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पेपर III · इकाई II

भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India)

चुनाव का अंपायर कैसे बना, कैसे चुना जाता है और कहाँ तक जा सकता है: अनुच्छेद 324 से 2023 के अधिनियम और शेषन-काल तक, हल किए पुराने प्रश्नों के साथ।

  • अनुच्छेद 324
  • नियुक्ति 2023
  • बरनवाल
  • MCC
  • एक साथ चुनाव
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

संघ सरकार और प्रशासनिक संस्थाएँ। संस्थाएँ: UPSC, भारत निर्वाचन आयोग, C&AG, वित्त आयोग, लोकपाल, नीति आयोग। (RPSC सिलेबस, 09-01-2026, पेपर III, इकाई II) इसी पेपर की इकाई I में 'मतदान व्यवहार, चुनाव सुधार और चुनावों का कार्य-संचालन' भी दर्ज है, इसलिए यह पन्ना दोनों इकाइयों के काम आता है।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • उपलब्ध पुराने प्रश्न-पत्रों (2013, 2016, 2021) में इस विषय के तीन प्रश्न मिलते हैं: 2021 में अनुच्छेद 103 में निर्वाचन आयोग की भूमिका (2 अंक), 2016 में एक साथ चुनाव के पक्ष में तर्क (5 अंक) और 2013 में चुनाव-प्रणाली के सुधार पर टिप्पणी (5 अंक)।
  • प्रश्न कभी सीधे तथ्य (अनुच्छेद 324, अनुच्छेद 103) पूछते हैं और कभी बहस (एक साथ चुनाव, चुनाव सुधार)। इसलिए तथ्य भी तैयार रखें और तर्क भी।
  • विश्लेषण: 2023 में नियुक्ति का नया क़ानून आया और 23 सितंबर 2026 को उसकी वैधता की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की दो-सदस्यीय पीठ में मतभेद रहा; मामला मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया। ताज़ा घटनाक्रम का एक वाक्य भी उत्तर को बाक़ी उत्तरों से अलग कर देता है।

आसान भाषा में: चुनाव का ‘अंपायर’

क्रिकेट के मैच में दो टीमें खेलती हैं और अंपायर तीसरा होता है। मान लीजिए अंपायर को किसी एक टीम का कप्तान चुने और वही उसे हटा भी सके, तो हर फ़ैसले पर शक रहेगा। चुनाव में भी यही उलझन है। खेलने वाले राजनीतिक दल हैं, और सरकार चलाने वाला दल भी मैदान में उतरता है। इसलिए चुनाव कराने वाली संस्था को सरकार और दलों, दोनों से अलग और मज़बूत रखा गया। यही संस्था निर्वाचन आयोग है।

परीक्षा के लिए परिभाषा: भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India, ECI) एक स्थायी और स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है, जिसे अनुच्छेद 324 के अंतर्गत संसद, प्रत्येक राज्य के विधान-मंडल तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के चुनावों की मतदाता सूची तैयार करने और उन चुनावों के संचालन का अधीक्षण (superintendence), निर्देशन (direction) और नियंत्रण (control) सौंपा गया है। आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई; इसी तिथि को हर वर्ष राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है।

एक सीमा पहले ही जान लें: अनुच्छेद 324 केवल संसद, राज्य विधान-मंडल और राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के चुनावों तक जाता है। पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग कराता है (अनुच्छेद 243K और 243ZA); उसकी तुलना इस पन्ने में आगे दी गई है.

संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 324 से 329

संविधान का भाग XV (चुनाव) अनुच्छेद 324 से 329 तक फैला है। सुप्रीम कोर्ट ने मोहिंदर सिंह गिल (1977) में इसे चुनाव के लिए ‘अपने आप में एक संहिता’ कहा: यही भाग बताता है कि चुनाव कौन कराएगा, कौन मतदाता होगा, क़ानून कौन बनाएगा और विवाद कहाँ जाएँगे। अनुच्छेद 324 मूल रूप में चुनाव न्यायाधिकरणों की नियुक्ति की बात भी करता था; वे शब्द 19वें संविधान संशोधन (1966) से हटा दिए गए।

नीचे की तालिका में हर अनुच्छेद का एक पंक्ति का सार है। इसे अपने हाथ से दो बार लिख लें; ‘अनुच्छेद 324 से 329’ प्रश्न-पत्र में एक सीधी पंक्ति के रूप में बहुत काम आता है.

अनुच्छेद 324–329 एक नज़र में

अनुच्छेदक्या कहता हैयाद रखने का सूत्र
324चुनावों और मतदाता सूची का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित; मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा-शर्तें और हटानाआयोग की जड़
325हर क्षेत्र के लिए एक सामान्य निर्वाचक नामावली; केवल धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर कोई नाम से बाहर नहीं और अलग सूची की माँग नहींएक सूची, कोई भेद नहीं
326लोक सभा और विधान सभा के चुनाव वयस्क मताधिकार पर; नागरिक, 18 वर्ष या अधिक (61वाँ संशोधन 1988, 28-3-1989 से), अनुपस्थिति या अयोग्यता (अस्वस्थ-चित्तता, अपराध, भ्रष्ट या अवैध आचरण) के अलावा पंजीकरण का अधिकार18 वर्ष, वयस्क मताधिकार
327संसद चुनाव से जुड़ी सभी बातों पर क़ानून बना सकती है: मतदाता सूची, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन आदिसंसद का क़ानून-अधिकार
328जहाँ तक संसद ने क़ानून न बनाया हो, राज्य विधान-मंडल अपने चुनावों पर क़ानून बना सकता हैराज्य का पूरक अधिकार
329(क) परिसीमन या सीटों के आवंटन की विधि को किसी अदालत में चुनौती नहीं; (ख) चुनाव को केवल चुनाव याचिका से ही चुनौती, किसी और रास्ते से नहींअदालत का दरवाज़ा सीमित

गठन, नियुक्ति और कार्यकाल

आयोग में कौन-कौन होगा, यह अनुच्छेद 324(2) कहता है: एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner, CEC) और उतने अन्य निर्वाचन आयुक्त (Election Commissioners, EC), जितने राष्ट्रपति समय-समय पर तय करें। नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, पर ‘संसद की बनाई किसी विधि के अधीन’। जब एक से अधिक आयुक्त हों तो CEC आयोग का अध्यक्ष होता है (324(3))। अनुच्छेद 324(4) राष्ट्रपति को आम चुनावों से पहले आयोग से परामर्श के बाद क्षेत्रीय आयुक्त नियुक्त करने की छूट देता है। आयोग अक्टूबर 1993 से तीन-सदस्यीय (CEC और दो EC) है; यह बदलाव कैसे आया, यह नीचे के शेषन-प्रकरण में पढ़ें।

लंबे समय तक ‘संसद की बनाई विधि’ में नियुक्ति की प्रक्रिया थी ही नहीं। 1991 का अधिनियम वेतन और काम-काज की बात करता था, पर नियुक्ति की प्रक्रिया नहीं बताता था; व्यवहार में नियुक्ति कार्यपालिका की सलाह से होती रही। इसी ख़ाली जगह को 2 मार्च 2023 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ में भरा, और फिर दिसंबर 2023 में संसद ने अपना अधिनियम बना दिया। तीनों व्यवस्थाओं की तुलना इस तालिका में देखिए.

नियुक्ति की तीन व्यवस्थाएँ

पहलू1991 का अधिनियम और परंपरामार्च 2023: अनूप बरनवालदिसंबर 2023 का अधिनियम
नियुक्ति कौन करता हैराष्ट्रपति (अनुच्छेद 324(2)); व्यवहार में कार्यपालिका की सलाहराष्ट्रपति, तीन-सदस्यीय समिति की सलाह परराष्ट्रपति, चयन समिति की सिफ़ारिश पर (अधिनियम की धारा 7)
समिति के सदस्यकोई वैधानिक समिति नहींप्रधानमंत्री, लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष (या सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता) और भारत के मुख्य न्यायाधीशप्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष (मान्यता न हो तो सबसे बड़े एकल विपक्षी दल का नेता) और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री
खोज समिति (Search Committee)नहीं—विधि और न्याय मंत्री की अध्यक्षता में; दो अन्य सदस्य, जो भारत सरकार के सचिव से कम पद के न हों; पाँच नामों का पैनल
पात्रतासंविधान में कोई योग्यता नहीं बताई गई—भारत सरकार के सचिव के समकक्ष पद पर हों या रहे हों; सत्यनिष्ठ हों; चुनाव के प्रबंधन और संचालन का ज्ञान और अनुभव रखते हों
वेतन और सेवा-शर्तेंसुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान वेतन—वेतन सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान (विधेयक में पहले कैबिनेट सचिव के समान था, पारित रूप में बदला गया)
स्थिति1991 के अधिनियम में नियुक्ति की प्रक्रिया नहीं थीअस्थायी: ‘जब तक संसद क़ानून न बनाए’संसद का क़ानून; वैधता का मामला 23-9-2026 को संविधान पीठ के लिए मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया (नीचे देखें)

2023 के अधिनियम में नियुक्ति की श्रृंखला

  1. खोज समिति

    विधि और न्याय मंत्री की अध्यक्षता में, दो सचिव-स्तर सदस्य

  2. पाँच नामों का पैनल

    चयन समिति पैनल से बाहर का नाम भी विचार सकती है (धारा 8(2))

  3. चयन समिति

    प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री

  4. सिफ़ारिश

    समिति में रिक्ति या कमी से नियुक्ति अमान्य नहीं होती (धारा 7(2))

  5. राष्ट्रपति का वारंट

    अपने हस्ताक्षर और मुहर वाले वारंट से नियुक्ति (धारा 4)

कार्यकाल, हटाना और स्वतंत्रता के कवच

2023 के अधिनियम के अनुसार CEC और अन्य आयुक्त पद-ग्रहण से छह वर्ष तक, या 65 वर्ष की आयु तक, जो पहले हो, पद पर रहते हैं। पुनर्नियुक्ति नहीं हो सकती। यदि कोई आयुक्त बाद में CEC बने, तो आयुक्त और CEC के रूप में कुल कार्यकाल छह वर्ष से अधिक नहीं हो सकता। धारा 11(1) के अनुसार आयुक्त राष्ट्रपति को लिखकर इस्तीफ़ा भी दे सकता है।

हटाने के नियम अनुच्छेद 324(5) के दो परंतुकों में हैं। CEC को उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। अनुच्छेद 124(4) के अनुसार इसका अर्थ है: संसद के दोनों सदनों का संबोधन, जिसे हर सदन की कुल सदस्य-संख्या के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई का समर्थन हो, और आधार सिद्ध कदाचार या अक्षमता हो। नियुक्ति के बाद CEC की सेवा-शर्तें उसके नुक़सान में नहीं बदली जा सकतीं। अन्य आयुक्त को CEC की सिफ़ारिश के बिना नहीं हटाया जा सकता।

यहाँ एक कमज़ोरी भी है: यह कवच CEC को पूरा और अन्य आयुक्तों को आधा मिलता है। बरनवाल में न्यायमूर्ति रस्तोगी के सहमत मत में सुझाव आया कि हटाने का यह संरक्षण अन्य आयुक्तों तक भी बढ़ाया जाए। परीक्षा में इसे ‘संरक्षण में असमानता’ के रूप में एक पंक्ति में जोड़ा जा सकता है.

CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्त: एक नज़र में अंतर

बिंदुमुख्य निर्वाचन आयुक्तअन्य निर्वाचन आयुक्त
हटाने की रीतिसुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह (संसद का संबोधन, सिद्ध कदाचार या अक्षमता)केवल CEC की सिफ़ारिश पर
सेवा-शर्तेंनियुक्ति के बाद नुक़सान में नहीं बदली जा सकतीं (अनुच्छेद 324(5))यह स्पष्ट संरक्षण परंतुक में नहीं
आयोग में भूमिकाअध्यक्ष (अनुच्छेद 324(3))सदस्य
नियुक्ति (2023 का अधिनियम)चयन समिति की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपतिवही चयन समिति और वही प्रक्रिया

अनुच्छेद 324 का पाठ और 2023 के अधिनियम पर PRS की सामग्री; स्रोत-सूची देखें।

आयोग की शक्तियाँ और कार्य

चुनाव की घोषणा और संचालन: चुनाव का कार्यक्रम आयोग तय करता है। 9 अक्टूबर 2023 की विज्ञप्ति में आयोग ने बताया कि कार्यक्रम बनाते समय वह जलवायु की स्थिति, शैक्षणिक कैलेंडर, बोर्ड परीक्षाएँ, बड़े त्योहार, क़ानून-व्यवस्था, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की उपलब्धता और उनके आवागमन का समय देखता है। विधानसभा चुनाव के लिए इसके बाद आयोग संबंधित राज्यों के राज्यपालों को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के अंतर्गत अधिसूचना जारी करने की सिफ़ारिश करता है।

मतदाता सूची: अनुच्छेद 324(1) में ही सूची की तैयारी का नियंत्रण आयोग को मिला है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 13A हर राज्य के लिए एक मुख्य निर्वाचन अधिकारी (Chief Electoral Officer) की व्यवस्था करती है, जो आयोग के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण में राज्य की सूची का काम देखता है; धारा 13AA ज़िले के लिए ज़िला निर्वाचन अधिकारी की बात करती है।

आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct, MCC): यह राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए दिशानिर्देश हैं। इसका शुरुआती रूप 1960 में केरल के विधानसभा चुनाव में बना, 1962 के लोक सभा चुनाव में मान्यता-प्राप्त दलों में बाँटा गया, 1979 में ‘सत्ताधारी दल’ पर रोकों की धारा जुड़ी, और 2013 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर घोषणा-पत्रों के लिए दिशानिर्देश जोड़े गए। संहिता चुनाव-कार्यक्रम की घोषणा से परिणाम तक लागू रहती है। यह सीधे क़ानून नहीं है। इसके कई प्रावधान दूसरे क़ानूनों (लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 और भारतीय न्याय संहिता/BNSS, पहले IPC/CrPC) की धाराओं से लागू कराए जा सकते हैं। आयोग ने इसे क़ानूनी बाध्यता देने के विरुद्ध यह तर्क दिया है कि चुनाव लगभग 45 दिन में पूरे हो जाते हैं और अदालती कार्यवाही उससे लंबी चलती है; 2013 की संसदीय स्थायी समिति ने इसे लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम का हिस्सा बनाने की सिफ़ारिश की थी।

राजनीतिक दल और चुनाव चिह्न: आयोग ने 1968 में निर्वाचन चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश जारी किया। यह चिह्नों के आवंटन, दलों के पंजीकरण और राष्ट्रीय या राज्य दल के रूप में मान्यता का आधार है। आदेश का पैराग्राफ 15 मान्यता-प्राप्त दल के भीतर दो गुटों के विवाद को सुलझाने की ज़िम्मेदारी आयोग को देता है।

परिसीमन: परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) अलग निकाय है, आयोग का हिस्सा नहीं। परिसीमन अधिनियम 2002 के अनुसार उसमें तीन सदस्य होते हैं: सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश (अध्यक्ष), CEC या उसके नामित निर्वाचन आयुक्त, और संबंधित राज्य का राज्य निर्वाचन आयुक्त। उसके आदेश राजपत्र में छपते ही क़ानून का बल पाते हैं और किसी अदालत में प्रश्न-योग्य नहीं रहते (धारा 10(2); अनुच्छेद 329(क))। अनुच्छेद 82 का तीसरा परंतुक कहता है कि 2026 के बाद की पहली जनगणना के आँकड़े प्रकाशित होने तक राज्यों में लोक सभा सीटों का आवंटन (1971 की जनगणना पर) और क्षेत्रों का विभाजन (2001 की जनगणना पर) दोबारा करना ज़रूरी नहीं है।

EVM और VVPAT: इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के तीन भाग हैं: बैलेट यूनिट, कंट्रोल यूनिट और VVPAT (Voter Verifiable Paper Audit Trail)। VVPAT मतदाता को सात सेकंड तक पर्ची दिखाती है कि उसका वोट उसी उम्मीदवार के नाम दर्ज हुआ। सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत निर्वाचन आयोग (8 अक्टूबर 2013) में सुप्रीम कोर्ट ने ‘पेपर ट्रेल’ को निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव की अपरिहार्य ज़रूरत माना। 2019 में न्यायालय ने प्रति विधानसभा क्षेत्र एक के बजाय पाँच EVM की पर्चियों की गिनती का निर्देश दिया। 26 अप्रैल 2024 को न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की पीठ ने 100% पर्ची-गिनती, बैलेट पेपर की वापसी और मतदाता के हाथ से पर्ची डालने की माँगें ठुकरा दीं, पर दो निर्देश दिए: सिंबल लोडिंग यूनिट सील कर 45 दिन रखी जाएँ, और दूसरे या तीसरे नंबर के उम्मीदवार के लिखित अनुरोध पर (परिणाम के सात दिन में, उसके ख़र्च पर) उस क्षेत्र की EVM के पाँच प्रतिशत की बर्न्ट मेमोरी की जाँच निर्माता कंपनी के इंजीनियर करें।

मतदाता शिक्षा: SVEEP (Systematic Voters’ Education and Electoral Participation) आयोग का मतदाता-शिक्षा और भागीदारी बढ़ाने वाला कार्यक्रम है; राज्य और ज़िला स्तर पर इसकी योजनाएँ बनती हैं।

सलाहकारी भूमिका (अनुच्छेद 103 और 192): यदि संसद-सदस्य की अयोग्यता का प्रश्न उठे (अनुच्छेद 102(1) की अयोग्यताएँ), तो वह राष्ट्रपति को भेजा जाता है और उनका निर्णय अंतिम होता है; पर निर्णय से पहले राष्ट्रपति को आयोग की राय लेनी होगी और उसी राय के अनुसार काम करना होगा (अनुच्छेद 103(2))। राज्य विधान-मंडल के सदस्य के लिए यही व्यवस्था अनुच्छेद 192 में राज्यपाल के लिए है। यानी राष्ट्रपति ‘निर्णायक’ ज़रूर हैं, पर राय आयोग की बाध्यकारी है.

अनुच्छेद 103 बनाम अनुच्छेद 192: आयोग की सलाहकारी भूमिका

सांसद या विधायक की सदस्यता पर अयोग्यता का सवाल उठे, तो फ़ैसला अदालत से पहले एक संवैधानिक पद के पास जाता है। ज़रा कल्पना कीजिए कि किसी सांसद पर आरोप है कि वह लाभ का पद धारण करता है। शिकायत राष्ट्रपति के पास जाती है, पर राष्ट्रपति के सामने यह तथ्यों का जटिल मामला है। इसलिए संविधान निर्माताओं ने एक विशेषज्ञ संस्था को बीच में रखा: निर्वाचन आयोग।

अनुच्छेद 103 और 192 की तुलना

अनुच्छेद 103 (संसद)

किसके सदस्यसंसद के किसी सदन का सदस्य

अयोग्यताओं का आधारअनुच्छेद 102(1)

निर्णायक कौनराष्ट्रपति; उनका निर्णय अंतिम

आयोग की भूमिकानिर्णय से पहले राय लेना अनिवार्य और उसी के अनुसार कार्य करना

अनुच्छेद 192 (राज्य विधान-मंडल)

किसके सदस्यराज्य विधान-मंडल के किसी सदन का सदस्य

अयोग्यताओं का आधारअनुच्छेद 191(1)

निर्णायक कौनराज्यपाल; उनका निर्णय अंतिम

आयोग की भूमिकानिर्णय से पहले राय लेना अनिवार्य और उसी के अनुसार कार्य करना

प्रमुख निर्णय: सिद्धांत और उद्धरण

वादनिर्णय का वर्ष और उद्धरणनिर्णय का सार
मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त2 दिसंबर 1977; (1978) 1 SCC 405; AIR 1978 SC 851; पाँच-न्यायाधीश पीठअनुच्छेद 324 ‘अपने आप में क़ानून’ नहीं बनाता, पर कानून की ख़ाली जगहों में आयोग को व्यापक अधिकार देता है, जिनका उपयोग निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के दायरे में हो। अनुच्छेद 329(ख) के कारण चुनाव-प्रक्रिया के बीच के क़दमों को रिट से चुनौती नहीं दी जा सकती; उपाय चुनाव याचिका है।
टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ1995; (1995) 4 SCC 611बहु-सदस्यीय आयोग संवैधानिक है; अनुच्छेद 324(3) में CEC ‘अध्यक्ष’ है, पर निर्णय में बहुमत का सिद्धांत चलेगा। 1993 में दो और आयुक्तों की नियुक्ति बरक़रार।
यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (ADR)2 मई 2002; (2002) 5 SCC 294उम्मीदवारों के आपराधिक अतीत, संपत्ति और शैक्षणिक योग्यता जानना मतदाता के अनुच्छेद 19(1)(क) के अधिकार का हिस्सा; आयोग इसके लिए हलफ़नामे माँग सकता है।
डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत निर्वाचन आयोग8 अक्टूबर 2013; (2013) 10 SCC 500‘पेपर ट्रेल’ निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव की अपरिहार्य ज़रूरत; EVM के साथ VVPAT चरणबद्ध ढंग से लगे।
अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ2 मार्च 2023; (2023) 6 SCC 161; पाँच-न्यायाधीश संविधान पीठसंसद के क़ानून तक आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सलाह पर; आयोग को कार्यपालिका के अनन्य नियंत्रण से बचाना ज़रूरी।
ADR बनाम भारत संघ (चुनावी बॉन्ड)15 फ़रवरी 2024; पाँच-न्यायाधीश संविधान पीठचुनावी बॉन्ड योजना 2018 मतदाता के सूचना के अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(क)) का उल्लंघन करने के कारण असंवैधानिक घोषित।
ADR बनाम भारत निर्वाचन आयोग (VVPAT)26 अप्रैल 2024; 2024 INSC 341100% VVPAT गिनती और बैलेट पेपर की माँग अस्वीकार; सिंबल लोडिंग यूनिट सुरक्षित रखने और बर्न्ट मेमोरी जाँच के निर्देश।
डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत संघ23 सितंबर 2026; 2026 INSC 1040; न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्माधारा 7 (चयन समिति) की वैधता पर निर्णय नहीं हुआ। दो-सदस्यीय पीठ इस पर बँटी कि मामला पाँच-न्यायाधीश संविधान पीठ को जाए या नहीं (दत्ता: नहीं, शर्मा: हाँ); दोनों ने कागज़ात मुख्य न्यायाधीश के सामने रखे, ताकि वे संविधान पीठ के गठन पर विचार करें।

भारत निर्वाचन आयोग: समय-रेखा

  1. 25 जनवरी 1950

    निर्वाचन आयोग की स्थापना (अनुच्छेद 324 के अंतर्गत)

  2. 1960–62

    आदर्श आचार संहिता की शुरुआत: केरल 1960, फिर 1962 के लोक सभा चुनाव में दलों में वितरण

  3. 2 दिसंबर 1977

    मोहिंदर सिंह गिल: अनुच्छेद 324 और 329(ख) की व्याख्या

  4. 1990–1996

    टी.एन. शेषन का कार्यकाल (12-12-1990 से 11-12-1996)

  5. अक्टूबर 1993

    आयोग तीन-सदस्यीय बना; 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी

  6. 2 मई 2002

    ADR निर्णय: उम्मीदवारों की जानकारी जानने का मतदाता का अधिकार

  7. 8 अक्टूबर 2013

    VVPAT को निष्पक्ष चुनाव के लिए अपरिहार्य माना गया

  8. 2 मार्च 2023

    अनूप बरनवाल: नियुक्ति के लिए अस्थायी समिति की व्यवस्था

  9. दिसंबर 2023

    CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा-शर्तें और पदावधि) अधिनियम पारित: राज्य सभा 12, लोक सभा 21 दिसंबर

  10. 26 अप्रैल 2024

    EVM-VVPAT: 100% पर्ची-गिनती की माँग अस्वीकार

  11. 23 सितंबर 2026

    जया ठाकुर: धारा 7 की चुनौती पर पीठ में मतभेद; संविधान पीठ के लिए मामला मुख्य न्यायाधीश के पास

सीमाएँ और सुधार

आयोग की ताक़त बड़ी है, पर उसकी सीमाएँ भी साफ़ हैं। पहली सीमा नियुक्ति की है: 2023 के अधिनियम में चयन समिति के तीन में से दो सदस्य सरकार की ओर के हैं (प्रधानमंत्री और उनके नामित मंत्री), इसलिए आलोचक कहते हैं कि इससे आयोग की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है; सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की ओर से तर्क दिया गया कि यह संसद का सोच-समझकर बनाया क़ानून है और प्रधानमंत्री जैसे उच्च पदों पर बैठे लोग निष्पक्षता से काम करेंगे।

दूसरी सीमा आचार संहिता की है: वह सीधे क़ानून नहीं है, इसलिए उसकी ताक़त आयोग की नैतिक सत्ता और अन्य क़ानूनों के सहारे पर टिकी है। तीसरी सीमा सुरक्षा का कवच असमान होना है: CEC को हटाने की सुरक्षा न्यायाधीश जैसी है, पर अन्य आयुक्तों को हटाना CEC की सिफ़ारिश पर टिका है। चौथी सीमा संसाधनों की है: अनुच्छेद 324(6) के अनुसार आयोग काम के लिए राष्ट्रपति या राज्यपाल से कर्मचारी उपलब्ध कराने का अनुरोध करता है, यानी चुनाव के समय बहुत-से कर्मचारी उधार के होते हैं (विश्लेषण)। पाँचवीं सीमा अदालती रोक की है: अनुच्छेद 329(ख) के कारण चुनाव-प्रक्रिया के बीच में आयोग के क़दम को अदालत में सीधे चुनौती नहीं दी जा सकती।

सुधार की सिफ़ारिशें पुरानी हैं। नियुक्ति के लिए समिति का विचार दिनेश गोस्वामी समिति (1990), संविधान की कार्यप्रणाली की समीक्षा के राष्ट्रीय आयोग (2002), विधि आयोग (2015) और अंततः सुप्रीम कोर्ट (2023) में बार-बार आया; हर बार समिति का स्वरूप अलग रहा, पर विपक्ष के नेता को शामिल करने पर लगभग सहमति रही। 2013 की संसदीय स्थायी समिति ने चुनावी ख़र्च की सीमा की समीक्षा, आचार संहिता को क़ानूनी समर्थन और दलों की मान्यता रद्द करने की शक्ति लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में जोड़ने की सिफ़ारिश की। पारदर्शिता के मोर्चे पर 2002 का ADR निर्णय (उम्मीदवारों का हलफ़नामा), 2013 में VVPAT और 15 फ़रवरी 2024 को चुनावी बॉन्ड योजना का रद्द होना मील के पत्थर हैं।

एक साथ चुनाव (Simultaneous Elections): पक्ष और विपक्ष

लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव 1951–52 से 1967 तक अधिकतर साथ-साथ होते थे। 1968–69 में कुछ राज्यों की विधान सभाएँ समय से पहले भंग हुईं और 1970 में चौथी लोक सभा भी, तब से चक्र बिखर गया। इसे फिर जोड़ने के लिए सितंबर 2023 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में उच्च-स्तरीय समिति बनी। उसने दो चरणों का सुझाव दिया: पहले लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव साथ, फिर 100 दिन के भीतर पंचायतों और नगरपालिकाओं के। संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक 2024 लोक सभा में 17 दिसंबर 2024 को पेश हुआ और 19 दिसंबर 2024 को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा गया; 18 मार्च 2026 को लोक सभा ने JPC का कार्यकाल 2026 के मानसून सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक बढ़ाया।

विश्लेषण: उत्तर में यह संतुलन लिखें कि प्रस्ताव का तर्क शासन की स्थिरता है, जबकि संसदीय प्रणाली में ज़ोर जवाबदेही पर रहा है (डॉ. आंबेडकर ने 1948 में कहा था कि दोनों बराबर मात्रा में कोई प्रणाली नहीं देती).

एक साथ चुनाव: तर्क एक नज़र में

पक्ष में तर्कविपक्ष में चिंताएँ
बार-बार चुनाव से सरकारी और अन्य हितधारकों का ख़र्च और समय बढ़ता हैप्रत्यक्ष सरकारी ख़र्च बजट के छोटे हिस्से के बराबर है, इसलिए ख़र्च का तर्क कमज़ोर हो सकता है (PRS का विश्लेषण)
बार-बार आचार संहिता लगने से विकास-कार्य और सेवा-वितरण रुकता हैकई विधायिकाओं का कार्यकाल बहुत छोटा रह सकता है, कभी-कभी एक वर्ष से भी कम
सुरक्षा बलों और मतदान कर्मियों को बार-बार लगाना पड़ता हैविधेयक में राज्य के चुनाव टालने की सिफ़ारिश आयोग कर सकता है, पर कोई समय-सीमा नहीं; अनुच्छेद 356 की तुलना में सीमा नीची
नीति में स्थिरता और पूर्वानुमान, मतदाता-भागीदारी बढ़ने की उम्मीद (कोविंद समिति)संघवाद और सरकार की जवाबदेही पर असर की आशंका

राज्य निर्वाचन आयोग से संक्षिप्त तुलना (अनुच्छेद 243K और 243ZA)

गाँव की पंचायत और शहर की नगरपालिका के चुनाव भारत निर्वाचन आयोग नहीं कराता। अनुच्छेद 243K पंचायतों के चुनाव और अनुच्छेद 243ZA नगरपालिकाओं के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission, SEC) को सौंपता है, जिसमें एक राज्य निर्वाचन आयुक्त होता है जिसे राज्यपाल नियुक्त करते हैं। राज्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने का तरीक़ा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसा है। (विस्तार से राज्य निर्वाचन आयोग का अलग पन्ना देखें।)

भारत निर्वाचन आयोग बनाम राज्य निर्वाचन आयोग

भारत निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 324)

किन चुनावों के लिएसंसद, राज्य विधान-मंडल, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति

गठनCEC और राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित संख्या में अन्य आयुक्त

नियुक्ति करने वालाराष्ट्रपति (संसद की विधि के अधीन)

हटाने की रीतिCEC: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह; अन्य आयुक्त: CEC की सिफ़ारिश पर

स्टाफ़ उपलब्ध कराने वालाराष्ट्रपति या राज्यपाल (अनुरोध पर)

चुनाव संबंधी क़ानूनसंसद (अनुच्छेद 327) और राज्य (अनुच्छेद 328)

राज्य निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 243K, 243ZA)

किन चुनावों के लिएपंचायतें (243K) और नगरपालिकाएँ (243ZA)

गठनएक राज्य निर्वाचन आयुक्त

नियुक्ति करने वालाराज्यपाल

हटाने की रीतिउच्च न्यायालय के न्यायाधीश की तरह

स्टाफ़ उपलब्ध कराने वालाराज्यपाल (अनुरोध पर)

चुनाव संबंधी क़ानूनराज्य विधान-मंडल (243K(4), 243ZA(2))

मुख्य तथ्य

स्थापना
25 जनवरी 1950 (अनुच्छेद 324 के अंतर्गत); 2011 से इसी तिथि पर राष्ट्रीय मतदाता दिवस
संवैधानिक आधार
भाग XV, अनुच्छेद 324–329 (संविधान, 1950); 1966 में अनुच्छेद 324(1) से चुनाव-न्यायाधिकरण वाले शब्द हटे
गठन
CEC और राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित संख्या में अन्य आयुक्त (अनुच्छेद 324(2)); अक्टूबर 1993 से तीन-सदस्यीय
नियुक्ति का क़ानून
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा-शर्तें और पदावधि) अधिनियम 2023 (अधिनियम सं. 49/2023); राज्य सभा से 12 और लोक सभा से 21 दिसंबर 2023 को पारित; राष्ट्रपति की स्वीकृति 28 दिसंबर 2023
चयन समिति (2023)
प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष (या सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता), प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री (2023)
खोज समिति (2023)
विधि और न्याय मंत्री की अध्यक्षता, दो सचिव-स्तर सदस्य, पाँच नामों का पैनल (संशोधन 11 दिसंबर 2023)
कार्यकाल
छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो; पुनर्नियुक्ति नहीं (2023 का अधिनियम, धारा 9)
हटाना
CEC सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह; अन्य आयुक्त CEC की सिफ़ारिश पर (अनुच्छेद 324(5); अनुच्छेद 124(4))
अनूप बरनवाल
2 मार्च 2023; (2023) 6 SCC 161; पाँच-न्यायाधीश पीठ (के.एम. जोसेफ़, अजय रस्तोगी, अनिरुद्ध बोस, हृषिकेश रॉय, सी.टी. रविकुमार)
मोहिंदर सिंह गिल
2 दिसंबर 1977; (1978) 1 SCC 405; AIR 1978 SC 851
टी.एन. शेषन
CEC: 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996; रेमन मैग्सेसे पुरस्कार 1996; टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995) 4 SCC 611
अनुच्छेद 103 और 192
अयोग्यता पर राष्ट्रपति या राज्यपाल का निर्णय अंतिम, पर आयोग की राय लेकर उसी के अनुसार (1950 का संविधान)
परिसीमन आयोग
तीन सदस्य: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश (अध्यक्ष), CEC या नामित आयुक्त, राज्य निर्वाचन आयुक्त; आदेश क़ानून का बल (परिसीमन अधिनियम 2002, धारा 3 और 10)
VVPAT
8 अक्टूबर 2013 के निर्णय में अपरिहार्य ‘पेपर ट्रेल’; 26 अप्रैल 2024 को 100% गिनती की माँग अस्वीकार (2024 INSC 341)
जया ठाकुर बनाम भारत संघ
23 सितंबर 2026: धारा 7 की वैधता पर निर्णय नहीं; दो-सदस्यीय पीठ संविधान पीठ भेजने के प्रश्न पर बँटी, कागज़ात मुख्य न्यायाधीश के पास (2026 INSC 1040)

राजस्थान का पहलू

(1) लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 13A के अनुसार हर राज्य में एक मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) होता है, जिसे निर्वाचन आयोग राज्य सरकार से परामर्श करके सरकार के किसी अधिकारी में से नामित करता है; वह आयोग के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण में राज्य की मतदाता सूची की तैयारी, पुनरीक्षण और सुधार की निगरानी करता है। धारा 13AA में हर ज़िले के लिए ज़िला निर्वाचन अधिकारी की यही व्यवस्था है। विश्लेषण: राजस्थान का CEO इसी वैधानिक ढाँचे के अंतर्गत है, यानी वह राज्य सरकार का अधिकारी होते हुए भी चुनाव-कार्य में आयोग के नियंत्रण में रहता है। (2) 9 अक्टूबर 2023 की निर्वाचन आयोग की विज्ञप्ति (PIB) में राजस्थान सहित पाँच राज्यों के विधानसभा आम चुनाव का कार्यक्रम घोषित हुआ; विज्ञप्ति के अनुसार कार्यक्रम बनाते समय मौसम, शैक्षणिक कैलेंडर, बोर्ड परीक्षाएँ, प्रमुख त्योहार, क़ानून-व्यवस्था और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की उपलब्धता देखी गई। (3) 11 अक्टूबर 2023 को आयोग ने राजस्थान का मतदान 23 नवंबर के बजाय 25 नवंबर 2023 को कराने का निर्णय लिया; आयोग के वक्तव्य (ANI के हवाले से) में बड़े पैमाने पर विवाह और सामाजिक आयोजनों से होने वाली असुविधा तथा विभिन्न दलों और संगठनों के प्रतिनिधित्व कारण बताए गए। मतदान-प्रतिशत या अन्य आँकड़े यहाँ जानबूझकर नहीं दिए गए, क्योंकि वे आयोग के प्रकाशित वर्ष-वार आँकड़ों से ही लिए जाने चाहिए।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • अनुच्छेद 324 को पंचायत और नगरपालिका चुनावों पर लागू बताना। वे राज्य निर्वाचन आयोग के पास हैं (अनुच्छेद 243K, 243ZA)।
  • ‘निर्वाचन आयोग परिसीमन करता है’ लिखना। परिसीमन आयोग (परिसीमन अधिनियम 2002) अलग निकाय है; CEC या उनका नामित आयुक्त उसका एक सदस्य होता है।
  • सभी आयुक्तों को CEC जैसा हटाने का संरक्षण बताना। अन्य आयुक्त को केवल CEC की सिफ़ारिश पर हटाया जा सकता है।
  • बरनवाल निर्णय की समिति (प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, मुख्य न्यायाधीश) को आज की क़ानूनी व्यवस्था बताना। वह अस्थायी व्यवस्था थी; 2023 के अधिनियम में तीसरे सदस्य के रूप में प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री है।
  • ‘सुप्रीम कोर्ट ने 2023 का अधिनियम रद्द कर दिया’ लिखना। 23 सितंबर 2026 को पीठ में मतभेद रहा और मामला संविधान पीठ के लिए मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया; न अधिनियम रद्द हुआ, न वैधता पर अंतिम निर्णय आया।
  • आदर्श आचार संहिता को क़ानून बताना। वह आयोग के दिशानिर्देश हैं; कुछ प्रावधान दूसरे क़ानूनों से लागू कराए जाते हैं।
  • कार्यकाल में ‘पाँच वर्ष’ या ‘पुनर्नियुक्ति संभव’ लिखना। 2023 के अधिनियम में छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो, और पुनर्नियुक्ति नहीं।
  • अनुच्छेद 103 में आयोग की राय को केवल ‘सलाह’ कहना। राष्ट्रपति को उसी राय के अनुसार कार्य करना होता है।