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पेपर III · इकाई II

सामान्यज्ञ और विशेषज्ञ: टकराव, ARC के मत और समाधान

सामान्यज्ञ और विशेषज्ञ में फ़र्क़, दोनों के बीच टकराव क्यों उठता है, प्रथम और द्वितीय ARC ने क्या कहा और समाधान क्या हैं, उत्तर-लेखन की दृष्टि से।

  • सामान्यज्ञ
  • विशेषज्ञ
  • प्रथम ARC
  • डोमेन-असाइनमेंट
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II: "Union Government and Administrative Institutions ... Issues: Union-State relations, Minister-civil servant relations, generalists-specialists, administrative reforms, social audit." इस पृष्ठ पर generalists-specialists है; ARC का सामान्य परिचय प्रशासनिक सुधार वाले पृष्ठ पर है।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2023 के पेपर में "सामान्यज्ञ बनाम विशेषज्ञ का टकराव; प्रथम ARC की सिफ़ारिशें" 10 अंक (100 शब्द) का प्रश्न था। प्रश्न में दो भाग हैं: टकराव और प्रथम ARC की सिफ़ारिशें; दोनों का उत्तर लिखना होगा।
  • 2013-2024 के पेपरों में यह विषय एक ही बार सीधे आया है, पर 10 अंक के रूप में। इसलिए इसे बड़ा प्रश्न मानकर तैयार करें, तारीख़ों और आयोग के नामों के साथ।
  • इस विषय के तथ्य आगे प्रशासनिक सुधार, कार्मिक प्रशासन और मंत्री-लोकसेवक संबंध जैसे प्रश्नों में भी काम आते हैं, इसलिए इन्हें अलग से रटें नहीं, कहानी के रूप में समझें।

पहले सरल भाषा में: अस्पताल का अधीक्षक और हृदय-शल्यचिकित्सक

एक बड़े अस्पताल को चलाने के लिए दो तरह के लोग चाहिए। हृदय-शल्यचिकित्सक (specialist) जानता है कि बाइपास कैसे किया जाता है, पर यह ज़रूरी नहीं कि उसे बजट, ख़रीद, स्टाफ़ और सरकार से तालमेल का अनुभव हो। अस्पताल का अधीक्षक (generalist) शायद शल्यक्रिया न कर पाए, पर वह तय कर सकता है कि अगले साल पैसा किस विभाग को मिले, किस वार्ड में नर्सें बढ़ें और दवाइयों की ख़रीद कैसे हो। अस्पताल तभी चलता है जब दोनों साथ चलें। झगड़ा तब शुरू होता है जब सर्जन को लगे कि हर बड़ा फ़ैसला वह आदमी ले रहा है जो ऑपरेशन थिएटर में गया ही नहीं, और अधीक्षक को लगे कि सर्जन को प्रशासन की समझ नहीं। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया उदाहरण है।)

परीक्षा के लिए परिभाषाएँ। सामान्यज्ञ (generalist) वह लोक सेवक है जिसकी योग्यता किसी एक विषय-क्षेत्र में नहीं, बल्कि व्यापक दृष्टि, समन्वय और निर्णय-क्षमता में मानी जाती है और जो अपने करियर में कई विभागों में काम करता है। विशेषज्ञ (specialist) वह है जिसकी पहचान किसी ख़ास क्षेत्र (इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कराधान आदि) के गहन ज्ञान और प्रशिक्षण से बनती है। (विश्लेषण: ये कार्यकारी परिभाषाएँ हैं जो ARC की श्रेणियों और CPR के विवरण से निकाली गई हैं; किसी एक आधिकारिक परिभाषा से नहीं।) प्रथम ARC ने सरकारी पदों को तीन श्रेणियों में बाँटा: सामान्य प्रशासन (उदाहरण: ज़िला कलेक्टर), विशेषीकृत प्रशासन (आयकर अधिकारी) और तकनीकी या वैज्ञानिक प्रशासन (कार्यपालक अभियंता); यह उदाहरण-सहित वर्गीकरण CPR के अध्ययन में दर्ज है।

सामान्यज्ञ बनाम विशेषज्ञ

सामान्यज्ञ (Generalist)

योग्यता का आधारव्यापक दृष्टि, समन्वय, निर्णय-क्षमता

करियरकई विभागों और स्तरों में घूमता है (फ़ील्ड और मुख्यालय)

ताक़तनीति, समन्वय, राजनीतिक-प्रशासनिक तालमेल

कमज़ोरीविषय की गहराई की कमी; जल्दी-जल्दी तबादले

भारत में उदाहरण (CPR/ARC के अनुसार)IAS जैसी सेवाएँ; ज़िला कलेक्टर का पद

विशेषज्ञ (Specialist)

योग्यता का आधारकिसी एक क्षेत्र में गहरा तकनीकी ज्ञान और प्रशिक्षण

करियरप्रायः अपने कार्यात्मक या तकनीकी विभाग में रहता है

ताक़तसटीक तकनीकी सलाह और गुणवत्ता

कमज़ोरीप्रशासनिक और प्रबंधन-अनुभव सीमित; पदोन्नति की संकरी राह

भारत में उदाहरण (CPR/ARC के अनुसार)IRS जैसी कार्यात्मक सेवाएँ; कार्यपालक अभियंता जैसे तकनीकी पद

पहली चार पंक्तियाँ विश्लेषण हैं; अंतिम पंक्ति CPR के अध्ययन और प्रथम ARC के वर्गीकरण के उदाहरणों पर आधारित।

जड़ें: यह टकराव कहाँ से आया

CPR के अध्ययन के अनुसार ब्रिटिश शासन में सिविल सेवक की कल्पना ऐसे व्यक्ति की थी जो व्यापक शिक्षा, सामान्य ज्ञान और चरित्र के बल पर अनेक काम सँभाल सके। भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) को यही सामान्यज्ञ-धारणा अपने पूर्ववर्ती ICS से विरासत में मिली। आज़ादी के बाद अलग-अलग काम के लिए अलग सेवाएँ बनीं, पर उच्च पदों की विशेषज्ञता की कल्पना औपनिवेशिक सिविल सेवा के सिद्धांतों के इर्द-गिर्द ही रही। यही कारण है कि कई लोग तर्क देते हैं कि IAS का कौशल आधुनिक शासन की माँगों से मेल नहीं खाता।

प्रथम ARC (1969) के अनुसार आज़ादी से पहले सरकार का मुख्य काम क़ानून-व्यवस्था, शांति बनाए रखना और राजस्व वसूलना था, जिसके लिए यह प्रणाली ठीक थी। आज़ादी के बाद नियोजन को विकास की रणनीति बनाने से प्रशासन "अधिकाधिक विशेषीकृत, तकनीकी और वैज्ञानिक" होता गया; सरकार का केंद्रीय उद्देश्य नियमन और रख-रखाव से हटकर सामाजिक कल्याण की नीतियाँ और कार्यक्रम बनाने और लागू करने की ओर बढ़ा। फिर भी उच्च प्रशासनिक पदों पर, जहाँ नीति और प्रबंधन के निर्णय होते हैं, "सामान्यज्ञ पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भरता" बनी रही।

टकराव के कारण (संघर्ष का स्वरूप)

टकराव के बिंदु तीन तरह के हैं। एक, शीर्ष नीतिगत पदों पर पहुँच: MCRHRDI (तेलंगाना सरकार के प्रशिक्षण संस्थान, हैदराबाद) की पाठ्य-सामग्री के अनुसार भारत में तकनीकी कर्मियों का मनोबल निचला है, क्योंकि ऊपर से अत्यधिक नियंत्रण है, तकनीकी क्षेत्रों के भी शीर्ष नीति-निर्माण पदों पर सामान्यज्ञ प्रशासक बैठे हैं और पदोन्नति के अवसर कम हैं। सामग्री में एक 1984 की रिपोर्ट उद्धृत है, जिसके अनुसार योजना आयोग में तकनीकी अधिकारी अपने काम में बाधित महसूस करते थे और दूसरे मंत्रालयों के IAS अधिकारी तकनीकी अधिकारियों की अध्यक्षता वाली बैठकों में आने में "कुछ झिझक" दिखाते थे।

दो, सेवाओं के बीच बराबरी: CPR के अनुसार अधिकतर संगठित सेवाएँ एक ही सिविल सेवा परीक्षा से आती हैं, इसलिए अलग-अलग सेवाओं के अधिकारी बराबर बर्ताव और करियर-प्रगति की उम्मीद रखते हैं; सुधार-रिपोर्टों ने बार-बार देखा कि वरिष्ठ प्रशासनिक पदों का असमान हिस्सा एक सेवा के पास जाता है। तीन, चयन में पारदर्शिता: द्वितीय ARC ने स्वीकार किया कि वरिष्ठ पदों के चयन की पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठता पर चिंताएँ हैं और यह संभावना है कि पद सबसे उपयुक्त अधिकारी को न मिलें; छठे केंद्रीय वेतन आयोग का भी यही कहना था (CPR में उद्धृत)।

विश्लेषण: टकराव मूलतः "कौन अच्छा" का नहीं, "किस पद पर किसकी ज़रूरत" का है। जहाँ पद की कसौटी तकनीकी गहराई है, वहाँ विशेषज्ञ का दावा मज़बूत है; जहाँ पद की कसौटी बहुविभागीय समन्वय और नीति-निर्णय है, वहाँ सामान्यज्ञ का तर्क मज़बूत है।

प्रथम ARC के मत और सिफ़ारिशें (1969)

प्रथम ARC का मूल निष्कर्ष यह था कि सरकारी कामों में आई विविधता से कई तरह के कौशल चाहिए। इसलिए तकनीकी, वैज्ञानिक और अन्य विशेषज्ञों (अर्थशास्त्री, चिकित्सक, इंजीनियर आदि) के करियर-नियोजन के नए तरीक़े चाहिए। CPR द्वारा उद्धृत आयोग के शब्दों में विषय-संबंधी योग्यताएँ "पेशेवर सिविल सेवक जैसे व्यापक वर्ग" से नहीं आतीं, वे बुनियादी कार्यात्मक कौशल या शैक्षणिक योग्यता पर विशेष प्रशिक्षण चढ़ाकर ही प्राप्त होती हैं।

सिफ़ारिशें दसवीं रिपोर्ट के अनुसार: (1) उच्च पदों को फ़ील्ड और मुख्यालय में बाँटना। (2) मुख्यालय (सचिवालय) में पदों को "कार्यात्मक" (functional) और "कार्यात्मक क्षेत्र से बाहर" में बाँटना। कार्यात्मक पद (जैसे आयकर, यांत्रिक इंजीनियरिंग या भू-राजस्व वाले पद, जिनमें उस कार्य का गहरा ज्ञान चाहिए) संबंधित कार्यात्मक वर्ग-1 सेवा के अधिकारियों से भरे जाएँ; शेष पद सभी सेवाओं (कार्यात्मक और ग़ैर-कार्यात्मक) में से सबसे उपयुक्त अधिकारी को मिलें। (3) विशेषज्ञता के आठ क्षेत्र: आर्थिक प्रशासन, औद्योगिक प्रशासन, कृषि व ग्रामीण विकास प्रशासन, सामाजिक व शैक्षिक प्रशासन, कार्मिक प्रशासन, वित्तीय प्रशासन, रक्षा प्रशासन व आंतरिक सुरक्षा और योजना। (4) इन आठ क्षेत्रों में चयन मध्य-करियर प्रतियोगी परीक्षा से: 8 से 12 वर्ष का अनुभव रखने वाले वर्ग-1 अधिकारी पात्र; UPSC द्वारा लिखित परीक्षा और UPSC अध्यक्ष तथा दो वरिष्ठ सचिवों की समिति द्वारा साक्षात्कार। (5) विशेष प्रशिक्षण: मुख्यालय के कार्य का प्रशिक्षण और हर विशेषज्ञता में विशेष पाठ्यक्रम।

इसके साथ आयोग ने वरिष्ठ प्रबंधन पदों के लिए "सभी संबंधित स्रोतों से चयन, सामान्यज्ञ और विशेषज्ञ दोनों" का सिद्धांत रखा और कहा कि जिन सेवाओं के लोग अब तक सचिवालय के उच्च प्रबंधन पदों तक नहीं पहुँचे, उनमें भी प्रतिभा पहचानी और निखारी जाए। CPR का आकलन (विश्लेषण-स्रोत) है कि कार्यात्मक पदों को कार्यात्मक सेवाओं के लिए सुरक्षित करके प्रथम ARC ने कार्यात्मक सेवाओं के विषय-ज्ञान को सामान्यज्ञ-संवर्गों के अनूठे अनुभव से ज़्यादा मूल्यवान माना।

द्वितीय ARC के मत और सिफ़ारिशें (2008)

द्वितीय ARC ने चार दशक बाद वही समस्या फिर परखी। CPR के अनुसार उसका ज़ोर "डोमेन-योग्यता" (domain competence) पर रहा, यानी क्षेत्र की व्यापक समझ और लंबे फ़ील्ड-अनुभव से उपजी प्रबंधन-क्षमता, न कि प्रथम ARC की तरह केवल विशेषीकृत तकनीकी ज्ञान। दसवीं रिपोर्ट के पैरा 8.4.12 में आयोग कहता है कि डोमेन-योग्यता को लेकर काफ़ी भ्रम है, क्योंकि उसे सामान्यज्ञ के नज़रिये से यह तय करने में देखा जाता है कि वह किस मंत्रालय में फ़िट बैठेगा। जबकि डोमेन-योग्यता कार्यों (functions) से जुड़ी है, मंत्रालयों से नहीं। चुनौती यह है कि "ऐसे सामान्यज्ञ चुने जाएँ जो विशेषीकृत हो चुके हैं और ऐसे विशेषज्ञ जो सामान्यीकृत हो चुके हैं", और उन्हें उपयुक्त पदों पर रखा जाए।

उदाहरण के लिए स्वास्थ्य या रेल मंत्रालय एकल कार्यात्मक डोमेन नहीं हैं। अपने मूल कार्यों (स्वास्थ्य सेवा, रेल-परिवहन) के अलावा दोनों में कार्मिक प्रशासन, वित्त व लेखा, सतर्कता जैसे कार्यक्षेत्र भी हैं। इसलिए किसी मंत्रालय के पदों को किसी एक डोमेन के हवाले करना व्यावहारिक नहीं। आयोग की सिफ़ारिशें: (1) सेवा के 13वें वर्ष के आसपास हर अधिकारी को विशिष्ट डोमेन सौंपा जाए, क्योंकि जब वह संयुक्त सचिव के स्तर के योग्य होगा तब तक उसे डोमेन का कम से कम तीन-चार साल का अनुभव हो चुका होगा। (2) डोमेन सौंपने की ज़िम्मेदारी एक स्वतंत्र प्राधिकरण (प्रस्तावित केंद्रीय सिविल सेवा प्राधिकरण) की हो; 13 वर्ष की सेवा पूरी कर चुके सभी अधिकारियों से आवेदन माँगे जाएँ, जिनमें शैक्षिक पृष्ठभूमि, शोध-उपलब्धियाँ और संबंधित महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ बताई जाएँ; साक्षात्कार से उनके दावे परखे जाएँ; और जिन डोमेन में आवेदक न हों, उन्हें प्राधिकरण उपयुक्त पृष्ठभूमि वाले अधिकारियों को सौंपे। (3) आठ डोमेन तालिका 8.1 के पहले आठ में दर्ज हैं: सामान्य प्रशासन, शहरी विकास, सुरक्षा, ग्रामीण विकास, वित्तीय प्रबंधन, अवसंरचना, मानव-संसाधन विकास/सामाजिक सशक्तीकरण और आर्थिक प्रशासन। CPR के अनुसार कुल बारह डोमेन हैं। प्रथम ARC के आठ क्षेत्रों को आयोग ने आज की ज़रूरतों के लिए अपर्याप्त माना।

वरिष्ठ स्तर के लिए आयोग ने कहा कि सर्वेक्षित देशों में वरिष्ठ सेवा लगभग पूरी तरह सामान्यज्ञों से बनी है। इससे यह रेखांकित होता है कि वरिष्ठ प्रबंधन स्तर पर वैचारिक स्पष्टता, नेतृत्व और निर्णय-क्षमता तथा क्षेत्र की व्यापक दृष्टि केवल तकनीकी ज्ञान से कहीं अधिक अहम है। पर साथ ही बाहर की प्रतिभा के लिए अतिरिक्त सचिव (HAG) या उससे ऊपर के चुने हुए पदों को केंद्रीय सिविल सेवा प्राधिकरण के माध्यम से पारदर्शी प्रक्रिया से खोलने की सिफ़ारिश की (पैरा 9.5.3); आयोग के अनुसार तदर्थ पार्श्विक प्रवेश अच्छा मॉडल नहीं, क्योंकि मौजूदा अधिकारी बाहरी प्रतिभा के प्रवेश का विरोध करते हैं और पूरा तंत्र व्यक्ति-आधारित रहता है।

प्रथम ARC बनाम द्वितीय ARC: सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ पर

प्रथम ARC (1969)

मूल चिंताविशेषज्ञ और तकनीकी ज्ञान वाले अधिकारियों को वरिष्ठ पदों में पर्याप्त हिस्सा नहीं

विशेषज्ञता का अर्थविशेषीकृत तकनीकी ज्ञान और प्रशिक्षण

डोमेन किस पर आधारित8 विशेषज्ञता-क्षेत्र

कार्यात्मक पदों का व्यवहारकार्यात्मक पद संबंधित कार्यात्मक सेवा को; शेष पद सभी सेवाओं के योग्य अधिकारियों को

प्रक्रियामध्य-करियर लिखित परीक्षा और साक्षात्कार (UPSC); 8-12 वर्ष के अनुभव वाले

बाहरी प्रतिभावरिष्ठ तकनीकी पदों पर पार्श्विक प्रवेश

द्वितीय ARC (2008)

मूल चिंताडोमेन-योग्यता का भ्रम; चयन की पारदर्शिता

विशेषज्ञता का अर्थक्षेत्र की व्यापक समझ और फ़ील्ड-अनुभव से जन्मी प्रबंधन-क्षमता (CPR)

डोमेन किस पर आधारितकार्य (function), मंत्रालय नहीं; 12 डोमेन (CPR)

कार्यात्मक पदों का व्यवहारसभी पदों पर चयन में सबसे उपयुक्त को अवसर (CPR का आकलन)

प्रक्रिया13वें वर्ष पर आवेदन; केंद्रीय सिविल सेवा प्राधिकरण द्वारा मूल्यांकन और असाइनमेंट

बाहरी प्रतिभाअतिरिक्त सचिव (HAG) स्तर के चुने हुए पदों पर, प्राधिकरण के ज़रिये

"सभी पदों पर सबसे उपयुक्त को अवसर" वाली पंक्ति CPR का सार है, जिसे उसने तीनों रिपोर्टों की तुलना से निकाला है।

द्वितीय ARC का डोमेन-असाइनमेंट: कैसे चलेगा

  1. 13वाँ वर्ष

    सेवा के 13 वर्ष पूरे करते ही अधिकारी आवेदन के पात्र

  2. आवेदन

    शैक्षिक पृष्ठभूमि, शोध, डोमेन से जुड़ी उपलब्धियाँ

  3. मूल्यांकन

    स्वतंत्र प्राधिकरण (प्रस्तावित केंद्रीय सिविल सेवा प्राधिकरण): साक्षात्कार और दावों की जाँच

  4. डोमेन-निर्धारण

    जिन डोमेन में आवेदक कम हों, वे उपयुक्त पृष्ठभूमि वाले अधिकारियों को

  5. पदस्थापन

    सरकार (केंद्र और राज्य) अधिकारियों को उनके डोमेन में पदस्थ करे

पदस्थापन का अंतिम चरण रिपोर्ट के वाक्य "government (both Union and State) should post officers to these domains" पर आधारित।

समय-रेखा: सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ बहस

  1. 18 अप्रैल 1969

    प्रथम ARC की कार्मिक प्रशासन रिपोर्ट: कार्यात्मक पद, 8 विशेषज्ञता-क्षेत्र, मध्य-करियर परीक्षा

  2. 2003

    सुरिंदर नाथ समिति की रिपोर्ट (डोमेन-आधारित पदस्थापन)

  3. 2008

    द्वितीय ARC की दसवीं रिपोर्ट: 13वें वर्ष पर डोमेन-असाइनमेंट, केंद्रीय सिविल सेवा प्राधिकरण

  4. 2015

    सातवें केंद्रीय वेतन आयोग की रिपोर्ट (CPR के अनुसार): सामान्यज्ञ-नीति-पदों की प्रणाली पुरानी; सदस्य की असहमति

1969 की तारीख़ दसवीं रिपोर्ट की तालिका 2.1 से है; अन्य वर्ष रिपोर्टों के प्रकाशन-वर्ष हैं।

टकराव का समाधान: क्या हो सकता है

समाधान के चार रास्ते, सभी ऊपर की रिपोर्टों से निकलते हैं। पहला, पद का वर्गीकरण: जहाँ गहरा तकनीकी ज्ञान चाहिए वहाँ संबंधित कार्यात्मक या तकनीकी सेवा; जहाँ नीति और समन्वय हो वहाँ खुला चयन (प्रथम ARC)। दूसरा, डोमेन-असाइनमेंट: करियर के बीच में अधिकारी को एक कार्य-क्षेत्र सौंपना ताकि वह वरिष्ठ पद तक पहुँचने से पहले उसमें अनुभव पा ले (द्वितीय ARC)। तीसरा, प्रशिक्षण: प्रथम ARC ने मुख्यालय के कार्य और विशेषज्ञता-विशेष पाठ्यक्रम पर ज़ोर दिया; MCRHRDI की सामग्री भी कहती है कि विशेषज्ञ और विशेषज्ञता के अलावा सामान्यज्ञ प्रशासकों को भी किसी एक या दूसरे क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करनी चाहिए। चौथा, खुला और पारदर्शी चयन: एक स्वतंत्र प्राधिकरण से, और बाहर की प्रतिभा के लिए संस्थागत पार्श्विक प्रवेश।

सबसे महत्वपूर्ण वाक्य MCRHRDI की सामग्री का है: विशेषज्ञों और सामान्यज्ञों का संबंध "पूरक है, प्रतिस्पर्धी नहीं", बशर्ते दोनों अपनी भूमिका निभाएँ। उसी सामग्री के अनुसार नियोजन के तर्क में विशेषज्ञों की हैसियत में एक निश्चित वृद्धि निहित है जिसे सुधारा जाना चाहिए, और साथ ही एकीकरण और समन्वय के काम बढ़ने से सामान्यज्ञ प्रशासकों का स्थान भी और अहम हो जाता है। विशेषज्ञों को भी प्रशासनिक अनुभव और प्रशिक्षण मिले ताकि वे प्रशासनिक ज़िम्मेदारी वाले पदों तक पहुँच सकें।

विश्लेषण: ऊपर का मॉडल यही सिखाता है कि उत्तर में दोनों पक्ष बराबर वज़न से लिखें, फिर समाधान में "पद का स्वभाव" देखें। केवल "विशेषज्ञ चाहिए" या केवल "सामान्यज्ञ चाहिए" का एकतरफ़ा उत्तर अधूरा माना जाएगा।

मुख्य तथ्य

प्रथम ARC की कार्मिक प्रशासन रिपोर्ट
18 अप्रैल 1969
प्रथम ARC: विशेषज्ञता के क्षेत्र
आठ (आर्थिक, औद्योगिक, कृषि व ग्रामीण विकास, सामाजिक व शैक्षिक, कार्मिक, वित्तीय, रक्षा व आंतरिक सुरक्षा, योजना)
प्रथम ARC: मध्य-करियर परीक्षा
8-12 वर्ष के अनुभव वाले श्रेणी-1 अधिकारी; UPSC की लिखित परीक्षा और साक्षात्कार
प्रथम ARC के पदों के वर्ग
फ़ील्ड बनाम मुख्यालय; मुख्यालय में कार्यात्मक पद बनाम कार्यात्मक क्षेत्र से बाहर के पद
सुरिंदर नाथ समिति रिपोर्ट
2003
द्वितीय ARC: डोमेन-असाइनमेंट कब
सेवा का 13वाँ वर्ष; स्वतंत्र प्राधिकरण द्वारा (दसवीं रिपोर्ट, नवंबर 2008)
द्वितीय ARC: बाहरी प्रतिभा
अतिरिक्त सचिव (HAG) या उससे ऊपर के चुने हुए पद; प्राधिकरण के ज़रिये
द्वितीय ARC: मुख्य सूत्र
सामान्यज्ञ जो "विशेषीकृत" हुए हों और विशेषज्ञ जो "सामान्यीकृत" हुए हों (पैरा 8.4.12)
अंतिम जाँच
1 अक्टूबर 2026

राजस्थान का पहलू

इस विषय पर राजस्थान की सिविल सेवा में सामान्यज्ञ और विशेषज्ञ संवर्गों से जुड़े नियम या संख्याएँ आधिकारिक अधिसूचना में प्रकाशित स्रोतों से 1 अक्टूबर 2026 तक नहीं मिलाई जा सकीं, इसलिए इस पृष्ठ पर राजस्थान के बारे में कोई दावा नहीं किया गया है। (इस पृष्ठ की MCRHRDI की सामग्री तेलंगाना सरकार के प्रशिक्षण संस्थान की है और सामान्य लोक प्रशासन पर है, राजस्थान पर नहीं।)

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • "प्रथम ARC केवल विशेषज्ञों के पक्ष में था" लिख देना। आयोग का सूत्र है कि वरिष्ठ पदों पर सभी स्रोतों से चयन हो, सामान्यज्ञ और विशेषज्ञ दोनों; कार्यात्मक पद कार्यात्मक सेवा को और शेष खुले।
  • प्रथम ARC के 8 विशेषज्ञता-क्षेत्रों और द्वितीय ARC के 12 डोमेन को आपस में मिला देना। पहले की सूची 1969 की है, दूसरी 2008 की।
  • द्वितीय ARC को सामान्यज्ञ-विरोधी बताना। उसने कहा कि वरिष्ठ स्तर पर वैचारिक स्पष्टता, नेतृत्व और व्यापक दृष्टि अहम हैं; बस डोमेन-योग्यता सुनिश्चित हो।
  • डोमेन को मंत्रालय से जोड़ देना; द्वितीय ARC के अनुसार डोमेन कार्य (function) पर टिका है।
  • प्रश्न के दोनों भाग न लिखना: 2023 में "टकराव" और "प्रथम ARC की सिफ़ारिशें" दोनों माँगे गए थे।
  • ज़िला कलेक्टर को "विशेषज्ञ" बताना। प्रथम ARC के उदाहरण में कलेक्टर सामान्य प्रशासन का उदाहरण है (CPR)।