द्विगु और द्वंद्व समास
दोनों भेद छोटे हैं और साथ पढ़ लेने में सुविधा रहती है। द्विगु में पहला पद संख्या होती है और पूरा शब्द एक समूह बताता है; द्वंद्व में दोनों पद बराबर होते हैं और बीच से और लुप्त रहता है। द्विगु के साथ बहुव्रीहि का जाल भी यहीं समझाया गया है।
द्विगु समास
जिस समास का पूर्वपद संख्यावाचक विशेषण हो और पूरा पद किसी समूह का बोध कराए, उसे द्विगु समास कहते हैं। यह असल में कर्मधारय का ही एक विशेष रूप है, फ़र्क़ सिर्फ़ इतना कि यहाँ विशेषण की जगह गिनती खड़ी होती है। ‘त्रिभुज’ का विग्रह ‘तीन भुजाओं का समूह’ है और ‘चौराहा’ का ‘चार राहों का समूह’। पहचान के लिए पूर्वपद में एक, दो, त्रि, चतुर्, पंच, सप्त, नव, दश जैसे शब्द खोजिए और देखिए कि अर्थ समूह का निकल रहा है या नहीं।
द्विगु और बहुव्रीहि का छोटा-सा जाल
संख्या आगे लगी हो, फिर भी शब्द किसी तीसरे का नाम बन जाए, तो वह द्विगु नहीं बहुव्रीहि हो जाता है। ‘चतुर्भुज’ जब चार भुजाओं वाली आकृति के अर्थ में आए तो द्विगु है, पर जब ‘जिसकी चार भुजाएँ हैं’ यानी विष्णु के अर्थ में आए तो बहुव्रीहि है। ‘दशानन’ भी इसी कारण बहुव्रीहि है, क्योंकि वह दस मुखों का समूह नहीं, दस मुख वाले रावण का नाम है। इसलिए संख्या देखकर तुरंत द्विगु मान लेना ठीक नहीं — पहले पूछिए कि शब्द किसका नाम है।
द्विगु समास के उदाहरण — संख्या से बने समूह
- त्रिभुजतीन भुजाओं का समूह
- त्रिलोकतीन लोकों का समूह
- त्रिवेणीतीन वेणियों का समूह
- त्रिफलातीन फलों का समूह
- त्रिकोणतीन कोणों का समूह
- चौराहाचार राहों का समूह
- चौमासाचार मासों का समूह
- चवन्नीचार आनों का समूह
- अठन्नीआठ आनों का समूह
- दोपहरदो पहरों का समूह
- पंचवटीपाँच वटों का समूह
- पंचतत्त्वपाँच तत्त्वों का समूह
- पंचामृतपाँच अमृतों का समूह
- नवरात्रनौ रात्रियों का समूह
- नवग्रहनौ ग्रहों का समूह
- सप्ताहसात दिनों का समूह
- सप्तर्षिसात ऋषियों का समूह
- शताब्दीसौ अब्दों का समूह
- चतुर्वेदचार वेदों का समूह
- दुअन्नीदो आनों का समूह
- तिमाहीतीन माहों का समूह
द्वंद्व समास
जिस समास में दोनों पद प्रधान हों और उनके बीच से ‘और’, ‘अथवा’ या ‘या’ जैसा योजक शब्द लुप्त हुआ हो, उसे द्वंद्व समास कहते हैं। यहाँ कोई पद दूसरे की विशेषता नहीं बताता, दोनों बराबरी से खड़े रहते हैं — ‘माता-पिता’ में माता भी पूरी है और पिता भी। पहचान इतनी आसान है कि विग्रह करते ही बीच में ‘और’ आ जाता है। लिखे जाने में इस समास के शब्द अक्सर योजक चिह्न के साथ आते हैं, जैसे ‘सुख-दुख’, ‘नर-नारी’, और यह चिह्न भी एक अच्छा संकेत है।
द्वंद्व के तीन रूप बताए जाते हैं। इतरेतर द्वंद्व में दोनों पद अपनी अलग पहचान बनाए रखते हैं और विग्रह में साफ़ ‘और’ आता है, जैसे ‘राम-लक्ष्मण’। समाहार द्वंद्व में दोनों पद मिलकर एक समूचे भाव का बोध कराते हैं, जैसे ‘रोटी-कपड़ा’ जो केवल दो वस्तुएँ नहीं बल्कि बुनियादी ज़रूरतों का पूरा भाव कहता है। वैकल्पिक द्वंद्व में पदों के बीच ‘या/अथवा’ का भाव रहता है, जैसे ‘पाप-पुण्य’ या ‘लाभ-हानि’ जहाँ दोनों में से एक की बात हो रही होती है। परीक्षा में अधिकतर सिर्फ़ ‘द्वंद्व’ पूछा जाता है, उपभेद कभी-कभी।
द्वंद्व समास के उदाहरण — बीच में ‘और’ लुप्त
- माता-पितामाता और पिता
- भाई-बहनभाई और बहन
- राम-लक्ष्मणराम और लक्ष्मण
- राधा-कृष्णराधा और कृष्ण
- नर-नारीनर और नारी
- सुख-दुखसुख और दुख
- रात-दिनरात और दिन
- देश-विदेशदेश और विदेश
- अन्न-जलअन्न और जल
- रोटी-कपड़ारोटी और कपड़ा
- आना-जानाआना और जाना
- लेन-देनलेना और देना
- हार-जीतहार और जीत
- लाभ-हानिलाभ अथवा हानि
- पाप-पुण्यपाप अथवा पुण्य
- जल-वायुजल और वायु
- ऊँच-नीचऊँच और नीच
- आगे-पीछेआगे और पीछे
- खरा-खोटाखरा अथवा खोटा
- दाल-रोटीदाल और रोटी
- सीता-रामसीता और राम
- गुण-दोषगुण और दोष
- अमीर-गरीबअमीर और गरीब
- शीतोष्णशीत और उष्ण
- धर्माधर्मधर्म और अधर्म
- यश-अपयशयश और अपयश
इस भाग के अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1
'माता-पिता' में कौन सा समास है?
- Aद्वंद्व
- Bद्विगु
- Cतत्पुरुष
- Dबहुव्रीहि
व्याख्या
दोनों पद समान रूप से प्रधान हैं और बीच से योजक 'और' लुप्त है — यही द्वंद्व समास का नियम है। विग्रह — माता और पिता।
प्रश्न 2
'त्रिभुज' में कौन सा समास है?
- Aबहुव्रीहि
- Bद्विगु
- Cकर्मधारय
- Dकरण तत्पुरुष
व्याख्या
पूर्वपद संख्यावाचक है और पूरा पद समूह का बोध कराता है — यही द्विगु समास है। विग्रह — तीन भुजाओं का समूह।
प्रश्न 3
'हार-जीत' में कौन सा समास है?
- Aद्वंद्व
- Bद्विगु
- Cअव्ययीभाव
- Dकर्म तत्पुरुष
व्याख्या
दोनों पद समान प्रधान हैं और बीच से योजक शब्द लुप्त है — यही द्वंद्व का नियम है। विग्रह — हार और जीत।
प्रश्न 4
'चौराहा' में कौन सा समास है?
- Aबहुव्रीहि
- Bकर्मधारय
- Cद्विगु
- Dद्वंद्व
व्याख्या
पूर्वपद 'चौ' संख्यावाचक है और पूरा पद समूह का बोध कराता है — विग्रह 'चार राहों का समूह', इसलिए द्विगु।