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पेपर III · इकाई II

प्रशासन पर नियंत्रण (विधायी, कार्यकारी, न्यायिक)

तीनों नियंत्रण, उनके साधन, सीमाएँ, एक वास्तविक मामला और सभी हल प्रश्न।

  • 10 PYQ
  • विधायी
  • कार्यकारी
  • न्यायिक
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC (09-01-2026) के अनुसार पेपर III, इकाई II में: "प्रशासन पर नियंत्रण: विधायी, कार्यपालिका, न्यायिक।" (Control over administration: legislative, executive, judicial.) 2013-2024 के पेपरों में इस विषय से सबसे अधिक, कुल 10 प्रश्न देखे गए।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2013-2024 के पेपरों में इस विषय से 10 प्रश्न आए (2, 5 और 10 अंक के), यानी पेपर III का सबसे अधिक पूछा जाने वाला विषय।
  • प्रश्न तीन ढंग के आते हैं: संसद के साधन (2016, 10 अंक), न्यायिक रूप और रिट (2016, 2018, 2021, 2023) और संबद्ध संस्थाएँ जैसे CVC, महान्यायवादी, शून्य काल (2018, 2023, 2024)।
  • एक ही उत्तर में तीनों नियंत्रण, उनके साधन और सीमाएँ लिख पाने वाला परीक्षार्थी 10 अंक के प्रश्न में बढ़त लेता है।

सरल भाषा में: प्रशासन पर नियंत्रण क्यों

सोचिए, गाँव का सरपंच पंचायत के पैसे से सड़क बनवाता है। अगर कोई उससे हिसाब न पूछे, तो सड़क कागज़ पर बन जाएगी और पैसा कहीं और चला जाएगा। इसलिए गाँव में तीन तरह की निगरानी होती है: ग्राम सभा सवाल पूछती है (विधायी), ऊपर का अफ़सर आदेश और जाँच करता है (कार्यकारी) और शिकायत पर अदालत फ़ैसला देती है (न्यायिक)। राज्य और केंद्र के स्तर पर भी यही ढाँचा है, बस पैमाना बड़ा है।

आधुनिक राज्य का प्रशासन कर लगाता है, लाइसेंस देता है, भूमि लेता है और लाखों कर्मचारियों से काम कराता है। इतनी शक्ति के साथ मनमानी, भ्रष्टाचार और अक्षमता का ख़तरा रहता है। नियंत्रण का उद्देश्य है कि शक्ति क़ानून और जनहित की सीमा में रहे और हर निर्णय के लिए कोई जवाबदेह हो।

परीक्षा-योग्य परिभाषा (विश्लेषण पर आधारित सार): प्रशासन पर नियंत्रण वह व्यवस्था है जिससे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती हैं कि लोक प्रशासन क़ानून, नीति और जनहित के अनुसार काम करे, और भटकने पर उसे सुधारा या दंडित किया जा सके।

तीन नियंत्रणों की तुलना

आधारविधायीकार्यकारीन्यायिक
कौन करता हैसंसद या राज्य विधान सभामंत्री, उच्च अधिकारी, मंत्रिमंडल सचिवालय, वित्त मंत्रालयसर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय, अधिकरण
स्वरूपराजनीतिक और वित्तीयआंतरिक, पदानुक्रम पर आधारितविधिक, शिकायत होने पर
कबपहले और बाद में, लगातारलगातार, कार्य के दौरानप्रायः कार्य हो जाने के बाद (प्रतिषेध अपवाद)
मुख्य साधनप्रश्न, प्रस्ताव, बजट, समितियाँआदेश, नियम, पर्यवेक्षण, वित्तीय स्वीकृतिरिट, न्यायिक समीक्षा, अपील
मुख्य सीमासमय की कमी, दलीय अनुशासनस्वयं के विभाग की जाँच में पक्षपातविवेकाधीन नीति में हस्तक्षेप नहीं

तीनों नियंत्रण एक-दूसरे के पूरक हैं; कोई अकेला पर्याप्त नहीं।

1. विधायी नियंत्रण (Legislative Control)

भारतीय संसदीय व्यवस्था की नींव मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व है। संविधान के अनुच्छेद 75(3) के अनुसार केंद्रीय मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति और अनुच्छेद 164(2) के अनुसार राज्य की मंत्रिपरिषद विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। मंत्री विभाग के हर कार्य के लिए सदन में जवाब देता है, इसलिए प्रशासन पर नियंत्रण का सबसे ऊँचा स्तर यही है। अनुच्छेद 88 के अनुसार मंत्री और महान्यायवादी किसी भी सदन में बोल सकते हैं, पर मतदान का अधिकार केवल सदस्य के रूप में ही रहता है।

नीचे संसदीय साधनों का सार दिया गया है। प्रश्न काल के बारे में राज्य सभा की एक पुस्तिका कहती है कि वह मुख्यतः कार्यपालिका की कार्रवाई पर एक प्रकार का विधायी नियंत्रण रखने के लिए है।

संसदीय साधन: एक नज़र में

साधनक्या हैमुख्य बात
प्रश्न काल (Question Hour)बैठक का पहला घंटा; तारांकित, अतारांकित, अल्प-सूचना और पूरक प्रश्नसामान्यतः कम से कम 15 पूर्ण दिन की सूचना (लोक सभा नियम 33)
शून्य काल (Zero Hour)अत्यावश्यक लोक-महत्व के मामले उठानानियमों में नहीं; परंपरा से विकसित (राज्य सभा पुस्तिका)
ध्यानाकर्षण (Calling Attention)लोक-महत्व के मामले पर मंत्री का वक्तव्यलोक सभा नियम 197; राज्य सभा नियम 180
स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion)अत्यावश्यक मामले पर सदन का कामकाज रोकनाअध्यक्ष की सहमति आवश्यक (लोक सभा नियम 56-57)
अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion)मंत्रिपरिषद में विश्वास का परीक्षणलोक सभा नियम 198; पारित होने पर सरकार जाती है
कटौती प्रस्ताव (Cut Motion)अनुदान माँग में कटौती का प्रस्तावनीति-कटौती (एक रुपया), मितव्ययिता-कटौती, सांकेतिक-कटौती (100 रुपये)

बजट और वित्तीय नियंत्रण

संसद की सबसे ठोस शक्ति पैसे पर नियंत्रण है। अनुच्छेद 113 के अनुसार अनुदान की माँगें केवल लोक सभा में रखी जाती हैं; सदन माँग स्वीकार, अस्वीकार या कम कर सकता है, और राष्ट्रपति की सिफ़ारिश के बिना कोई माँग नहीं रखी जा सकती। भारत की संचित निधि पर भारित व्यय पर चर्चा हो सकती है, पर उस पर मतदान नहीं होता। अनुच्छेद 114 के अंतर्गत विनियोग विधेयक पारित होने पर ही धन निकाला जा सकता है, और उसमें राशि बदलने वाला संशोधन नहीं लाया जा सकता। अनुच्छेद 116 लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान की व्यवस्था करता है।

व्यवहार में सब माँगों पर चर्चा का समय नहीं होता। निर्धारित अवधि पूरी होने पर बची हुई सभी माँगें बिना चर्चा एक साथ मतदान के लिए रख दी जाती हैं; इसे गिलोटिन (Guillotine) कहते हैं। यही कारण है कि बजट पर सदन का नियंत्रण कई बार औपचारिक रह जाता है। 1993 से विभाग-संबंधित स्थायी समितियों ने प्राक्कलनों की जाँच का कार्य सँभाला, जिससे यह कमी कुछ घटी है।

संसदीय समितियाँ

सदन में चर्चा का समय सीमित है, इसलिए असली जाँच समितियों में होती है। लोक लेखा समिति (PAC) विनियोग लेखाओं और CAG के प्रतिवेदनों की जाँच करती है। इसमें अधिकतम 22 सदस्य होते हैं (15 लोक सभा से, 7 राज्य सभा से), सदस्यों का कार्यकाल एक वर्ष का है और कोई मंत्री इसका सदस्य नहीं हो सकता। प्राक्कलन समिति लोक सभा की ही समिति है, जिसमें अधिकतम 30 सदस्य होते हैं; वह मितव्ययिता, कार्यकुशलता और वैकल्पिक नीतियाँ सुझाती है। सार्वजनिक उपक्रम समिति (COPU) सरकारी उपक्रमों की जाँच करती है, पर बड़ी सरकारी नीति और दैनिक प्रशासन उसके क्षेत्र से बाहर हैं।

प्रमुख संसदीय समितियाँ

समितिआकारकाम
लोक लेखा समिति (PAC)22 (15 लोक सभा + 7 राज्य सभा)विनियोग लेखे और CAG प्रतिवेदन; व्यय का औचित्य (लोक सभा नियम 308-309)
प्राक्कलन समिति (Estimates)30, केवल लोक सभामितव्ययिता, कुशलता, वैकल्पिक नीति (नियम 310-311)
सार्वजनिक उपक्रम समिति (COPU)22 (15 + 7)सरकारी उपक्रमों की रिपोर्ट व लेखे; नीति पर नहीं (नियम 312A-B)
विभाग-संबंधित स्थायी समितियाँ (DRSC)24 समितियाँ, प्रत्येक 31 सदस्य (21 + 10)मंत्रालयों की अनुदान माँगें, विधेयक, वार्षिक प्रतिवेदन
अधीनस्थ विधान समिति15, अध्यक्ष द्वारा मनोनीतनियम-क़ानूनों की जाँच कि वे कार्यपालिका को मिली शक्ति की सीमा में हैं (नियम 317-318)
सरकारी आश्वासन समिति15मंत्रियों के सदन में दिए आश्वासनों का पालन (नियम 323-324)

विधायी नियंत्रण की सीमाएँ

सदस्यों के पास तकनीकी विशेषज्ञता और समय कम होता है। दलीय अनुशासन के कारण बहुमत वाली सरकार को जवाबदेह ठहराना कठिन होता है। प्रत्यायोजित विधान इतना बढ़ गया है कि हर नियम की जाँच कठिन है। (विश्लेषण) इन्हीं कारणों से विधायी नियंत्रण को CAG की रिपोर्ट और समितियों जैसे विशेषज्ञ तंत्र का सहारा लेना पड़ता है।

2. कार्यकारी नियंत्रण (Executive Control)

यह प्रशासन के भीतर से किया जाने वाला नियंत्रण है, जैसे थाने का प्रभारी अपने जवान से और ज़िला कलक्टर तहसीलदार से रिपोर्ट माँगता है। इसमें पदानुक्रम (Hierarchy) के ज़रिये आदेश, निरीक्षण, अपील और अनुशासनात्मक कार्रवाई शामिल है। इसके मुख्य स्तर ये हैं।

मंत्री और मंत्रिपरिषद: अनुच्छेद 77(3) के अनुसार राष्ट्रपति सरकारी कार्य के संचालन और मंत्रालयों में उसके बँटवारे के लिए नियम बनाते हैं। इन्हीं के अंतर्गत मंत्री अपने विभाग का राजनीतिक प्रमुख है और सचिव उसका प्रशासनिक प्रमुख। मंत्रिमंडल सचिवालय कार्य-संचालन नियम 1961 और कार्य-आवंटन नियम 1961 का प्रशासन करता है, मंत्रिमंडल और उसकी समितियों को सचिवालयी सहायता देता है और सचिवों की समितियों से मंत्रालयों में तालमेल बैठाता है।

वित्त मंत्रालय: व्यय विभाग सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन का नोडल विभाग है और लेखा-परीक्षा की टिप्पणियों की निगरानी करता है। प्रत्येक मंत्रालय में वित्तीय सलाहकार (Financial Adviser) होता है, जो प्रशासनिक मंत्रालय और व्यय विभाग, दोनों के प्रति जवाबदेह है। इसी से कोई विभाग अपनी मर्ज़ी से ख़र्च नहीं कर पाता।

प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग (DARPG): यह नागरिक-केंद्रित शासन और शिकायत निवारण की नीति का नोडल विभाग है। उसका CPGRAMS पोर्टल नागरिक की शिकायत संबंधित मंत्रालय या राज्य को भेजता है और निपटान की निगरानी करता है। इस प्रकार शिकायत ऊपर से प्रशासन को सुधारने का साधन बनती है।

सीमा: विभाग स्वयं अपनी जाँच करे तो पक्षपात की आशंका रहती है, और गोपनीयता व लालफ़ीताशाही भी बाधा बनती है। इसलिए बाहरी निगरानी, यानी विधायिका और न्यायपालिका, ज़रूरी है।

3. न्यायिक नियंत्रण (Judicial Control)

जब सरकारी आदेश से किसी की संपत्ति, नौकरी या स्वतंत्रता प्रभावित हो और विभाग सुनवाई न करे, तो नागरिक अदालत जा सकता है। न्यायालय देखता है कि अधिकारी ने क़ानून की सीमा पार तो नहीं की, उचित प्रक्रिया अपनाई या नहीं और निर्णय मनमाना तो नहीं है। यही न्यायिक नियंत्रण है।

संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 13 के अनुसार मूल अधिकारों से टकराने वाला क़ानून शून्य है। अनुच्छेद 32 में मूल अधिकारों के लिए सर्वोच्च न्यायालय को और अनुच्छेद 226 में उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति है। उच्च न्यायालय की रिट-शक्ति मूल अधिकारों के साथ "किसी अन्य प्रयोजन" के लिए भी है, इसलिए वह अधिक व्यापक है। अनुच्छेद 227 उच्च न्यायालय को अपने क्षेत्र के सभी न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण देता है। अनुच्छेद 136 में सर्वोच्च न्यायालय विशेष अनुमति याचिका (SLP) सुन सकता है, और अनुच्छेद 300 के अनुसार संघ और राज्य पर वाद चल सकता है।

पाँच रिट: कब कौन सी

रिटअर्थकब काम आती हैउदाहरण
बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)व्यक्ति को अदालत में प्रस्तुत करोहिरासत की वैधता जाँचनेबिना आधार पुलिस हिरासत में रखे व्यक्ति के लिए
परमादेश (Mandamus)"हम आदेश देते हैं"सार्वजनिक अधिकारी अपना विधिक कर्तव्य न निभाएपात्र आवेदक की पेंशन रोके रखना
प्रतिषेध (Prohibition)रोकनिचली अदालत या अधिकरण कार्यवाही के दौरान अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाएअधिकरण ऐसा मामला सुन रहा हो जो उसके क्षेत्र में नहीं
उत्प्रेषण (Certiorari)सूचित करना, रिकॉर्ड मँगानानिर्णय हो जाने के बाद उसे रद्द करनेअधिकार-क्षेत्र से बाहर दिया गया आदेश
अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto)किस अधिकार से?सार्वजनिक पद पर अवैध क़ब्ज़ाअयोग्य व्यक्ति का पद ग्रहण

प्रतिषेध बनाम परमादेश

प्रतिषेध

स्वरूपनिवारक: कार्यवाही चलते समय रोकता है

किसके विरुद्धनिचली अदालत, अधिकरण, अर्ध-न्यायिक निकाय

उद्देश्यअधिकार-क्षेत्र से बाहर जाने से रोकना

कबनिर्णय से पहले

परमादेश

स्वरूपआदेशात्मक: कर्तव्य निभाने को कहता है

किसके विरुद्धसार्वजनिक अधिकारी या निकाय; सामान्यतः निजी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं

उद्देश्यविधिक कर्तव्य का पालन कराना

कबकर्तव्य की अवहेलना होने पर

प्रतिषेध और उत्प्रेषण, दोनों अधिकार-क्षेत्र के अतिक्रमण को रोकते हैं; अंतर समय का है (हरि विष्णु कामत, 1954)।

प्रशासनिक अधिकरण (Administrative Tribunals)

सरकारी कर्मचारियों के सेवा-विवादों से अदालतें भर रही थीं। 42वें संशोधन (1976) से अनुच्छेद 323A जुड़ा, जिसके अंतर्गत भर्ती और सेवा-शर्तों के लिए प्रशासनिक अधिकरण बन सकते हैं। अनुच्छेद 323B कर, विदेशी मुद्रा, औद्योगिक विवाद, भूमि सुधार और चुनाव जैसे विषयों के लिए अधिकरणों की अनुमति देता है। प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम 1985 से केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) बना।

एल. चंद्र कुमार (1997) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 323A(2)(d) और 323B(3)(d) उस सीमा तक असंवैधानिक हैं जहाँ वे उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के अनुच्छेद 226, 227 और 32 के अधिकार-क्षेत्र को बाहर करते हैं; यह अधिकार-क्षेत्र संविधान की मूल संरचना का भाग है। इसलिए अधिकरण के निर्णय के विरुद्ध उच्च न्यायालय की खंडपीठ में जाया जा सकता है।

फ़्रांस, ब्रिटेन और भारत: प्रशासनिक विवाद कहाँ सुने जाते हैं

आधारफ़्रांस (Droit Administratif)ब्रिटेन (डाइसी की विधि)भारत
न्यायालयअलग प्रशासनिक न्यायालय, शीर्ष पर कोंसेई द'एता (Conseil d'État)साधारण न्यायालय ही सबके लिएसाधारण न्यायालय; सेवा-विवादों के लिए अधिकरण
क़ानूनसार्वजनिक पक्ष के लिए पृथक् प्रशासनिक विधिसाधारण विधि सबके लिए समानसंविधान, विधियाँ और निर्णय; अनुच्छेद 226 से समीक्षा
मूल बातराज्य के कार्य के लिए विशेष विवाद-प्रणालीविधि का शासन; अधिकारी भी साधारण अदालत के अधीनमिश्र ढाँचा; अधिकरणों पर भी उच्च न्यायालय की निगरानी

कोंसेई द'एता की स्थापना 13 दिसंबर 1799 के संविधान के अनुच्छेद 52 के अंतर्गत हुई; डाइसी ने 1885 में इस फ़्रांसीसी प्रणाली की तुलना की।

न्यायिक नियंत्रण की सीमाएँ

अनुच्छेद 74(2) के अनुसार मंत्रियों ने राष्ट्रपति को क्या सलाह दी, इसकी जाँच किसी न्यायालय में नहीं हो सकती। अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपाल को पद के कार्यों के लिए न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं रखता, कुछ शर्तों के साथ। विवादित तथ्यों वाले मामलों में रिट कठिन है, और परमादेश सामान्यतः निजी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं मिलता (सोहनलाल, 1957)। (विश्लेषण) अदालत महँगी और धीमी भी है, इसलिए न्यायिक नियंत्रण हर नागरिक के लिए समान रूप से सुलभ नहीं।

अन्य नियंत्रण (केवल सिलेबस संदर्भ)

संस्थाआधारभूमिका
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG)अनुच्छेद 148-151लेखा-परीक्षण; रिपोर्ट संसद या विधान-मंडल में रखी जाती है
केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC)CVC अधिनियम 2003भ्रष्टाचार की निगरानी; CBI का अधीक्षण (जाँच का तरीक़ा निर्देशित नहीं करता)
लोकपाल एवं लोकायुक्तलोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013लोक सेवकों के भ्रष्टाचार की शिकायतें
सूचना का अधिकारसूचना का अधिकार अधिनियम 2005नागरिक को जानकारी माँगने का अधिकार, इस प्रकार पारदर्शिता
महान्यायवादीअनुच्छेद 76सरकार का मुख्य विधि सलाहकार

नियंत्रण का मानचित्र

प्रशासन पर नियंत्रण

विधायी

  • प्रश्न काल, शून्य काल
  • अविश्वास, स्थगन
  • बजट, कटौती
  • PAC, Estimates, COPU

कार्यकारी

  • पदानुक्रम, आदेश
  • मंत्री, मंत्रिमंडल सचिवालय
  • वित्त मंत्रालय
  • DARPG, CPGRAMS

न्यायिक

  • अनुच्छेद 32, 226 रिट
  • न्यायिक समीक्षा
  • अधिकरण (323A)
  • SLP अनुच्छेद 136

अन्य

  • CAG
  • CVC
  • लोकपाल
  • RTI

जवाबदेही की कड़ी: लेखा-परीक्षण से सुधार तक

  1. विभाग का व्यय

    संचित निधि से

  2. CAG की लेखा-परीक्षा

    अनुच्छेद 148-151

  3. रिपोर्ट सदन में

    सदन के पटल पर

  4. PAC की जाँच

    विभाग से साक्ष्य

  5. सिफ़ारिश

    प्रतिवेदन सदन में

  6. सरकार की कार्रवाई

    सुधार या स्पष्टीकरण

यह श्रृंखला दिखाती है कि लेखा-परीक्षण और संसद मिलकर वित्तीय नियंत्रण कैसे करते हैं।

मुख्य तथ्य

मंत्रिपरिषद का उत्तरदायित्व
अनुच्छेद 75(3) लोक सभा के प्रति, अनुच्छेद 164(2) विधान सभा के प्रति
प्रश्न की सूचना
कम से कम 15 पूर्ण दिन (लोक सभा नियम 33); राजस्थान विधान सभा में 14 पूर्ण दिन
PAC और COPU
22 सदस्य (15 + 7); प्राक्कलन समिति 30 (केवल लोक सभा)
अनुच्छेद 323A
42वाँ संशोधन 1976; भर्ती और सेवा के अधिकरण
एल. चंद्र कुमार
18 मार्च 1997; अधिकरणों पर उच्च न्यायालय की निगरानी बनी रही
विनीत नारायण
18 दिसंबर 1997; CVC को वैधानिक आधार, CBI निदेशक को दो वर्ष का कार्यकाल
CVC की संरचना
CVC अधिनियम 2003: केंद्रीय सतर्कता आयुक्त तथा अधिकतम दो सतर्कता आयुक्त; कार्यकाल 4 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले
कोंसेई द'एता
1799 (संविधान का अनुच्छेद 52); 1872 से अपने निर्णय स्वयं देने का अधिकार
अंतिम जाँच
01-10-2026

राजस्थान का पहलू

राजस्थान विधान सभा की आधिकारिक वेबसाइट (देखा गया 01-10-2026) के अनुसार तारांकित और अतारांकित प्रश्नों के लिए 14 पूर्ण दिन की सूचना चाहिए; अल्प-सूचना प्रश्न 10 पूर्ण दिन से कम की सूचना पर होते हैं और स्वीकार्यता का निर्णय केवल अध्यक्ष करते हैं। अन्य साधन: आधे घंटे की चर्चा, ध्यानाकर्षण, नियम 295 के अंतर्गत विशेष उल्लेख और स्थगन प्रस्ताव। बजट पर लगभग चार दिन सामान्य चर्चा के बाद शेष माँगें गिलोटिन से पारित होती हैं। समितियों में लोक लेखा, सार्वजनिक उपक्रम, प्राक्कलन (क) और (ख), पुस्तकालय एवं सरकारी आश्वासन, तथा विशेषाधिकार एवं अधीनस्थ विधान सहित अन्य समितियाँ हैं (समितियों का पृष्ठ, देखा गया 01-10-2026)।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • प्रश्न "न्यायिक नियंत्रण" का हो और उत्तर केवल रिट की सूची हो: न्यायिक समीक्षा, अपील, अधिकरण और सीमाएँ भी लिखिए।
  • प्रतिषेध और उत्प्रेषण को एक मान लेना: प्रतिषेध निर्णय से पहले, उत्प्रेषण निर्णय के बाद।
  • शून्य काल को नियमों में लिखा बताना: यह परंपरा से बनी व्यवस्था है।
  • PAC में मंत्री को सदस्य और प्राक्कलन समिति में राज्य सभा के सदस्य लिख देना: गलत; प्राक्कलन केवल लोक सभा की समिति है।
  • CVC को किसी भी व्यक्ति की जाँच करने वाली एजेंसी समझना: उसका क्षेत्र धारा 8 में निर्धारित है।
  • अनुच्छेद 226 और 32 की शक्ति बराबर बताना: 226 अन्य प्रयोजन के लिए भी है।