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पेपर III · इकाई II

लोक प्रशासन का विकास (Evolution of Public Administration)

विल्सन (1887) से मिन्नोब्रुक, नव लोक प्रशासन, नव लोक प्रबंधन और शासन तक: पाँच चरणों में लोक प्रशासन के विकास की कहानी, साइमन की आपत्ति के उदाहरण और भारत की गोरवाला-एपलबी कड़ी के साथ।

  • विकास के चरण
  • विल्सन 1887
  • साइमन 1946
  • मिन्नोब्रुक 1968
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II: "Public Administration: Theories and Principles. Meaning, nature, scope and significance; evolution as a discipline; role in developing and developed societies; New Public Administration, New Public Management, Good Governance, New Public Service." इस पृष्ठ पर "evolution as a discipline" है; अर्थ, प्रकृति और क्षेत्र का अलग पृष्ठ है।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में "विषय के रूप में लोक प्रशासन का विकास" शीर्षक का सीधा प्रश्न दर्ज नहीं है। इसलिए नीचे के अभ्यास-प्रश्न मौलिक हैं, पिछले वर्षों के प्रश्न नहीं।
  • फिर भी यह पृष्ठ ज़रूरी है: नव लोक प्रबंधन (NPM) के प्रश्न 2013, 2016 और 2024 के पेपरों में आए हैं, और उन्हें पूरा समझने के लिए पता होना चाहिए कि NPM किस पुराने ढाँचे की प्रतिक्रिया है। (विश्लेषण)
  • एक बार पाँच चरण, हर चरण का एक प्रमुख नाम और एक वर्ष याद हो जाए तो विल्सन, गुलिक, साइमन और मिन्नोब्रुक पर 15, 50 या 100 शब्द के किसी भी प्रश्न का ढाँचा तुरंत बन जाता है।

पहले सरल भाषा में: एक नया विषय अपनी पहचान कैसे खोजता है

सोचिए, किसी तहसील में पहली बार एक नया दफ़्तर खुलता है। शुरू में सब कहते हैं कि दफ़्तर का काम सीधा है: नियम पढ़ो, फ़ाइल चलाओ। कुछ साल बाद कर्मचारी कहते हैं कि कोई तय तरीक़ा बनना चाहिए। फिर कोई टोकता है कि हर दफ़्तर अलग है और तय तरीक़े काम नहीं करते। अंत में नए लोग आकर पूछते हैं कि यह सब किसके लिए है। लोक प्रशासन का इतिहास लगभग ऐसा ही है: अलग विषय बनने की माँग, "सिद्धांतों" की खोज, उन पर प्रहार, पहचान का संकट, और फिर जन-हित की चिंता।

पाठ्यपुस्तकों में इस यात्रा को पाँच कालखंडों में बाँटा जाता है: (I) 1887-1926, (II) 1927-37, (III) 1938-47, (IV) 1948-70 और (V) 1971 के बाद। यह बँटवारा एक प्रचलित पाठ्यपुस्तकीय परिपाटी है, कोई आधिकारिक कालक्रम नहीं; परीक्षा में इसी ढाँचे में लिखना सुरक्षित है, पर वाक्य "आम तौर पर माना जाता है" की भाषा में रखिए।

एक सावधानी: मैक्स वेबर और नौकरशाही का मॉडल इस विकास-क्रम की पृष्ठभूमि है, पर यह पृष्ठ उनके सिद्धांत की व्याख्या नहीं करता। सिलेबस की सूची में वह अलग से नहीं दिखता; इसलिए उसे सिर्फ़ पृष्ठभूमि माना गया है।

समय-रेखा: पाँच चरण, एक नज़र में

  1. 1887

    विल्सन का निबंध "The Study of Administration"; अलग अध्ययन-क्षेत्र की माँग

  2. 1900

    गुडनाउ की Politics and Administration: राजनीति-प्रशासन द्विभाजन

  3. 1926

    एल. डी. व्हाइट की पहली पाठ्यपुस्तक: Introduction to the Study of Public Administration

  4. 1927

    विलोबी की Principles of Public Administration; "सिद्धांतों" का युग शुरू

  5. 1937

    गुलिक और उर्विक की Papers on the Science of Administration; POSDCORB

  6. 1946-47

    साइमन: "Proverbs of Administration" (1946) और Administrative Behavior (1947)

  7. 1948-70

    पहचान का संकट: राजनीति-विज्ञान या प्रशासनिक विज्ञान?

  8. 1968

    मिन्नोब्रुक सम्मेलन-I; वाल्डो की भूमिका

  9. 1971

    Toward a New Public Administration (मरीनी) और Public Administration in a Time of Turbulence (वाल्डो)

  10. 1991

    क्रिस्टोफ़र हुड द्वारा "New Public Management" शब्द

तिथियाँ दो स्वतंत्र पाठ्यपुस्तकों/प्राथमिक स्रोतों से मिलाई गई हैं। चरणों का बँटवारा पाठ्यपुस्तकीय परिपाटी है।

पाँच चरण: सार तालिका

चरणकालखंडकेंद्रीय विचारप्रमुख नाम और कृतियाँ
I1887-1926राजनीति-प्रशासन द्विभाजन; दक्षता और मितव्ययिताविल्सन (1887), गुडनाउ (1900), व्हाइट (1926)
II1927-37प्रशासन के सिद्धांत; मूल्य-मुक्त "विज्ञान" की खोजविलोबी (1927), फ़ेयोल, फ़ॉलेट, मूनी-रेले, गुलिक-उर्विक (1937)
III1938-47सिद्धांतों को चुनौती: "लोकोक्तियाँ"; विज्ञान होने पर संदेहसाइमन (1946, 1947), डाहल
IV1948-70पहचान का संकट; राजनीति-विज्ञान या प्रशासनिक विज्ञानवाल्डो; मार्च-साइमन आदि; दशक के अंत में नई माँगें
V1971 के बादअंतर-अनुशासनीय; नीति-विज्ञान; सामाजिक समानता; बाज़ार-प्रबंधन; शासनमरीनी और वाल्डो (1971), हुड (1991), विश्व बैंक (1992)

कुछ लेखक चरणों के नाम थोड़े अलग रखते हैं।

चरण I (1887-1926): द्विभाजन और अलग विषय की माँग

जून 1887 में वुडरो विल्सन ने Political Science Quarterly में "The Study of Administration" लिखा। इसी कारण उन्हें विषय का जनक कहा जाता है। उनका तर्क सीधा था: संविधान बनाना राजनीति का काम है, पर उसे चलाना प्रशासन का; उनके शब्दों में संविधान चलाना उसे बनाने से कठिन होता जा रहा है। इसलिए प्रशासन को राजनीति के झगड़ों से अलग, एक व्यावसायिक अध्ययन की तरह देखा जाए।

1900 में फ़्रैंक गुडनाउ की Politics and Administration ने इसी बात को आगे बढ़ाया: राजनीति राज्य की इच्छा की अभिव्यक्ति है और प्रशासन उस इच्छा का निष्पादन। उन्होंने दोनों के संस्थागत स्थान भी बाँटे: राजनीति विधायिका और शीर्ष स्तर का काम, प्रशासन कार्यपालिका का। इसी को राजनीति-प्रशासन द्विभाजन कहते हैं।

1926 में एल. डी. व्हाइट की Introduction to the Study of Public Administration आई, जिसे इस विषय की पहली पाठ्यपुस्तक माना जाता है। उसकी मान्यताएँ थीं कि राजनीति और प्रशासन अलग रहें तथा दक्षता और मितव्ययिता प्रशासन के मूल मंत्र हों। यह चरण द्विभाजन में इतना विश्वास रखता था कि व्यवहार में दोनों का घालमेल उसे विचलित नहीं करता था।

चरण II (1927-37): "सिद्धांतों" का स्वर्ण-काल

1927 में डब्ल्यू. एफ़. विलोबी की Principles of Public Administration आई; शीर्षक में ही "सिद्धांत" शब्द इस चरण की दिशा बता देता है। इसी दौर में फ़ेयोल, मैरी पार्कर फ़ॉलेट और मूनी-रेले की रचनाएँ भी चर्चा में रहीं। विचार यह था कि संगठन-व्यवहार से कुछ सार्वभौमिक नियम निकाले जा सकते हैं, चाहे संस्था सरकारी हो या निजी।

इस चरण का शिखर 1937 में गुलिक और उर्विक का संपादित संग्रह Papers on the Science of Administration है। उर्विक का तर्क था कि मानव-संगठन के कुछ सिद्धांत प्रयोजन, कर्मियों या राजनीतिक-सामाजिक सिद्धांत से स्वतंत्र होकर समझे जा सकते हैं। इसी संग्रह में गुलिक ने POSDCORB का सूत्र दिया, जिसका ब्योरा अर्थ-प्रकृति वाले पृष्ठ पर है। यह दौर "विज्ञान" शब्द से इतना जुड़ा कि सरकार और व्यापार, दोनों में इन विशेषज्ञों की माँग रही।

चरण III (1938-47): सिद्धांतों पर प्रहार

तीसरे चरण में "सिद्धांतों" को ही कटघरे में खड़ा किया गया। निर्णायक प्रहार हर्बर्ट साइमन का था: शीतकाल 1946 में Public Administration Review के खंड 6 के पहले अंक में उनका लेख "The Proverbs of Administration" छपा। उनका कहना था कि ये सिद्धांत लोकोक्तियों जैसे हैं: हर एक के सामने उतनी ही वज़नदार उलटी कहावत मिल जाती है। 1947 की Administrative Behavior में उन्होंने निर्णय-प्रक्रिया को प्रशासन का केंद्र माना और द्विभाजन को भी अस्वीकार किया। इसी योगदान के लिए उन्हें 1978 में नोबेल पुरस्कार मिला।

इसी दौर में रॉबर्ट डाहल ने "The Science of Public Administration: Three Problems" में तीन आपत्तियाँ रखीं: प्रशासन में मूल्यों को अलग करना प्राय: असंभव है; प्रशासन मानव-व्यवहार का अध्ययन है, इसलिए पूरे मनुष्य को समझना पड़ेगा; और कुछ सीमित उदाहरणों से "सार्वभौमिक" सिद्धांत गढ़ना ग़लत है। इन आलोचनाओं के बाद विषय का आत्मविश्वास डगमगा गया।

चरण IV (1948-70): पहचान का संकट

सिद्धांत ढह जाने के बाद विषय के सामने पहचान का सवाल था। एक रास्ता राजनीति-विज्ञान में लौटने का था, पर वहाँ से अपेक्षित स्वागत नहीं मिला: कई राजनीति-वैज्ञानिक प्रशासन को कार्यपालिका की बौद्धिक समझ तक सीमित रखना चाहते थे। दूसरा रास्ता प्रशासनिक विज्ञान का था, जिसमें मान्यता थी कि प्रशासन हर जगह एक जैसा है, चाहे सरकार हो या कंपनी। इस राह पर लोक प्रशासन की अलग पहचान घुल जाती थी। दोनों तरफ़ संकट था।

1960 के दशक के अंत तक अमेरिका में उथल-पुथल थी। ड्वाइट वाल्डो ने "Public Administration in a Time of Revolutions" (1968) में लिखा कि न अध्ययन और न व्यवहार बढ़ती अशांति और गंभीर समस्याओं का उपयुक्त जवाब दे रहा है। इसी माहौल में 1968 का मिन्नोब्रुक सम्मेलन हुआ, जिसे अगला अध्याय माना जाता है।

चरण V (1971 के बाद): नव लोक प्रशासन, नव लोक प्रबंधन और शासन

1968 में सिरैक्यूज़ विश्वविद्यालय के मिन्नोब्रुक सम्मेलन में युवा विद्वानों और व्यवहार-कर्ताओं ने माँग की कि प्रशासन केवल दक्षता और मितव्ययिता तक सीमित न रहे; उसे प्रासंगिक, मूल्य-सजग और जनहित से जुड़ा होना चाहिए। 1971 में दो पुस्तकें आईं: फ़्रैंक मरीनी द्वारा संपादित Toward a New Public Administration: The Minnowbrook Perspective और ड्वाइट वाल्डो द्वारा संपादित Public Administration in a Time of Turbulence। इन्हीं से "नव लोक प्रशासन" (NPA) की अवधारणा प्रचलित हुई। 1971 से विषय को अंतर-अनुशासनीय और नीति-विज्ञान से जुड़ा माना जाता है।

1980-90 के दशक में बाज़ार की भाषा का असर बढ़ा। क्रिस्टोफ़र हुड ने 1991 में "New Public Management" शब्द गढ़ा और NPM को उन्होंने सात पहलुओं में समझाया (विस्तार नव लोक प्रबंधन के पृष्ठ पर)। इसके समानांतर 1992 की विश्व बैंक रिपोर्ट और NPM के नए प्रतिमान ने "शासन" (governance) की अवधारणा में नया आयाम जोड़ा। इसलिए चरण V को एक ही शब्द में बाँधना कठिन है: यहाँ सामाजिक समानता वाली माँग (NPA) और बाज़ार-प्रबंधन वाली माँग (NPM) साथ-साथ चलती हैं और बाद की शासन-चर्चा दोनों को समेटती है। (विश्लेषण)

सिद्धांतों का युग बनाम साइमन की आलोचना

चरण II की मान्यता

विषय का स्वरूपप्रशासन एक मूल्य-मुक्त "विज्ञान" है

सिद्धांतसंगठन-व्यवहार से सार्वभौमिक नियम निकाले जा सकते हैं

मनुष्य की छविसंगठन एक यंत्र है, कर्मचारी उसके पुर्ज़े

राजनीति और प्रशासनदोनों अलग हैं (द्विभाजन)

अध्ययन-क्षेत्रसरकार और व्यापार, दोनों में लागू

चरण III की आपत्ति

विषय का स्वरूपडाहल: मूल्यों और साध्य को अलग करना प्राय: असंभव है

सिद्धांतसाइमन: ये नियम लोकोक्तियों जैसे हैं, एक के सामने उलटा नियम खड़ा है

मनुष्य की छविडाहल: अध्ययन में पूरे मनुष्य का मनोविज्ञान आना चाहिए

राजनीति और प्रशासनसाइमन: द्विभाजन अस्वीकार; केंद्र में निर्णय-प्रक्रिया

अध्ययन-क्षेत्रडाहल: सीमित राष्ट्रीय और ऐतिहासिक उदाहरणों से सार्वभौमिक नियम गढ़ना ग़लत

नव लोक प्रशासन (NPA) और नव लोक प्रबंधन (NPM): मोटा अंतर

आधारनव लोक प्रशासन (NPA)नव लोक प्रबंधन (NPM)
काल और उद्गम1968 का मिन्नोब्रुक सम्मेलन; 1971 की दो पुस्तकें1980-90 के दशक के सुधार; शब्द हुड का, 1991
मुख्य चिंताप्रासंगिकता, मूल्य और सामाजिक समानतादक्षता, परिणाम और बाज़ार-शैली का प्रबंधन
प्रशासक की भूमिकासमाज की समस्याओं के प्रति संवेदनशील और सक्रियसंविदाओं और प्रदर्शन के प्रबंधक
पृष्ठभूमि1960 के दशक की अशांति और पहचान का संकटबड़ी और अक्षम सरकार की समस्याएँ

विस्तृत पृष्ठ अलग हैं।

विकास-क्रम को याद रखने और लिखने का तरीक़ा

पाँचों चरणों को एक कहानी की तरह याद कीजिए: पहले चरण में "अलग हो जाओ" (विल्सन), दूसरे में "नियम खोजो" (विलोबी, गुलिक), तीसरे में "नियम झूठे हैं" (साइमन, डाहल), चौथे में "हम कौन हैं?" (पहचान का संकट) और पाँचवें में "किसके लिए और कैसे?" (NPA, NPM, शासन)। हर चरण का एक नाम और एक वर्ष जोड़ लेने से 50 शब्द के उत्तर का ढाँचा बन जाता है।

जब 100 शब्द का प्रश्न हो तो पाँचों चरण एक-एक वाक्य में लिखिए और अंत में एक पंक्ति का निष्कर्ष जोड़िए। जब 15 शब्द का प्रश्न हो तो सिर्फ़ किसी एक चरण की परिभाषा और एक नाम-वर्ष दीजिए। 50 शब्द के उत्तर में कोई एक घटना (जैसे मिन्नोब्रुक) और उसका असर लिखना बेहतर रहता है। यह उत्तर-लेखन की सलाह विश्लेषण है, आधिकारिक नियम नहीं। जहाँ तिथि पर संदेह हो, वहाँ वर्ष की जगह "1920 के दशक" जैसा दशक लिखना भी चल जाता है, पर पक्के वर्ष ऊपर की तालिका से मिलाकर लिखें।

ध्यान रखिए कि इतिहास की इस कथा में अमेरिका का दबदबा है, क्योंकि वहीं यह विषय पनपा। भारत में इसकी जड़ें अपेक्षाकृत नई हैं: बीसवीं सदी के मध्य की रिपोर्टों और संस्थाओं से विषय को यहाँ संस्थागत आधार मिला। इसलिए उत्तर में भारतीय कड़ी (गोरवाला, एपलबी, IIPA) का एक वाक्य जोड़ने से उत्तर अलग दिखता है।

भारत में विकास: गोरवाला और एपलबी

भारत में इस विषय की एक संस्थागत यात्रा भी है, जिसकी चर्चा परीक्षा में अलग से पूछी जा सकती है। योजना आयोग ने जुलाई 1951 में सेवानिवृत्त प्रशासक ए. डी. गोरवाला से देखने को कहा कि मौजूदा प्रशासनिक तंत्र योजनाबद्ध विकास के लिए कितना पर्याप्त है; इस पर Report on Public Administration (1951) आई। पॉल एपलबी ने भारत सरकार के लिए 1953 में Public Administration in India: A Report of a Survey लिखी। एपलबी के 1953 के सर्वेक्षण की सिफ़ारिश पर मार्च 1954 में नई दिल्ली में भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) की स्थापना हुई।

एपलबी ने 1956 में Re-examination of India's Administrative System भी लिखी। इन रिपोर्टों का महत्व यह है कि भारत में प्रशासन के अध्ययन और प्रशिक्षण को संस्थागत आधार मिला। यहाँ तक की जानकारी पाठ्यपुस्तकों और जीवनी-स्रोतों से मिली है; रिपोर्टों की विषय-वस्तु का ब्योरा इस पृष्ठ में नहीं दिया गया।

एक नज़र में: पाँच चरण

लोक प्रशासन का विकास

I (1887-1926)

  • विल्सन 1887
  • गुडनाउ 1900
  • व्हाइट 1926
  • द्विभाजन

II (1927-37)

  • विलोबी 1927
  • गुलिक-उर्विक 1937
  • POSDCORB
  • सिद्धांत

III (1938-47)

  • साइमन 1946, 1947
  • डाहल
  • लोकोक्तियाँ

IV (1948-70)

  • पहचान का संकट
  • राजनीति-विज्ञान या प्रशासनिक विज्ञान
  • वाल्डो 1968

V (1971-)

  • मिन्नोब्रुक 1968
  • NPA 1971
  • NPM (हुड 1991)
  • शासन

भारत

  • गोरवाला 1951
  • एपलबी 1953
  • IIPA मार्च 1954

मुख्य तथ्य

विल्सन का निबंध
"The Study of Administration", Political Science Quarterly, खंड 2 अंक 2, जून 1887; द्विभाजन का आधार
गुडनाउ
Politics and Administration, 1900
व्हाइट
Introduction to the Study of Public Administration, 1926; पहली पाठ्यपुस्तक
विलोबी
Principles of Public Administration, 1927
गुलिक-उर्विक
Papers on the Science of Administration, 1937
साइमन
"The Proverbs of Administration", Public Administration Review, 1946; Administrative Behavior, 1947; नोबेल 1978
मिन्नोब्रुक
सम्मेलन-I 1968; मरीनी की पुस्तक 1971; वाल्डो का संपादित खंड 1971
हुड
"New Public Management" शब्द, 1991; सात पहलू
भारत
गोरवाला रिपोर्ट 1951; एपलबी रिपोर्ट 1953; IIPA, मार्च 1954
विश्व बैंक
"Governance and Development", 1992; शासन की चर्चा का आधार
अंतिम जाँच
1 अक्टूबर 2026

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • विल्सन का वर्ष 1887 है। कुछ छपी पुस्तकों में 1987 की टंकण-त्रुटि मिलती है; उसे न दोहराएँ।
  • चरण-II का शिखर 1937 (गुलिक-उर्विक) है, चरण-III की चोट 1946-47 (साइमन) है। दोनों को उलट देना सबसे आम ग़लती है।
  • NPA और NPM को एक ही चीज़ लिख देना। NPA सामाजिक समानता और प्रासंगिकता की माँग है (1968-71), NPM बाज़ार-शैली के प्रबंधन की (1991)।
  • पाँच चरणों को "आधिकारिक" कह देना। यह पाठ्यपुस्तकीय परिपाटी है; "आम तौर पर माना जाता है" लिखें।
  • मैक्स वेबर को पूरा चरण बना देना। उनका नौकरशाही-मॉडल इस पृष्ठ में केवल पृष्ठभूमि है।