ज़िला कलेक्टर : राजस्व, क़ानून-व्यवस्था और विकास प्रशासन
ज़िला प्रशासन की धुरी — राजस्व, क़ानून-व्यवस्था और विकास, तीनों एक ही पद में। यहाँ पद की उत्पत्ति, शक्तियाँ, पंचायती राज के बाद बदलाव, आलोचना और सुधार, सब परीक्षा-उपयोगी रूप में।
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II : "ज़िला : ज़िला कलेक्टर, क़ानून-व्यवस्था प्रशासन, राजस्व प्रशासन, विकास प्रशासन।" (मूल पाठ: District: District Collector, law and order administration, revenue administration, development administration.) इस पेज में चारों हिस्से अलग-अलग शीर्षकों में कवर हैं।
उत्पत्ति : कलेक्टर का पद कैसे बना
ज़िला स्तर के एक सर्वशक्तिमान अधिकारी का विचार अंग्रेज़ी राज की देन है। आम तौर पर माना जाता है कि 1772 में वॉरेन हेस्टिंग्स के समय बंगाल में कंपनी ने राजस्व वसूली अपने हाथ में ली और पुराने नायब दीवानों की जगह हर ज़िले में अंग्रेज़ 'कलेक्टर' बैठाए, जो बोर्ड ऑफ़ रेवेन्यू (कलकत्ता) के प्रति जवाबदेह थे। नाम इसी से पड़ा — वह ज़िले का राजस्व एकत्र करने वाला मुखिया था।
आगे का क्रम क़दम-दर-क़दम समझिए। 1786 में ज़िलों को नियमित राजकोषीय इकाइयों में ढालकर राजस्व निर्धारण और वसूली का पूरा ज़िम्मा कलेक्टर को दिया गया। 1787 में (कुछ ज़िलों को छोड़कर) उसे मजिस्ट्रेट की शक्तियाँ भी मिलीं, यानी एक ही अफ़सर के हाथ में कर-वसूली और फ़ौजदारी प्रशासन आ गया। 1793 की कॉर्नवालिस संहिता ने उससे दीवानी और राजस्व अदालतों की अध्यक्षता छीनकर ज़िला जजों को दे दी, फिर भी वह कंपनी का सबसे ताक़तवर ज़िला अधिकारी बना रहा — राजस्व, मजिस्ट्रेटी, पुलिस की निगरानी, जेल और महामारी-आपदा राहत सब उसी के पास थे।
19वीं सदी की शुरुआत में कई ज़िलों पर नज़र रखने के लिए संभागीय आयुक्त का पद (1829) जोड़ा गया। आज़ादी के बाद भी ढाँचा बना रहा, पर उसका मिज़ाज बदला: प्रधानमंत्री ने 2005 के ज़िला मजिस्ट्रेट सम्मेलन में कहा था कि राजस्व वसूली अब सबसे कम अहम काम है और कलेक्टर को सुशासन व विकास का 'परिवर्तन-दूत' बनना है (ARC की 15वीं रिपोर्ट में उद्धृत)।
कलेक्टर की तीन मुख्य भूमिकाएँ
1. राजस्व अधिकारी (Collector)। ज़िले की राजस्व व्यवस्था का मुखिया और सरकारी ज़मीन-जायदाद का संरक्षक। उसकी मदद के लिए अतिरिक्त कलेक्टर, उपखंड अधिकारी (SDO), तहसीलदार और नायब तहसीलदार की श्रृंखला है। भू-अभिलेखों का रखरखाव, ज़मीन की पैमाइश-बंदोबस्त, लगान-वसूली और भू-सुधारों का क्रियान्वयन यहीं आते हैं।
2. ज़िला मजिस्ट्रेट (DM)। क़ानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखने का प्राथमिक कार्यकारी अधिकारी। सभा-जुलूस पर रोक, निषेधाज्ञा, शस्त्र-विस्फोटक-सिनेमा जैसे अधिनियमों के लाइसेंस, हिरासत-आदेश और संकट में सेना-सशस्त्र बलों की तैनाती में मार्गदर्शन इसी भूमिका के हिस्से हैं। जनता आज भी उसे ज़िले में क़ानून-व्यवस्था का अंतिम ज़िम्मेदार मानती है।
3. विकास व समन्वय अधिकारी। 1960 के दशक तक कलेक्टर का काम भू-सुधार, राजस्व, क़ानून-व्यवस्था, खाद्य आपूर्ति और राहत तक सीमित था। 1980 के दशक में केंद्र प्रायोजित योजनाओं की बाढ़ आई और प्रायः उसे ही योजनाओं की समग्र निगरानी सौंपी गई। वह ज़िला निर्वाचन अधिकारी, ज़िला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) का अध्यक्ष और विभिन्न विभागों के बीच समन्वयक भी है।
ज़िला कलेक्टर : एक पद, कई भूमिकाएँ
ज़िला कलेक्टर / ज़िला मजिस्ट्रेट
राजस्व प्रशासन
- भू-अभिलेख अधिकारी (RLR Act धारा 20)
- राजस्व अधिकारियों का नियंत्रण
- सरकारी भूमि का संरक्षक
क़ानून-व्यवस्था (ज़िला मजिस्ट्रेट)
- BNSS धारा 163 के निषेधात्मक आदेश
- शांति बनाए रखने के बंधपत्र (धारा 126)
- आपात स्थिति में बल-तैनाती में मार्गदर्शन
विकास प्रशासन
- योजनाओं की निगरानी-समन्वय
- ज़िला स्तरीय समितियों की अध्यक्षता
- पंचायती राज के बाद सीमित/सहयोगी भूमिका
समन्वय व आपदा
- ज़िला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) का अध्यक्ष
- ज़िला निर्वाचन अधिकारी
- विभिन्न विभागों में तालमेल
कलेक्टर/DM की शक्तियाँ : चुनिंदा प्रावधान
| क़ानून व धारा | क्या व्यवस्था है (अपने शब्दों में) |
|---|---|
| राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956, धारा 20 | सरकार हर ज़िले में कलेक्टर नियुक्त करेगी; वही ज़िले का भू-अभिलेख अधिकारी भी होगा। |
| भू-राजस्व अधिनियम, धारा 24 (ii) | ज़िले के अतिरिक्त कलेक्टर, उपखंड अधिकारी, सहायक कलेक्टर, तहसीलदार व नायब तहसीलदार कलेक्टर के अधीनस्थ हैं; ख़ुद कलेक्टर संभागीय आयुक्त के अधीन। |
| भू-राजस्व अधिनियम, धारा 25 | कलेक्टर अपने ज़िले में इस अधिनियम, राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 और अन्य प्रचलित क़ानूनों से मिले अधिकार व कर्तव्य निभाता है। |
| भू-राजस्व अधिनियम, धारा 15-16 | संभाग, ज़िले, उपखंड और तहसील बनाना-मिटाना या सीमाएँ बदलना राज्य सरकार का अधिकार है, जो राजपत्र अधिसूचना से होता है। |
| BNSS 2023, धारा 14 | राज्य सरकार ज़िले में कार्यकारी मजिस्ट्रेट नियुक्त करती है, उनमें से एक ज़िला मजिस्ट्रेट होता है; अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट व उपखंड मजिस्ट्रेट भी बनते हैं। पुलिस आयुक्त को भी कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्तियाँ दी जा सकती हैं (14(6))। |
| BNSS, धारा 16-17 | DM कार्यकारी मजिस्ट्रेटों का क्षेत्राधिकार तय करता है; सभी कार्यकारी मजिस्ट्रेट उसके अधीन हैं और वह काम के बँटवारे के नियम/विशेष आदेश दे सकता है। |
| BNSS, धारा 126 | कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सूचना मिले कि कोई व्यक्ति शांति भंग या लोक-शांति में बाधा डाल सकता है, तो वह उससे कारण पूछ सकता है कि अधिकतम एक वर्ष के लिए शांति-बंधपत्र क्यों न लिया जाए। |
| BNSS, धारा 148 | कार्यकारी मजिस्ट्रेट, थानाधिकारी, या थानाधिकारी की अनुपस्थिति में उप-निरीक्षक से अन्यून रैंक का पुलिस अधिकारी, ग़ैरक़ानूनी जमाव या पाँच या अधिक व्यक्तियों के ऐसे जमाव को, जिससे शांति भंग होने की आशंका हो, तितर-बितर होने का आदेश दे सकता है। |
| BNSS, धारा 163 (पहले CrPC की धारा 144) | उपद्रव या आसन्न ख़तरे के तत्काल मामलों में DM/SDM या विशेष रूप से सशक्त कार्यकारी मजिस्ट्रेट लिखित आदेश से किसी काम से रोक सकता है; आपात स्थिति में एकतरफ़ा (ex parte) भी। आदेश सामान्यतः दो माह से अधिक नहीं चलता; ख़तरा बना रहे तो राज्य सरकार अधिसूचना से छह माह तक और बढ़ा सकती है। |
BNSS 1 जुलाई 2024 से लागू है, इसलिए उत्तर में धारा-संख्या BNSS की लिखें; ARC-2009 जैसे पुराने पाठ में CrPC की धाराएँ (106-124, 129-148) मिलेंगी।
पुलिस अधीक्षक (SP) और ज़िला परिषद के CEO से संबंध
SP से संबंध : द्वितीय ARC के अनुसार कई राज्यों के पुलिस अधिनियमों के संशोधन से वह खंड हटा दिया गया, जो ज़िला पुलिस को DM के 'सामान्य नियंत्रण और निर्देश' में रखता था; फिर भी जनता कलेक्टर को ही क़ानून-व्यवस्था का प्रभारी मानती है। BNSS की धारा 148 में भीड़ को हटाने का आदेश कार्यकारी मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारी, दोनों दे सकते हैं; और धारा 15 के तहत राज्य सरकार पुलिस अधीक्षक या उससे ऊपर के पुलिस अधिकारी को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट भी नियुक्त कर सकती है।
ज़िला परिषद के CEO से संबंध : ज़िला परिषद का CEO प्रशासनिक अधिकारी होता है, जिस पर ज़िला प्रमुख का प्रशासनिक पर्यवेक्षण और नियंत्रण रहता है (धारा 35(1)(ग))। राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 1994 के अनुसार यह पद IAS या RAS अधिकारी (या चयनित परियोजना निदेशक) के पास रहता है और सरकार उसे नियुक्त करती है। ARC के अनुसार पंचायती राज आने के बाद विकास के अधिकांश कार्य कलेक्टर के दायरे से बाहर हो गए, फिर भी राज्य सरकारें इस पद का उपयोग पंचायती संस्थाओं पर नियंत्रण के लिए करना सुविधाजनक मानती रही हैं; विभागीय तालमेल के लिए भी वे कलेक्टर की राय को महत्त्व देती हैं।
73वें-74वें संशोधन के बाद बदली भूमिका
संविधान के 73वें और 74वें संशोधन (1992; लागू 1993) ने पंचायतों और नगरपालिकाओं को सरकार का तीसरा स्तर बना दिया। ARC का आकलन साफ़ है: पंचायती राज आने के बाद विकास के अधिकांश कार्य कलेक्टर के दायरे से बाहर चले गए, हालाँकि राज्य सरकारें इस पद को स्थानीय निकायों पर नियंत्रण के औज़ार की तरह भी इस्तेमाल करती रहीं। अनुच्छेद 243ZD के तहत ज़िला योजना समिति बनी, जिसमें ग्रामीण और शहरी निकायों के प्रतिनिधि मिलकर ज़िले की योजना तैयार करते हैं।
इसका व्यावहारिक मतलब: (क) कलेक्टर विकास का 'कर्ता' कम और 'समन्वयक-सुविधादाता' अधिक हो गया; (ख) उसका मुख्य आधार अब भी नियामक काम हैं — राजस्व, क़ानून-व्यवस्था, आपदा, चुनाव, लाइसेंस।
आलोचनाएँ
1. काम का बोझ और अस्पष्टता : ARC ने पाया कि कलेक्टर दर्जनों ज़िला-स्तरीय समितियों का अध्यक्ष बना दिया जाता है (ARC ने एक अध्ययन के हवाले से बताया कि असम में एक उपायुक्त 43 ज़िला-स्तरीय समितियों का अध्यक्ष था); भूमिकाएँ स्पष्ट न होने से ज़िम्मेदारी बिखर जाती है।
2. अनुभव की कमी : कई राज्यों में IAS अधिकारी लगभग चार साल की सेवा पर ही DM बन जाते हैं, जबकि उन्हें अपने से कहीं वरिष्ठ विभागीय अधिकारियों का समन्वय करना होता है।
3. औपनिवेशिक विरासत और लोकतांत्रिक टकराव : ARC ने दर्ज किया कि स्थानीय सरकारों के समर्थक कलेक्टर-संस्था को लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनावश्यक मानते हैं, और यह भी कि राज्य सरकारें पंचायतों पर नियंत्रण के लिए इस संस्था का सहारा लेती हैं।
4. नागरिक-सेवा की कमज़ोर व्यवस्था : शिकायत निवारण, सतर्कता और सूचना-प्रबंधन के लिए कलेक्टर कार्यालय का संगठन काम की ज़रूरतों के अनुरूप नहीं माना गया।
सुधार : द्वितीय ARC (15वीं रिपोर्ट, अप्रैल 2009) की सिफ़ारिशें
आयोग का मूल निष्कर्ष यह है कि कलेक्टर का पद ख़त्म नहीं, बल्कि पुनर्परिभाषित किया जाए। मुख्य सुझाव: (1) कलेक्टर मूल कार्यों पर केंद्रित रहे — भू-राजस्व प्रशासन, क़ानून-व्यवस्था, आपदा प्रबंधन, सार्वजनिक वितरण व नागरिक आपूर्ति, आबकारी, चुनाव, परिवहन, जनगणना, प्रोटोकॉल, सामान्य प्रशासन, कोषागार और विभागीय समन्वय; (2) भू-स्वामित्व (Land Title) प्रबंधन प्रणाली का दायित्व उसे मिले; (3) कलेक्टर कार्यालय में RTI प्रकोष्ठ, शिकायत व जन-प्रतिक्रिया प्रकोष्ठ, सतर्कता प्रकोष्ठ और MIS/ई-गवर्नेंस इकाई बने; (4) IAS अधिकारी शुरुआती करियर में DM बन सकते हैं, पर जटिल और समस्याग्रस्त ज़िलों में DM 10-12 वर्ष की सेवा के बाद ही लगाया जाए।
बड़ा ढाँचागत सुझाव: हर ज़िले में चुनी हुई ज़िला परिषद (ग्रामीण+शहरी प्रतिनिधि) बने और कलेक्टर उसका 'मुख्य अधिकारी' रहे — स्थानीय मामलों में ज़िला सरकार के प्रति और नियामक मामलों में राज्य सरकार के प्रति जवाबदेह। आयोग यह भी कहता है कि इन मूल कार्यों से कलेक्टर की ज़िम्मेदारी न घटाई जाए, न भटकाई जाए। ध्यान दें: यह सुझाव रिपोर्ट में है; लागू करना राज्यों पर निर्भर है, इसलिए उत्तर में 'सिफ़ारिश' लिखें, 'लागू व्यवस्था' नहीं।
मुख्य तथ्य
- कलेक्टर पद की शुरुआत
- 1772, वॉरेन हेस्टिंग्स (बंगाल)
- ज़िला-आधार पर राजस्व का ज़िम्मा कलेक्टर को
- 1786
- कलेक्टर को मजिस्ट्रेटी शक्तियाँ
- 1787
- न्यायिक कार्य छिने (कॉर्नवालिस संहिता)
- 1793
- BNSS लागू
- 1 जुलाई 2024; DM — धारा 14, निषेधाज्ञा — धारा 163
- राजस्थान में कलेक्टर की नियुक्ति
- भू-राजस्व अधिनियम 1956, धारा 20 (वही भू-अभिलेख अधिकारी)
- द्वितीय ARC की ज़िला प्रशासन रिपोर्ट
- 15वीं रिपोर्ट, अप्रैल 2009
- DM की वरिष्ठता पर ARC सुझाव
- जटिल ज़िलों में 10-12 वर्ष की सेवा के बाद
- ज़िला योजना समिति
- अनुच्छेद 243ZD
राजस्थान का पहलू
राजस्व मंडल, राजस्थान की आधिकारिक सूची (29-01-2025 की स्थिति) के अनुसार राज्य में 7 संभाग और 41 ज़िले हैं; 28 दिसंबर 2024 की कैबिनेट बैठक में 9 ज़िले समाप्त करने के फ़ैसले के बाद यही संख्या बनी (स्रोत: आकाशवाणी की 28-12-2024 की ख़बर)। संख्या सरकार की अधिसूचना से बदल सकती है (भू-राजस्व अधिनियम 1956, धारा 16), इसलिए परीक्षा से पहले ताज़ा स्थिति जाँच लें। राजस्थान में कलेक्टर की नियुक्ति भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 20 से होती है और वह ज़िले का भू-अभिलेख अधिकारी भी है; ज़िला परिषद का CEO पंचायती राज अधिनियम 1994 की धारा 82 के अनुसार IAS/RAS अधिकारी होता है।
अभ्यास प्रश्न (हमारे अपने — PYQ नहीं)
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
ज़िला कलेक्टर को ज़िले की प्रशासनिक धुरी क्यों कहा जाता है? (लगभग 50 शब्द)
आदर्श उत्तर
कलेक्टर एक ही पद में तीन भूमिकाएँ निभाता है: राजस्व का मुखिया, ज़िला मजिस्ट्रेट के रूप में क़ानून-व्यवस्था का प्रभारी, और विकास-योजनाओं का समन्वयक। आपदा, चुनाव और विभागों के तालमेल का केंद्र भी वही है। इसी कारण जनता और सरकार, दोनों सबसे पहले उसी की ओर देखती हैं।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
BNSS की धारा 163 क्या है और इसके अंतर्गत कलेक्टर की शक्ति की सीमाएँ क्या हैं? (लगभग 50 शब्द)
आदर्श उत्तर
BNSS धारा 163 (पहले CrPC 144) उपद्रव या आसन्न ख़तरे के तत्काल मामलों में DM, SDM या विशेष सशक्त कार्यकारी मजिस्ट्रेट को लिखित निषेधात्मक आदेश देने देती है। आदेश सामान्यतः दो माह तक चलता है; राज्य सरकार अधिसूचना से छह माह और बढ़ा सकती है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 150 शब्द
73वें-74वें संशोधन के बाद ज़िला कलेक्टर की बदलती भूमिका की समीक्षा कीजिए और द्वितीय ARC के सुझावों की चर्चा कीजिए। (लगभग 150 शब्द)
आदर्श उत्तर
संशोधनों से पंचायतें और नगर निकाय सरकार का तीसरा स्तर बने और ज़िले के विकास कार्यों का बड़ा हिस्सा कलेक्टर के दायरे से निकलकर निर्वाचित संस्थाओं के पास गया। ज़िला योजना समिति (अनुच्छेद 243ZD) ने योजना-निर्माण में भी स्थानीय प्रतिनिधियों को जगह दी। फलस्वरूप कलेक्टर विकास का कर्ता कम और समन्वयक अधिक हुआ, जबकि राजस्व, क़ानून-व्यवस्था, आपदा और चुनाव जैसे नियामक कार्य उसकी असली पहचान बने रहे।
फिर भी समस्याएँ रहीं: दर्जनों समितियों के कारण ज़िम्मेदारी का बिखराव, कम अनुभव पर DM की तैनाती, और पंचायतों पर राज्य-नियंत्रण का औज़ार बनने का आरोप।
द्वितीय ARC (15वीं रिपोर्ट, 2009) ने कलेक्टर को मूल कार्यों तक केंद्रित करने, RTI-शिकायत-सतर्कता प्रकोष्ठ और MIS बनाने, जटिल ज़िलों में 10-12 वर्ष की सेवा वाले अधिकारी को DM बनाने तथा निर्वाचित ज़िला परिषद में कलेक्टर को मुख्य अधिकारी बनाने का सुझाव दिया। ये सिफ़ारिशें हैं, अनिवार्य क़ानून नहीं।
उत्तर कैसे लिखें
भूमिका
एक पंक्ति में पद की परिभाषा और प्रश्न की माँग (भूमिका / आलोचना / सुधार) लिखें; ज़रूरत हो तो 1772 का संदर्भ दें।
मुख्य भाग
- पृष्ठभूमि : 1772 (हेस्टिंग्स) से 1787 और 1793 का क्रम, संक्षेप में।
- तीन भूमिकाएँ : राजस्व (भू-राजस्व अधिनियम 1956), क़ानून-व्यवस्था (BNSS धारा 14, 126, 148, 163), विकास-समन्वय।
- संबंध : SP के साथ साझेदारी; ज़िला परिषद CEO व पंचायती राज के साथ बदला संतुलन।
- आलोचना : काम का बोझ/समिति-बिखराव, अनुभव की कमी, औपनिवेशिक छवि बनाम स्थानीय स्वशासन।
- सुधार : द्वितीय ARC की सिफ़ारिशें (मूल कार्य, प्रकोष्ठ, 10-12 वर्ष, ज़िला परिषद में मुख्य अधिकारी)।
निष्कर्ष
कलेक्टर का पद अप्रासंगिक नहीं, पर उसे नियामक-समन्वयक और स्थानीय सरकार के सहयोगी के रूप में पुनर्परिभाषित करना समय की माँग है।
अतिरिक्त मूल्य
- BNSS (1 जुलाई 2024 से लागू) की धारा संख्याएँ लिखें।
- राजस्थान का उदाहरण देते समय भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 20 और संख्याओं के साथ तारीख़ (29-01-2025) जोड़ें।
एक पन्ने में दोहराव
- कलेक्टर का पद : 1772 हेस्टिंग्स; 1786 राजस्व ज़िम्मा; 1787 मजिस्ट्रेटी; 1793 न्यायिक कार्य अलग।
- तीन भूमिकाएँ : राजस्व + DM (क़ानून-व्यवस्था) + विकास/समन्वय।
- राजस्थान : भू-राजस्व अधिनियम 1956, धारा 20 — कलेक्टर ही भू-अभिलेख अधिकारी; धारा 24-25 अधीनस्थ व शक्तियाँ।
- BNSS : धारा 14 (DM), 16-17 (अधीनता), 126 (शांति-बंधपत्र), 148 (भीड़ हटाना), 163 (निषेधाज्ञा, 2 माह + 6 माह)।
- SP : साझेदारी; पुलिस अधिनियमों से 'DM का सामान्य नियंत्रण' खंड हटा (ARC)।
- ज़िला परिषद CEO : IAS/RAS, सरकार द्वारा नियुक्त (राज. पंचायती राज अधिनियम 1994, धारा 82)।
- 73वें/74वें संशोधन के बाद विकास कार्य पंचायतों को; ज़िला योजना समिति अनुच्छेद 243ZD।
- आलोचना : बोझ, अनुभवहीनता, औपनिवेशिक छवि, पंचायतों पर नियंत्रण।
- ARC 15वीं रिपोर्ट (अप्रैल 2009) : मूल कार्य, प्रकोष्ठ, 10-12 वर्ष, ज़िला परिषद में मुख्य अधिकारी।
- राजस्थान : 7 संभाग, 41 ज़िले (29-01-2025 की आधिकारिक सूची)।
याद रखने योग्य शब्द
- 1772
- हेस्टिंग्स
- कॉर्नवालिस 1793
- धारा 20 भू-राजस्व अधिनियम
- BNSS धारा 163
- ज़िला मजिस्ट्रेट
- ARC 15वीं रिपोर्ट
- अनुच्छेद 243ZD
- ज़िला परिषद CEO