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ध्वनि एवं उसका वर्गीकरण

‘घ’ के बारे में तीन बातें बिना याद किए बताई जा सकती हैं — वह कंठ्य है, सघोष है और महाप्राण है — केवल इसलिए कि वह क-वर्ग का चौथा वर्ण है। इस अध्याय की सारी तालिकाएँ एक ही व्यवस्था से निकलती हैं, और वह व्यवस्था समझ लेने पर रटना नहीं पड़ता।

30 सितंबर 2026 को सत्यापित

ध्वनि और वर्ण — पहले यह अंतर पक्का कीजिए

ध्वनि वह है जो मुँह से निकलती है और कान सुनता है। वर्ण वह है जो उस ध्वनि को काग़ज़ पर दिखाने के लिए बनाया गया चिह्न है। ‘क’ बोलिए तो वह ध्वनि है; ‘क’ लिखिए तो वह वर्ण है। इसीलिए परिभाषा यों दी जाती है — वर्ण भाषा की वह सबसे छोटी इकाई है जिसके और टुकड़े नहीं किए जा सकते।

यह अंतर छोटा लगता है, पर पूरा अध्याय इसी पर टिका है। वर्गीकरण ध्वनि का होता है, वर्ण का नहीं — इसीलिए वर्गीकरण की कसौटियाँ भी बोलने से जुड़ी हैं: मुँह में कहाँ से आवाज़ उठी, साँस कितनी लगी, गला काँपा या नहीं। लिखावट का इससे कोई संबंध नहीं।

कसौटी यह है कि ध्वनि सुनाई देती है और वर्ण दिखाई देता है। एक ही ध्वनि को अलग-अलग लिपियों में अलग-अलग वर्ण से लिखा जा सकता है, पर ध्वनि वही रहती है।

किन परीक्षाओं में पूछा जाता है

परीक्षाकहाँ पूछा जाता है
RSSB CET स्नातक स्तर2024 के पाठ्यक्रम (06-08-2024) में ‘ध्वनि एवं उसका वर्गीकरण’ नाम से था। 2026 की विस्तृत विज्ञप्ति (01-07-2026) की सामान्य हिन्दी सूची में यह बिंदु नहीं है — मूल दस्तावेज़ पढ़कर जाँचा गया।
RSSB CET वरिष्ठ माध्यमिक (12वीं) स्तरकिसी भी वर्ष के पाठ्यक्रम में नाम से नहीं

हिंदी में कुल कितने वर्ण हैं — और यह प्रश्न विवादित क्यों है

इस अध्याय में सबसे अधिक भ्रम इसी गिनती को लेकर है, और भ्रम इसलिए है कि दोनों उत्तर अपनी-अपनी जगह सही हैं। जो गिनती किस आधार पर की जा रही है, प्रश्न प्रायः यही जाँचता है।

मूल वर्ण चौवालीस हैं — ग्यारह स्वर और तैंतीस व्यंजन। यह परंपरागत गिनती है, जो संस्कृत की वर्ण-व्यवस्था से चली आई है। ध्यान रहे कि यह आधुनिक ध्वनिविज्ञान की गिनती नहीं है — उसमें ऋ को हिंदी का स्वतंत्र स्वर नहीं माना जाता, जबकि ड़ और ढ़ को स्वतंत्र ध्वनि माना जाता है। परीक्षा परंपरागत गिनती ही पूछती है, पर कारण यह है, न कि ‘ये स्वतंत्र ध्वनियाँ हैं’।

व्यवहार में पढ़ाई जाने वाली वर्णमाला बावन की है। उसमें उन्हीं चौवालीस के साथ चार और श्रेणियाँ जोड़ ली जाती हैं — दो अयोगवाह (अं, अः), दो उत्क्षिप्त या द्विगुण व्यंजन (ड़, ढ़) और चार संयुक्त व्यंजन (क्ष, त्र, ज्ञ, श्र)। 44 + 2 + 2 + 4 = 52।

इनके अलावा कुछ आगत या गृहीत ध्वनियाँ हैं जो अरबी-फ़ारसी और अंग्रेज़ी से आईं — क़, ख़, ग़, ज़, फ़ और ऑ। ये मानक वर्णमाला की गिनती में सामान्यतः नहीं जोड़ी जातीं, पर लिखने में चलती हैं। प्रश्न यदि ‘मूल वर्ण’ पूछे तो उत्तर 44 है; यदि ‘हिंदी वर्णमाला’ पूछे तो 52 — और यही अंतर पढ़कर जाना चाहिए, क्योंकि दोनों संख्याएँ विकल्पों में साथ-साथ दी जाती हैं।

स्वर — कुल 11, समय के आधार पर वर्गीकरण

भेदसंख्यावर्णपहचान
ह्रस्व (मूल) स्वर4अ, इ, उ, ऋएक मात्रा का समय लगता है
दीर्घ स्वर7आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औदो मात्रा का समय लगता है
प्लुत स्वर—ओ३म्, हे राऽऽमदीर्घ से भी अधिक समय — प्रायः संबोधन और मंत्रोच्चार में। इसका अपना कोई अलग वर्ण नहीं है, इसीलिए ग्यारह की गिनती में नहीं जुड़ता; यह उन्हीं स्वरों को खींचकर बोलने की एक स्थिति है।

व्यंजन — कुल 33, उच्चारण की रीति के आधार पर

भेदसंख्यावर्णपहचान
स्पर्श (वर्गीय)25क ख ग घ ङ · च छ ज झ ञ · ट ठ ड ढ ण · त थ द ध न · प फ ब भ मउच्चारण में जीभ किसी स्थान को छूती है
अंतःस्थ4य र ल वस्वर और व्यंजन के बीच की स्थिति — इसीलिए ‘अंतःस्थ’
ऊष्म (संघर्षी)4श ष स हहवा रगड़ खाकर निकलती है, ऊष्मा-सी पैदा होती है

उच्चारण-स्थान के आधार पर वर्गीकरण

भेदध्वनि कहाँ से उठती हैवर्ण
कंठ्यकंठअ, आ, क, ख, ग, घ, ङ, ह, विसर्ग
तालव्यकठोर तालुइ, ई, च, छ, ज, झ, ञ, य, श
मूर्धन्यमूर्धाऋ, ट, ठ, ड, ढ, ण, ड़, ढ़, र, ष
दंत्यदाँतत, थ, द, ध, न, ल, स
ओष्ठ्यदोनों होंठउ, ऊ, प, फ, ब, भ, म
कंठ-तालव्यकंठ तथा तालुए, ऐ
कंठ-ओष्ठ्यकंठ तथा होंठओ, औ
दंत-ओष्ठ्यनीचे का होंठ तथा ऊपर के दाँतव
नासिक्यनाकङ, ञ, ण, न, म तथा अनुस्वार

प्रयत्न के आधार पर वर्गीकरण — साँस और स्वर-तंत्रियाँ

भेदक्या होता हैकौन-से वर्ण
अल्पप्राणसाँस कम लगती हैप्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा और पाँचवाँ वर्ण — क, ग, ङ आदि; तथा य, र, ल, व
महाप्राणसाँस अधिक लगती है, ‘ह’ की ध्वनि मिली रहती हैप्रत्येक वर्ग का दूसरा और चौथा वर्ण — ख, घ, छ, झ आदि; तथा श, ष, स, ह
अघोषस्वर-तंत्रियाँ नहीं काँपतींप्रत्येक वर्ग का पहला और दूसरा वर्ण — क, ख, च, छ आदि; तथा श, ष, स
सघोषस्वर-तंत्रियाँ काँपती हैंप्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा और पाँचवाँ वर्ण; तथा य, र, ल, व, ह और सभी स्वर

पूरी तालिका याद रखने का एक ही नियम

उच्चारण-स्थान और प्रयत्न की तालिकाएँ लंबी दिखती हैं, पर इनके पीछे एक ही व्यवस्था है और वह व्यवस्था अपने आप में तर्क रखती है। पाँचों वर्गों को क्रम से बोलिए — क, च, ट, त, प। ध्यान दीजिए कि आवाज़ गले से शुरू होकर धीरे-धीरे आगे बढ़ती हुई होंठों पर आ जाती है। यही क्रम उच्चारण-स्थान का क्रम है: कंठ, तालु, मूर्धा, दाँत, होंठ।

प्रयत्न की तालिका में हर वर्ग के भीतर भी क्रम है। पहला और दूसरा वर्ण अघोष हैं, तीसरा, चौथा और पाँचवाँ सघोष। दूसरा और चौथा महाप्राण हैं, बाक़ी अल्पप्राण। इसका अर्थ यह हुआ कि किसी भी वर्ग का कोई भी वर्ण दीजिए, केवल उसकी स्थिति गिनकर उसके सारे लक्षण बताए जा सकते हैं — तालिका रटने की ज़रूरत ही नहीं।

एक उदाहरण से जाँच लीजिए: ‘घ’ क-वर्ग का चौथा वर्ण है। चौथा है, इसलिए सघोष और महाप्राण; क-वर्ग का है, इसलिए कंठ्य। तीनों उत्तर बिना याद किए निकल आए। परीक्षा का प्रश्न ठीक इसी रूप में आता है।

अकसर पूछे जाने वाले प्रश्न

अयोगवाह किसे कहते हैं और वे स्वर हैं या व्यंजन?+

अं (अनुस्वार) और अः (विसर्ग) को अयोगवाह कहते हैं। नाम का अर्थ है — जो योग के बिना वहन न कर सके। ये न पूरे स्वर हैं न पूरे व्यंजन, क्योंकि इनका उच्चारण स्वर के सहारे के बिना होता ही नहीं। इसीलिए इन्हें अलग श्रेणी में रखा जाता है।

ड़ और ढ़ को अलग क्यों गिना जाता है?+

क्योंकि ये संस्कृत की मूल ध्वनियाँ नहीं हैं। हिंदी में ये ड और ढ के उच्चारण-भेद से विकसित हुईं, इसलिए इन्हें उत्क्षिप्त या द्विगुण व्यंजन कहा जाता है और मूल तैंतीस में नहीं गिना जाता। ध्यान रहे — बनते ये नुक़्ते से ही हैं, पर ये क़, ज़, फ़ जैसी आगत ध्वनियाँ नहीं हैं; वे अरबी-फ़ारसी से आईं, जबकि ड़ और ढ़ हिंदी की अपनी विकसित ध्वनियाँ हैं।

क्ष, त्र, ज्ञ, श्र को संयुक्त व्यंजन क्यों कहते हैं?+

क्योंकि इनमें से हर एक दो या अधिक व्यंजनों के मेल से बना है — क् + ष = क्ष, त् + र = त्र, ज् + ञ = ज्ञ, श् + र = श्र। ये स्वतंत्र ध्वनियाँ नहीं हैं, इसीलिए मूल वर्णों में नहीं गिने जाते, यद्यपि वर्णमाला में पढ़ाए जाते हैं।

अनुस्वार और अनुनासिक में क्या अंतर है?+

अनुस्वार ( ं ) में ध्वनि पूरी तरह नाक से निकलती है, जैसे ‘हंस’। अनुनासिक ( ँ ) में ध्वनि नाक और मुँह दोनों से निकलती है, जैसे ‘हँस’। अंतर सुनने में छोटा लगता है पर अर्थ बदल देता है — हंस पक्षी है, हँस क्रिया।

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