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संघ-राज्य प्रशासनिक संबंध

3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC की योजना (09-01-2026), लोक प्रशासन: "Issues: Union-State relations, Minister-civil servant relations, generalists-specialists, administrative reforms, social audit." इस पृष्ठ में संघ-राज्य संबंधों का प्रशासनिक पक्ष है। मंत्री-सिविल सेवक संबंध, सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ, प्रशासनिक सुधार और सामाजिक अंकेक्षण के अलग पृष्ठ हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2013 से 2023 के पेपरों में इस विषय से चार प्रश्न मिले: 2013 (पेपर I, 5 अंक) भारत के संघात्मक ढाँचे में एकात्मक विशेषताएँ, 2016 (10 अंक) बोम्मई वाद की सुरक्षाएँ, 2018 (2 अंक) अनुच्छेद 355 की भूमिका और 2023 (2 अंक) उप-राष्ट्रीय सरकार।
  • प्रश्न अक्सर अनुच्छेद 352, 355 और 356 को जोड़कर पूछे जाते हैं, इसलिए अनुच्छेदों का क्रम और बोम्मई के निर्देश अलग-अलग नहीं, एक कहानी की तरह याद करें।
  • सरकारिया और पुंछी आयोग, अंतर-राज्य परिषद, क्षेत्रीय परिषद और GST परिषद सहकारी संघवाद के उदाहरण हैं। इन्हें निबंध-शैली के 10 अंक वाले उत्तर में तथ्यों के साथ जोड़ने से अंक बढ़ते हैं।

पहले सरल भाषा में: क़ानून दिल्ली में बनता है, अमल गाँव में होता है

मान लीजिए केंद्र सरकार ने कोई नया राष्ट्रीय क़ानून बनाया। संसद उसे पास कर देती है, पर उसे लागू करवाने के लिए अपने थाने, अपने पटवारी या अपने कलेक्टर हर ज़िले में नहीं बैठाती। यह काम किसी राज्य के कलेक्टर, थानेदार और पटवारी करते हैं, जो राज्य सरकार के कर्मचारी हैं। मतलब आदेश का दफ़्तर एक है और अमल करने वाला हाथ दूसरा। जैसे किसी कंपनी का मुख्यालय नीति बनाए और उसे हर शहर की स्वतंत्र फ़्रेंचाइज़ी लागू करे। तब सवाल उठते हैं: फ़्रेंचाइज़ी न माने तो क्या होगा? मुख्यालय कितना निर्देश दे सकता है? दोनों के बीच तालमेल कैसे बैठेगा? इन्हीं सवालों के उत्तर संविधान के प्रशासनिक संबंध हैं।

सरकारिया आयोग ने भी यही देखा कि संविधान निर्माताओं ने जान-बूझकर संघ के क़ानूनों के अमल का काम अधिकतर राज्यों की मशीनरी से कराने का रास्ता चुना (सरकारिया रिपोर्ट, 3.5.02)। संघ अपने हाथ से केवल गिने-चुने विषय चलाता है, जैसे रक्षा, विदेश मामले, डाक-तार, रेल, मुद्रा, सीमा शुल्क और आयकर (रिपोर्ट, 3.1.07)।

परीक्षा-योग्य परिभाषा: संघ-राज्य प्रशासनिक संबंध वह व्यवस्था है जो संविधान के भाग XI के अध्याय II (अनुच्छेद 256 से 263) और उससे जुड़े प्रावधानों (अनुच्छेद 355, 356, 365, 312) से तय होती है। इसके अनुसार राज्य संघ के क़ानूनों का पालन करते हैं, संघ राज्यों को निर्देश दे सकता है, दोनों एक-दूसरे को कार्य सौंप सकते हैं, और विवादों व साझा हित के प्रश्नों पर समन्वय के लिए अंतर-राज्य परिषद जैसी संस्थाएँ बनाई जा सकती हैं।

अनुच्छेद 256 से 263 एक नज़र में

अनुच्छेदक्या कहता हैयाद रखने का सूत्र
256राज्य की कार्यपालिका शक्ति संसद के बनाए और लागू क़ानूनों के पालन के अनुसार चले; संघ आवश्यक निर्देश दे सकता हैपालन करो
257राज्य की शक्ति संघ की कार्यपालिका शक्ति में बाधा न बने; राष्ट्रीय या सैनिक महत्त्व के संचार-साधन और रेलों की सुरक्षा पर निर्देश; अतिरिक्त ख़र्च संघ देगाबाधा मत डालो
258राष्ट्रपति राज्य की सहमति से संघ के कार्य राज्य को सौंप सकता है; संसद का क़ानून भी राज्य पर कार्य डाल सकता है; अतिरिक्त ख़र्च संघ देगासंघ से राज्य को
258Aराज्यपाल भारत सरकार की सहमति से राज्य के कार्य संघ को सौंप सकता हैराज्य से संघ को
260संघ भारत से बाहर के क्षेत्रों में समझौते से क्षेत्राधिकार ले सकता हैविदेशी क्षेत्र
261संघ और हर राज्य के सार्वजनिक कार्यों, अभिलेखों और न्यायिक कार्यवाहियों को पूरे भारत में पूर्ण विश्वास और मान्यतापूर्ण आस्था
262अंतर-राज्यीय नदियों के जल विवादों के न्याय-निर्णयन का क़ानून संसद बना सकती है और न्यायालयों का क्षेत्राधिकार रोक सकती हैजल विवाद
263राष्ट्रपति आदेश से अंतर-राज्य परिषद स्थापित कर सकता हैसमन्वय की संस्था

अनुच्छेद 257A (44वाँ संशोधन) और 259 (7वाँ संशोधन) निरसित हैं। स्रोत: भारत का संविधान, 1 मई 2024 तक अद्यतन।

निर्देश की सीढ़ी: अनुच्छेद 256, 257 और 365

अनुच्छेद 256 राज्य पर क़ानून-पालन की ज़िम्मेदारी डालता है और संघ को निर्देश देने की शक्ति देता है। अनुच्छेद 257(1) उसका दूसरा पहलू है: राज्य अपनी शक्ति का ऐसा प्रयोग न करे जिससे संघ की कार्यपालिका शक्ति बाधित हो। 257(2) और 257(3) में दो विशेष निर्देश हैं: राष्ट्रीय या सैनिक महत्त्व के संचार-साधनों के निर्माण व रखरखाव पर, और रेलों की सुरक्षा के उपायों पर। इनके कारण राज्य को अतिरिक्त ख़र्च हो तो उसे भारत सरकार चुकाती है; सहमति न बने तो भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त मध्यस्थ तय करता है (257(4))।

अगर कोई राज्य निर्देश न माने तो अनुच्छेद 365 का रास्ता खुलता है। इसके अनुसार निर्देश का पालन न होने पर राष्ट्रपति यह मान सकता है कि राज्य की सरकार संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चल सकती। यही मान्यता आगे अनुच्छेद 356 के प्रयोग का आधार बन सकती है। यानी क्रम यह है: निर्देश, फिर पालन न होना, फिर 365 की मान्यता और अंत में 356 की उद्घोषणा।

सरकारिया आयोग ने इन अनुच्छेदों (256, 257 और 365) को संघ की एकता के लिए उपयोगी माना, पर कहा कि इनका प्रयोग अंतिम उपाय के रूप में और बहुत सावधानी से हो (रिपोर्ट, 3.9.01 से 3.9.02)। आयोग ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 258 का उपयोग अधिक व्यापकता से हो, ताकि संघ के कार्य राज्यों और स्थानीय निकायों को सौंपकर विकेंद्रीकरण बढ़े। यह बात विकेंद्रीकरण के पृष्ठ से जुड़ती है।

अनुच्छेद 352, 355 और 356: 355 पुल कैसे है (2018 का प्रश्न)

अनुच्छेद 355 में दो कर्तव्य हैं: संघ हर राज्य को बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से बचाए, और यह सुनिश्चित करे कि हर राज्य की सरकार संविधान के अनुसार चले। इसे "शक्ति" की जगह "कर्तव्य" पढ़िए। जैसे अभिभावक का कर्तव्य है कि बच्चा सुरक्षित रहे, पर वह कर्तव्य निभाने के लिए पहले सलाह, फिर चेतावनी, फिर सख़्त क़दम चुन सकता है।

अनुच्छेद 352 युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल की बात करता है। अनुच्छेद 353 के तहत आपातकाल में संघ राज्य को कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग के ढंग पर निर्देश दे सकता है। अनुच्छेद 356 राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर राष्ट्रपति शासन की बात करता है। सरकारिया आयोग के अनुसार 355 का तीसरा अंग (संविधान के अनुसार शासन सुनिश्चित करना) अनुच्छेद 356 तक पहुँचता है (6.3.18)।

आयोग ने 352 और 356 के बीच एक मध्यवर्ती क्षेत्र देखा, जहाँ स्थिति इतनी गंभीर नहीं कि 352 या 356 लगे, पर 355 के पहले भाग के तहत कार्रवाई ज़रूरी हो (6.1.04(c)); संघ की कार्रवाइयों की एक पूरी श्रेणी हो सकती है और 356 से पहले 355 के सभी विकल्प आज़माए जाएँ (6.3.14 से 6.3.17)। इसलिए 355 "पुल" है: वह 352 की तरह राष्ट्रीय स्तर पर और 356 की तरह राज्य-सरकार हटाकर नहीं, बल्कि उससे पहले की सीढ़ियों पर काम करता है। आयोग ने यह भी कहा कि संघ राज्य की पुलिस को अपने अधीन नहीं ले सकता (7.3.07)।

352, 355 और 356 की तुलना

बिंदुअनुच्छेद 352अनुच्छेद 355अनुच्छेद 356
स्वरूपराष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणासंघ का कर्तव्यराज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर उद्घोषणा
आधारयुद्ध, बाहरी आक्रमण, सशस्त्र विद्रोहबाहरी आक्रमण, आंतरिक अशांति, संविधान के अनुसार शासनसंवैधानिक तंत्र विफल, या अनुच्छेद 365 की मान्यता
असरअनुच्छेद 353 से राज्यों को निर्देशनिर्देश, सलाह, सुरक्षा बल की सहायता जैसे मध्यवर्ती क़दम (सरकारिया की व्याख्या)राज्य सरकार हटती है, कार्यपालिका शक्ति संघ के हाथ में
क्रमअंतिम स्तर का संकट356 से पहले की सीढ़ीअंतिम उपाय

मध्यवर्ती क़दमों की व्याख्या सरकारिया आयोग (6.1.04, 6.3.14 से 6.3.17) की है; यह संविधान की धारा नहीं।

बोम्मई वाद: अनुच्छेद 356 पर लगे ताले (2016 का 10 अंक वाला प्रश्न)

1977 में राजस्थान समेत नौ राज्यों की सरकारें बर्ख़ास्त हुईं और अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग लंबे समय तक बहस में रहा। एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (नौ-न्यायाधीश पीठ, 11 मार्च 1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने इसके लिए ठोस सुरक्षाएँ तय कीं। इन्हें इस तरह याद रखें:

1. न्यायिक समीक्षा: राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा अदालत में जाँची जा सकती है। संघ को वे तथ्य अदालत में रखने होंगे जिन पर निर्णय टिका है, और अनुच्छेद 74(2) इसमें बाधा नहीं बनता।

2. शक्ति सशर्त है: 356 निरंकुश नहीं, एक संवैधानिक शर्त के अधीन है कि राज्य में संवैधानिक तंत्र वास्तव में विफल हुआ हो।

3. विधानसभा तुरंत भंग नहीं: संसद के दोनों सदनों के अनुमोदन तक विधानसभा केवल निलंबित रहेगी, भंग नहीं। दो महीने में अनुमोदन न मिला या अस्वीकार हुआ तो उद्घोषणा समाप्त हो जाएगी और हटाई गई सरकार बहाल होगी।

4. न्यायालय का उपचार: अदालत उद्घोषणा को असंवैधानिक ठहराकर यथास्थिति बहाल कर सकती है। एक साथ दो सरकारों की गुंजाइश नहीं है।

5. धर्मनिरपेक्षता: इसे संविधान की मूल संरचना माना गया, इसलिए उसे नष्ट करने वाले कार्य 356 का आधार बन सकते हैं।

6. संघ का स्वरूप: न्यायालय ने संघ-राज्य संबंध को "केंद्र की ओर झुकाव वाला संघ" कहा, पर यह भी माना कि राज्य संघ के उपांग नहीं हैं।

बहुमत के निर्णय में सरकारिया आयोग (6.5.01) के उन उदाहरणों को भी अपनाया गया जहाँ 356 अनुचित है। उनमें "355 के सभी उपाय आज़माए न गए हों" और विधानसभा में बहुमत की परीक्षा (floor test) के बिना बर्ख़ास्तगी जैसी स्थितियाँ हैं। इस तरह 355 और 356 की कड़ी बोम्मई में न्यायिक रूप से भी पक्की हुई।

अखिल भारतीय सेवाएँ (अनुच्छेद 312): केंद्र और राज्य का साझा कर्मचारी-वर्ग

कल्पना कीजिए कि एक ऐसा अधिकारी है जिसकी भर्ती केंद्र करता है, पर काम वह किसी राज्य में करता है और ज़िले में कलेक्टर बनकर राज्य सरकार के आदेश मानता है। यही अखिल भारतीय सेवा का सार है। इसलिए इसे दोहरे नियंत्रण वाली सेवा कहा गया है (सरकारिया रिपोर्ट अध्याय VIII)।

अनुच्छेद 312 के अनुसार राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करे तो संसद नई अखिल भारतीय सेवा बना सकती है। IAS और IPS अनुच्छेद 312(2) में पहले से अखिल भारतीय सेवा मानी गई हैं। अखिल भारतीय सेवा अधिनियम, 1951 (29 अक्टूबर 1951) में केंद्र को नियम बनाने की शक्ति है, पर संबंधित राज्य सरकारों से परामर्श के बाद। आज केवल IAS, IPS और IFS ही अस्तित्व में हैं। IFS का गठन 1 जुलाई 1966 को हुआ, जिससे पहले राज्यसभा का प्रस्ताव और 1963 का संशोधन आया।

सरकारिया आयोग ने इन सेवाओं को बनाए रखने और मज़बूत करने की सिफ़ारिश की, साथ ही "सामान्यज्ञ झुकाव" की जगह विशेषज्ञता पर ज़ोर, केंद्रीय प्रतिनियुक्ति की अनिवार्यता के साथ छँटाई, कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में अखिल भारतीय सेवाओं के कार्मिक प्रशासन की सलाहकार परिषद, और निलंबन-अपीलों पर UPSC से परामर्श की बात कही (रिपोर्ट, 8.19.01 से 8.19.14)। यह सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ वाले पृष्ठ से सीधे जुड़ता है।

समन्वय की संस्थाएँ: अंतर-राज्य परिषद, क्षेत्रीय परिषदें और नीति आयोग

अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council): अनुच्छेद 263 राष्ट्रपति को परिषद बनाने की अनुमति देता है, अनिवार्यता नहीं। परिषद का कार्य है: (क) राज्यों के विवादों की जाँच और सलाह, (ख) साझा हित के विषयों की जाँच और चर्चा, (ग) नीति और कार्रवाई में बेहतर समन्वय की सिफ़ारिश। सरकारिया आयोग की सिफ़ारिश (अध्याय IX, 9.10.01) पर इसे 28 मई 1990 के राष्ट्रपति आदेश से बनाया गया। अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं; सदस्य सभी राज्यों और विधानसभा वाले संघ क्षेत्रों के मुख्यमंत्री, बिना विधानसभा वाले संघ क्षेत्रों के प्रशासक, राष्ट्रपति शासन वाले राज्यों के राज्यपाल और प्रधानमंत्री द्वारा नामित छह केंद्रीय कैबिनेट मंत्री हैं। बैठकें बंद कमरे में होती हैं और निर्णय आम सहमति से। 11वीं बैठक 16 जुलाई 2016 को हुई (MHA, 2022)। 1996 में बनी स्थायी समिति के अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री हैं।

क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils): ये संविधान की नहीं, राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के भाग III (धाराएँ 14 से 22) की देन हैं। देश को पाँच क्षेत्रों में बाँटा गया है। अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री होते हैं, हर राज्य का मुख्यमंत्री बारी-बारी से एक वर्ष के लिए उपाध्यक्ष बनता है, राज्यपाल हर राज्य से दो मंत्री नामित करता है, और मुख्य सचिव स्थायी समिति बनाते हैं। इनके कार्य केवल सलाहकारी हैं। राजस्थान उत्तरी क्षेत्रीय परिषद में है, जिसमें अब हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और चंडीगढ़ हैं (PIB, 2025)। सरकारिया आयोग ने इनकी कमज़ोरी गिनाई: स्वतंत्र सचिवालय नहीं, 1963 से कर्मचारी दिल्ली में केंद्रीकृत, 1957 से 1963 के बीच 33 बैठकें, और विवादास्पद विषयों से परहेज़ (9.8.01 से 9.8.05)।

नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल: 1 जनवरी 2015 के मंत्रिमंडल सचिवालय के प्रस्ताव से बना नीति आयोग "सहकारी संघवाद" को बढ़ावा देने को अपना उद्देश्य बताता है। इसकी गवर्निंग काउंसिल में सभी राज्यों और विधानसभा वाले संघ क्षेत्रों के मुख्यमंत्री तथा अन्य संघ क्षेत्रों के उपराज्यपाल हैं; प्रस्ताव का संशोधन 16 फ़रवरी 2015 का है। 11वीं बैठक 11 जून 2026 को हुई। योजना आयोग से नीति आयोग की तुलना का प्रश्न (2021) नीति आयोग वाले पृष्ठ में हल है।

GST परिषद: सहकारी संघवाद की जीवित प्रयोगशाला (दरों का उल्लेख नहीं)

101वें संविधान संशोधन (2016) से अनुच्छेद 246A और 279A जुड़े। 246A के कारण संसद और राज्य विधानमंडल, दोनों वस्तु और सेवा कर पर साथ-साथ क़ानून बना सकते हैं। 279A के तहत GST परिषद बनी, जिसका अध्यक्ष केंद्रीय वित्त मंत्री होता है; सदस्य केंद्रीय राजस्व या वित्त के राज्य मंत्री और हर राज्य का वित्त या कराधान मंत्री हैं, जो आपस में से एक को उपाध्यक्ष चुनते हैं।

कोरम कुल सदस्यों का आधा है। निर्णय उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के भारित मतों के तीन-चौथाई से होता है: केंद्र के मतों का भार एक-तिहाई और सभी राज्यों के मतों का सम्मिलित भार दो-तिहाई है। इसलिए केंद्र अकेला किसी निर्णय को पारित नहीं करा सकता, और राज्य भी बिना केंद्र की सहमति के निर्णय नहीं करा सकते। अनुच्छेद 279A(11) में विवाद-निपटारे की व्यवस्था भी है। संघीय प्रावधान होने के कारण 279A जैसे बदलावों के लिए अनुच्छेद 368(2) के परंतुक के अनुसार आधे राज्यों का अनुसमर्थन चाहिए था।

यह ढाँचा साझा निर्णय की उत्कृष्ट मिसाल है, पर सर्वोच्च न्यायालय ने मोहित मिनरल्स (2022) में साफ़ किया कि परिषद की सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं, केवल प्रेरक हैं। यानी सहकारी संघवाद में भी संसद और राज्य विधानमंडल अपनी क़ानून-शक्ति नहीं खोते।

सरकारिया बनाम पुंछी आयोग

सरकारिया आयोग

गठन9 जून 1983

अध्यक्षन्यायमूर्ति आर.एस. सरकारिया

रिपोर्ट1988; कुल 247 सिफ़ारिशें

प्रशासनिक पहलूअनुच्छेद 256, 257 और 365 अंतिम उपाय; 258 का अधिक उपयोग; अखिल भारतीय सेवाएँ मज़बूत; स्थायी अंतर-सरकारी परिषद; क्षेत्रीय परिषदों में बदलाव

वर्तमान स्थिति1990 में अंतर-राज्य परिषद बनी

पुंछी आयोग

गठन27 अप्रैल 2007 (राजपत्र; 3 जुलाई 2007 को संशोधित)

अध्यक्षन्यायमूर्ति मदन मोहन पुंछी

रिपोर्ट31 मार्च 2010; सात खंड, 273 सिफ़ारिशें

प्रशासनिक पहलूविचार-विषयों में 355 के तहत संघ की स्वतः तैनाती और केंद्रीय क़ानून-प्रवर्तन एजेंसी शामिल थे; राज्यपाल के विवेकाधिकार पर कथन 2025 के निर्णय में उद्धृत

वर्तमान स्थितिस्थायी समिति ने 2017 और 2018 में विचार किया; राज्यों की अद्यतन टिप्पणियाँ माँगी जा रही हैं; परिषद ने निर्णय नहीं किया (फ़रवरी 2023)

विश्लेषण: पुंछी रिपोर्ट के अपुष्ट हिस्से

पुंछी आयोग की प्रशासनिक सिफ़ारिशों का पूरा आधिकारिक पाठ इस पृष्ठ के लिए नहीं खोला जा सका, इसलिए केवल गठन, आकार और विचार-विषय (MHA, PIB) तथा 2025 के निर्णय में उद्धृत बिंदु लिए गए हैं। 2025 के निर्णय में आयोग के आधार पर कहा गया कि राज्यपाल का विवेकाधिकार संकीर्ण है, अनुच्छेद 200 और 201 पर समय-सीमाएँ चाहिए, राष्ट्रपति के लिए अनुच्छेद 201 में छह महीने सुझाए गए, और स्वीकृति रोके जाने पर अनुच्छेद 143 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को संदर्भ वांछनीय है। उत्तर लिखते समय इन्हें "2025 के निर्णय में उद्धृत" कहकर लिखें। राज्यपाल का विस्तृत पक्ष राज्यपाल वाले पृष्ठ में है।

संघात्मक बनाम एकात्मक विशेषताएँ (2013 का प्रश्न)

संघात्मक विशेषताएकात्मक विशेषता
दोहरी शासन-व्यवस्था: संघ और राज्यअनुच्छेद 1: "भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ होगा"; राज्य संघ से अलग होने के अधिकारी नहीं
लिखित और सर्वोच्च संविधानअनुच्छेद 3: संसद राज्यों के क्षेत्र, सीमा और नाम बदल सकती है; राज्य विधानमंडल के केवल विचार लिए जाते हैं
सातवीं अनुसूची में शक्तियों का बँटवाराअनुच्छेद 249 और 256 से 257: संसद राज्य सूची पर कुछ स्थितियों में क़ानून बना सकती है; संघ निर्देश दे सकता है
स्वतंत्र न्यायपालिकाअनुच्छेद 352 से 356: आपातकाल और राष्ट्रपति शासन में संघ का नियंत्रण
संघीय प्रावधानों के संशोधन में आधे राज्यों का अनुसमर्थन (अनुच्छेद 368(2) परंतुक)राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा (अनुच्छेद 155); अखिल भारतीय सेवाएँ (अनुच्छेद 312); एकीकृत न्यायपालिका (सरकारिया, 3.1.06)

बोम्मई (1994) के अनुसार संविधान ने "केंद्र की ओर झुकाव वाला संघ" बनाया। डॉ. आंबेडकर के कथन का हवाला सरकारिया रिपोर्ट (1.3.21) में है।

उप-राष्ट्रीय सरकार (Sub-national government): 2023 का प्रश्न

राष्ट्रीय या केंद्र सरकार के नीचे जो भी सरकारें हैं, वे उप-राष्ट्रीय सरकारें हैं। OECD और ADB (2023) की श्रेणी में ये क्षेत्रीय, मध्यवर्ती और नगरपालिका स्तर की सरकारें हैं। भारत में इसका मुख्य अर्थ राज्य सरकारें हैं (भाग VI), और व्यापक अर्थ में पंचायतें (भाग IX) तथा नगरपालिकाएँ (भाग IXA) भी। इसीलिए संघ-राज्य संबंध के बाद राज्य-स्थानीय संबंध पढ़ना ज़रूरी है।

निर्देश से राष्ट्रपति शासन तक की सीढ़ी

  1. अनुच्छेद 256 और 257

    संघ का निर्देश

  2. अनुच्छेद 355

    मध्यवर्ती उपाय

  3. अनुच्छेद 365

    पालन न होने पर मान्यता

  4. अनुच्छेद 356

    राष्ट्रपति शासन

  5. बोम्मई (1994)

    न्यायिक समीक्षा और संसद का अनुमोदन

क्रम अनुच्छेदों की शब्दावली और सरकारिया तथा बोम्मई की व्याख्या के अनुसार।

समन्वय की संस्थाएँ

संघ-राज्य समन्वय

संविधानिक

  • अनुच्छेद 263 अंतर-राज्य परिषद
  • अनुच्छेद 279A GST परिषद

वैधानिक

  • क्षेत्रीय परिषदें (1956 का अधिनियम)

कार्यकारी

  • नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल

सेवा-तंत्र

  • अखिल भारतीय सेवाएँ (अनुच्छेद 312)

समय-रेखा: संघ-राज्य संबंध

  1. 1951

    अखिल भारतीय सेवा अधिनियम (29 अक्टूबर)

  2. 1956

    राज्य पुनर्गठन अधिनियम; क्षेत्रीय परिषदें

  3. 1966

    भारतीय वन सेवा का गठन (1 जुलाई)

  4. 1983 और 1988

    सरकारिया आयोग का गठन (9 जून 1983) और रिपोर्ट

  5. 1990

    अंतर-राज्य परिषद (28 मई)

  6. 1994

    बोम्मई निर्णय (11 मार्च)

  7. 2007 और 2010

    पुंछी आयोग का गठन (27 अप्रैल) और रिपोर्ट (31 मार्च)

  8. 2015

    नीति आयोग (1 जनवरी का प्रस्ताव)

  9. 2016

    101वाँ संशोधन और GST परिषद

  10. 2022

    मोहित मिनरल्स निर्णय (19 मई)

  11. 2025

    तमिलनाडु राज्य बनाम राज्यपाल निर्णय (8 अप्रैल)

मुख्य तथ्य

प्रशासनिक संबंध
भाग XI अध्याय II, अनुच्छेद 256 से 263 (संविधान, 2024)
अनुच्छेद 365
निर्देश का पालन न होने पर राष्ट्रपति की मान्यता (संविधान, 2024)
अखिल भारतीय सेवा अधिनियम
29 अक्टूबर 1951; केवल IAS, IPS, IFS (2022)
अंतर-राज्य परिषद
28 मई 1990; अध्यक्ष प्रधानमंत्री; 11वीं बैठक 16 जुलाई 2016
क्षेत्रीय परिषदें
राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956, धाराएँ 14 से 22; अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री
नीति आयोग
1 जनवरी 2015 का प्रस्ताव; 11वीं गवर्निंग काउंसिल बैठक 11 जून 2026
सरकारिया आयोग
1983 में गठित, 1988 की रिपोर्ट, 247 सिफ़ारिशें
पुंछी आयोग
2007 में गठित, 31 मार्च 2010 की रिपोर्ट, 273 सिफ़ारिशें
GST परिषद
अनुच्छेद 279A, 101वाँ संशोधन 2016; निर्णय तीन-चौथाई भारित मतों से
बोम्मई
11 मार्च 1994, नौ-न्यायाधीश पीठ
मोहित मिनरल्स
19 मई 2022: GST परिषद की सिफ़ारिशें प्रेरक

राजस्थान का पहलू

राजस्थान सरकार के आधिकारिक पोर्टलों से इस पृष्ठ के लिए कोई तथ्य सत्यापित नहीं हो सका, इसलिए यहाँ केवल संविधान, राज्य पुनर्गठन अधिनियम, MHA/PIB और सर्वोच्च न्यायालय से मिले तथ्य हैं (जाँच: 1 अक्टूबर 2026)। राजस्थान उत्तरी क्षेत्रीय परिषद का सदस्य है, जिसमें हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और चंडीगढ़ भी हैं (PIB, 16 नवंबर 2025)। 1977 में जिन नौ राज्यों की सरकारें बर्ख़ास्त हुईं, उनमें राजस्थान भी था (NCRWC पत्र); उसी वर्ष का राजस्थान राज्य बनाम भारत संघ वाद (सात-न्यायाधीश पीठ) सरकारिया रिपोर्ट (3.4.02) में इस बिंदु पर उद्धृत है कि अनुच्छेद 256 और 257 के निर्देश विधानसभा के विघटन जैसे मामले तक नहीं पहुँचते, क्योंकि अनुच्छेद 174 के तहत वह राज्य का अनन्य विषय है।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • अनुच्छेद 355 को "शक्ति" लिखना। यह संघ का कर्तव्य है, 356 से पहले की सीढ़ी है।
  • अंतर-राज्य परिषद को संवैधानिक रूप से अनिवार्य बताना। अनुच्छेद 263 केवल स्थापना की अनुमति देता है; परिषद 1990 में बनी।
  • क्षेत्रीय परिषदों को संवैधानिक मानना। वे 1956 के अधिनियम से बनी हैं और केवल सलाहकारी हैं।
  • बोम्मई में केवल "न्यायिक समीक्षा" लिखकर रुक जाना। विधानसभा का निलंबन (भंग नहीं), दोनों सदनों का अनुमोदन और बहाली का उपचार भी लिखें।
  • सरकारिया (1988) और पुंछी (2010) को आपस में मिलाना, या पुंछी की सिफ़ारिशों को लागू बताना। स्थिति अभी विचाराधीन है।
  • GST परिषद के निर्णयों को बाध्यकारी बताना। मोहित मिनरल्स (2022) के अनुसार वे प्रेरक हैं।