मुख्य सामग्री पर जाएं
पेपर III · इकाई II

संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक उपागम (रिग्स का प्रिज़्मीय-सैला मॉडल)

संरचना और प्रकार्य का अर्थ, पार्सन्स-मर्टन-अल्मंड की पृष्ठभूमि, और रिग्स का संलयित-प्रिज़्मीय-विवर्तित तथा प्रिज़्मीय-सैला मॉडल, उदाहरण और उत्तर-लेखन के साथ।

  • संरचना
  • प्रकार्य
  • रिग्स
  • सैला
  • विषमता
  • औपचारिकता
  • अतिव्यापन
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II: "Theories and approaches: Scientific Management, Human Relations, Behavioural, Structural-Functional, Ecological." इस पृष्ठ पर संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक उपागम (Structural-Functional Approach) है, जिसमें अल्मंड, पार्सन्स, मर्टन और रिग्स का प्रिज़्मीय-सैला मॉडल शामिल है। पारिस्थितिकीय उपागम का अलग पृष्ठ है।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में इस उपागम पर सीधा प्रश्न नहीं मिला। पर 2013-2024 के पेपरों में सिद्धांत-आधारित प्रश्न बार-बार देखे गए, जैसे 2024 में नव लोक प्रबंध के विरोधाभास (5 अंक) और उत्तर-आधुनिकतावाद (5 अंक)। यानी किसी भी उपागम को परिभाषा, मुख्य विचारक और एक उदाहरण के साथ तैयार रखना ज़रूरी है।
  • 2024 में तुलनात्मक लोक प्रशासन में रिग्स के तीन रुझान पूछे गए (2 अंक)। रिग्स का पूरा ढाँचा संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक है, इसलिए यह पृष्ठ उस प्रश्न की पृष्ठभूमि भी पक्की करता है।
  • यह उपागम अवधारणाओं की एक छोटी शब्दावली माँगता है: संरचना, प्रकार्य, संलयित, प्रिज़्मीय, विवर्तित, विषमता, औपचारिकता, अतिव्यापन। इन्हें उदाहरण के साथ लिखने वाला उत्तर आम उत्तरों से अलग दिखता है।

पहले सरल भाषा में: रेलवे स्टेशन और उसके काम

एक बड़े रेलवे स्टेशन को देखिए। टिकट-खिड़की, पूछताछ-कार्यालय, स्टेशन-मास्टर का कक्ष, कुली और चाय की दुकान: ये सब संरचनाएँ (structures) हैं, यानी वे स्थायी ढर्रे जिनके सहारे स्टेशन चलता है। इनके काम, यानी प्रकार्य (functions), अलग हैं: टिकट देना, जानकारी देना, गाड़ियों का संचालन, यात्रियों की सुविधा। स्टेशन को समझने के दो तरीक़े हैं। पहला, ढाँचों की सूची बनाइए और फिर पूछिए कि हर ढाँचा क्या करता है। दूसरा, पहले पूछिए कि स्टेशन को चलते रहने के लिए कौन-से काम ज़रूरी हैं, और फिर देखिए कि उन्हें कौन-सा ढाँचा निभा रहा है। दूसरा तरीक़ा ही संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक उपागम है। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया उदाहरण है।)

इसका फ़ायदा तुलना में दिखता है। एक छोटे स्टेशन पर स्टेशन-मास्टर ही टिकट भी बाँटता है, झंडी भी दिखाता है और पार्सल भी सँभालता है: एक ढाँचा, कई काम। बड़े जंक्शन पर हर काम का अलग विभाग है। दोनों जगह टिकट बँटता है, पर ढाँचे अलग हैं। जो केवल ढाँचे गिनेगा वह उलझेगा; जो कामों से शुरू करेगा वह दोनों को एक तराज़ू पर रख सकेगा। फ़्रेड रिग्स (Fred W. Riggs) का संलयित (fused) और विवर्तित (diffracted) समाज का विचार इसी तर्क पर टिका है।

परीक्षा के लिए सटीक परिभाषाएँ। रिग्स के अपने शब्दों के अनुसार संरचना (structure) व्यवहार का ऐसा कोई भी प्रतिरूप है जो किसी सामाजिक व्यवस्था की स्थायी विशेषता बन गया हो; प्रकार्य (function) किसी संरचना के वे परिणाम हैं जो दूसरी संरचनाओं या पूरी व्यवस्था को प्रभावित करते हैं, यानी दो या अधिक संरचनाओं के बीच परस्पर निर्भरता का ढर्रा। संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक उपागम समाज को, और उसके एक उप-तंत्र के रूप में प्रशासन को, ऐसी व्यवस्था मानता है जिसके टिके रहने के लिए कुछ प्रकार्य अनिवार्य हैं; वह पूछता है कि उन प्रकार्यों को कौन-सी संरचनाएँ किस ढंग से निभा रही हैं।

यह उपागम कहाँ से आया

इसकी जड़ें समाजशास्त्र और राजनीति-विज्ञान में हैं, लोक प्रशासन ने इसे वहाँ से उधार लिया। समाजशास्त्र में टैल्कॉट पार्सन्स (Talcott Parsons) ने बताया कि हर व्यवस्था को बचे रहने के लिए चार प्रकार्यात्मक आवश्यकताएँ पूरी करनी पड़ती हैं, जिन्हें AGIL कहा जाता है। रॉबर्ट मर्टन (Robert K. Merton) ने प्रकार्यों को प्रकट (manifest) और अप्रकट (latent) में बाँटा और कुप्रकार्य (dysfunction) की धारणा जोड़ी। राजनीति-विज्ञान में गैब्रियल अल्मंड (Gabriel Almond) और जेम्स कोलमैन (James Coleman) के संपादन में The Politics of the Developing Areas (प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस, 1960) आई, जिसमें हर राजनीतिक व्यवस्था के प्रकार्यों की एक साझा सूची बनी।

लोक प्रशासन में इसे अपनाने का सुझाव सबसे पहले ड्वाइट वाल्डो (Dwight Waldo) ने 1955 में दिया; इस सुझाव को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख विद्वान रिग्स थे, जिन्होंने इसी आधार पर अपने मॉडल बनाए। इसलिए परीक्षा में संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक उपागम का मतलब व्यवहार में अक्सर रिग्स का मॉडल ही होता है। अल्मंड, पार्सन्स और मर्टन के विचार उस पृष्ठभूमि के रूप में पढ़ें, ताकि उत्तर में एक-दो वाक्य जोड़े जा सकें।

पार्सन्स की AGIL योजना और ज़िला प्रशासन में उसका अनुप्रयोग

अक्षरप्रकार्यात्मक आवश्यकताअर्थज़िला प्रशासन में उदाहरण (विश्लेषण)
Aअनुकूलन (Adaptation)व्यवस्था पर्यावरण से संसाधन जुटाए और उसके बदलावों के अनुसार ढलेज़िले को मिलने वाला बजट और कर्मचारी जुटाना; सूखे या बाढ़ जैसे हालात के हिसाब से योजना बदलना
Gलक्ष्य-प्राप्ति (Goal Attainment)व्यवस्था लक्ष्य तय करे और अपने घटकों को उनकी ओर लगाएयोजनाओं के लक्ष्य तय करना और विभागों को उन पर जुटाना
Iएकीकरण (Integration)घटकों के संबंध संतुलित रहें, टकराव और बिखराव न होविभागों के बीच समन्वय; समितियाँ और नियम जो घटकों को जोड़े रखते हैं
Lप्रतिमान-अनुरक्षण (Latency / Latent Pattern Maintenance)प्रेरणा और सांस्कृतिक प्रतिमान बने रहेंसेवा-मूल्य, आचरण-नियम, प्रशिक्षण जिनसे कर्मचारी की प्रेरणा बनी रहे

AGIL की चार आवश्यकताएँ और उनके अर्थ रुसिदियाह (2020) और संदर्भ-लेख से; यह योजना पार्सन्स ने 1950 के दशक में विकसित की। चौथी पंक्ति के अनुप्रयोग समझाने के लिए दिए गए विश्लेषण हैं, किसी स्रोत के दावे नहीं।

अल्मंड की सात प्रकार्य-श्रेणियाँ (1960)

वर्गप्रकार्यसरल अर्थ
निवेश (Input) प्रकार्यराजनीतिक समाजीकरण और भर्ती (political socialization and recruitment)लोगों को राजनीतिक मूल्य सिखाना और नेतृत्व के लिए चुनना
निवेश प्रकार्यहित-अभिव्यक्ति (interest articulation)समूहों का अपनी माँगें सामने रखना
निवेश प्रकार्यहित-समूहन (interest aggregation)अलग-अलग माँगों को मिलाकर नीति-विकल्प बनाना
निवेश प्रकार्यराजनीतिक संप्रेषण (political communication)सूचना का आदान-प्रदान
निर्गत (Output) प्रकार्यनियम-निर्माण (rule-making)क़ानून और नियम बनाना
निर्गत प्रकार्यनियम-प्रयोग (rule application)बने नियमों को लागू करना; प्रशासन का मुख्य क्षेत्र (विश्लेषण)
निर्गत प्रकार्यनियम-निर्णयन (rule adjudication)नियमों की व्याख्या और विवाद-निपटारा

वर्गीकरण The Developing Economies में छपी पुस्तक-समीक्षा के आधार पर। अल्मंड का निष्कर्ष: राजनीतिक व्यवस्थाओं की तुलना इस आधार पर हो सकती है कि राजनीतिक संरचनाएँ ये प्रकार्य किस आवृत्ति और शैली में निभाती हैं। आलोचना: समीक्षक के अनुसार ढाँचा ऐतिहासिक कारकों पर कम ध्यान देता है और आधुनिक व्यवस्था का मॉडल पश्चिमी लोकतंत्र के लक्षणों से बना है।

मर्टन: प्रकट प्रकार्य, अप्रकट प्रकार्य और कुप्रकार्य

मर्टन का योगदान यह याद दिलाना था कि किसी संस्था के परिणाम उतने ही नहीं होते जितने उसके निर्माता चाहते थे। प्रकट प्रकार्य (manifest function) वे परिणाम हैं जो इरादतन हैं और लोगों को दिखते हैं। अप्रकट प्रकार्य (latent function) वे परिणाम हैं जो अनपेक्षित हैं और अक्सर बाहर का पर्यवेक्षक पहचानता है। कुप्रकार्य (dysfunction) वे परिणाम हैं जो व्यवस्था की स्थिरता को नुक़सान पहुँचाते हैं। मर्टन ने वर्षा के लिए होने वाले अनुष्ठान का उदाहरण दिया: प्रकट उद्देश्य वर्षा लाना है, अप्रकट लाभ समूह की एकजुटता है।

प्रशासन पर लगाकर देखिए (काल्पनिक उदाहरण, केवल समझाने के लिए): ग्राम सभा की बैठक का प्रकट प्रकार्य योजनाओं पर चर्चा और अनुमोदन है; अप्रकट प्रकार्य गाँव के अलग-अलग तबक़ों का एक जगह बैठकर बात करना है; और अगर बैठक में केवल प्रभावशाली लोग बोलें और बाक़ी चुप रहें, तो यह कुप्रकार्य है। उत्तर में यह भेद अंक दिलाता है क्योंकि यह दिखाता है कि प्रकार्य केवल कागज़ी उद्देश्य नहीं होते।

रिग्स का संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक विश्लेषण

रिग्स ने अपने 1964 के अध्याय में कहा कि परंपरागत अध्ययन संरचनाओं से शुरू होता है: विधायिका, विभाग, कर्मचारी-कार्यालय, क्षेत्रीय इकाइयाँ। यह तभी भरोसेमंद है जब संरचनाएँ समाज में हर जगह एक जैसा काम करती हों और औपचारिक नियम व असल व्यवहार में मेल हो। संक्रमणशील समाजों में ऐसा नहीं होता, इसलिए उन्होंने सुझाया कि विश्लेषण प्रकार्यों से शुरू हो। यह मानकर कि हर समाज में कुछ प्रकार्य ज़रूरी हैं, अलग दिखने वाली संरचनाओं को भी तुलना-योग्य बनाया जा सकता है। रिग्स के अनुसार हर समाज में पाँच तरह के प्रकार्य चलते हैं: राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, प्रतीकात्मक और संप्रेषणात्मक, और यही अपेक्षाएँ प्रशासनिक उप-तंत्र पर भी लागू होती हैं।

फिर रिग्स ने एक सरल कसौटी चुनी: कोई संरचना कितने प्रकार्य करती है। जो संरचना बहुत से प्रकार्य करती है वह प्रकार्यात्मक रूप से विसरित (functionally diffuse) है; जो सीमित प्रकार्य करती है वह विशिष्ट (functionally specific) है। उनका उदाहरण: पारंपरिक संयुक्त परिवार शिक्षा, अर्थ, राजनीति, समाज और धर्म, सब निभाता है; श्रम-सांख्यिकी ब्यूरो का केवल एक विशिष्ट काम है। अगर किसी काल्पनिक समाज की सभी संरचनाएँ अत्यंत विसरित हों तो वह संलयित (fused) मॉडल है; अगर सभी अत्यंत विशिष्ट हों तो विवर्तित (diffracted) मॉडल। रिग्स ने साफ़ लिखा कि ये दोनों शुद्ध रूप में असल दुनिया में नहीं मिलते; ये आदर्श-प्रारूप (ideal types) हैं जो वर्णन में मदद करते हैं।

यहाँ नाम की उपमा समझ लें। श्वेत प्रकाश सब आवृत्तियों का मिश्रण है (संलयित)। प्रिज़्म से गुज़रकर वही प्रकाश वर्णक्रम (spectrum) के अलग-अलग रंगों में बिखर जाता है (विवर्तित)। रिग्स ने बीच की उस अवस्था की कल्पना की जब प्रिज़्म के भीतर रंग अलग होना शुरू हो चुके हों पर बँट न पाए हों: यह प्रिज़्मीय (prismatic) अवस्था है, यानी संक्रमणशील समाज। रिग्स ने कहा कि पहले वे 'refracted' शब्द लिखते थे; बाद में सही भौतिकी-शब्द 'diffracted' अपनाया और दोनों को पर्यायवाची माना।

संलयित, प्रिज़्मीय और विवर्तित समाज

आधारसंलयित (Fused)प्रिज़्मीय (Prismatic)विवर्तित (Diffracted)
संरचना और प्रकार्यएक संरचना, अनेक प्रकार्य (functionally diffuse)अर्ध-विभेदित; दोनों के लक्षण साथ-साथविशिष्ट संरचनाएँ, सीमित प्रकार्य (functionally specific)
प्रकाश की उपमाश्वेत प्रकाशप्रिज़्म के भीतर, बँटवारा अधूरावर्णक्रम के अलग रंग
पार्सन्स के चर (pattern variables)आरोपण (ascription), व्यक्ति-विशेष के आधार पर व्यवहार (particularism), प्रकार्यात्मक विसरणइन पैमानों पर मध्यवर्ती स्थिति (रिग्स की परिकल्पना)उपलब्धि (achievement), सबके लिए समान नियम (universalism), प्रकार्यात्मक विशिष्टता
सामान्यतः किस समाज के निकटपरंपरागत कृषि और लोक समाजसंक्रमणशील, विकासशील समाजआधुनिक औद्योगिक समाज
रिग्स की पहली जोड़ी (1950 का दशक)कृषिप्रधान (Agraria): परंपरागत कृषि-समाज; उदाहरण साम्राज्यकालीन चीनसंक्रमण (Transitia)उद्योगप्रधान (Industria): उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका

सावधानी: रिग्स के अनुसार चरों का यह सहसंबंध परिकल्पना है, परिभाषा नहीं; विवर्तित मॉडल की परिभाषा केवल इतनी है कि संरचनाएँ मुख्यतः विशिष्ट हों।

प्रिज़्मीय-सैला मॉडल: तीन लक्षण

रिग्स का असली ध्यान प्रिज़्मीय समाज पर था। उसके प्रशासनिक उप-तंत्र को उन्होंने सैला (sala) कहा, और "प्रशासनिक पारिस्थितिकी" को समझाने के लिए प्रिज़्मीय-सैला मॉडल बनाया। उनके अनुसार इस मॉडल के तीन मुख्य लक्षण हैं: विषमता (heterogeneity), औपचारिकता (formalism) और अतिव्यापन (overlapping)।

रिग्स ने इन्हें घड़ी की उपमा से समझाया। पारंपरिक प्रशासनिक मॉडल घड़ी जैसा है: एक ही काम, यानी क़ानून लागू करना, और अगर घड़ी गड़बड़ करे तो कारीगर उसे ठीक कर दे। पर संक्रमणशील समाज में प्रशासन घड़ी, रेडियो और फ़्रिज वाले कमरे जैसा है, जहाँ तेज़ बिजली-तरंगें हैं: घड़ी ठीक करें तो रेडियो बिगड़ता है, रेडियो ठीक करें तो फ़्रिज। एक हिस्से में सुधार दूसरे हिस्से पर अनपेक्षित असर डालता है। इसी से अतिव्यापन की बात निकलती है।

विषमता, औपचारिकता और अतिव्यापन

लक्षणअर्थरिग्स की उपमा या उदाहरणभारतीय छवि (विश्लेषण)
विषमता (Heterogeneity)एक ही समय में बहुत अलग प्रकार की व्यवस्थाओं, रीतियों और दृष्टिकोणों का साथ-साथ होनागाँव का बुज़ुर्ग या क़बीले का मुखिया और शहर का परिष्कृत सचिवालय अधिकारी, एक ही शासन-व्यवस्था में; महानगर से दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र तक का फैलावएक ही ज़िले में ऑनलाइन आवेदन की सुविधा वाला नगरीय कार्यालय और वह गाँव जहाँ विवाद अब भी बुज़ुर्गों की बैठक में निपटते हैं
औपचारिकता (Formalism)औपचारिक रूप से जो तय है और वास्तव में जो होता है, उन दोनों में अंतर; यानी सिद्धांत और व्यवहार की खाईग़लत नक़्शा या रेलवे समय-सारणी जो असल रास्ते से मेल नहीं खाती; संगठन-चार्ट जिसमें लिखे काम विभाग के लोग करते ही नहींबने हुए क़ानून जो लागू नहीं हो पाते; पुनर्गठन जिसमें केवल संगठन-चार्ट बदलता है, व्यवहार नहीं
अतिव्यापन (Overlapping)औपचारिक रूप से अलग दिखने वाली प्रशासनिक संरचना का वास्तव में पारंपरिक सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं में उलझा होना; प्रशासनिक मापदंड की जगह ग़ैर-प्रशासनिक मापदंड से निर्णयजब बाहर रोज़गार कम हो तो सरकारी पदों की माँग बढ़ती है और भर्ती में परिवार का दबाव चलता है; भर्ती तब उतनी ही राजनीतिक समस्या है जितनी प्रशासनिकभर्ती या तबादले में रिश्ते, जाति या स्थानीय सिफ़ारिश की भूमिका (केवल उदाहरण-रूप में; किसी वास्तविक मामले का आरोप नहीं)

रिग्स का सूत्र: जितना अधिक अतिव्यापन, उतनी अधिक औपचारिकता।

सैला, संशोधित सिद्धांत और आलोचना

IJSR के अनुसार सैला स्वयं भी विषम है, क्योंकि उसमें संलयित समाज के "चैंबर" (दरबार जैसे कक्ष) और विवर्तित समाज के "ब्यूरो" (आधुनिक कार्यालय) दोनों के तत्त्व मिलते हैं। रिग्स का मत था कि जब परिवर्तन का दबाव बाहर से आता है तब विषमता, औपचारिकता और अतिव्यापन अधिक होते हैं, और जब भीतर से आता है तब कम।

रिग्स ने अपनी पुस्तक Prismatic Society Revisited (1973) में सिद्धांत बदला। पहले केवल एक कसौटी थी, विभेदन (differentiation); अब दो हुईं: विभेदन और एकीकरण (integration)। इससे विवर्तित और प्रिज़्मीय दोनों समाजों के तीन-तीन रूप बने, जिन्हें उन्होंने eo-, ortho- और neo- उपसर्गों से बताया। तर्क यह था कि कोई समाज विभेदित होकर भी ठीक से एकीकृत न हो तो प्रिज़्मीय अवस्था में अटका रह सकता है, यानी प्रिज़्मीय होना केवल अविकसित देशों की पहचान नहीं।

आलोचना (पेंग, 2008): मॉडल बहुत व्यापक और अमूर्त है और उसके पक्ष में अनुभवजन्य साक्ष्य कम है; शब्दावली भारी है; मूल्य-भरे शब्द पश्चिमी पैमाने से प्रिज़्मीय समाज को नकारात्मक दिखाते हैं; औपचारिकता को प्रशासनिक शक्ति बढ़ने का इकलौता कारण मानना अति-सरलीकरण है; और यह समाज की जैविक एकता पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर देता है। फिर भी तुलनात्मक लोक प्रशासन पढ़ने वाला कोई भी रिग्स के प्रभाव से अछूता नहीं रहा।

संलयित से विवर्तित तक: प्रकाश की उपमा

  1. संलयित (Fused)

    श्वेत प्रकाश; एक संरचना अनेक काम

  2. प्रिज़्मीय (Prismatic)

    प्रिज़्म के भीतर रंग अलग होने लगे पर बँटे नहीं; विषमता, औपचारिकता, अतिव्यापन

  3. विवर्तित (Diffracted)

    वर्णक्रम; हर संरचना का एक विशिष्ट काम

1973 के संशोधन में विभेदन के साथ एकीकरण की दूसरी कसौटी जुड़ी: eo-, ortho-, neo- रूप।

समय-रेखा: संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक उपागम

  1. 1950 का दशक

    पार्सन्स की प्रकार्यात्मक आवश्यकताओं की योजना (AGIL)

  2. 1955

    ड्वाइट वाल्डो का लोक प्रशासन में इस उपागम को अपनाने का सुझाव

  3. 1960

    अल्मंड और कोलमैन की The Politics of the Developing Areas

  4. 1964

    रिग्स की पुस्तक Administration in Developing Countries: The Theory of Prismatic Society

  5. 1973

    Prismatic Society Revisited: विभेदन के साथ एकीकरण; eo-, ortho-, neo-

तारीख़ें केवल क्रम समझने के लिए; परीक्षा में 1955, 1964 और 1973 पर्याप्त हैं।

एक नज़र में: संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक उपागम

संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक उपागम

मूल विचार

  • संरचना = स्थायी व्यवहार-ढर्रा
  • प्रकार्य = संरचना का परिणाम
  • समाज एक व्यवस्था
  • प्रकार्य से तुलना शुरू करें

विचारक

  • पार्सन्स: AGIL
  • मर्टन: प्रकट, अप्रकट, कुप्रकार्य
  • अल्मंड: निवेश और निर्गत
  • वाल्डो (1955), रिग्स (1964)

रिग्स के मॉडल

  • संलयित: विसरित संरचनाएँ
  • प्रिज़्मीय: बीच की अवस्था
  • विवर्तित: विशिष्ट संरचनाएँ

प्रिज़्मीय-सैला

  • सैला = प्रशासनिक उप-तंत्र
  • विषमता
  • औपचारिकता
  • अतिव्यापन

आलोचना

  • अमूर्त, अनुभवजन्य साक्ष्य कम
  • पश्चिमी पैमाना
  • जटिल शब्दावली

मुख्य तथ्य

संरचना और प्रकार्य की परिभाषा
रिग्स (1964): संरचना = व्यवहार का स्थायी प्रतिरूप; प्रकार्य = संरचनाओं की परस्पर निर्भरता
रिग्स के अनुसार हर समाज के पाँच प्रकार्य
राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, प्रतीकात्मक, संप्रेषणात्मक
लोक प्रशासन में उपागम का पहला सुझाव
ड्वाइट वाल्डो, 1955
अल्मंड और कोलमैन की पुस्तक
The Politics of the Developing Areas, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस, 1960; निवेश के चार और निर्गत के तीन प्रकार्य
रिग्स के तीन मॉडल-चरण
कृषिप्रधान-उद्योगप्रधान (1950 का दशक), संलयित-प्रिज़्मीय-विवर्तित (1964), संशोधित प्रिज़्मीय सिद्धांत (1973)
प्रिज़्मीय-सैला के तीन लक्षण
विषमता, औपचारिकता, अतिव्यापन
1973 का संशोधन
एक कसौटी (विभेदन) की जगह दो (विभेदन और एकीकरण); eo-, ortho-, neo- रूप
अंतिम जाँच
1 अक्टूबर 2026

राजस्थान का पहलू

राजस्थान सरकार (ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग) की 01.11.2011 की अधिसूचना, यानी राजस्थान पंचायती राज (अनुसूचित क्षेत्रों में उनके लागू होने के संबंध में उपबंधों का उपांतरण) नियम, 2011 [Rajasthan Panchayati Raj (Modification of Provisions in their Application to the Scheduled Areas) Rules, 2011] के अनुसार, अनुसूचित क्षेत्र की ग्राम सभा के पास केवल विकास-योजनाओं का काम नहीं है: उसका मूल कर्तव्य अपने क्षेत्र में शांति-व्यवस्था बनाए रखना और विवाद हल करना है, लघु वन उपज पर उसका स्वामित्व कुछ शर्तों के साथ माना गया है, और वह नशे के नियमन पर प्रस्ताव पारित कर सकती है। (राजस्थान सरकार की अधिसूचना से तथ्य मिलान, 1 अक्टूबर 2026।) विश्लेषण: संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक भाषा में यह एक ही संस्था के बहु-प्रकार्यात्मक होने (functional diffuseness) की मिसाल है।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • संरचना और प्रकार्य को पर्यायवाची मान लेना: संरचना ढर्रा है, प्रकार्य उसका परिणाम। उत्तर में दोनों की अलग परिभाषा लिखें।
  • संलयित, प्रिज़्मीय और विवर्तित को असल देशों के नाम मान लेना: रिग्स के अनुसार शुद्ध संलयित या विवर्तित समाज असल दुनिया में नहीं मिलते; ये आदर्श-प्रारूप हैं।
  • "प्रिज़्मीय = अविकसित" लिख देना: 1973 के संशोधन के बाद यह निष्कर्ष कमज़ोर है, क्योंकि विभेदित समाज भी ठीक से एकीकृत न हो तो प्रिज़्मीय रह सकता है।
  • औपचारिकता (formalism) को केवल "रूढ़िवाद" या "नियमों की पाबंदी" बता देना: इसका अर्थ औपचारिक नियम और वास्तविक व्यवहार के बीच की खाई है।
  • विषमता और अतिव्यापन में गड़बड़: विषमता का अर्थ अलग-अलग तरह की व्यवस्थाओं का साथ-साथ होना; अतिव्यापन का अर्थ औपचारिक रूप से अलग संरचना का ग़ैर-प्रशासनिक कारकों में उलझा होना।
  • रिग्स का सिद्धांत लिखते समय सैला का अर्थ भूलना: सैला प्रिज़्मीय समाज का प्रशासनिक उप-तंत्र है।