संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग
संघ लोक सेवा आयोग का गठन, नियुक्ति, कार्यकाल, हटाना, कार्य और स्वतंत्रता के रक्षोपाय, और अनुच्छेद 315 से 323 के साथ राज्य लोक सेवा आयोग (RPSC जैसे) की संक्षिप्त तस्वीर, उत्तर-लेखन की दृष्टि से।
- अनुच्छेद 315 से 323
- UPSC
- राज्य लोक सेवा आयोग
- अनुच्छेद 320
- स्वतंत्रता के रक्षोपाय
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II: "Union Government and Administrative Institutions. Institutions: UPSC, Election Commission of India, C&AG, Finance Commission, Lokpal, NITI Aayog." राज्य लोक सेवा आयोग का नाम सिलेबस में अलग से नहीं है, पर 2023 के पेपर में अनुच्छेद 315 पर राज्य आयोग का प्रश्न आया, इसलिए इस पृष्ठ पर राज्य आयोग भी अनुच्छेद 315 से 323 के साथ संक्षेप में दिया गया है।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- 2023 के पेपर III में 5 अंक (50 शब्द) का प्रश्न आया: अनुच्छेद 315 के अंतर्गत राज्य लोक सेवा आयोग के प्रावधान। यानी राज्य आयोग का उत्तर भी संघ आयोग के अनुच्छेदों से ही बनता है, इसलिए दोनों को साथ पढ़िए।
- यह पूरा विषय नौ अनुच्छेदों (315 से 323) की सीधी पढ़ाई है। नियुक्ति (316), हटाना (317), सेवा-शर्तें (318), पद के बाद रोक (319), कार्य (320), अतिरिक्त कार्य (321), व्यय (322) और प्रतिवेदन (323): हर अनुच्छेद एक सवाल बन सकता है।
- सबसे ज़्यादा अंक वहाँ कटते हैं जहाँ संघ और राज्य आयोग की बातें गडमड होती हैं: आयु-सीमा (65 बनाम 62), नियुक्त करने वाला (राष्ट्रपति बनाम राज्यपाल) और हटाने का अधिकार (दोनों में राष्ट्रपति)। नीचे की तुलना-तालिका इसी के लिए है।
पहले सरल भाषा में: भर्ती का निष्पक्ष अंपायर
कल्पना कीजिए कि राज्य के हर विभाग में नौकरी देने का अधिकार सीधे मंत्री या विभाग के पास हो। तब सिफ़ारिश, रिश्तेदारी या राजनीतिक वफ़ादारी से भर्ती होने की आशंका बढ़ेगी, और अच्छे अभ्यर्थी का मौक़ा चला जाएगा। इसलिए संविधान ने भर्ती और सेवा-संबंधी कुछ बड़े मामलों के लिए एक स्वतंत्र निकाय बनाया, जो परीक्षा लेता है और सरकार को योग्यता के आधार पर सलाह देता है। यही लोक सेवा आयोग है। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया उदाहरण है; तर्क विश्लेषण है।)
परीक्षा के लिए सटीक परिभाषा: लोक सेवा आयोग (Public Service Commission) संविधान के भाग XIV के अध्याय II (अनुच्छेद 315 से 323) में वर्णित संवैधानिक निकाय हैं। संघ के लिए संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) होता है और प्रत्येक राज्य के लिए राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC); दोनों संघ या राज्य की सेवाओं के लिए परीक्षा आयोजित करते हैं और भर्ती, पदोन्नति और अनुशासन जैसे विषयों पर सरकार को परामर्श देते हैं।
संक्षिप्त इतिहास: 1926 से 1950
UPSC की आधिकारिक इतिहास-पुस्तिका के अनुसार भारत में पहला लोक सेवा आयोग 1 अक्टूबर 1926 को बना। इसकी पृष्ठभूमि थी भारत सरकार अधिनियम, 1919 की धारा 96(C) और 1924 की ली आयोग की सिफ़ारिश कि वैधानिक लोक सेवा आयोग बिना देरी स्थापित हो। उस आयोग में अध्यक्ष के अलावा चार सदस्य थे और पहले अध्यक्ष ब्रिटेन की गृह सिविल सेवा के सदस्य सर रॉस बार्कर थे। उसके कार्य अधिनियम में नहीं, बल्कि 1926 के लोक सेवा आयोग (कार्य) नियमों से तय होते थे।
भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने संघ के लिए संघीय लोक सेवा आयोग और प्रांतों के लिए प्रांतीय आयोगों की व्यवस्था की; 1 अप्रैल 1937 को यह लागू होने पर लोक सेवा आयोग संघीय लोक सेवा आयोग बन गया। संविधान लागू होने के दिन, 26 जनवरी 1950 से, यह संघ लोक सेवा आयोग कहलाया, और अनुच्छेद 378(1) के अनुसार संघीय आयोग के अध्यक्ष और सदस्य ही UPSC के अध्यक्ष और सदस्य बन गए।
समय-रेखा: लोक सेवा आयोग का विकास
1924
ली आयोग की रिपोर्ट: वैधानिक लोक सेवा आयोग शीघ्र बने
1 अक्टूबर 1926
भारत का पहला लोक सेवा आयोग (अध्यक्ष + 4 सदस्य; पहले अध्यक्ष सर रॉस बार्कर)
1 अप्रैल 1937
भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत संघीय लोक सेवा आयोग
26 जनवरी 1950
संविधान लागू; संघ लोक सेवा आयोग; अनुच्छेद 378(1) से सदस्यों की निरंतरता
अनुच्छेद 315: संघ, राज्य और संयुक्त आयोग (2023 के प्रश्न का आधार)
अनुच्छेद 315(1): संघ के लिए एक लोक सेवा आयोग और प्रत्येक राज्य के लिए एक लोक सेवा आयोग होगा। यानी राजस्थान के लिए अलग आयोग का होना संवैधानिक अपेक्षा है, राज्य की मर्ज़ी नहीं। 315(2): दो या अधिक राज्य चाहें तो एक ही आयोग साझा कर सकते हैं; इसके लिए हर राज्य के विधानमंडल का (दो सदन हों तो हर सदन का) प्रस्ताव चाहिए, और तब संसद क़ानून बनाकर संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग (Joint Commission) बना सकती है। 315(3): ऐसा क़ानून आवश्यक आनुषंगिक उपबंध रख सकता है।
315(4): यदि राज्य का राज्यपाल अनुरोध करे तो UPSC, राष्ट्रपति की स्वीकृति से, राज्य की सभी या कुछ ज़रूरतें पूरी करने को सहमत हो सकता है। 315(5): संविधान में जहाँ भी UPSC या राज्य लोक सेवा आयोग का उल्लेख है, उसका अर्थ संबंधित मामले में संघ या राज्य की सेवा करने वाला आयोग समझा जाएगा।
अनुच्छेद 315 से 323: एक नज़र में
| अनुच्छेद | विषय | मुख्य बात |
|---|---|---|
| 315 | संघ और राज्यों के लिए आयोग | संघ का UPSC; प्रत्येक राज्य का आयोग; संयुक्त आयोग संभव; UPSC राज्य की सेवा भी कर सकता है |
| 316 | नियुक्ति और कार्यकाल | संघ/संयुक्त: राष्ट्रपति; राज्य: राज्यपाल; छह वर्ष या आयु-सीमा; पुनर्नियुक्ति वर्जित |
| 317 | हटाना और निलंबन | राष्ट्रपति का आदेश; सिद्ध कदाचार पर उच्चतम न्यायालय की जाँच के बाद |
| 318 | संख्या और सेवा-शर्तें | राष्ट्रपति/राज्यपाल के विनियम; नियुक्ति के बाद नुक़सान की दिशा में नहीं |
| 319 | पद के बाद नियोजन पर रोक | UPSC अध्यक्ष: आगे कोई सरकारी नियोजन नहीं; अन्य सदस्यों को सीमित पदोन्नतियाँ |
| 320 | कार्य | परीक्षाएँ; भर्ती, पदोन्नति, अनुशासन आदि पर परामर्श |
| 321 | अतिरिक्त कार्य | संसद/राज्य विधानमंडल के क़ानून से, स्थानीय निकायों आदि के लिए भी |
| 322 | व्यय | संघ/राज्य की संचित निधि पर भारित |
| 323 | प्रतिवेदन | वार्षिक प्रतिवेदन; असहमति पर कारणों का ज्ञापन, विधायिका में रखा जाता है |
नियुक्ति, कार्यकाल और पद के बाद की रोक (अनुच्छेद 316, 318, 319)
नियुक्ति: UPSC और संयुक्त आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है; राज्य आयोग के राज्यपाल। संविधान सदस्यों की संख्या नहीं बताता; अनुच्छेद 318 के अनुसार संख्या और सेवा-शर्तें राष्ट्रपति (संघ) या राज्यपाल (राज्य) विनियमों से तय करते हैं। UPSC की आधिकारिक वेबसाइट पर 15 मई 2025 की स्थिति में अध्यक्ष सहित नौ पदधारक सूचीबद्ध हैं; यह संख्या समय के साथ बदल सकती है, इसलिए उत्तर में संख्या रटकर न लिखें।
एक विशेष शर्त: हर आयोग में लगभग आधे सदस्य ऐसे होने चाहिए जिन्होंने नियुक्ति की तारीख़ तक कम-से-कम दस वर्ष भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन पद धारण किया हो (अनुच्छेद 316(1) का परंतुक)। इसका उद्देश्य है कि आयोग में प्रशासन का अनुभव रखने वाले लोग हों, और बाक़ी सदस्य बाहर के क्षेत्रों से आकर निष्पक्षता लाएँ (विश्लेषण)। अध्यक्ष का पद ख़ाली हो या वह अनुपस्थित हो, तो राष्ट्रपति (संघ) या राज्यपाल (राज्य) किसी अन्य सदस्य से अध्यक्ष का कार्य करवा सकता है (316(1A))।
कार्यकाल: सदस्य छह वर्ष के लिए या आयु-सीमा तक, जो पहले आए। आयु-सीमा संघ आयोग में 65 वर्ष है और राज्य या संयुक्त आयोग में 62 वर्ष (राज्य आयोग की सीमा पहले 60 वर्ष थी, 1976 के 41वें संशोधन से 62 वर्ष हुई)। सदस्य राष्ट्रपति (संघ/संयुक्त) या राज्यपाल (राज्य) को लिखित सूचना देकर इस्तीफ़ा दे सकता है। कार्यकाल पूरा होने पर वह उसी पद पर पुनर्नियुक्ति के लिए अयोग्य होता है (316(3))।
पद के बाद की रोक (अनुच्छेद 319) आयोग को आगे की नौकरी के लालच से बचाती है। UPSC का अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन कोई नियोजन नहीं ले सकता। राज्य आयोग का अध्यक्ष UPSC का अध्यक्ष या सदस्य, या किसी अन्य राज्य आयोग का अध्यक्ष बन सकता है, पर कोई अन्य सरकारी नौकरी नहीं। UPSC का कोई अन्य सदस्य UPSC का अध्यक्ष या किसी राज्य आयोग का अध्यक्ष बन सकता है; राज्य आयोग का अन्य सदस्य UPSC का अध्यक्ष या सदस्य, या उसी या किसी अन्य राज्य आयोग का अध्यक्ष बन सकता है।
हटाना और निलंबन (अनुच्छेद 317)
सबसे बड़ी चूक यहाँ होती है: राज्य आयोग का सदस्य राज्यपाल नियुक्त करता है, पर हटाने का आदेश राष्ट्रपति देता है, और यह नियम संघ और राज्य दोनों आयोगों पर लागू है। दो रास्ते हैं। पहला, कदाचार (misbehaviour) के आधार पर: राष्ट्रपति मामला उच्चतम न्यायालय को भेजता है, न्यायालय अनुच्छेद 145 के अंतर्गत तय प्रक्रिया से जाँच करके रिपोर्ट देता है कि व्यक्ति को हटाया जाना चाहिए, और तभी राष्ट्रपति आदेश देता है (317(1))। इस बीच जिस सदस्य के विरुद्ध संदर्भ गया है, उसे राष्ट्रपति (संघ/संयुक्त आयोग) या राज्यपाल (राज्य आयोग) निलंबित कर सकता है (317(2))।
दूसरा रास्ता: कुछ आधारों पर राष्ट्रपति सीधे आदेश से हटा सकता है, बिना उच्चतम न्यायालय की जाँच के (317(3)): वह दिवालिया घोषित हो, पद के दौरान कर्तव्यों से बाहर कोई सवेतन नौकरी करे, या राष्ट्रपति की राय में शारीरिक या मानसिक अक्षमता के कारण पद पर बने रहने के योग्य न रहे। इसके अलावा 317(4) के अनुसार यदि सदस्य सरकार के किसी अनुबंध या समझौते से हित या लाभ लेता है (किसी निगमित कंपनी के अन्य सदस्यों की तरह सामान्य अंश को छोड़कर), तो उसे कदाचार माना जाएगा।
कार्य: अनुच्छेद 320, 321, 322, 323
अनुच्छेद 320(1): संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों का कर्तव्य है कि वे क्रमशः संघ और राज्य की सेवाओं में नियुक्ति के लिए परीक्षाएँ लें। 320(2): यदि दो या अधिक राज्य अनुरोध करें तो UPSC उन्हें ऐसी सेवाओं के लिए संयुक्त भर्ती की योजना बनाने और चलाने में सहायता देता है, जिनके लिए विशेष योग्यता वाले उम्मीदवार चाहिए।
320(3): आयोग से परामर्श लिया जाएगा: (क) सिविल सेवाओं और पदों में भर्ती की पद्धति पर; (ख) नियुक्ति, पदोन्नति और एक सेवा से दूसरी में स्थानांतरण के सिद्धांतों और उम्मीदवारों की उपयुक्तता पर; (ग) सरकार के अधीन सिविल क्षमता में कार्यरत व्यक्ति को प्रभावित करने वाले सभी अनुशासनिक मामलों पर, उनके ज्ञापनों और याचिकाओं सहित; (घ) कर्तव्य-पालन में की गई कार्रवाई के लिए चले मुक़दमे में हुए ख़र्च संचित निधि से देने के दावों पर; (ङ) सेवा में लगी चोट के लिए पेंशन के दावों और उसकी राशि पर। राष्ट्रपति या राज्यपाल जो और मामले भेजें, उन पर भी सलाह देना आयोग का कर्तव्य है।
दो अपवाद ध्यान रखें। एक, राष्ट्रपति (संघ) या राज्यपाल (राज्य) विनियम बनाकर बता सकते हैं कि किन मामलों में आयोग से परामर्श आवश्यक नहीं होगा (320(3) का परंतुक); ऐसे विनियमों को संसद या विधानमंडल के सामने कम-से-कम चौदह दिन रखना होता है और वे उनके संशोधन के अधीन हैं (320(5))। दो, अनुच्छेद 16(4) (पिछड़े वर्ग के पदों में आरक्षण) और अनुच्छेद 335 (अनुसूचित जाति/जनजाति के दावे) के बारे में परामर्श आवश्यक नहीं (320(4))। UPSC की आधिकारिक कार्य-सूची में अनुच्छेद 320 के अंतर्गत परीक्षा, साक्षात्कार से सीधी भर्ती, पदोन्नति/प्रतिनियुक्ति/समावेशन पर नियुक्ति, भर्ती-नियमों का निर्माण और संशोधन, अनुशासनिक मामले और राष्ट्रपति द्वारा भेजे मामलों पर परामर्श गिनाया गया है।
अनुच्छेद 321: संसद (या राज्य विधानमंडल) क़ानून बनाकर आयोग को अतिरिक्त कार्य दे सकती है, जिसमें स्थानीय प्राधिकारी या अन्य निगमित निकाय की सेवाएँ भी आती हैं। अनुच्छेद 322: आयोग का सारा व्यय, सदस्यों और कर्मचारियों के वेतन, भत्ते, पेंशन सहित, संघ या राज्य की संचित निधि पर भारित है। अनुच्छेद 323: UPSC हर वर्ष राष्ट्रपति को अपने कार्य का प्रतिवेदन देता है; राष्ट्रपति उसे, उन मामलों में जहाँ आयोग की सलाह नहीं मानी गई, कारणों के ज्ञापन के साथ संसद के प्रत्येक सदन में रखवाता है। राज्य आयोग का प्रतिवेदन राज्यपाल को जाता है और वह उसे इसी तरह राज्य विधानमंडल में रखवाता है।
संघ और राज्य लोक सेवा आयोग: तुलना
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC)
अनुच्छेद315 से 323
नियुक्तिराष्ट्रपति
आयु-सीमा65 वर्ष
कार्यकालछह वर्ष या आयु-सीमा तक, जो पहले
त्यागपत्र किसेराष्ट्रपति को
हटाने का आदेशराष्ट्रपति
निलंबनराष्ट्रपति
संख्या/सेवा-शर्तें तय करने वालाराष्ट्रपति (विनियम)
परीक्षाएँ किसकी सेवाओं के लिएसंघ की सेवाएँ
व्यय किस निधि परभारत की संचित निधि
प्रतिवेदन किसेराष्ट्रपति; फिर संसद में
पद के बादअध्यक्ष: कोई सरकारी नियोजन नहीं
राज्य लोक सेवा आयोग
अनुच्छेद315 से 323 (वही अध्याय)
नियुक्तिराज्यपाल
आयु-सीमा62 वर्ष
कार्यकालछह वर्ष या आयु-सीमा तक, जो पहले
त्यागपत्र किसेराज्यपाल को
हटाने का आदेशराष्ट्रपति
निलंबनराज्यपाल
संख्या/सेवा-शर्तें तय करने वालाराज्यपाल (विनियम)
परीक्षाएँ किसकी सेवाओं के लिएराज्य की सेवाएँ
व्यय किस निधि परराज्य की संचित निधि
प्रतिवेदन किसेराज्यपाल; फिर राज्य विधानमंडल में
पद के बादअध्यक्ष: UPSC अध्यक्ष/सदस्य या अन्य राज्य आयोग का अध्यक्ष बन सकता है
स्वतंत्रता के रक्षोपाय: कौन-सा अनुच्छेद क्या बचाता है
| सुरक्षा | अनुच्छेद | कैसे स्वतंत्रता देती है (विश्लेषण) |
|---|---|---|
| नियुक्ति राष्ट्रपति/राज्यपाल करते हैं, मंत्री नहीं | 316(1) | सीधा विभागीय या दलगत नियंत्रण नहीं (व्यवहार में सलाह मंत्रिपरिषद की) |
| हटाने के लिए उच्चतम न्यायालय की जाँच | 317(1) | सरकार अपनी मर्ज़ी से नहीं हटा सकती |
| सेवा-शर्तें नुक़सान की दिशा में नहीं | 318 का परंतुक | सरकार दबाव में वेतन-भत्ते घटा नहीं सकती |
| पद के बाद सरकारी नौकरी पर रोक | 319 | आगे नौकरी के लालच में निर्णय प्रभावित नहीं होता |
| पुनर्नियुक्ति वर्जित | 316(3) | कार्यकाल बढ़वाने के लिए सरकार को ख़ुश रखने की ज़रूरत नहीं |
| व्यय संचित निधि पर भारित | 322 | आयोग को धन के लिए सरकार की मर्ज़ी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता |
| आधे सदस्य दस वर्ष के सरकारी अनुभव वाले | 316(1) का परंतुक | प्रशासनिक अनुभव और बाहरी निष्पक्षता का संतुलन |
| वार्षिक प्रतिवेदन और असहमति का ज्ञापन | 323 | सरकार को सलाह न मानने पर विधायिका के सामने कारण देने पड़ते हैं |
अनुच्छेद संख्याएँ संविधान से; तीसरा स्तंभ विश्लेषण है।
एक नज़र में: लोक सेवा आयोग (अनुच्छेद 315-323)
लोक सेवा आयोग (315-323)
प्रकार (315)
- संघ: UPSC
- राज्य: प्रत्येक राज्य का आयोग
- संयुक्त: विधानमंडलों के प्रस्ताव + संसद का क़ानून
- UPSC राज्य की सेवा भी कर सकता है
नियुक्ति और कार्यकाल (316)
- राष्ट्रपति / राज्यपाल
- लगभग आधे सदस्य 10 वर्ष सरकारी सेवा वाले
- 6 वर्ष या आयु: 65 / 62
- पुनर्नियुक्ति वर्जित
हटाना (317)
- राष्ट्रपति का आदेश
- कदाचार: SC की जाँच के बाद
- दिवालिया, बाहरी नौकरी, अक्षमता: सीधे
- निलंबन: राज्यपाल (राज्य आयोग)
कार्य (320-323)
- परीक्षा और सलाह
- अतिरिक्त कार्य: क़ानून से
- व्यय: संचित निधि पर भारित
- प्रतिवेदन: विधायिका में
मुख्य तथ्य
- अध्याय और अनुच्छेद
- भाग XIV, अध्याय II: अनुच्छेद 315 से 323
- पहला लोक सेवा आयोग
- 1 अक्टूबर 1926
- संघीय लोक सेवा आयोग
- 1 अप्रैल 1937 (भारत सरकार अधिनियम 1935)
- UPSC नाम
- 26 जनवरी 1950 (संविधान लागू; अनुच्छेद 378(1))
- कार्यकाल
- 6 वर्ष या आयु-सीमा; संघ 65, राज्य/संयुक्त 62 वर्ष (अनुच्छेद 316(2))
- नियुक्ति
- राष्ट्रपति (संघ/संयुक्त); राज्यपाल (राज्य)
- हटाना
- राष्ट्रपति का आदेश; कदाचार पर उच्चतम न्यायालय की जाँच के बाद (अनुच्छेद 317)
- व्यय
- संघ/राज्य की संचित निधि पर भारित (अनुच्छेद 322)
- UPSC की संख्या
- संविधान में तय नहीं (अनुच्छेद 318); 15-5-2025 की सूची में अध्यक्ष सहित 9
- अनुच्छेद 320(3)(ग) का स्वरूप
- बाध्यकारी नहीं: मनबोधन लाल श्रीवास्तव, 20-9-1957
राजस्थान का पहलू
राजस्थान के लिए राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) अनुच्छेद 315(1) के अंतर्गत राज्य का लोक सेवा आयोग है: उसके अध्यक्ष और सदस्यों को राजस्थान का राज्यपाल नियुक्त करता है (अनुच्छेद 316(1)), वह राज्य की सेवाओं के लिए परीक्षाएँ लेता है (अनुच्छेद 320(1)), और उसका वार्षिक प्रतिवेदन राज्यपाल के माध्यम से राजस्थान विधानमंडल में रखा जाता है (अनुच्छेद 323(2))। आयोग के सदस्यों की संख्या, नाम और अन्य ब्योरे समय के साथ बदलते हैं, इसलिए उत्तर में केवल संवैधानिक ढाँचा लिखें।
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- "राज्य आयोग के सदस्य को राज्यपाल हटाता है" लिखना: ग़लत। राज्यपाल नियुक्त करता है और राज्य आयोग के सदस्य को निलंबित भी कर सकता है, पर हटाने का आदेश राष्ट्रपति देता है (अनुच्छेद 317)।
- आयु-सीमा में गड़बड़ी: UPSC में 65 वर्ष, राज्य और संयुक्त आयोग में 62 वर्ष। कार्यकाल "छह वर्ष या आयु-सीमा, जो पहले" है।
- आयोग की सलाह को बाध्यकारी बताना: यह परामर्शी है। मनबोधन लाल (1957) में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 320(3)(ग) को बाध्यकारी नहीं माना, और अनुच्छेद 323 केवल कारण-ज्ञापन माँगता है।
- "पुनर्नियुक्ति वर्जित" का ग़लत अर्थ: अनुच्छेद 316(3) उसी पद पर पुनर्नियुक्ति रोकता है; अनुच्छेद 319 कुछ अन्य आयोग-पदों पर नियुक्ति की छूट देता है।
- अनुच्छेद 315(2) और 315(4) को मिलाना: (2) संयुक्त आयोग है, जो दो या अधिक राज्यों के प्रस्तावों पर संसद के क़ानून से बनता है; (4) UPSC का राज्य की सेवा करना है, जो राज्यपाल के अनुरोध और राष्ट्रपति की स्वीकृति से होता है।
- यह लिखना कि संविधान आयोग के सदस्यों की संख्या तय करता है: संख्या और सेवा-शर्तें अनुच्छेद 318 के विनियमों से तय होती हैं।
- संघ और राज्य आयोग की परीक्षाओं का क्षेत्र मिलाना: UPSC संघ की सेवाओं के लिए, राज्य आयोग राज्य की सेवाओं के लिए (अनुच्छेद 320(1))।
कार्य-उदाहरण: कार्यकाल की गणना (कल्पित सदस्य)
हल सहित उदाहरणछह वर्ष या आयु-सीमा, जो पहले हो
दिया है
- यह उदाहरण समझाने के लिए गढ़ा गया है; सदस्य और आयु काल्पनिक हैं।
- अनुच्छेद 316(2): कार्यकाल छह वर्ष या आयु-सीमा तक, जो पहले आए। आयु-सीमा: UPSC में 65 वर्ष, राज्य आयोग में 62 वर्ष।
- 1सदस्य A: राज्य आयोग, नियुक्ति के समय 58 वर्ष छह वर्ष पूरे होने पर आयु 64 वर्ष होती, पर राज्य आयोग की सीमा 62 वर्ष है। 62 वर्ष लगभग 4 वर्ष बाद पूरे होते हैं, इसलिए कार्यकाल लगभग 4 वर्ष का रहेगा।
- 2सदस्य B: UPSC, नियुक्ति के समय 55 वर्ष छह वर्ष बाद आयु 61 वर्ष होगी, जो 65 की सीमा से नीचे है। इसलिए पूरे 6 वर्ष का कार्यकाल मिलेगा।
- 3सदस्य C: UPSC, नियुक्ति के समय 62 वर्ष छह वर्ष बाद आयु 68 वर्ष होती, पर 65 की सीमा लगभग 3 वर्ष में आ जाएगी। कार्यकाल लगभग 3 वर्ष का रहेगा।
- 4पुनर्नियुक्ति A, B और C में से कोई भी अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद उसी आयोग के सदस्य पद पर पुनर्नियुक्त नहीं हो सकता (316(3)); हाँ, अनुच्छेद 319 के अनुसार कुछ अन्य आयोग-पदों पर नियुक्ति संभव है।
निष्कर्ष: सूत्र: कार्यकाल = न्यूनतम (6 वर्ष, आयु-सीमा तक बचे वर्ष)। उत्तर में यह वाक्य लिखने से आयु-सीमा (65 बनाम 62) का अंतर अपने आप स्पष्ट हो जाता है।
केस स्टडी: उत्तर प्रदेश राज्य बनाम मनबोधन लाल श्रीवास्तव (1957)
केस स्टडीक्या आयोग से परामर्श न करना सरकारी कार्रवाई को अवैध बना देता है?
उत्तर प्रदेश सरकार के एक कर्मचारी के विरुद्ध निजी हित और सार्वजनिक कर्तव्य के टकराव पर विभागीय जाँच हुई। अनुच्छेद 311(2) के अंतर्गत उसे पदावनति और अनिवार्य सेवानिवृत्ति का कारण-बताओ नोटिस मिला। इस बीच सरकार ने राज्य लोक सेवा आयोग से सलाह ली, पर आयोग को कर्मचारी का दूसरा लिखित स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। उच्च न्यायालय ने सरकार का आदेश इसी आधार पर अवैध माना कि अनुच्छेद 320(3)(ग) का पूरा पालन नहीं हुआ। अपील सर्वोच्च न्यायालय पहुँची, जिसने 20 सितंबर 1957 को निर्णय दिया।
- मुख्य निर्णय
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 320(3)(ग) के प्रावधान अनिवार्य (mandatory) नहीं हैं और वे लोक सेवक को कोई अधिकार नहीं देते।
- परिणाम
- इसलिए परामर्श का न होना, या उसमें कोई अनियमितता, लोक सेवक को अदालत में मुक़दमा करने का आधार नहीं देती।
- अनुच्छेद 311 से संबंध
- न्यायालय ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 311 अनुच्छेद 320 से नियंत्रित नहीं होता, यानी लोक सेवक के संरक्षण का स्रोत अनुच्छेद 311 है, आयोग से परामर्श नहीं।
सीख
लोक सेवा आयोग की भूमिका परामर्शी (advisory) है, बाध्यकारी नहीं। सरकार सलाह न माने तो अनुच्छेद 323 के अंतर्गत विधायिका के सामने कारण-ज्ञापन रखना राजनीतिक जवाबदेही बनाता है, क़ानूनी बाध्यता नहीं। उत्तर में "परामर्शी, पर नैतिक वज़न वाला" लिखना अंक देता है।
पिछले वर्षों के प्रश्न (हल सहित)
2023RAS मुख्य परीक्षापेपर III5 अंक
Art 315: State Public Service Commission provisions
आदर्श उत्तर
अनुच्छेद 315: प्रत्येक राज्य के लिए राज्य लोक सेवा आयोग होगा। दो या अधिक राज्य अपने विधानमंडलों के प्रस्तावों पर संसद के क़ानून से संयुक्त आयोग बना सकते हैं। राज्यपाल के अनुरोध और राष्ट्रपति की स्वीकृति से UPSC राज्य की ज़रूरतें भी पूरी कर सकता है। सदस्यों को राज्यपाल नियुक्त करता है (316)।
अभ्यास प्रश्न (हमारे अपने)
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
लोक सेवा आयोग के सदस्य का कार्यकाल क्या है?
आदर्श उत्तर
छह वर्ष या आयु-सीमा (संघ में 65, राज्य में 62 वर्ष) तक, जो पहले आए; पुनर्नियुक्ति वर्जित।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य को पद से कैसे हटाया जाता है?
आदर्श उत्तर
सदस्य को राष्ट्रपति हटाता है, राज्यपाल नहीं। कदाचार पर राष्ट्रपति मामला उच्चतम न्यायालय को भेजता है और जाँच-रिपोर्ट के बाद आदेश देता है; इस बीच राज्यपाल सदस्य को निलंबित कर सकता है। दिवालिया होने, बाहरी सवेतन नौकरी या शारीरिक-मानसिक अक्षमता पर राष्ट्रपति सीधे हटा सकता है (अनुच्छेद 317)।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोग में चार अंतर बताइए।
आदर्श उत्तर
UPSC के सदस्यों को राष्ट्रपति नियुक्त करता है, राज्य आयोग के सदस्यों को राज्यपाल। UPSC में आयु-सीमा 65 वर्ष है, राज्य आयोग में 62। UPSC संघ की सेवाओं के लिए परीक्षा लेता है, राज्य आयोग राज्य की। UPSC का प्रतिवेदन संसद में रखा जाता है, राज्य आयोग का राज्य विधानमंडल में।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
अनुच्छेद 320 के अंतर्गत लोक सेवा आयोगों के कार्यों और उनकी परामर्शी प्रकृति की विवेचना कीजिए।
आदर्श उत्तर
अनुच्छेद 320 के अनुसार संघ और राज्य लोक सेवा आयोग संबंधित सेवाओं के लिए परीक्षाएँ लेते हैं। उनसे सिविल सेवाओं में भर्ती की पद्धति, नियुक्ति-पदोन्नति के सिद्धांतों, अनुशासनिक मामलों, मुक़दमे के ख़र्च और पेंशन-दावों पर परामर्श लिया जाता है, और राष्ट्रपति या राज्यपाल जो अन्य मामले भेजें उन पर भी।
यह परामर्श बाध्यकारी नहीं है। मनबोधन लाल श्रीवास्तव (1957) में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 320(3)(ग) को अनिवार्य नहीं माना। सरकार सलाह न माने तो अनुच्छेद 323 के अंतर्गत विधायिका के सामने कारण-ज्ञापन रखा जाता है। इसलिए आयोग की ताक़त क़ानूनी नहीं, नैतिक है।
उत्तर कैसे लिखें (10 अंक, 100 शब्द)
भूमिका
प्रश्न: "संघ लोक सेवा आयोग के कार्यों और उसकी स्वतंत्रता के संवैधानिक रक्षोपायों का मूल्यांकन कीजिए।" पहले वाक्य में अनुच्छेद 315 से 323 और आयोग का संवैधानिक दर्जा बताएँ; एक वाक्य में 1926 से 1950 तक का विकास जोड़ें।
मुख्य भाग
- कार्य (अनुच्छेद 320): परीक्षा; भर्ती पद्धति, पदोन्नति, अनुशासन और पेंशन आदि पर परामर्श; अतिरिक्त कार्य (321)
- रक्षोपाय: राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति; हटाने के लिए उच्चतम न्यायालय की जाँच (317); सेवा-शर्तें नुक़सान की दिशा में नहीं (318); पद के बाद रोक (319); व्यय संचित निधि पर (322)
- कार्यकाल: 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु; पुनर्नियुक्ति वर्जित; लगभग आधे सदस्य 10 वर्ष सरकारी अनुभव वाले
- सीमा: परामर्श बाध्यकारी नहीं (मनबोधन लाल, 1957); कुछ मामलों में परामर्श अनिवार्य नहीं (320(3) का परंतुक, 320(4))
- जवाबदेही: वार्षिक प्रतिवेदन और असहमति का कारण-ज्ञापन संसद में (323)
निष्कर्ष
निष्कर्ष: UPSC की स्वतंत्रता उसकी रचना में है, पर प्रभावशीलता सरकारों के सलाह मानने की परंपरा पर टिकी है; यही संस्थागत परंपरा योग्यता-आधारित भर्ती की रक्षा करती है।
अतिरिक्त मूल्य
- राज्य आयोग का एक वाक्य: अनुच्छेद 315(1) के अनुसार प्रत्येक राज्य का अपना आयोग (जैसे RPSC)
- 1926 का पहला आयोग और 1937 का संघीय आयोग एक पंक्ति में जोड़ें
- मनबोधन लाल (1957) का एक वाक्य: परामर्श अनिवार्य नहीं
त्वरित पुनरावृत्ति
- लोक सेवा आयोग: भाग XIV, अध्याय II, अनुच्छेद 315 से 323; संघ और प्रत्येक राज्य के लिए अलग आयोग (315(1)); संयुक्त आयोग संभव (315(2))
- UPSC राज्यपाल के अनुरोध और राष्ट्रपति की स्वीकृति से राज्य की ज़रूरतें भी पूरी कर सकता है (315(4))
- नियुक्ति: राष्ट्रपति (संघ/संयुक्त), राज्यपाल (राज्य); लगभग आधे सदस्य 10 वर्ष सरकारी अनुभव वाले (316)
- कार्यकाल 6 वर्ष या आयु-सीमा: UPSC 65, राज्य/संयुक्त 62; पुनर्नियुक्ति वर्जित (316(3))
- हटाना: राष्ट्रपति; कदाचार पर SC की जाँच के बाद; दिवालिया, बाहरी नौकरी, अक्षमता पर सीधे (317)
- निलंबन: राज्यपाल, राज्य आयोग के सदस्य का (317(2))
- संख्या/सेवा-शर्तें: विनियम (318); नुक़सान की दिशा में नहीं
- पद के बाद रोक (319): UPSC अध्यक्ष किसी सरकारी नियोजन के योग्य नहीं
- कार्य (320): परीक्षा; भर्ती-पदोन्नति-अनुशासन पर परामर्श; 320(4): अनुच्छेद 16(4) और 335 पर परामर्श नहीं
- व्यय संचित निधि पर भारित (322); वार्षिक प्रतिवेदन विधायिका में, कारण-ज्ञापन सहित (323)
- इतिहास: 1-10-1926 पहला आयोग; 1-4-1937 संघीय; 26-1-1950 UPSC; मनबोधन लाल (20-9-1957): परामर्श बाध्यकारी नहीं
याद रखने योग्य शब्द
- अनुच्छेद 315
- अनुच्छेद 316
- अनुच्छेद 317
- अनुच्छेद 320
- संयुक्त आयोग
- 65 और 62 वर्ष
- परामर्शी
- मनबोधन लाल