मुख्यमंत्री और राज्य मंत्रिपरिषद : अनुच्छेद 163 से 167, 15% सीमा और सामूहिक उत्तरदायित्व
राज्य की असली कार्यपालिका: मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद। अनुच्छेद 163 से 167, 91वें संशोधन की 15% सीमा, सामूहिक उत्तरदायित्व, दो वास्तविक सर्वोच्च न्यायालय मामले और राजस्थान की गणना, हल प्रश्नों के साथ।
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II, "राज्य : राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद, राज्य सचिवालय, मुख्य सचिव, निदेशालयों की भूमिका, पुलिस प्रशासन, राजस्व मंडल, राज्य निर्वाचन आयोग, राज्य मानवाधिकार आयोग, लोकायुक्त।" (मूल पाठ: State: Governor, Chief Minister, Council of Ministers, State Secretariat, Chief Secretary, role of Directorates, police administration, Revenue Board, State Election Commission, State Human Rights Commission, Lokayukta.) इस पेज में मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद पूरी तरह, तथा सचिवालय और मुख्य सचिव का संबंध संक्षेप में कवर है; बाक़ी पदों के अलग पेज हैं।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- उपलब्ध छह मुख्य परीक्षा पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में इस विषय से सीधे दो प्रश्न आए: 2016 में 10 अंक का "आलोचनात्मक मूल्यांकन" और 2023 में 5 अंक का "संवैधानिक कर्तव्य"। दोनों के लिए अनुच्छेद 163 से 167 का सटीक ज्ञान चाहिए।
- 2016 का प्रश्न "critically evaluate" वाला था: केवल शक्तियाँ गिनाने से पूरे अंक नहीं मिलते, पक्ष और सीमाएँ दोनों लिखनी होती हैं। इस पेज का तुलना-तालिका और आलोचना वाला हिस्सा इसी के लिए है।
- विश्लेषण: इस विषय से जुड़े तथ्य (15% सीमा, सामूहिक उत्तरदायित्व, शमशेर सिंह) राज्यपाल, केंद्र-राज्य संबंध और सचिवालय के प्रश्नों में भी काम आते हैं, इसलिए इसे इन पेजों के साथ जोड़कर पढ़ें।
पहले सरल भाषा में समझें
एक सहकारी समिति की कल्पना कीजिए। काग़ज़ों में अध्यक्ष के रूप में एक सम्मानित व्यक्ति का नाम है और हर आदेश पर उसी का नाम छपता है। पर रोज़ के फ़ैसले एक प्रबंध समिति लेती है, जिसका एक मुखिया होता है, और यह समिति साल में आम सभा के सामने अपने हर फ़ैसले का हिसाब देती है। अगर आम सभा भरोसा खो दे, तो पूरी समिति को हटना पड़ता है। राज्य सरकार का ढाँचा बिल्कुल ऐसा ही है। राज्यपाल "नाम के अध्यक्ष" हैं: अनुच्छेद 166(1) के अनुसार राज्य सरकार की सारी कार्यकारी कार्रवाई राज्यपाल के नाम से व्यक्त की जाती है। मुख्यमंत्री प्रबंध समिति के मुखिया हैं, मंत्रिपरिषद वह समिति है, और विधानसभा आम सभा है।
अब परीक्षा के लिए सटीक परिभाषा। मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) वह निकाय है जिसके शीर्ष पर मुख्यमंत्री होता है और जो राज्यपाल को उसके कार्यों में सहायता और सलाह देता है, उन कार्यों को छोड़कर जो संविधान के अनुसार राज्यपाल को अपने विवेक से करने हैं (अनुच्छेद 163(1))। यह परिषद राज्य की विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है (अनुच्छेद 164(2))। मुख्यमंत्री (Chief Minister) को राज्यपाल नियुक्त करता है (अनुच्छेद 164(1)); संविधान यह तय नहीं करता कि वह कौन होगा, पर सर्वोच्च न्यायालय ने शमशेर सिंह (1974) में कहा कि इस चुनाव में सबसे बड़ा विचार यह है कि वह सदन में बहुमत का विश्वास रखता हो।
अनुच्छेद 163 से 167 : एक नज़र
| अनुच्छेद | क्या कहता है | याद रखने का शब्द |
|---|---|---|
| 163(1) | मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद राज्यपाल को सहायता और सलाह देती है, केवल विवेकाधीन कार्यों को छोड़कर | सहायता और सलाह |
| 163(2)-(3) | विवेक का प्रश्न उठे तो राज्यपाल का निर्णय अंतिम; मंत्रियों ने क्या सलाह दी, इसकी जाँच न्यायालय में नहीं हो सकती | विवेक अंतिम; सलाह की जाँच नहीं |
| 164(1) | मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है; अन्य मंत्री मुख्यमंत्री की सलाह पर; सभी मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत | प्रसादपर्यंत |
| 164(1A) | कुल मंत्री (मुख्यमंत्री सहित) विधानसभा सदस्यों के 15% से अधिक नहीं; कम से कम 12 | 15% और न्यूनतम 12 |
| 164(1B) | दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य ठहरे दलबदलू सदस्य को अयोग्यता की अवधि में मंत्री नहीं बनाया जा सकता | दलबदल पर रोक |
| 164(2) | मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी | सामूहिक उत्तरदायित्व |
| 164(3)-(5) | राज्यपाल पद और गोपनीयता की शपथ दिलाता है; 6 माह तक विधानमंडल का सदस्य न बनने वाला मंत्री पद छोड़ता है; वेतन-भत्ते विधानमंडल के क़ानून से | शपथ; 6 माह; वेतन |
| 166 | कार्यकारी कार्रवाई राज्यपाल के नाम से; आदेशों का प्रमाणीकरण नियमों से; राज्यपाल कार्य-संचालन और मंत्रियों में कार्य-बँटवारे के नियम बनाता है | राज्यपाल का नाम; कार्य-नियम |
| 167 | मुख्यमंत्री का कर्तव्य: परिषद के निर्णय राज्यपाल को बताना, माँगी जानकारी देना, राज्यपाल के कहने पर मंत्री-स्तर का निर्णय परिषद के सामने रखना | सूचना देने के तीन कर्तव्य |
अनुच्छेद 164(1A) और 91वाँ संशोधन (2003): मंत्रिपरिषद का आकार
पहले संविधान में मंत्रियों की संख्या पर कोई सीमा नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि गठबंधन की राजनीति में कई राज्यों में बहुत बड़े मंत्रिमंडल बनने लगे और हर नाराज़ विधायक को मंत्री पद देकर मनाने का चलन बढ़ा। संविधान (91वाँ संशोधन) अधिनियम, 2003 ने अनुच्छेद 164 में खंड (1A) और (1B) जोड़े; ये 1 जनवरी 2004 से लागू हैं।
खंड (1A) की तीन बातें याद रखें। पहली: मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्रियों की कुल संख्या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। दूसरी: मुख्यमंत्री सहित संख्या 12 से कम नहीं होगी (इसीलिए बहुत छोटी विधानसभा वाले राज्य में 15% की गणना 12 से नीचे आए तो भी 12 मंत्री रह सकते हैं)। तीसरी: जिन राज्यों में उस समय संख्या सीमा से ऊपर थी, उन्हें राष्ट्रपति की अधिसूचित तिथि से 6 महीने में सीमा के भीतर आना था। इसी संशोधन से अनुच्छेद 75(1A) में केंद्र के लिए भी लोकसभा की सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत की सीमा तय हुई।
खंड (1B) दलबदल से जुड़ा है: दसवीं अनुसूची के पैरा 2 के तहत अयोग्य ठहराया गया सदस्य, जब तक उसकी अयोग्यता की अवधि चलती है (या वह फिर से निर्वाचित नहीं हो जाता, जो भी पहले हो), मंत्री नहीं बनाया जा सकता। इसी संशोधन ने अनुच्छेद 361B भी जोड़ा, जो अयोग्य ठहराए गए दलीय सदस्य को "लाभ का राजनीतिक पद" (remunerative political post) लेने से रोकता है।
आलोचना और सुधार का पक्ष: द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (15वीं रिपोर्ट, 2009) ने पाया कि मंत्रियों और विभागों की भीड़ से प्रशासनिक बिखराव होता है और 15% की सीमा के बावजूद बड़े राज्यों में बड़े मंत्रिमंडल बन रहे हैं। उसने सुझाव दिया कि सीमा 10 से 15 प्रतिशत के बीच ढाल पर तय हो (200 से अधिक सदस्यों वाली विधानसभा में 10%, 80 से 200 में 12%, 80 से कम में 15%) और इस पर अंतर-राज्य परिषद में सहमति बने। यह केवल सिफ़ारिश है; क़ानून आज भी 15% का ही है।
सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Responsibility)
अनुच्छेद 164(2) कहता है कि मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। इसे ऐसे समझिए जैसे क्रिकेट की टीम की हार या जीत: खिलाड़ी अलग-अलग खेलते हैं, पर नतीजा पूरी टीम का माना जाता है। परिषद में जो फ़ैसला हुआ, उसका बचाव हर मंत्री सदन में करता है; अगर विधानसभा का विश्वास परिषद से उठ जाए (अविश्वास प्रस्ताव पारित हो), तो पूरी परिषद को जाना होता है, किसी एक मंत्री को नहीं। विश्लेषण: व्यवहार में परंपरा यह भी है कि जो मंत्री परिषद के निर्णय से असहमत हो, वह या तो उसका सार्वजनिक बचाव करे या त्यागपत्र दे।
इसका एक पूरक पहलू है व्यक्तिगत उत्तरदायित्व: अनुच्छेद 164(1) के अनुसार प्रत्येक मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद पर रहता है, पर मंत्री की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर होती है, इसलिए किसी मंत्री को हटाने की सलाह भी व्यवहार में मुख्यमंत्री की ही होती है। मुख्यमंत्री परिषद की "कुंजी" है, और यही उसे सामूहिक उत्तरदायित्व का केंद्र बनाता है।
तीन छोटे उपबंध भी जोड़ लें। अनुच्छेद 163(3) कहता है कि मंत्रियों ने राज्यपाल को क्या सलाह दी, इसकी जाँच किसी न्यायालय में नहीं होगी; यह मंत्रिमंडल की गोपनीयता की ढाल है, और अनुच्छेद 164(3) की गोपनीयता की शपथ इसी से जुड़ती है। अनुच्छेद 177 के अनुसार हर मंत्री विधानसभा में बोल सकता है और कार्यवाही में भाग ले सकता है, पर इस अनुच्छेद के बल पर मतदान नहीं कर सकता; मतदान वह तभी करेगा जब स्वयं विधायक हो। और अनुच्छेद 164(4) के अनुसार विधायक न होने पर भी कोई व्यक्ति मंत्री बन सकता है, पर लगातार 6 माह में उसे विधानमंडल का सदस्य बनना होगा, नहीं तो पद छूट जाता है।
जवाबदेही की कड़ी (नीचे से ऊपर)
मतदाता
विधायकों को चुनते हैं
विधानसभा
अविश्वास की शक्ति; परिषद को हटा सकती है
मंत्रिपरिषद
सामूहिक उत्तरदायित्व, अनु. 164(2)
मुख्यमंत्री
परिषद का प्रमुख, राज्यपाल से कड़ी, अनु. 163(1) और 167
मंत्री
अपने-अपने विभाग के राजनीतिक प्रमुख
सचिवालय और मुख्य सचिव
नीति में सहायता, प्रशासन में निरंतरता
मुख्यमंत्री की शक्तियाँ और प्रशासन में भूमिका
1. मंत्रिपरिषद का गठन और नेतृत्व: अन्य मंत्रियों को राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर नियुक्त करता है (अनुच्छेद 164(1)); यह सलाह 15% की सीमा के भीतर ही दी जा सकती है। परिषद की बैठक की अध्यक्षता और एजेंडा का स्वरूप व्यवहार में मुख्यमंत्री तय करता है (विश्लेषण: संविधान में बैठक की प्रक्रिया नहीं लिखी, यह कार्य-नियमों और परंपरा से चलती है)।
2. विभागों का बँटवारा: अनुच्छेद 166(3) राज्यपाल को सरकारी कार्य के संचालन और मंत्रियों में कार्य-आवंटन के नियम बनाने का अधिकार देता है। शमशेर सिंह (1974) में न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल का मंत्रियों में कार्य बाँटना "प्रत्यायोजन" नहीं, बल्कि परिषद और अधिकारियों के माध्यम से कार्यकारी शक्ति का प्रयोग है, और कार्य-नियमों के तहत किसी मंत्री या अधिकारी का निर्णय राज्यपाल का ही निर्णय माना जाता है। विश्लेषण: व्यवहार में कौन-सा विभाग किसे मिलेगा, यह मुख्यमंत्री की सलाह से तय होता है।
3. राज्यपाल से कड़ी (अनुच्छेद 167): मुख्यमंत्री परिषद के सभी प्रशासनिक और विधायी निर्णय राज्यपाल को बताता है, माँगी गई जानकारी देता है, और राज्यपाल चाहे तो ऐसा मामला परिषद के सामने रखता है जिस पर मंत्री ने निर्णय ले लिया पर परिषद ने विचार नहीं किया। यह राज्यपाल को सूचित रखने का संवैधानिक तरीक़ा है; उसे निर्णय पलटने की शक्ति नहीं देता।
4. समन्वय: दो विभागों के बीच मतभेद, जैसे सड़क बनाने में लोक निर्माण और वन विभाग की खींचतान, मुख्यमंत्री और परिषद ही सुलझाते हैं। केंद्र में यह काम मंत्रिमंडल सचिवालय करता है, जो मंत्रालयों के बीच समन्वय और मतभेद निपटारे में मदद करता है (मंत्रिमंडल सचिवालय का आधिकारिक विवरण); राज्य में उसकी भूमिका सचिवालय और मुख्य सचिव निभाते हैं (विश्लेषण: यह तुलना समझाने के लिए है, राज्य का कोई एकरूप क़ानूनी ढाँचा नहीं बताती)।
5. योजना और नीति: राष्ट्रीय स्तर पर नीति आयोग की संचालन परिषद की सदस्यता में प्रधानमंत्री के साथ सभी राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हैं (2015 की अधिसूचना), यानी राज्य की प्राथमिकताएँ मुख्यमंत्री ही केंद्र के सामने रखता है। राज्य के भीतर बजट, योजनाओं और संसाधन-बँटवारे की प्राथमिकताएँ मुख्यमंत्री के नेतृत्व में परिषद तय करती है (विश्लेषण)।
6. संकट-प्रबंधन: द्वितीय ARC ने सुझाया कि संकट से निपटने की शीर्ष संरचना राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री और राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हो, और प्रशासनिक स्तर पर क्रमशः मंत्रिमंडल सचिव और मुख्य सचिव उसके प्रमुख रहें।
7. मंत्रिमंडलीय समितियाँ (Cabinet Committees): संविधान के अनुच्छेद 163 से 167 में इनका उल्लेख नहीं है। भारत सरकार में मंत्रिमंडल सचिवालय मंत्रिमंडल और मंत्रिमंडलीय समितियों को सचिवीय सहायता देता है; राज्यों में समितियाँ ज़रूरत के अनुसार बनाई जाती हैं, और उनकी संख्या व स्वरूप राज्य-विशेष हैं। उत्तर में इन्हें "आवश्यकतानुसार गठित" लिखना सुरक्षित है, किसी राज्य की सूची नहीं।
8. सदन में नेतृत्व: मुख्यमंत्री सदन में सरकार का मुख्य प्रवक्ता है। मंत्रियों को अनुच्छेद 177 से सदन में बोलने का अधिकार है, और विपक्ष के प्रश्नों का उत्तर परिषद की ओर से संबंधित मंत्री देते हैं, जिसका सामूहिक बचाव मुख्यमंत्री करता है।
मुख्यमंत्री की भूमिकाएँ एक नज़र में
मुख्यमंत्री
परिषद का प्रमुख
- मंत्रियों की नियुक्ति की सलाह
- विभाग-बँटवारा
- परिषद की बैठक
राज्यपाल से कड़ी
- निर्णय बताना, अनु. 167(क)
- जानकारी देना, 167(ख)
- विचार हेतु मामला लाना, 167(ग)
विधानसभा में नेता
- सामूहिक उत्तरदायित्व
- बहुमत बनाए रखना
समन्वयक
- विभागों के मतभेद
- सचिवालय और मुख्य सचिव
नीति और योजना
- राज्य की प्राथमिकताएँ
- नीति आयोग की संचालन परिषद
संकट-नेतृत्व
- ARC: राज्य स्तर पर शीर्ष संरचना का प्रमुख
मुख्यमंत्री बनाम प्रधानमंत्री
मुख्यमंत्री (राज्य)
सहायता-सलाह का अनुच्छेद163(1)
सलाह मानने की बाध्यता163(1) में "सलाह के अनुसार कार्य करेगा" जैसे शब्द नहीं; राज्यपाल के कुछ विवेकाधीन क्षेत्र (163(1)-(2)); शमशेर सिंह के अनुसार सामान्यतः सलाह पर, कुछ अपवाद
नियुक्तिराज्यपाल, 164(1)
सामूहिक उत्तरदायित्व किसके प्रतिविधानसभा, 164(2)
आकार की सीमाविधानसभा सदस्यों का 15%, कम से कम 12, 164(1A)
सूचना देने का कर्तव्यअनुच्छेद 167
कार्य-संचालन के नियमराज्यपाल बनाता है, 166(3)
सचिवीय तंत्रराज्य सचिवालय और मुख्य सचिव
प्रधानमंत्री (संघ)
सहायता-सलाह का अनुच्छेद74(1)
सलाह मानने की बाध्यता74(1): राष्ट्रपति सलाह के अनुसार कार्य करेगा (42वाँ संशोधन); परंतुक: एक बार पुनर्विचार का निर्देश दे सकता है (44वाँ संशोधन)
नियुक्तिराष्ट्रपति, 75(1)
सामूहिक उत्तरदायित्व किसके प्रतिलोकसभा, 75(3)
आकार की सीमालोकसभा सदस्यों का 15%, कोई न्यूनतम सीमा नहीं, 75(1A)
सूचना देने का कर्तव्यअनुच्छेद 78
कार्य-संचालन के नियमअनुच्छेद 77(3) के तहत कार्य-आवंटन और कार्य-संचालन नियम, 1961
सचिवीय तंत्रमंत्रिमंडल सचिवालय और मंत्रिमंडल सचिव
सबसे बड़ा संवैधानिक अंतर: अनु. 74(1) में "सलाह के अनुसार कार्य करेगा" की बाध्यता है, अनु. 163(1) में नहीं।
सचिवालय और मुख्य सचिव से संबंध (संक्षेप में)
मंत्री चुनाव जीतकर आते हैं और पाँच साल के लिए होते हैं; सचिवालय का स्टाफ़ स्थायी होता है। द्वितीय ARC के शब्दों में राज्य सचिवालय राज्य प्रशासन का शीर्ष स्तर है, जिसका मुख्य काम मुख्यमंत्री और मंत्रियों को नीति बनाने, क़ानून व नियम का मसौदा बनाने, कार्यक्रमों का समन्वय और निगरानी करने, बजट बनाने और केंद्र से संपर्क रखने में सहायता देना है। चूँकि राजनीतिक कार्यपालिका बदलती रहती है और सचिवालय बना रहता है, इसलिए वह नीतियों की "स्मृति" का काम करता है।
मुख्य सचिव राज्य प्रशासन का वरिष्ठतम अधिकारी है और मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद की शासन के सभी मामलों में सहायता करता है; विभागों के प्रमुख सचिव अपने-अपने मंत्री के साथ काम करते हैं। मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव का रिश्ता "नीति बनाम अमल" का है: मुख्यमंत्री दिशा देता है, मुख्य सचिव सारे विभागों से उस दिशा पर अमल कराता है। ARC ने सुझाया कि मुख्य सचिव और अन्य शीर्ष पदों की नियुक्ति के लिए मुख्यमंत्री या मंत्रिमंडल के सामने नामों का पैनल देने वाली संगुटिका (collegium) हो और कार्यकाल दो वर्ष का निश्चित रहे, ताकि राजनीतिक बदलाव से अस्थिरता न आए।
तुलना याद रखें: केंद्र में मंत्रिमंडल सचिव, राज्य में मुख्य सचिव। विस्तृत चर्चा के लिए राज्य सचिवालय और मुख्य सचिव का अलग पेज देखें।
न्यायालय की कसौटी: तीन फ़ैसले
| निर्णय | उद्धरण और पीठ | मुख्य सिद्धांत | उत्तर में कैसे जोड़ें |
|---|---|---|---|
| शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (23-08-1974) | AIR 1974 SC 2192; (1974) 2 SCC 831; सात न्यायाधीश | राज्यपाल औपचारिक प्रमुख है; शक्तियाँ मंत्रिपरिषद की सलाह पर, सुविदित अपवादों को छोड़कर | मुख्यमंत्री की वास्तविक सत्ता का आधार |
| एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (11-03-1994) | (1994) 3 SCC 1; नौ न्यायाधीश | मंत्रिपरिषद के बहुमत की परीक्षा सदन के पटल पर होनी चाहिए; अनु. 356 के प्रयोग पर न्यायिक समीक्षा (संदर्भ मात्र) | परिषद का अस्तित्व विधानसभा के विश्वास पर टिका है, राज्यपाल की निजी राय पर नहीं |
| मनोज नरूला बनाम भारत संघ (27-08-2014) | (2014) 9 SCC 1; संविधान पीठ (पाँच न्यायाधीश) | अनु. 75(1)/164(1) में न्यायालय अयोग्यता नहीं जोड़ेगा; पर मुख्यमंत्री से संवैधानिक विश्वास की अपेक्षा | मंत्री-चयन में मुख्यमंत्री का विवेक और उसकी नैतिक सीमा |
आलोचनात्मक मूल्यांकन: मुख्यमंत्री की स्थिति के पक्ष और सीमाएँ
2016 के प्रश्न का सार यही है। पक्ष में: (1) संविधान ने मुख्यमंत्री को परिषद का प्रमुख और राज्यपाल से कड़ी बनाया (163, 164, 167); (2) शमशेर सिंह के बाद राज्यपाल सामान्यतः उसकी सलाह पर चलता है, इसलिए वही असली कार्यपालिका है; (3) विभाग-बँटवारा, समन्वय, योजना और संकट में अंतिम निर्णायक वही है; (4) सदन के नेता के रूप में वह सरकार का चेहरा है।
सीमाएँ और आलोचना: (1) सामूहिक उत्तरदायित्व (164(2)) और बहुमत की निर्भरता उस पर अंकुश है; गठबंधन में यह दबाव और बढ़ता है; (2) राज्यपाल के कुछ विवेकाधीन क्षेत्र और अनुच्छेद 356 उसकी सत्ता को सीमित करते हैं, जिन पर बोम्मई (1994) ने न्यायिक समीक्षा खोली; (3) 15% की सीमा (164(1A)) ने उसके "संरक्षण बाँटने" के विकल्प घटाए; (4) आलोचना यह भी है कि सत्ता मुख्यमंत्री में केंद्रित होकर परिषद को केवल मुहर लगाने वाला निकाय बना सकती है (विश्लेषण), और ARC के अनुसार मंत्रियों की भीड़ प्रशासनिक बिखराव लाती है; (5) सचिवालय और मुख्य सचिव पर निर्भरता से नीति का अमल उसके पूरे नियंत्रण में नहीं रहता।
निष्कर्ष की भाषा: मुख्यमंत्री राज्य प्रशासन का वास्तविक शीर्ष है, पर उसकी शक्ति जवाबदेही की जंजीर से बँधी है, और संवैधानिक नैतिकता (मनोज नरूला) इस बंधन को पूरा करती है।
मुख्य तथ्य
- अनु. 163(1)
- मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद राज्यपाल को सहायता और सलाह देती है (विवेकाधीन कार्य अपवाद)
- अनु. 164(1)
- मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है; अन्य मंत्री मुख्यमंत्री की सलाह पर; प्रसादपर्यंत
- अनु. 164(1A)
- मुख्यमंत्री सहित मंत्री विधानसभा सदस्यों के 15% से अधिक नहीं, 12 से कम नहीं; 91वाँ संशोधन 2003, लागू 01-01-2004
- अनु. 164(2)
- मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी
- अनु. 164(4)
- लगातार 6 माह विधानमंडल का सदस्य न रहने पर मंत्री पद छूटता है
- अनु. 166
- कार्रवाई राज्यपाल के नाम से; कार्य-संचालन और कार्य-आवंटन के नियम राज्यपाल बनाता है
- अनु. 167
- मुख्यमंत्री के तीन कर्तव्य: निर्णय बताना, जानकारी देना, मामला परिषद में रखना
- अनु. 74(1) बनाम 163(1)
- 74(1) में राष्ट्रपति सलाह के अनुसार कार्य करेगा (1976, 1978 के संशोधन); 163(1) में ऐसे शब्द नहीं
- अनु. 75(1A)
- केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सीमा लोकसभा सदस्यों का 15% (91वाँ संशोधन 2003)
- द्वितीय ARC की सिफ़ारिश (2009)
- सीमा 10, 12 या 15% ढाल पर, बड़े राज्यों में 10%; क़ानून नहीं, केवल सिफ़ारिश
- शमशेर सिंह (1974)
- सात न्यायाधीश; AIR 1974 SC 2192, (1974) 2 SCC 831; राज्यपाल सलाह के अनुसार, सुविदित अपवाद छोड़कर
- मनोज नरूला (2014)
- संविधान पीठ; (2014) 9 SCC 1; मंत्री-चयन में संवैधानिक विश्वास की अपेक्षा, अयोग्यता नहीं जोड़ी गई
- बोम्मई (1994)
- नौ न्यायाधीश; (1994) 3 SCC 1; बहुमत की परीक्षा सदन के पटल पर
- नीति आयोग की संचालन परिषद
- अध्यक्ष प्रधानमंत्री; सदस्यों में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री (अधिसूचना 16-02-2015)
- राजस्थान विधान सभा की सीटें
- 200 (आधिकारिक पोर्टल, 01-10-2026)
- अंतिम जाँच
- 01-10-2026 (अनुच्छेद 163-167, 164(1A), विधानसभा की सीटें, तीन निर्णयों के उद्धरण)
राजस्थान का पहलू
राजस्थान विधान सभा के आधिकारिक पोर्टल (assembly.rajasthan.gov.in) पर 01-10-2026 को "Total Seats: 200" दर्ज है। अनुच्छेद 164(1A) के अनुसार इससे राजस्थान में मुख्यमंत्री सहित अधिकतम 30 मंत्री हो सकते हैं (गणना ऊपर कार्य-उदाहरण में)। पदधारी मुख्यमंत्री और मंत्रियों के नाम, तथा परिषद की वर्तमान संख्या बदलती रहती है; परीक्षा से पहले आधिकारिक पोर्टल से उनका मिलान कर लें। द्वितीय ARC की तालिका (2009) में राजस्थान की विधानसभा 200 सदस्यों की ही दर्ज थी।
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- 164(1A) की 15% सीमा में मुख्यमंत्री शामिल है। "मुख्यमंत्री को छोड़कर" लिखना ग़लत है।
- न्यूनतम 12 वाला पहला परंतुक भूल जाना: छोटी विधानसभा में 15% की गणना 12 से कम आए तो भी 12 मंत्री रह सकते हैं।
- सामूहिक उत्तरदायित्व विधानसभा के प्रति है (अनु. 164(2)); लोकसभा के प्रति नहीं (वह अनु. 75(3), संघ के लिए है) और विधान परिषद के प्रति भी नहीं।
- अनुच्छेद 163 और 167 को मिला देना: 163 "सहायता और सलाह" की संरचना है; 167 मुख्यमंत्री के तीन सूचना-संबंधी कर्तव्य हैं।
- यह लिखना कि राज्यपाल "हमेशा" सलाह मानने को बाध्य है। 163(1) में बाध्यकारी शब्द नहीं हैं और शमशेर सिंह ने अपवाद माने हैं; सही उत्तर "सामान्यतः" है।
- "critically evaluate" में केवल शक्तियाँ गिनाना। पक्ष, सीमा और निष्कर्ष तीनों लिखें।
- 91वें संशोधन को 2004 का बताना। अधिनियम 2003 का है, प्रभावी तिथि 1 जनवरी 2004 है।
- राजस्थान की "30" को स्थायी संख्या मान लेना: यह विधानसभा की 200 सीटों पर निर्भर है; संख्या बदले तो सीमा बदलेगी।
वास्तविक मामला 1
केस स्टडीशमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974): राज्यपाल असल में किसकी सलाह पर चलता है?
पंजाब सिविल सेवा (न्यायिक शाखा) के दो परिवीक्षाधीन अधिकारियों की सेवाएँ "राज्यपाल की ओर से" समाप्त की गईं। उनका तर्क था कि अधीनस्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति और हटाने की शक्ति (अनुच्छेद 234) राज्यपाल को निजी तौर पर प्रयोग करनी होती है, मंत्री या अधिकारी नहीं कर सकते; और वे सरदारी लाल के पुराने निर्णय का हवाला देते थे। मामला बड़ी पीठ को गया: सात न्यायाधीश, मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रे की अगुवाई में, निर्णय 23 अगस्त 1974।
- प्रश्न
- क्या राष्ट्रपति और राज्यपाल "संतुष्टि" या "प्रसाद" जैसी शक्तियाँ व्यक्तिगत रूप से प्रयोग करते हैं, या मंत्रिपरिषद की सहायता-सलाह पर?
- निर्णय
- न्यायालय ने घोषित किया कि राष्ट्रपति और राज्यपाल अपनी औपचारिक संवैधानिक शक्तियाँ केवल मंत्रियों की सलाह के अनुसार ही प्रयोग करेंगे, कुछ सुविदित अपवादों को छोड़कर। सरदारी लाल का निर्णय पलटा गया (overruled)।
- अपवाद
- न्यायालय ने उदाहरण गिनाए (पूर्ण सूची नहीं माना): (क) प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का चुनाव, जो सदन में बहुमत की कसौटी से बँधा है; (ख) जो सरकार सदन में बहुमत खो चुकी हो पर पद न छोड़े, उसकी बर्ख़ास्तगी; (ग) जहाँ जनादेश आवश्यक हो, वहाँ सदन का विघटन, जिसमें भी राज्य प्रमुख को राजनीति में पड़ने से बचना चाहिए और मुख्यमंत्री की सलाह लेनी चाहिए।
- कार्य-नियम
- अनुच्छेद 166(3) के कार्य-नियमों के तहत मंत्रियों में कार्य-आवंटन "प्रत्यायोजन" नहीं है; मंत्री या अधिकारी का निर्णय राज्यपाल का ही निर्णय है।
सीख
मुख्यमंत्री की स्थिति का क़ानूनी आधार यही निर्णय है: राज्यपाल "नाम" का प्रमुख है, असली कार्यपालिका मंत्रिपरिषद है, जिसका मुखिया मुख्यमंत्री है। उत्तर में इसे अनुच्छेद 163(1) और 166 के साथ लिखें।
वास्तविक मामला 2
केस स्टडीमनोज नरूला बनाम भारत संघ (2014): क्या दागी को मंत्री बनने से रोका जा सकता है?
रिट याचिका (सिविल) 289 / 2005 में माँग थी कि जिन पर गंभीर आपराधिक मामलों में आरोप तय हो चुके हों, उन्हें मंत्री न बनाया जाए। पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 27 अगस्त 2014 को निर्णय दिया। अनुच्छेद 164(1) इसमें इसलिए आता है क्योंकि प्रधानमंत्री पर लागू तर्क मुख्यमंत्री पर भी लागू माना गया।
- न्यायालय ने क्या नहीं किया
- अनुच्छेद 75(1) या 164(1) की व्याख्या से अयोग्यता का नया आधार नहीं जोड़ा; अयोग्यता तय करना संविधान और जनप्रतिनिधित्व क़ानून का क्षेत्र है।
- न्यायालय ने क्या कहा
- प्रधानमंत्री से संवैधानिक विश्वास (constitutional trust) की अपेक्षा है; वे ऐसे व्यक्ति को मंत्री चुनने से बचने पर विचार करें जिस पर जघन्य या गंभीर अपराधों या भ्रष्टाचार के आरोप तय हो चुके हों। आगे का निर्णय उनके विवेक पर है।
- मुख्यमंत्री पर लागू
- पीठ ने साफ़ जोड़ा कि प्रधानमंत्री के बारे में जो कहा गया, वह अनुच्छेद 164(1) की भाषा को देखते हुए मुख्यमंत्री पर भी पूरी तरह लागू है।
सीख
मुख्यमंत्री को मंत्री चुनने की सलाह देने का व्यापक विवेक है, पर यह निरंकुश नहीं: संवैधानिक नैतिकता उस पर अपेक्षा रखती है। 164(1B) जैसी क़ानूनी रोक सीमित है, इसलिए शेष पर अंकुश जनता और विधानसभा का है।
गणना: राजस्थान में मंत्रिपरिषद की अधिकतम सीमा
हल सहित उदाहरणअनुच्छेद 164(1A) से राजस्थान की सीमा (विधानसभा की संख्या का आधिकारिक मिलान आवश्यक)
दिया है
- राजस्थान विधान सभा के आधिकारिक पोर्टल (assembly.rajasthan.gov.in) पर 01-10-2026 को दर्ज कुल सीटें: 200।
- अनुच्छेद 164(1A): मुख्यमंत्री सहित कुल मंत्री विधानसभा सदस्यों के 15% से अधिक नहीं, और 12 से कम नहीं।
- सावधानी: यह गणना 01-10-2026 की आधिकारिक संख्या पर है; सदस्य-संख्या बदले (जैसे परिसीमन से) तो सीमा बदलेगी, इसलिए परीक्षा से पहले पोर्टल पर संख्या फिर जाँच लें।
- 1चरण 1 200 × 15 ÷ 100 = 30.
- 2चरण 2 यह 30 मुख्यमंत्री सहित है, इसलिए मुख्यमंत्री को छोड़कर अधिकतम 29 अन्य मंत्री।
- 3चरण 3 न्यूनतम 12 की शर्त जाँचें: 30 बड़ा है 12 से, इसलिए बाधा नहीं; सीमा 30 ही रहेगी।
- 4चरण 4 (भिन्न आने पर) विश्लेषण: संविधान में "अधिक नहीं" लिखा है, इसलिए दशमलव होने पर संख्या नीचे की ओर पूर्णांकित होगी। उदाहरण: 243 सदस्यों की विधानसभा में 15% = 36.45, यानी अधिकतम 36 (द्वितीय ARC की तालिका में बिहार की विधानसभा 243 दी गई है)।
- 5चरण 5 (छोटी विधानसभा) जहाँ 15% की संख्या 12 से कम आए, वहाँ पहला परंतुक लागू होता है: 40 सदस्यों की विधानसभा (ARC की तालिका में गोवा) में 15% = 6, पर न्यूनतम 12 मंत्री रह सकते हैं।
निष्कर्ष: राजस्थान (200 सीटें) में मुख्यमंत्री सहित अधिकतम 30 मंत्री हो सकते हैं, यानी मुख्यमंत्री के अलावा 29। इस संख्या में सभी श्रेणियों के मंत्री गिने जाएँगे; यह सीमा संख्या की है, मंत्रियों के नाम या श्रेणी की नहीं।
पिछले वर्षों के प्रश्न (हल)
2023RAS मुख्य परीक्षापेपर III5 अंक
CM's duties under the Constitution; most important duty as head of government
आदर्श उत्तर
अनुच्छेद 167: मुख्यमंत्री परिषद के निर्णय राज्यपाल को बताता है, माँगी जानकारी देता है और उनके कहने पर मंत्री-स्तर का निर्णय परिषद में रखता है। अनुच्छेद 163-164 में वह परिषद का प्रमुख है। विश्लेषण: सरकार-प्रमुख का सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य परिषद को विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी बनाए रखना है।
2016RAS मुख्य परीक्षापेपर III10 अंक
राज्य प्रशासन में मुख्यमंत्री की स्थिति तथा भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये। (Critically evaluate the position and role of Chief Minister in State Administration.)
आदर्श उत्तर
स्थिति: अनुच्छेद 163, 164 और 167 में मुख्यमंत्री परिषद का प्रमुख और राज्यपाल से कड़ी है; शमशेर सिंह (1974) के बाद राज्यपाल सामान्यतः उसकी सलाह पर चलता है, इसलिए वही वास्तविक कार्यपालिका है। भूमिका: मंत्रियों की नियुक्ति की सलाह, विभाग-बँटवारा, समन्वय, नीति-योजना और सदन में नेतृत्व।
आलोचना: सामूहिक उत्तरदायित्व, बहुमत और गठबंधन उस पर अंकुश हैं; राज्यपाल के विवेकाधीन क्षेत्र और अनु. 356 सीमा हैं; 15% की सीमा विकल्प घटाती है; सत्ता का केंद्रीकरण परिषद को मुहर-मात्र बना सकता है; सचिवालय पर निर्भरता रहती है।
निष्कर्ष: पद वास्तविक रूप से शक्तिशाली है, पर जवाबदेही और संवैधानिक नैतिकता से बँधा।
अभ्यास प्रश्न (हमारे अपने, PYQ नहीं)
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
अनुच्छेद 164(1A) में राज्य की मंत्रिपरिषद के आकार की सीमा क्या है?
आदर्श उत्तर
मुख्यमंत्री सहित मंत्री विधानसभा सदस्यों के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं और बारह से कम नहीं होंगे।
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
सामूहिक उत्तरदायित्व का अर्थ बताइए।
आदर्श उत्तर
परिषद एक इकाई के रूप में विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है; अविश्वास पर पूरी परिषद हटती है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
राजस्थान में मंत्रिपरिषद की अधिकतम संख्या कितनी हो सकती है? (विधानसभा की सीटों का आधिकारिक मिलान करें)
आदर्श उत्तर
विधानसभा की 200 सीटों का 15 प्रतिशत यानी 30 (मुख्यमंत्री सहित); सीटें बदलें तो सीमा बदलेगी।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की संवैधानिक स्थिति में दो मुख्य अंतर बताइए।
आदर्श उत्तर
पहला अंतर: अनुच्छेद 74(1) में राष्ट्रपति सलाह के अनुसार कार्य करेगा, जबकि अनुच्छेद 163(1) में ऐसे शब्द नहीं हैं और राज्यपाल के कुछ विवेकाधीन क्षेत्र हैं। दूसरा अंतर: प्रधानमंत्री का सामूहिक उत्तरदायित्व लोकसभा के प्रति (75(3)) है, मुख्यमंत्री का विधानसभा के प्रति (164(2))। न्यूनतम 12 का नियम केवल राज्य पर लागू होता है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) का महत्व बताइए।
आदर्श उत्तर
सात न्यायाधीशों की पीठ ने घोषित किया कि राष्ट्रपति और राज्यपाल अपनी औपचारिक शक्तियाँ मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही प्रयोग करेंगे, कुछ सुविदित अपवादों को छोड़कर, जैसे मुख्यमंत्री का चुनाव और बहुमत खो चुकी सरकार की बर्ख़ास्तगी। इससे मुख्यमंत्री की वास्तविक कार्यपालिका की स्थिति का क़ानूनी आधार बना; सरदारी लाल का निर्णय पलट गया।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
राज्य प्रशासन में मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के संबंध की विवेचना कीजिए।
आदर्श उत्तर
मुख्यमंत्री राजनीतिक कार्यपालिका का शीर्ष है, जबकि मुख्य सचिव राज्य प्रशासन का वरिष्ठतम अधिकारी है और द्वितीय ARC के अनुसार मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद की शासन के सभी मामलों में सहायता करता है।
संबंध का स्वरूप नीति और अमल का है: मुख्यमंत्री दिशा तय करता है, मुख्य सचिव सचिवालय के माध्यम से विभागों से उस पर अमल कराता है और समन्वय करता है। सचिवालय स्थायी रहकर नीतियों की निरंतरता सुनिश्चित करता है। संकट की स्थिति में ARC के अनुसार शीर्ष संरचना का प्रमुख मुख्यमंत्री और प्रशासनिक प्रमुख मुख्य सचिव होता है।
चुनौती: बार-बार तबादले और अस्थिर कार्यकाल, जिसके लिए ARC ने संगुटिका और दो वर्ष के निश्चित कार्यकाल का सुझाव दिया।
10 अंक (100 शब्द) का उत्तर कैसे लिखें
भूमिका
संवैधानिक आधार से शुरू करें: अनुच्छेद 163, 164 और 167 में मुख्यमंत्री परिषद का प्रमुख है; शमशेर सिंह (1974) के बाद वही राज्य की वास्तविक कार्यपालिका है।
मुख्य भाग
- भूमिका (2 से 3 पंक्तियाँ): मंत्रियों की नियुक्ति की सलाह, विभाग-बँटवारा, राज्यपाल से कड़ी, समन्वय, नीति-योजना, सदन में नेतृत्व।
- पक्ष (2 बिंदु): सहायता और सलाह की व्यवस्था में निर्णायक भूमिका; सामूहिक उत्तरदायित्व का केंद्र।
- सीमाएँ (3 बिंदु): बहुमत और गठबंधन का दबाव; राज्यपाल के विवेकाधीन क्षेत्र और अनु. 356; 15% सीमा (164(1A)); सचिवालय पर निर्भरता।
- एक केस या तथ्य: शमशेर सिंह (1974) या मनोज नरूला (2014)।
निष्कर्ष
निष्कर्ष: मुख्यमंत्री वास्तविक शीर्ष है, पर उसकी शक्ति जवाबदेही और संवैधानिक नैतिकता से बँधी है; सुधार के लिए परिषद का सुसंगत आकार और सचिवालय का स्थिर कार्यकाल मदद करेंगे।
अतिरिक्त मूल्य
- एक पंक्ति में तुलना: अनु. 74(1) बनाम 163(1)।
- द्वितीय ARC (2009) की 10/12/15% की सिफ़ारिश का उल्लेख।
- राजस्थान का उदाहरण: 200 सीटें, अधिकतम 30 मंत्री (संख्या आधिकारिक रूप से जाँचकर)।
एक पन्ने में दोहराव
- अनु. 163(1): मुख्यमंत्री के नेतृत्व में परिषद राज्यपाल को सहायता और सलाह देती है; विवेकाधीन अपवाद।
- अनु. 164(1): CM की नियुक्ति राज्यपाल; अन्य मंत्री CM की सलाह पर; प्रसादपर्यंत।
- अनु. 164(1A): मुख्यमंत्री सहित 15% से अधिक नहीं, 12 से कम नहीं; 91वाँ संशोधन 2003, लागू 1-1-2004।
- अनु. 164(1B): दलबदल से अयोग्य को मंत्री पद नहीं; 361B: लाभ का राजनीतिक पद।
- अनु. 164(2): विधानसभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व; 164(4): 6 माह में सदस्य बनना।
- अनु. 166: कार्रवाई राज्यपाल के नाम से; 166(3) कार्य-नियम।
- अनु. 167: CM के तीन कर्तव्य: निर्णय बताना, जानकारी देना, मामला परिषद में रखना।
- 74(1) में "सलाह के अनुसार कार्य करेगा"; 163(1) में नहीं।
- शमशेर सिंह (1974): सात न्यायाधीश; राज्यपाल सलाह पर, सुविदित अपवाद; मनोज नरूला (2014): अयोग्यता नहीं जोड़ी, पर संवैधानिक विश्वास।
- राजस्थान: 200 सीटें, 15% = 30 (CM सहित); संख्या आधिकारिक रूप से जाँचें।
- ARC 2009: 10/12/15% की ढालू सीमा की सिफ़ारिश; मुख्य सचिव: वरिष्ठतम अधिकारी, CM की सहायता।
याद रखने योग्य शब्द
- सहायता और सलाह
- 164(1A)
- 91वाँ संशोधन
- 15% और न्यूनतम 12
- सामूहिक उत्तरदायित्व
- अनुच्छेद 167
- प्रसादपर्यंत
- शमशेर सिंह
- मनोज नरूला
- मुख्य सचिव