है।
प्र.5. अपस्फीति और विमुद्रास्फीति के बीच मुख्य अंतर क्या है?
✅ अपस्फीति सामान्य मूल्य-स्तर में निरंतर गिरावट है, जबकि विमुद्रास्फीति केवल मूल्य-वृद्धि दर के धीमा पड़ने को दर्शाती है — विमुद्रास्फीति में कीमतें अब भी बढ़ रही होती हैं, बस धीमी गति से।
सारांश
संक्षेप में, मुद्रास्फीति सामान्य मूल्य-स्तर में एक निरंतर वृद्धि है जो मुद्रा की क्रय-शक्ति को क्षीण करती है। यह अत्यधिक माँग (माँग-प्रेरित) या बढ़ती उत्पादन लागत (लागत-प्रेरित) से उत्पन्न हो सकती है, और इसकी गंभीरता हल्की रेंगती मुद्रास्फीति से लेकर विनाशकारी अति-मुद्रास्फीति तक फैली होती है। भारत मुख्यतः CPI (खुदरा, उपभोक्ता-केंद्रित सूचकांक, जो मौद्रिक नीति समिति के माध्यम से RBI के लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचे का आधार है) और WPI (थोक, उत्पादक-केंद्रित सूचकांक, जो सेवाओं को शामिल नहीं करता) के माध्यम से मुद्रास्फीति मापता है। नीति-निर्माता मौद्रिक उपायों (रेपो दर, CRR/SLR), राजकोषीय उपायों (व्यय एवं सब्सिडी नियंत्रण) और आपूर्ति-पक्षीय उपायों (आयात उदारीकरण, बफर स्टॉक जारी करना) के माध्यम से मुद्रास्फीति को नियंत्रित करते हैं। RAS प्रारंभिक परीक्षा के लिए याद रखने योग्य संबंधित अवधारणाओं में अपस्फीति (मुद्रास्फीति का विपरीत), विमुद्रास्फीति (मूल्य-वृद्धि दर का धीमा होना), और स्टैगफ्लेशन (उच्च मुद्रास्फीति का ठहरी वृद्धि व बेरोज़गारी के साथ असामान्य संयोजन) शामिल हैं।
⚡ त्वरित रिवीजन — One-Liners
- •GDP = C + I + G + (X−M); यह एक वर्ष में देश की सीमा के भीतर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य है।
- •भारत की पहली पंचवर्षीय योजना 1951-56 में 'हैरोड-डोमर' मॉडल पर आधारित थी।
- •RBI की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को हुई; 1949 में राष्ट्रीयकरण; मुख्यालय मुंबई।
- •भारत में GST 1 जुलाई 2017 से लागू; 101वें संशोधन (2016)।
- •GDP = देश की भौगोलिक सीमा के भीतर एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं/सेवाओं का बाजार मूल्य।