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पेपर III · इकाई II

मानव संबंध उपागम (Human Relations Approach)

मानव संबंध उपागम क्या है, हॉथॉर्न अध्ययनों के चार चरण, अनौपचारिक संगठन, वैज्ञानिक प्रबंध से अंतर और आलोचना, 2018 के नव-शास्त्रीय प्रश्न के हल के साथ।

  • मेयो
  • हॉथॉर्न
  • अनौपचारिक संगठन
  • नव-शास्त्रीय
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II: "Public Administration: Theories and Principles. ... Theories and approaches: Scientific Management, Human Relations, Behavioural, Structural-Functional, Ecological. Principles of organisation: hierarchy, unity of command, span of control, delegation, centralisation and decentralisation, coordination, authority and responsibility, accountability. Administrative behaviour: leadership, communication, morale." इस पृष्ठ पर मानव संबंध उपागम (Human Relations) है, जिसे पाठ्यपुस्तकें नव-शास्त्रीय (Neo-Classical) विचारधारा भी कहती हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में इस विषय से जुड़ा एक प्रश्न है: 2018 में "प्रशासन की नव-शास्त्रीय विचारधारा की मुख्य मान्यताएँ" (5 अंक)। नव-शास्त्रीय का मानव संबंध उपागम से मिलान एक विश्लेषणात्मक निर्णय है (सीमारेखा प्रश्न), इसलिए उत्तर में दोनों नाम साथ लिखना सुरक्षित है।
  • सिलेबस की तीनों शुरुआती उपागम-सूची में यह बीच की कड़ी है: वैज्ञानिक प्रबंध की प्रतिक्रिया और व्यवहारवादी उपागम की भूमिका। इसलिए "मानव संबंध बनाम वैज्ञानिक प्रबंध" जैसी तुलना की तैयारी ज़रूरी है।
  • हॉथॉर्न की कहानी रटने की नहीं, तर्क से लिखने की चीज़ है: कौन-सा प्रयोग क्या दिखाने गया, क्या निकला और आज क्या आलोचना है। नीचे हर चरण के साथ यह तालिका और केस स्टडी दी गई है।

पहले सरल भाषा में: दफ़्तर की चाय-मंडली

एक सरकारी दफ़्तर सोचिए। नियम-पुस्तिका में लिखा है कि फ़ाइल किस मेज़ से किस मेज़ तक जाएगी, पर असल में तीन बाबू रोज़ दोपहर की चाय साथ पीते हैं और आपस में तय कर लेते हैं कि कितनी फ़ाइलें निपटानी हैं ताकि कोई "ज़्यादा तेज़" या "ज़्यादा सुस्त" न दिखे। नया बाबू जो अकेला बहुत तेज़ चलता है, उसे चाय-मंडली से किनारे कर दिया जाता है। दूसरी ओर, जिस शाखा अधिकारी ने कभी बाबुओं की बात सुनी, उसकी शाखा में काम भी बेहतर चलता है। यह नियमों से नहीं, आपसी रिश्तों, अपनेपन और सम्मान से चलने वाला अदृश्य ढाँचा है। मानव संबंध उपागम (Human Relations approach) ठीक इसी अदृश्य पक्ष को गंभीरता से लेता है। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया उदाहरण है, किसी वास्तविक दफ़्तर का वर्णन नहीं।)

परीक्षा के लिए सटीक रूप। मानव संबंध उपागम प्रबंध और प्रशासन का वह दृष्टिकोण है जो मानता है कि कर्मचारी केवल नियमों, अधिकार-श्रृंखला और आर्थिक प्रोत्साहनों से नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकताओं, भावनाओं और अभिवृत्तियों से भी संचालित होते हैं, इसलिए उत्पादकता का रहस्य कार्य-समूह के सामाजिक संबंधों, पर्यवेक्षण के ढंग और मनोबल में है। NCERT इसे "नव-शास्त्रीय सिद्धांत, मानव संबंध उपागम" कहती है और इसका काल 1920 से 1950 के दशकों के बीच बताती है; उसके अनुसार मानवीय पक्ष की ओर यह ध्यान आगे चलकर व्यवहारवादी विज्ञानों का पूर्वगामी बना।

पृष्ठभूमि: हॉथॉर्न कारख़ाना और एल्टन मेयो

इस उपागम की जड़ें हॉथॉर्न अध्ययनों (Hawthorne Studies) में हैं, जो वेस्टर्न इलेक्ट्रिक कंपनी (Western Electric Company) के शिकागो स्थित हॉथॉर्न वर्क्स में हुए। Harvard Business School की ऐतिहासिक सामग्री बताती है कि उस दौर में कंपनी कर्मचारी-कल्याण पर काफ़ी ख़र्च करती थी: पेंशन, बीमारी में वेतन, खेल और शिक्षा के कार्यक्रम, सुरक्षा-उपकरण। साथ ही, कंपनी सामाजिक, व्यवहार और चिकित्सा विज्ञानों की मदद से यह समझना चाहती थी कि श्रमिक की उत्पादकता और संतोष किन चीज़ों पर टिकते हैं।

एल्टन मेयो (Elton Mayo) का जन्म 1880 में एडिलेड (ऑस्ट्रेलिया) में हुआ; वे अमेरिका में हार्वर्ड के औद्योगिक अनुसंधान से जुड़े। मेयो का मानना था, HBS के अनुसार, कि श्रमिक के मन को समझना औद्योगिक अशांति की कुंजी है। उनकी प्रमुख पुस्तक The Human Problems of an Industrial Civilization 1933 की है, और हॉथॉर्न का विस्तृत लेखा-जोखा Management and the Worker (1939) में छपा, जिसके लेखक रॉथ्लिसबर्गर (F. J. Roethlisberger) और डिक्सन (W. J. Dickson) हैं (HBS इसमें हेरल्ड राइट का नाम भी जोड़ता है)। ध्यान रहे कि स्रोत इस पर एकमत नहीं कि मेयो कब जुड़े: Britannica 1927 से बताती है, जबकि HBS के पुस्तकालय के अनुसार 1928 में हॉथॉर्न में उनका स्वागत हुआ। मूल रिपोर्ट के अनुसार मेयो और उनके सहयोगी अध्ययनों में लगभग शुरुआत से सलाहकार रहे। उत्तर में "लगभग 1927-28 से" लिखना सुरक्षित है।

हॉथॉर्न के चार चरण

चरणअवधिक्या किया गयाक्या सीखा
1. प्रकाश वाले प्रयोग1924 से 1927 (राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद के साथ)तीन विभागों में रोशनी घटाई-बढ़ाई, फिर नियंत्रण-समूह के साथ तुलनाप्रकाश और उत्पादन में सीधा संबंध नहीं मिला; प्रकाश अनेक कारकों में एक मामूली कारक निकला
2. रिले असेंबली टेस्ट रूम1927 से 1932 तक चलता रहाछह महिलाओं को अलग कमरे में रखकर विश्राम, घंटे और प्रोत्साहन बदलेउत्पादन ऊपर की ओर बढ़ा, किसी एक बदलाव से सीधा नहीं जुड़ा; टोली-भावना और पर्यवेक्षण की भूमिका दिखी
3. साक्षात्कार-कार्यक्रम1928 से 1930हज़ारों कर्मचारियों से खुली, ग़ैर-निर्देशित बातचीतकर्मचारी अपनापन और सामाजिक रिश्तों को बहुत महत्व देते हैं; शिकायतें अक्सर भावनात्मक होती हैं
4. बैंक वायरिंग ऑब्ज़र्वेशन रूम1931-32 (मूल रिपोर्ट के अनुसार नवंबर 1931 से मई 1932)14 पुरुष कर्मचारियों का सीधा अवलोकन, बिना कोई बदलाव किएसमूह ने अपने अलिखित नियम और 'उचित कोटा' तय कर रखा था; उत्पादन उसी के भीतर रहा

बैंक वायरिंग की सटीक तिथियाँ केवल मूल पुस्तक में मिलीं।

प्रकाश वाले प्रयोग: जो नतीजा सोचा था, वह नहीं मिला

सबसे पुराना सवाल सीधा था: क्या ज़्यादा रोशनी से ज़्यादा उत्पादन होता है? कंपनी ने राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद (National Research Council) के साथ 1924 से 1927 तक यह परखा। पहला प्रयोग तीन अलग विभागों में हुआ, जिनमें एक विभाग छोटे पुर्ज़ों का निरीक्षण करता था, दूसरा रिले जोड़ता था और तीसरा कुंडली लपेटता था। रोशनी बढ़ाने पर उत्पादन रोशनी के अनुपात में नहीं बदला; मूल रिपोर्ट के अनुसार वह कभी ऊपर, कभी नीचे होता रहा।

इसके बाद प्रयोग का डिज़ाइन सुधारा गया। एक ही तरह के कार्य वाले श्रमिकों को दो टोलियों में बाँटा गया: एक "परीक्षण समूह" जिसकी रोशनी बदली जाती थी और एक "नियंत्रण समूह" जिसकी रोशनी लगभग स्थिर रखी जाती थी। रिपोर्ट के अनुसार दोनों समूहों का उत्पादन लगभग एक जैसा बढ़ा। एक अगले प्रयोग में परीक्षण समूह की रोशनी घटाई गई, फिर भी दोनों का उत्पादन लगातार बढ़ता रहा, और जब रोशनी बहुत कम हुई तब श्रमिकों ने शिकायत की और उत्पादन घटा।

निष्कर्ष, जो कंपनी ने ख़ुद निकाला: प्रकाश उत्पादन को प्रभावित करने वाले अनेक कारकों में केवल एक और शायद मामूली कारक है; और बड़े कार्य-समूहों में बहुत-से कारक एक साथ चलते हैं, इसलिए किसी एक को अलग करके मापना मुश्किल है। यही सोच अगले चरण, छोटे और अलग किए गए समूह वाले रिले असेंबली टेस्ट रूम, तक ले गई।

रिले असेंबली टेस्ट रूम: छह महिलाओं का कमरा

इस प्रयोग में छह महिला श्रमिकों को नियमित विभाग से अलग एक कमरे में रखा गया। मूल रिपोर्ट के अनुसार उनमें से पाँच रिले जोड़ती थीं और छठी "लेआउट ऑपरेटर" थी जो काम बाँटती और पुर्ज़े लाती थी। Harvard Business School की सामग्री के अनुसार ये अविवाहित युवतियाँ थीं जो अपने परिवारों की आर्थिक मदद भी करती थीं। शोधकर्ताओं ने विश्राम के अंतराल, काम के घंटे और मज़दूरी-प्रोत्साहन जैसी चीज़ें बदलीं और उनका असर देखा।

नतीजा अप्रत्याशित था। मूल रिपोर्ट के अनुसार, विश्राम या घंटों के किसी ख़ास बदलाव से स्वतंत्र, उत्पादन में एक सामान्य ऊपर की ओर रुझान दिखा, जिसने शोधकर्ताओं को चकित किया। उन्होंने यह भी पाया कि मज़दूरी-प्रोत्साहन को उत्पादन-वृद्धि का अकेला कारण मानने के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं है। HBS के अनुसार मेयो ने इसे इस रूप में समझा कि छह व्यक्ति एक टोली बन गए और टोली ने प्रयोग में सहयोग किया; उन्हें कमरे की अनौपचारिक आज़ादी, बातचीत और दोस्ती का अहसास हुआ। मेयो और रॉथ्लिसबर्गर इस नतीजे पर पहुँचे कि मानसिक अभिवृत्ति, उचित पर्यवेक्षण और समूह में बने अनौपचारिक सामाजिक संबंध उत्पादकता और संतोष की कुंजी हैं।

साक्षात्कार और बैंक वायरिंग कक्ष: अनौपचारिक संगठन की खोज

1928 से 1930 के बीच हज़ारों कर्मचारियों से बातचीत हुई। HBS के अनुसार मेयो और रॉथ्लिसबर्गर की देखरेख में 21,000 से अधिक साक्षात्कार हुए। शुरू में सवाल सीधे पूछे जाते थे, पर जल्द समझ आ गया कि कर्मचारी तब खुलकर बोलते हैं जब उन्हें अपनी पसंद के विषय पर बोलने दिया जाए। इसलिए साक्षात्कार "सुनने की प्रक्रिया" बना, जिसे ग़ैर-निर्देशित (nondirected) साक्षात्कार कहते हैं। रॉथ्लिसबर्गर ने पाया कि कर्मचारियों को सबसे ज़्यादा संतोष आपसी जुड़ाव से मिलता है। इन साक्षात्कारों के नतीजे कार्मिक-नीतियों और पर्यवेक्षकों के प्रशिक्षण में इस्तेमाल हुए और बाद में नियमित परामर्श-कार्यक्रम भी शुरू हुआ।

बैंक वायरिंग कक्ष में 14 पुरुष कर्मचारियों को बिना कोई बदलाव किए सीधे देखा गया। यहाँ कोई प्रोत्साहन-परिवर्तन नहीं था और उत्पादन में कोई बदलाव नहीं आया; HBS के अनुसार इसका कारण आंशिक रूप से कामगारों की यह अलिखित समझ थी कि वे जिसे "उचित कोटा" मानते हैं उससे अधिक नहीं बनाएँगे। मूल रिपोर्ट इस समूह के चार अनौपचारिक नियम बताती है: बहुत ज़्यादा काम मत करो (वरना "रेट-बस्टर"), बहुत कम मत करो (वरना "चिज़लर"), पर्यवेक्षक को ऐसा कुछ मत बताओ जिससे साथी का नुक़सान हो (वरना "स्क्वीलर"), और अफ़सरी मत दिखाओ। जो इन नियमों के अनुसार चला, वह समूह में अधिक स्वीकार्य रहा। यह औपचारिक संगठन के भीतर अनौपचारिक संगठन (informal organisation) की सबसे साफ़ तस्वीर है।

औपचारिक बनाम अनौपचारिक संगठन

औपचारिक संगठन

बनता कैसे हैनियम, पद और अधिकार-श्रृंखला से

नियमलिखित; पदानुक्रम में दिखते हैं

नेतृत्वपद से मिला अधिकार

हॉथॉर्न में उदाहरणकंपनी का बोगी (मानक) और दैनिक कार्य-योजना

प्रबंध के लिए संदेशअकेला पर्याप्त नहीं

अनौपचारिक संगठन

बनता कैसे हैकाम के दौरान आपसी रिश्तों, पसंद और साझा भावनाओं से

नियमअलिखित; समूह के मानदंड (norms), जैसे 'उचित कोटा'

नेतृत्वसमूह का स्वीकार किया हुआ नेता

हॉथॉर्न में उदाहरणबैंक वायरिंग कक्ष के चार अलिखित नियम; रिले कमरे की दोस्ती

प्रबंध के लिए संदेशसमझना और सहयोग में बदलना ज़रूरी

पहली पंक्तियाँ प्रबंध-पाठ्यपुस्तकों की स्थापित तुलना हैं (विश्लेषण); हॉथॉर्न वाली पंक्ति Roethlisberger और Dickson (1939) और HBS पर आधारित है।

मानव संबंध उपागम की मुख्य मान्यताएँ (2018 के प्रश्न का आधार)

NCERT के अनुसार यह विचारधारा मानती है कि कर्मचारी केवल नियमों, अधिकार-श्रृंखला और आर्थिक प्रोत्साहनों के प्रति तर्कसंगत ढंग से प्रतिक्रिया नहीं करते, बल्कि सामाजिक आवश्यकताओं, चाहतों और अभिवृत्तियों से भी निर्देशित होते हैं। हॉथॉर्न की खोजों के आधार पर इसकी मुख्य मान्यताएँ इस तरह सामने आती हैं।

पहली, मनुष्य सामाजिक प्राणी है: केवल वेतन नहीं, अपनापन, सम्मान और समूह की स्वीकृति भी उसे प्रेरित करती है। दूसरी, हर औपचारिक संगठन के भीतर अनौपचारिक समूह बनते हैं, जिनके अपने मानदंड और नेता होते हैं और जो उत्पादन तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। तीसरी, उत्पादकता भौतिक परिस्थितियों से ज़्यादा मानसिक अभिवृत्ति, पर्यवेक्षण के ढंग और समूह-संबंधों पर टिकती है। चौथी, कर्मचारियों की बात सुनना, उन्हें अपनी भावना व्यक्त करने का अवसर देना और उनकी भागीदारी लेना मनोबल बढ़ाता है। पाँचवीं (विश्लेषण), इसलिए पर्यवेक्षक और प्रबंधक में केवल तकनीकी योग्यता नहीं, मानवीय व्यवहार और संवाद का कौशल भी चाहिए।

वैज्ञानिक प्रबंध बनाम मानव संबंध

वैज्ञानिक प्रबंध (टेलर)

मनुष्य की छविमुख्यतः आर्थिक लाभ से प्रेरित प्राणी

उत्पादकता का स्रोतकार्य-विधि, मानकीकरण, प्रोत्साहन

संगठन पर नज़रऔपचारिक ढाँचा और काम

साक्ष्य का स्रोतसमय और गति अध्ययन, प्रयोग शॉप-फ़्लोर पर

मुख्य सीमामानवीय पक्ष की उपेक्षा

मानव संबंध (मेयो)

मनुष्य की छविसामाजिक आवश्यकताओं और भावनाओं वाला प्राणी

उत्पादकता का स्रोतसमूह-संबंध, मनोबल, पर्यवेक्षण

संगठन पर नज़रऔपचारिक के भीतर अनौपचारिक समूह भी

साक्ष्य का स्रोतहॉथॉर्न: प्रकाश, टेस्ट रूम, साक्षात्कार, अवलोकन

मुख्य सीमाआर्थिक और संरचनात्मक पक्ष की उपेक्षा; शोध-पद्धति पर प्रश्न (विश्लेषण)

पहली पंक्ति NCERT के 'तर्कसंगत आर्थिक दृष्टिकोण' और 'मानव संबंध' के वर्णन पर आधारित; शेष का आधार इस पृष्ठ के पिछले अनुभाग।

आलोचना: हॉथॉर्न पर आज के प्रश्न

पहली आलोचना शोध की गुणवत्ता पर है। Harvard Business School का अपना विवरण कहता है कि कई आलोचकों ने इन अध्ययनों को पद्धति और विचारधारा, दोनों दृष्टियों से दोबारा परखा है। अर्थशास्त्री स्टीवन लेविट (Steven Levitt) और जॉन लिस्ट (John List) ने (American Economic Journal: Applied Economics, 2011) प्रकाश-प्रयोग के मूल आँकड़े खोज निकाले और निष्कर्ष दिया कि लोकप्रिय कहानियों में बताए गए नाटकीय पैटर्न उन आँकड़ों में नहीं दिखते। इज़ावा, फ़्रेंच और हेज (Human Factors, 2011) ने भी पाया कि रोशनी और उत्पादन के बीच संबंध का प्रमाण असंगत है और तीनों प्रयोगों में गंभीर पद्धतिगत कमियाँ थीं।

दूसरी आलोचना निष्कर्षों के सामान्यीकरण पर है। बैंक वायरिंग कक्ष में अच्छे आपसी संबंध थे, फिर भी समूह ने उत्पादन सीमित रखा। यानी "प्रसन्न कर्मचारी ज़्यादा उत्पादक होता है" वाला सरल सूत्र हर परिस्थिति में नहीं टिकता; यह समूह के मानदंडों पर निर्भर है (विश्लेषण)। तीसरी, HBS बताता है कि मेयो का नज़रिया यह था कि एक प्रशासक-वर्ग श्रमिकों के मनोबल को सुधारने के तरीक़े विकसित करे, ताकि सामाजिक स्थिरता बनी रहे; इसे प्रबंध-पक्षीय झुकाव के रूप में पढ़ा जा सकता है (विश्लेषण)। चौथी (विश्लेषण), यह उपागम श्रमिक संघों, सामूहिक सौदेबाज़ी, संगठन की संरचना और बाहरी वातावरण पर कम ध्यान देता है।

परीक्षा में एक अलग बात समझ लें। "हॉथॉर्न प्रभाव" (Hawthorne effect) वह घटना है जिसमें लोग इसलिए अपना व्यवहार या प्रदर्शन बदल देते हैं कि उन पर नज़र रखी जा रही है। HBS के अनुसार रॉथ्लिसबर्गर ने इसे इसी रूप में बताया। ऊपर की आलोचनाओं के बाद यह कहना कि प्रकाश-प्रयोग से हॉथॉर्न प्रभाव "सिद्ध" हो गया था, ग़लत होगा।

लोक प्रशासन में उपयोग (विश्लेषण)

विश्लेषण (स्रोत-आधारित तथ्य नहीं): मानव संबंध की सीख सरकारी दफ़्तर में कई रूपों में दिखती है। शिकायत-निवारण की बैठकें और सुझाव-पेटी अधीनस्थों को अपनी बात कहने का मंच देती हैं; प्रशिक्षण में संवाद और नेतृत्व जैसे विषय शामिल करना पर्यवेक्षक की मानवीय क्षमता बढ़ाता है; समूह में कार्य-बँटवारे और टीम-भावना पर ध्यान मनोबल सुधारता है। पर लोक सेवा में नियम, जवाबदेही और संविधान-प्रदत्त ढाँचे की सीमा भी है, इसलिए मानव संबंध की सीख वैधानिक ढाँचे के भीतर ही काम करती है। प्रशासनिक व्यवहार (नेतृत्व, संचार, मनोबल) के पृष्ठों में इन्हीं बातों का विस्तार आएगा।

हॉथॉर्न से मानव संबंध तक की कड़ी

  1. प्रकाश-प्रयोग (1924-27)

    रोशनी से सीधा संबंध नहीं मिला

  2. रिले टेस्ट रूम (1927-32)

    टोली-भावना और पर्यवेक्षण उभरे

  3. साक्षात्कार (1928-30)

    कर्मचारी अपनेपन को महत्व देते हैं

  4. बैंक वायरिंग कक्ष

    समूह के अलिखित नियम और 'उचित कोटा'

  5. मानव संबंध उपागम

    सामाजिक आवश्यकताओं और अनौपचारिक संगठन पर ज़ोर

क्रम हॉथॉर्न के चार चरणों का है; "मानव संबंध उपागम" उनका सार है।

एक नज़र में: मानव संबंध उपागम

मानव संबंध उपागम

हॉथॉर्न (वेस्टर्न इलेक्ट्रिक)

  • प्रकाश 1924-27
  • रिले रूम 1927-32
  • साक्षात्कार 1928-30 (21,000 से अधिक)
  • बैंक वायरिंग: 14 पुरुष

प्रमुख नाम

  • एल्टन मेयो
  • रॉथ्लिसबर्गर
  • डिक्सन

मान्यताएँ

  • सामाजिक प्राणी
  • अनौपचारिक समूह
  • मनोबल और पर्यवेक्षण
  • सुनवाई और भागीदारी

आलोचना

  • आँकड़ों का पुनर्विश्लेषण
  • समूह-मानदंड अलग-अलग दिशा में
  • संघ और संरचना की उपेक्षा

समय-रेखा: मानव संबंध उपागम

  1. 1924-1927

    प्रकाश वाले प्रयोग (राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद के साथ)

  2. 1927

    रिले असेंबली टेस्ट रूम शुरू; 1932 तक चला

  3. 1928-1930

    साक्षात्कार-कार्यक्रम; 21,000 से अधिक साक्षात्कार

  4. 1933

    मेयो की The Human Problems of an Industrial Civilization

  5. 1939

    Management and the Worker (रॉथ्लिसबर्गर और डिक्सन)

  6. 2011

    लेविट-लिस्ट और इज़ावा आदि द्वारा प्रकाश-प्रयोग के आँकड़ों का पुनर्विश्लेषण

बैंक वायरिंग कक्ष की तिथि 1931-32 मूल रिपोर्ट के अनुसार है।

मुख्य तथ्य

स्थान
हॉथॉर्न वर्क्स, वेस्टर्न इलेक्ट्रिक कंपनी, शिकागो
प्रकाश वाले प्रयोग
1924 से 1927; राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद के साथ
रिले असेंबली टेस्ट रूम
1927 से 1932; छह महिलाएँ
साक्षात्कार
1928 से 1930; 21,000 से अधिक साक्षात्कार
बैंक वायरिंग कक्ष
14 पुरुष कर्मचारी; 'उचित कोटा' की अलिखित समझ
मेयो की मुख्य पुस्तक
The Human Problems of an Industrial Civilization (1933)
Management and the Worker
1939
आलोचना
लेविट और लिस्ट (2011); इज़ावा, फ़्रेंच, हेज (2011)
अंतिम जाँच
1 अक्टूबर 2026

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • "हॉथॉर्न में रोशनी बढ़ाने से उत्पादन बढ़ा" लिखना: स्रोतों के अनुसार उत्पादन रोशनी से सीधे नहीं बँधा था; नियंत्रण-समूह में भी वृद्धि हुई।
  • टेस्ट रूम की वृद्धि का कारण केवल पैसे या केवल रोशनी बताना: मूल रिपोर्ट मज़दूरी-प्रोत्साहन को अकेला कारण नहीं मानती; टोली-भावना, पर्यवेक्षण और अभिवृत्ति पर ज़ोर है।
  • तिथियाँ गड्डमड्ड करना: प्रकाश 1924 से 1927, रिले रूम 1927 से 1932, साक्षात्कार 1928 से 1930, बैंक वायरिंग 1931-32। पुस्तकें 1933 (मेयो) और 1939 (Management and the Worker)।
  • नव-शास्त्रीय का अर्थ "नव-क्लासिकल अर्थशास्त्र" लेना: यहाँ यह प्रबंध-विचारधारा है, अर्थशास्त्र का सिद्धांत नहीं।
  • मानव संबंध को केवल प्रशंसा के साथ लिखना: आलोचना (पद्धति पर प्रश्न, संघ और संरचना की उपेक्षा) जोड़े बिना 5-10 अंक के उत्तर अधूरे रहते हैं।
  • "हॉथॉर्न प्रभाव" और "हॉथॉर्न अध्ययन" को एक समझना: अध्ययन शोध-शृंखला है, प्रभाव उसके बाद चर्चित एक अवधारणा।