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पेपर III · इकाई II

जवाबदेही (Accountability) और सामाजिक उत्तरदायित्व

जवाबदेही क्या है, उत्तर-देयता और प्रवर्तन में फ़र्क़, विधायी-कार्यकारी-न्यायिक-सामाजिक चार मंच, RTI और सामाजिक अंकेक्षण, तथा 2018 में पूछा गया लोक प्रशासन का सामाजिक उत्तरदायित्व, उत्तर-लेखन की दृष्टि से।

  • जवाबदेही
  • उत्तर-देयता
  • RTI
  • सामाजिक अंकेक्षण
  • सामाजिक उत्तरदायित्व
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II: "Principles of organisation: hierarchy, unity of command, span of control, delegation, centralisation and decentralisation, coordination, authority and responsibility, accountability." साथ ही "Issues: ... social audit. Control over administration: legislative, executive, judicial." इस पृष्ठ पर जवाबदेही की अवधारणा, उसके प्रकार और चार मंच (विधायी, कार्यकारी, न्यायिक, सामाजिक) तथा लोक प्रशासन का सामाजिक उत्तरदायित्व है। अधिकार और उत्तरदायित्व, विधायी-कार्यकारी-न्यायिक नियंत्रण और सामाजिक अंकेक्षण के अलग पृष्ठ हैं; यहाँ उनका सार ही जोड़ा गया है।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2018 के पेपर III में "लोक प्रशासन के सामाजिक उत्तरदायित्व से आप क्या समझते हैं?" (5 अंक) पूछा गया था। यह प्रश्न इसी पृष्ठ से जोड़ा गया है (मिलान हमारा विश्लेषण है), इसलिए अवधारणा के साथ संवैधानिक आधार और साधन तीनों तैयार रखें।
  • संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में जवाबदेही के औज़ारों पर बार-बार प्रश्न आए: सूचना का अधिकार अधिनियम की परिभाषाएँ, लोकायुक्त का क्षेत्राधिकार, न्यायिक व संसदीय नियंत्रण, सुनवाई का अधिकार और लोक सेवा गारंटी क़ानून। 2013-2024 के पेपरों में देखा गया यह रुझान बताता है कि चारों मंचों का ढाँचा हर ऐसे उत्तर में काम आता है।
  • 10 अंक के उत्तर में अकसर "तंत्र और उनकी सीमाएँ" माँगी जाती हैं (जैसे 2016 में संसदीय नियंत्रण, 2023 में न्यायिक नियंत्रण)। इस पृष्ठ का चार-मंच का ढाँचा और उत्तर-रेखा सीधे वहाँ लगती है।

पहले सरल भाषा में: राशन की दुकान का रजिस्टर

मान लीजिए गाँव की राशन-दुकान पर कार्डधारकों को हर महीने गेहूँ कम मिलता है। कार्डधारक डीलर से पूछता है कि स्टॉक कितना आया और कितना बँटा। डीलर को रजिस्टर दिखाना पड़ता है और कारण बताना पड़ता है। इतना उत्तर देना ही answerability (उत्तर-देयता) है। अब मान लीजिए जाँच में गड़बड़ी साबित हुई और अधिकारी ने डीलर का लाइसेंस निलंबित कर दिया। यह दंड देने की क्षमता enforcement (प्रवर्तन) है। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया उदाहरण है।) जवाबदेही (accountability) इन दोनों का जोड़ है: पूछे जाने पर जानकारी और औचित्य देना, और ग़लती साबित होने पर नतीजा भुगतना।

परीक्षा के लिए परिभाषा इस प्रकार लिखें। जवाबदेही वह बाध्यता है जिसमें सार्वजनिक पदाधिकारी या संस्था अपने निर्णयों और कार्यों के बारे में सूचना देने और उन्हें उचित ठहराने के लिए उत्तरदायी होती है, और अनुचित आचरण पर उसे दंड या सुधार का सामना करना पड़ सकता है। राजनीति-विज्ञानी आंद्रेयास शेडलर (Andreas Schedler, 1999) जवाबदेही के दो स्तंभ बताते हैं: उत्तर-देयता (जानकारी देना और औचित्य बताना) तथा प्रवर्तन (उल्लंघन पर दंड देने की क्षमता)। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की चौथी रिपोर्ट (2007) के अनुसार लोकतंत्र में हर पदधारक अंततः जनता के प्रति जवाबदेह है और यह जवाबदेही उन क़ानूनों व नियमों से लागू होती है जो जनप्रतिनिधि बनाते हैं; सभी सार्वजनिक पदाधिकारी जनता के न्यासी (trustee) हैं, इसलिए उन्हें मिला अधिकार जनहित में ही प्रयोग होना चाहिए।

उत्तर-देयता बनाम प्रवर्तन: दो स्तंभ

उत्तर-देयता (Answerability)

अर्थसूचना देना और निर्णय का औचित्य बताना

सवाल"क्या हुआ और क्यों हुआ?"

RTI अधिनियम मेंधारा 4 (स्वतः प्रकटीकरण, निर्णयों के कारण बताना), धारा 7 (30 दिन में उत्तर)

संस्थाओं मेंसार्वजनिक सुनवाई, जन सूचना पोर्टल, विधायिका में प्रश्न

सीमाबिना दंड-भय के उत्तर औपचारिकता रह जाते हैं

प्रवर्तन (Enforcement)

अर्थउल्लंघन पर दंड या सुधार थोपना

सवाल"अब इसका परिणाम क्या होगा?"

RTI अधिनियम मेंधारा 20: विलंब या ग़लत सूचना पर 250 रुपये प्रतिदिन, अधिकतम 25,000 रुपये का दंड

संस्थाओं मेंन्यायालय के आदेश, अनुशासनिक कार्रवाई, सेवा-समाप्ति (अनुच्छेद 311 की प्रक्रिया के साथ)

सीमाबिना जानकारी के दंड मनमाना हो जाता है

शेडलर के अनुसार दोनों स्तंभ साथ चलते हैं, पर कुछ व्यवस्थाओं में एक ही मिलता है; जैसे ऑम्बड्समैन जैसी संस्थाओं के पास अकसर जाँच और सिफ़ारिश का ही अधिकार होता है, दंड का नहीं। RTI की संख्याएँ अधिनियम-पाठ से हैं।

जवाबदेही और उत्तरदायित्व: आधार-भेद

इन शब्दों को मिलाना सबसे आम चूक है। NCERT के अनुसार अधिकार (authority) सौंपा जा सकता है, उत्तरदायित्व (responsibility) ग्रहण किया जाता है और जवाबदेही थोपी जाती है; जवाबदेही पूरी तरह प्रत्यायोजित नहीं होती और अधीनस्थ से ऊपर वाले की ओर बहती है। यानी निदेशक ने ज़िला अधिकारी को स्वीकृति का अधिकार दे दिया, तब भी अंतिम नतीजे के लिए निदेशक जवाबदेह बना रहेगा। यह बात प्रत्यायोजन के पृष्ठ में विस्तार से है; यहाँ केवल इतना याद रखें कि जवाबदेही "अंतिम नतीजे का उत्तर" है और उसका एक पूरा ढाँचा बनाना पड़ता है।

द्वितीय ARC ने इसी बात को "interlocking accountability" (परस्पर गुँथी जवाबदेही) कहा है। आयोग के अनुसार सिविल सेवा में हर स्तर पर कर्तव्य और ज़िम्मेदारियाँ साफ़ बँटी हों, निगरानी करने वाले अधिकारियों की ज़िम्मेदारी भी ठोस शब्दों में लिखी हो, और पुरस्कार-दंड की ऐसी व्यवस्था हो जिसमें मनमानी की गुंजाइश न रहे। रिपोर्ट एक सूत्र भी उद्धृत करती है: एकाधिकार + विवेकाधिकार - जवाबदेही = भ्रष्टाचार। इस सूत्र को उत्तर में शुरुआती वाक्य की तरह बहुत अच्छी तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

जवाबदेही के प्रकार: दिशा के आधार पर

द्वितीय ARC की भाषा में जवाबदेही तीन दिशाओं से आती है। पहली, आंतरिक-ऊर्ध्वाधर (internal vertical): अधीनस्थ से वरिष्ठ अधिकारी, फिर मंत्री तक की श्रृंखला, जिसमें फ़ाइल, निरीक्षण, वार्षिक रिपोर्ट और अनुशासनिक नियम आते हैं। दूसरी, क्षैतिज (horizontal): विधायिका और न्यायपालिका जैसी स्वतंत्र संस्थाएँ कार्यपालिका को जाँचती हैं; आयोग ने इन्हें "विधायी और क़ानूनी जवाबदेही" कहा है। तीसरी, नागरिकों की आवाज़ (voice) से आने वाली जवाबदेही, जिसमें नागरिक समाज, मीडिया और स्वयं नागरिक प्रशासन से सवाल करते हैं। आयोग इसे पारंपरिक तंत्रों में जुड़ा "नया आयाम" बताता है।

परीक्षा में इन्हें सरल चार मंचों में रखना सबसे सुरक्षित है: विधायी, कार्यकारी (प्रशासनिक), न्यायिक और सामाजिक। विश्लेषण: इन चार नामों में पहली दो ARC की "आंतरिक" और "क्षैतिज" श्रेणियों में बाँटी जा सकती हैं, तीसरी भी क्षैतिज है और चौथी "आवाज़" वाली है। इसलिए उत्तर के शुरू में एक पंक्ति में ARC की तीन दिशाएँ लिखकर आगे चार मंच गिनाएँ, तो वर्गीकरण भी प्रामाणिक रहता है और उत्तर भी व्यवस्थित।

चार मंच, चार औज़ार

मंचमुख्य साधनसंवैधानिक/क़ानूनी आधारआम कमज़ोरी (विश्लेषण)
विधायीप्रश्न, चर्चा, बजट-पारित करना, समितियाँ (लोक लेखा समिति), CAG की रिपोर्टअनुच्छेद 75(3) और 164(2): मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोक सभा या विधान सभा के प्रति उत्तरदायी; अनुच्छेद 148, 151सदन का समय सीमित; समितियों की सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं
कार्यकारी (प्रशासनिक)पदानुक्रम, निरीक्षण, अनुशासनिक कार्रवाई, सतर्कता तंत्र, लोकपाल और लोकायुक्तसेवा-नियम; अनुच्छेद 311 (जाँच और सुनवाई का अवसर)अपने ही विभाग की जाँच में हितों का टकराव; मनमाने तबादले
न्यायिकरिट, न्यायिक पुनरावलोकन, अधिकरणअनुच्छेद 32 (सर्वोच्च न्यायालय) और अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय) के अंतर्गत रिटमुक़दमे में देरी और ख़र्च; आम नागरिक की पहुँच सीमित
सामाजिकRTI, सामाजिक अंकेक्षण, जन सुनवाई, नागरिक घोषणा-पत्र, मीडिया, नागरिक समाजRTI अधिनियम 2005; राज्यों के लोक सेवा गारंटी क़ानूनजागरूकता की कमी; घोषणा-पत्र में दंड या मुआवज़े का प्रावधान न होना

संविधान के अनुच्छेद संविधान के पाठ से मिलाए गए हैं। "आम कमज़ोरी" वाला स्तंभ हमारा विश्लेषण है, स्रोत का कथन नहीं।

विधायी और कार्यकारी जवाबदेही: सार

संसदीय प्रणाली की जड़ में है कि सरकार संसद के प्रति जवाबदेह रहे। अनुच्छेद 75(3) कहता है कि मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है; राज्यों में अनुच्छेद 164(2) यही बात विधान सभा के लिए कहता है। इसलिए एक मंत्री का फ़ैसला पूरे मंत्रिमंडल की ज़िम्मेदारी बन जाता है और विश्वास खोने पर पूरी सरकार को जाना पड़ता है। इसके अलावा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) संघ और राज्यों के लेखों की जाँच करता है। अनुच्छेद 148 के अनुसार उसे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की ही रीति और आधारों पर हटाया जा सकता है, और अनुच्छेद 151 के अनुसार उसकी रिपोर्टें राष्ट्रपति या राज्यपाल के माध्यम से संसद या विधानमंडल के पटल पर रखी जाती हैं। PRS के अनुसार हर रिपोर्ट पर सदन में चर्चा कठिन और समय-साध्य है, इसलिए CAG की रिपोर्टों की जाँच लोक लेखा समिति (PAC) करती है।

कार्यकारी जवाबदेही आंतरिक है और रोज़ की प्रशासनिक चीज़ों में दिखती है: फ़ाइल पर किसने क्या लिखा, किसने मंज़ूरी दी, किसने निरीक्षण किया। द्वितीय ARC के अनुसार भ्रष्टाचार और कुशासन का एक बड़ा कारण यही है कि सिविल सेवकों की जवाबदेही की वर्तमान व्यवस्था असंतोषजनक है; इसलिए उसने हर स्तर पर स्पष्ट कर्तव्य-बँटवारा, ऊपर तक जुड़ी निगरानी और पुरस्कार-दंड के निष्पक्ष मानदंड माँगे। अनुशासनिक कार्रवाई के लिए अनुच्छेद 311 जाँच और सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य बनाता है, ताकि जवाबदेही का अर्थ मनमानी बर्ख़ास्तगी न हो जाए। लोकपाल, लोकायुक्त और विधायी-न्यायिक नियंत्रण के अलग पृष्ठ हैं; यहाँ बस इतना ध्यान रखें कि वे सब इसी ढाँचे की शाखाएँ हैं।

न्यायिक जवाबदेही

न्यायालय वह मंच है जहाँ जवाबदेही को क़ानूनी बल मिलता है। अनुच्छेद 32(2) सर्वोच्च न्यायालय को बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा की प्रकृति के निदेश, आदेश या रिट जारी करने की शक्ति देता है; अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को भी रिट-अधिकारिता देता है। जब कोई अधिकारी क़ानूनी कर्तव्य निभाने से इनकार करे तो परमादेश (mandamus) उसे कर्तव्य निभाने का आदेश देता है; जब कोई प्राधिकारी अधिकार से बाहर जाए तो प्रतिषेध (prohibition) उसे रोकता है। न्यायिक नियंत्रण के रूपों और विधायी नियंत्रण की प्रक्रियाओं (जैसे शून्य काल, प्रश्नकाल) का पूरा ब्योरा "प्रशासन पर नियंत्रण" पृष्ठ में है, इसलिए यहाँ दोहराया नहीं गया।

सामाजिक जवाबदेही: सूचना का अधिकार, सामाजिक अंकेक्षण, नागरिक घोषणा-पत्र

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारत में जवाबदेही का सबसे प्रभावी नागरिक-औज़ार है। अधिनियम का उद्देश्य ही सार्वजनिक प्राधिकरणों के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही लाना है। इसकी धारा 4 हर प्राधिकरण से कहती है कि वह अपने संगठन, कर्तव्य, निर्णय-प्रक्रिया (निगरानी और जवाबदेही की कड़ियों सहित), बजट और सब्सिडी-लाभार्थियों जैसी जानकारी ख़ुद प्रकाशित करे, महत्त्वपूर्ण नीतियाँ बनाते समय सभी प्रासंगिक तथ्य सार्वजनिक करे और प्रभावित व्यक्तियों को प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक निर्णयों के कारण बताए। धारा 4(2) कहती है कि प्राधिकरण स्वतः इतनी जानकारी देने का निरंतर प्रयास करें कि जनता को इस अधिनियम का सहारा कम से कम लेना पड़े।

सामाजिक अंकेक्षण (social audit) में समुदाय सरकारी ख़र्च और काम की सामूहिक जाँच करता है। Accountability Research Center के अनुसार भारत में इसकी शुरुआत 1990 के दशक में राजस्थान में मज़दूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) के संघर्ष से हुई, जो न्यूनतम मज़दूरी लागू कराने के लिए सरकारी रिकॉर्ड की माँग से जुड़ा था। इसी की "जन सुनवाई" (jan sunwai) में गाँववाले सरकारी रिकॉर्ड पढ़कर अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने उनकी सच्चाई परखते थे। यही अभियान आगे चलकर राष्ट्रीय सूचना के अधिकार आंदोलन का आधार बना। सामाजिक अंकेक्षण के पूरे चरणों के लिए अलग पृष्ठ देखें।

नागरिक घोषणा-पत्र (Citizens' Charter) सेवा-प्रदाता संस्था का नागरिकों से किया गया वादा है कि वह तय मानकों पर सेवा देगी। द्वितीय ARC ने लिखा कि कई कार्यालयों में ये घोषणा-पत्र पवित्र घोषणाएँ बनकर रह गए क्योंकि इन्हें लागू कराने का कोई तंत्र नहीं था। आयोग का सुझाव था कि घोषणा-पत्र में विशिष्ट दायित्व और समय-सीमा लिखी हो, और चूक होने पर उपचार, दंड या मुआवज़ा साफ़ बताया जाए, तभी ये सार्वजनिक सेवकों को जवाबदेह बनाने का औज़ार बनेंगे। राजस्थान के सुनवाई का अधिकार अधिनियम, 2012 और लोक सेवा गारंटी अधिनियम, 2011 जैसे क़ानून इसी दिशा के प्रयास हैं; उनकी धाराओं का ब्योरा सुशासन के पृष्ठ पर है।

जवाबदेही की चुनौतियाँ और सुधार का रास्ता

व्यवहार में जवाबदेही चार जगह अटकती है (विश्लेषण, द्वितीय ARC की रिपोर्ट के संकेतों पर आधारित)। पहली, कर्तव्य का धुँधलापन: जब फ़ाइल कई मेज़ों से गुज़रे और हर मेज़ "सिफ़ारिश" लिखकर आगे बढ़ा दे, तो किसकी ग़लती थी यह तय करना कठिन हो जाता है; इसी कारण आयोग ने हर स्तर पर साफ़ कर्तव्य-बँटवारा माँगा। दूसरी, पुरस्कार-दंड का अभाव: ARC के अनुसार अभी न मेहनत से काम करने का प्रोत्साहन है, न टालमटोल और भ्रष्टाचार के प्रतिकूल नतीजे। तीसरी, अपारदर्शिता: आयोग पारदर्शिता को खुलेपन और जवाबदेही का पर्याय मानता है, यानी निर्णय और कार्यशैली जनता व मीडिया की जाँच के लिए खुली हो। चौथी, कमज़ोर नागरिक औज़ार: जैसे ऊपर बताए घोषणा-पत्र।

सुधार के तीन ठोस सुझाव आयोग की रिपोर्ट से निकलते हैं: कर्तव्य-बँटवारा और ऊपर तक जुड़ी निगरानी, पुरस्कार-दंड के निष्पक्ष मानदंड, और नागरिक भागीदारी को सशक्त करना ताकि जवाबदेही केवल ऊपर से नहीं, नीचे से भी बने। अधिकारियों के मनमाने तबादले जवाबदेही को कैसे कमज़ोर करते हैं, इसके लिए "मंत्री-सिविल सेवक संबंध" का पृष्ठ देखें।

लोक प्रशासन का सामाजिक उत्तरदायित्व (2018 का प्रश्न)

सामाजिक उत्तरदायित्व का मोटा अर्थ है कि सरकारी कामकाज का अंतिम मापदंड समाज का हित है, ख़ासकर उन लोगों का जिनकी आवाज़ कमज़ोर है। जैसे एक ग्राम सेवक का काम केवल फ़ाइल निपटाना नहीं, यह भी देखना है कि पेंशन असली पात्र तक पहुँची या नहीं। अब सटीक रूप: लोक प्रशासन का सामाजिक उत्तरदायित्व वह दायित्व है कि प्रशासन अपने निर्णयों और सेवाओं में संवैधानिक मूल्यों (न्याय, समानता, कल्याण) के अनुरूप समाज के हित को सर्वोपरि रखे, उसकी अपेक्षाओं के प्रति संवेदनशील रहे और अपने कार्यों के लिए पारदर्शी व जवाबदेह हो। (यह परिभाषा नीचे दिए संवैधानिक और ARC स्रोतों पर आधारित हमारा संकलन है, किसी एक पाठ्यपुस्तक की उद्धृत परिभाषा नहीं।)

इसका संवैधानिक आधार स्पष्ट है। प्रस्तावना सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय का वचन देती है। अनुच्छेद 38(1) कहता है कि राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाने का प्रयास करेगा जिसमें राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रेरित करे; अनुच्छेद 38(2) राज्य को आय की विषमता घटाने और प्रास्थिति, सुविधाओं तथा अवसरों की असमानता मिटाने का प्रयास करने को कहता है। द्वितीय ARC की न्यासी (trusteeship) की धारणा इसे नैतिक रूप देती है: सार्वजनिक पदाधिकारी को मिला अधिकार जनहित में ही प्रयोग होना चाहिए।

उत्तर में चार आयाम लिखना पर्याप्त है (विश्लेषण): एक, कल्याण और समता: कमज़ोर वर्गों तक सेवा पहुँचाना। दो, संवेदनशीलता: नागरिक घोषणा-पत्र जैसे साधन से नागरिक की ज़रूरत पर प्रतिक्रिया। तीन, पारदर्शिता और जवाबदेही: RTI, सामाजिक अंकेक्षण। चार, नैतिक आचरण और सत्यनिष्ठा: निष्पक्षता और भ्रष्टाचार-मुक्ति। यहाँ सावधानी रखें: यह कंपनियों के "कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व" (CSR) से अलग विषय है, जो निजी कंपनियों पर लागू होता है; उसकी चर्चा इस उत्तर में न मिलाएँ।

जवाबदेही की श्रृंखला

  1. अधीनस्थ कर्मचारी

    काम करता है; अपने वरिष्ठ को जवाब देता है

  2. वरिष्ठ अधिकारी/सचिव

    अधीनस्थों के काम के अंतिम नतीजे के लिए जवाबदेह

  3. मंत्री

    विभाग के लिए विधायिका के सामने उत्तरदायी

  4. मंत्रिपरिषद → विधायिका

    अनुच्छेद 75(3), 164(2): सामूहिक उत्तरदायित्व

  5. नागरिक

    चुनाव, RTI, सामाजिक अंकेक्षण से अंतिम पूछताछ

जवाबदेही सेवा-स्तर से ऊपर की ओर बहती है और अंत में जनता तक पहुँचती है। न्यायपालिका और CAG इस श्रृंखला को बाहर से जाँचते हैं (विश्लेषण-आधारित चित्र)।

समय-रेखा: सूचना और जवाबदेही

  1. 1990 का दशक

    राजस्थान में MKSS की जन सुनवाइयाँ; सामाजिक अंकेक्षण की शुरुआत

  2. 11 मई 2000

    राजस्थान सूचना का अधिकार अधिनियम, 2000 (अधिनियम 13/2000) को राज्यपाल की स्वीकृति

  3. 15 जून 2005

    सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को स्वीकृति

  4. 12 अक्टूबर 2005

    RTI अधिनियम लागू

  5. जनवरी 2007

    द्वितीय ARC की चौथी रिपोर्ट: Ethics in Governance

  6. 13 सितंबर 2019

    जन सूचना पोर्टल पर UN के भाषण की तारीख़; पंचायत स्तर पर 21 योजनाओं का स्वतः प्रकटीकरण (भाषण के अनुसार)

1990 के दशक का वर्ष स्रोतों में नहीं दिया गया है, इसलिए केवल दशक लिखा है।

एक नज़र में: जवाबदेही

जवाबदेही

अवधारणा

  • उत्तर-देयता + प्रवर्तन
  • न्यासी की धारणा
  • जवाबदेही नहीं सौंपी जाती

तीन दिशाएँ (ARC)

  • आंतरिक-ऊर्ध्वाधर
  • क्षैतिज: विधायी, क़ानूनी
  • नागरिक आवाज़

चार मंच

  • विधायी: अनु. 75(3), 164(2), CAG, PAC
  • कार्यकारी: पदानुक्रम, अनु. 311
  • न्यायिक: अनु. 32, 226
  • सामाजिक: RTI, जन सुनवाई, घोषणा-पत्र

RTI की रेखाएँ

  • 30 दिन; 48 घंटे
  • अपील: 30 और 90 दिन
  • दंड: 250 रुपये/दिन, अधिकतम 25,000 रुपये

सामाजिक उत्तरदायित्व

  • प्रस्तावना: न्याय
  • अनु. 38: कल्याण
  • कल्याण, संवेदनशीलता, पारदर्शिता, सत्यनिष्ठा

मुख्य तथ्य

जवाबदेही के दो स्तंभ (शेडलर, 1999)
उत्तर-देयता (जानकारी और औचित्य) और प्रवर्तन (दंड की क्षमता)
लोकतंत्र में पदधारक की जवाबदेही (द्वितीय ARC, जनवरी 2007)
अंततः जनता के प्रति; सभी सार्वजनिक पदाधिकारी जनता के न्यासी
मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व
अनुच्छेद 75(3): लोक सभा के प्रति; अनुच्छेद 164(2): राज्य की विधान सभा के प्रति
CAG की रिपोर्ट
अनुच्छेद 151: राष्ट्रपति/राज्यपाल के माध्यम से संसद/विधानमंडल में; जाँच लोक लेखा समिति करती है
RTI अधिनियम: उत्तर की समय-सीमा
30 दिन; जीवन या स्वतंत्रता की सूचना पर 48 घंटे (धारा 7(1))
RTI अपील
प्रथम अपील 30 दिन में (धारा 19(1)); द्वितीय अपील 90 दिन में (धारा 19(3))
RTI दंड (धारा 20(1))
250 रुपये प्रतिदिन, अधिकतम 25,000 रुपये
RTI अधिनियम 2005: स्वीकृति और प्रवर्तन
15 जून 2005 स्वीकृति; 12 अक्टूबर 2005 से लागू
राजस्थान सूचना का अधिकार अधिनियम, 2000
अधिनियम 13/2000; राज्यपाल की स्वीकृति 11 मई 2000
नागरिक घोषणा-पत्र पर द्वितीय ARC का मत
लागू कराने का तंत्र नहीं होने से कई घोषणा-पत्र निष्प्रभावी; उपचार, दंड या मुआवज़ा साफ़ लिखा जाए
अंतिम जाँच
1 अक्टूबर 2026

राजस्थान का पहलू

राजस्थान सूचना का अधिकार अधिनियम, 2000 (अधिनियम 13/2000) केंद्रीय अधिनियम 2005 से पाँच वर्ष पहले का है; अधिनियम के पाठ में राज्यपाल की स्वीकृति 11 मई 2000 दर्ज है। राजस्थान सरकार के जन सूचना पोर्टल का मुखपृष्ठ (1 अक्टूबर 2026 को देखा गया) बताता है कि पोर्टल सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 4(2) के अंतर्गत स्वतः प्रकटीकरण करता है, और इसमें सामाजिक सुरक्षा पेंशन तथा राशन-कार्डधारकों जैसी जानकारी के साथ RTI आवेदन ट्रैक करने की सुविधा दी गई है। UN India के भाषण (13 सितंबर 2019) के अनुसार पंचायत स्तर पर 21 योजनाओं के स्वतः प्रकटीकरण वाली यह भारत की पहली पहल थी; इसे वक्ता का कथन मानकर लिखें। पोर्टल पर आज कितनी योजनाएँ या विभाग हैं, यह यहाँ जानबूझकर नहीं दिया गया क्योंकि उसकी तिथि-युक्त सरकारी अधिसूचना नहीं देखी गई।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • जवाबदेही को उत्तरदायित्व का पर्याय लिख देना: उत्तरदायित्व काम ठीक से करने का दायित्व है, जवाबदेही अंतिम नतीजे का उत्तर और परिणाम भुगतने की बाध्यता है।
  • यह लिखना कि अधिकार देने पर जवाबदेही भी चली जाती है: जवाबदेही प्रत्यायोजित नहीं होती, ऊपर वाले के पास ही रहती है।
  • उत्तर-देयता और प्रवर्तन में से केवल एक का ज़िक्र करना: जानकारी देना भी ज़रूरी है और दंड की व्यवस्था भी; दोनों साथ हों तभी जवाबदेही पूरी बनती है।
  • RTI की समय-सीमाएँ गड़बड़ाना: 30 दिन (सामान्य), 48 घंटे (जीवन-स्वतंत्रता), प्रथम अपील 30 दिन, द्वितीय अपील 90 दिन, दंड 250 रुपये प्रतिदिन और अधिकतम 25,000 रुपये।
  • सामाजिक उत्तरदायित्व में कंपनियों के CSR का क़ानून घुसा देना: यहाँ संदर्भ लोक प्रशासन का है (प्रस्तावना, अनुच्छेद 38 और न्यासी की धारणा)।
  • यह दावा करना कि नागरिक घोषणा-पत्र क़ानूनी रूप से लागू कराने योग्य हैं: द्वितीय ARC के अनुसार कई घोषणा-पत्रों में लागू कराने का कोई तंत्र नहीं है, इसलिए सुझाव दिया कि उपचार और मुआवज़ा लिखा जाए।