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पेपर III · इकाई II

नव लोक प्रबंध (New Public Management)

नव लोक प्रबंध क्या है, कहाँ से आया, हुड और ओसबोर्न-गेबलर क्या कहते हैं, भारत और राजस्थान में उसके रंग क्या हैं और उसकी आलोचना कैसे लिखें, इसकी उत्तर-लेखन केंद्रित तैयारी।

3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II: "Public Administration: Theories and Principles... New Public Administration, New Public Management, Good Governance, New Public Service."

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2013 के पेपर में 20 अंक (200 शब्द) का प्रश्न आया था: NPM क्या है, इसकी विशेषताएँ, सरकारी प्रशासन में उपयोगिता और उदाहरण। लंबे उत्तर के लिए पूरा ढाँचा इसी पेज पर है।
  • 2016 में 2 अंक का प्रश्न NPM की '3-ई' अवधारणा पर था और 2024 में 5 अंक का प्रश्न NPM के विरोधाभासों पर। यानी परिभाषा के साथ आलोचना भी तैयार रखनी है (2013-2024 के पेपरों में देखा गया रुझान)।
  • NPM का सीधा संबंध सुशासन, नागरिक घोषणा-पत्र, ई-गवर्नेंस और सेवा-गारंटी क़ानून से है, इसलिए यह पेज इकाई II के कई प्रश्नों की नींव का काम करता है।

सरल भाषा में: NPM क्या है

कल्पना कीजिए एक पुराना सरकारी डाकघर। वहाँ हर काम फ़ाइल, नियम-पुस्तिका और ऊपर के आदेश से चलता है। काउंटर के बाबू से यह नहीं पूछा जाता कि कितने लोगों का काम कितने दिन में हुआ; पूछा जाता है कि प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं। अब उसी डाकघर को एक अच्छी कूरियर कंपनी की तरह चलाने की सोचिए: साफ़ लक्ष्य, हर काउंटर के लिए समय-मानक, बेहतर काम पर पुरस्कार, और ज़रूरत हो तो कुछ काम बाहर की एजेंसी से कराना। यही सोच नव लोक प्रबंध (New Public Management, NPM) की जड़ है।

परीक्षा में लिखने योग्य परिभाषा: NPM सार्वजनिक सेवाओं के संचालन की वह सुधार-दृष्टि है जिसमें निजी क्षेत्र की प्रबंध-तकनीकें, प्रतिस्पर्धा, परिणाम-आधारित मूल्यांकन और नागरिक-केंद्रित सेवा-वितरण अपनाए जाते हैं, ताकि कम लागत में बेहतर सेवा मिले। क्रिस्टोफ़र हुड (Christopher Hood) ने 1991 में इसे एक 'ढीला शब्द' (loose term) कहा और बताया कि इसके पीछे दो धाराओं का मेल है: एक ओर लोक-चयन सिद्धांत (public choice), लेन-देन लागत सिद्धांत (transaction cost) और प्रधान-अभिकर्ता सिद्धांत (principal-agent) जैसे अर्थशास्त्रीय विचार, दूसरी ओर निजी व्यवसाय से आई प्रबंधवादी सोच (managerialism), जो मानती है कि पेशेवर प्रबंध-कौशल हर संगठन में काम आता है।

उत्पत्ति: कहाँ से और कैसे आया

हुड के अनुसार NPM 1970 के दशक के उत्तरार्ध से OECD समूह के कई देशों में उभरा और यह केवल ब्रिटेन तक सीमित विकास नहीं था। उन्होंने ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और डेनमार्क जैसे देशों का उल्लेख किया है। परीक्षा के लिए दो उदाहरण याद रखें।

ब्रिटेन: 1988 की 'Next Steps' रिपोर्ट ने सुझाव दिया कि नीति बनाने का काम मंत्रालय में रहे और सेवा पहुँचाने का काम अपने कर्मचारियों, रणनीति और नेतृत्व वाली कार्यकारी एजेंसियों (executive agencies) को सौंपा जाए। 1990 के दशक के मध्य तक सौ से अधिक एजेंसियाँ बन चुकी थीं। जुलाई 1991 में ब्रिटेन में नागरिक घोषणा-पत्र (Citizen's Charter) का श्वेत-पत्र आया।

न्यूज़ीलैंड: State Sector Act 1988 और Public Finance Act 1989 ने मिलकर नया ढाँचा बनाया। हर विभाग का अपना मुख्य कार्यकारी (chief executive) हुआ, जो विभाग के प्रदर्शन के लिए ज़िम्मेदार था और अलग रोज़गार-अनुबंध पर रखा गया। ध्यान आगत (input) मापने से हटकर निर्गत (output) पर गया। इसका एक अनचाहा नतीजा भी बताया जाता है: विभाग अलग-अलग द्वीपों की तरह काम करने लगे और आपसी सहयोग घटा।

1991 में हुड का लेख 'A Public Management for All Seasons?' (Public Administration, खंड 69, वसंत 1991, पृ. 3-19) छपा। 1992 में डेविड ओसबोर्न (David Osborne) और टेड गेबलर (Ted Gaebler) की पुस्तक Reinventing Government आई, जिसने 'सरकार को उद्यमशील बनाओ' का नारा लोकप्रिय किया।

समय-रेखा: NPM के पड़ाव

  1. 1970 के दशक का उत्तरार्ध

    OECD देशों में सुधार की लहर (हुड के अनुसार)

  2. 1988

    ब्रिटेन: Next Steps रिपोर्ट; न्यूज़ीलैंड: State Sector Act

  3. 1989

    न्यूज़ीलैंड: Public Finance Act

  4. 1991

    हुड का लेख; ब्रिटेन का Citizen's Charter (जुलाई); भारत की औद्योगिक नीति (24 जुलाई)

  5. 1992

    Osborne और Gaebler: Reinventing Government

  6. 1997

    भारत: मुख्यमंत्री सम्मेलन में 'Action Plan on Effective and Responsive Government' (मई)

  7. 2000

    Denhardt और Denhardt: New Public Service, 'serving rather than steering'

  8. 2004

    Hood और Peters: 'The Middle Aging of NPM: Into the Age of Paradox?'

  9. 2006

    भारत: राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NeGP) की मंज़ूरी (मई)

तारीख़ें हर बिंदु पर अलग-अलग स्रोत से जाँची गई हैं; स्रोत-सूची पेज के अंत में है।

हुड के अनुसार NPM के सात सिद्धांत (doctrines)

हुड का सिद्धांतसरल अर्थभारतीय उदाहरण (विश्लेषण)
1. हाथ में काम सँभालने वाला पेशेवर प्रबंध (hands-on professional management)काम की ज़िम्मेदारी किसी नामित, दिखाई देने वाले प्रबंधक की हो; अधिकार बिखरे न होंराजस्थान के सेवा-गारंटी क़ानून में हर सेवा के लिए 'नामित अधिकारी' (designated officer)
2. स्पष्ट मानक और प्रदर्शन-माप (explicit standards and measures)लक्ष्य लिखित हों और सफलता के संख्यात्मक पैमाने तय होंनागरिक घोषणा-पत्र में सेवा-मानक और समय-सीमा
3. निर्गत पर नियंत्रण (output controls)बजट और पुरस्कार प्रक्रिया की जगह नतीजे से जुड़ेंसेवा में देरी पर प्रतिदिन ₹250 जुर्माना (राजस्थान अधिनियम 2011)
4. इकाइयों का विघटन (disaggregation)बड़े एकीकृत विभाग को छोटी, प्रबंधनीय इकाइयों में बाँटनाब्रिटेन की Next Steps एजेंसियाँ; पासपोर्ट सेवा में अग्र-भाग (front-end) का अलग संचालन
5. अधिक प्रतिस्पर्धा (competition)अनुबंध और सार्वजनिक निविदा से लागत घटे और स्तर सुधरेPPP परियोजनाएँ; पासपोर्ट परियोजना का अनुबंध TCS को (2008)
6. निजी क्षेत्र की प्रबंध-शैली (private-sector styles)निजी क्षेत्र के आज़माए औज़ार सार्वजनिक सेवा में अपनानाकॉल-सेंटर, ऑनलाइन पोर्टल और मोबाइल ऐप से सेवा
7. अनुशासन और मितव्ययिता (discipline and parsimony)'कम में अधिक काम'; संसाधनों की माँग पर अंकुशलागत-प्रति-आवेदन जैसे मापों से बचत की जाँच (नीचे कार्य-उदाहरण)

सातों सिद्धांत हुड (1991) की तालिका से हैं; भारतीय उदाहरण का स्तंभ हमारा विश्लेषण है, हुड का कथन नहीं।

ओसबोर्न और गेबलर के दस सिद्धांत (Reinventing Government, 1992)

सिद्धांतमूल भाव
1. उत्प्रेरक सरकार (catalytic)चप्पू चलाने की जगह दिशा देना (steering rather than rowing)
2. समुदाय-स्वामित्व वाली सरकारसेवा देने की जगह समुदाय को सक्षम बनाना
3. प्रतिस्पर्धी सरकारसेवा-वितरण में प्रतिस्पर्धा लाना
4. मिशन-प्रेरित सरकारनियम-चालित संगठन को लक्ष्य-चालित बनाना
5. परिणामोन्मुख सरकारआगत नहीं, नतीजों को धन देना
6. ग्राहक-प्रेरित सरकारनौकरशाही की नहीं, ग्राहक की ज़रूरत पूरी करना
7. उद्यमशील सरकारकेवल ख़र्च नहीं, कमाई भी करना
8. पूर्वानुमान करने वाली सरकारइलाज से बेहतर रोकथाम
9. विकेंद्रित सरकारपदानुक्रम से भागीदारी और टीमवर्क की ओर
10. बाज़ार-उन्मुख सरकारबाज़ार के माध्यम से बदलाव लाना

याद रखने की युक्ति: हुड = 7 सिद्धांत (शैक्षिक विश्लेषण, 1991); ओसबोर्न-गेबलर = 10 सिद्धांत (व्यावहारिक नुस्खा, 1992)।

NPM की '3-ई': मितव्ययिता, दक्षता, प्रभावशीलता

मान लीजिए एक ज़िले का दफ़्तर राशन-कार्ड बनाता है। 3-ई इन तीन सवालों में बँटे हैं। मितव्ययिता (Economy): काग़ज़, कर्मचारी और कंप्यूटर कम से कम लागत पर जुटाए गए या नहीं (आगत की लागत घटाना)। दक्षता (Efficiency): इन्हीं आगतों से कितने कार्ड बने, यानी आगत को निर्गत में बदलने की दर। प्रभावशीलता (Effectiveness): जो कार्ड बने, उनसे असली लक्ष्य, यानी पात्र परिवारों तक अनाज पहुँचना, कितना पूरा हुआ।

ब्रिटेन का National Audit Office 'value for money' को संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग के रूप में परिभाषित करता है, जिसके तीन घटक यही तीन 'E' हैं। ICAI की परिभाषाएँ भी यही बात कहती हैं: आगत की लागत घटाना, आगत को सर्वश्रेष्ठ दर पर निर्गत बनाना और निवेश के स्तर पर सर्वश्रेष्ठ संभव परिणाम पाना। कुछ संस्थाएँ चौथा 'E' (Equity, समता) भी जोड़ती हैं, ताकि सबसे वंचित तक पहुँचना लागत-बचत के नीचे न दब जाए। यह चौथा E ही NPM की आलोचना का प्रवेश-द्वार भी है।

तुलना: परंपरागत लोक प्रशासन, NPA, NPM और NPS

बिंदुपरंपरागत लोक प्रशासननव लोक प्रशासन (NPA)नव लोक प्रबंध (NPM)नव लोक सेवा (NPS)
मुख्य ज़ोरनियम, पदानुक्रम, प्रक्रिया का पालनसामाजिक समता और समाज से प्रासंगिकतादक्षता, परिणाम, प्रतिस्पर्धासाझा जनहित और लोकतांत्रिक नागरिकता
नागरिक कौन हैआवेदक या लाभार्थीवंचित वर्ग, जिसके पक्ष में प्रशासन खड़ा होग्राहक (customer)नागरिक और साझेदार
सरकार की भूमिकासीधे सेवा देना और नियम लागू करनासमता सुनिश्चित करने वाला सक्रिय पक्षनिर्देशन (steering), अनुबंध और निगरानीसेवा करना (serving), संवाद और साझा मूल्य बनाना
सफलता का पैमानानियमों का पालनसामाजिक न्याय और समता3-ई और प्रदर्शन-संकेतकजनहित और बहु-स्तरीय जवाबदेही
मूल संदर्भस्थापित प्रशासनिक परंपराMinnowbrook सम्मेलन, 1968हुड (1991), ओसबोर्न-गेबलर (1992)Denhardt और Denhardt (2000)

NPA और NPS के अलग पेज बाद में आएँगे; यहाँ केवल तुलना के लिए छोटी पंक्तियाँ हैं। परंपरागत लोक प्रशासन वाला स्तंभ सार-रूप में हमारा विश्लेषण है।

एक दिन की मिसाल: पुराना ढर्रा बनाम NPM की सोच (काल्पनिक दृश्य)

एक ज़िले के सेवा-कार्यालय में सुबह दस बजे सौ लोग प्रमाण-पत्र के लिए कतार में हैं। पुराने ढर्रे में कार्यालय-प्रमुख की चिंता यह रहती है कि हर फ़ाइल पर सही हस्ताक्षर, सही मुहर और सही क्रम में टिप्पणी हो। उसे यह नहीं पूछा जाता कि कतार में खड़े व्यक्ति को कितने दिन लगे। फ़ाइल नियम से चले तो काम 'सही' माना जाता है, चाहे नागरिक को चार चक्कर लगाने पड़ें।

NPM की सोच में वही प्रमुख एक नामित प्रबंधक है। उसके सामने लिखित लक्ष्य है (जैसे 15 दिन में प्रमाण-पत्र), हर महीने का निर्गत-आँकड़ा है (कितने निपटे, कितने समय पर), काउंटर का संचालन ज़रूरत हो तो अनुबंध पर बाहर की एजेंसी को दिया जा सकता है, और देरी पर कर्मचारी की जवाबदेही तय है। फ़र्क़ यह है कि जवाबदेही प्रक्रिया से हटकर परिणाम की ओर चली गई। यही तीन शब्द उत्तर में दोहराएँ: लक्ष्य, मापन, जवाबदेही। इस दृश्य के पात्र और संख्या काल्पनिक हैं; इसे केवल समझने के लिए पढ़ें, उदाहरण के रूप में उत्तर में न लिखें।

भारत में NPM के रंग: पाँच उदाहरण

सावधानी: भारत ने कभी 'NPM अपनाने' की घोषणा नहीं की। नीचे के उदाहरण NPM के सिद्धांतों से मेल खाने वाले भारतीय क़दम हैं; यह मेल हमारा विश्लेषण है।

1. उदारीकरण (LPG सुधार, 1991): 24 जुलाई 1991 के औद्योगिक नीति वक्तव्य में चुनी हुई छोटी सूची को छोड़कर औद्योगिक लाइसेंसिंग समाप्त की गई, सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की सूची काफ़ी घटाई गई और चुने उद्योगों में 51 प्रतिशत तक विदेशी इक्विटी की स्वतः अनुमति मिली। यह सरकार की भूमिका सीमित करने और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की उसी हवा का हिस्सा था, जिसमें NPM पनपा।

2. नागरिक घोषणा-पत्र (Citizen's Charter): ब्रिटेन के जुलाई 1991 के घोषणा-पत्र से प्रेरित इस विचार पर भारत में केंद्र सरकार का पहला निर्देश दिसंबर 1996 में गया और मई 1997 के मुख्यमंत्री सम्मेलन में 'Action Plan on Effective and Responsive Government' अपनाया गया, जिसमें घोषणा-पत्र लागू करने, शिकायत-निवारण और विकेंद्रीकरण पर सिफ़ारिशें थीं। DARPG/IIPA की समीक्षा में पाया गया कि कई घोषणा-पत्रों में सेवा-मानक और शिकायत-निवारण की समय-सीमा नहीं थी और अधिकांश अंग्रेज़ी में थे। यानी मानक तय करने का सिद्धांत आया, पर अमल कमज़ोर रहा।

3. ई-गवर्नेंस: राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NeGP) को मई 2006 में मंज़ूरी मिली। दिसंबर 2010 की PIB विज्ञप्ति के अनुसार 86,000 से अधिक सामान्य सेवा केंद्र (CSC) खुल चुके थे। निजी उद्यमी के हाथ में सेवा-केंद्र देना निजी-शैली और प्रतिस्पर्धा का मेल है।

4. आउटसोर्सिंग और सरकारी-निजी भागीदारी (PPP): वित्त मंत्रालय के आर्थिक कार्य विभाग की 6 जनवरी 2026 की PIB विज्ञप्ति के अनुसार तीन वर्ष की PPP परियोजना पाइपलाइन में 852 परियोजनाएँ हैं, जिनकी कुल लागत ₹17 लाख करोड़ से अधिक है। सेवा-क्षेत्र का सबसे चर्चित उदाहरण पासपोर्ट सेवा है (नीचे केस स्टडी)।

5. राजस्थान: सेवा-गारंटी का क़ानूनी ढाँचा, जो नीचे 'राजस्थान का पहलू' में है।

आलोचना और विरोधाभास (2024 के प्रश्न की तैयारी)

हुड ने ख़ुद 1991 में NPM को 'ढीला शब्द' कहा और पूछा कि क्या यह सब ऋतुओं के लिए, यानी हर देश और हर राजनीतिक संदर्भ के लिए उपयुक्त है। Hood और Peters (2004) ने इसकी 'मध्य-आयु' पर लिखे लेख के शीर्षक में ही 'विरोधाभासों का युग' (age of paradox) का प्रश्न रखा। सुधारों के विश्लेषण पर Brookings की 2012 की पुस्तक की प्रस्तावना में भी यही चिंता मिलती है कि बदलावों ने अपेक्षित नतीजे नहीं दिए, कई बार अनचाहे परिणाम आए जो सरकारी संस्थाओं के बुनियादी मूल्यों को नुकसान पहुँचाते हैं, और निजी क्षेत्र के औज़ार राष्ट्रीय संदर्भ और उनकी सीमाएँ देखे बिना ले लिए गए।

परीक्षा के लिए पाँच विरोधाभास सूत्र-रूप में (विश्लेषण; स्रोतों से मिली चिंताओं का हमारा संयोजन):

(क) स्वायत्तता बनाम नियंत्रण: प्रबंधक को अधिक स्वतंत्रता देने की बात होती है, पर माप, मानक और ऑडिट बढ़ने से नियंत्रण भी बढ़ता है।

(ख) विघटन बनाम तालमेल: इकाइयाँ अलग करने से हर इकाई कुशल होती है, पर साझा समस्याओं पर सहयोग घटता है। न्यूज़ीलैंड में ठीक यही अनुभव बताया गया।

(ग) ग्राहक बनाम नागरिक: ग्राहक पैसा देकर माँग करता है; नागरिक के अधिकार और कर्तव्य, दोनों होते हैं। वंचित व्यक्ति 'लाभदायक ग्राहक' न हो तो उपेक्षित हो सकता है।

(घ) लक्ष्य-पूर्ति बनाम गुणवत्ता: जब पुरस्कार संख्या से जुड़ते हैं तो कर्मचारी संख्या बढ़ाने पर ध्यान देते हैं, गुणवत्ता गिर सकती है। Brookings की प्रस्तावना में निजी क्षेत्र से लाई प्रदर्शन-आधारित वेतन पद्धतियों का प्रभाव सार्वजनिक क्षेत्र में कमज़ोर बताया गया है।

(ङ) दक्षता बनाम जवाबदेही: अनुबंध पर सेवा देने वाली एजेंसी की जवाबदेही मतदाता के प्रति सीधी नहीं होती; शिकायत किसके पास जाए, यह अस्पष्ट हो सकता है।

भारत के संदर्भ में एक और सीमा: विकासशील देश में संस्थागत क्षमता, डिजिटल पहुँच और साक्षरता असमान है, इसलिए निजी-क्षेत्र वाली सीधी नक़ल जोखिम भरी हो सकती है। इसी चिंता से 'नव लोक सेवा' और सुशासन की ओर लौटने की माँग उठी।

एक नज़र में: NPM

नव लोक प्रबंध (NPM)

उत्पत्ति

  • 1970 के दशक का उत्तरार्ध, OECD
  • ब्रिटेन: Next Steps 1988
  • न्यूज़ीलैंड: 1988-89 के क़ानून

सिद्धांत

  • हुड के 7
  • ओसबोर्न-गेबलर के 10
  • 3-ई

भारतीय उदाहरण

  • LPG 1991
  • नागरिक घोषणा-पत्र 1997
  • NeGP 2006
  • PPP, पासपोर्ट सेवा
  • राजस्थान सेवा-गारंटी 2011

आलोचना

  • स्वायत्तता बनाम नियंत्रण
  • विघटन बनाम तालमेल
  • ग्राहक बनाम नागरिक
  • संख्या बनाम गुणवत्ता
  • दक्षता बनाम जवाबदेही

तुलना

  • परंपरागत PA: नियम
  • NPA: समता
  • NPS: serving, steering नहीं
उत्तर के लिए पाँच शाखाएँ: उत्पत्ति, सिद्धांत, भारतीय उदाहरण, आलोचना, तुलना।

मुख्य तथ्य

हुड का लेख
Public Administration, खंड 69, पृ. 3-19, वसंत 1991 (सात सिद्धांत)
ओसबोर्न-गेबलर की पुस्तक
Reinventing Government, 1992 (दस सिद्धांत)
Hood और Peters
JPART खंड 14, अंक 3, पृ. 267-282, 2004
ब्रिटेन: Next Steps
1988 की रिपोर्ट; 1990 के दशक के मध्य तक सौ से अधिक कार्यकारी एजेंसियाँ
न्यूज़ीलैंड
State Sector Act 1988 और Public Finance Act 1989
भारत की औद्योगिक नीति
24 जुलाई 1991 (लाइसेंसिंग समाप्त, 51 प्रतिशत तक FDI स्वतः मंज़ूरी)
नागरिक घोषणा-पत्र: भारत
केंद्र का पहला निर्देश दिसंबर 1996; मुख्यमंत्री सम्मेलन मई 1997
राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना
मई 2006 में मंज़ूरी
पासपोर्ट परियोजना
अनुबंध 13 अक्टूबर 2008; 77 PSK का देशव्यापी रोल-आउट जून 2012
राजस्थान सेवा-गारंटी अधिनियम
अधिनियम सं. 23 of 2011; राज्यपाल की स्वीकृति 21 सितंबर 2011
अंतिम जाँच
1 अक्टूबर 2026

राजस्थान का पहलू

राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदाय की गारंटी अधिनियम, 2011 (अधिनियम सं. 23; राज्यपाल की स्वीकृति 21 सितंबर 2011) में अधिसूचित सेवा निर्धारित समय-सीमा में देने की बाध्यता है। India Code में उपलब्ध पाठ के अनुसार नामित अधिकारी को आवेदन की लिखित पावती देनी होती है; अस्वीकृति या समय-सीमा बीतने के 30 दिन के भीतर प्रथम अपील और उसके निर्णय के 60 दिन के भीतर द्वितीय अपील हो सकती है; देरी पर ₹250 प्रतिदिन का जुर्माना है, जो ₹5,000 से अधिक नहीं होगा। 2013 के संशोधन (अधिनियम सं. 36, स्वीकृति 15 सितंबर 2013) ने 'Commission for Guaranteed Delivery of Public Services' के गठन का प्रावधान जोड़ा, जिसमें द्वितीय अपील के निर्णय के 60 दिन के भीतर पुनरीक्षण किया जा सकता है। NPM से जोड़ (विश्लेषण): यह निर्गत-मानक, नामित जवाबदेह अधिकारी और दंड, तीनों का मेल है। जानकारी 1 अक्टूबर 2026 को देखी गई; अधिनियम के लागू होने की तारीख़ यहाँ नहीं दी गई, क्योंकि आधिकारिक स्रोतों में वह अलग-अलग मिलती है।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • 3-ई में Economy, Efficiency, Effectiveness लिखें। Equity या Ethics को तीसरा E न बनाएँ; Equity चौथा E है जो आलोचना के संदर्भ में जोड़ा जाता है।
  • NPM को केवल 'निजीकरण' न लिखें। हुड के सात सिद्धांतों में निजी-शैली एक है; बाक़ी लक्ष्य, मापन, विघटन, प्रतिस्पर्धा और मितव्ययिता हैं।
  • हुड (1991, सात सिद्धांत) और ओसबोर्न-गेबलर (1992, दस सिद्धांत) को मिलाएँ नहीं। 'steering rather than rowing' ओसबोर्न-गेबलर का पहला सिद्धांत है।
  • 'भारत ने NPM अपनाया' जैसा सीधा वाक्य न लिखें। लिखें कि अमुक सुधार NPM के अमुक सिद्धांत से मेल खाता है।
  • 20 अंक के उत्तर में सिर्फ़ गुण न गिनाएँ। 'सरकारी प्रशासन में उपयोगिता' माँगी गई है, इसलिए उपयोग और सीमा, दोनों पर उदाहरण दें।
  • आलोचना में काल्पनिक आँकड़े न दें; पासपोर्ट सेवा का 99.5 प्रतिशत संतुष्टि-आँकड़ा सरकार की अपनी रिपोर्ट का है, यह बताना न भूलें।