भ्रष्टाचार (Corruption)
RAS मुख्य परीक्षा, पत्र II, इकाई I, बिंदु 7: "Ethical concerns, dilemmas and challenges in administration" (प्रशासन में नैतिक चिंताएँ, दुविधाएँ और चुनौतियाँ)
- जनवरी 2026 के पाठ्यक्रम के अनुसार अद्यतन
- पढ़ने का समय: लगभग 16 मिनट
परीक्षा-भार (2018-2024 के प्रश्नों के आधार पर)
नाम से 0 प्रश्न (52 में से)। निकट: 2024 भाग ख Q6 (सत्यनिष्ठा और वस्तुनिष्ठता)। भ्रष्टाचार पाठ्यक्रम में पत्र I इकाई III भाग क (समाजशास्त्र: "Challenges and issues before Indian society: dowry, divorce, corruption...") में भी नाम से है, और लोकपाल तथा लोकायुक्त पत्र III इकाई II में। 2021 के पत्र I में "Define political corruption." 2 अंक में और 2024 के पत्र III में CVC को हटाने की प्रक्रिया 2 अंक में पूछी गई (हमारे प्रश्न-संग्रह के अनुसार)। इसलिए इस पृष्ठ के संस्थाओं वाले हिस्से का दोहरा उपयोग है।
30 सेकंड का सार
याद रखें
- भ्रष्टाचार का अर्थ: सौंपी गई शक्ति का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग (ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की परिभाषा)। रिश्वत इसका एक रूप है; भाई-भतीजावाद और पद का दुरुपयोग भी।
- भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक 2025 में भारत 100 में 39 अंक और 182 देशों में 91वें स्थान पर है (ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल)। यह धारणा का सूचकांक है, मापा हुआ तथ्य नहीं।
- कारण: एकाधिकार और विवेकाधिकार के साथ जवाबदेही की कमी (क्लिटगार्ड का सूत्र), धीमा प्रवर्तन, सामाजिक सहनशीलता, चुनावी धन।
- नैतिक दोष: सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता टूटती है, गरीब पर बोझ बढ़ता है, जनविश्वास घटता है। कानूनी दोष इसका केवल एक हिस्सा है।
- उपाय चार स्तर पर: कानून (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988, संशोधित 2018), संस्थाएँ (CVC, लोकपाल, लोकायुक्त, ACB), पारदर्शिता (RTI), और नैतिक संस्कृति (संहिता, प्रशिक्षण, उदाहरण)।
भाग क के लिए छोटे उत्तर (15 शब्द तक)
याद रखें
- प्रश्न: भ्रष्टाचार को परिभाषित कीजिए।
- उत्तर: सौंपी गई शक्ति का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग (ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल)।
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 रिश्वत लेने और, 2018 से, देने को भी दंडित करता है।
- उपाय: कानून, CVC और लोकपाल जैसी संस्थाएँ, RTI, अंकेक्षण और नैतिक प्रशिक्षण।
1. अर्थ और रूप
परिभाषा: "सौंपी गई शक्ति का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग" (ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल)। उनके अनुसार सेवा के बदले पैसा या एहसान माँगते लोक सेवक, मित्रों-परिवार को ठेके और नौकरियाँ देते राजनेता, और अधिकारियों को रिश्वत देती कंपनियाँ, सब इसके उदाहरण हैं।
कानून की भाषा: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में "अनुचित लाभ" (undue advantage) शब्द है; यह केवल नकद नहीं, कोई भी लाभ हो सकता है।
रूप (हमारी श्रेणियाँ): छोटा या "सुविधा-शुल्क" वाला (petty); बड़ा (grand), जैसे ठेके और नीतियों में; व्यवस्थागत (systemic), जब बेईमानी ही तंत्र का हिस्सा बन जाए। साथ ही "माँग-पक्ष" (अधिकारी माँगे) और "आपूर्ति-पक्ष" (नागरिक या कंपनी दे)। 2018 के संशोधन से आपूर्ति-पक्ष भी अपराध है।
2. कारण (हमारा समूहीकरण)
| समूह | कारण |
|---|---|
| अवसर | एकाधिकार, ज़्यादा विवेकाधिकार, कम जवाबदेही (क्लिटगार्ड, 1988: भ्रष्टाचार = एकाधिकार + विवेकाधिकार - जवाबदेही; यह सरलीकृत सूत्र है, आलोचना भी हुई है) |
| प्रवर्तन | जाँच और मुकदमों में देरी, कमज़ोर निगरानी, अभियोजन की जटिल मंज़ूरियाँ |
| आर्थिक | वस्तुओं और सेवाओं की कमी, जटिल लाइसेंस-प्रक्रियाएँ, नकदी का लेन-देन; कम वेतन को भी कारण बताया जाता है, पर प्रमाण मिश्रित हैं |
| राजनीतिक | चुनावी खर्च और धन की ज़रूरत |
| सामाजिक | "सब देते हैं" की सोच, उपहार-संस्कृति, धन से सम्मान, शिकायत का डर |
| संगठनात्मक | कमज़ोर अंकेक्षण, तबादले और पोस्टिंग का इनाम या सज़ा की तरह प्रयोग, नेतृत्व का बुरा उदाहरण |
| व्यक्तिगत | लोभ और अपने को सही ठहराने की आदत ("एक बार की बात है") |
3. नैतिक पहलू
कर्तव्य और विश्वास: पद जनता का न्यास है, निजी संपत्ति नहीं। रिश्वत में अधिकारी पद का साधन की तरह उपयोग करता है (कांट का कर्तव्य-चश्मा)।
निष्पक्षता और समानता: जो देता है उसका काम पहले होता है; जो नहीं दे सकता वह पीछे। अनुच्छेद 14 की समानता की भावना टूटती है। CCS आचरण नियम 3(1)(i): "पूर्ण निष्ठा"; 3(1)(xv): पद का दुरुपयोग नहीं।
परिणाम (उपयोगितावादी चश्मा): कल्याण-राशि का रिसाव, घटिया निर्माण, सेवा में देरी; सबसे ज़्यादा चोट गरीब पर।
गुण (अरस्तू): लोभ बार-बार के छोटे समझौतों से पनपता है; सत्यनिष्ठा उसी तरह की आदत है।
गीता: फल की आसक्ति ही रिश्वत की जड़ है; निष्काम कर्म इसका नैतिक उत्तर है (पृष्ठ 4.2)।
ऐतिहासिक चेतावनियाँ: कौटिल्य (शमशास्त्री अनुवाद): "जैसे जीभ की नोक पर रखे शहद या विष को न चखना असंभव है, वैसे ही सरकारी सेवक के लिए राजा के राजस्व का थोड़ा-सा भी न खाना असंभव है।" इसलिए निगरानी स्थायी चाहिए (पृष्ठ 6.15)। लॉर्ड एक्टन (5 अप्रैल 1887): "Power tends to corrupt and absolute power corrupts absolutely."
4. कानूनी और संस्थागत ढाँचा
(जहाँ "द्वितीयक स्रोत" लिखा है, वहाँ मूल पाठ की जगह विश्वसनीय सार से लिया गया है)
(क) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधन अधिनियम, 2018, यानी 2018 का 16; लागू 26 जुलाई 2018)
| धारा | मुख्य बात |
|---|---|
| धारा 7 | लोक सेवक का "अनुचित लाभ" लेना; 3 से 7 वर्ष कारावास और जुर्माना। अपराध तब भी बनता है जब लोक कर्तव्य का निर्वहन अनुचित न भी हो |
| धारा 8 | अनुचित लाभ देना या देने का वादा; 7 वर्ष तक कारावास या जुर्माना। अपवाद: जिसे देने को विवश किया गया वह सात दिन के भीतर कानून-प्रवर्तन एजेंसी को बता दे |
| धारा 9 | वाणिज्यिक संगठन जुर्माने से दंडनीय, यदि उससे जुड़ा कोई व्यक्ति कारोबार पाने या बनाए रखने के लिए अनुचित लाभ दे; बचाव: रिश्वत रोकने की "पर्याप्त प्रक्रियाएँ" |
| धारा 10 | प्रभारी व्यक्ति (निदेशक, प्रबंधक आदि) की सहमति या मिलीभगत पर दायित्व |
| धारा 13 | आपराधिक कदाचार, 2018 के बाद सीमित: सौंपी संपत्ति का बेईमान या कपटपूर्ण दुरुपयोग और अवैध संपत्ति (द्वितीयक स्रोत) |
| धारा 17A | सरकारी कृत्यों में की गई सिफ़ारिश या निर्णय पर जाँच से पहले सक्षम प्राधिकारी की पूर्व-अनुमति; रंगे हाथ गिरफ़्तारी के लिए अनुमति नहीं; निर्णय तीन माह में (एक माह बढ़ सकता है) |
| सुनवाई | मुकदमे का लक्ष्य दो वर्ष, कारण लिखकर चार वर्ष तक (द्वितीयक स्रोत) |
लंबित प्रश्न (धारा 17A): 14 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय की दो-सदस्यीय पीठ (न्यायमूर्ति नागरत्ना और न्यायमूर्ति विश्वनाथन) ने खंडित निर्णय दिया। न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने धारा को वैध माना, इस शर्त पर कि अनुमति लोकपाल या लोकायुक्त की सिफ़ारिश पर हो; न्यायमूर्ति नागरत्ना ने अनुच्छेद 14 के उल्लंघन के कारण उसे रद्द किया। मामला बड़ी पीठ के लिए मुख्य न्यायाधीश को भेजा गया। (कानून की स्थिति बदलती रहती है: नवीनतम आधिकारिक पाठ देख लें।) पृष्ठभूमि: विनीत नारायण (18 दिसंबर 1997) में "एकल निर्देश" रद्द हुआ और CVC को वैधानिक दर्जे का निर्देश मिला; सुब्रमण्यम स्वामी (6 मई 2014) में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 6A रद्द हुई। 17A पर बहस इसी "पूर्व-अनुमति" बनाम "स्वतंत्र जाँच" के संतुलन की है।
(ख) संस्थाएँ
| संस्था | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) | 1964 में संथानम समिति की सिफ़ारिश पर बना; केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 से वैधानिक। मूलतः सलाहकार निकाय। विनीत नारायण (1997) का निर्देश इसके पीछे |
| लोकपाल | लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (स्वीकृति 1 जनवरी 2014; लागू 16 जनवरी 2014); एक अध्यक्ष और अधिकतम आठ सदस्य; पहले अध्यक्ष न्यायमूर्ति पी. सी. घोष: नियुक्ति 19 मार्च 2019, शपथ 23 मार्च 2019 |
| लोकायुक्त | राज्य अपने कानून से एक वर्ष में स्थापित करें (2013 के अधिनियम के अनुसार)। राजस्थान: राजस्थान लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1973 (1973 का अधिनियम 9; राष्ट्रपति की स्वीकृति 26 मार्च 1973; 2019 के संशोधन सहित प्रति PRS पर) |
| भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB), राजस्थान | राज्य सरकार का ब्यूरो, जो कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच और जाल (trap) कार्रवाई करता है |
(ग) पारदर्शिता
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005: राष्ट्रपति की स्वीकृति 15 जून 2005, पूर्ण रूप से 12 अक्तूबर 2005 से लागू; सामान्यतः 30 दिन में उत्तर, जीवन या स्वतंत्रता के मामले में 48 घंटे; देरी पर प्रतिदिन 250 रुपये, अधिकतम 25,000 रुपये का जुर्माना। धारा 4: स्वतः प्रकटीकरण।
नया मोड़: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 की धारा 44(3) से RTI की धारा 8(1)(j) बदली (नवंबर 2025 से लागू, द्वितीयक स्रोत)। सर्वोच्च न्यायालय ने 16 फ़रवरी 2026 को रोक देने से इनकार किया और चुनौतियाँ बड़ी पीठ को भेजीं; 7 अगस्त 2026 की सुनवाई की रिपोर्ट तक भी रोक नहीं लगी थी (मामला लंबित)। यह चल रहा मामला है; कानून की स्थिति बदलती रहती है: नवीनतम आधिकारिक पाठ देख लें।
राजस्थान: राजस्थान गारंटीकृत सार्वजनिक सेवा प्रदाय अधिनियम, 2011 (नवंबर 2011 से लागू; सटीक दिन स्रोतों में 14 या 15 नवंबर मिलता है, इसलिए केवल "नवंबर 2011" लिखें; द्वितीयक स्रोत) और जन सूचना पोर्टल (13 सितंबर 2019, द्वितीयक स्रोत); पृष्ठ 3.5।
(घ) आचार-आधार: CCS आचरण नियम 3(1)(i) पूर्ण निष्ठा, (vi) उच्च नैतिक मानक और ईमानदारी, (xv) पद का दुरुपयोग नहीं। पर्यवेक्षक अधिकारी का दायित्व: 3(2)(i), अपने अधीनस्थों की सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करने के सभी संभव कदम।
5. उपाय: एक संतुलित सूची
रोकथाम: एकाधिकार घटाएँ (विकल्प और डिजिटल सेवा), विवेकाधिकार घटाएँ (स्पष्ट नियम, समय-सीमा, मानक प्रक्रिया), पारदर्शिता बढ़ाएँ (RTI, स्वतः प्रकटीकरण, सामाजिक अंकेक्षण)।
पहचान: अंकेक्षण, सतर्कता, सूचना देने वालों का संरक्षण (पृष्ठ 7.4), डेटा से जोखिम-चिह्न।
दंड: तेज़ मुकदमे, संपत्ति-ज़ब्ती, और दंड की निश्चितता: कठोरता से ज़्यादा निश्चितता असर करती है (यह हमारी राय है)।
नैतिक संस्कृति: आचार-संहिता, प्रशिक्षण, हित-घोषणा (पृष्ठ 7.2), नेतृत्व का उदाहरण, ईमानदार अधिकारी का संरक्षण।
नागरिक: रिश्वत देने से इनकार, शिकायत और सामाजिक निगरानी। ध्यान रहे: 2018 के बाद रिश्वत देना भी अपराध है।
संथानम समिति (1964)
भ्रष्टाचार निवारण पर समिति; इसी की सिफ़ारिश पर CVC बना। उसका कथन पृष्ठ 3.2 में है: नैतिक गंभीरता की कमी सत्यनिष्ठा की परंपरा में सबसे बड़ी बाधा।
सत्येंद्र दुबे (नवंबर 2003) और PIDPI (अप्रैल 2004)
विवरण पृष्ठ 7.4 में।
उत्तर में कैसे लगाएँ
परिभाषा → एक कारण-सूत्र (क्लिटगार्ड) → नैतिक पहलू (कर्तव्य, निष्पक्षता, परिणाम) → कानून और संस्था (PC Act 2018, लोकपाल, CVC, RTI) → एक वास्तविक उदाहरण (विनीत नारायण या MKSS) → "कानून के साथ नैतिक संस्कृति"।
विचारक और उद्धरण
| नाम | विचार | प्रयोग-योग्य पंक्ति |
|---|---|---|
| ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल | भ्रष्टाचार की परिभाषा | "the abuse of entrusted power for private gain" |
| कौटिल्य, अर्थशास्त्र (शमशास्त्री अनुवाद, द्वितीय अधिकरण) | शहद-विष की उपमा | "Just as it is impossible not to taste the honey or the poison that finds itself at the tip of the tongue, so it is impossible for a government servant not to eat up, at least, a bit of the king's revenue." |
| लॉर्ड एक्टन (5 अप्रैल 1887, बिशप क्रेइटन को पत्र) | सत्ता और भ्रष्टता | "Power tends to corrupt and absolute power corrupts absolutely." |
| संथानम समिति (1964) | नैतिक गंभीरता | "The lack of moral earnestness... is perhaps the greatest single factor which hampers the growth of strong traditions of integrity and efficiency." (2nd ARC चौथी रिपोर्ट में उद्धृत) |
| महात्मा गांधी (द्वारा प्रकाशित, यंग इंडिया 22 अक्तूबर 1925) | सात सामाजिक पाप | "Wealth without work", "Commerce without morality" (2nd ARC में उद्धृत सूची से) |
चित्र: अवसर का सूत्र और उपाय
भ्रष्टाचार = एकाधिकार + विवेकाधिकार - जवाबदेही (क्लिटगार्ड, 1988)
ऊपर की पट्टी (नारंगी)
तीन तीर नीचे, तीन स्तंभ
एकाधिकार घटाएँ
स्तंभ 1 (नीला) : विकल्प, डिजिटल सेवा, प्रतिस्पर्धा
विवेकाधिकार घटाएँ
स्तंभ 2 (नीला) : स्पष्ट नियम, समय-सीमा, मानक प्रक्रिया
जवाबदेही बढ़ाएँ
स्तंभ 3 (हरा) : अंकेक्षण, RTI, लोकपाल और लोकायुक्त, CVC, सामाजिक अंकेक्षण, PC Act
नैतिक संस्कृति: संहिता, प्रशिक्षण, हित-घोषणा, नेतृत्व का उदाहरण, सूचना देने वालों का संरक्षण
नीचे की पट्टी (नेवी)
नाम से कोई प्रश्न नहीं (2018, 2021, 2023, 2024, पत्र II इकाई I)।
अन्य इकाइयों में (हमारे प्रश्न-संग्रह के अनुसार; पाठ्यक्रम में भ्रष्टाचार पत्र I इकाई III भाग क में भी है):
2024, पत्र III, Q2 (2 अंक): केंद्रीय सतर्कता आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया।
पहले इसी अवधारणा का प्रश्न: पत्र II इकाई I में नहीं मिला; अन्य इकाइयों में ऊपर की सूची देखें (2021 में 2 अंक की परिभाषा, 2018 में 10 अंक का सत्यनिष्ठा-उपाय)। हमारा अनुमान (RPSC की सूचना नहीं): भाग क में परिभाषा या कानून, भाग ख में "नैतिक पहलू और उपाय"।
आम गलतियाँ
याद रखें
- केवल कानूनों की सूची लिख देना; नैतिक पहलू (विश्वास, निष्पक्षता, गरीब पर बोझ) और संस्कृति की बात छोड़ देना।
- पुरानी स्थिति लिखना: 2018 के बाद रिश्वत देना भी अपराध है और धारा 17A की अनुमति का प्रावधान जुड़ा है; लोकपाल 2019 में कार्यशील हुआ, केवल कानून बनने से नहीं।
- बिना स्रोत के आँकड़े देना; सूचकांक को "धारणा" का न बताना।
आत्म-जाँच (5 प्रश्न)
याद रखें
- भ्रष्टाचार की परिभाषा लिखिए।
- 2018 के संशोधन के दो बड़े बदलाव क्या हैं?
- क्लिटगार्ड का सूत्र क्या है?
- CVC, लोकपाल और ACB में एक-एक अंतर बताइए।
- RTI के पीछे MKSS की भूमिका का एक वाक्य लिखिए।
वास्तविक उदाहरण
केस स्टडीविनीत नारायण बनाम भारत संघ, 18 दिसंबर 1997
जैन हवाला मामले की निष्क्रिय जाँच पर सर्वोच्च न्यायालय ने "एकल निर्देश" (बड़े अधिकारियों की जाँच से पहले अनुमति) रद्द किया, CVC को वैधानिक दर्जा देने का निर्देश दिया, और निगरानी जारी रखी।
सीख
जाँच की स्वतंत्रता कानून के शासन का हिस्सा है।
केस स्टडीमज़दूर किसान शक्ति संगठन (MKSS), राजस्थान: स्थापना 1 मई 1990; 1996 में ब्यावर में 40 दिन का धरना
जन सुनवाइयों में खर्च के सरकारी अभिलेख गाँव वालों को पढ़कर सुनाए गए, जिससे मज़दूरी और निर्माण-खर्च की गड़बड़ी सामने आई; इसी आंदोलन ने सूचना के अधिकार की माँग को बल दिया।
सीख
पारदर्शिता भ्रष्टाचार की सबसे सस्ती दवा है (स्रोत: विकिपीडिया, MKSS)।
काल्पनिक केस
उदाहरण (काल्पनिक)काल्पनिक केस (Hypothetical case)
तहसीलदार लीला को पता चलता है कि एक विधवा का ज़मीन-नामांतरण का आवेदन चार महीने से अटका है। पूछने पर विधवा बताती है कि तहसील के रीडर रमेश ने 2,000 रुपये "खर्चा" माँगा और न देने पर "फ़ाइल गुम" कहा। रमेश कहता है, "मैडम, सब यही करते हैं, आप नई हैं।" एक वरिष्ठ कर्मचारी सलाह देता है, "जाने दीजिए, तबादला करा दीजिए।"
- हितधारक
- विधवा आवेदक, रीडर रमेश, तहसीलदार लीला, अन्य आवेदक जो चुपचाप देते हैं, तहसील स्टाफ, उपखंड अधिकारी और कलेक्टर, ACB और जनता।
- मुद्दा और टकराते मूल्य
- सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, न्याय और जनसेवा बनाम स्टाफ की निष्ठा, "सब करते हैं" की सोच और टकराव का डर। यह "सच बनाम निष्ठा" है।
- तीन विकल्प
- (क) रीडर का तबादला करा देना और मामला बंद। लाभ: जल्दी, कोई झंझट नहीं। हानि: भ्रष्टाचार अपनी जगह रहेगा, किसी और जगह चलेगा; सबूत और जवाबदेही नहीं बनती। (ख) मौखिक चेतावनी देकर छोड़ देना। लाभ: स्टाफ से तालमेल। हानि: संदेश गलत; आदत जारी; पर्यवेक्षक के कर्तव्य (3(2)(i)) की चूक। (ग) पहले विधवा का काम नियम से तुरंत कराना; उसका बयान लिखित में और पीड़ित को कोई दबाव न पड़े इसका ध्यान रखते हुए लेना; तथ्य सत्यापित करके (फ़ाइल-गतिविधि का रिकॉर्ड, तारीखें) अपने वरिष्ठ (उपखंड अधिकारी या कलेक्टर) को लिखित रिपोर्ट देना और सक्षम सतर्कता या ACB के रास्ते की सलाह लेना; रीडर पर सेवा-नियमों के अंतर्गत अनुशासनिक कार्रवाई वरिष्ठ के निर्देश से। लाभ: न्याय, सबूत और संदेश तीनों। हानि: स्टाफ में तनाव, समय और प्रतिशोध का जोखिम; सहयोगियों की नाराज़गी।
- सर्वोत्तम विकल्प और समर्थक मूल्य
- विकल्प (ग)। समर्थक: सत्यनिष्ठा और जवाबदेही; CCS आचरण नियम 3(1)(i) और 3(2)(i) (केंद्रीय नियम; राजस्थान के आचरण नियम में समान भावना); पीड़ित को पहले राहत।
सीख
कदम: अल्पकालिक: विधवा का नामांतरण तुरंत, लिखित बयान, तथ्य-सत्यापन, वरिष्ठ को लिखित रिपोर्ट, पीड़ित और स्वयं के लिए सुरक्षा का अनुरोध। दीर्घकालिक: कार्यालय में आवेदन-स्थिति और समय-सीमा की सार्वजनिक सूचना-पट्टी और ऑनलाइन ट्रैकिंग, गारंटीकृत सेवा की अवधि का पालन, आवेदकों के लिए शिकायत-नंबर, और स्टाफ के साथ नैतिकता-बैठक।
अभ्यास प्रश्न
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
भ्रष्टाचार के दो नैतिक नुकसान बताइए।
आदर्श उत्तर
भ्रष्टाचार निष्पक्षता तोड़ता है: जो रिश्वत देता है उसका काम पहले होता है और गरीब, जो नहीं दे सकता, अनुच्छेद 14 की समानता से वंचित रहता है। यह जनविश्वास भी तोड़ता है और कल्याण-राशि हड़पकर कमज़ोर को सबसे ज़्यादा चोट पहुँचाता है। नैतिक प्रशासक पद को न्यास मानता है, निजी संपत्ति नहीं।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
भ्रष्टाचार केवल कानूनी नहीं, नैतिक विफलता भी है। चर्चा कीजिए और उपाय सुझाइए।
आदर्श उत्तर
भ्रष्टाचार अवैध तो है ही, पर उसका गहरा दोष नैतिक है: वह जनता के न्यास को निजी संपत्ति बनाता है, समान व्यवहार तोड़ता है और गरीब पर बोझ डालता है। क्लिटगार्ड का सूत्र, एकाधिकार जमा विवेकाधिकार घटा जवाबदेही, अवसर समझाता है। कानून मदद करता है: 2018 के संशोधित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में रिश्वत देना भी अपराध है; लोकपाल, लोकायुक्त और CVC जाँचते हैं; RTI उजागर करता है (MKSS, ब्यावर 1996)। पर कानून के साथ नैतिक संस्कृति चाहिए: प्रशिक्षण, डिजिटल सेवाएँ, अंकेक्षण, सूचना देने वालों का संरक्षण और नेतृत्व का उदाहरण। कौटिल्य का शहद-विष याद रखें: निगरानी स्थायी चाहिए।
पिछले असली प्रश्न
2024निकट संबंधीपत्र II, भाग ख, Q65 अंक
Does administrative objectivity necessarily presuppose administrative integrity? (पृष्ठ 3.2)
2021पत्र I, इकाई III भाग क (समाजशास्त्र), Q42 अंक
Define political corruption.
2018पत्र III, इकाई II, Q1310 अंक
Explain the measures taken to enhance the integrity in administration in India.
2018पत्र III, इकाई II, Q105 अंक
Which posts and persons have been exempted from the jurisdiction of Lokayukta in Rajasthan?
2018पत्र III, Q32 अंक
Can the Chief Vigilance Commission investigate a case against anybody?
यह उत्तर कैसे लिखें
भूमिका
परिभाषा, कानूनी बनाम नैतिक
मुख्य भाग
- कारण-सूत्र, नैतिक नुकसान, कानून और संस्थाएँ, पारदर्शिता
निष्कर्ष
कानून के साथ संस्कृति
अतिरिक्त मूल्य
- कौटिल्य का शहद-विष, एक्टन, MKSS
एक पेज में दोहराव
- भ्रष्टाचार = सौंपी शक्ति का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग (TI)
- CPI 2025: 39 अंक, 91/182 (धारणा)
- क्लिटगार्ड 1988: एकाधिकार + विवेकाधिकार - जवाबदेही
- PC Act 1988, संशोधन 2018 (16) (26.7.2018): धारा 7 (3 से 7 वर्ष), 8 (देना अपराध; 7 दिन का अपवाद), 9, 10, 17A (पूर्व-अनुमति; 14.1.2026 खंडित निर्णय, बड़ी पीठ)
- विनीत नारायण 18.12.1997
- सुब्रमण्यम स्वामी 6.5.2014 (धारा 6A रद्द)
- CVC 1964, वैधानिक 2003
- लोकपाल अधिनियम 2013 (1.1.2014; लागू 16.1.2014), पहला अध्यक्ष: नियुक्ति 19.3.2019, शपथ 23.3.2019
- राजस्थान लोकायुक्त अधिनियम 1973 (1973 का 9)
- RTI 2005 (15.6.2005; लागू 12.10.2005)
- MKSS 1.5.1990, ब्यावर 1996
- कौटिल्य का शहद-विष
- एक्टन 1887
- केस: तहसीलदार लीला, रीडर रमेश, लिखित रिपोर्ट और ACB-मार्ग।