कर्मधारय समास
कर्मधारय समास में दोनों पदों के बीच तीन में से कोई एक रिश्ता होता है — विशेषण और विशेष्य का, उपमान और उपमेय का, या रूपक का। रिश्ता पहचान में आ गया तो विग्रह अपने आप बन जाता है।
कर्मधारय समास
जिस समास में एक पद विशेषण हो और दूसरा विशेष्य, अथवा दोनों पदों में उपमान और उपमेय का संबंध हो, उसे कर्मधारय समास कहते हैं। सरल भाषा में कहें तो यहाँ एक पद दूसरे की विशेषता बताता है, दोनों एक ही वस्तु की ओर इशारा करते हैं। ‘महात्मा’ में ‘महान’ विशेषण है और ‘आत्मा’ विशेष्य — विग्रह होगा ‘महान है जो आत्मा’। पहचान का चिह्न भी यही है कि विग्रह में ‘है जो’, ‘रूपी’, ‘के समान’ जैसा शब्द आता है, विभक्ति नहीं आती। यही बात इसे तत्पुरुष से अलग करती है, जहाँ को, से, के लिए जैसी विभक्ति लगती है।
कर्मधारय के भीतर तीन तरह के रिश्ते मिलते हैं, और परीक्षा में तीनों आते हैं। पहला विशेषण-विशेष्य का, जैसे ‘नीलकमल’ यानी नीला कमल। दूसरा उपमान-उपमेय का, जहाँ एक चीज को दूसरी के समान बताया जाता है, जैसे ‘चरणकमल’ यानी कमल के समान चरण। तीसरा रूपक का, जहाँ एक पर दूसरे का रूप ही आरोपित कर दिया जाता है, जैसे ‘विद्याधन’ यानी विद्या ही है धन। तीनों में समान बात यह है कि उत्तरपद प्रधान रहता है और शब्द उसी वस्तु का नाम रहता है जिसका उत्तरपद है — नीलकमल आखिर कमल ही है।
कर्मधारय समास के तीन रिश्ते
| रिश्ता | विग्रह में आने वाला शब्द | उदाहरण | विग्रह |
|---|---|---|---|
| विशेषण + विशेष्य | है जो | नीलकमल | नीला है जो कमल |
| विशेष्य + विशेषण | है जो | भलामानस | भला है जो मानस |
| उपमान + उपमेय | के समान | चरणकमल | कमल के समान चरण |
| रूपक | ही है | विद्याधन | विद्या ही है धन |
कर्मधारय समास के उदाहरण — विग्रह सहित
- महात्मामहान है जो आत्मा
- महादेवमहान है जो देव
- महाराजामहान है जो राजा
- नीलकमलनीला है जो कमल
- नीलगगननीला है जो गगन
- श्वेतांबरश्वेत है जो अंबर
- पीतांबरपीत है जो अंबरवस्त्र के अर्थ में कर्मधारय; विष्णु/कृष्ण के अर्थ में बहुव्रीहि
- कालीमिर्चकाली है जो मिर्च
- सद्भावनाअच्छी है जो भावना
- सज्जनसत् है जो जन
- दुर्जनबुरा है जो जन
- परमेश्वरपरम है जो ईश्वर
- महापुरुषमहान है जो पुरुष
- अंधकूपअंधा है जो कूप
- मंदबुद्धिमंद है जो बुद्धि
- नरसिंहसिंह के समान नरउपमा के अर्थ में कर्मधारय; विष्णु के अवतार के अर्थ में बहुव्रीहि
- चरणकमलकमल के समान चरण
- चंद्रमुखचंद्र के समान मुख
- कमलनयनकमल के समान नयननयन के अर्थ में कर्मधारय; ‘जिसके नयन कमल जैसे हैं’ अर्थ में बहुव्रीहि
- विद्याधनविद्या ही है धन
- क्रोधाग्निक्रोध ही है अग्नि
- भवसागरभव ही है सागर
- प्राणप्रियप्राणों के समान प्रिय
- कापुरुषकायर है जो पुरुष
- नवयुवकनव है जो युवक
- महारानीमहान है जो रानी
- अधपकाआधा है जो पका
- कृष्णसर्पकाला है जो सर्प
इस भाग के अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1
'महात्मा' में कौन सा समास है?
- Aकर्मधारय
- Bबहुव्रीहि
- Cसंबंध तत्पुरुष
- Dद्वंद्व
व्याख्या
'महान' विशेषण है और 'आत्मा' विशेष्य; दोनों एक ही वस्तु की ओर संकेत करते हैं। विशेषण-विशेष्य संबंध होने पर कर्मधारय समास होता है। विग्रह — महान है जो आत्मा।
प्रश्न 2
'चरणकमल' में कौन सा समास है?
- Aबहुव्रीहि
- Bकर्मधारय
- Cद्वंद्व
- Dतत्पुरुष
व्याख्या
यहाँ उपमान-उपमेय संबंध है — चरण की तुलना कमल से की गई है। उपमान-उपमेय संबंध कर्मधारय के अंतर्गत आता है। विग्रह — कमल के समान चरण।
प्रश्न 3
'विद्याधन' में कौन सा समास है और क्यों?
- Aबहुव्रीहि — अर्थ तीसरे पद पर जाता है
- Bद्वंद्व — दोनों पद प्रधान हैं
- Cकर्मधारय — रूपक संबंध है
- Dअपादान तत्पुरुष — 'से' लुप्त है
व्याख्या
यहाँ विद्या पर धन का रूप आरोपित किया गया है — विग्रह 'विद्या ही है धन'। रूपक संबंध कर्मधारय के अंतर्गत आता है।