परिचय
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि RAS प्रारंभिक परीक्षा के अर्थशास्त्र खंड का सबसे व्यापक व सर्वाधिक भारांकित विषय है, क्योंकि यह इतिहास (हरित क्रांति, भूमि सुधार), संस्थागत ढाँचा (APMC, e-NAM, MSP, NABARD) और नवीनतम योजनाओं (PM-KISAN, PMFBY, कृषोन्नति योजना) — तीनों को एक साथ जोड़ता है। भारत की लगभग आधी कार्यशील जनसंख्या (46.1%) आजीविका के लिए कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों पर निर्भर है, जबकि सकल मूल्य वर्धन (GVA) में इसका योगदान मात्र लगभग एक-पंचमांश (लगभग 20%) है — यह असंतुलन "छिपी बेरोज़गारी" (Disguised Unemployment) एवं निम्न कृषि उत्पादकता की समस्या को दर्शाता है, जो परीक्षा में बार-बार पूछा जाने वाला तथ्य है। स्वतंत्रता के बाद से भारतीय कृषि नीति दो समानांतर धाराओं में आगे बढ़ी है — संस्थागत सुधार (भूमि-स्वामित्व, विपणन, साख, बीमा से जुड़े) और तकनीकी प्रगति (उन्नत बीज, सिंचाई, यंत्रीकरण, डिजिटल कृषि) — और वर्तमान सरकारी रणनीति (कृषोन्नति योजना, PM धन-धान्य कृषि योजना, दलहन आत्मनिर्भरता मिशन) इन दोनों धाराओं को एक साथ आगे बढ़ाने पर केंद्रित है।
मुख्य अवधारणाएँ
1. भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का स्थान
कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र (फसल उत्पादन, पशुपालन, मत्स्य पालन, वानिकी) भारत की राष्ट्रीय आय में लगभग 18-20% का योगदान देते हैं, लेकिन देश के 46.1% कार्यबल को रोज़गार प्रदान करते हैं। यह असंतुलन दर्शाता है कि कृषि क्षेत्र में प्रति व्यक्ति उत्पादकता अन्य क्षेत्रों (उद्योग, सेवा) की तुलना में काफी कम है, और अतिरिक्त श्रम-शक्ति खेतों पर "छिपी बेरोज़गारी" के रूप में बनी रहती है। हाल के वर्षों में फसल क्षेत्र (Crop Sector) की तुलना में संबद्ध क्षेत्र — विशेषकर मत्स्य पालन (8.8% वृद्धि दर) एवं पशुपालन (7-7.4% वृद्धि दर) — कहीं अधिक तेज़ गति से बढ़ रहे हैं, इसीलिए इन्हें "कृषि विकास के नए इंजन" कहा जाता है। भारत आज विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है (247.87 मिलियन टन), अंडा उत्पादन में द्वितीय तथा मांस उत्पादन में चतुर्थ स्थान रखता है। कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र की औसत वार्षिक वृद्धि दर पिछले पाँच वर्षों में लगभग 4.4% रही है, जबकि दशकवार वृद्धि दर (2016-25) 4.45% के साथ पिछले कई दशकों में सर्वाधिक रही है — फिर भी यह दर देश की समग्र GDP वृद्धि दर से पीछे रहती है, जिससे कृषि व गैर-कृषि क्षेत्र के बीच की खाई और चौड़ी होती जाती है।
2. फसल पद्धति (Cropping Pattern) की मौसमी संरचना
भारतीय कृषि तीन प्रमुख फसल-ऋतुओं में विभाजित है। खरीफ फसलें दक्षिण-पश्चिम मानसून के साथ जून-जुलाई में बोई जाती हैं और सितंबर-अक्टूबर में काटी जाती हैं — इनमें धान, मक्का, बाजरा, ज्वार, कपास, गन्ना, सोयाबीन तथा अरहर (तुअर) प्रमुख हैं। रबी फसलें अक्टूबर-नवंबर में बोई जाती हैं तथा मार्च-अप्रैल में काटी जाती हैं, इनके लिए शीत ऋतु व सिंचाई आवश्यक होती है — गेहूँ, जौ, चना, सरसों तथा मटर इसके प्रमुख उदाहरण हैं। जायद फसलें रबी व खरीफ के मध्य की छोटी अवधि (मार्च-जून) में उगाई जाती हैं और पूर्णतः सिंचाई पर निर्भर होती हैं — तरबूज, खीरा तथा हरी सब्जियाँ इसके उदाहरण हैं। भारत में शस्य गहनता (Cropping Intensity) — यानी वर्ष में एक ही भूमि पर कितनी बार फसल उगाई जाती है — सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के साथ लगातार बढ़ रही है, जो कृषि उत्पादकता बढ़ाने की प्रमुख रणनीतियों में से एक है।
3. हरित क्रांति (Green Revolution)
1960 के दशक के मध्य में भारत गंभीर खाद्यान्न संकट व आयात-निर्भरता (विशेषकर PL-480 के तहत अमेरिकी गेहूँ आयात) से जूझ रहा था। इस संकट के समाधान हेतु 1966-67 में हरित क्रांति की शुरुआत हुई, जिसका श्रेय मुख्यतः कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन (भारत में) तथा नॉर्मन बोरलॉग (मैक्सिको में उच्च उपज किस्मों — HYV — के जनक) को दिया जाता है। हरित क्रांति की रणनीति के तीन मुख्य स्तंभ थे — उच्च उत्पादकता वाले उन्नत बीज (HYV), रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों का व्यापक प्रयोग, तथा सुनिश्चित सिंचाई। इसका सर्वाधिक लाभ गेहूँ व चावल की उपज में हुआ, तथा पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश इसके सबसे बड़े लाभार्थी क्षेत्र बने — इसीलिए इन्हें भारत का "अन्न भंडार" (Food Bowl) कहा जाता है। हरित क्रांति के कारण भारत खाद्यान्न आयातक से आत्मनिर्भर (और बाद में निर्यातक) देश बना, परंतु इसकी कुछ गंभीर सीमाएँ भी उजागर हुईं — क्षेत्रीय असंतुलन (पूर्वी व वर्षा-सिंचित क्षेत्र पीछे रह गए), फसल विविधता में कमी (गेहूँ-चावल चक्र पर अति-निर्भरता), भूजल स्तर में तीव्र गिरावट, तथा अत्यधिक रासायनिक प्रयोग से मृदा स्वास्थ्य को क्षति। इन्हीं सीमाओं को दूर करने हेतु अब "सदाबहार क्रांति" (Evergreen Revolution) व सतत कृषि (Sustainable Agriculture) पर बल दिया जा रहा है, जिसमें जलवायु-अनुकूल (Climate-Resilient) बीज, प्राकृतिक/जैविक खेती तथा फसल विविधीकरण को प्राथमिकता दी जा रही है।
4. भूमि सुधार (Land Reforms)
भूमि सुधार का उद्देश्य केवल भूमि-स्वामित्व बदलना नहीं, बल्कि उत्पादन-संबंधों (Relations of Production) में बदलाव लाकर वास्तविक जोतकर्ता (Actual Tiller) को भूमि पर अधिकार व सुरक्षा प्रदान करना है। स्वतंत्रता के बाद इसके चार प्रमुख घटक रहे — बिचौलियों (जमींदारी प्रथा) का उन्मूलन, जिसके तहत 1950 के दशक में जमींदार, जागीरदार व ज़ैलदार जैसे मध्यस्थ वर्गों को समाप्त कर काश्तकारों को सीधे राज्य से जोड़ा गया; काश्तकारी सुधार (Tenancy Reform), जिसमें किरायेदार किसानों को उचित लगान व स्थायी काश्तकारी अधिकार (Security of Tenure) दिए गए तथा "जोतो वही जो बोए" (Land to the Tiller) के सिद्धांत को लागू करने का प्रयास हुआ; भूमि जोत सीमा कानून (Land Ceiling Acts), जिसके अंतर्गत प्रत्येक परिवार के पास रखी जा सकने वाली अधिकतम कृषि भूमि की सीमा तय की गई तथा अधिशेष भूमि भूमिहीनों में वितरित की गई; और जोतों का समेकन (Consolidation of Holdings), जिसके तहत बिखरे हुए छोटे-छोटे भूखंडों को एक साथ मिलाकर बड़ी व सुसंगत जोतों में बदला गया, ताकि यंत्रीकरण व सिंचाई कुशलता से हो सके। भूमि सुधार के क्रियान्वयन में राज्यवार भारी असमानता रही — केरल व पश्चिम बंगाल में यह अपेक्षाकृत सफल रहा जबकि कई राज्यों में कानूनी खामियों व राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह अधूरा रह गया। वर्तमान में भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण व स्पष्ट स्वामित्व हेतु स्वामित्व योजना (SVAMITVA) जैसी पहलें ग्रामीण भूमि प्रबंधन को आधुनिक बना रही हैं।
5. सिंचाई एवं जल प्रबंधन
भारत की खेती योग्य भूमि का एक बड़ा भाग आज भी मानसून पर निर्भर है, इसलिए सुनिश्चित सिंचाई कृषि उत्पादकता बढ़ाने की सबसे बुनियादी शर्त मानी जाती है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) का उद्देश्य "हर खेत को पानी" (Water to Every Field) तथा "पर ड्रॉप मोर क्रॉप" (Per Drop More Crop) — यानी उपलब्ध जल की एक-एक बूँद से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना है। इसके अंतर्गत ड्रिप व स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई (Micro-Irrigation) तकनीकों को बढ़ावा दिया जाता है, जो परंपरागत बाढ़ सिंचाई (Flood Irrigation) की तुलना में जल की काफी बचत करती हैं। सिंचाई के प्रमुख स्रोतों में नहरें, कुएँ व नलकूप (Tube Wells), तालाब तथा अन्य स्रोत शामिल हैं — नलकूप सिंचाई वर्तमान में सबसे प्रमुख स्रोत है, विशेषकर उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में, परंतु इसके अत्यधिक दोहन से भूजल स्तर में निरंतर गिरावट एक गंभीर पर्यावरणीय चिंता बनी हुई है।
6. कृषि विपणन सुधार — APMC एवं e-NAM
स्वतंत्रता के बाद किसानों को शोषण से बचाने हेतु राज्यों ने कृषि उत्पाद विपणन समिति (APMC) अधिनियम लागू किए, जिसके तहत किसानों को अपनी उपज केवल अधिसूचित मंडियों में ही लाइसेंसधारी बिचौलियों के माध्यम से बेचने की बाध्यता थी। यद्यपि इसका उद्देश्य उचित मूल्य व पारदर्शी नीलामी सुनिश्चित करना था, व्यवहार में यह व्यवस्था एकाधिकार (Cartelization), ऊँचा कमीशन, तथा किसानों की सीमित बाज़ार पहुँच जैसी समस्याओं का कारण बनी — कृषि विपणन राज्य सूची (State List) का विषय होने के कारण एक समान अंतर-राज्यीय बाज़ार का अभाव भी बना रहा। इन समस्याओं के समाधान हेतु 14 अप्रैल 2016 को राष्ट्रीय कृषि बाज़ार (e-NAM) का शुभारंभ किया गया — यह एक अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है, जो देशभर की APMC मंडियों को एक साझा ऑनलाइन नेटवर्क से जोड़कर किसानों को अपनी उपज कहीं से भी, किसी भी पंजीकृत खरीदार को, पारदर्शी ई-नीलामी के माध्यम से बेचने की सुविधा देता है; इसे लघु कृषक कृषि व्यापार संघ (SFAC) द्वारा क्रियान्वित किया जाता है। सुधारों को और आगे बढ़ाने हेतु केंद्र सरकार ने मॉडल APMC अधिनियम व मॉडल कृषि उत्पाद एवं पशुधन विपणन (संवर्धन एवं सरलीकरण) अधिनियम, 2017 राज्यों को परामर्शी रूप में भेजे तथा किसान उत्पादक संगठनों (FPO) — जो छोटे किसानों को संगठित कर सामूहिक सौदेबाज़ी व बेहतर बाज़ार पहुँच प्रदान करते हैं — के गठन व संवर्धन को व्यापक प्रोत्साहन दिया, जिसके अंतर्गत देशभर में 10,000 FPO गठित करने का लक्ष्य रखा गया है।
7. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)
न्यूनतम समर्थन मूल्य वह गारंटीकृत मूल्य है जिस पर सरकार किसानों से उनकी उपज सीधे खरीदने की प्रतिबद्धता जताती है, ताकि बाज़ार भाव गिरने की स्थिति में भी किसानों को लाभकारी मूल्य सुनिश्चित हो सके। MSP की सिफारिश कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) करता है तथा अंतिम स्वीकृति आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) देती है — वर्तमान में 23 प्रमुख फसलों (7 अनाज, 5 दलहन, 7 तिलहन तथा 4 वाणिज्यिक फसलें) के लिए प्रत्येक फसल-मौसम पूर्व MSP घोषित किया जाता है। MSP निर्धारण की लागत-गणना पद्धति पर लंबे समय से बहस रही है — CACP परंपरागत रूप से A2+FL लागत (वास्तविक भुगतान किया गया नकद व्यय + पारिवारिक श्रम का अनुमानित मूल्य) के आधार पर सिफारिश करता रहा है, जबकि डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय किसान आयोग (2004-06) ने C2 लागत (जिसमें भूमि व स्थायी पूँजी पर काल्पनिक ब्याज व किराया भी शामिल होता है) पर कम-से-कम 50% लाभ जोड़कर MSP तय करने की सिफारिश की थी — यह "स्वामीनाथन फॉर्मूला" आज भी किसान आंदोलनों की केंद्रीय माँगों में से एक है। MSP पर वास्तविक खरीद मुख्यतः भारतीय खाद्य निगम (FCI) तथा राज्य एजेंसियों द्वारा होती है, जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) व बफर स्टॉक हेतु अनाज खरीदती हैं — परंतु व्यवहार में गेहूँ व चावल की खरीद पंजाब, हरियाणा जैसे कुछ ही राज्यों में केंद्रित रहने के कारण अन्य राज्यों के किसानों तक MSP का लाभ सीमित रूप से पहुँचता है।
8. किसान आय सहायता एवं जोखिम प्रबंधन योजनाएँ
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN), फरवरी 2019 में आरंभ, एक केंद्रीय क्षेत्र योजना है जिसके तहत पात्र भूमिधारक किसान परिवारों को प्रतिवर्ष ₹6,000 की राशि तीन बराबर किस्तों (₹2,000 प्रत्येक) में सीधे बैंक खातों में स्थानांतरित की जाती है — अब तक 9.44 करोड़ से अधिक लाभार्थी परिवारों को ₹3 लाख करोड़ से अधिक की संचयी राशि हस्तांतरित की जा चुकी है। इसके पूरक स्वरूप प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना (PM-KMY) एक ऐच्छिक एवं अंशदायी पेंशन योजना है, जो 60 वर्ष की आयु पूर्ण करने पर लघु व सीमांत किसानों को ₹3,000 प्रतिमाह की सुनिश्चित पेंशन प्रदान करती है। फसल जोखिम प्रबंधन हेतु 2016 में शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) प्राकृतिक आपदाओं, कीट-प्रकोप व मौसम की अनिश्चितता से होने वाली फसल हानि के विरुद्ध किफायती एवं व्यापक बीमा कवरेज उपलब्ध कराती है — यह "एक राज्य, एक फसल, एक प्रीमियम" के सिद्धांत पर आधारित है तथा बुवाई-पूर्व से कटाई-उपरांत तक की संपूर्ण फसल-चक्र अवधि को कवर करती है; अब तक इसके अंतर्गत 92.5 करोड़ से अधिक बीमित आवेदनों पर ₹1.96 लाख करोड़ के दावों का भुगतान किया जा चुका है।
9. कृषि साख (Agricultural Credit)
कृषि साख को संस्थागत (Institutional) व गैर-संस्थागत (Non-Institutional — साहूकार, महाजन) स्रोतों में बाँटा जाता है, तथा स्वतंत्रता के बाद से नीति का प्रमुख लक्ष्य किसानों को शोषणकारी गैर-संस्थागत साख से मुक्त कर सस्ती व समय पर संस्थागत साख उपलब्ध कराना रहा है। राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (NABARD), जिसकी स्थापना 1982 में हुई, कृषि व ग्रामीण साख के लिए शीर्ष पुनर्वित्त (Refinance) संस्था है, जो सहकारी बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRB) व वाणिज्यिक बैंकों को कृषि ऋण हेतु पुनर्वित्त सुविधा प्रदान करती है। किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना, 1998 में शुरू, किसानों को फसल उत्पादन, फसलोत्तर व्यय तथा घरेलू आवश्यकताओं हेतु लचीली एवं सरलीकृत साख उपलब्ध कराती है — इसके अंतर्गत ब्याज अनुदान योजना (Interest Subvention Scheme) के तहत अल्पकालिक फसल ऋण पर प्रभावी ब्याज दर घटाकर किसानों को समय पर ऋण चुकाने पर अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जाता है। प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (Priority Sector Lending) प्रावधानों के अंतर्गत सभी वाणिज्यिक बैंकों के लिए कृषि क्षेत्र को न्यूनतम निर्धारित प्रतिशत ऋण देना अनिवार्य किया गया है।
10. खाद्य प्रसंस्करण एवं राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम
खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र कृषि को उद्योग से जोड़ने वाली कड़ी है — यह फसलोत्तर हानि (Post-Harvest Loss) घटाने के साथ-साथ उपज में मूल्य संवर्धन (Value Addition) कर किसानों की आय बढ़ाने का सशक्त माध्यम है। इस दिशा में प्रधानमंत्री किसान सम्पदा योजना (PM Kisan SAMPADA Yojana) कोल्ड चेन अवसंरचना व प्रसंस्करण क्षमता को सुदृढ़ करती है, जबकि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग हेतु उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना घरेलू विनिर्माण व वैश्विक ब्रांड निर्माण को बढ़ावा देती है। खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 एक ऐतिहासिक कानून है, जो सस्ते खाद्यान्न को कल्याणकारी योजना (Welfare Scheme) से वैधानिक अधिकार (Legal Right) का दर्जा देता है — यह देश की लगभग 75% ग्रामीण तथा 50% शहरी जनसंख्या को लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) के माध्यम से अत्यंत रियायती दरों (₹1-3 प्रति किलो) पर प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 5 किलोग्राम खाद्यान्न (गेहूँ, चावल, मोटा अनाज) पाने का कानूनी अधिकार प्रदान करता है, तथा अंत्योदय अन्न योजना के तहत सर्वाधिक निर्धन परिवारों को इससे भी अधिक रियायत मिलती है।
महत्वपूर्ण तथ्य
- कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र का GVA में योगदान लगभग 18-20%, परंतु रोज़गार में योगदान 46.1% — यह असंतुलन "छिपी बेरोज़गारी" का प्रमाण है।
- हरित क्रांति 1966-67 में शुरू; डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन (भारत) व नॉर्मन बोरलॉग (उच्च उपज बीज के जनक); सर्वाधिक लाभ पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश को।
- भूमि सुधार के चार स्तंभ: बिचौलियों का उन्मूलन, काश्तकारी सुधार, भूमि सीमा कानून, जोतों का समेकन।
- e-NAM का शुभारंभ 14 अप्रैल 2016; क्रियान्वयन एजेंसी — SFAC; कृषि विपणन राज्य सूची का विषय है।
- MSP: CACP सिफारिश करता है, CCEA स्वीकृति देती है; वर्तमान में 23 फसलें कवर; स्वामीनाथन फॉर्मूला — C2+50%।
- PM-KISAN: ₹6,000/वर्ष, 3 किस्तों में; 2019 से आरंभ; 9.44 करोड़+ लाभार्थी परिवार।
- PMFBY: 2016 से आरंभ; "एक राज्य, एक फसल, एक प्रीमियम"; ₹1.96 लाख करोड़ के दावे भुगतान।
- NABARD की स्थापना 1982; KCC योजना 1998 से; NFSA 2013 — 75% ग्रामीण व 50% शहरी जनसंख्या कवर।
- खाद्यान्न उत्पादन (2024-25): 3577.3 लाख मीट्रिक टन, पिछले वर्ष से 254.3 लाख मीट्रिक टन अधिक।
परीक्षा टिप्स
- हरित क्रांति के "क्या हुआ" (उत्पादन वृद्धि) और "क्या नहीं हुआ" (क्षेत्रीय असंतुलन, भूजल संकट, फसल विविधता की कमी) — दोनों पहलू याद रखें, प्रश्न प्रायः आलोचनात्मक दृष्टिकोण से पूछे जाते हैं।
- MSP की गणना पद्धति (A2+FL बनाम C2) तथा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश (C2+50%) एक अति-लोकप्रिय व बार-बार पूछा जाने वाला प्रश्न-क्षेत्र है।
- योजनाओं के आरंभ वर्ष व राशि/किस्त-संख्या को ध्यान से याद रखें — PM-KISAN (2019, ₹6000/3 किस्तें), PMFBY (2016), e-NAM (2016) परस्पर आसानी से गड़बड़ा जाते हैं।
- कृषि विपणन (APMC/e-NAM) राज्य सूची का विषय है जबकि कृषि साख व मूल्य नीति (MSP, NABARD) केंद्र सरकार से जुड़ी है — यह संवैधानिक भेद परीक्षा में महत्वपूर्ण है।
"भूमि-साख-विपणन-बीमा से संस्थागत मज़बूती, बीज-सिंचाई-यंत्र-डिजिटल से तकनीकी मज़बूती" — भूमि सुधार, कृषि साख, विपणन सुधार व फसल बीमा को संस्थागत पहलू के रूप में तथा HYV बीज, सिंचाई, यंत्रीकरण व डिजिटल कृषि को तकनीकी पहलू के रूप में एक साथ याद रखें — RAS के अधिकांश योजना-आधारित प्रश्न इन्हीं आठ स्तंभों में से किसी एक में फिट होते हैं।
MSP और वास्तविक सरकारी खरीद (Procurement) को अक्सर एक समझ लिया जाता है, जबकि दोनों अलग हैं। MSP केवल एक घोषित न्यूनतम मूल्य की गारंटी है, जिस पर सरकार खरीदने की प्रतिबद्धता जताती है — इसे पाने का कानूनी अधिकार किसान को स्वतः प्राप्त नहीं होता। वास्तविक खरीद (Procurement) FCI व राज्य एजेंसियों द्वारा सीमित मात्रा में, सीमित फसलों (मुख्यतः गेहूँ-चावल) की तथा सीमित राज्यों (पंजाब, हरियाणा प्रमुख) में केंद्रित होकर होती है — इसीलिए 23 फसलों के लिए MSP घोषित होने पर भी वास्तविक लाभ बहुत असमान रूप से बँटता है। त्वरित पहचान: "MSP = घोषणा, Procurement = क्रियान्वयन।"
Q1. हरित क्रांति की शुरुआत किस वर्ष हुई तथा इसके सबसे बड़े लाभार्थी राज्य कौन-से रहे?
✅ 1966-67 में; सर्वाधिक लाभ पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश को हुआ।
Q2. स्वामीनाथन आयोग ने MSP निर्धारण हेतु कौन-सा फॉर्मूला सुझाया था?
✅ C2 लागत (भूमि व पूँजी पर काल्पनिक ब्याज सहित) पर कम-से-कम 50% लाभ जोड़कर MSP तय करने की सिफारिश — "C2+50% फॉर्मूला"।
Q3. e-NAM पोर्टल कब शुरू हुआ और इसे कौन-सी एजेंसी क्रियान्वित करती है?
✅ 14 अप्रैल 2016; क्रियान्वयन एजेंसी — लघु कृषक कृषि व्यापार संघ (SFAC)।
Q4. PM-KISAN योजना के तहत किसानों को कितनी राशि, कितनी किस्तों में मिलती है?
✅ ₹6,000 प्रतिवर्ष, तीन बराबर किस्तों (₹2,000 प्रत्येक) में, सीधे बैंक खाते में।
Q5. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 किस प्रतिशत ग्रामीण व शहरी जनसंख्या को कवर करता है?
✅ लगभग 75% ग्रामीण जनसंख्या तथा 50% शहरी जनसंख्या।
सारांश
भारतीय कृषि आज भी सबसे बड़ी आजीविका-प्रदाता है, भले ही राष्ट्रीय आय में इसका हिस्सा घटता जा रहा हो — यह असंतुलन ही RAS परीक्षा के लिए इस विषय को सर्वाधिक महत्वपूर्ण बनाता है। हरित क्रांति (1966-67) व भूमि सुधारों ने उत्पादन-आधार तैयार किया, जबकि APMC/e-NAM जैसे विपणन सुधार, MSP व CACP का मूल्य-समर्थन तंत्र, NABARD-KCC आधारित संस्थागत साख, तथा PM-KISAN, PMFBY व NFSA जैसी कल्याणकारी योजनाएँ किसान की आय-सुरक्षा व खाद्य-सुरक्षा दोनों सुनिश्चित करती हैं। परीक्षा की दृष्टि से हरित क्रांति की उपलब्धियाँ व सीमाएँ, MSP की गणना-पद्धति, तथा प्रमुख योजनाओं के आरंभ-वर्ष व मुख्य प्रावधान — इन तीनों पर सर्वाधिक ध्यान केंद्रित करना सबसे फलदायी रणनीति है।
⚡ त्वरित रिवीजन — One-Liners
- •GDP = C + I + G + (X−M); यह एक वर्ष में देश की सीमा के भीतर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य है।
- •भारत की पहली पंचवर्षीय योजना 1951-56 में 'हैरोड-डोमर' मॉडल पर आधारित थी।
- •RBI की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को हुई; 1949 में राष्ट्रीयकरण; मुख्यालय मुंबई।
- •भारत में GST 1 जुलाई 2017 से लागू; 101वें संशोधन (2016)।
- •GDP = देश की भौगोलिक सीमा के भीतर एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं/सेवाओं का बाजार मूल्य।