भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India)
चुनाव का अंपायर कैसे बना, कैसे चुना जाता है और कहाँ तक जा सकता है: अनुच्छेद 324 से 2023 के अधिनियम और शेषन-काल तक, हल किए पुराने प्रश्नों के साथ।
- अनुच्छेद 324
- नियुक्ति 2023
- बरनवाल
- MCC
- एक साथ चुनाव
सिलेबस में
संघ सरकार और प्रशासनिक संस्थाएँ। संस्थाएँ: UPSC, भारत निर्वाचन आयोग, C&AG, वित्त आयोग, लोकपाल, नीति आयोग। (RPSC सिलेबस, 09-01-2026, पेपर III, इकाई II) इसी पेपर की इकाई I में 'मतदान व्यवहार, चुनाव सुधार और चुनावों का कार्य-संचालन' भी दर्ज है, इसलिए यह पन्ना दोनों इकाइयों के काम आता है।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- उपलब्ध पुराने प्रश्न-पत्रों (2013, 2016, 2021) में इस विषय के तीन प्रश्न मिलते हैं: 2021 में अनुच्छेद 103 में निर्वाचन आयोग की भूमिका (2 अंक), 2016 में एक साथ चुनाव के पक्ष में तर्क (5 अंक) और 2013 में चुनाव-प्रणाली के सुधार पर टिप्पणी (5 अंक)।
- प्रश्न कभी सीधे तथ्य (अनुच्छेद 324, अनुच्छेद 103) पूछते हैं और कभी बहस (एक साथ चुनाव, चुनाव सुधार)। इसलिए तथ्य भी तैयार रखें और तर्क भी।
- विश्लेषण: 2023 में नियुक्ति का नया क़ानून आया और 23 सितंबर 2026 को उसकी वैधता की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की दो-सदस्यीय पीठ में मतभेद रहा; मामला मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया। ताज़ा घटनाक्रम का एक वाक्य भी उत्तर को बाक़ी उत्तरों से अलग कर देता है।
आसान भाषा में: चुनाव का ‘अंपायर’
क्रिकेट के मैच में दो टीमें खेलती हैं और अंपायर तीसरा होता है। मान लीजिए अंपायर को किसी एक टीम का कप्तान चुने और वही उसे हटा भी सके, तो हर फ़ैसले पर शक रहेगा। चुनाव में भी यही उलझन है। खेलने वाले राजनीतिक दल हैं, और सरकार चलाने वाला दल भी मैदान में उतरता है। इसलिए चुनाव कराने वाली संस्था को सरकार और दलों, दोनों से अलग और मज़बूत रखा गया। यही संस्था निर्वाचन आयोग है।
परीक्षा के लिए परिभाषा: भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India, ECI) एक स्थायी और स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है, जिसे अनुच्छेद 324 के अंतर्गत संसद, प्रत्येक राज्य के विधान-मंडल तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के चुनावों की मतदाता सूची तैयार करने और उन चुनावों के संचालन का अधीक्षण (superintendence), निर्देशन (direction) और नियंत्रण (control) सौंपा गया है। आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई; इसी तिथि को हर वर्ष राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है।
एक सीमा पहले ही जान लें: अनुच्छेद 324 केवल संसद, राज्य विधान-मंडल और राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के चुनावों तक जाता है। पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग कराता है (अनुच्छेद 243K और 243ZA); उसकी तुलना इस पन्ने में आगे दी गई है.
संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 324 से 329
संविधान का भाग XV (चुनाव) अनुच्छेद 324 से 329 तक फैला है। सुप्रीम कोर्ट ने मोहिंदर सिंह गिल (1977) में इसे चुनाव के लिए ‘अपने आप में एक संहिता’ कहा: यही भाग बताता है कि चुनाव कौन कराएगा, कौन मतदाता होगा, क़ानून कौन बनाएगा और विवाद कहाँ जाएँगे। अनुच्छेद 324 मूल रूप में चुनाव न्यायाधिकरणों की नियुक्ति की बात भी करता था; वे शब्द 19वें संविधान संशोधन (1966) से हटा दिए गए।
नीचे की तालिका में हर अनुच्छेद का एक पंक्ति का सार है। इसे अपने हाथ से दो बार लिख लें; ‘अनुच्छेद 324 से 329’ प्रश्न-पत्र में एक सीधी पंक्ति के रूप में बहुत काम आता है.
अनुच्छेद 324–329 एक नज़र में
| अनुच्छेद | क्या कहता है | याद रखने का सूत्र |
|---|---|---|
| 324 | चुनावों और मतदाता सूची का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित; मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा-शर्तें और हटाना | आयोग की जड़ |
| 325 | हर क्षेत्र के लिए एक सामान्य निर्वाचक नामावली; केवल धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर कोई नाम से बाहर नहीं और अलग सूची की माँग नहीं | एक सूची, कोई भेद नहीं |
| 326 | लोक सभा और विधान सभा के चुनाव वयस्क मताधिकार पर; नागरिक, 18 वर्ष या अधिक (61वाँ संशोधन 1988, 28-3-1989 से), अनुपस्थिति या अयोग्यता (अस्वस्थ-चित्तता, अपराध, भ्रष्ट या अवैध आचरण) के अलावा पंजीकरण का अधिकार | 18 वर्ष, वयस्क मताधिकार |
| 327 | संसद चुनाव से जुड़ी सभी बातों पर क़ानून बना सकती है: मतदाता सूची, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन आदि | संसद का क़ानून-अधिकार |
| 328 | जहाँ तक संसद ने क़ानून न बनाया हो, राज्य विधान-मंडल अपने चुनावों पर क़ानून बना सकता है | राज्य का पूरक अधिकार |
| 329 | (क) परिसीमन या सीटों के आवंटन की विधि को किसी अदालत में चुनौती नहीं; (ख) चुनाव को केवल चुनाव याचिका से ही चुनौती, किसी और रास्ते से नहीं | अदालत का दरवाज़ा सीमित |
गठन, नियुक्ति और कार्यकाल
आयोग में कौन-कौन होगा, यह अनुच्छेद 324(2) कहता है: एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner, CEC) और उतने अन्य निर्वाचन आयुक्त (Election Commissioners, EC), जितने राष्ट्रपति समय-समय पर तय करें। नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, पर ‘संसद की बनाई किसी विधि के अधीन’। जब एक से अधिक आयुक्त हों तो CEC आयोग का अध्यक्ष होता है (324(3))। अनुच्छेद 324(4) राष्ट्रपति को आम चुनावों से पहले आयोग से परामर्श के बाद क्षेत्रीय आयुक्त नियुक्त करने की छूट देता है। आयोग अक्टूबर 1993 से तीन-सदस्यीय (CEC और दो EC) है; यह बदलाव कैसे आया, यह नीचे के शेषन-प्रकरण में पढ़ें।
लंबे समय तक ‘संसद की बनाई विधि’ में नियुक्ति की प्रक्रिया थी ही नहीं। 1991 का अधिनियम वेतन और काम-काज की बात करता था, पर नियुक्ति की प्रक्रिया नहीं बताता था; व्यवहार में नियुक्ति कार्यपालिका की सलाह से होती रही। इसी ख़ाली जगह को 2 मार्च 2023 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ में भरा, और फिर दिसंबर 2023 में संसद ने अपना अधिनियम बना दिया। तीनों व्यवस्थाओं की तुलना इस तालिका में देखिए.
नियुक्ति की तीन व्यवस्थाएँ
| पहलू | 1991 का अधिनियम और परंपरा | मार्च 2023: अनूप बरनवाल | दिसंबर 2023 का अधिनियम |
|---|---|---|---|
| नियुक्ति कौन करता है | राष्ट्रपति (अनुच्छेद 324(2)); व्यवहार में कार्यपालिका की सलाह | राष्ट्रपति, तीन-सदस्यीय समिति की सलाह पर | राष्ट्रपति, चयन समिति की सिफ़ारिश पर (अधिनियम की धारा 7) |
| समिति के सदस्य | कोई वैधानिक समिति नहीं | प्रधानमंत्री, लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष (या सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता) और भारत के मुख्य न्यायाधीश | प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष (मान्यता न हो तो सबसे बड़े एकल विपक्षी दल का नेता) और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री |
| खोज समिति (Search Committee) | नहीं | — | विधि और न्याय मंत्री की अध्यक्षता में; दो अन्य सदस्य, जो भारत सरकार के सचिव से कम पद के न हों; पाँच नामों का पैनल |
| पात्रता | संविधान में कोई योग्यता नहीं बताई गई | — | भारत सरकार के सचिव के समकक्ष पद पर हों या रहे हों; सत्यनिष्ठ हों; चुनाव के प्रबंधन और संचालन का ज्ञान और अनुभव रखते हों |
| वेतन और सेवा-शर्तें | सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान वेतन | — | वेतन सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान (विधेयक में पहले कैबिनेट सचिव के समान था, पारित रूप में बदला गया) |
| स्थिति | 1991 के अधिनियम में नियुक्ति की प्रक्रिया नहीं थी | अस्थायी: ‘जब तक संसद क़ानून न बनाए’ | संसद का क़ानून; वैधता का मामला 23-9-2026 को संविधान पीठ के लिए मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया (नीचे देखें) |
2023 के अधिनियम में नियुक्ति की श्रृंखला
खोज समिति
विधि और न्याय मंत्री की अध्यक्षता में, दो सचिव-स्तर सदस्य
पाँच नामों का पैनल
चयन समिति पैनल से बाहर का नाम भी विचार सकती है (धारा 8(2))
चयन समिति
प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री
सिफ़ारिश
समिति में रिक्ति या कमी से नियुक्ति अमान्य नहीं होती (धारा 7(2))
राष्ट्रपति का वारंट
अपने हस्ताक्षर और मुहर वाले वारंट से नियुक्ति (धारा 4)
कार्यकाल, हटाना और स्वतंत्रता के कवच
2023 के अधिनियम के अनुसार CEC और अन्य आयुक्त पद-ग्रहण से छह वर्ष तक, या 65 वर्ष की आयु तक, जो पहले हो, पद पर रहते हैं। पुनर्नियुक्ति नहीं हो सकती। यदि कोई आयुक्त बाद में CEC बने, तो आयुक्त और CEC के रूप में कुल कार्यकाल छह वर्ष से अधिक नहीं हो सकता। धारा 11(1) के अनुसार आयुक्त राष्ट्रपति को लिखकर इस्तीफ़ा भी दे सकता है।
हटाने के नियम अनुच्छेद 324(5) के दो परंतुकों में हैं। CEC को उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। अनुच्छेद 124(4) के अनुसार इसका अर्थ है: संसद के दोनों सदनों का संबोधन, जिसे हर सदन की कुल सदस्य-संख्या के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई का समर्थन हो, और आधार सिद्ध कदाचार या अक्षमता हो। नियुक्ति के बाद CEC की सेवा-शर्तें उसके नुक़सान में नहीं बदली जा सकतीं। अन्य आयुक्त को CEC की सिफ़ारिश के बिना नहीं हटाया जा सकता।
यहाँ एक कमज़ोरी भी है: यह कवच CEC को पूरा और अन्य आयुक्तों को आधा मिलता है। बरनवाल में न्यायमूर्ति रस्तोगी के सहमत मत में सुझाव आया कि हटाने का यह संरक्षण अन्य आयुक्तों तक भी बढ़ाया जाए। परीक्षा में इसे ‘संरक्षण में असमानता’ के रूप में एक पंक्ति में जोड़ा जा सकता है.
CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्त: एक नज़र में अंतर
| बिंदु | मुख्य निर्वाचन आयुक्त | अन्य निर्वाचन आयुक्त |
|---|---|---|
| हटाने की रीति | सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह (संसद का संबोधन, सिद्ध कदाचार या अक्षमता) | केवल CEC की सिफ़ारिश पर |
| सेवा-शर्तें | नियुक्ति के बाद नुक़सान में नहीं बदली जा सकतीं (अनुच्छेद 324(5)) | यह स्पष्ट संरक्षण परंतुक में नहीं |
| आयोग में भूमिका | अध्यक्ष (अनुच्छेद 324(3)) | सदस्य |
| नियुक्ति (2023 का अधिनियम) | चयन समिति की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति | वही चयन समिति और वही प्रक्रिया |
अनुच्छेद 324 का पाठ और 2023 के अधिनियम पर PRS की सामग्री; स्रोत-सूची देखें।
आयोग की शक्तियाँ और कार्य
चुनाव की घोषणा और संचालन: चुनाव का कार्यक्रम आयोग तय करता है। 9 अक्टूबर 2023 की विज्ञप्ति में आयोग ने बताया कि कार्यक्रम बनाते समय वह जलवायु की स्थिति, शैक्षणिक कैलेंडर, बोर्ड परीक्षाएँ, बड़े त्योहार, क़ानून-व्यवस्था, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की उपलब्धता और उनके आवागमन का समय देखता है। विधानसभा चुनाव के लिए इसके बाद आयोग संबंधित राज्यों के राज्यपालों को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के अंतर्गत अधिसूचना जारी करने की सिफ़ारिश करता है।
मतदाता सूची: अनुच्छेद 324(1) में ही सूची की तैयारी का नियंत्रण आयोग को मिला है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 13A हर राज्य के लिए एक मुख्य निर्वाचन अधिकारी (Chief Electoral Officer) की व्यवस्था करती है, जो आयोग के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण में राज्य की सूची का काम देखता है; धारा 13AA ज़िले के लिए ज़िला निर्वाचन अधिकारी की बात करती है।
आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct, MCC): यह राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए दिशानिर्देश हैं। इसका शुरुआती रूप 1960 में केरल के विधानसभा चुनाव में बना, 1962 के लोक सभा चुनाव में मान्यता-प्राप्त दलों में बाँटा गया, 1979 में ‘सत्ताधारी दल’ पर रोकों की धारा जुड़ी, और 2013 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर घोषणा-पत्रों के लिए दिशानिर्देश जोड़े गए। संहिता चुनाव-कार्यक्रम की घोषणा से परिणाम तक लागू रहती है। यह सीधे क़ानून नहीं है। इसके कई प्रावधान दूसरे क़ानूनों (लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 और भारतीय न्याय संहिता/BNSS, पहले IPC/CrPC) की धाराओं से लागू कराए जा सकते हैं। आयोग ने इसे क़ानूनी बाध्यता देने के विरुद्ध यह तर्क दिया है कि चुनाव लगभग 45 दिन में पूरे हो जाते हैं और अदालती कार्यवाही उससे लंबी चलती है; 2013 की संसदीय स्थायी समिति ने इसे लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम का हिस्सा बनाने की सिफ़ारिश की थी।
राजनीतिक दल और चुनाव चिह्न: आयोग ने 1968 में निर्वाचन चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश जारी किया। यह चिह्नों के आवंटन, दलों के पंजीकरण और राष्ट्रीय या राज्य दल के रूप में मान्यता का आधार है। आदेश का पैराग्राफ 15 मान्यता-प्राप्त दल के भीतर दो गुटों के विवाद को सुलझाने की ज़िम्मेदारी आयोग को देता है।
परिसीमन: परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) अलग निकाय है, आयोग का हिस्सा नहीं। परिसीमन अधिनियम 2002 के अनुसार उसमें तीन सदस्य होते हैं: सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश (अध्यक्ष), CEC या उसके नामित निर्वाचन आयुक्त, और संबंधित राज्य का राज्य निर्वाचन आयुक्त। उसके आदेश राजपत्र में छपते ही क़ानून का बल पाते हैं और किसी अदालत में प्रश्न-योग्य नहीं रहते (धारा 10(2); अनुच्छेद 329(क))। अनुच्छेद 82 का तीसरा परंतुक कहता है कि 2026 के बाद की पहली जनगणना के आँकड़े प्रकाशित होने तक राज्यों में लोक सभा सीटों का आवंटन (1971 की जनगणना पर) और क्षेत्रों का विभाजन (2001 की जनगणना पर) दोबारा करना ज़रूरी नहीं है।
EVM और VVPAT: इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के तीन भाग हैं: बैलेट यूनिट, कंट्रोल यूनिट और VVPAT (Voter Verifiable Paper Audit Trail)। VVPAT मतदाता को सात सेकंड तक पर्ची दिखाती है कि उसका वोट उसी उम्मीदवार के नाम दर्ज हुआ। सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत निर्वाचन आयोग (8 अक्टूबर 2013) में सुप्रीम कोर्ट ने ‘पेपर ट्रेल’ को निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव की अपरिहार्य ज़रूरत माना। 2019 में न्यायालय ने प्रति विधानसभा क्षेत्र एक के बजाय पाँच EVM की पर्चियों की गिनती का निर्देश दिया। 26 अप्रैल 2024 को न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की पीठ ने 100% पर्ची-गिनती, बैलेट पेपर की वापसी और मतदाता के हाथ से पर्ची डालने की माँगें ठुकरा दीं, पर दो निर्देश दिए: सिंबल लोडिंग यूनिट सील कर 45 दिन रखी जाएँ, और दूसरे या तीसरे नंबर के उम्मीदवार के लिखित अनुरोध पर (परिणाम के सात दिन में, उसके ख़र्च पर) उस क्षेत्र की EVM के पाँच प्रतिशत की बर्न्ट मेमोरी की जाँच निर्माता कंपनी के इंजीनियर करें।
मतदाता शिक्षा: SVEEP (Systematic Voters’ Education and Electoral Participation) आयोग का मतदाता-शिक्षा और भागीदारी बढ़ाने वाला कार्यक्रम है; राज्य और ज़िला स्तर पर इसकी योजनाएँ बनती हैं।
सलाहकारी भूमिका (अनुच्छेद 103 और 192): यदि संसद-सदस्य की अयोग्यता का प्रश्न उठे (अनुच्छेद 102(1) की अयोग्यताएँ), तो वह राष्ट्रपति को भेजा जाता है और उनका निर्णय अंतिम होता है; पर निर्णय से पहले राष्ट्रपति को आयोग की राय लेनी होगी और उसी राय के अनुसार काम करना होगा (अनुच्छेद 103(2))। राज्य विधान-मंडल के सदस्य के लिए यही व्यवस्था अनुच्छेद 192 में राज्यपाल के लिए है। यानी राष्ट्रपति ‘निर्णायक’ ज़रूर हैं, पर राय आयोग की बाध्यकारी है.
अनुच्छेद 103 बनाम अनुच्छेद 192: आयोग की सलाहकारी भूमिका
सांसद या विधायक की सदस्यता पर अयोग्यता का सवाल उठे, तो फ़ैसला अदालत से पहले एक संवैधानिक पद के पास जाता है। ज़रा कल्पना कीजिए कि किसी सांसद पर आरोप है कि वह लाभ का पद धारण करता है। शिकायत राष्ट्रपति के पास जाती है, पर राष्ट्रपति के सामने यह तथ्यों का जटिल मामला है। इसलिए संविधान निर्माताओं ने एक विशेषज्ञ संस्था को बीच में रखा: निर्वाचन आयोग।
अनुच्छेद 103 और 192 की तुलना
अनुच्छेद 103 (संसद)
किसके सदस्यसंसद के किसी सदन का सदस्य
अयोग्यताओं का आधारअनुच्छेद 102(1)
निर्णायक कौनराष्ट्रपति; उनका निर्णय अंतिम
आयोग की भूमिकानिर्णय से पहले राय लेना अनिवार्य और उसी के अनुसार कार्य करना
अनुच्छेद 192 (राज्य विधान-मंडल)
किसके सदस्यराज्य विधान-मंडल के किसी सदन का सदस्य
अयोग्यताओं का आधारअनुच्छेद 191(1)
निर्णायक कौनराज्यपाल; उनका निर्णय अंतिम
आयोग की भूमिकानिर्णय से पहले राय लेना अनिवार्य और उसी के अनुसार कार्य करना
प्रमुख निर्णय: सिद्धांत और उद्धरण
| वाद | निर्णय का वर्ष और उद्धरण | निर्णय का सार |
|---|---|---|
| मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त | 2 दिसंबर 1977; (1978) 1 SCC 405; AIR 1978 SC 851; पाँच-न्यायाधीश पीठ | अनुच्छेद 324 ‘अपने आप में क़ानून’ नहीं बनाता, पर कानून की ख़ाली जगहों में आयोग को व्यापक अधिकार देता है, जिनका उपयोग निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के दायरे में हो। अनुच्छेद 329(ख) के कारण चुनाव-प्रक्रिया के बीच के क़दमों को रिट से चुनौती नहीं दी जा सकती; उपाय चुनाव याचिका है। |
| टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ | 1995; (1995) 4 SCC 611 | बहु-सदस्यीय आयोग संवैधानिक है; अनुच्छेद 324(3) में CEC ‘अध्यक्ष’ है, पर निर्णय में बहुमत का सिद्धांत चलेगा। 1993 में दो और आयुक्तों की नियुक्ति बरक़रार। |
| यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (ADR) | 2 मई 2002; (2002) 5 SCC 294 | उम्मीदवारों के आपराधिक अतीत, संपत्ति और शैक्षणिक योग्यता जानना मतदाता के अनुच्छेद 19(1)(क) के अधिकार का हिस्सा; आयोग इसके लिए हलफ़नामे माँग सकता है। |
| डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत निर्वाचन आयोग | 8 अक्टूबर 2013; (2013) 10 SCC 500 | ‘पेपर ट्रेल’ निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव की अपरिहार्य ज़रूरत; EVM के साथ VVPAT चरणबद्ध ढंग से लगे। |
| अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ | 2 मार्च 2023; (2023) 6 SCC 161; पाँच-न्यायाधीश संविधान पीठ | संसद के क़ानून तक आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सलाह पर; आयोग को कार्यपालिका के अनन्य नियंत्रण से बचाना ज़रूरी। |
| ADR बनाम भारत संघ (चुनावी बॉन्ड) | 15 फ़रवरी 2024; पाँच-न्यायाधीश संविधान पीठ | चुनावी बॉन्ड योजना 2018 मतदाता के सूचना के अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(क)) का उल्लंघन करने के कारण असंवैधानिक घोषित। |
| ADR बनाम भारत निर्वाचन आयोग (VVPAT) | 26 अप्रैल 2024; 2024 INSC 341 | 100% VVPAT गिनती और बैलेट पेपर की माँग अस्वीकार; सिंबल लोडिंग यूनिट सुरक्षित रखने और बर्न्ट मेमोरी जाँच के निर्देश। |
| डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत संघ | 23 सितंबर 2026; 2026 INSC 1040; न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा | धारा 7 (चयन समिति) की वैधता पर निर्णय नहीं हुआ। दो-सदस्यीय पीठ इस पर बँटी कि मामला पाँच-न्यायाधीश संविधान पीठ को जाए या नहीं (दत्ता: नहीं, शर्मा: हाँ); दोनों ने कागज़ात मुख्य न्यायाधीश के सामने रखे, ताकि वे संविधान पीठ के गठन पर विचार करें। |
भारत निर्वाचन आयोग: समय-रेखा
25 जनवरी 1950
निर्वाचन आयोग की स्थापना (अनुच्छेद 324 के अंतर्गत)
1960–62
आदर्श आचार संहिता की शुरुआत: केरल 1960, फिर 1962 के लोक सभा चुनाव में दलों में वितरण
2 दिसंबर 1977
मोहिंदर सिंह गिल: अनुच्छेद 324 और 329(ख) की व्याख्या
1990–1996
टी.एन. शेषन का कार्यकाल (12-12-1990 से 11-12-1996)
अक्टूबर 1993
आयोग तीन-सदस्यीय बना; 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी
2 मई 2002
ADR निर्णय: उम्मीदवारों की जानकारी जानने का मतदाता का अधिकार
8 अक्टूबर 2013
VVPAT को निष्पक्ष चुनाव के लिए अपरिहार्य माना गया
2 मार्च 2023
अनूप बरनवाल: नियुक्ति के लिए अस्थायी समिति की व्यवस्था
दिसंबर 2023
CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा-शर्तें और पदावधि) अधिनियम पारित: राज्य सभा 12, लोक सभा 21 दिसंबर
26 अप्रैल 2024
EVM-VVPAT: 100% पर्ची-गिनती की माँग अस्वीकार
23 सितंबर 2026
जया ठाकुर: धारा 7 की चुनौती पर पीठ में मतभेद; संविधान पीठ के लिए मामला मुख्य न्यायाधीश के पास
सीमाएँ और सुधार
आयोग की ताक़त बड़ी है, पर उसकी सीमाएँ भी साफ़ हैं। पहली सीमा नियुक्ति की है: 2023 के अधिनियम में चयन समिति के तीन में से दो सदस्य सरकार की ओर के हैं (प्रधानमंत्री और उनके नामित मंत्री), इसलिए आलोचक कहते हैं कि इससे आयोग की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है; सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की ओर से तर्क दिया गया कि यह संसद का सोच-समझकर बनाया क़ानून है और प्रधानमंत्री जैसे उच्च पदों पर बैठे लोग निष्पक्षता से काम करेंगे।
दूसरी सीमा आचार संहिता की है: वह सीधे क़ानून नहीं है, इसलिए उसकी ताक़त आयोग की नैतिक सत्ता और अन्य क़ानूनों के सहारे पर टिकी है। तीसरी सीमा सुरक्षा का कवच असमान होना है: CEC को हटाने की सुरक्षा न्यायाधीश जैसी है, पर अन्य आयुक्तों को हटाना CEC की सिफ़ारिश पर टिका है। चौथी सीमा संसाधनों की है: अनुच्छेद 324(6) के अनुसार आयोग काम के लिए राष्ट्रपति या राज्यपाल से कर्मचारी उपलब्ध कराने का अनुरोध करता है, यानी चुनाव के समय बहुत-से कर्मचारी उधार के होते हैं (विश्लेषण)। पाँचवीं सीमा अदालती रोक की है: अनुच्छेद 329(ख) के कारण चुनाव-प्रक्रिया के बीच में आयोग के क़दम को अदालत में सीधे चुनौती नहीं दी जा सकती।
सुधार की सिफ़ारिशें पुरानी हैं। नियुक्ति के लिए समिति का विचार दिनेश गोस्वामी समिति (1990), संविधान की कार्यप्रणाली की समीक्षा के राष्ट्रीय आयोग (2002), विधि आयोग (2015) और अंततः सुप्रीम कोर्ट (2023) में बार-बार आया; हर बार समिति का स्वरूप अलग रहा, पर विपक्ष के नेता को शामिल करने पर लगभग सहमति रही। 2013 की संसदीय स्थायी समिति ने चुनावी ख़र्च की सीमा की समीक्षा, आचार संहिता को क़ानूनी समर्थन और दलों की मान्यता रद्द करने की शक्ति लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में जोड़ने की सिफ़ारिश की। पारदर्शिता के मोर्चे पर 2002 का ADR निर्णय (उम्मीदवारों का हलफ़नामा), 2013 में VVPAT और 15 फ़रवरी 2024 को चुनावी बॉन्ड योजना का रद्द होना मील के पत्थर हैं।
एक साथ चुनाव (Simultaneous Elections): पक्ष और विपक्ष
लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव 1951–52 से 1967 तक अधिकतर साथ-साथ होते थे। 1968–69 में कुछ राज्यों की विधान सभाएँ समय से पहले भंग हुईं और 1970 में चौथी लोक सभा भी, तब से चक्र बिखर गया। इसे फिर जोड़ने के लिए सितंबर 2023 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में उच्च-स्तरीय समिति बनी। उसने दो चरणों का सुझाव दिया: पहले लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव साथ, फिर 100 दिन के भीतर पंचायतों और नगरपालिकाओं के। संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक 2024 लोक सभा में 17 दिसंबर 2024 को पेश हुआ और 19 दिसंबर 2024 को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा गया; 18 मार्च 2026 को लोक सभा ने JPC का कार्यकाल 2026 के मानसून सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक बढ़ाया।
विश्लेषण: उत्तर में यह संतुलन लिखें कि प्रस्ताव का तर्क शासन की स्थिरता है, जबकि संसदीय प्रणाली में ज़ोर जवाबदेही पर रहा है (डॉ. आंबेडकर ने 1948 में कहा था कि दोनों बराबर मात्रा में कोई प्रणाली नहीं देती).
एक साथ चुनाव: तर्क एक नज़र में
| पक्ष में तर्क | विपक्ष में चिंताएँ |
|---|---|
| बार-बार चुनाव से सरकारी और अन्य हितधारकों का ख़र्च और समय बढ़ता है | प्रत्यक्ष सरकारी ख़र्च बजट के छोटे हिस्से के बराबर है, इसलिए ख़र्च का तर्क कमज़ोर हो सकता है (PRS का विश्लेषण) |
| बार-बार आचार संहिता लगने से विकास-कार्य और सेवा-वितरण रुकता है | कई विधायिकाओं का कार्यकाल बहुत छोटा रह सकता है, कभी-कभी एक वर्ष से भी कम |
| सुरक्षा बलों और मतदान कर्मियों को बार-बार लगाना पड़ता है | विधेयक में राज्य के चुनाव टालने की सिफ़ारिश आयोग कर सकता है, पर कोई समय-सीमा नहीं; अनुच्छेद 356 की तुलना में सीमा नीची |
| नीति में स्थिरता और पूर्वानुमान, मतदाता-भागीदारी बढ़ने की उम्मीद (कोविंद समिति) | संघवाद और सरकार की जवाबदेही पर असर की आशंका |
राज्य निर्वाचन आयोग से संक्षिप्त तुलना (अनुच्छेद 243K और 243ZA)
गाँव की पंचायत और शहर की नगरपालिका के चुनाव भारत निर्वाचन आयोग नहीं कराता। अनुच्छेद 243K पंचायतों के चुनाव और अनुच्छेद 243ZA नगरपालिकाओं के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission, SEC) को सौंपता है, जिसमें एक राज्य निर्वाचन आयुक्त होता है जिसे राज्यपाल नियुक्त करते हैं। राज्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने का तरीक़ा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसा है। (विस्तार से राज्य निर्वाचन आयोग का अलग पन्ना देखें।)
भारत निर्वाचन आयोग बनाम राज्य निर्वाचन आयोग
भारत निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 324)
किन चुनावों के लिएसंसद, राज्य विधान-मंडल, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति
गठनCEC और राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित संख्या में अन्य आयुक्त
नियुक्ति करने वालाराष्ट्रपति (संसद की विधि के अधीन)
हटाने की रीतिCEC: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह; अन्य आयुक्त: CEC की सिफ़ारिश पर
स्टाफ़ उपलब्ध कराने वालाराष्ट्रपति या राज्यपाल (अनुरोध पर)
चुनाव संबंधी क़ानूनसंसद (अनुच्छेद 327) और राज्य (अनुच्छेद 328)
राज्य निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 243K, 243ZA)
किन चुनावों के लिएपंचायतें (243K) और नगरपालिकाएँ (243ZA)
गठनएक राज्य निर्वाचन आयुक्त
नियुक्ति करने वालाराज्यपाल
हटाने की रीतिउच्च न्यायालय के न्यायाधीश की तरह
स्टाफ़ उपलब्ध कराने वालाराज्यपाल (अनुरोध पर)
चुनाव संबंधी क़ानूनराज्य विधान-मंडल (243K(4), 243ZA(2))
मुख्य तथ्य
- स्थापना
- 25 जनवरी 1950 (अनुच्छेद 324 के अंतर्गत); 2011 से इसी तिथि पर राष्ट्रीय मतदाता दिवस
- संवैधानिक आधार
- भाग XV, अनुच्छेद 324–329 (संविधान, 1950); 1966 में अनुच्छेद 324(1) से चुनाव-न्यायाधिकरण वाले शब्द हटे
- गठन
- CEC और राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित संख्या में अन्य आयुक्त (अनुच्छेद 324(2)); अक्टूबर 1993 से तीन-सदस्यीय
- नियुक्ति का क़ानून
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा-शर्तें और पदावधि) अधिनियम 2023 (अधिनियम सं. 49/2023); राज्य सभा से 12 और लोक सभा से 21 दिसंबर 2023 को पारित; राष्ट्रपति की स्वीकृति 28 दिसंबर 2023
- चयन समिति (2023)
- प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष (या सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता), प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री (2023)
- खोज समिति (2023)
- विधि और न्याय मंत्री की अध्यक्षता, दो सचिव-स्तर सदस्य, पाँच नामों का पैनल (संशोधन 11 दिसंबर 2023)
- कार्यकाल
- छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो; पुनर्नियुक्ति नहीं (2023 का अधिनियम, धारा 9)
- हटाना
- CEC सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह; अन्य आयुक्त CEC की सिफ़ारिश पर (अनुच्छेद 324(5); अनुच्छेद 124(4))
- अनूप बरनवाल
- 2 मार्च 2023; (2023) 6 SCC 161; पाँच-न्यायाधीश पीठ (के.एम. जोसेफ़, अजय रस्तोगी, अनिरुद्ध बोस, हृषिकेश रॉय, सी.टी. रविकुमार)
- मोहिंदर सिंह गिल
- 2 दिसंबर 1977; (1978) 1 SCC 405; AIR 1978 SC 851
- टी.एन. शेषन
- CEC: 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996; रेमन मैग्सेसे पुरस्कार 1996; टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995) 4 SCC 611
- अनुच्छेद 103 और 192
- अयोग्यता पर राष्ट्रपति या राज्यपाल का निर्णय अंतिम, पर आयोग की राय लेकर उसी के अनुसार (1950 का संविधान)
- परिसीमन आयोग
- तीन सदस्य: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश (अध्यक्ष), CEC या नामित आयुक्त, राज्य निर्वाचन आयुक्त; आदेश क़ानून का बल (परिसीमन अधिनियम 2002, धारा 3 और 10)
- VVPAT
- 8 अक्टूबर 2013 के निर्णय में अपरिहार्य ‘पेपर ट्रेल’; 26 अप्रैल 2024 को 100% गिनती की माँग अस्वीकार (2024 INSC 341)
- जया ठाकुर बनाम भारत संघ
- 23 सितंबर 2026: धारा 7 की वैधता पर निर्णय नहीं; दो-सदस्यीय पीठ संविधान पीठ भेजने के प्रश्न पर बँटी, कागज़ात मुख्य न्यायाधीश के पास (2026 INSC 1040)
राजस्थान का पहलू
(1) लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 13A के अनुसार हर राज्य में एक मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) होता है, जिसे निर्वाचन आयोग राज्य सरकार से परामर्श करके सरकार के किसी अधिकारी में से नामित करता है; वह आयोग के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण में राज्य की मतदाता सूची की तैयारी, पुनरीक्षण और सुधार की निगरानी करता है। धारा 13AA में हर ज़िले के लिए ज़िला निर्वाचन अधिकारी की यही व्यवस्था है। विश्लेषण: राजस्थान का CEO इसी वैधानिक ढाँचे के अंतर्गत है, यानी वह राज्य सरकार का अधिकारी होते हुए भी चुनाव-कार्य में आयोग के नियंत्रण में रहता है। (2) 9 अक्टूबर 2023 की निर्वाचन आयोग की विज्ञप्ति (PIB) में राजस्थान सहित पाँच राज्यों के विधानसभा आम चुनाव का कार्यक्रम घोषित हुआ; विज्ञप्ति के अनुसार कार्यक्रम बनाते समय मौसम, शैक्षणिक कैलेंडर, बोर्ड परीक्षाएँ, प्रमुख त्योहार, क़ानून-व्यवस्था और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की उपलब्धता देखी गई। (3) 11 अक्टूबर 2023 को आयोग ने राजस्थान का मतदान 23 नवंबर के बजाय 25 नवंबर 2023 को कराने का निर्णय लिया; आयोग के वक्तव्य (ANI के हवाले से) में बड़े पैमाने पर विवाह और सामाजिक आयोजनों से होने वाली असुविधा तथा विभिन्न दलों और संगठनों के प्रतिनिधित्व कारण बताए गए। मतदान-प्रतिशत या अन्य आँकड़े यहाँ जानबूझकर नहीं दिए गए, क्योंकि वे आयोग के प्रकाशित वर्ष-वार आँकड़ों से ही लिए जाने चाहिए।
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- अनुच्छेद 324 को पंचायत और नगरपालिका चुनावों पर लागू बताना। वे राज्य निर्वाचन आयोग के पास हैं (अनुच्छेद 243K, 243ZA)।
- ‘निर्वाचन आयोग परिसीमन करता है’ लिखना। परिसीमन आयोग (परिसीमन अधिनियम 2002) अलग निकाय है; CEC या उनका नामित आयुक्त उसका एक सदस्य होता है।
- सभी आयुक्तों को CEC जैसा हटाने का संरक्षण बताना। अन्य आयुक्त को केवल CEC की सिफ़ारिश पर हटाया जा सकता है।
- बरनवाल निर्णय की समिति (प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, मुख्य न्यायाधीश) को आज की क़ानूनी व्यवस्था बताना। वह अस्थायी व्यवस्था थी; 2023 के अधिनियम में तीसरे सदस्य के रूप में प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री है।
- ‘सुप्रीम कोर्ट ने 2023 का अधिनियम रद्द कर दिया’ लिखना। 23 सितंबर 2026 को पीठ में मतभेद रहा और मामला संविधान पीठ के लिए मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया; न अधिनियम रद्द हुआ, न वैधता पर अंतिम निर्णय आया।
- आदर्श आचार संहिता को क़ानून बताना। वह आयोग के दिशानिर्देश हैं; कुछ प्रावधान दूसरे क़ानूनों से लागू कराए जाते हैं।
- कार्यकाल में ‘पाँच वर्ष’ या ‘पुनर्नियुक्ति संभव’ लिखना। 2023 के अधिनियम में छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो, और पुनर्नियुक्ति नहीं।
- अनुच्छेद 103 में आयोग की राय को केवल ‘सलाह’ कहना। राष्ट्रपति को उसी राय के अनुसार कार्य करना होता है।
वास्तविक केस: मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त (1977)
केस स्टडीजब गिनती के आख़िरी घंटे में हिंसा हुई और आयोग ने पूरे क्षेत्र में दोबारा मतदान कराया
एक लोक सभा क्षेत्र में गिनती के आख़िरी चरण में भीड़ की हिंसा हुई। याचिकाकर्ता उम्मीदवार का आरोप था कि तब उसकी जीत लगभग तय दिख रही थी। कई विधानसभा-खंडों के डाक-मतपत्र और मतपेटियाँ गिनती-स्थल पर लाते समय नष्ट कर दी गईं। रिटर्निंग अधिकारी ने परिणाम घोषित करना रोका और घटना की सूचना मुख्य निर्वाचन आयुक्त को भेजी। आयोग ने अधिसूचना जारी कर माना कि गिनती पूरी कर निश्चित परिणाम देना संभव नहीं है और अनुच्छेद 324 की शक्ति से पूरे क्षेत्र में पुनर्मतदान का आदेश दे दिया। उम्मीदवार ने अनुच्छेद 226 में उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया; दावा था कि आदेश मनमाना है और उसे सुने बिना दिया गया।
- क्या तय हुआ: अदालत की सीमा
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 329(ख) चुनाव-प्रक्रिया के बीच के क़दमों पर मुक़दमेबाज़ी की पूर्ण रोक (blanket ban) है; पुनर्मतदान का आदेश चुनाव का ही एक क़दम है, इसलिए रिट से उसे चुनौती नहीं दी जा सकती। असंतुष्ट पक्ष का उपाय चुनाव याचिका है।
- क्या तय हुआ: आयोग की शक्ति
- अनुच्छेद 324 आयोग को ‘अपने आप में क़ानून’ नहीं बनाता, पर यह उन क्षेत्रों में काम करता है जिन्हें क़ानून ने ख़ाली छोड़ा है; ‘अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण’ तथा ‘चुनावों का संचालन’ शब्द व्यापक हैं। यह शक्ति मौजूद क़ानून को निष्प्रभावी नहीं कर सकती।
- क्या तय हुआ: निष्पक्षता
- आयोग को मनमाने ढंग से नहीं, निष्पक्षता के मानदंडों पर चलना होगा। जहाँ किसी के अधिकार या हित पर असर पड़े, वहाँ सुनवाई की ज़रूरत जितनी बड़ी शक्ति, उतनी अधिक। फिर भी यदि सुनवाई से पूरी प्रक्रिया ठप हो जाए, तो क़ानून उसे अपवाद में रख सकता है।
सीख
निर्वाचन आयोग की शक्ति व्यापक है, पर निरंकुश नहीं। उत्तर में कहें: ‘अनुच्छेद 324 ख़ाली जगह भरता है, कानून को नहीं हटाता; अनुच्छेद 329(ख) चुनाव के बीच अदालती दख़ल रोकता है; और आयोग फिर भी निष्पक्षता से बँधा है।’
वास्तविक केस: टी.एन. शेषन का दौर (1990–1996)
केस स्टडीएक आयुक्त ने अनुच्छेद 324 की ताक़त पहचानी, और सरकार ने आयोग को तीन-सदस्यीय बना दिया
टी.एन. शेषन 1955 बैच के IAS अधिकारी (तमिलनाडु कैडर) थे और केंद्र में कैबिनेट सचिव रह चुके थे। वे 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे। उस समय तक आयोग को कई लोग एक नरम, कम चर्चित संस्था मानते थे। शेषन ने अनुच्छेद 324 के शब्दों को पूरा पढ़ा और माँग की कि सरकारें चुनाव-काल में आयोग के संवैधानिक अधिकार को मानें।
- आचार संहिता को दाँत
- उन्होंने आदर्श आचार संहिता को कड़ाई से लागू कराया। मतदान-केंद्र तक लोगों को ढोकर ले जाने जैसी ‘सामान्य’ मानी जाने वाली बातें उनके दौर में असंभव हो गईं।
- चरणबद्ध मतदान और पर्यवेक्षक
- बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बूथ-कब्ज़े को रोकने के लिए मतदान को चरणों में बाँटा गया ताकि सुरक्षा बल हर चरण में तैनात रहें, और चुनाव-पर्यवेक्षक भेजे गए।
- मतदाता फ़ोटो पहचान-पत्र
- मतदाता के लिए फ़ोटो पहचान-पत्र की माँग उनके दौर में तेज़ हुई और बाद में चुनावों का हिस्सा बन गई।
- सरकार की प्रतिक्रिया: अक्टूबर 1993
- टकराव के बीच अक्टूबर 1993 में केंद्र ने आयोग को बहु-सदस्यीय बना दिया और दो और आयुक्त, जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति और एम.एस. गिल, नियुक्त किए। शेषन ने इसे अपनी शक्ति घटाने का प्रयास माना और सुप्रीम कोर्ट गए।
- अदालत का फ़ैसला: 1995
- टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ ((1995) 4 SCC 611) में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पूरी तरह ख़ारिज की। कारण: अनुच्छेद 324(3) में CEC के ‘अध्यक्ष’ होने की बात ही यह मानकर लिखी गई कि आयोग बहु-सदस्यीय हो सकता है; और बहु-सदस्यीय निकाय में निर्णय का स्वाभाविक नियम बहुमत है।
- मान्यता
- शेषन को 1996 में सरकारी सेवा के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला।
सीख
संविधान ने आयोग को ताक़त शब्दों में दी थी, पर उसे व्यवहार में उतारने का साहस एक व्यक्ति ने दिखाया। उसी के जवाब में संस्थागत संतुलन (बहु-सदस्यीय आयोग, बहुमत का नियम) आया। विश्लेषण: स्वतंत्र आयोग के लिए अच्छा व्यक्ति और अच्छी संरचना, दोनों चाहिए; इसीलिए 2023 के क़ानून और बरनवाल की बहस में नियुक्ति की प्रक्रिया इतनी अहम हो गई।
प्रक्रिया का एक उदाहरण: विधानसभा चुनाव की घोषणा का पहला हफ़्ता (राजस्थान 2023)
हल सहित उदाहरणघोषणा से बदलाव तक: कौन किसके अधिकार से कदम उठाता है
दिया है
- 9 अक्टूबर 2023: निर्वाचन आयोग ने पाँच राज्यों, राजस्थान सहित, के विधानसभा आम चुनाव का कार्यक्रम घोषित किया।
- 11 अक्टूबर 2023: आयोग ने राजस्थान का मतदान 23 नवंबर से बदलकर 25 नवंबर 2023 किया।
- 11. कार्यक्रम पर विचार आयोग मौसम, शैक्षणिक कैलेंडर, बोर्ड परीक्षाएँ, प्रमुख त्योहार, क़ानून-व्यवस्था और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की उपलब्धता जैसे कारकों को तौलकर कार्यक्रम बनाता है (आयोग की विज्ञप्ति, 9 अक्टूबर 2023)।
- 22. घोषणा और आदर्श आचार संहिता घोषणा के साथ ही आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है और परिणाम घोषित होने तक चलती है।
- 33. राज्यपाल को सिफ़ारिश आयोग संबंधित राज्यों के राज्यपालों से लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के अंतर्गत अधिसूचना जारी करने की सिफ़ारिश करता है।
- 44. बदलाव की गुंजाइश प्रतिनिधित्वों और विवाह जैसे बड़े सामाजिक आयोजनों से होने वाली असुविधा को देखकर आयोग ने तारीख़ खिसकाई। यानी कार्यक्रम तय करना आयोग का विवेकाधिकार है और वह जनहित में उसे बदल सकता है (ANI और BusinessToday, आयोग के वक्तव्य के हवाले से)।
निष्कर्ष: नतीजा: चुनाव कराने का कार्यक्रम, उसकी सुरक्षा-योजना और तारीख़ में फेरबदल आयोग के हाथ में है; राज्यपाल आयोग की सिफ़ारिश पर अधिसूचना जारी करते हैं।
पिछले वर्षों के प्रश्न और आदर्श उत्तर
2021RAS मुख्य परीक्षापेपर III2 अंक
भारत के संविधान के अनुच्छेद 103 में निर्वाचन आयोग की भूमिका क्या है?
आदर्श उत्तर
अनुच्छेद 103(2): सांसद की अयोग्यता पर राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय लेकर उसी के अनुसार चलते हैं।
2016RAS मुख्य परीक्षापेपर III5 अंक
लोक सभा तथा राज्य विधान सभाओं के एक साथ निर्वाचन करवाने के पक्ष में दिए गए तर्कों का उल्लेख कीजिए।
आदर्श उत्तर
पक्ष में तर्क: बार-बार चुनाव से सरकारी और दलों का ख़र्च बढ़ता है; आचार संहिता से विकास-कार्य रुकते हैं; सुरक्षा बल और कर्मचारी बार-बार लगते हैं; सरकार नीति पर लगातार ध्यान दे पाती है; मतदाता को एक ही बार जाना पड़ता है और मतदान-थकान घटती है।
2013RAS मुख्य परीक्षापेपर I5 अंक
"एक शक्तिशाली भारतीय जनतंत्र को चुनाव प्रणाली में महत्वपूर्ण सुधारों की आवश्यकता है।" विवेचन करें।
आदर्श उत्तर
जनतंत्र की मज़बूती निष्पक्ष चुनाव पर टिकी है। धनबल, बाहुबल और अपराधीकरण, चुनावी चंदे की अपारदर्शिता और बार-बार चुनाव गंभीर चिंता के विषय हैं। इसलिए आयोग की स्वायत्त नियुक्ति, चंदे में पारदर्शिता, EVM-VVPAT की साख और आचार संहिता का प्रभावी पालन ही ज़रूरी सुधार हैं।
अभ्यास प्रश्न (हमारे अपने)
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
निर्वाचन आयोग का संवैधानिक आधार क्या है?
आदर्श उत्तर
अनुच्छेद 324: चुनावों और मतदाता सूची का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण भारत निर्वाचन आयोग के पास है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
आदर्श आचार संहिता क्या है? इसकी क़ानूनी स्थिति बताइए।
आदर्श उत्तर
आचार संहिता दलों के आचरण पर आयोग के निर्देश हैं; क़ानून नहीं, पर आयोग पालन कराता है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया में क्या अंतर है?
आदर्श उत्तर
अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह ही हटाया जाता है, यानी संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत से राष्ट्रपति के आदेश द्वारा। अन्य आयुक्तों को केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर हटाया जा सकता है, इसलिए उनका संरक्षण कम है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
राज्य निर्वाचन आयोग और भारत निर्वाचन आयोग की तुलना कीजिए।
आदर्श उत्तर
भारत निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 324) संसद, राज्य विधान-मंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव कराता है। राज्य निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 243K, 243ZA) पंचायत और नगरपालिका चुनाव कराता है। राज्य निर्वाचन आयुक्त को राज्यपाल नियुक्त करते हैं और उसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की तरह हटाया जाता है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
अनूप बरनवाल (2023) के निर्णय और 2023 के अधिनियम की नियुक्ति-व्यवस्था की तुलना कीजिए।
आदर्श उत्तर
अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2 मार्च 2023) में पाँच-न्यायाधीश पीठ ने कहा कि संसद का क़ानून बनने तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति एक समिति की सलाह पर करेंगे, जिसमें प्रधानमंत्री, लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश होंगे। उद्देश्य आयोग को कार्यपालिका के प्रभाव से बचाना था। दिसंबर 2023 के अधिनियम में समिति के तीसरे सदस्य के रूप में प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री रखा गया, मुख्य न्यायाधीश बाहर हो गए। विश्लेषण: इससे आलोचकों के अनुसार सरकार का पलड़ा भारी रहता है। 23 सितंबर 2026 को दो-सदस्यीय पीठ धारा 7 को संविधान पीठ भेजने पर विभाजित रही; मामला मुख्य न्यायाधीश के पास है।
10 अंक के उत्तर का ढाँचा (100 शब्द)
भूमिका
एक पंक्ति में परिभाषा: निर्वाचन आयोग अनुच्छेद 324 से बना स्थायी, स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है जो संसद, राज्य विधान-मंडल, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव कराता है।
मुख्य भाग
- संरचना और नियुक्ति: मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य आयुक्त; 2023 का अधिनियम; समिति में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और एक मंत्री।
- स्वतंत्रता के उपाय: मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने का सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसा संरक्षण; छह वर्ष का कार्यकाल; सेवा-शर्तों में अलाभकारी बदलाव पर रोक।
- कार्य: चुनाव-कार्यक्रम, मतदाता सूची, चुनाव चिह्न और दलों की मान्यता, आदर्श आचार संहिता, EVM-VVPAT, SVEEP; अनुच्छेद 103 और 192 में राय देना।
- न्यायिक आधार: मोहिंदर सिंह गिल (1978) में अनुच्छेद 324 के व्यापक अधिकार, और अनूप बरनवाल (2023)।
- सीमाएँ: क़ानून और अदालती समीक्षा के अधीन; आदर्श आचार संहिता को क़ानूनी बल नहीं; अपना प्रवर्तन-तंत्र सीमित।
निष्कर्ष
निष्कर्ष: लोकतंत्र की साख आयोग की निष्पक्षता पर टिकी है, इसलिए नियुक्ति की पारदर्शिता, चुनावी धन पर निगरानी और तकनीक पर भरोसा तीनों सुधार ज़रूरी हैं।
अतिरिक्त मूल्य
- शेषन-काल का उदाहरण
- राजस्थान 2023: मतदान तिथि का परिवर्तन
- अनुच्छेद 243K और 243ZA से तुलना
एक पन्ने में दोहराव
- अनुच्छेद 324: चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन, नियंत्रण; भाग XV में 324 से 329।
- गठन: मुख्य निर्वाचन आयुक्त और राष्ट्रपति द्वारा तय संख्या में अन्य आयुक्त; 1993 से तीन-सदस्यीय।
- 2023 का अधिनियम: चयन समिति में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री।
- अनूप बरनवाल (2 मार्च 2023): अस्थायी समिति में मुख्य न्यायाधीश भी थे।
- कार्यकाल: छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो; पुनर्नियुक्ति नहीं।
- हटाना: मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह; अन्य आयुक्त उसकी सिफ़ारिश पर।
- मोहिंदर सिंह गिल (1978): अनुच्छेद 324 पूरक शक्ति देता है, पर क़ानून के विरुद्ध नहीं।
- अनुच्छेद 103 और 192: अयोग्यता पर राष्ट्रपति या राज्यपाल आयोग की राय के अनुसार चलते हैं।
- परिसीमन आयोग अलग निकाय है; मुख्य निर्वाचन आयुक्त या नामित आयुक्त उसका सदस्य।
- राज्य निर्वाचन आयोग: अनुच्छेद 243K और 243ZA; नियुक्ति राज्यपाल।
- एक साथ चुनाव: 129वाँ संशोधन विधेयक 2024 संयुक्त संसदीय समिति के पास।
याद रखने योग्य शब्द
- अनुच्छेद 324
- अनुच्छेद 103
- CEC
- बरनवाल
- 2023 अधिनियम
- आदर्श आचार संहिता
- VVPAT
- SVEEP
- परिसीमन
- 243K