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पेपर III · इकाई II

राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC): राजस्थान

राज्य मानवाधिकार आयोग क्या है, उसके सदस्य कैसे नियुक्त होते हैं, कैसे त्यागपत्र देते और कैसे हटाए जाते हैं, 2019 के संशोधन के बाद की सही तस्वीर, कार्य, शक्तियाँ और सीमाएँ, उत्तर-लेखन की दृष्टि से।

  • मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993
  • धारा 21 से 26
  • नियुक्ति समिति
  • 2019 संशोधन
  • राजस्थान
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II, "State and District Administration": "State: Governor, Chief Minister, Council of Ministers, State Secretariat, Chief Secretary, role of Directorates, police administration, Revenue Board, State Election Commission, State Human Rights Commission, Lokayukta." इस पृष्ठ पर राज्य मानवाधिकार आयोग है; राज्य निर्वाचन आयोग और लोकायुक्त के अलग पृष्ठ हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2024 के पेपर III में 5 अंक (50 शब्द) का सीधा प्रश्न आया: राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के सदस्यों की नियुक्ति, त्यागपत्र और पद से हटाया जाना। यह प्रश्न पूरी तरह अधिनियम की धाराओं (22, 23, 24) पर टिका है, इसलिए धारा-वार तथ्य पक्के होने चाहिए।
  • इसी इकाई के राज्य-स्तरीय संस्थानों पर प्रश्न बार-बार आए हैं: 2023 में राज्य निर्वाचन आयोग (2 अंक), 2021 और 2018 में राजस्थान लोकायुक्त (5-5 अंक)। 2013-2024 के पेपरों में देखा गया रुझान यह है कि इन संस्थाओं पर प्रश्न उनकी बनावट, अधिकार या प्रक्रिया से जुड़े रहे।
  • 2019 के संशोधन के बाद कार्यकाल पाँच से घटकर तीन वर्ष हुआ और अध्यक्ष की पात्रता बढ़ी। पुराने नोट्स में पाँच वर्ष लिखा मिलता है; उत्तर में संशोधित तथ्य लिखना आपको औरों से अलग करता है।

पहले सरल भाषा में: थाने और अदालत के बीच की एक खिड़की

मान लीजिए ज़िला जेल में बंद एक व्यक्ति के परिवार को शक है कि उसके साथ मारपीट हुई है। थाने जाएँ तो शिकायत उसी विभाग तक पहुँचती है जिस पर आरोप है; अदालत जाएँ तो समय और ख़र्च दोनों लगते हैं। ऐसे में एक तीसरी खिड़की चाहिए, जहाँ न्यायिक अनुभव वाले लोग बैठे हों, जो सरकार से रिपोर्ट माँग सकें, गवाहों को बुला सकें और अपनी राय खुलकर रख सकें। राज्य मानवाधिकार आयोग यही खिड़की है। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया उदाहरण है।)

एक बात शुरू में ही साफ़ रखिए: यह खिड़की सज़ा नहीं सुनाती। वह जाँच करती है और सरकार को सिफ़ारिश करती है, जैसे पीड़ित को मुआवज़ा दिया जाए या दोषी पर मुक़दमा चले। इसीलिए परीक्षा में आयोग की ताक़त और उसकी सीमा, दोनों साथ लिखनी होती हैं।

परीक्षा के लिए सटीक परिभाषा: राज्य मानवाधिकार आयोग मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (Protection of Human Rights Act, 1993) की धारा 21 के अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा गठित वैधानिक (statutory) निकाय है, जो राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों से जुड़े मानवाधिकार-उल्लंघन की जाँच करता है। अधिनियम की धारा 2(1)(घ) में "मानव अधिकार" का अर्थ है: जीवन, स्वतंत्रता, समानता और व्यक्ति की गरिमा से संबंधित वे अधिकार, जो संविधान द्वारा सुनिश्चित हैं या अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदाओं में समाए हैं और भारत की अदालतों में लागू कराए जा सकते हैं।

ध्यान दें कि यह संवैधानिक निकाय नहीं है। UPSC और राज्य निर्वाचन आयोग का नाम संविधान में है; मानवाधिकार आयोग संसद के क़ानून से बना है, इसलिए उसके सदस्यों की सेवा-शर्तें, कार्यकाल और हटाने के नियम अधिनियम में हैं, संविधान में नहीं।

क़ानूनी आधार और 2019 का संशोधन

मूल अधिनियम "मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993" (अधिनियम सं. 10/1994) कहलाता है और उसे 28 सितंबर 1993 से प्रवृत्त माना गया है। अधिनियम तीन चीज़ें बनाता है: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) और मानवाधिकार न्यायालय। राज्य आयोग का अध्याय V है; धारा 21 से 29 उसी की हैं।

संशोधन 2019 में हुआ। संसद में विधेयक 8 जुलाई 2019 को गृह मंत्री ने पेश किया; वह लोकसभा में 19 जुलाई को और राज्यसभा में 22 जुलाई 2019 को पारित हुआ (PRS)। संशोधित अधिनियम (अधिनियम सं. 19/2019) 2 अगस्त 2019 से प्रभावी है। राज्य आयोग के लिए सबसे अहम बदलाव नीचे की तालिका में हैं।

राज्य आयोग: 2019 से पहले और बाद

बिंदु2019 से पहले2019 के बाद (अब की स्थिति)
अध्यक्ष की पात्रताउच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश रह चुका व्यक्तिउच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश रह चुका व्यक्ति (धारा 21(2)(क))
अध्यक्ष का कार्यकालपाँच वर्ष या 70 वर्ष की आयु तकतीन वर्ष या 70 वर्ष की आयु तक, जो पहले हो (धारा 24(1))
अध्यक्ष की पुनर्नियुक्तिअधिनियम के पाठ में इसका उल्लेख नहीं थापुनर्नियुक्ति के पात्र (धारा 24(1))
सदस्य का कार्यकालपाँच वर्ष, और केवल एक और पाँच वर्ष के कार्यकाल तक पुनर्नियुक्तितीन वर्ष; पुनर्नियुक्ति के पात्र, 70 वर्ष की आयु तक (धारा 24(2))
सचिवआयोग द्वारा सौंपे गए अधिकार और कार्यअध्यक्ष के नियंत्रण में आयोग के सभी प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार (धारा 21(3))
केंद्र शासित प्रदेशकोई प्रावधान नहींकेंद्र सरकार आदेश से दिल्ली को छोड़कर अन्य केंद्र शासित प्रदेशों के मानवाधिकार-कार्य राज्य आयोग को दे सकती है; दिल्ली के कार्य NHRC के पास (धारा 21(7), (8))

'पहले' वाली पंक्तियाँ अधिनियम के फ़ुटनोट में दर्ज प्रतिस्थापन से ली गई हैं।

संरचना: आयोग में कौन-कौन होता है (धारा 21)

धारा 21(2) के अनुसार राज्य आयोग में तीन व्यक्ति होते हैं: एक अध्यक्ष और दो सदस्य। इनके अलावा एक सचिव होता है, जो आयोग का मुख्य कार्यकारी अधिकारी है। राज्य सरकार को सचिव-स्तर (राज्य सरकार के सचिव से कम नहीं) का अधिकारी सचिव के रूप में और पुलिस महानिरीक्षक से कम रैंक के नहीं ऐसे अधिकारी के अधीन पुलिस व जाँच कर्मचारी आयोग को उपलब्ध कराने होते हैं (धारा 27)। यह जाँच-कर्मचारियों वाली व्यवस्था आयोग को अपनी जाँच-शाखा देती है, ताकि वह हर बार उसी विभाग पर निर्भर न रहे जिस पर शिकायत है।

राज्य आयोग की संरचना

पदकौन हो सकता है (धारा 21)
अध्यक्षउच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश रह चुका व्यक्ति
सदस्य (न्यायिक)उच्च न्यायालय का वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश, या ज़िला न्यायाधीश जिसे राज्य में ज़िला न्यायाधीश के रूप में कम से कम सात वर्ष का अनुभव हो
सदस्य (विशेषज्ञ)मानवाधिकार से जुड़े मामलों का ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाला व्यक्ति
सचिवआयोग का मुख्य कार्यकारी अधिकारी; अध्यक्ष के नियंत्रण में प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार
मुख्यालयराज्य सरकार की अधिसूचना से तय; राजस्थान में जयपुर

राष्ट्रीय आयोग में 2019 से कम-से-कम एक महिला सदस्य अनिवार्य है; राज्य आयोग की धारा 21(2) में ऐसी शर्त नहीं है, इसलिए उत्तर में दोनों को न मिलाएँ।

नियुक्ति: राज्यपाल करता है, पर अपनी मर्ज़ी से नहीं (धारा 22)

धारा 22(1) के अनुसार अध्यक्ष और सदस्यों को राज्यपाल अपने हस्ताक्षर और मुहर वाले अधिपत्र (warrant) से नियुक्त करता है। पर शर्त यह है कि हर नियुक्ति एक चार-सदस्यीय समिति की सिफ़ारिश के बाद ही होगी: मुख्यमंत्री (अध्यक्ष), विधानसभा अध्यक्ष, राज्य का गृह मंत्री और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष। जिन राज्यों में विधान परिषद है, वहाँ परिषद के सभापति और परिषद के नेता प्रतिपक्ष भी समिति में जुड़ते हैं।

दो और बातें परीक्षा में काम आती हैं। एक, उच्च न्यायालय के किसी वर्तमान न्यायाधीश या वर्तमान ज़िला न्यायाधीश को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद ही नियुक्त किया जा सकता है। दो, समिति में कोई पद ख़ाली होने भर से नियुक्ति अवैध नहीं हो जाती (धारा 22(2))।

विश्लेषण: अनुच्छेद 168(1) में दो सदनों वाले राज्यों की जो सूची है, उसमें राजस्थान नहीं है, इसलिए राजस्थान में समिति के चार ही सदस्य बनते हैं। सत्ता-पक्ष के तीन और विपक्ष का एक सदस्य होने से बहुमत सरकार के पास रहता है, पर नेता प्रतिपक्ष की उपस्थिति से आपत्ति दर्ज होने और पारदर्शिता की गुंजाइश बनती है।

नियुक्ति-समिति (धारा 22(1))

सदस्यराजस्थान जैसे एक-सदन वाले राज्य मेंविधान परिषद वाले राज्य में
मुख्यमंत्रीअध्यक्षअध्यक्ष
विधानसभा अध्यक्षसदस्यसदस्य
गृह विभाग के प्रभारी मंत्रीसदस्यसदस्य
विधानसभा में नेता प्रतिपक्षसदस्यसदस्य
विधान परिषद का सभापतिनहीं (परिषद नहीं)सदस्य
विधान परिषद में नेता प्रतिपक्षनहीं (परिषद नहीं)सदस्य

राजस्थान वाला स्तंभ अनुच्छेद 168(1) के आधार पर विश्लेषण है।

कार्यकाल, त्यागपत्र और हटाना (धाराएँ 23, 24, 25, 26)

कार्यकाल: अध्यक्ष और हर सदस्य तीन वर्ष के लिए नियुक्त होता है, या 70 वर्ष की आयु पूरी होने तक, जो पहले आए। दोनों पुनर्नियुक्ति के पात्र हैं। पद छोड़ने के बाद वह राज्य सरकार या भारत सरकार के अधीन आगे कोई नौकरी नहीं कर सकता (धारा 24(3)); यह प्रावधान आयोग को पद के बाद के लालच से बचाता है।

त्यागपत्र: अध्यक्ष या सदस्य अपने हाथ से लिखी सूचना राज्यपाल को देकर इस्तीफ़ा दे सकता है (धारा 23(1))। यानी नियुक्त करने वाला और त्यागपत्र लेने वाला, दोनों राज्यपाल हैं।

हटाना: यहाँ सबसे बड़ी चूक होती है। नियुक्ति राज्यपाल करता है, पर हटाने का आदेश राष्ट्रपति देता है। हटाने के दो रास्ते हैं। पहला, सिद्ध कदाचार (proved misbehaviour) या अक्षमता (incapacity) के आधार पर: राष्ट्रपति मामला उच्चतम न्यायालय को भेजता है, न्यायालय अपनी तय प्रक्रिया से जाँच करके रिपोर्ट देता है कि व्यक्ति को हटाया जाना चाहिए, और तभी राष्ट्रपति आदेश देता है (धारा 23(1A))। दूसरा, कुछ आधारों पर राष्ट्रपति सीधे आदेश से हटा सकता है, बिना उच्चतम न्यायालय की जाँच के (धारा 23(2))।

कामचलाऊ व्यवस्था: अध्यक्ष का पद ख़ाली हो जाए या वह छुट्टी पर हो तो राज्यपाल अधिसूचना से किसी सदस्य को अध्यक्ष का कार्य करने का अधिकार देता है (धारा 25)। वेतन, भत्ते और सेवा-शर्तें राज्य सरकार तय करती है, पर नियुक्ति के बाद उन्हें सदस्य के नुक़सान की दिशा में बदला नहीं जा सकता (धारा 26)। हटाने की यह कठिन प्रक्रिया और सेवा-शर्तों की सुरक्षा ही आयोग की स्वतंत्रता की रीढ़ है।

पद से हटाने के दो रास्ते (धारा 23)

आधारकौन आदेश देता हैजाँच कौन करता है
सिद्ध कदाचार या अक्षमता (धारा 23(1A))राष्ट्रपतिउच्चतम न्यायालय; राष्ट्रपति के संदर्भ पर, न्यायालय की अपनी तय प्रक्रिया से
दिवालिया घोषित होना (धारा 23(2)(क))राष्ट्रपतिअलग जाँच ज़रूरी नहीं
पद के दौरान कर्तव्यों से बाहर सवेतन नौकरी (धारा 23(2)(ख))राष्ट्रपतिअलग जाँच ज़रूरी नहीं
शारीरिक या मानसिक अक्षमता के कारण पद के अयोग्य (धारा 23(2)(ग))राष्ट्रपतिअलग जाँच ज़रूरी नहीं
विकृतचित्त, जो सक्षम न्यायालय ने घोषित किया हो (धारा 23(2)(घ))राष्ट्रपतिन्यायालय की घोषणा पहले से हो
नैतिक अधमता वाले अपराध में सज़ा और कारावास, राष्ट्रपति की राय में (धारा 23(2)(ङ))राष्ट्रपतिदोषसिद्धि से आधार बनता है

राज्यपाल केवल नियुक्त करता है और इस्तीफ़ा लेता है; हटाने का आदेश राष्ट्रपति के पास है।

कार्य: आयोग क्या-क्या करता है (धारा 12, धारा 29 के साथ)

राज्य आयोग पर धारा 12 के कार्य लागू होते हैं, केवल खंड (च) को छोड़कर, जो अंतरराष्ट्रीय संधियों के अध्ययन का है और राष्ट्रीय आयोग के लिए रखा गया है (धारा 29(ग))। मुख्य कार्य ये हैं। पहला, पीड़ित या उसकी ओर से किसी व्यक्ति की याचिका पर, अपने आप (suo motu), या किसी न्यायालय के निर्देश पर, मानवाधिकार-उल्लंघन या उसके दुष्प्रेरण, या किसी लोक-सेवक की उसे रोकने में लापरवाही की जाँच। दूसरा, न्यायालय की अनुमति से किसी लंबित मामले में हस्तक्षेप।

तीसरा, राज्य सरकार के नियंत्रण वाली किसी जेल या ऐसी संस्था में, जहाँ इलाज, सुधार या संरक्षण के लिए लोग रखे जाते हैं, जाकर वहाँ की हालत का अध्ययन और सरकार को सुझाव। चौथा, मानवाधिकारों की सुरक्षा के संवैधानिक और वैधानिक उपायों की समीक्षा, और आतंकवाद सहित उन कारकों की समीक्षा जो अधिकारों के उपभोग में बाधा हैं। पाँचवाँ, मानवाधिकार के क्षेत्र में शोध, मानवाधिकार-साक्षरता का प्रसार और इस क्षेत्र में काम करने वाले ग़ैर-सरकारी संगठनों को प्रोत्साहन।

शक्तियाँ और प्रक्रिया: जाँच कैसे चलती है (धाराएँ 13, 14, 17, 18)

जाँच के दौरान आयोग के पास सिविल न्यायालय की शक्तियाँ होती हैं (धारा 13)। वह गवाहों को बुलाकर शपथ पर उनसे पूछताछ कर सकता है, दस्तावेज़ मँगवा सकता है, शपथपत्र पर साक्ष्य ले सकता है, किसी न्यायालय या कार्यालय से सार्वजनिक अभिलेख मँगा सकता है और गवाहों या दस्तावेज़ों की जाँच के लिए कमीशन जारी कर सकता है। वह किसी भी व्यक्ति से प्रासंगिक सूचना माँग सकता है, और आयोग के सामने की कार्यवाही न्यायिक कार्यवाही मानी जाती है।

जाँच-एजेंसी: आयोग केंद्र या राज्य सरकार के किसी अधिकारी या जाँच-एजेंसी की सेवा संबंधित सरकार की सहमति से ले सकता है (धारा 14)। धारा 17 के अनुसार वह पहले सरकार या अधीनस्थ प्राधिकारी से रिपोर्ट माँग सकता है; समय पर रिपोर्ट न आए तो ख़ुद आगे बढ़ सकता है, और रिपोर्ट से संतुष्ट हो कि कार्रवाई हो चुकी है तो शिकायतकर्ता को सूचित कर आगे नहीं बढ़ता।

जाँच के बाद धारा 18 के क़दम: आयोग सरकार को मुआवज़ा देने, अभियोजन या अन्य कार्रवाई शुरू करने की सिफ़ारिश करता है; वह अंतरिम राहत की सिफ़ारिश कर सकता है; और उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय से निर्देश माँग सकता है। रिपोर्ट की प्रति सरकार को भेजी जाती है और सरकार को एक माह में (या आयोग द्वारा बढ़ाए समय में) अपनी टिप्पणी और की गई कार्रवाई बतानी होती है। आयोग रिपोर्ट को सरकार की टिप्पणी के साथ प्रकाशित करता है। इसके अलावा राज्य सरकार, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से, हर ज़िले में एक सत्र न्यायालय को मानवाधिकार न्यायालय घोषित कर सकती है (धारा 30), और उसके लिए एक विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करती है (धारा 31)।

आयोग की ताक़त और सीमाएँ

पक्षक्या हैआधार
ताक़तसिविल न्यायालय की शक्तियाँ: समन, शपथ, दस्तावेज़, शपथपत्रधारा 13
ताक़तजेल और संरक्षण-गृहों का दौराधारा 12(ग)
ताक़तअपने आप (suo motu) जाँचधारा 12(क)
ताक़तवार्षिक और विशेष रिपोर्ट विधानमंडल में रखी जाती हैं, कार्रवाई-ज्ञापन के साथधारा 28
सीमाआयोग की सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं; सरकार को केवल टिप्पणी और की गई कार्रवाई बतानी होती हैधारा 18
सीमाकेवल राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों से जुड़े उल्लंघनधारा 21(5)
सीमाजिस कृत्य से उल्लंघन हुआ, उसके एक वर्ष बाद जाँच नहींधारा 36(2)
सीमाजो मामला किसी अन्य आयोग के पास चल रहा हो, उसमें जाँच नहींधारा 21(5) का परंतुक, धारा 36(1)

विश्लेषण: 'बाध्यकारी न होना' ही आयोग की मुख्य कमज़ोरी मानी जाती है, पर प्रकाशन और विधानमंडल में रिपोर्ट रखने का दबाव सरकार पर नैतिक असर डालता है।

राष्ट्रीय और राज्य आयोग: एक नज़र में तुलना

राष्ट्रीय आयोग (NHRC)

अध्याय/धाराएँअध्याय II; धारा 3 से 11

नियुक्त करने वालाराष्ट्रपति

सिफ़ारिश करने वाली समितिप्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा अध्यक्ष, गृह मंत्री, लोकसभा और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष, राज्यसभा के उप-सभापति

अध्यक्ष की योग्यताभारत का मुख्य न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका

त्यागपत्र किसेराष्ट्रपति को

हटाने का आदेशराष्ट्रपति (उच्चतम न्यायालय की जाँच के बाद, या धारा 5(3) के आधारों पर)

कार्यकालतीन वर्ष या 70 वर्ष की आयु

रिपोर्ट किसेकेंद्र सरकार; संसद के पटल पर

मुख्यालयदिल्ली

राज्य आयोग (SHRC)

अध्याय/धाराएँअध्याय V; धारा 21 से 29

नियुक्त करने वालाराज्यपाल

सिफ़ारिश करने वाली समितिमुख्यमंत्री (अध्यक्ष), विधानसभा अध्यक्ष, गृह मंत्री, नेता प्रतिपक्ष (+ परिषद के दो पदाधिकारी, यदि परिषद हो)

अध्यक्ष की योग्यताउच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश रह चुका

त्यागपत्र किसेराज्यपाल को

हटाने का आदेशराष्ट्रपति (उच्चतम न्यायालय की जाँच के बाद, या धारा 23(2) के आधारों पर)

कार्यकालतीन वर्ष या 70 वर्ष की आयु

रिपोर्ट किसेराज्य सरकार; राज्य विधानमंडल के पटल पर

मुख्यालयराज्य सरकार की अधिसूचना से तय

शिकायत से सिफ़ारिश तक: जाँच का प्रवाह

  1. शिकायत या स्वतः संज्ञान

    पीड़ित, उसकी ओर से कोई व्यक्ति, न्यायालय का निर्देश, या आयोग स्वयं (धारा 12(क))

  2. समय-सीमा और क्षेत्राधिकार की जाँच

    कृत्य एक वर्ष के भीतर का हो; विषय राज्य/समवर्ती सूची का हो (धारा 21(5), 36)

  3. सरकार से रिपोर्ट

    संबंधित सरकार या प्राधिकारी से निर्धारित समय में रिपोर्ट (धारा 17)

  4. जाँच

    गवाह, दस्तावेज़, शपथपत्र; ज़रूरत पर जाँच-एजेंसी की सहायता (धारा 13, 14)

  5. सिफ़ारिश

    मुआवज़ा, अभियोजन या अन्य कार्रवाई, अंतरिम राहत (धारा 18)

  6. सरकार का उत्तर और प्रकाशन

    एक माह में टिप्पणी और की गई कार्रवाई; आयोग रिपोर्ट प्रकाशित करता है (धारा 18)

आयोग का फ़ैसला सरकार पर क़ानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होता; यही उसकी प्रमुख सीमा है।

एक नज़र में: राज्य मानवाधिकार आयोग

राज्य मानवाधिकार आयोग (धारा 21-29)

संरचना

  • अध्यक्ष + दो सदस्य
  • अध्यक्ष: HC के मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश रह चुके
  • सचिव: मुख्य कार्यकारी अधिकारी

नियुक्ति

  • राज्यपाल, अधिपत्र से
  • समिति: CM, अध्यक्ष, गृह मंत्री, नेता प्रतिपक्ष
  • वर्तमान न्यायाधीश: मुख्य न्यायाधीश से परामर्श

कार्यकाल

  • 3 वर्ष या 70 वर्ष की आयु
  • पुनर्नियुक्ति के पात्र
  • पद के बाद सरकारी नौकरी वर्जित

त्यागपत्र/हटाना

  • त्यागपत्र: राज्यपाल को
  • हटाना: राष्ट्रपति के आदेश से
  • SC की जाँच या धारा 23(2) के आधार

कार्य और शक्तियाँ

  • जाँच, जेल-दौरा, शोध, जागरूकता
  • सिविल न्यायालय की शक्तियाँ
  • सिफ़ारिश बाध्यकारी नहीं

मुख्य तथ्य

क़ानूनी आधार
मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (अधिनियम 10/1994); 28-9-1993 से प्रवृत्त माना गया
संशोधन
अधिनियम 19/2019; लोकसभा 19 जुलाई, राज्यसभा 22 जुलाई 2019 को पारित; 2-8-2019 से प्रभावी
राज्य आयोग का गठन
धारा 21(1): राज्य सरकार गठित कर सकती है
संख्या
अध्यक्ष + दो सदस्य (धारा 21(2))
नियुक्ति
राज्यपाल; समिति: मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, गृह मंत्री, नेता प्रतिपक्ष
कार्यकाल
3 वर्ष या 70 वर्ष की आयु, जो पहले हो; पुनर्नियुक्ति के पात्र (2019 से)
त्यागपत्र
राज्यपाल को लिखित सूचना (धारा 23(1))
हटाना
राष्ट्रपति का आदेश; सिद्ध कदाचार/अक्षमता पर उच्चतम न्यायालय की जाँच के बाद, या धारा 23(2) के आधारों पर
जाँच की समय-सीमा
कृत्य के एक वर्ष बाद नहीं (धारा 36(2))
राजस्थान आयोग का मुख्यालय
जयपुर (आयोग की आधिकारिक वेबसाइट)

राजस्थान का पहलू

राजस्थान में राज्य मानवाधिकार आयोग अधिनियम की धारा 21 के अंतर्गत गठित है और उसका मुख्यालय जयपुर में है (राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग की वेबसाइट)। राजस्थान विधानसभा एक-सदनीय है, इसलिए नियुक्ति-समिति चार सदस्यों की बनती है: मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, गृह मंत्री और नेता प्रतिपक्ष (विश्लेषण, अनुच्छेद 168(1) और धारा 22 के आधार पर)। अध्यक्ष और सदस्यों के नाम समय के साथ बदलते हैं, इसलिए पदधारकों के नाम रटने के बजाय परीक्षा से पहले आयोग की वेबसाइट देख लें।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • "राज्यपाल सदस्य को हटाता है" लिखना: ग़लत। नियुक्ति और त्यागपत्र राज्यपाल के पास हैं, पर हटाने का आदेश राष्ट्रपति देता है।
  • कार्यकाल पाँच वर्ष लिखना: 2019 के संशोधन के बाद तीन वर्ष (या 70 वर्ष की आयु) है। अध्यक्ष और सदस्य दोनों पुनर्नियुक्ति के पात्र हैं।
  • अध्यक्ष के लिए केवल "मुख्य न्यायाधीश" लिखना: अब उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका व्यक्ति भी पात्र है।
  • राज्यपाल की नियुक्ति को स्वविवेक की बताना: नियुक्ति समिति की सिफ़ारिश के बाद ही होती है, जिसमें नेता प्रतिपक्ष भी है।
  • राज्य आयोग और राष्ट्रीय आयोग को मिला देना: नियुक्त करने वाला (राष्ट्रपति बनाम राज्यपाल), समिति, सदस्यों की संख्या और महिला सदस्य की अनिवार्यता (2019 से केवल राष्ट्रीय आयोग में) अलग हैं।
  • आयोग की सिफ़ारिशों को बाध्यकारी या आयोग को संवैधानिक निकाय बताना: दोनों बातें ग़लत हैं।
  • आयोग को सभी विषयों पर जाँच का अधिकार बताना: केवल राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों तक, और एक वर्ष की सीमा के भीतर।