समन्वय (Coordination)
समन्वय क्या है, क्यों ज़रूरी है, गुलिक के दो मार्ग, फ़ेयोल और CSMOP के साधन, तथा मंत्रिमंडल सचिवालय, अंतर-राज्य परिषद और क्षेत्रीय परिषदों वाला भारतीय तंत्र।
- समन्वय
- गुलिक
- CSMOP
- अंतर-राज्य परिषद
- क्षेत्रीय परिषद
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II: "Principles of organisation: hierarchy, unity of command, span of control, delegation, centralisation and decentralisation, coordination, authority and responsibility, accountability." इस पृष्ठ पर समन्वय (coordination) है। पदानुक्रम, आदेश की एकता, नियंत्रण-क्षेत्र, प्रत्यायोजन, अधिकार, उत्तरदायित्व और जवाबदेही के अलग पृष्ठ हैं।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में 'समन्वय' नाम से कोई सीधा प्रश्न नहीं आया, पर यह हर सिद्धांत-उत्तर की धुरी है: पदानुक्रम, आदेश की एकता, प्रत्यायोजन और नियंत्रण-क्षेत्र, सब इसी के साधन हैं। गुलिक के अनुसार अधिकार की संरचना समन्वय का एक मुख्य मार्ग है।
- सिद्धांत वाले प्रश्न 2013-2024 के पेपरों में 2 से 10 अंक तक आए हैं (जैसे 2024 में नियंत्रण-क्षेत्र पर 10 अंक)। ऐसे उत्तर में 'समन्वय' का एक वाक्य और भारतीय उदाहरण (मंत्रिमंडल सचिवालय, अंतर-राज्य परिषद) उत्तर को अलग बनाते हैं।
- भारतीय समन्वय-तंत्र का पाठ आधिकारिक स्रोतों में है (CSMOP, मंत्रिमंडल सचिवालय, गृह मंत्रालय)। इनके नाम और भूमिकाएँ सही लिखने से उत्तर में ठोस उदाहरण जुड़ता है।
पहले सरल भाषा में: बाढ़ आई, तो कौन-क्या करे?
सोचिए एक ज़िले में बाढ़ आती है। कलेक्टर को चार काम एक साथ चाहिए: नाव और बचाव (पुलिस, आपदा बल), राहत-शिविर में खाना (नागरिक आपूर्ति), बीमारी रोकना (स्वास्थ्य विभाग) और टूटी सड़क खोलना (PWD)। अगर हर विभाग अपनी-अपनी धुन में चले, तो एक ही गाँव में तीन टीमें पहुँच जाएँगी और दूसरे गाँव में कोई नहीं। इसलिए कोई तय करता है कि कौन कहाँ जाएगा, कब रिपोर्ट करेगा और एक-दूसरे को क्या बताएगा। यह तालमेल बिठाना ही समन्वय (coordination) है। (समझाने के लिए गढ़ी गई तस्वीर है, किसी वास्तविक घटना का वर्णन नहीं।)
परीक्षा के लिए सटीक परिभाषा यह है। फ़ेयोल (Henri Fayol) के अनुसार समन्वय का अर्थ है उपक्रम की सारी गतिविधियों में सामंजस्य बैठाना, ताकि उसका संचालन सुगम हो और वह सफल हो। प्रबंधन के पाँच तत्त्वों में वे इसे "सारी गतिविधि और प्रयास को जोड़ना, एक करना और सुसंगत बनाना" कहते हैं। लोक प्रशासन के संदर्भ में: विभिन्न विभागों, स्तरों और इकाइयों के कार्य को एक साझा उद्देश्य की ओर ऐसे जोड़ना कि दोहराव, टकराव और खाली जगहें न रहें (अंतिम वाक्य हमारा सार है)।
समन्वय की आवश्यकता: काम बँटता है तो जोड़ना पड़ता है
गुलिक (Luther Gulick) का तर्क संक्षिप्त है: काम को जितना ज़्यादा उप-विभाजित किया जाए, भ्रम का ख़तरा और निगरानी व समन्वय की ज़रूरत उतनी बढ़ती है। उप-विभाजन टाला नहीं जा सकता, इसलिए समन्वय अनिवार्य हो जाता है। वे यह भी कहते हैं कि समन्वय संयोग से नहीं पनपता; उसे बुद्धिमान, सशक्त, निरंतर और संगठित प्रयास से जीता जाता है। आकार और समय इसमें सबसे बड़ी सीमाएँ हैं: छोटे प्रकल्प में अधिकार की संरचना सरल और उद्देश्य हर कर्मचारी को साफ़ दिखता है; बड़े जटिल उपक्रम में संरचना उलझ जाती है और कर्मचारी केंद्रीय उद्देश्य भूलकर अपने हित में लग सकते हैं।
फ़ेयोल समन्वय की कमी के तीन साफ़ लक्षण गिनाते हैं, जो आज भी सरकारी दफ़्तरों में पहचाने जाते हैं। पहला, हर विभाग दूसरों के बारे में न जानता है और न जानना चाहता है, जैसे वही उसका अपना लक्ष्य हो। दूसरा, एक ही विभाग के प्रभागों और कार्यालयों के बीच भी पानी-बंद डिब्बे (water-tight compartments) हैं और हर कोई किसी काग़ज़, आदेश या परिपत्र के पीछे छिपकर निजी ज़िम्मेदारी से बचता है। तीसरा, सामान्य हित के बारे में कोई नहीं सोचता और पहल व निष्ठा ग़ायब हो जाती है। वे यह भी कहते हैं कि यह रवैया पूर्व-नियोजित इरादे से नहीं, बल्कि अपर्याप्त समन्वय का नतीजा है।
इसके उलट, फ़ेयोल के अनुसार सुसमन्वित उपक्रम में तीन बातें दिखती हैं: हर विभाग बाकी के साथ तालमेल में चलता है; विभाग के प्रभागों-उप-प्रभागों को पता होता है कि साझा काम में उनका हिस्सा क्या है और उन्हें एक-दूसरे की क्या मदद करनी है; और विभागों की कार्य-सारणी परिस्थिति के अनुसार लगातार ढलती रहती है।
समन्वय के दो मार्ग और उसके प्रकार
गुलिक के अनुसार समन्वय दो मुख्य रास्तों से आता है। पहला, संगठन द्वारा (by organisation): काम को ऐसे लोगों में बाँटना जो अधिकार की एक संरचना में रखे हों, ताकि वरिष्ठों के आदेश ऊपर से नीचे तक काम को जोड़ें। दूसरा, विचार की प्रधानता द्वारा (by the dominance of an idea): साथ काम करने वालों के मन और संकल्प में उद्देश्य की ऐसी एकता, कि हर कोई अपनी ओर से कुशलता और उत्साह से अपना काम पूरे में बैठा दे। वे साफ़ कहते हैं कि दोनों परस्पर-विरोधी नहीं हैं; कोई उपक्रम दोनों के व्यापक प्रयोग के बिना सचमुच प्रभावी नहीं होता।
आम पाठ्यक्रम-वर्गीकरण में समन्वय को आंतरिक (संगठन के भीतर) और बाह्य (दूसरे संगठनों/सरकारों से) तथा ऊर्ध्वाधर (ऊपर-नीचे के स्तरों में) और क्षैतिज (समान स्तर के विभागों में) बाँटा जाता है। यह वर्गीकरण हमारा विश्लेषण है, किसी एक स्रोत का सूत्र नहीं, पर स्रोतों से मेल खाता है: गुलिक का 'संगठन द्वारा' समन्वय ऊर्ध्वाधर पदानुक्रम से चलता है, और उनके ही 'अंतर-विभागीय समन्वय के अन्य साधन' (समितियाँ, समन्वयक, क्षेत्रीय बैठकें) क्षैतिज समन्वय हैं।
समन्वय के प्रकार (वर्गीकरण)
| आधार | प्रकार | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| साधन (गुलिक) | संगठन द्वारा | अधिकार की संरचना और वरिष्ठ के आदेश | सचिव से सेक्शन तक की श्रृंखला (CSMOP) |
| साधन (गुलिक) | विचार की प्रधानता द्वारा | साझा उद्देश्य की भावना | मिशन-लक्ष्य, नेतृत्व का संदेश |
| दिशा (विश्लेषण) | ऊर्ध्वाधर | ऊपर-नीचे के स्तरों में तालमेल | मंत्रालय के भीतर वरिष्ठ-अधीनस्थ |
| दिशा (विश्लेषण) | क्षैतिज | समान स्तर के विभागों में तालमेल | अंतर-विभागीय बैठक, अंतर-मंत्रालयी परामर्श |
| क्षेत्र (विश्लेषण) | आंतरिक / बाह्य | एक ही संगठन में / अन्य संगठनों या सरकारों के साथ | विभाग के प्रभाग / केंद्र-राज्य: अंतर-राज्य परिषद |
'साधन' वाली दो पंक्तियाँ गुलिक (1937) की हैं; शेष वर्गीकरण हमारा विश्लेषण है।
समन्वय के साधन और युक्तियाँ (Techniques and Devices)
फ़ेयोल का सबसे प्रसिद्ध साधन साप्ताहिक सम्मेलन है। उनके अनुसार विभागाध्यक्षों का यह सम्मेलन प्रबंधन को संचालन की जानकारी देता है, यह साफ़ करता है कि विभागों से कैसा सहयोग अपेक्षित है और साझा हित की समस्याएँ सुलझाता है। यह नई योजना बनाने की जगह नहीं, मौजूदा योजना को चालू घटनाओं के हिसाब से लागू करने की जगह है। उनका ढंग यह है कि सभी विभागाध्यक्ष तय दिन पर महाप्रबंधक की अध्यक्षता में मिलें, एजेंडा से कोई बिंदु भूला न जाए, कार्यवृत्त (minutes) रखे जाएँ और अगली बैठक की शुरुआत में पढ़े जाएँ। लगभग एक घंटे में प्रबंधक पूरी तस्वीर जान लेता है और हर विभाग जानता है कि उसे क्या करना है और अगले हफ़्ते उसका हिसाब देना है। वे यहाँ तक कहते हैं कि बड़ी इकाइयों, मंत्रालयों और सरकार के लिए ऐसा साप्ताहिक सम्मेलन अनिवार्य होना चाहिए।
जहाँ दूरी या अन्य बाधा से बैठक न हो सके, वहाँ फ़ेयोल संपर्क-अधिकारी (liaison officers) का सुझाव देते हैं। गुलिक ने सरकारी संदर्भ के साधन गिनाए: नियोजन-बोर्ड और समितियाँ, अंतर-विभागीय समितियाँ, समन्वयक (co-ordinators) और आधिकारिक रूप से आयोजित क्षेत्रीय बैठकें। एक महत्त्वपूर्ण सावधानी भी वे देते हैं: ये साधन असामान्य स्थितियों और नीतिगत मामलों (जैसे योजना-निर्माण) के लिए हैं। नियमित काम तो संगठन की बनावट से ही निपटना चाहिए, क्योंकि ये साधन सामान्य प्रशासन के लिए बहुत देरी करने वाले और ज़िम्मेदारी धुँधली करने वाले हैं। जहाँ नियमित काम में भी बार-बार विशेष समन्वय-साधनों का सहारा लेना पड़े, वहाँ संगठन ही ख़राब है।
भारत में इन साधनों का लिखित रूप CSMOP में मिलता है। प्रस्तावना कहती है कि सुव्यवस्थित प्रक्रिया "स्थायी आदेश, प्रयासों के समन्वय का साधन और संचार का औज़ार" है। पैरा 54 (12वें 2003 और 13वें 2010 संस्करण में समान) अंतर-विभागीय परामर्श के तीन रूप बताता है: अंतर-विभागीय नोट, बैठकें और मौखिक चर्चा। पैरा 55 नोडल मंत्रालयों (जैसे विधि, वित्त, कार्मिक) से कहता है कि वे अपने विषयों पर साफ़ दिशानिर्देश बनाएँ, ताकि संदर्भों की संख्या घटे और निर्णय तेज़ हो।
समन्वय के साधन: किसमें क्या
| साधन | कैसे काम करता है | आधार |
|---|---|---|
| पदानुक्रम और आदेश | वरिष्ठ के आदेश से इकाइयाँ जुड़ती हैं | गुलिक (1937) |
| साझा उद्देश्य | हर कर्मचारी अपना काम पूरे के उद्देश्य में बैठाता है | गुलिक (1937) |
| नियम और प्रक्रिया | स्थायी आदेश की तरह प्रयासों का तालमेल | CSMOP प्रस्तावना |
| साप्ताहिक सम्मेलन | विभागाध्यक्ष मिलते हैं; कार्यवृत्त; अगली बार हिसाब | फ़ेयोल (1949) |
| संपर्क-अधिकारी / समन्वयक | दूरी या बाधा की स्थिति में कड़ी का काम | फ़ेयोल, गुलिक |
| गैंगप्लैंक | दो शाखाओं के अधीनस्थों का सीधा संपर्क, वरिष्ठों की अनुमति से | फ़ेयोल (1949) |
| अंतर-विभागीय परामर्श | नोट, बैठक या मौखिक चर्चा; समय-सीमा | CSMOP पैरा 54 |
| नोडल मंत्रालय | साझे दिशानिर्देश से संदर्भ घटते हैं | CSMOP पैरा 55 |
| ऊपर ले जाना (escalation) | गतिरोध में Committee of Secretaries या मंत्री-स्तर | CSMOP पैरा 54(7) |
गुलिक की सावधानी याद रखें: विशेष साधन असामान्य स्थिति के लिए हैं, नियमित काम के लिए नहीं।
समन्वय और बाकी संगठन-सिद्धांतों का रिश्ता
समन्वय अकेला सिद्धांत कम, बाकी सिद्धांतों का साझा लक्ष्य ज़्यादा है। OpenStax के शब्दों में आदेश की एकता और आदेश-श्रृंखला हर किसी को साफ़ निर्देश देती हैं और अलग-अलग काम करने वालों के बीच तालमेल बैठाने में मदद करती हैं। पदानुक्रम वह रीढ़ है जिससे आदेश चलते हैं; नियंत्रण-क्षेत्र तय करता है कि एक वरिष्ठ कितनों में तालमेल रख सकता है; प्रत्यायोजन तय करता है कि तालमेल का कौन-सा हिस्सा किस स्तर पर होगा। जब ये सब ठीक बैठते हैं तो समन्वय सहज हो जाता है, और जब कोई बिगड़ता है तो समन्वय की कमी के लक्षण (फ़ेयोल के डिब्बे) दिखने लगते हैं (यह हमारा सार-विश्लेषण है)।
भारत में समन्वय का तंत्र
केंद्र सरकार के भीतर समन्वय की धुरी मंत्रिमंडल सचिवालय (Cabinet Secretariat) है। सचिवालय की अपनी वेबसाइट के अनुसार वह भारत सरकार (कार्य-संचालन) नियम, 1961 और भारत सरकार (कार्य-आवंटन) नियम, 1961 का प्रशासन करता है, मंत्रिमंडल और उसकी समितियों को सचिवीय सहायता देता है, और अंतर-मंत्रालयी समन्वय सुनिश्चित करके, मंत्रालयों के मतभेद सुलझाकर और स्थायी/तदर्थ सचिव-समितियों (Committees of Secretaries) के ज़रिये आम सहमति बनाकर निर्णय-प्रक्रिया में मदद करता है। देश में बड़ी संकट-स्थिति में विभिन्न मंत्रालयों की गतिविधियों का समन्वय भी उसके कार्यों में गिना गया है। संविधान का अनुच्छेद 77(3) इन नियमों की जड़ है: राष्ट्रपति सरकार के कार्य के सुविधाजनक संचालन और मंत्रियों में कार्य-आवंटन के लिए नियम बनाएगा। CSMOP का पैरा 54(7) बताता है कि अगर दो या अधिक विभाग अपने मत पर अड़े रहें और गतिरोध हो, तो मामला कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली सचिव-समिति या संबंधित मंत्रियों के स्तर पर उठाया जाए।
केंद्र-राज्य और राज्य-राज्य समन्वय के लिए संविधान ने अनुच्छेद 263 दिया है: राष्ट्रपति को यदि लगे कि लोकहित में ऐसी परिषद चाहिए, तो वह आदेश से अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council) बना सकता है, जिसका काम राज्यों के बीच विवादों की जाँच और सलाह, साझे हित के विषयों की जाँच और चर्चा, और ऐसे विषयों पर नीति और कार्रवाई के "बेहतर समन्वय" की सिफ़ारिशें करना हो सकता है। गृह मंत्रालय की 2012 और 2015 की सूचनाओं के अनुसार प्रधानमंत्री परिषद के अध्यक्ष और सभी राज्यों के मुख्यमंत्री उसके सदस्य हैं; 2015 की सूचना के अनुसार परिषद का पुनर्गठन अंतर-राज्य परिषद आदेश, 1990 के अंतर्गत हुआ और गृह मंत्री की अध्यक्षता में एक स्थायी समिति भी है। (परिषद एक स्थायी निकाय नहीं है; अनुच्छेद 263 में केवल 'कर सकता है' लिखा है।)
तीसरी परत क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils) हैं। गृह मंत्रालय और PIB, दोनों के अनुसार पाँच क्षेत्रीय परिषदें राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के भाग III के अंतर्गत बनीं; अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री होता है, उपाध्यक्ष क्षेत्र के मुख्यमंत्री बारी-बारी से एक-एक वर्ष के लिए, और मुख्य सचिवों की स्थायी समिति मुद्दों की छँटाई करती है। इन्हें मंत्रालय 'सलाहकारी' निकाय कहता है, जिनका उद्देश्य राज्यों के बीच तथा केंद्र-राज्य सहयोग की आदत विकसित करना है। उत्तरी क्षेत्रीय परिषद में राजस्थान शामिल है।
गतिरोध से निर्णय तक: अंतर-विभागीय समन्वय का क्रम
अंतर-विभागीय नोट
अवर सचिव से नीचे के स्तर से नहीं; समय-सीमा
बैठक या मौखिक चर्चा
संयुक्त सचिव के आदेश पर; एजेंडा; कार्यवृत्त
सचिव-समिति
गतिरोध पर, कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में
मंत्री-स्तर
संबंधित मंत्रियों के बीच निर्णय
एक नज़र में: समन्वय
समन्वय (Coordination)
अर्थ
- गतिविधियों में सामंजस्य (फ़ेयोल)
- दोहराव और टकराव से बचाव
आवश्यकता
- काम का उप-विभाजन (गुलिक)
- बड़ा आकार, कम समय
- अभाव: पानी-बंद डिब्बे (फ़ेयोल)
दो मार्ग (गुलिक)
- संगठन द्वारा
- विचार की प्रधानता द्वारा
साधन
- साप्ताहिक सम्मेलन
- संपर्क-अधिकारी / समन्वयक
- गैंगप्लैंक
- CSMOP पैरा 54: परामर्श
- नोडल मंत्रालय
भारत
- मंत्रिमंडल सचिवालय; सचिव-समितियाँ
- अंतर-राज्य परिषद (अनुच्छेद 263)
- क्षेत्रीय परिषदें (1956)
क्रम से: समन्वय के सिद्धांत और संस्थाएँ
1916
फ़ेयोल का मूल ग्रंथ (अंग्रेज़ी अनुवाद 1949); समन्वय प्रबंधन के पाँच तत्त्वों में
1937
गुलिक-उर्विक का संग्रह: समन्वय के दो मार्ग
1956
राज्य पुनर्गठन अधिनियम के भाग III से पाँच क्षेत्रीय परिषदें
1990
अंतर-राज्य परिषद आदेश, अनुच्छेद 263 के अंतर्गत
2003 / 2010
CSMOP के 12वें और 13वें संस्करण; पैरा 54 (अंतर-विभागीय परामर्श)
9 जुलाई 2022
उत्तरी क्षेत्रीय परिषद की 30वीं बैठक, जयपुर
मुख्य तथ्य
- फ़ेयोल की पुस्तक
- फ़्रेंच मूल 1916; अंग्रेज़ी अनुवाद 1949
- गुलिक-उर्विक का संग्रह
- 1937; समन्वय के दो मार्ग: संगठन और विचार की प्रधानता
- CSMOP पैरा 54
- 12वाँ (2003) और 13वाँ (2010) संस्करण में अंतर-विभागीय परामर्श: नोट, बैठक, मौखिक चर्चा
- गतिरोध की स्थिति
- Committee of Secretaries (कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता) या मंत्री-स्तर (पैरा 54(7))
- मंत्रिमंडल सचिवालय
- कार्य-संचालन और कार्य-आवंटन नियम, 1961 का प्रशासन; अंतर-मंत्रालयी समन्वय
- अनुच्छेद 77(3)
- कार्य-संचालन और कार्य-आवंटन के लिए राष्ट्रपति नियम बनाएगा
- अनुच्छेद 263
- अंतर-राज्य परिषद; 'नीति और कार्रवाई के बेहतर समन्वय' की सिफ़ारिश
- अंतर-राज्य परिषद आदेश
- 1990; अध्यक्ष प्रधानमंत्री (2012 और 2015 की पुनर्गठन-सूचनाओं के अनुसार)
- क्षेत्रीय परिषदें
- पाँच; राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 का भाग III; अध्यक्ष गृह मंत्री
- उत्तरी क्षेत्रीय परिषद, 30वीं बैठक
- जयपुर, 9 जुलाई 2022
- अंतिम जाँच
- 01-10-2026
राजस्थान का पहलू
राजस्थान उत्तरी क्षेत्रीय परिषद का सदस्य राज्य है (गृह मंत्रालय के परिषद-दस्तावेज़ और PIB के तथ्य-पत्र, दोनों के अनुसार), और परिषद की 30वीं बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय गृह मंत्री ने 9 जुलाई 2022 को जयपुर में की (PIB की सूचना; एक समाचार-स्रोत से मिलान; देखा गया 01-10-2026)।
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- समन्वय को केवल 'नियंत्रण' का पर्याय लिखना: गुलिक के अनुसार समन्वय के दो मार्ग हैं, और दूसरा (विचार की प्रधानता) आदेश पर नहीं, साझा उद्देश्य पर टिका है।
- अंतर-राज्य परिषद को स्थायी संवैधानिक निकाय बताना: अनुच्छेद 263 कहता है कि राष्ट्रपति आदेश से ऐसी परिषद बना 'सकता' है; यह संविधान में ही अनिवार्य रूप से गठित नहीं है।
- क्षेत्रीय परिषदों को संवैधानिक निकाय बताना: वे राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के भाग III से बनी हैं और सलाहकारी हैं।
- मंत्रिमंडल सचिवालय को सिर्फ़ 'कैबिनेट की बैठकों का सचिव' बताना: वह नियमों के प्रशासन, अंतर-मंत्रालयी समन्वय और सचिव-समितियों का भी काम करता है।
- हर बार नई समिति या समन्वयक बनाने का सुझाव देना: गुलिक चेताते हैं कि नियमित काम के लिए बार-बार विशेष समन्वय-साधन चाहिए तो संगठन में ही खोट है।
केस स्टडी: भारत में समन्वय की तीन परतें
केस स्टडीमंत्रिमंडल सचिवालय, अंतर-राज्य परिषद और क्षेत्रीय परिषदें
समन्वय की ज़रूरत तीन स्तरों पर पड़ती है: केंद्र के मंत्रालयों के बीच, केंद्र और सभी राज्यों के बीच, और पड़ोसी राज्यों के समूह के बीच। भारत में तीनों के लिए अलग संस्थागत व्यवस्था है।
- मंत्रालयों के बीच
- मंत्रिमंडल सचिवालय (नियम 1961 का प्रशासन, Committees of Secretaries, संकट में समन्वय) और CSMOP की अंतर-विभागीय परामर्श-प्रक्रिया। गतिरोध की स्थिति में कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली सचिव-समिति या मंत्री-स्तर।
- केंद्र और सभी राज्यों के बीच
- अंतर-राज्य परिषद (अनुच्छेद 263; आदेश 1990)। अध्यक्ष प्रधानमंत्री; सदस्य सभी राज्यों के मुख्यमंत्री; स्थायी समिति के अध्यक्ष गृह मंत्री। अनुच्छेद 263 में 'नीति और कार्रवाई के बेहतर समन्वय' की सिफ़ारिश का स्पष्ट उल्लेख है।
- क्षेत्र के राज्यों के बीच
- पाँच क्षेत्रीय परिषदें (राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956, भाग III)। अध्यक्ष गृह मंत्री; उपाध्यक्ष मुख्यमंत्री बारी-बारी; मुख्य सचिवों की स्थायी समिति। भूमिका सलाहकारी, यानी निर्णय थोपने की नहीं, राय बनाने की।
- राजस्थान का संदर्भ
- राजस्थान उत्तरी क्षेत्रीय परिषद का सदस्य है। उस परिषद की 30वीं बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 9 जुलाई 2022 को जयपुर में की (PIB और एक समाचार-स्रोत के अनुसार)।
सीख
विश्लेषण: तीनों परतें गुलिक की दोनों बातें साथ दिखाती हैं। मंत्रिमंडल सचिवालय 'संगठन द्वारा' समन्वय का औज़ार है (नियम, समितियाँ, पदानुक्रम में ऊपर ले जाना), जबकि अंतर-राज्य और क्षेत्रीय परिषदें 'विचार की प्रधानता' पर टिकी हैं, क्योंकि वहाँ राज्य सरकारों पर आदेश नहीं चलता, सहमति बनानी पड़ती है। इसीलिए उन्हें सलाहकारी कहा गया है। उत्तर में यह भेद लिखने पर गहराई दिखती है।
कार्य-उदाहरण: एक अंतर-विभागीय मामला कैसे सुलझे (कल्पित मामला, असली प्रक्रिया)
हल सहित उदाहरणCSMOP के पैरा 54 की प्रक्रिया पर
दिया है
- मामला समझाने के लिए गढ़ा गया है: एक मंत्रालय एक नई योजना की अधिसूचना जारी करना चाहता है, जिसमें दो अन्य मंत्रालयों की राय या सहमति चाहिए। मंत्रालय, योजना और समय-सारणी काल्पनिक हैं।
- नियम असली हैं: CSMOP के 12वें (2003) और 13वें (2010) संस्करण के पैरा 54।
- 1चरण 1: लिखित संदर्भ संदर्भ सामान्यतः अवर सचिव से नीचे के स्तर के अधिकारी के निर्देश पर नहीं बनता। जिन बिंदुओं पर राय चाहिए, साफ़ लिखे जाएँ; संभव हो तो प्रस्तावित आदेश का मसौदा भी दिखाया जाए।
- 2चरण 2: एक साथ परामर्श दो मंत्रालयों से एक साथ परामर्श हो सकता है, जब तक दूसरे की ज़रूरत पहले की राय आने पर ही न पड़े। अगर संदर्भ पर कार्य-संचालन नियमों के तहत सहमति ज़रूरी है, तो मूल मंत्रालय समय-सीमा तय करे; दूसरा मंत्रालय देरी हो तो समय-सीमा से पहले बताए कि कितना और समय लगेगा।
- 3चरण 3: बैठक या मौखिक चर्चा मतभेद दिखे तो बैठक बुलाई जा सकती है, सामान्यतः संयुक्त सचिव से नीचे के अधिकारी के आदेश पर नहीं। प्रतिनिधि ऐसे हों जो अपने विभाग की ओर से निर्णय ले सकें; पहले से एजेंडा जाए; बैठक के तुरंत बाद निष्कर्ष और अगली कार्रवाई करने वाले विभाग का नाम लिखकर कार्यवृत्त सबको भेजा जाए।
- 4चरण 4: गतिरोध अगर दो विभाग अपने मत पर अड़े रहें, तो लंबे पत्राचार की जगह मामला कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली सचिव-समिति या संबंधित मंत्रियों के स्तर पर उठाया जाए।
- 5चरण 5: निर्णय के बाद उचित परामर्श के बाद लिए निर्णय को सामान्यतः दोबारा नहीं खोला जाता। ठोस कारण हों तो जल्दी पुनर्मूल्यांकन से सुलझाया जाए।
निष्कर्ष: सार: पहले लिखित या मौखिक परामर्श, फिर समय-सीमा वाली बैठक, और अंत में ऊपर ले जाना। यह गुलिक की बात का सरकारी रूप है कि विशेष साधन असामान्य स्थिति के लिए हैं और अंतिम सहारा पदानुक्रम का ऊपरी स्तर ही है।
अभ्यास प्रश्न (हमारे अपने)
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
फ़ेयोल के अनुसार समन्वय क्या है?
आदर्श उत्तर
उपक्रम की सारी गतिविधियों में सामंजस्य बैठाना, ताकि उसका संचालन सुगम हो और वह सफल रहे।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
गुलिक द्वारा बताए समन्वय के दो मार्ग लिखिए।
आदर्श उत्तर
गुलिक के अनुसार समन्वय दो मार्गों से आता है। पहला, संगठन द्वारा: काम को अधिकार की संरचना में रखे लोगों में बाँटकर वरिष्ठों के आदेश से जोड़ना। दूसरा, विचार की प्रधानता द्वारा: साझा उद्देश्य की ऐसी भावना कि हर कोई अपना काम पूरे में बैठा दे। दोनों परस्पर-विरोधी नहीं; प्रभावी उपक्रम दोनों का प्रयोग करता है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
अंतर-विभागीय समन्वय के कोई चार साधन बताइए।
आदर्श उत्तर
चार साधन: विभागाध्यक्षों का साप्ताहिक सम्मेलन (फ़ेयोल), जिसमें कार्यवृत्त रखे जाते हैं; संपर्क-अधिकारी या समन्वयक; अंतर-विभागीय नोट और बैठक (CSMOP पैरा 54); तथा नोडल मंत्रालयों के साझे दिशानिर्देश। गतिरोध हो तो मामला कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली सचिव-समिति या मंत्री-स्तर पर उठाया जाता है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
भारत में केंद्र-राज्य समन्वय के संस्थागत साधनों का वर्णन कीजिए।
आदर्श उत्तर
केंद्र-राज्य समन्वय के लिए संविधान का अनुच्छेद 263 राष्ट्रपति को आदेश से अंतर-राज्य परिषद बनाने देता है, जिसका काम विवादों पर सलाह, साझे हित की चर्चा और नीति-कार्रवाई के बेहतर समन्वय की सिफ़ारिश है। उसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री और सदस्य सभी राज्यों के मुख्यमंत्री हैं। दूसरी ओर राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 से बनीं पाँच क्षेत्रीय परिषदों के अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री हैं और उपाध्यक्ष क्षेत्र के मुख्यमंत्री बारी-बारी से; राजस्थान उत्तरी परिषद में है। दोनों सलाहकारी हैं, इसलिए आदेश की जगह सहमति से समन्वय करती हैं। केंद्र के भीतर यह काम मंत्रिमंडल सचिवालय करता है।
उत्तर कैसे लिखें (10 अंक, 100 शब्द)
भूमिका
प्रश्न: "समन्वय की आवश्यकता और उसके साधनों की विवेचना कीजिए। भारत से उदाहरण दीजिए।" पहले दो वाक्य: फ़ेयोल की परिभाषा और गुलिक का तर्क कि काम का उप-विभाजन समन्वय को अनिवार्य बनाता है।
मुख्य भाग
- आवश्यकता: उप-विभाजन, बड़ा आकार; अभाव के लक्षण (फ़ेयोल के पानी-बंद डिब्बे)
- दो मार्ग: संगठन द्वारा और विचार की प्रधानता द्वारा (गुलिक)
- साधन: साप्ताहिक सम्मेलन, संपर्क-अधिकारी/समन्वयक, गैंगप्लैंक, CSMOP पैरा 54
- भारत: मंत्रिमंडल सचिवालय व सचिव-समितियाँ; अंतर-राज्य परिषद (अनुच्छेद 263); क्षेत्रीय परिषदें (1956)
- सावधानी: विशेष साधन असामान्य स्थिति के लिए (गुलिक)
निष्कर्ष
निष्कर्ष: समन्वय संयोग से नहीं आता; आदेश और साझे उद्देश्य, दोनों से बुनना पड़ता है, और बार-बार विशेष साधन चाहिए तो संगठन की बनावट सुधारनी चाहिए।
अतिरिक्त मूल्य
- गुलिक का 'संगठन बनाम विचार की प्रधानता' भेद
- अनुच्छेद 263 में 'सकता है' का बिंदु
- राजस्थान: उत्तरी क्षेत्रीय परिषद, 30वीं बैठक जयपुर, 9 जुलाई 2022
त्वरित पुनरावृत्ति
- फ़ेयोल: समन्वय = सारी गतिविधि में सामंजस्य; प्रबंधन के पाँच तत्त्वों में एक (मूल 1916, अनुवाद 1949)
- गुलिक 1937: उप-विभाजन अपरिहार्य तो समन्वय अनिवार्य; समन्वय संयोग से नहीं होता
- दो मार्ग: संगठन द्वारा (अधिकार-संरचना) और विचार की प्रधानता द्वारा (साझा उद्देश्य); दोनों साथ
- अभाव के लक्षण (फ़ेयोल): हर विभाग अलग लक्ष्य, पानी-बंद डिब्बे, सामान्य हित की चिंता नहीं
- साधन: साप्ताहिक सम्मेलन + कार्यवृत्त, संपर्क-अधिकारी, गैंगप्लैंक, समितियाँ, नोडल मंत्रालय
- गुलिक की सावधानी: विशेष साधन असामान्य स्थिति और नीति-मामलों के लिए; नियमित काम संगठन की बनावट से
- CSMOP पैरा 54: नोट (अवर सचिव+), बैठक (संयुक्त सचिव+), मौखिक चर्चा; गतिरोध में सचिव-समिति या मंत्री
- मंत्रिमंडल सचिवालय: कार्य-संचालन और कार्य-आवंटन नियम 1961 का प्रशासन; अंतर-मंत्रालयी समन्वय
- अनुच्छेद 263: अंतर-राज्य परिषद (राष्ट्रपति 'कर सकता है'); आदेश 1990; अध्यक्ष प्रधानमंत्री
- क्षेत्रीय परिषदें: पाँच; राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 भाग III; अध्यक्ष गृह मंत्री; सलाहकारी; राजस्थान उत्तरी परिषद में
याद रखने योग्य शब्द
- coordination
- Fayol
- Gulick
- dominance of an idea
- liaison officer
- Committee of Secretaries
- अनुच्छेद 263
- Zonal Councils
- CSMOP पैरा 54