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पेपर III · इकाई II

प्रशासनिक सुधार: प्रथम और द्वितीय ARC, परिवर्तन प्रबंधन, राजस्थान

प्रथम और द्वितीय ARC ने क्या कहा, परिवर्तन प्रबंधन (change management) की मूल बातें, और राजस्थान के सत्यापित सुधार, उत्तर-लेखन की दृष्टि से।

  • प्रथम ARC
  • द्वितीय ARC
  • परिवर्तन प्रबंधन
  • राजस्थान के सुधार
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II: "Union Government and Administrative Institutions ... Issues: Union-State relations, Minister-civil servant relations, generalists-specialists, administrative reforms, social audit." इस पृष्ठ पर प्रशासनिक सुधार है; सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ (generalists-specialists) और सामाजिक अंकेक्षण के अलग पृष्ठ हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2023 में "परिवर्तन प्रबंधन की मुख्य विशेषताएँ" (5 अंक) पूछा गया, यानी विषय सिर्फ़ ARC तक सीमित नहीं; प्रबंधन की भाषा में भी तैयार रहें।
  • 2013 में राजस्थान के प्रशासनिक नवाचार और सुधारों पर 20 अंक (200 शब्द) का वैकल्पिक प्रश्न आया था। 2013-2024 के पेपरों में देखा गया रुझान यह है कि बाद के वर्षों में राजस्थान-केंद्रित प्रश्न छोटे अंकों में बँट गए (सुनवाई का अधिकार, सेवा-गारंटी), इसलिए राजस्थान के सुधारों की तारीख़ें और धाराएँ पक्की रखें।
  • ARC की सिफ़ारिशें इसी इकाई के दूसरे प्रश्नों में भी काम आती हैं: 2023 का 10 अंक का प्रश्न "सामान्यज्ञ बनाम विशेषज्ञ का टकराव; प्रथम ARC की सिफ़ारिशें" इसी पृष्ठ की जानकारी पर टिका है।

पहले सरल भाषा में: पुराने मकान की मरम्मत

सोचिए एक पुराना सरकारी दफ़्तर है। फ़ाइल हर मेज़ पर रुकती है, एक प्रमाणपत्र के लिए आम आदमी को कई चक्कर लगाने पड़ते हैं और किसी को पता नहीं कि देरी किसकी वजह से हुई। अब सरकार तीन काम करे: फ़ाइल की चाल घटाए, कर्मचारियों को नई पद्धति का प्रशिक्षण दे और नागरिक को समय-सीमा की गारंटी दे। यह दीवारें गिराकर नया शहर बसाना नहीं है, पुराने मकान की वायरिंग, पाइप और खिड़कियाँ बदलकर उसे रहने लायक़ बनाना है। इसी को प्रशासनिक सुधार (administrative reform) कहते हैं। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया उदाहरण है।)

परीक्षा के लिए कार्यकारी परिभाषा: प्रशासनिक सुधार सरकारी तंत्र की संरचना, कार्य-पद्धति, कार्मिक-व्यवस्था या व्यवहार में योजनाबद्ध परिवर्तन है, जिसका लक्ष्य प्रशासन को अधिक कुशल, जवाबदेह और संवेदनशील बनाना है। (विश्लेषण: यह उत्तर लिखने के लिए संक्षेप में गढ़ी गई परिभाषा है, किसी एक विद्वान की परिभाषा नहीं।) सुधार की ज़रूरत क्यों पड़ती है, इसका सरकारी उत्तर दसवीं रिपोर्ट में मिलता है: सूचना प्रौद्योगिकी में तेज़ बदलाव और पंचायतों-नगरपालिकाओं की संवैधानिक व्यवस्था जैसे संस्थागत बदलावों के बाद पूरे लोक प्रशासन की व्यापक समीक्षा आवश्यक हो गई थी, जो इससे पहले अंतिम बार प्रथम ARC (1966) ने की थी।

प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966-70)

दसवीं रिपोर्ट के अनुसार आज़ादी के बाद केंद्र सरकार के स्तर पर लगभग पचास आयोग और समितियाँ प्रशासनिक सुधारों पर विचार कर चुकी हैं। इनमें प्रथम ARC जनवरी 1966 में बना और उसे भारत सरकार की कार्य-प्रणाली, योजना-तंत्र, केंद्र-राज्य संबंध, वित्तीय प्रशासन, कार्मिक प्रशासन, आर्थिक प्रशासन, राज्य और ज़िला प्रशासन, कृषि प्रशासन तथा नागरिकों की शिकायतों के निवारण जैसे विषय सौंपे गए। आयोग ने मध्य-1970 में काम समेटने से पहले कुल 20 रिपोर्टें दीं, जिनमें 537 प्रमुख सिफ़ारिशें थीं; इनके क्रियान्वयन की स्थिति बताने वाली रिपोर्ट नवंबर 1977 में संसद में रखी गई।

सबसे पहली (अंतरिम) रिपोर्ट "नागरिकों की शिकायतों का निवारण" पर थी (20 अक्टूबर 1966)। परीक्षा में काम आने वाली रिपोर्टों की तारीख़ें नीचे की तालिका में हैं। कार्मिक प्रशासन पर रिपोर्ट के अध्यक्ष के. हनुमंतैया थे।

प्रथम ARC की चुनिंदा रिपोर्टें (तारीख़ के साथ)

रिपोर्टप्रस्तुति की तारीख़
नागरिकों की शिकायतों का निवारण (अंतरिम)20 अक्टूबर 1966
योजना-तंत्र (अंतरिम)29 अप्रैल 1967
सार्वजनिक उपक्रम17 अक्टूबर 1967
वित्त, लेखा और अंकेक्षण13 जनवरी 1968
भारत सरकार का तंत्र और कार्य-प्रक्रिया16 सितंबर 1968
कार्मिक प्रशासन18 अप्रैल 1969
वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों का प्रत्यायोजन12 जून 1969
केंद्र-राज्य संबंध19 जून 1969
राज्य प्रशासन4 नवंबर 1969

कुल 20 रिपोर्टों में से चुनी हुई।

प्रथम ARC की प्रमुख सिफ़ारिशें (कार्मिक और संबंधित क्षेत्र)

दसवीं रिपोर्ट ने प्रथम ARC की जो बातें अपने विषय के लिए प्रासंगिक मानीं, वे ये हैं। विशेषज्ञता की ज़रूरत: सरकार के कार्य विविध हो जाने से आयोग ने विशेषज्ञता की आवश्यकता मानी और वरिष्ठ प्रबंधन पदों के लिए कार्यात्मक (functional) और ग़ैर-कार्यात्मक क्षेत्रों में चयन की पद्धति तय की। एकीकृत वेतन-श्रेणी: योग्यता तथा कर्तव्यों की प्रकृति पर आधारित। भर्ती: श्रेणी-1 की सेवाओं के लिए एक संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा (आयु-सीमा 26 वर्ष तक बढ़ाने की सिफ़ारिश), वरिष्ठ तकनीकी पदों पर पार्श्विक प्रवेश (lateral entry), श्रेणी-2 की सीधी भर्ती बंद करना, लिपिक-वर्ग के लिए सरल वस्तुनिष्ठ परीक्षा, UPSC और राज्य लोक सेवा आयोगों के सदस्यों की नियुक्ति की नई प्रक्रिया।

प्रशिक्षण: राष्ट्रीय नीति तथा कार्मिक विभाग में केंद्रीय प्रशिक्षण प्रभाग। पदोन्नति: विस्तृत दिशानिर्देश। आचरण और अनुशासन: अनुशासनात्मक जाँच में सुधार और सिविल सेवा अधिकरण (tribunals) की स्थापना। इन्हीं के साथ प्रथम ARC ने कार्मिक प्रशासन पर विशेषज्ञता के आठ क्षेत्र सुझाए और उनके लिए मध्य-करियर प्रतियोगी परीक्षा की योजना दी (इसका विस्तार सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ वाले पृष्ठ पर है)। मंत्रिपरिषद के आकार पर पंद्रहवीं रिपोर्ट याद दिलाती है कि प्रथम ARC ने एकसदनीय राज्य में विधानसभा के 10% और द्विसदनीय में 11% की सीमा सुझाई थी।

द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2005-09)

द्वितीय ARC का गठन भारत सरकार के 31 अगस्त 2005 के संकल्प से हुआ। इसका काम "देश में सरकार के सभी स्तरों पर सक्रिय, संवेदनशील, जवाबदेह, टिकाऊ और कुशल प्रशासन" के लिए उपाय सुझाना और लोक प्रशासन प्रणाली को नए सिरे से गढ़ने का विस्तृत खाका बनाना था। अध्यक्ष वीरप्पा मोइली थे; सदस्य वी. रामचंद्रन, ए.पी. मुखर्जी, ए.एच. कालरो और जयप्रकाश नारायण; सदस्य-सचिव विनीता राय। संकल्प में 13 विषय गिनाए गए: भारत सरकार का संगठनात्मक ढाँचा, शासन में नैतिकता, कार्मिक प्रशासन का नवीनीकरण, वित्तीय प्रबंधन प्रणालियों को सुदृढ़ करना, राज्य स्तर का प्रभावी प्रशासन, ज़िला प्रशासन, स्थानीय स्वशासन/पंचायती राज संस्थाएँ, सामाजिक पूँजी, नागरिक-केंद्रित प्रशासन, ई-गवर्नेंस, संघीय राजनीति के मुद्दे, संकट प्रबंधन और लोक व्यवस्था।

प्रथम और द्वितीय ARC का मुख्य फ़र्क़ यह है कि प्रथम ने पूरे तंत्र की एक साथ व्यापक समीक्षा की, जबकि द्वितीय ने विषय-वार रिपोर्टें दीं। पंद्रहवीं रिपोर्ट के अंत की सूची के अनुसार फ़रवरी 2009 तक चौदह रिपोर्टें जमा हुई थीं और पंद्रहवीं रिपोर्ट अप्रैल 2009 की है।

द्वितीय ARC की 15 रिपोर्टें

क्रमरिपोर्ट का शीर्षकमोटा अर्थ
1Right to Information: Master Key to Good Governanceसूचना का अधिकार
2Unlocking Human Capital: Entitlements and Governance, A Case Studyमानव पूँजी और हक़दारियाँ
3Crisis Management: From Despair to Hopeसंकट प्रबंधन
4Ethics in Governanceशासन में नैतिकता
5Public Order: Justice for All, Peace for Allलोक व्यवस्था
6Local Governance: An Inspiring Journey into the Futureस्थानीय शासन
7Capacity Building for Conflict Resolution: Friction to Fusionसंघर्ष-समाधान की क्षमता
8Combatting Terrorism: Protecting by Righteousnessआतंकवाद का मुक़ाबला
9Social Capital: A Shared Destinyसामाजिक पूँजी
10Refurbishing of Personnel Administration: Scaling New Heights (नवंबर 2008)कार्मिक प्रशासन
11Promoting e-Governance: The SMART Way Forwardई-गवर्नेंस
12Citizen Centric Administration: The Heart of Governanceनागरिक-केंद्रित प्रशासन
13Organisational Structure of Government of Indiaभारत सरकार का ढाँचा
14Strengthening Financial Management Systemsवित्तीय प्रबंधन
15State and District Administration (अप्रैल 2009)राज्य और ज़िला प्रशासन

सूची रटने से अधिक काम की बात यह है कि कौन-सी रिपोर्ट किस प्रश्न में काम आएगी।

द्वितीय ARC की सत्यापित प्रमुख सिफ़ारिशें

कार्मिक प्रशासन (दसवीं रिपोर्ट): आयोग के निष्कर्ष के अनुसार भर्ती में उम्मीदवारों की आयु काफ़ी घटाई जाए ताकि कम उम्र से ही प्रशासक तैयार हों; हर स्तर पर प्रवेश-प्रशिक्षण अनिवार्य हो; वरिष्ठ पदों की तैनाती में प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता हो; अनुशासनात्मक प्रक्रिया युक्तिसंगत बने; और 20 वर्ष की सेवा पर फ़िटनेस-बार लगे। इन सब सुधारों को वैधानिक आधार देने के लिए नया सिविल सेवा क़ानून (Civil Services Law) बने और उसके अंतर्गत केंद्रीय सिविल सेवा प्राधिकरण (Central Civil Services Authority) बने। प्रवेश के स्तर पर आयोग ने राष्ट्रीय लोक प्रशासन संस्थान (National Institutes of Public Administration) बनाने, चुने हुए विश्वविद्यालयों में लोक प्रशासन के स्नातक पाठ्यक्रम चलाने और अन्य विषयों के स्नातकों के लिए "ब्रिज कोर्स" की सिफ़ारिश की।

कार्यक्षेत्र के आधार पर पदस्थापन के लिए आयोग ने सेवा के 13वें वर्ष के आसपास अधिकारी को एक "डोमेन" सौंपने और वरिष्ठ पदों पर प्रतिस्पर्धा से चयन की बात कही; अतिरिक्त सचिव (HAG) स्तर के चुने हुए पदों पर बाहर की प्रतिभा के पार्श्विक प्रवेश को संस्थागत करने की सिफ़ारिश भी इसी रिपोर्ट में है (विस्तार सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ वाले पृष्ठ पर)।

राज्य और ज़िला प्रशासन (पंद्रहवीं रिपोर्ट): आयोग ने कहा कि दसवीं रिपोर्ट के सिविल सेवा क़ानून और प्राधिकरण को राज्य भी अपनाएँ और अपने यहाँ वैसा क़ानून बनाएँ; मुख्य सचिव के चयन में एक तय वरिष्ठता (जैसे 30 वर्ष) से ऊपर के सभी अधिकारियों को पैनल में रखा जाए; सचिवों की भूमिका को पुनर्परिभाषित करके उन्हें ग़ैर-ज़रूरी कार्यकारी कार्यों से मुक्त किया जाए और विभागों/एजेंसियों को अधिक अधिकार सौंपे जाएँ; जो कार्य सरकार ही कर सकती है उन्हें छोड़कर बाक़ी कार्य अर्ध-स्वायत्त और पेशेवर ढंग से चलने वाली कार्यकारी एजेंसियाँ (executive agencies) करें; और समान विषयों वाले सचिवालयीय विभाग मिलाए जाएँ। (राजस्थान की ज़िला व्यवस्था पर इन सिफ़ारिशों का असर अलग पृष्ठ का विषय है।)

प्रथम ARC बनाम द्वितीय ARC

प्रथम ARC

गठनजनवरी 1966

स्वरूपपूरे तंत्र की एक साथ व्यापक समीक्षा; 20 रिपोर्टें (मध्य-1970 तक)

सिफ़ारिशों की गिनती537 प्रमुख सिफ़ारिशें

कार्मिक-विषय का केंद्रविशेषज्ञता के 8 क्षेत्र, कार्यात्मक पद, मध्य-करियर परीक्षा

नए क्षेत्रयोजना-तंत्र, केंद्र-राज्य संबंध, नागरिक शिकायत निवारण

द्वितीय ARC

गठन31 अगस्त 2005 का संकल्प

स्वरूपविषय-वार 15 रिपोर्टें (अप्रैल 2009 तक)

सिफ़ारिशों की गिनतीआधिकारिक गिनती इस पृष्ठ के स्रोतों में प्रकाशित नहीं

कार्मिक-विषय का केंद्रडोमेन-योग्यता, केंद्रीय सिविल सेवा प्राधिकरण, प्रतिस्पर्धी वरिष्ठ चयन

नए क्षेत्रनैतिकता, ई-गवर्नेंस, सामाजिक पूँजी, स्थानीय शासन, संकट प्रबंधन

अंतिम पंक्ति रिपोर्टों के शीर्षकों से बना विश्लेषण है।

परिवर्तन प्रबंधन (Change Management): मूल बातें

मान लीजिए किसी तहसील में काग़ज़ की फ़ाइलों की जगह कंप्यूटर-आधारित फ़ाइल-प्रणाली लाई जा रही है। मशीनें ख़रीद लेने से बदलाव नहीं होता; पुराने क्लर्क को सिखाना होता है, डर दूर करना होता है, काम की नई आदतें बनानी होती हैं। इसी पूरी योजना को परिवर्तन प्रबंधन कहते हैं। OpenStax की पाठ्यपुस्तक के अनुसार change management परिवर्तन को डिज़ाइन करने और लागू करने की प्रक्रिया है; इसके विशेषज्ञ क्षेत्र को संगठन-विकास (organisational development) कहा जाता है। (यह उदाहरण गढ़ा गया है।)

परिवर्तन के प्रकार: संरचनात्मक (विभाग बदलना, पद जोड़ना, भूमिकाएँ बदलना), तकनीकी (नई मशीन या सॉफ़्टवेयर, जो अक्सर संरचना भी बदल देता है) और संस्कृति-परिवर्तन (सोचने और व्यवहार करने के साझा ढंग को बदलना), जो सबसे कठिन है और अक्सर कई वर्ष लेता है। दृष्टिकोण दो हैं: ऊपर से नीचे (top-down), जिसमें छोटा समूह प्रक्रिया बनाकर बाक़ी को निर्देश देता है, और नीचे से ऊपर (bottom-up), जिसमें कर्मचारी स्वयं बदलाव गढ़ने में भागीदार होते हैं। पाठ्यपुस्तक का नियम-सूत्र है कि परिवर्तन जितना जटिल हो, कर्मचारियों की भागीदारी उतनी ही ज़रूरी है।

लेविन का मॉडल (Kurt Lewin) तीन चरणों का है। पहला, अनफ़्रीज़ (unfreeze): पुराने मानदंड और दिनचर्या में खलल डालना, ताकि बदलाव के लिए जगह बने। दूसरा, परिवर्तन (change): नई व्यवस्था लागू करना और लोगों को प्रशिक्षण या चर्चा-सभाओं से ढलने में मदद देना। तीसरा, रीफ़्रीज़ (refreeze): संसाधन, नीतियाँ और दिनचर्या नई व्यवस्था के अनुरूप ढालकर बदलाव को पक्का करना। कॉटर का मॉडल (John Kotter) आठ चरणों का है: तात्कालिकता का बोध जगाना, शक्तिशाली मार्गदर्शी गठबंधन बनाना, परिवर्तन की दृष्टि गढ़ना, दृष्टि का संप्रेषण, बाधाएँ हटाना, छोटी जीतें बनाना, सुधारों को पक्का करना और परिवर्तन को संस्कृति में बैठाना (anchor)।

प्रतिरोध (resistance): पाठ्यपुस्तक कहती है कि कर्मचारी तब ज़्यादा विरोध करते हैं जब योजना बनाने में उनका कोई हाथ नहीं होता और उन्हें बदलाव की ज़रूरत या दृष्टि समझ नहीं आती। इसलिए प्रतिरोध घटाने के उपाय हैं: कारण बताना, भागीदारी देना, लगातार संवाद, प्रशिक्षण और बाधाओं को हटाना। एक और चेतावनी: पारंपरिक सोच यह मान लेती है कि लोग स्वभाव से बदलाव का विरोध करते हैं, जबकि सराहनात्मक (appreciative) सोच मानती है कि सम्मान और भागीदारी मिलने पर लोग बदलाव अपनाते हैं।

लेविन बनाम कॉटर

लेविन

चरण3: अनफ़्रीज़, परिवर्तन, रीफ़्रीज़

स्वरूपबुनियादी, सरल; स्थिर संगठन के अनुकूल

दृष्टिकोणऊपर-नीचे या नीचे-ऊपर, दोनों पर लागू

प्रतिरोध परदिनचर्या में खलल डालकर नई दिनचर्या बनवाना

कॉटर

चरण8, तात्कालिकता से लेकर संस्कृति में बैठाने तक

स्वरूपविस्तृत; मज़बूत पदानुक्रम वाले संगठन में उपयोगी

दृष्टिकोणकेंद्रीकृत, ऊपर से नीचे की प्रक्रिया

प्रतिरोध परबाधाएँ हटाना, छोटी जीतें दिखाना

पाठ्यपुस्तक के अनुसार लेविन का मॉडल ऐसे संगठनों में सबसे सटीक बैठता है जहाँ बदलाव लंबे समय टिकता है।

लेविन और कॉटर: परिवर्तन के चरण

  1. अनफ़्रीज़

    पुरानी दिनचर्या में खलल; तात्कालिकता और कारण का बोध (कॉटर के चरण 1-4)

  2. परिवर्तन

    नई प्रणाली लागू; प्रशिक्षण, संवाद, बाधाएँ हटाना, छोटी जीतें (कॉटर के चरण 5-6)

  3. सुदृढ़ीकरण

    सुधारों को पक्का करना, फिर परिवर्तन को संस्कृति में बैठाना (कॉटर के चरण 7-8; लेविन का रीफ़्रीज़)

दोनों मॉडलों की तुलना-रेखा विश्लेषण है: OpenStax खंड कॉटर के चरणों को लेविन के तीन चरणों के मुक़ाबले रखते हैं, पर यह एक-से-एक मिलान नहीं है।

राजस्थान के सत्यापित सुधार (2013 के 20 अंक वाले प्रश्न का आधार)

2013 का प्रश्न "प्रशासनिक नवाचार और सुधार: लोक प्रशासन, नीति-निर्धारण और संवेदनशीलता" तीन पहलुओं पर था। यहाँ केवल वे सुधार लिए गए हैं जिनकी तिथि और ब्योरा आधिकारिक पाठ से मिलाया जा सका। राजस्थान में पहले के दशकों के किसी अन्य आयोग या समिति के नाम और सिफ़ारिशें इस पृष्ठ के स्रोतों में प्रकाशित नहीं मिलीं, इसलिए उन्हें यहाँ नहीं जोड़ा गया है।

लोक प्रशासन (विकेंद्रीकृत ढाँचा): पंचायती राज मंत्रालय की रूपरेखा रिपोर्ट के अनुसार नेहरू ने 2 अक्टूबर 1959 को नागौर (राजस्थान) में त्रिस्तरीय पंचायती राज का उद्घाटन किया। 73वें संशोधन के बाद राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 (अधिनियम 13/1994) बना; अधिनियम की पाद-टिप्पणी के अनुसार यह 23 अप्रैल 1994 की अधिसूचना से लागू हुआ और धारा 124 से 1953 का पंचायत अधिनियम और 1959 का पंचायत समिति व ज़िला परिषद अधिनियम (अधिनियम 37/1959) निरस्त हुए।

नीति-निर्माण और पारदर्शिता: MKSS ने 1994 में ग्रामीण राजस्थान में विकास-कार्यों की जानकारी के लिए ज़मीनी अभियान शुरू किया और राजस्थान ने 2000 में सूचना का अधिकार क़ानून बनाया (MCRHRDI की सामग्री); राजस्थान सूचना का अधिकार अधिनियम, 2000 (अधिनियम 13/2000) को राज्यपाल की स्वीकृति 11 मई 2000 को मिली। जन सूचना पोर्टल 13 सितंबर 2019 को शुरू हुआ; पोर्टल के अनुसार यह पहला ऐसा प्रयास है जिसमें वार्ड या पंचायत में चल रही सभी सरकारी योजनाओं की जानकारी एक जगह मिलती है और यह RTI अधिनियम 2005 की धारा 4(2) को लागू करता है। संयुक्त राष्ट्र की रेज़िडेंट कोऑर्डिनेटर के भाषण के अनुसार यह पंचायत स्तर पर 21 योजनाओं में स्वतः सूचना-प्रकटीकरण की भारत में पहली पहल है।

संवेदनशीलता (जवाबदेही और शिकायत-निवारण): राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम, 2011 (अधिनियम 23/2011) और उसका 2013 का संशोधन (अधिनियम 36/2013; स्वीकृति 15 सितंबर 2013)। राजस्थान सुनवाई का अधिकार अधिनियम, 2012 (अधिनियम 22/2012; स्वीकृति 21 मई 2012): नागरिक की शिकायत पर तय समय-सीमा में सुनवाई का अवसर; लोक सुनवाई अधिकारी की अधिसूचना (धारा 3), सूचना एवं सुविधा केंद्र (धारा 5) जिनमें कॉल सेंटर और हेल्प डेस्क शामिल हैं, पहली अपील 30 दिन में और दूसरी अपील 30 दिन में (धारा 6), और बिना पर्याप्त कारण सुनवाई न देने पर 500 से 5,000 रुपये का जुर्माना, जो अधिकारी के वेतन से वसूला जा सकता है (धारा 7)। धारा 2(क) में "शिकायत" की परिभाषा 2014 के संशोधन अधिनियम (21 सितंबर 2013 से प्रभावी माना गया) से बदली: अब सेवा-संबंधी मामले, न्यायालय या अधिकरण के क्षेत्राधिकार वाले मामले और अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी के समक्ष लंबित अपील इसके बाहर हैं।

विकास-प्रशासन में नवाचार: राजस्थान सरकार के दस्तावेज़ के अनुसार मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान 27 जनवरी 2016 से शुरू हुआ। उसी दस्तावेज़ में बताया गया है कि 30 जून 2016 को पूरे हुए पहले चरण के अध्ययन में 21 गैर-मरुस्थलीय ज़िलों में औसत भूजल-स्तर 4.66 फ़ुट बढ़ा (राजस्थान सरकार का दावा; दूसरे स्रोत में ज़िलों की संख्या 16 बताई गई है, इसलिए उत्तर में "सरकारी अध्ययन के अनुसार" लिखें)।

राजस्थान के सुधार: एक नज़र में

वर्षसुधारकिस पहलू सेमुख्य बात
1959त्रिस्तरीय पंचायती राज, नागौर (2 अक्टूबर)लोक प्रशासनत्रिस्तरीय पंचायती राज का उद्घाटन; लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का प्रयोग
1994राजस्थान पंचायती राज अधिनियम (23-4-1994 से लागू)लोक प्रशासन73वें संशोधन के अनुरूप नया क़ानून; 1953 व 1959 के क़ानून निरस्त
2000राजस्थान सूचना का अधिकार अधिनियमनीति और पारदर्शिताMKSS के 1994 के अभियान के बाद; स्वीकृति 11 मई 2000
2011लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम (2013 में संशोधित)संवेदनशीलताअधिसूचित सेवाएँ, जवाबदेही
2012सुनवाई का अधिकार अधिनियमसंवेदनशीलता30 दिन की दो अपीलें; 500-5,000 रुपये जुर्माना
2016मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियाननीति और विकास-प्रशासन27 जनवरी 2016 से; सरकारी अध्ययन के अनुसार जल-स्तर में वृद्धि
2019जन सूचना पोर्टल (13 सितंबर)पारदर्शितापंचायत स्तर पर स्वतः प्रकटीकरण; धारा 4(2)

समय-रेखा: ARC और राजस्थान

  1. 2 अक्टूबर 1959

    नागौर (राजस्थान) में त्रिस्तरीय पंचायती राज का उद्घाटन

  2. जनवरी 1966

    प्रथम ARC का गठन

  3. 18 अप्रैल 1969

    प्रथम ARC की कार्मिक प्रशासन पर रिपोर्ट

  4. मध्य-1970

    प्रथम ARC का समापन; 20 रिपोर्टें, 537 सिफ़ारिशें

  5. 23 अप्रैल 1994

    राजस्थान पंचायती राज अधिनियम लागू

  6. 11 मई 2000

    राजस्थान RTI अधिनियम को राज्यपाल की स्वीकृति

  7. 31 अगस्त 2005

    द्वितीय ARC का गठन

  8. नवंबर 2008

    दसवीं रिपोर्ट (कार्मिक प्रशासन)

  9. अप्रैल 2009

    पंद्रहवीं रिपोर्ट (राज्य और ज़िला प्रशासन)

  10. 21 मई 2012

    राजस्थान सुनवाई का अधिकार अधिनियम को स्वीकृति (सेवा-गारंटी अधिनियम 2011 में)

  11. 27 जनवरी 2016

    मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान की शुरुआत

  12. 13 सितंबर 2019

    जन सूचना पोर्टल की शुरुआत

तारीख़ें परीक्षा में तुलना के लिए पूछी जाती हैं; क्रम पर ध्यान दें कि 1959 का नागौर प्रयोग प्रथम ARC से पहले का है।

मुख्य तथ्य

प्रथम ARC
जनवरी 1966 में गठित; 20 रिपोर्टें; 537 प्रमुख सिफ़ारिशें; क्रियान्वयन-रिपोर्ट नवंबर 1977 में संसद में
द्वितीय ARC का गठन
31 अगस्त 2005 का सरकारी संकल्प; अध्यक्ष वीरप्पा मोइली; 13 विषय
द्वितीय ARC की रिपोर्टें
15; दसवीं (कार्मिक प्रशासन) नवंबर 2008; पंद्रहवीं (राज्य और ज़िला प्रशासन) अप्रैल 2009
दसवीं रिपोर्ट का निष्कर्ष
भर्ती-आयु घटाना, अनिवार्य प्रवेश-प्रशिक्षण, प्रतिस्पर्धी वरिष्ठ चयन, 20 वर्ष पर फ़िटनेस-बार, सिविल सेवा क़ानून (2008)
लेविन के चरण
अनफ़्रीज़, परिवर्तन, रीफ़्रीज़ (3)
कॉटर के चरण
8 चरण
नागौर में पंचायती राज का उद्घाटन
2 अक्टूबर 1959
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम
अधिनियम 13/1994; 23-4-1994 से लागू (1994)
राजस्थान RTI अधिनियम
अधिनियम 13/2000; स्वीकृति 11 मई 2000
सुनवाई का अधिकार अधिनियम
अधिनियम 22/2012; स्वीकृति 21 मई 2012; जुर्माना 500 से 5,000 रुपये
सेवा-गारंटी अधिनियम का 2013 संशोधन
अधिनियम 36/2013; स्वीकृति 15 सितंबर 2013
जन सूचना पोर्टल
13 सितंबर 2019
जल स्वावलंबन अभियान
27 जनवरी 2016 (सरकारी दस्तावेज़)
अंतिम जाँच
1 अक्टूबर 2026

राजस्थान का पहलू

इस पृष्ठ के राजस्थान-तथ्य सरकारी या विधायी पाठ से लिए गए हैं: नागौर में पंचायती राज का उद्घाटन (पंचायती राज मंत्रालय, 2 अक्टूबर 1959), राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 1994 (23-4-1994), RTI अधिनियम 2000, सुनवाई का अधिकार अधिनियम 2012, जन सूचना पोर्टल (13 सितंबर 2019, पोर्टल का अपना विवरण) और जल स्वावलंबन अभियान (27 जनवरी 2016, राजस्थान सरकार का दस्तावेज़)। 2011 के सेवा-गारंटी अधिनियम का केवल अधिनियम-क्रमांक और 2013 का संशोधन दिया गया है, क्योंकि उसकी समय-सीमा और जुर्माने की राशियाँ इस सत्र में मूल पाठ से नहीं मिलाई जा सकीं। 1 अक्टूबर 2026 को देखे गए स्रोतों में राज्य की किसी और "प्रशासनिक सुधार समिति" का विवरण आधिकारिक अधिसूचना में प्रकाशित नहीं मिला।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • प्रथम ARC (1966) के गठन-वर्ष को द्वितीय ARC (2005) से उलझाना; और यह लिख देना कि द्वितीय ARC ने भी एक रिपोर्ट में सब कुछ समेटा। द्वितीय ARC की 15 विषय-वार रिपोर्टें हैं।
  • द्वितीय ARC की सिफ़ारिशें लिखते समय केवल "सिविल सेवा क़ानून" लिख देना; इसके साथ केंद्रीय सिविल सेवा प्राधिकरण, डोमेन-असाइनमेंट और पार्श्विक प्रवेश का एक वाक्य जोड़ें।
  • परिवर्तन प्रबंधन को केवल लेविन के तीन चरणों तक सीमित कर देना। मूल विशेषताएँ (ज़रूरत का स्पष्ट कारण, भागीदारी, संवाद, प्रशिक्षण, प्रतिरोध प्रबंधन) पहले लिखें, मॉडल बाद में।
  • राजस्थान के उदाहरण में तारीख़ें गड़बड़ाना: 2 अक्टूबर 1959 (नागौर), 23 अप्रैल 1994 (पंचायती राज अधिनियम), 11 मई 2000 (RTI अधिनियम की स्वीकृति), 21 मई 2012 (सुनवाई का अधिकार)। जो तारीख़ पक्की न हो, केवल वर्ष लिखें।
  • जल स्वावलंबन अभियान का आँकड़ा "निश्चित तथ्य" की तरह लिखना; वह सरकारी अध्ययन का दावा है। "सरकारी अध्ययन के अनुसार" जोड़ें।
  • बिना सत्यापन के राजस्थान की ज़िला या विभाग संख्याएँ लिख देना; उसके लिए आधिकारिक अधिसूचना की तारीख़ वाला स्रोत चाहिए।