प्रशासन पर नियंत्रण (विधायी, कार्यकारी, न्यायिक)
तीनों नियंत्रण, उनके साधन, सीमाएँ, एक वास्तविक मामला और सभी हल प्रश्न।
- 10 PYQ
- विधायी
- कार्यकारी
- न्यायिक
सिलेबस में
RPSC (09-01-2026) के अनुसार पेपर III, इकाई II में: "प्रशासन पर नियंत्रण: विधायी, कार्यपालिका, न्यायिक।" (Control over administration: legislative, executive, judicial.) 2013-2024 के पेपरों में इस विषय से सबसे अधिक, कुल 10 प्रश्न देखे गए।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- 2013-2024 के पेपरों में इस विषय से 10 प्रश्न आए (2, 5 और 10 अंक के), यानी पेपर III का सबसे अधिक पूछा जाने वाला विषय।
- प्रश्न तीन ढंग के आते हैं: संसद के साधन (2016, 10 अंक), न्यायिक रूप और रिट (2016, 2018, 2021, 2023) और संबद्ध संस्थाएँ जैसे CVC, महान्यायवादी, शून्य काल (2018, 2023, 2024)।
- एक ही उत्तर में तीनों नियंत्रण, उनके साधन और सीमाएँ लिख पाने वाला परीक्षार्थी 10 अंक के प्रश्न में बढ़त लेता है।
सरल भाषा में: प्रशासन पर नियंत्रण क्यों
सोचिए, गाँव का सरपंच पंचायत के पैसे से सड़क बनवाता है। अगर कोई उससे हिसाब न पूछे, तो सड़क कागज़ पर बन जाएगी और पैसा कहीं और चला जाएगा। इसलिए गाँव में तीन तरह की निगरानी होती है: ग्राम सभा सवाल पूछती है (विधायी), ऊपर का अफ़सर आदेश और जाँच करता है (कार्यकारी) और शिकायत पर अदालत फ़ैसला देती है (न्यायिक)। राज्य और केंद्र के स्तर पर भी यही ढाँचा है, बस पैमाना बड़ा है।
आधुनिक राज्य का प्रशासन कर लगाता है, लाइसेंस देता है, भूमि लेता है और लाखों कर्मचारियों से काम कराता है। इतनी शक्ति के साथ मनमानी, भ्रष्टाचार और अक्षमता का ख़तरा रहता है। नियंत्रण का उद्देश्य है कि शक्ति क़ानून और जनहित की सीमा में रहे और हर निर्णय के लिए कोई जवाबदेह हो।
परीक्षा-योग्य परिभाषा (विश्लेषण पर आधारित सार): प्रशासन पर नियंत्रण वह व्यवस्था है जिससे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती हैं कि लोक प्रशासन क़ानून, नीति और जनहित के अनुसार काम करे, और भटकने पर उसे सुधारा या दंडित किया जा सके।
तीन नियंत्रणों की तुलना
| आधार | विधायी | कार्यकारी | न्यायिक |
|---|---|---|---|
| कौन करता है | संसद या राज्य विधान सभा | मंत्री, उच्च अधिकारी, मंत्रिमंडल सचिवालय, वित्त मंत्रालय | सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय, अधिकरण |
| स्वरूप | राजनीतिक और वित्तीय | आंतरिक, पदानुक्रम पर आधारित | विधिक, शिकायत होने पर |
| कब | पहले और बाद में, लगातार | लगातार, कार्य के दौरान | प्रायः कार्य हो जाने के बाद (प्रतिषेध अपवाद) |
| मुख्य साधन | प्रश्न, प्रस्ताव, बजट, समितियाँ | आदेश, नियम, पर्यवेक्षण, वित्तीय स्वीकृति | रिट, न्यायिक समीक्षा, अपील |
| मुख्य सीमा | समय की कमी, दलीय अनुशासन | स्वयं के विभाग की जाँच में पक्षपात | विवेकाधीन नीति में हस्तक्षेप नहीं |
तीनों नियंत्रण एक-दूसरे के पूरक हैं; कोई अकेला पर्याप्त नहीं।
1. विधायी नियंत्रण (Legislative Control)
भारतीय संसदीय व्यवस्था की नींव मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व है। संविधान के अनुच्छेद 75(3) के अनुसार केंद्रीय मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति और अनुच्छेद 164(2) के अनुसार राज्य की मंत्रिपरिषद विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। मंत्री विभाग के हर कार्य के लिए सदन में जवाब देता है, इसलिए प्रशासन पर नियंत्रण का सबसे ऊँचा स्तर यही है। अनुच्छेद 88 के अनुसार मंत्री और महान्यायवादी किसी भी सदन में बोल सकते हैं, पर मतदान का अधिकार केवल सदस्य के रूप में ही रहता है।
नीचे संसदीय साधनों का सार दिया गया है। प्रश्न काल के बारे में राज्य सभा की एक पुस्तिका कहती है कि वह मुख्यतः कार्यपालिका की कार्रवाई पर एक प्रकार का विधायी नियंत्रण रखने के लिए है।
संसदीय साधन: एक नज़र में
| साधन | क्या है | मुख्य बात |
|---|---|---|
| प्रश्न काल (Question Hour) | बैठक का पहला घंटा; तारांकित, अतारांकित, अल्प-सूचना और पूरक प्रश्न | सामान्यतः कम से कम 15 पूर्ण दिन की सूचना (लोक सभा नियम 33) |
| शून्य काल (Zero Hour) | अत्यावश्यक लोक-महत्व के मामले उठाना | नियमों में नहीं; परंपरा से विकसित (राज्य सभा पुस्तिका) |
| ध्यानाकर्षण (Calling Attention) | लोक-महत्व के मामले पर मंत्री का वक्तव्य | लोक सभा नियम 197; राज्य सभा नियम 180 |
| स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion) | अत्यावश्यक मामले पर सदन का कामकाज रोकना | अध्यक्ष की सहमति आवश्यक (लोक सभा नियम 56-57) |
| अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) | मंत्रिपरिषद में विश्वास का परीक्षण | लोक सभा नियम 198; पारित होने पर सरकार जाती है |
| कटौती प्रस्ताव (Cut Motion) | अनुदान माँग में कटौती का प्रस्ताव | नीति-कटौती (एक रुपया), मितव्ययिता-कटौती, सांकेतिक-कटौती (100 रुपये) |
बजट और वित्तीय नियंत्रण
संसद की सबसे ठोस शक्ति पैसे पर नियंत्रण है। अनुच्छेद 113 के अनुसार अनुदान की माँगें केवल लोक सभा में रखी जाती हैं; सदन माँग स्वीकार, अस्वीकार या कम कर सकता है, और राष्ट्रपति की सिफ़ारिश के बिना कोई माँग नहीं रखी जा सकती। भारत की संचित निधि पर भारित व्यय पर चर्चा हो सकती है, पर उस पर मतदान नहीं होता। अनुच्छेद 114 के अंतर्गत विनियोग विधेयक पारित होने पर ही धन निकाला जा सकता है, और उसमें राशि बदलने वाला संशोधन नहीं लाया जा सकता। अनुच्छेद 116 लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान की व्यवस्था करता है।
व्यवहार में सब माँगों पर चर्चा का समय नहीं होता। निर्धारित अवधि पूरी होने पर बची हुई सभी माँगें बिना चर्चा एक साथ मतदान के लिए रख दी जाती हैं; इसे गिलोटिन (Guillotine) कहते हैं। यही कारण है कि बजट पर सदन का नियंत्रण कई बार औपचारिक रह जाता है। 1993 से विभाग-संबंधित स्थायी समितियों ने प्राक्कलनों की जाँच का कार्य सँभाला, जिससे यह कमी कुछ घटी है।
संसदीय समितियाँ
सदन में चर्चा का समय सीमित है, इसलिए असली जाँच समितियों में होती है। लोक लेखा समिति (PAC) विनियोग लेखाओं और CAG के प्रतिवेदनों की जाँच करती है। इसमें अधिकतम 22 सदस्य होते हैं (15 लोक सभा से, 7 राज्य सभा से), सदस्यों का कार्यकाल एक वर्ष का है और कोई मंत्री इसका सदस्य नहीं हो सकता। प्राक्कलन समिति लोक सभा की ही समिति है, जिसमें अधिकतम 30 सदस्य होते हैं; वह मितव्ययिता, कार्यकुशलता और वैकल्पिक नीतियाँ सुझाती है। सार्वजनिक उपक्रम समिति (COPU) सरकारी उपक्रमों की जाँच करती है, पर बड़ी सरकारी नीति और दैनिक प्रशासन उसके क्षेत्र से बाहर हैं।
प्रमुख संसदीय समितियाँ
| समिति | आकार | काम |
|---|---|---|
| लोक लेखा समिति (PAC) | 22 (15 लोक सभा + 7 राज्य सभा) | विनियोग लेखे और CAG प्रतिवेदन; व्यय का औचित्य (लोक सभा नियम 308-309) |
| प्राक्कलन समिति (Estimates) | 30, केवल लोक सभा | मितव्ययिता, कुशलता, वैकल्पिक नीति (नियम 310-311) |
| सार्वजनिक उपक्रम समिति (COPU) | 22 (15 + 7) | सरकारी उपक्रमों की रिपोर्ट व लेखे; नीति पर नहीं (नियम 312A-B) |
| विभाग-संबंधित स्थायी समितियाँ (DRSC) | 24 समितियाँ, प्रत्येक 31 सदस्य (21 + 10) | मंत्रालयों की अनुदान माँगें, विधेयक, वार्षिक प्रतिवेदन |
| अधीनस्थ विधान समिति | 15, अध्यक्ष द्वारा मनोनीत | नियम-क़ानूनों की जाँच कि वे कार्यपालिका को मिली शक्ति की सीमा में हैं (नियम 317-318) |
| सरकारी आश्वासन समिति | 15 | मंत्रियों के सदन में दिए आश्वासनों का पालन (नियम 323-324) |
विधायी नियंत्रण की सीमाएँ
सदस्यों के पास तकनीकी विशेषज्ञता और समय कम होता है। दलीय अनुशासन के कारण बहुमत वाली सरकार को जवाबदेह ठहराना कठिन होता है। प्रत्यायोजित विधान इतना बढ़ गया है कि हर नियम की जाँच कठिन है। (विश्लेषण) इन्हीं कारणों से विधायी नियंत्रण को CAG की रिपोर्ट और समितियों जैसे विशेषज्ञ तंत्र का सहारा लेना पड़ता है।
2. कार्यकारी नियंत्रण (Executive Control)
यह प्रशासन के भीतर से किया जाने वाला नियंत्रण है, जैसे थाने का प्रभारी अपने जवान से और ज़िला कलक्टर तहसीलदार से रिपोर्ट माँगता है। इसमें पदानुक्रम (Hierarchy) के ज़रिये आदेश, निरीक्षण, अपील और अनुशासनात्मक कार्रवाई शामिल है। इसके मुख्य स्तर ये हैं।
मंत्री और मंत्रिपरिषद: अनुच्छेद 77(3) के अनुसार राष्ट्रपति सरकारी कार्य के संचालन और मंत्रालयों में उसके बँटवारे के लिए नियम बनाते हैं। इन्हीं के अंतर्गत मंत्री अपने विभाग का राजनीतिक प्रमुख है और सचिव उसका प्रशासनिक प्रमुख। मंत्रिमंडल सचिवालय कार्य-संचालन नियम 1961 और कार्य-आवंटन नियम 1961 का प्रशासन करता है, मंत्रिमंडल और उसकी समितियों को सचिवालयी सहायता देता है और सचिवों की समितियों से मंत्रालयों में तालमेल बैठाता है।
वित्त मंत्रालय: व्यय विभाग सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन का नोडल विभाग है और लेखा-परीक्षा की टिप्पणियों की निगरानी करता है। प्रत्येक मंत्रालय में वित्तीय सलाहकार (Financial Adviser) होता है, जो प्रशासनिक मंत्रालय और व्यय विभाग, दोनों के प्रति जवाबदेह है। इसी से कोई विभाग अपनी मर्ज़ी से ख़र्च नहीं कर पाता।
प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग (DARPG): यह नागरिक-केंद्रित शासन और शिकायत निवारण की नीति का नोडल विभाग है। उसका CPGRAMS पोर्टल नागरिक की शिकायत संबंधित मंत्रालय या राज्य को भेजता है और निपटान की निगरानी करता है। इस प्रकार शिकायत ऊपर से प्रशासन को सुधारने का साधन बनती है।
सीमा: विभाग स्वयं अपनी जाँच करे तो पक्षपात की आशंका रहती है, और गोपनीयता व लालफ़ीताशाही भी बाधा बनती है। इसलिए बाहरी निगरानी, यानी विधायिका और न्यायपालिका, ज़रूरी है।
3. न्यायिक नियंत्रण (Judicial Control)
जब सरकारी आदेश से किसी की संपत्ति, नौकरी या स्वतंत्रता प्रभावित हो और विभाग सुनवाई न करे, तो नागरिक अदालत जा सकता है। न्यायालय देखता है कि अधिकारी ने क़ानून की सीमा पार तो नहीं की, उचित प्रक्रिया अपनाई या नहीं और निर्णय मनमाना तो नहीं है। यही न्यायिक नियंत्रण है।
संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 13 के अनुसार मूल अधिकारों से टकराने वाला क़ानून शून्य है। अनुच्छेद 32 में मूल अधिकारों के लिए सर्वोच्च न्यायालय को और अनुच्छेद 226 में उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति है। उच्च न्यायालय की रिट-शक्ति मूल अधिकारों के साथ "किसी अन्य प्रयोजन" के लिए भी है, इसलिए वह अधिक व्यापक है। अनुच्छेद 227 उच्च न्यायालय को अपने क्षेत्र के सभी न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण देता है। अनुच्छेद 136 में सर्वोच्च न्यायालय विशेष अनुमति याचिका (SLP) सुन सकता है, और अनुच्छेद 300 के अनुसार संघ और राज्य पर वाद चल सकता है।
पाँच रिट: कब कौन सी
| रिट | अर्थ | कब काम आती है | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) | व्यक्ति को अदालत में प्रस्तुत करो | हिरासत की वैधता जाँचने | बिना आधार पुलिस हिरासत में रखे व्यक्ति के लिए |
| परमादेश (Mandamus) | "हम आदेश देते हैं" | सार्वजनिक अधिकारी अपना विधिक कर्तव्य न निभाए | पात्र आवेदक की पेंशन रोके रखना |
| प्रतिषेध (Prohibition) | रोक | निचली अदालत या अधिकरण कार्यवाही के दौरान अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाए | अधिकरण ऐसा मामला सुन रहा हो जो उसके क्षेत्र में नहीं |
| उत्प्रेषण (Certiorari) | सूचित करना, रिकॉर्ड मँगाना | निर्णय हो जाने के बाद उसे रद्द करने | अधिकार-क्षेत्र से बाहर दिया गया आदेश |
| अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) | किस अधिकार से? | सार्वजनिक पद पर अवैध क़ब्ज़ा | अयोग्य व्यक्ति का पद ग्रहण |
प्रतिषेध बनाम परमादेश
प्रतिषेध
स्वरूपनिवारक: कार्यवाही चलते समय रोकता है
किसके विरुद्धनिचली अदालत, अधिकरण, अर्ध-न्यायिक निकाय
उद्देश्यअधिकार-क्षेत्र से बाहर जाने से रोकना
कबनिर्णय से पहले
परमादेश
स्वरूपआदेशात्मक: कर्तव्य निभाने को कहता है
किसके विरुद्धसार्वजनिक अधिकारी या निकाय; सामान्यतः निजी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं
उद्देश्यविधिक कर्तव्य का पालन कराना
कबकर्तव्य की अवहेलना होने पर
प्रतिषेध और उत्प्रेषण, दोनों अधिकार-क्षेत्र के अतिक्रमण को रोकते हैं; अंतर समय का है (हरि विष्णु कामत, 1954)।
प्रशासनिक अधिकरण (Administrative Tribunals)
सरकारी कर्मचारियों के सेवा-विवादों से अदालतें भर रही थीं। 42वें संशोधन (1976) से अनुच्छेद 323A जुड़ा, जिसके अंतर्गत भर्ती और सेवा-शर्तों के लिए प्रशासनिक अधिकरण बन सकते हैं। अनुच्छेद 323B कर, विदेशी मुद्रा, औद्योगिक विवाद, भूमि सुधार और चुनाव जैसे विषयों के लिए अधिकरणों की अनुमति देता है। प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम 1985 से केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) बना।
एल. चंद्र कुमार (1997) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 323A(2)(d) और 323B(3)(d) उस सीमा तक असंवैधानिक हैं जहाँ वे उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के अनुच्छेद 226, 227 और 32 के अधिकार-क्षेत्र को बाहर करते हैं; यह अधिकार-क्षेत्र संविधान की मूल संरचना का भाग है। इसलिए अधिकरण के निर्णय के विरुद्ध उच्च न्यायालय की खंडपीठ में जाया जा सकता है।
फ़्रांस, ब्रिटेन और भारत: प्रशासनिक विवाद कहाँ सुने जाते हैं
| आधार | फ़्रांस (Droit Administratif) | ब्रिटेन (डाइसी की विधि) | भारत |
|---|---|---|---|
| न्यायालय | अलग प्रशासनिक न्यायालय, शीर्ष पर कोंसेई द'एता (Conseil d'État) | साधारण न्यायालय ही सबके लिए | साधारण न्यायालय; सेवा-विवादों के लिए अधिकरण |
| क़ानून | सार्वजनिक पक्ष के लिए पृथक् प्रशासनिक विधि | साधारण विधि सबके लिए समान | संविधान, विधियाँ और निर्णय; अनुच्छेद 226 से समीक्षा |
| मूल बात | राज्य के कार्य के लिए विशेष विवाद-प्रणाली | विधि का शासन; अधिकारी भी साधारण अदालत के अधीन | मिश्र ढाँचा; अधिकरणों पर भी उच्च न्यायालय की निगरानी |
कोंसेई द'एता की स्थापना 13 दिसंबर 1799 के संविधान के अनुच्छेद 52 के अंतर्गत हुई; डाइसी ने 1885 में इस फ़्रांसीसी प्रणाली की तुलना की।
न्यायिक नियंत्रण की सीमाएँ
अनुच्छेद 74(2) के अनुसार मंत्रियों ने राष्ट्रपति को क्या सलाह दी, इसकी जाँच किसी न्यायालय में नहीं हो सकती। अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपाल को पद के कार्यों के लिए न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं रखता, कुछ शर्तों के साथ। विवादित तथ्यों वाले मामलों में रिट कठिन है, और परमादेश सामान्यतः निजी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं मिलता (सोहनलाल, 1957)। (विश्लेषण) अदालत महँगी और धीमी भी है, इसलिए न्यायिक नियंत्रण हर नागरिक के लिए समान रूप से सुलभ नहीं।
अन्य नियंत्रण (केवल सिलेबस संदर्भ)
| संस्था | आधार | भूमिका |
|---|---|---|
| नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) | अनुच्छेद 148-151 | लेखा-परीक्षण; रिपोर्ट संसद या विधान-मंडल में रखी जाती है |
| केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) | CVC अधिनियम 2003 | भ्रष्टाचार की निगरानी; CBI का अधीक्षण (जाँच का तरीक़ा निर्देशित नहीं करता) |
| लोकपाल एवं लोकायुक्त | लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 | लोक सेवकों के भ्रष्टाचार की शिकायतें |
| सूचना का अधिकार | सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 | नागरिक को जानकारी माँगने का अधिकार, इस प्रकार पारदर्शिता |
| महान्यायवादी | अनुच्छेद 76 | सरकार का मुख्य विधि सलाहकार |
नियंत्रण का मानचित्र
प्रशासन पर नियंत्रण
विधायी
- प्रश्न काल, शून्य काल
- अविश्वास, स्थगन
- बजट, कटौती
- PAC, Estimates, COPU
कार्यकारी
- पदानुक्रम, आदेश
- मंत्री, मंत्रिमंडल सचिवालय
- वित्त मंत्रालय
- DARPG, CPGRAMS
न्यायिक
- अनुच्छेद 32, 226 रिट
- न्यायिक समीक्षा
- अधिकरण (323A)
- SLP अनुच्छेद 136
अन्य
- CAG
- CVC
- लोकपाल
- RTI
जवाबदेही की कड़ी: लेखा-परीक्षण से सुधार तक
विभाग का व्यय
संचित निधि से
CAG की लेखा-परीक्षा
अनुच्छेद 148-151
रिपोर्ट सदन में
सदन के पटल पर
PAC की जाँच
विभाग से साक्ष्य
सिफ़ारिश
प्रतिवेदन सदन में
सरकार की कार्रवाई
सुधार या स्पष्टीकरण
मुख्य तथ्य
- मंत्रिपरिषद का उत्तरदायित्व
- अनुच्छेद 75(3) लोक सभा के प्रति, अनुच्छेद 164(2) विधान सभा के प्रति
- प्रश्न की सूचना
- कम से कम 15 पूर्ण दिन (लोक सभा नियम 33); राजस्थान विधान सभा में 14 पूर्ण दिन
- PAC और COPU
- 22 सदस्य (15 + 7); प्राक्कलन समिति 30 (केवल लोक सभा)
- अनुच्छेद 323A
- 42वाँ संशोधन 1976; भर्ती और सेवा के अधिकरण
- एल. चंद्र कुमार
- 18 मार्च 1997; अधिकरणों पर उच्च न्यायालय की निगरानी बनी रही
- विनीत नारायण
- 18 दिसंबर 1997; CVC को वैधानिक आधार, CBI निदेशक को दो वर्ष का कार्यकाल
- CVC की संरचना
- CVC अधिनियम 2003: केंद्रीय सतर्कता आयुक्त तथा अधिकतम दो सतर्कता आयुक्त; कार्यकाल 4 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले
- कोंसेई द'एता
- 1799 (संविधान का अनुच्छेद 52); 1872 से अपने निर्णय स्वयं देने का अधिकार
- अंतिम जाँच
- 01-10-2026
राजस्थान का पहलू
राजस्थान विधान सभा की आधिकारिक वेबसाइट (देखा गया 01-10-2026) के अनुसार तारांकित और अतारांकित प्रश्नों के लिए 14 पूर्ण दिन की सूचना चाहिए; अल्प-सूचना प्रश्न 10 पूर्ण दिन से कम की सूचना पर होते हैं और स्वीकार्यता का निर्णय केवल अध्यक्ष करते हैं। अन्य साधन: आधे घंटे की चर्चा, ध्यानाकर्षण, नियम 295 के अंतर्गत विशेष उल्लेख और स्थगन प्रस्ताव। बजट पर लगभग चार दिन सामान्य चर्चा के बाद शेष माँगें गिलोटिन से पारित होती हैं। समितियों में लोक लेखा, सार्वजनिक उपक्रम, प्राक्कलन (क) और (ख), पुस्तकालय एवं सरकारी आश्वासन, तथा विशेषाधिकार एवं अधीनस्थ विधान सहित अन्य समितियाँ हैं (समितियों का पृष्ठ, देखा गया 01-10-2026)।
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- प्रश्न "न्यायिक नियंत्रण" का हो और उत्तर केवल रिट की सूची हो: न्यायिक समीक्षा, अपील, अधिकरण और सीमाएँ भी लिखिए।
- प्रतिषेध और उत्प्रेषण को एक मान लेना: प्रतिषेध निर्णय से पहले, उत्प्रेषण निर्णय के बाद।
- शून्य काल को नियमों में लिखा बताना: यह परंपरा से बनी व्यवस्था है।
- PAC में मंत्री को सदस्य और प्राक्कलन समिति में राज्य सभा के सदस्य लिख देना: गलत; प्राक्कलन केवल लोक सभा की समिति है।
- CVC को किसी भी व्यक्ति की जाँच करने वाली एजेंसी समझना: उसका क्षेत्र धारा 8 में निर्धारित है।
- अनुच्छेद 226 और 32 की शक्ति बराबर बताना: 226 अन्य प्रयोजन के लिए भी है।
वास्तविक मामला
केस स्टडीविनीत नारायण बनाम भारत संघ (1997): जाँच एजेंसी पर निगरानी
जैन डायरी (हवाला) मामले में आरोप थे कि बड़े नेताओं और अधिकारियों के विरुद्ध जाँच दबाई जा रही है। याचिका सर्वोच्च न्यायालय में पहुँची। निर्णय 18 दिसंबर 1997 को आया ((1998) 1 SCC 226)।
- निर्देश 1
- CVC को वैधानिक दर्जा मिले; उसके चयन के लिए प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और विपक्ष के नेता की समिति बने।
- निर्देश 2
- CBI पर CVC का अधीक्षण हो; CBI निदेशक का न्यूनतम कार्यकाल दो वर्ष हो।
- निर्देश 3
- "एकल निर्देश" (Single Directive) को वैध नहीं माना गया, जिसके अनुसार वरिष्ठ अधिकारियों की जाँच के लिए पूर्व अनुमति चाहिए थी।
- विशेषता
- न्यायालय ने "सतत परमादेश" (continuing mandamus) का तरीक़ा अपनाया, यानी निगरानी जारी रखी।
सीख
न्यायपालिका ने रिट-शक्ति से कार्यपालिका की जाँच-व्यवस्था सुधारी; बाद में CVC अधिनियम 2003 ने इन्हें क़ानूनी रूप दिया। यह न्यायिक नियंत्रण का व्यापक और सृजनात्मक उदाहरण है।
उदाहरण (काल्पनिक)
उदाहरण (काल्पनिक)तहसील में राशन कार्ड: तीनों नियंत्रण एक साथ
मान लीजिए किसी पात्र परिवार का राशन कार्ड बिना कारण निरस्त कर दिया गया। यह काल्पनिक उदाहरण केवल समझाने के लिए है।
- कार्यकारी
- परिवार ज़िला कलक्टर या CPGRAMS पर शिकायत करता है; ऊपर का अधिकारी जाँच के आदेश देता है।
- विधायी
- क्षेत्र का विधायक विधान सभा में प्रश्न पूछता है या मामला शून्य काल में उठाता है।
- न्यायिक
- कोई कार्रवाई न हो तो परिवार उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 के अंतर्गत परमादेश माँगता है।
सीख
तीनों रास्ते अलग-अलग गति और शक्ति के हैं; सही मंच चुनना ही व्यावहारिक समझ है।
कौन सी रिट? अभ्यास
हल सहित उदाहरणस्थिति देखकर रिट पहचानिए
दिया है
- स्थिति क: बिना कारण बताए एक व्यक्ति को हिरासत में रखा गया है।
- स्थिति ख: अधिकरण ऐसे मामले की सुनवाई कर रहा है जो उसके क्षेत्र में नहीं आता; सुनवाई अभी चल रही है।
- स्थिति ग: अधिकरण अपने क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय दे चुका है।
- स्थिति घ: अधिकारी पात्र व्यक्ति को प्रमाण-पत्र नहीं दे रहा।
- स्थिति ङ: कोई व्यक्ति अयोग्य होते हुए सार्वजनिक पद पर बैठा है।
- 1चरण 1 देखिए कि मामला व्यक्ति की स्वतंत्रता का है (क), किसी निकाय के अधिकार-क्षेत्र का (ख, ग), कर्तव्य-पालन का (घ) या पद की वैधता का (ङ)।
- 2चरण 2 अधिकार-क्षेत्र के मामले में समय देखिए: चलते समय रोकना है तो प्रतिषेध, निर्णय के बाद रद्द कराना है तो उत्प्रेषण।
- 3चरण 3 मंच चुनिए: मूल अधिकार हो तो अनुच्छेद 32 या 226; अन्य प्रयोजन हो तो केवल अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय)।
निष्कर्ष: क: बंदी प्रत्यक्षीकरण; ख: प्रतिषेध; ग: उत्प्रेषण; घ: परमादेश; ङ: अधिकार-पृच्छा।
पिछले वर्षों के प्रश्न (हल सहित)
2024RAS मुख्य परीक्षापेपर III2 अंक
केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया क्या है ?
आदर्श उत्तर
सर्वोच्च न्यायालय की जाँच में सिद्ध कदाचार या अक्षमता पर राष्ट्रपति के आदेश से (धारा 6)।
2024RAS मुख्य परीक्षापेपर III5 अंक
Role of Attorney General's office in control over the executive
आदर्श उत्तर
अनुच्छेद 76 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त महान्यायवादी सरकार का मुख्य विधि सलाहकार है। वह सभी न्यायालयों में सरकार का पक्ष रखता है और संसद में बोल सकता है, मतदान नहीं। उसकी सलाह से कार्यपालिका की कार्रवाई विधिसम्मत रहती है, इसलिए वह आंतरिक विधिक नियंत्रण का साधन है।
2023RAS मुख्य परीक्षापेपर III2 अंक
Who uploads the question-answer text on the RS/LS web portal
आदर्श उत्तर
संबंधित सदन का सचिवालय प्रश्न-सूची और उत्तर डिजिटल संसद पोर्टल पर प्रकाशित करता है।
2023RAS मुख्य परीक्षापेपर III10 अंक
Forms and methods of judicial control in India
आदर्श उत्तर
भारत में न्यायिक नियंत्रण संविधान से शक्ति पाता है। प्रमुख रूप: (1) अनुच्छेद 32 व 226 के अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा रिट; (2) अनुच्छेद 13 के अंतर्गत कानूनों की न्यायिक समीक्षा; (3) अनुच्छेद 136 में विशेष अनुमति याचिका; (4) अनुच्छेद 227 में उच्च न्यायालय का अधीक्षण; (5) अनुच्छेद 300 में सरकार पर वाद; (6) अधिकरणों की समीक्षा (एल. चंद्र कुमार, 1997)। इन रूपों से अधिकारियों की मनमानी रुकती है और नागरिक को उपचार मिलता है। सीमाएँ: अनुच्छेद 74(2) में मंत्रियों की सलाह की जाँच नहीं, अनुच्छेद 361 में राष्ट्रपति व राज्यपाल को संरक्षण, नीतिगत विवेक में सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं और विवादित तथ्यों में रिट कठिन।
2021RAS मुख्य परीक्षापेपर III5 अंक
प्रशासन पर न्यायिक नियंत्रण के विभिन्न रूपों का उल्लेख कीजिए।
आदर्श उत्तर
न्यायिक नियंत्रण के रूप: (1) अनुच्छेद 32 व 226 की रिटें; (2) अनुच्छेद 13 के अंतर्गत कानूनों और आदेशों की न्यायिक समीक्षा; (3) अनुच्छेद 136 में विशेष अनुमति याचिका; (4) अनुच्छेद 300 में सरकार के विरुद्ध वाद; (5) अनुच्छेद 227 से अधिकरणों पर अधीक्षण।
2018RAS मुख्य परीक्षापेपर III2 अंक
क्या केंद्रीय सतर्कता आयोग किसी के भी विरुद्ध प्रकरण का अन्वेषण कर सकता है?
आदर्श उत्तर
नहीं; धारा 8: केवल अखिल भारतीय सेवा, समूह-क के अधिकारी या केंद्र के संदर्भ पर।
2018RAS मुख्य परीक्षापेपर III2 अंक
शून्य काल क्या है?
आदर्श उत्तर
नियमों में अनुल्लिखित, परंपरा से बनी व्यवस्था, जिसमें सांसद अत्यावश्यक लोक-महत्व के मामले उठाते हैं।
2018RAS मुख्य परीक्षापेपर III5 अंक
न्यायिक नियंत्रण के सन्दर्भ में प्रतिषेध एवं परमादेश लेख (रिट) के मध्य क्या अन्तर है?
आदर्श उत्तर
प्रतिषेध निचली अदालत या अधिकरण को कार्यवाही के दौरान अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाने से रोकता है, इसलिए निवारक है। परमादेश सार्वजनिक अधिकारी को अपना विधिक कर्तव्य निभाने का आदेश देता है। प्रतिषेध न्यायिक या अर्ध-न्यायिक निकायों पर चलता है, जबकि परमादेश सामान्यतः निजी व्यक्ति पर नहीं।
2016RAS मुख्य परीक्षापेपर III2 अंक
प्रशासन पर न्यायिक नियंत्रण की कोई दो विधियाँ लिखिए।
आदर्श उत्तर
(1) अनुच्छेद 32 व 226 के अंतर्गत रिट; (2) कानूनों और आदेशों की न्यायिक समीक्षा।
2016RAS मुख्य परीक्षापेपर III10 अंक
उन पद्धतियों का निरूपण कीजिये जिनके माध्यम से संसद लोक प्रशासन पर नियंत्रण रखती है।
आदर्श उत्तर
संसद इन तरीक़ों से नियंत्रण रखती है: (1) प्रश्न काल, शून्य काल, ध्यानाकर्षण और स्थगन प्रस्ताव; (2) अविश्वास प्रस्ताव तथा सामूहिक उत्तरदायित्व (अनुच्छेद 75(3)); (3) बजट: अनुदान माँगें, कटौती प्रस्ताव और विनियोग विधेयक; (4) समितियाँ: लोक लेखा, प्राक्कलन, सार्वजनिक उपक्रम, विभाग-संबंधित स्थायी, अधीनस्थ विधान और आश्वासन समिति; (5) CAG की रिपोर्ट; (6) विधेयकों व संकल्पों पर बहस। इनसे मंत्री हर निर्णय के लिए सदन के प्रति उत्तरदायी रहते हैं। समितियाँ सदन के बाहर विस्तार से जाँच करती हैं। सीमा यह है कि समय कम है और दलीय अनुशासन से बहुमत का सरकार पर असर सीमित रहता है।
अभ्यास प्रश्न
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
लोक लेखा समिति का मुख्य कार्य क्या है?
आदर्श उत्तर
CAG रिपोर्ट और विनियोग लेखाओं की जाँच करके सरकारी व्यय का औचित्य परखती है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
कटौती प्रस्ताव क्या होता है?
आदर्श उत्तर
अनुदान माँग घटाने का प्रस्ताव; नीति, मितव्ययिता या सांकेतिक कटौती के रूप में।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
कार्यकारी नियंत्रण के प्रमुख साधन लिखिए।
आदर्श उत्तर
कार्यकारी नियंत्रण पदानुक्रम से चलता है। मंत्री विभाग का राजनीतिक प्रमुख है और सचिव प्रशासनिक प्रमुख। मंत्रिमंडल सचिवालय कार्य-संचालन नियमों से तालमेल रखता है, व्यय विभाग और वित्तीय सलाहकार ख़र्च पर रोक लगाते हैं, और DARPG शिकायतों की निगरानी करता है। इसकी कमी यह है कि विभाग स्वयं की जाँच में पक्षपाती हो सकता है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
एल. चंद्र कुमार निर्णय का प्रशासनिक अधिकरणों के संदर्भ में महत्व बताइए।
आदर्श उत्तर
सर्वोच्च न्यायालय ने 1997 में कहा कि अनुच्छेद 226, 227 और 32 के अंतर्गत न्यायिक समीक्षा मूल संरचना का भाग है। अधिकरणों के निर्णय उच्च न्यायालय की खंडपीठ में चुनौती योग्य हैं। इस प्रकार अधिकरण न्यायालयों के पूरक बने, उनके विकल्प नहीं। यह निर्णय अनुच्छेद 323A और 323B की सीमा तय करता है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
प्रशासन पर विधायी नियंत्रण की सीमाओं की विवेचना कीजिए।
आदर्श उत्तर
विधायी नियंत्रण संसदीय लोकतंत्र की आधारशिला है, फिर भी उसकी सीमाएँ हैं। पहली, समय की कमी: प्रश्न काल में सब प्रश्न नहीं आ पाते और बजट की अधिकांश माँगें गिलोटिन से पारित होती हैं। दूसरी, दलीय अनुशासन: बहुमत वाली सरकार पर प्रस्तावों का असर सीमित रहता है। तीसरी, विशेषज्ञता का अभाव: सदस्य तकनीकी विषय गहराई से नहीं समझ पाते। चौथी, प्रत्यायोजित विधान की अधिकता। इन कमियों को समितियाँ और CAG कुछ हद तक पूरा करती हैं। फिर भी सुधार के लिए समितियों को अधिक समय और विशेषज्ञ सहायता चाहिए।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
न्यायिक नियंत्रण की सीमाएँ बताइए और उसके महत्व पर टिप्पणी कीजिए।
आदर्श उत्तर
न्यायिक नियंत्रण नागरिक के अधिकारों का अंतिम संरक्षक है। उसकी सीमाएँ भी हैं। अनुच्छेद 74(2) के अनुसार मंत्रियों की सलाह की जाँच अदालत में नहीं होती। अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपाल को संरक्षण देता है। नीतिगत विवेक में अदालत सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करती और विवादित तथ्यों में रिट कठिन होती है। इसके अलावा अदालत तभी हस्तक्षेप करती है जब कोई पीड़ित जाए, और प्रक्रिया महँगी तथा धीमी है। फिर भी रिट और न्यायिक समीक्षा मनमानी रोकती हैं और कार्यपालिका को क़ानून की सीमा में रखती हैं। इसलिए इसे आवश्यक, पर अकेला अपर्याप्त नियंत्रण माना जाता है।
10 अंक (100 शब्द) के उत्तर का ढाँचा
भूमिका
एक पंक्ति में नियंत्रण की परिभाषा और कारण: शक्ति के साथ जवाबदेही।
मुख्य भाग
- विधायी: अनुच्छेद 75(3), प्रश्न, प्रस्ताव, बजट, PAC आदि समितियाँ।
- कार्यकारी: पदानुक्रम, मंत्री, मंत्रिमंडल सचिवालय, वित्त मंत्रालय।
- न्यायिक: अनुच्छेद 32, 226 की रिट, न्यायिक समीक्षा, अधिकरण।
- सीमाएँ: एक-एक पंक्ति में हर नियंत्रण की कमी।
निष्कर्ष
तीनों नियंत्रण मिलकर ही प्रशासन को क़ानून और जनहित के दायरे में रखते हैं।
अतिरिक्त मूल्य
- विनीत नारायण (1997) जैसा एक निर्णय
- राजस्थान विधान सभा के साधनों का एक उदाहरण
- CAG, CVC, लोकपाल का एक पंक्ति में संदर्भ
त्वरित पुनरावृत्ति
- नियंत्रण तीन प्रकार: विधायी, कार्यकारी, न्यायिक।
- अनुच्छेद 75(3), 164(2): सामूहिक उत्तरदायित्व।
- प्रश्न की सूचना: लोक सभा में 15 पूर्ण दिन; राजस्थान में 14।
- शून्य काल नियमों में नहीं, परंपरा से।
- PAC और COPU: 22 सदस्य; प्राक्कलन: 30, केवल लोक सभा।
- कटौती प्रस्ताव: नीति, मितव्ययिता, सांकेतिक।
- अनुच्छेद 32 सर्वोच्च न्यायालय, 226 उच्च न्यायालय (अन्य प्रयोजन भी)।
- पाँच रिट: बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, अधिकार-पृच्छा।
- अनुच्छेद 323A: 42वाँ संशोधन 1976; एल. चंद्र कुमार 1997।
- विनीत नारायण 1997: CVC को वैधानिक आधार।
याद रखने योग्य शब्द
- गिलोटिन
- सामूहिक उत्तरदायित्व
- न्यायिक समीक्षा
- प्रतिषेध
- परमादेश
- सतत परमादेश
- प्रत्यायोजित विधान