लोक प्रशासन का विकास (Evolution of Public Administration)
विल्सन (1887) से मिन्नोब्रुक, नव लोक प्रशासन, नव लोक प्रबंधन और शासन तक: पाँच चरणों में लोक प्रशासन के विकास की कहानी, साइमन की आपत्ति के उदाहरण और भारत की गोरवाला-एपलबी कड़ी के साथ।
- विकास के चरण
- विल्सन 1887
- साइमन 1946
- मिन्नोब्रुक 1968
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II: "Public Administration: Theories and Principles. Meaning, nature, scope and significance; evolution as a discipline; role in developing and developed societies; New Public Administration, New Public Management, Good Governance, New Public Service." इस पृष्ठ पर "evolution as a discipline" है; अर्थ, प्रकृति और क्षेत्र का अलग पृष्ठ है।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में "विषय के रूप में लोक प्रशासन का विकास" शीर्षक का सीधा प्रश्न दर्ज नहीं है। इसलिए नीचे के अभ्यास-प्रश्न मौलिक हैं, पिछले वर्षों के प्रश्न नहीं।
- फिर भी यह पृष्ठ ज़रूरी है: नव लोक प्रबंधन (NPM) के प्रश्न 2013, 2016 और 2024 के पेपरों में आए हैं, और उन्हें पूरा समझने के लिए पता होना चाहिए कि NPM किस पुराने ढाँचे की प्रतिक्रिया है। (विश्लेषण)
- एक बार पाँच चरण, हर चरण का एक प्रमुख नाम और एक वर्ष याद हो जाए तो विल्सन, गुलिक, साइमन और मिन्नोब्रुक पर 15, 50 या 100 शब्द के किसी भी प्रश्न का ढाँचा तुरंत बन जाता है।
पहले सरल भाषा में: एक नया विषय अपनी पहचान कैसे खोजता है
सोचिए, किसी तहसील में पहली बार एक नया दफ़्तर खुलता है। शुरू में सब कहते हैं कि दफ़्तर का काम सीधा है: नियम पढ़ो, फ़ाइल चलाओ। कुछ साल बाद कर्मचारी कहते हैं कि कोई तय तरीक़ा बनना चाहिए। फिर कोई टोकता है कि हर दफ़्तर अलग है और तय तरीक़े काम नहीं करते। अंत में नए लोग आकर पूछते हैं कि यह सब किसके लिए है। लोक प्रशासन का इतिहास लगभग ऐसा ही है: अलग विषय बनने की माँग, "सिद्धांतों" की खोज, उन पर प्रहार, पहचान का संकट, और फिर जन-हित की चिंता।
पाठ्यपुस्तकों में इस यात्रा को पाँच कालखंडों में बाँटा जाता है: (I) 1887-1926, (II) 1927-37, (III) 1938-47, (IV) 1948-70 और (V) 1971 के बाद। यह बँटवारा एक प्रचलित पाठ्यपुस्तकीय परिपाटी है, कोई आधिकारिक कालक्रम नहीं; परीक्षा में इसी ढाँचे में लिखना सुरक्षित है, पर वाक्य "आम तौर पर माना जाता है" की भाषा में रखिए।
एक सावधानी: मैक्स वेबर और नौकरशाही का मॉडल इस विकास-क्रम की पृष्ठभूमि है, पर यह पृष्ठ उनके सिद्धांत की व्याख्या नहीं करता। सिलेबस की सूची में वह अलग से नहीं दिखता; इसलिए उसे सिर्फ़ पृष्ठभूमि माना गया है।
समय-रेखा: पाँच चरण, एक नज़र में
1887
विल्सन का निबंध "The Study of Administration"; अलग अध्ययन-क्षेत्र की माँग
1900
गुडनाउ की Politics and Administration: राजनीति-प्रशासन द्विभाजन
1926
एल. डी. व्हाइट की पहली पाठ्यपुस्तक: Introduction to the Study of Public Administration
1927
विलोबी की Principles of Public Administration; "सिद्धांतों" का युग शुरू
1937
गुलिक और उर्विक की Papers on the Science of Administration; POSDCORB
1946-47
साइमन: "Proverbs of Administration" (1946) और Administrative Behavior (1947)
1948-70
पहचान का संकट: राजनीति-विज्ञान या प्रशासनिक विज्ञान?
1968
मिन्नोब्रुक सम्मेलन-I; वाल्डो की भूमिका
1971
Toward a New Public Administration (मरीनी) और Public Administration in a Time of Turbulence (वाल्डो)
1991
क्रिस्टोफ़र हुड द्वारा "New Public Management" शब्द
पाँच चरण: सार तालिका
| चरण | कालखंड | केंद्रीय विचार | प्रमुख नाम और कृतियाँ |
|---|---|---|---|
| I | 1887-1926 | राजनीति-प्रशासन द्विभाजन; दक्षता और मितव्ययिता | विल्सन (1887), गुडनाउ (1900), व्हाइट (1926) |
| II | 1927-37 | प्रशासन के सिद्धांत; मूल्य-मुक्त "विज्ञान" की खोज | विलोबी (1927), फ़ेयोल, फ़ॉलेट, मूनी-रेले, गुलिक-उर्विक (1937) |
| III | 1938-47 | सिद्धांतों को चुनौती: "लोकोक्तियाँ"; विज्ञान होने पर संदेह | साइमन (1946, 1947), डाहल |
| IV | 1948-70 | पहचान का संकट; राजनीति-विज्ञान या प्रशासनिक विज्ञान | वाल्डो; मार्च-साइमन आदि; दशक के अंत में नई माँगें |
| V | 1971 के बाद | अंतर-अनुशासनीय; नीति-विज्ञान; सामाजिक समानता; बाज़ार-प्रबंधन; शासन | मरीनी और वाल्डो (1971), हुड (1991), विश्व बैंक (1992) |
कुछ लेखक चरणों के नाम थोड़े अलग रखते हैं।
चरण I (1887-1926): द्विभाजन और अलग विषय की माँग
जून 1887 में वुडरो विल्सन ने Political Science Quarterly में "The Study of Administration" लिखा। इसी कारण उन्हें विषय का जनक कहा जाता है। उनका तर्क सीधा था: संविधान बनाना राजनीति का काम है, पर उसे चलाना प्रशासन का; उनके शब्दों में संविधान चलाना उसे बनाने से कठिन होता जा रहा है। इसलिए प्रशासन को राजनीति के झगड़ों से अलग, एक व्यावसायिक अध्ययन की तरह देखा जाए।
1900 में फ़्रैंक गुडनाउ की Politics and Administration ने इसी बात को आगे बढ़ाया: राजनीति राज्य की इच्छा की अभिव्यक्ति है और प्रशासन उस इच्छा का निष्पादन। उन्होंने दोनों के संस्थागत स्थान भी बाँटे: राजनीति विधायिका और शीर्ष स्तर का काम, प्रशासन कार्यपालिका का। इसी को राजनीति-प्रशासन द्विभाजन कहते हैं।
1926 में एल. डी. व्हाइट की Introduction to the Study of Public Administration आई, जिसे इस विषय की पहली पाठ्यपुस्तक माना जाता है। उसकी मान्यताएँ थीं कि राजनीति और प्रशासन अलग रहें तथा दक्षता और मितव्ययिता प्रशासन के मूल मंत्र हों। यह चरण द्विभाजन में इतना विश्वास रखता था कि व्यवहार में दोनों का घालमेल उसे विचलित नहीं करता था।
चरण II (1927-37): "सिद्धांतों" का स्वर्ण-काल
1927 में डब्ल्यू. एफ़. विलोबी की Principles of Public Administration आई; शीर्षक में ही "सिद्धांत" शब्द इस चरण की दिशा बता देता है। इसी दौर में फ़ेयोल, मैरी पार्कर फ़ॉलेट और मूनी-रेले की रचनाएँ भी चर्चा में रहीं। विचार यह था कि संगठन-व्यवहार से कुछ सार्वभौमिक नियम निकाले जा सकते हैं, चाहे संस्था सरकारी हो या निजी।
इस चरण का शिखर 1937 में गुलिक और उर्विक का संपादित संग्रह Papers on the Science of Administration है। उर्विक का तर्क था कि मानव-संगठन के कुछ सिद्धांत प्रयोजन, कर्मियों या राजनीतिक-सामाजिक सिद्धांत से स्वतंत्र होकर समझे जा सकते हैं। इसी संग्रह में गुलिक ने POSDCORB का सूत्र दिया, जिसका ब्योरा अर्थ-प्रकृति वाले पृष्ठ पर है। यह दौर "विज्ञान" शब्द से इतना जुड़ा कि सरकार और व्यापार, दोनों में इन विशेषज्ञों की माँग रही।
चरण III (1938-47): सिद्धांतों पर प्रहार
तीसरे चरण में "सिद्धांतों" को ही कटघरे में खड़ा किया गया। निर्णायक प्रहार हर्बर्ट साइमन का था: शीतकाल 1946 में Public Administration Review के खंड 6 के पहले अंक में उनका लेख "The Proverbs of Administration" छपा। उनका कहना था कि ये सिद्धांत लोकोक्तियों जैसे हैं: हर एक के सामने उतनी ही वज़नदार उलटी कहावत मिल जाती है। 1947 की Administrative Behavior में उन्होंने निर्णय-प्रक्रिया को प्रशासन का केंद्र माना और द्विभाजन को भी अस्वीकार किया। इसी योगदान के लिए उन्हें 1978 में नोबेल पुरस्कार मिला।
इसी दौर में रॉबर्ट डाहल ने "The Science of Public Administration: Three Problems" में तीन आपत्तियाँ रखीं: प्रशासन में मूल्यों को अलग करना प्राय: असंभव है; प्रशासन मानव-व्यवहार का अध्ययन है, इसलिए पूरे मनुष्य को समझना पड़ेगा; और कुछ सीमित उदाहरणों से "सार्वभौमिक" सिद्धांत गढ़ना ग़लत है। इन आलोचनाओं के बाद विषय का आत्मविश्वास डगमगा गया।
चरण IV (1948-70): पहचान का संकट
सिद्धांत ढह जाने के बाद विषय के सामने पहचान का सवाल था। एक रास्ता राजनीति-विज्ञान में लौटने का था, पर वहाँ से अपेक्षित स्वागत नहीं मिला: कई राजनीति-वैज्ञानिक प्रशासन को कार्यपालिका की बौद्धिक समझ तक सीमित रखना चाहते थे। दूसरा रास्ता प्रशासनिक विज्ञान का था, जिसमें मान्यता थी कि प्रशासन हर जगह एक जैसा है, चाहे सरकार हो या कंपनी। इस राह पर लोक प्रशासन की अलग पहचान घुल जाती थी। दोनों तरफ़ संकट था।
1960 के दशक के अंत तक अमेरिका में उथल-पुथल थी। ड्वाइट वाल्डो ने "Public Administration in a Time of Revolutions" (1968) में लिखा कि न अध्ययन और न व्यवहार बढ़ती अशांति और गंभीर समस्याओं का उपयुक्त जवाब दे रहा है। इसी माहौल में 1968 का मिन्नोब्रुक सम्मेलन हुआ, जिसे अगला अध्याय माना जाता है।
चरण V (1971 के बाद): नव लोक प्रशासन, नव लोक प्रबंधन और शासन
1968 में सिरैक्यूज़ विश्वविद्यालय के मिन्नोब्रुक सम्मेलन में युवा विद्वानों और व्यवहार-कर्ताओं ने माँग की कि प्रशासन केवल दक्षता और मितव्ययिता तक सीमित न रहे; उसे प्रासंगिक, मूल्य-सजग और जनहित से जुड़ा होना चाहिए। 1971 में दो पुस्तकें आईं: फ़्रैंक मरीनी द्वारा संपादित Toward a New Public Administration: The Minnowbrook Perspective और ड्वाइट वाल्डो द्वारा संपादित Public Administration in a Time of Turbulence। इन्हीं से "नव लोक प्रशासन" (NPA) की अवधारणा प्रचलित हुई। 1971 से विषय को अंतर-अनुशासनीय और नीति-विज्ञान से जुड़ा माना जाता है।
1980-90 के दशक में बाज़ार की भाषा का असर बढ़ा। क्रिस्टोफ़र हुड ने 1991 में "New Public Management" शब्द गढ़ा और NPM को उन्होंने सात पहलुओं में समझाया (विस्तार नव लोक प्रबंधन के पृष्ठ पर)। इसके समानांतर 1992 की विश्व बैंक रिपोर्ट और NPM के नए प्रतिमान ने "शासन" (governance) की अवधारणा में नया आयाम जोड़ा। इसलिए चरण V को एक ही शब्द में बाँधना कठिन है: यहाँ सामाजिक समानता वाली माँग (NPA) और बाज़ार-प्रबंधन वाली माँग (NPM) साथ-साथ चलती हैं और बाद की शासन-चर्चा दोनों को समेटती है। (विश्लेषण)
सिद्धांतों का युग बनाम साइमन की आलोचना
चरण II की मान्यता
विषय का स्वरूपप्रशासन एक मूल्य-मुक्त "विज्ञान" है
सिद्धांतसंगठन-व्यवहार से सार्वभौमिक नियम निकाले जा सकते हैं
मनुष्य की छविसंगठन एक यंत्र है, कर्मचारी उसके पुर्ज़े
राजनीति और प्रशासनदोनों अलग हैं (द्विभाजन)
अध्ययन-क्षेत्रसरकार और व्यापार, दोनों में लागू
चरण III की आपत्ति
विषय का स्वरूपडाहल: मूल्यों और साध्य को अलग करना प्राय: असंभव है
सिद्धांतसाइमन: ये नियम लोकोक्तियों जैसे हैं, एक के सामने उलटा नियम खड़ा है
मनुष्य की छविडाहल: अध्ययन में पूरे मनुष्य का मनोविज्ञान आना चाहिए
राजनीति और प्रशासनसाइमन: द्विभाजन अस्वीकार; केंद्र में निर्णय-प्रक्रिया
अध्ययन-क्षेत्रडाहल: सीमित राष्ट्रीय और ऐतिहासिक उदाहरणों से सार्वभौमिक नियम गढ़ना ग़लत
नव लोक प्रशासन (NPA) और नव लोक प्रबंधन (NPM): मोटा अंतर
| आधार | नव लोक प्रशासन (NPA) | नव लोक प्रबंधन (NPM) |
|---|---|---|
| काल और उद्गम | 1968 का मिन्नोब्रुक सम्मेलन; 1971 की दो पुस्तकें | 1980-90 के दशक के सुधार; शब्द हुड का, 1991 |
| मुख्य चिंता | प्रासंगिकता, मूल्य और सामाजिक समानता | दक्षता, परिणाम और बाज़ार-शैली का प्रबंधन |
| प्रशासक की भूमिका | समाज की समस्याओं के प्रति संवेदनशील और सक्रिय | संविदाओं और प्रदर्शन के प्रबंधक |
| पृष्ठभूमि | 1960 के दशक की अशांति और पहचान का संकट | बड़ी और अक्षम सरकार की समस्याएँ |
विस्तृत पृष्ठ अलग हैं।
विकास-क्रम को याद रखने और लिखने का तरीक़ा
पाँचों चरणों को एक कहानी की तरह याद कीजिए: पहले चरण में "अलग हो जाओ" (विल्सन), दूसरे में "नियम खोजो" (विलोबी, गुलिक), तीसरे में "नियम झूठे हैं" (साइमन, डाहल), चौथे में "हम कौन हैं?" (पहचान का संकट) और पाँचवें में "किसके लिए और कैसे?" (NPA, NPM, शासन)। हर चरण का एक नाम और एक वर्ष जोड़ लेने से 50 शब्द के उत्तर का ढाँचा बन जाता है।
जब 100 शब्द का प्रश्न हो तो पाँचों चरण एक-एक वाक्य में लिखिए और अंत में एक पंक्ति का निष्कर्ष जोड़िए। जब 15 शब्द का प्रश्न हो तो सिर्फ़ किसी एक चरण की परिभाषा और एक नाम-वर्ष दीजिए। 50 शब्द के उत्तर में कोई एक घटना (जैसे मिन्नोब्रुक) और उसका असर लिखना बेहतर रहता है। यह उत्तर-लेखन की सलाह विश्लेषण है, आधिकारिक नियम नहीं। जहाँ तिथि पर संदेह हो, वहाँ वर्ष की जगह "1920 के दशक" जैसा दशक लिखना भी चल जाता है, पर पक्के वर्ष ऊपर की तालिका से मिलाकर लिखें।
ध्यान रखिए कि इतिहास की इस कथा में अमेरिका का दबदबा है, क्योंकि वहीं यह विषय पनपा। भारत में इसकी जड़ें अपेक्षाकृत नई हैं: बीसवीं सदी के मध्य की रिपोर्टों और संस्थाओं से विषय को यहाँ संस्थागत आधार मिला। इसलिए उत्तर में भारतीय कड़ी (गोरवाला, एपलबी, IIPA) का एक वाक्य जोड़ने से उत्तर अलग दिखता है।
भारत में विकास: गोरवाला और एपलबी
भारत में इस विषय की एक संस्थागत यात्रा भी है, जिसकी चर्चा परीक्षा में अलग से पूछी जा सकती है। योजना आयोग ने जुलाई 1951 में सेवानिवृत्त प्रशासक ए. डी. गोरवाला से देखने को कहा कि मौजूदा प्रशासनिक तंत्र योजनाबद्ध विकास के लिए कितना पर्याप्त है; इस पर Report on Public Administration (1951) आई। पॉल एपलबी ने भारत सरकार के लिए 1953 में Public Administration in India: A Report of a Survey लिखी। एपलबी के 1953 के सर्वेक्षण की सिफ़ारिश पर मार्च 1954 में नई दिल्ली में भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) की स्थापना हुई।
एपलबी ने 1956 में Re-examination of India's Administrative System भी लिखी। इन रिपोर्टों का महत्व यह है कि भारत में प्रशासन के अध्ययन और प्रशिक्षण को संस्थागत आधार मिला। यहाँ तक की जानकारी पाठ्यपुस्तकों और जीवनी-स्रोतों से मिली है; रिपोर्टों की विषय-वस्तु का ब्योरा इस पृष्ठ में नहीं दिया गया।
एक नज़र में: पाँच चरण
लोक प्रशासन का विकास
I (1887-1926)
- विल्सन 1887
- गुडनाउ 1900
- व्हाइट 1926
- द्विभाजन
II (1927-37)
- विलोबी 1927
- गुलिक-उर्विक 1937
- POSDCORB
- सिद्धांत
III (1938-47)
- साइमन 1946, 1947
- डाहल
- लोकोक्तियाँ
IV (1948-70)
- पहचान का संकट
- राजनीति-विज्ञान या प्रशासनिक विज्ञान
- वाल्डो 1968
V (1971-)
- मिन्नोब्रुक 1968
- NPA 1971
- NPM (हुड 1991)
- शासन
भारत
- गोरवाला 1951
- एपलबी 1953
- IIPA मार्च 1954
मुख्य तथ्य
- विल्सन का निबंध
- "The Study of Administration", Political Science Quarterly, खंड 2 अंक 2, जून 1887; द्विभाजन का आधार
- गुडनाउ
- Politics and Administration, 1900
- व्हाइट
- Introduction to the Study of Public Administration, 1926; पहली पाठ्यपुस्तक
- विलोबी
- Principles of Public Administration, 1927
- गुलिक-उर्विक
- Papers on the Science of Administration, 1937
- साइमन
- "The Proverbs of Administration", Public Administration Review, 1946; Administrative Behavior, 1947; नोबेल 1978
- मिन्नोब्रुक
- सम्मेलन-I 1968; मरीनी की पुस्तक 1971; वाल्डो का संपादित खंड 1971
- हुड
- "New Public Management" शब्द, 1991; सात पहलू
- भारत
- गोरवाला रिपोर्ट 1951; एपलबी रिपोर्ट 1953; IIPA, मार्च 1954
- विश्व बैंक
- "Governance and Development", 1992; शासन की चर्चा का आधार
- अंतिम जाँच
- 1 अक्टूबर 2026
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- विल्सन का वर्ष 1887 है। कुछ छपी पुस्तकों में 1987 की टंकण-त्रुटि मिलती है; उसे न दोहराएँ।
- चरण-II का शिखर 1937 (गुलिक-उर्विक) है, चरण-III की चोट 1946-47 (साइमन) है। दोनों को उलट देना सबसे आम ग़लती है।
- NPA और NPM को एक ही चीज़ लिख देना। NPA सामाजिक समानता और प्रासंगिकता की माँग है (1968-71), NPM बाज़ार-शैली के प्रबंधन की (1991)।
- पाँच चरणों को "आधिकारिक" कह देना। यह पाठ्यपुस्तकीय परिपाटी है; "आम तौर पर माना जाता है" लिखें।
- मैक्स वेबर को पूरा चरण बना देना। उनका नौकरशाही-मॉडल इस पृष्ठ में केवल पृष्ठभूमि है।
केस स्टडी: साइमन की दो "लोकोक्तियाँ" जो आपस में टकराती हैं
केस स्टडीनियंत्रण का क्षेत्र बनाम सीमित स्तर
साइमन ने 1946 के लेख में दिखाया कि दो प्रचलित "सिद्धांत" एक ही संगठन में एक-दूसरे के उलट सलाह देते हैं। यह उदाहरण दिखाता है कि उन्होंने "सिद्धांतों" को लोकोक्ति क्यों कहा।
- पहला सिद्धांत
- प्रत्येक अधिकारी के सीधे अधीनस्थ कम रहें, यानी नियंत्रण का क्षेत्र (span of control) संकरा हो, ताकि निगरानी ठीक रहे।
- दूसरा सिद्धांत
- संगठन में स्तर कम से कम रहें, ताकि निर्देश और सूचना जल्दी पहुँचे और बीच में बिगड़े नहीं।
- टकराव
- पहला पिरामिड को ऊँचा और संकरा बनाता है, दूसरा चौड़ा और छोटा। दोनों एक साथ पूरे नहीं माने जा सकते।
- साइमन का निष्कर्ष
- जब दो सिद्धांत उलटी दिशा में खींचें, तो वे सही निर्णय की कसौटी नहीं बन सकते। निर्णय परिस्थिति देखकर लिया जाता है, इसलिए उन्होंने ध्यान निर्णय-प्रक्रिया पर मोड़ा।
सीख
यही वह तर्क है जिससे "सिद्धांतों का युग" हिला। बाद के पृष्ठ पर नियंत्रण के क्षेत्र की गणना विस्तार से दी गई है।
कार्य-उदाहरण: एक ही दफ़्तर, दो पिरामिड (कल्पित, केवल समझाने के लिए)
हल सहित उदाहरण64 कर्मचारियों का दफ़्तर और नियंत्रण का क्षेत्र
दिया है
- यह उदाहरण समझाने के लिए गढ़ा गया है; दफ़्तर और संख्या वास्तविक नहीं हैं।
- एक विभाग में सबसे निचले स्तर पर 64 कर्मचारी हैं और सबके ऊपर एक निदेशक।
- विकल्प A: हर अधिकारी के 4 सीधे अधीनस्थ। विकल्प B: हर अधिकारी के 8 सीधे अधीनस्थ।
- 1चरण 1: विकल्प A 64 कर्मचारियों के ऊपर 64 ÷ 4 = 16 पर्यवेक्षक चाहिए, उनके ऊपर 16 ÷ 4 = 4, और उनके ऊपर 4 ÷ 4 = 1 निदेशक। निदेशक के नीचे कुल 3 स्तर बनते हैं (4, 16, 64)।
- 2चरण 2: विकल्प B 64 ÷ 8 = 8 पर्यवेक्षक चाहिए, उनके ऊपर 8 ÷ 8 = 1 निदेशक। निदेशक के नीचे सिर्फ़ 2 स्तर बनते हैं (8, 64)।
- 3चरण 3: तुलना A में निगरानी कसी हुई है (हर अधिकारी के 4 अधीनस्थ), पर आदेश को 3 सीढ़ियाँ उतरना पड़ता है। B में दो ही सीढ़ियाँ हैं, पर हर अधिकारी पर 8 लोगों का बोझ है।
निष्कर्ष: संकरा नियंत्रण-क्षेत्र स्तर बढ़ाता है और कम स्तर नियंत्रण-क्षेत्र को चौड़ा करता है। दोनों सिद्धांत एक साथ पूरे नहीं हो सकते: यही साइमन की आपत्ति का सार है।
अभ्यास-प्रश्न (मौलिक, पिछले वर्षों के प्रश्न नहीं)
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
राजनीति-प्रशासन द्विभाजन क्या है?
आदर्श उत्तर
राजनीति नीति बनाती है, प्रशासन उसे लागू करता है; दोनों अलग हैं। विल्सन 1887, गुडनाउ 1900।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
साइमन ने प्रशासन के सिद्धांतों को "लोकोक्तियाँ" क्यों कहा?
आदर्श उत्तर
साइमन (1946) के अनुसार हर सिद्धांत के सामने उतना ही वज़नदार उलटा सिद्धांत मिल जाता है। नियंत्रण का क्षेत्र संकरा रखें तो स्तर बढ़ते हैं; स्तर कम करें तो क्षेत्र चौड़ा होता है। अतः ये निर्णय की कसौटी नहीं बनते। उन्होंने ध्यान निर्णय-प्रक्रिया पर मोड़ा, जिसे प्रशासन का हृदय कहा गया।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
1968 का मिन्नोब्रुक सम्मेलन क्या था? उसका महत्व बताइए।
आदर्श उत्तर
1968 में सिरैक्यूज़ के मिन्नोब्रुक में युवा विद्वानों का सम्मेलन हुआ। उन्होंने माँग की कि प्रशासन केवल दक्षता नहीं, प्रासंगिकता और मूल्यों से भी जुड़े। 1971 में मरीनी और वाल्डो की पुस्तकों से "नव लोक प्रशासन" की अवधारणा प्रचलित हुई। इससे विषय की चिंता दक्षता से आगे बढ़कर समाज तक पहुँची।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
लोक प्रशासन के विकास के विभिन्न चरणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
आदर्श उत्तर
पाठ्यपुस्तकों में पाँच चरण माने जाते हैं, जिनमें विषय सिद्धांतों से संदर्भ की ओर बढ़ा। 1887-1926: विल्सन, गुडनाउ, व्हाइट; राजनीति-प्रशासन द्विभाजन। 1927-37: विलोबी, गुलिक-उर्विक; सिद्धांतों का स्वर्ण-काल।
1938-47: साइमन और डाहल ने सिद्धांतों को लोकोक्तियाँ कहकर चुनौती दी; निर्णय-प्रक्रिया और मानव-व्यवहार पर बल बढ़ा। 1948-70: पहचान का संकट; राजनीति-विज्ञान या प्रशासनिक विज्ञान की उलझन, और वाल्डो की चिंता।
1971 के बाद: मिन्नोब्रुक से नव लोक प्रशासन, फिर नव लोक प्रबंधन (हुड, 1991) और शासन की चर्चा; विषय अंतर-अनुशासनीय और नीति-उन्मुख हुआ। भारत में गोरवाला (1951) और एपलबी (1953) की रिपोर्टों से IIPA (मार्च 1954) बना।
उत्तर कैसे लिखें (10 अंक, 100 शब्द)
भूमिका
प्रश्न: "लोक प्रशासन के विकास के चरणों को स्पष्ट कीजिए।" पहले दो वाक्य में पाँच चरणों का ढाँचा बताइए, फिर हर चरण में एक नाम और एक वर्ष।
मुख्य भाग
- चरण I (1887-1926): विल्सन 1887, गुडनाउ 1900, व्हाइट 1926; द्विभाजन
- चरण II (1927-37): विलोबी 1927, गुलिक-उर्विक 1937; सिद्धांत और POSDCORB
- चरण III (1938-47): साइमन 1946-47 की "लोकोक्तियाँ", डाहल की आपत्तियाँ
- चरण IV (1948-70): पहचान का संकट; वाल्डो 1968
- चरण V (1971-): मिन्नोब्रुक, NPA, NPM (हुड 1991), शासन
निष्कर्ष
निष्कर्ष: पाँचों चरणों में विषय "सिद्धांत" से "संदर्भ" की ओर बढ़ा; आज वह अंतर-अनुशासनीय और नीति-केंद्रित है।
अतिरिक्त मूल्य
- साइमन का उदाहरण: नियंत्रण का क्षेत्र बनाम कम स्तर
- भारत: गोरवाला 1951, एपलबी 1953, IIPA मार्च 1954
- एक वाक्य कि चरणों का बँटवारा पाठ्यपुस्तकीय परिपाटी है
त्वरित पुनरावृत्ति
- पाँच चरण: 1887-1926, 1927-37, 1938-47, 1948-70, 1971 के बाद (पाठ्यपुस्तकीय परिपाटी)
- I: विल्सन 1887 (जनक), गुडनाउ 1900, व्हाइट 1926 (पहली पाठ्यपुस्तक); द्विभाजन
- II: विलोबी 1927, गुलिक-उर्विक 1937; सिद्धांत, POSDCORB
- III: साइमन "Proverbs" 1946, Administrative Behavior 1947 (नोबेल 1978); डाहल की तीन आपत्तियाँ
- साइमन का उदाहरण: नियंत्रण का क्षेत्र बनाम कम स्तर
- IV: पहचान का संकट; राजनीति-विज्ञान बनाम प्रशासनिक विज्ञान; वाल्डो 1968
- V: मिन्नोब्रुक 1968; मरीनी और वाल्डो 1971; NPA
- NPM: हुड 1991, सात पहलू; विश्व बैंक 1992 से शासन की चर्चा
- भारत: गोरवाला 1951, एपलबी 1953, IIPA मार्च 1954
- वेबर इस पृष्ठ में केवल पृष्ठभूमि
याद रखने योग्य शब्द
- Evolution of Public Administration
- Wilson 1887
- Politics-Administration dichotomy
- Principles of Administration
- Proverbs of Administration
- Minnowbrook 1968
- NPA
- NPM
- Hood 1991
- Appleby
- Gorwala