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पेपर III · इकाई II

व्यवहारवादी उपागम (Behavioural Approach)

व्यवहारवादी उपागम में साइमन का योगदान: शास्त्रीय सिद्धांतों की आलोचना, प्रशासनिक मानव, सीमित बुद्धिमत्ता, संतोषजनक निर्णय, एक असली केस और कार्य-उदाहरण, आलोचना सहित।

  • साइमन
  • सीमित बुद्धिमत्ता
  • संतोषजनक निर्णय
  • प्रशासनिक मानव
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II: "Public Administration: Theories and Principles. ... Theories and approaches: Scientific Management, Human Relations, Behavioural, Structural-Functional, Ecological. Principles of organisation: hierarchy, unity of command, span of control, delegation, centralisation and decentralisation, coordination, authority and responsibility, accountability. Administrative behaviour: leadership, communication, morale." इस पृष्ठ पर व्यवहारवादी उपागम (Behavioural Approach) है, जिसमें लोक प्रशासन के संदर्भ में हर्बर्ट साइमन केंद्र में हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में "व्यवहारवादी उपागम" पर सीधा प्रश्न नहीं मिला। फिर भी पास का एक प्रश्न 2024 में आया: "वैधता: वेबर बनाम बार्नार्ड" (10 अंक), जो सिलेबस में नामित नहीं है। इस पृष्ठ की बार्नार्ड-पृष्ठभूमि (साइमन के वर्णन के अनुसार) उसमें थोड़ी काम आ सकती है।
  • 2024 में "शास्त्रीय सिद्धांत कहावतें और मिथक हैं" (10 अंक) भी आया, जिसकी जड़ साइमन के 1946 के लेख में है। इसलिए साइमन की आलोचना और उसके बाद का निर्णय-निर्माण वाला दृष्टिकोण दोनों साथ पढ़ें।
  • उत्तर में अंक दिलाने वाली चीज़ें: साइमन का परिचय, "कहावतों" वाली आलोचना, प्रशासनिक मानव और सीमित बुद्धिमत्ता, संतोषजनक निर्णय का एक उदाहरण, और आलोचना।

पहले सरल भाषा में: किराये का मकान और दफ़्तर का भवन

आप किसी नए शहर में किराये का मकान ढूँढ रहे हैं। किताबी तरीक़ा कहता है कि शहर के सारे 40 मकान देखो, सबकी तुलना करो और सबसे बढ़िया चुनो। असल में आप क्या करते हैं? पहले अपने मन में एक सीमा तय करते हैं: दो कमरे, बजट इतना, दफ़्तर के पास। मकान देखते जाते हैं, और जैसे ही तीसरा मकान इन शर्तों पर खरा उतरता है, आप उसे ले लेते हैं। चालीसों मकान देखने का न समय है, न जानकारी। यही हाल प्रशासक का है: वह न सारे विकल्प जानता है, न सबके नतीजे गिन सकता है, इसलिए वह "पर्याप्त अच्छा" विकल्प चुनता है। यह व्यवहारवादी दृष्टिकोण की जड़ है। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया उदाहरण है।)

परीक्षा के लिए सटीक रूप। व्यवहारवादी उपागम (Behavioural Approach) संगठन में मनुष्य के वास्तविक व्यवहार का अध्ययन करता है, कि लोग कैसे निर्णय लेते हैं, आदेश कैसे स्वीकार करते हैं और समूह में कैसे बर्ताव करते हैं, और इसके लिए मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और मानवशास्त्र जैसे व्यवहार-विज्ञानों की मदद लेता है। NCERT इसे "व्यवहारवादी विज्ञान उपागम, संगठनात्मक मानववाद" कहती है, जिसमें आर्गिरिस, मैकग्रेगर, मैस्लो और हर्ज़बर्ग जैसे विद्वान गिने गए हैं। लोक प्रशासन में इसके केंद्र में हर्बर्ट साइमन (Herbert A. Simon) और उनकी पुस्तक Administrative Behavior (1947) हैं। साइमन के अनुसार निर्णय-निर्माण प्रशासन का हृदय है और प्रशासन-सिद्धांत की शब्दावली मानवीय चुनाव के तर्क और मनोविज्ञान से निकलनी चाहिए।

यहाँ तक कैसे पहुँचे

NCERT विचारधाराओं को क्रम से रखती है। पहले शास्त्रीय दौर आया: तर्कसंगत आर्थिक दृष्टिकोण, टेलर का वैज्ञानिक प्रबंध, फ़ेयोल की प्रशासनिक सिद्धांत-परंपरा और वेबर की नौकरशाही। फिर 1920 से 1950 के दशकों में नव-शास्त्रीय या मानव संबंध उपागम आया, जिसने कहा कि कर्मचारी केवल नियमों और आर्थिक प्रोत्साहनों से नहीं, सामाजिक आवश्यकताओं से भी चलते हैं। उसके बाद व्यवहारवादी विज्ञान उपागम आया, जिसका बुनियादी विचार NCERT के अनुसार यह है कि व्यक्ति को अपनी सारी क्षमताओं और रचनात्मक कौशल का उपयोग काम पर भी और घर पर भी करना चाहिए।

सरल क्रम: पहले (टेलर) काम की विधि को वैज्ञानिक बनाया गया, फिर (मेयो) कर्मचारी की सामाजिक आवश्यकताओं पर ध्यान गया, और फिर (साइमन और अन्य) यह समझने की कोशिश हुई कि निर्णय और आचरण असल में कैसे बनते हैं, और इसके लिए व्यवहार-विज्ञानों की पद्धतियाँ ली गईं। मानव संबंध का पृष्ठ और वैज्ञानिक प्रबंध का पृष्ठ इसी शृंखला की पिछली कड़ियाँ हैं।

साइमन की आलोचना: "प्रशासन की कहावतें" (1946)

साइमन का पहला प्रसिद्ध योगदान शास्त्रीय "सिद्धांतों" की आलोचना है। 1946 के अपने लेख "The Proverbs of Administration" (Public Administration Review, खंड 6, अंक 1) में उन्होंने कहा कि कहावतें अक्सर परस्पर-विरोधी जोड़ों में आती हैं, जैसे "सोच-विचारकर कूदो" और "जो हिचकिचाया वह हारा"। बहस जीतने के लिए यह सुविधा है, पर वैज्ञानिक सिद्धांत की बुनियाद के रूप में यह दोष है। उनके अनुसार प्रशासन के अधिकांश "सिद्धांत" कहावतों जैसे हैं: हर सिद्धांत के विरुद्ध उतना ही विश्वसनीय दूसरा सिद्धांत मिल जाता है, और सिद्धांत यह नहीं बताता कि दोनों में कौन-सा लगाएँ।

उन्होंने चार प्रचलित सिद्धांत गिनाए: कार्य का विशेषज्ञता से विभाजन, पदानुक्रम (और आदेश की एकता), नियंत्रण-क्षेत्र की सीमा, और कर्मियों को उद्देश्य, प्रक्रिया, ग्राहक-वर्ग या स्थान के अनुसार समूहित करना। फिर दिखाया कि हर एक में अस्पष्टता है। उदाहरण: नर्सिंग की योजना में नर्सों को ज़िले के अनुसार बाँटा जाए या कार्य (स्कूल-जाँच, घर-भ्रमण, तपेदिक-सेवा) के अनुसार? दोनों विशेषज्ञता के सिद्धांत को पूरा करते हैं, पर सिद्धांत यह नहीं बताता कि चुनें कौन-सा। इन सिद्धांतों का विस्तृत विश्लेषण नियंत्रण-क्षेत्र और आदेश की एकता वाले पृष्ठों में है।

प्रशासनिक मानव, सीमित बुद्धिमत्ता

साइमन के विचारों का केंद्र प्रशासक की बुद्धिमत्ता की सीमाएँ हैं। नोबेल व्याख्यान में उन्होंने शास्त्रीय तर्कसंगत-चुनाव के मॉडल की चार माँगें गिनाईं: सारे विकल्पों का ज्ञान; हर विकल्प के परिणामों का पूरा ज्ञान या उन्हें गिनने की क्षमता; वर्तमान और भविष्य में इन परिणामों के मूल्यांकन की निश्चितता; और अलग-अलग तरह के परिणामों की तुलना किसी एक समान उपयोगिता-माप पर कर पाने की क्षमता। वास्तविक प्रशासक इनमें से किसी को पूरा नहीं कर सकता।

इसीलिए साइमन ने "आर्थिक मानव" (economic man) की जगह "प्रशासनिक मानव" (administrative man) की बात की। उनके अनुसार Administrative Behavior में सीमित बुद्धिमत्ता (bounded rationality) को मोटे तौर पर शेष-श्रेणी की तरह परिभाषित किया गया: बुद्धिमत्ता तब सीमित होती है जब वह सर्वज्ञता से कम पड़े, और सर्वज्ञता की विफलताएँ मुख्यतः तीन हैं: सारे विकल्प न जान पाना, बाहरी घटनाओं की अनिश्चितता, और परिणामों की गणना न कर पाना। नोबेल पुरस्कार की प्रेस विज्ञप्ति भी इसी बात को दोहराती है कि निर्णयकर्ता का तर्क अधूरे ज्ञान और व्यक्तिगत तथा सामाजिक संबंधों से सीमित है।

1946 के लेख में साइमन मनुष्य की सीमाओं के तीन पक्ष बताते हैं। पहला, कौशल, आदत और प्रतिक्रिया की सीमा, जो शरीर-क्रिया और प्रशिक्षण के नियमों से जुड़ी है। दूसरा, मूल्यों और उद्देश्य-बोध की सीमा: किसी की निष्ठा संगठन से जुड़ी है या अपने कार्यालय से, इससे उसके निर्णय बदलते हैं। तीसरा, ज्ञान की सीमा: निर्णय के लिए ज़रूरी बुनियादी ज्ञान और जानकारी कितनी है। वे इसे "तर्कसंगतता की सीमाओं का त्रिकोण" कहते हैं और मानते हैं कि हो सकता है यह पूरी तस्वीर न हो।

आर्थिक मानव बनाम प्रशासनिक मानव

आर्थिक मानव (शास्त्रीय मॉडल)

विकल्पों का ज्ञानसभी विकल्प जानता है

परिणामों का ज्ञानहर विकल्प के परिणाम गिन लेता है

लक्ष्यअधिकतम (optimise) करता है

मूल्यांकनसभी परिणामों की तुलना एक उपयोगिता-माप पर

निर्णय रुकता कब हैजब सर्वोत्तम मिल जाए

प्रशासनिक मानव (साइमन)

विकल्पों का ज्ञानविकल्प खोजने पड़ते हैं; सब नहीं जान सकता

परिणामों का ज्ञानपरिणाम अधूरे जानता है; गणना-क्षमता सीमित

लक्ष्यसंतोषजनक (satisfice) स्तर खोजता है

मूल्यांकनविषम परिणामों की कोई एक सुसंगत उपयोगिता-माप नहीं

निर्णय रुकता कब हैजब आकांक्षा-स्तर को छूने वाला विकल्प मिल जाए

संतोषजनक निर्णय (Satisficing)

सीमित बुद्धिमत्ता के बाद सवाल था कि फिर चुनाव होता कैसे है? साइमन के अनुसार दो अवधारणाएँ यहाँ केंद्रीय हैं: खोज (search) और संतोषजनकता (satisficing)। अगर विकल्प पहले से सामने नहीं हैं तो उन्हें खोजना पड़ेगा। फिर, निर्णयकर्ता मन में एक आकांक्षा-स्तर (aspiration level) बनाता है कि कितना अच्छा विकल्प चाहिए। जैसे ही उसे ऐसा विकल्प मिलता है जो इस स्तर को छू ले, वह खोज रोक देता है और उसे चुन लेता है। इस चुनाव के ढंग को साइमन ने "संतोषजनक चुनाव" (satisficing) कहा।

यह आकांक्षा-स्तर स्थिर नहीं है। साइमन के अनुसार अनुकूल परिस्थिति में, जहाँ बहुत सारे अच्छे विकल्प मिलते हैं, आकांक्षाएँ बढ़ती हैं; कठिन परिस्थिति में वे घटती हैं। नोबेल की प्रेस विज्ञप्ति के शब्दों में, जब निर्णयकर्ता सर्वोत्तम नहीं चुन सकते तो उन्हें संतोषजनक विकल्प से संतुष्ट होना पड़ता है। साइमन का तर्क था कि यह तरीक़ा उचित मात्रा की गणना और बहुत अधूरी जानकारी के साथ चुनाव संभव बनाता है, यानी वह असंभव काम नहीं माँगता जो सर्वोत्तम खोजने के लिए चाहिए। नोबेल व्याख्यान के अनुसार खोज और संतोषजनकता के इस औपचारिक वर्णन की दिशा में 1955 और 1956 के दो शोध-पत्रों ने पहले क़दम उठाए।

उप-लक्ष्य पहचान और संगठन-संतुलन

साइमन ने एक और घटना पहचानी जिसे संगठन-सिद्धांत में उप-लक्ष्य पहचान (subgoal identification) कहते हैं। जब संगठन का बड़ा लक्ष्य सीधे कार्रवाई से जोड़ा नहीं जा सकता, तो निर्णयों को छोटे, मापने-योग्य उप-लक्ष्यों के आधार पर परखा जाता है। इन उप-लक्ष्यों का तय होना निर्णयकर्ता के ज्ञान, अनुभव, संगठनात्मक परिवेश और, उनके शब्दों में, उसके निजी हित और सत्ता की चाहत से भी प्रभावित होता है। यही कारण है कि एक ही संगठन में अलग-अलग विभाग एक ही समस्या को अलग-अलग ढंग से देखते हैं।

संगठन-संतुलन (organisational equilibrium) साइमन की एक और अवधारणा है। उनके अनुसार संगठन तभी टिकता है जब उसके सदस्य, यानी कर्मचारी, निवेशक, ग्राहक और आपूर्तिकर्ता, उसमें बने रहने को तैयार हों; यह उस संतुलन पर टिका है जो संगठन की ओर से मिलने वाली प्रेरणाओं (inducements) और सदस्यों के योगदान (contributions) के बीच बनता है। साइमन इसका श्रेय बार्नार्ड के काम को भी देते हैं; यह बिंदु नीचे "पृष्ठभूमि" में अलग से है।

पृष्ठभूमि (सिलेबस में नामित नहीं): चेस्टर बार्नार्ड

साइमन के अपने वर्णन के अनुसार चेस्टर बार्नार्ड (Chester I. Barnard) एक कार्यकारी (executive) थे, जिनकी पुस्तक The Functions of the Executive (1938) निर्णय-निर्माण पर थी। साइमन के अनुसार बार्नार्ड ने संगठन में प्राधिकार-तंत्र और कर्मचारियों द्वारा संगठनात्मक लक्ष्यों को स्वीकार करने के प्रेरक आधारों के मौलिक सिद्धांत दिए, और संगठन में निर्णय-निर्माण को "अवसरवादी" (opportunistic) बताया। साइमन ने Administrative Behavior में बार्नार्ड का बार-बार उल्लेख किया है। यह जानकारी केवल साइमन के नोबेल व्याख्यान से है, इसलिए इसे पृष्ठभूमि की तरह पढ़ें और बार्नार्ड पर अलग से प्रश्न आने पर स्वतंत्र स्रोत से तैयारी करें।

प्राधिकार को स्वीकार करना (साइमन का दृष्टिकोण)

1946 के लेख में साइमन प्राधिकार (authority) को इस तरह परिभाषित करते हैं कि अधीनस्थ तब प्राधिकार को स्वीकार करता है जब वह किसी और के लिए गए निर्णय को अपने व्यवहार का मार्गदर्शक बनने देता है, चाहे उसका अपना मत उस निर्णय के गुण-दोष पर कुछ भी हो। इसी आधार पर वे आदेश की एकता जैसे सिद्धांत की परीक्षा करते हैं और बताते हैं कि एक अर्थ में यह सिद्धांत "भंग हो ही नहीं सकता", क्योंकि कोई व्यक्ति दो परस्पर-विरोधी आदेशों का पालन शारीरिक रूप से कर ही नहीं सकता। इसलिए "सिद्धांत" को कुछ और ठोस कहना होगा, जो वह कहावत की तरह नहीं कहता।

यह दृष्टिकोण दिखाता है कि प्रशासन में आदेश का पालन केवल पद से अपने आप नहीं होता, वह अधीनस्थ की स्वीकृति से भी बनता है। यह बिंदु बार्नार्ड की अवधारणाओं के क़रीब पड़ता है (विश्लेषण), पर स्रोत में साइमन ने यही परिभाषा दी है, इसलिए परीक्षा में इसे "साइमन के अनुसार" लिखना सुरक्षित है।

आलोचना: क्या सीमाएँ हैं

सबसे पहले साइमन की अपनी आत्म-आलोचना। नोबेल व्याख्यान में वे मानते हैं कि Administrative Behavior में सीमित बुद्धिमत्ता को शेष-श्रेणी के रूप में परिभाषित किया गया था और उसके लिए अधिक सकारात्मक और औपचारिक वर्णन की ज़रूरत थी; वही बाद के लेखों में हुआ। वे यह भी लिखते हैं कि संगठन में निर्णय-निर्माण के अध्ययन महँगे, समय-साध्य हैं, उनकी पद्धति अभी प्रारंभिक है और निर्णय-व्यवहार तक पहुँच पाना कठिन है। यानी यह क्षेत्र उस समय तक कम खोजा गया था।

आगे की आलोचनाएँ विश्लेषण हैं, स्रोत-आधारित तथ्य नहीं। एक, यह उपागम बताता है कि निर्णय कैसे होते हैं (वर्णनात्मक), पर यह नहीं बताता कि कैसे होने चाहिए; लोक सेवा में नैतिकता, जवाबदेही और संवैधानिक मूल्य अलग से चाहिए। दो, "संतोषजनक" की सीमा कौन तय करे, यह स्पष्ट न हो तो वह औसत प्रदर्शन का बहाना भी बन सकता है। तीन, आकांक्षा-स्तर बदलता रहता है, इसलिए इसका सटीक पूर्वानुमान कठिन है। चार, व्यक्तियों के व्यवहार पर ज़ोर संरचना, राजनीतिक दबाव और संसाधनों की कमी जैसी बातों को पीछे कर सकता है।

तीन उपागम एक नज़र में

आधारवैज्ञानिक प्रबंधमानव संबंधव्यवहारवादी (साइमन)
केंद्रकाम की विधि और दक्षतासामाजिक आवश्यकताएँ, अनौपचारिक समूहनिर्णय और व्यवहार की प्रक्रिया
मनुष्य की छविआर्थिक प्राणीसामाजिक प्राणीसीमित बुद्धिमत्ता वाला 'प्रशासनिक मानव'
मुख्य नामटेलरमेयो, रॉथ्लिसबर्गरसाइमन (और NCERT के अनुसार आर्गिरिस, मैकग्रेगर आदि)
मुख्य शब्दएक सर्वोत्तम तरीक़ाअनौपचारिक संगठनसंतोषजनक निर्णय
मुख्य सीमामानवीय पक्ष की उपेक्षाआर्थिक और संरचनात्मक पक्ष की उपेक्षावर्णनात्मक; मानकीय पक्ष कम

टेलर और मानव संबंध की पंक्तियाँ इस साइट के संबंधित पृष्ठों से; व्यवहारवादी स्तंभ साइमन के स्रोतों और NCERT से। अंतिम पंक्ति का आधार विश्लेषण है।

लोक प्रशासन में उपयोग (विश्लेषण)

विश्लेषण (स्रोत-आधारित तथ्य नहीं): सरकार में निर्णय अक्सर फ़ाइल पर नोटिंग, समिति-बैठक और अनुभवी अधिकारियों की सलाह से बनते हैं; ये साइमन के "खोज" वाले चरण जैसे हैं। नीति-निर्माता सभी विकल्पों का सटीक मूल्यांकन करके नहीं, बल्कि "मान्य" सीमा के भीतर पहला स्वीकार्य विकल्प चुनते दिखते हैं। इसीलिए निर्णय-प्रक्रिया की गुणवत्ता सुधारने के लिए विकल्पों की खोज को चौड़ा करना, सूचना की गुणवत्ता सुधारना और प्रशिक्षण देना काम आता है। यह विषय प्रबंध-खंड के निर्णय-निर्माण (प्रक्रिया, तकनीक और मॉडल) से जुड़ता है।

साइमन के अनुसार निर्णय की राह

  1. समस्या सामने आई

    संगठन में निर्णय की ज़रूरत

  2. आकांक्षा-स्तर बनाया

    कितना अच्छा विकल्प चाहिए

  3. विकल्पों की खोज

    सब विकल्प पहले से ज्ञात नहीं; सीमित जानकारी

  4. आकांक्षा से तुलना

    क्या यह विकल्प स्तर को छूता है?

  5. पहला संतोषजनक विकल्प चुना

    खोज रुकी

  6. न मिले तो आकांक्षा घटाई

    कठिन परिस्थिति में स्तर नीचे; अनुकूल में ऊपर

क्रम साइमन के नोबेल व्याख्यान में दिए गए search और satisficing विवरण का सार है।

एक नज़र में: व्यवहारवादी उपागम

व्यवहारवादी उपागम

साइमन

  • Proverbs of Administration (1946)
  • Administrative Behavior (1947)
  • नोबेल 1978

मुख्य अवधारणाएँ

  • प्रशासनिक मानव
  • सीमित बुद्धिमत्ता
  • संतोषजनक निर्णय
  • उप-लक्ष्य पहचान
  • संगठन-संतुलन

तर्कसंगतता की सीमाएँ (1946)

  • कौशल, आदत
  • मूल्य, निष्ठा
  • ज्ञान

पृष्ठभूमि (चिह्नित)

  • बार्नार्ड 1938
  • NCERT के नाम: आर्गिरिस, मैकग्रेगर, मैस्लो, हर्ज़बर्ग

आलोचना

  • शेष-श्रेणी वाली परिभाषा
  • प्रारंभिक पद्धति
  • वर्णनात्मक, मानकीय नहीं (विश्लेषण)

समय-रेखा: साइमन और व्यवहारवादी दृष्टि

  1. 1934-35

    मिल्वॉकी मनोरंजन-सुविधाओं का क्षेत्र-अध्ययन

  2. 1938

    बार्नार्ड की The Functions of the Executive (पृष्ठभूमि)

  3. 1946

    The Proverbs of Administration, Public Administration Review

  4. 1947

    Administrative Behavior

  5. 1955-56

    सीमित बुद्धिमत्ता, खोज और संतोषजनक चुनाव के औपचारिक वर्णन के पहले दो शोध-पत्र (नोबेल व्याख्यान के अनुसार)

  6. 8 दिसंबर 1978

    साइमन का नोबेल व्याख्यान; अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार

1934-35 और 1938 की तिथियाँ नोबेल व्याख्यान में ही मिलीं।

मुख्य तथ्य

साइमन का नोबेल पुरस्कार
अर्थशास्त्र, 1978; व्याख्यान 8 दिसंबर 1978
Administrative Behavior
1947
The Proverbs of Administration
Public Administration Review, खंड 6, अंक 1, 1946
सीमित बुद्धिमत्ता की परिभाषा (Simon)
तर्कसंगतता सीमित जब सर्वज्ञता से कम पड़े; सीमाएँ: विकल्पों का अज्ञान, अनिश्चितता, परिणाम न गिन पाना
संतोषजनक निर्णय
आकांक्षा-स्तर और खोज; पहला संतोषजनक विकल्प चुनकर खोज रोकना
तर्कसंगतता की सीमाओं के तीन पक्ष (1946)
कौशल और आदत; मूल्य और निष्ठा; ज्ञान
व्यवहारवादी विज्ञान उपागम (NCERT)
आर्गिरिस, मैकग्रेगर, मैस्लो, हर्ज़बर्ग
अंतिम जाँच
1 अक्टूबर 2026

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • संतोषजनक निर्णय को "लापरवाही" या "औसत से काम चलाना" लिखना: साइमन का तर्क है कि यह सीमित ज्ञान और गणना-क्षमता के भीतर तर्कसंगत तरीक़ा है, न कि आलस्य।
  • सीमित बुद्धिमत्ता को "अतार्किक" बताना: साइमन के अनुसार यह तर्कसंगतता की सीमाएँ दिखाती है, तर्कहीनता नहीं।
  • साइमन को शास्त्रीय सिद्धांतों का समर्थक बताना: 1946 में वे उन्हें कहावतों जैसा कहकर उनकी आलोचना करते हैं।
  • पुस्तक और लेख की तिथियाँ मिलाना: लेख "Proverbs of Administration" 1946, पुस्तक Administrative Behavior 1947, नोबेल 1978।
  • बार्नार्ड या आर्गिरिस-मैकग्रेगर का विवरण इस पृष्ठ के आधार पर लिख देना: इस पृष्ठ में उनका केवल पृष्ठभूमि-स्तर पर नाम और संदर्भ है, उसे अपनी अलग तैयारी से भरें।
  • व्यवहारवादी उपागम को मानव संबंध उपागम का दूसरा नाम बताना: दोनों अलग पड़ाव हैं (हॉथॉर्न बनाम निर्णय-निर्माण और व्यवहार-विज्ञान)।

पिछले वर्षों के प्रश्न

संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में इस विषय पर सीधा प्रश्न नहीं मिला, इसलिए यहाँ "पिछले वर्षों के प्रश्न" की सूची नहीं है। नीचे के अभ्यास-प्रश्न हमारे अपने हैं और पीवाईक्यू की तरह नहीं पढ़े जाने चाहिए।