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📚 आर्थिक अवधारणाएं एवं भारतीय अर्थव्यवस्था

आर्थिक सुधार 1991 — LPG (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण)

Economic Reforms 1991 — LPG (Liberalization, Privatization, Globalization)

12 मिनटintermediate✓ अपडेटेड: अगस्त 2026· Economic Concepts and Indian Economy

परिचय

सुधार (Reforms) यानी 1991 के आर्थिक सुधार, RAS प्रारंभिक परीक्षा के आर्थिक भाग में सबसे अधिक बार पूछा जाने वाला विषय है, क्योंकि यह भारत के आधुनिक आर्थिक इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ है। 24 जुलाई 1991 को प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव एवं वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में लागू की गई नई आर्थिक नीति (New Economic Policy — NEP), 1991 ने भारत को दशकों पुरानी लाइसेंस-परमिट राज व्यवस्था से बाहर निकालकर एक खुली, बाज़ार-उन्मुख अर्थव्यवस्था की दिशा में मोड़ा। इस नीति को संक्षेप में LPG मॉडल — उदारीकरण (Liberalization), निजीकरण (Privatization) एवं वैश्वीकरण (Globalization) — कहा जाता है। ध्यान रहे कि यह विषय 2014 के बाद के "हाल के सुधारों" (Recent Reforms — GST, IBC, PLI आदि किसी अन्य नोट में शामिल) से भिन्न है; यहाँ केंद्र-बिंदु 1991 का संकट, उसकी तात्कालिक प्रतिक्रिया और 1990-2000 के दशक की सुधार-लहरें हैं।

मुख्य अवधारणाएँ

1. पृष्ठभूमि — 1991 का भुगतान संतुलन संकट (Balance of Payments Crisis)

1991 तक भारत की अर्थव्यवस्था एक गंभीर बहु-आयामी संकट में फँस चुकी थी। सबसे तात्कालिक समस्या थी भुगतान संतुलन संकट — विदेशी मुद्रा भंडार इतना घट गया था कि वह मुश्किल से दो-तीन सप्ताह के आयात बिल को ही पूरा कर सकता था। इसके पीछे कई परस्पर-जुड़े कारण थे। पहला, वर्षों से लगातार बढ़ते सरकारी व्यय एवं सब्सिडी के कारण उच्च राजकोषीय घाटा बना हुआ था। दूसरा, सार्वजनिक ऋण GDP के अनुपात में लगभग 30% से बढ़कर 53% तक जा पहुँचा था, जिसने ऋण-चुकौती का बोझ असहनीय बना दिया। तीसरा, खाड़ी युद्ध (1990-91) के कारण तेल की कीमतों में तीव्र उछाल आया, जिससे आयात बिल और भारी हो गया, जबकि खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीय श्रमिकों की प्रेषण-आय (remittances) भी बाधित हुई। इन सबके परिणामस्वरूप संकट इतना गहरा हो गया कि भारत को अपने लगभग 67 टन सोने के भंडार को बैंक ऑफ इंग्लैंड व यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड के पास गिरवी रखना पड़ा — इसे "स्वर्ण गिरवी संकट" कहा जाता है, जो उस समय की आर्थिक विवशता का सबसे मार्मिक प्रतीक बना।

इस संकट से पहले का दौर भी संरचनात्मक रूप से कमजोर था। स्वतंत्रता के बाद अपनाई गई औद्योगिक नीतियों — औद्योगिक नीति संकल्प 1948 एवं 1956 (जिसे भारत का "आर्थिक संविधान" कहा जाता है) — ने एक मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) मॉडल स्थापित किया, जिसमें भारी उद्योग व आधारभूत क्षेत्र सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित थे और निजी क्षेत्र कठोर लाइसेंसिंग व्यवस्था के अधीन काम करता था। 1966-1979 का काल औद्योगिक मंदी एवं ठहराव का दौर रहा — कृषि संकट, युद्धों के कारण बढ़ा रक्षा व्यय, बजटीय बाधाएँ और सबसे बढ़कर लाइसेंस-परमिट राज ने निवेश, नवाचार व उद्यमिता को हतोत्साहित किया। 1980 के दशक में औद्योगिक नीति 1980 व 1977 जैसे क्रमिक बदलावों से आंशिक उदारीकरण शुरू हुआ, जिसे 1991 के व्यापक सुधारों की "पूर्वपीठिका" (prelude) माना जाता है, परंतु यह संरचनात्मक कमजोरियों को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं था।

2. नई आर्थिक नीति (NEP), 1991 एवं संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम

संकट इतना गहरा हो चुका था कि भारत को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से आपातकालीन ऋण लेना पड़ा, जिसके साथ IMF एवं विश्व बैंक द्वारा निर्धारित शर्तें (Conditionalities) जुड़ी थीं — इसे संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम (Structural Adjustment Programme — SAP) कहा जाता है। इन शर्तों में राजकोषीय घाटे में कमी, रुपये का अवमूल्यन, व्यापार उदारीकरण, औद्योगिक विनियमन में कमी तथा वित्तीय क्षेत्र सुधार शामिल थे। इसी क्रम में जुलाई 1991 में दो चरणों में रुपये का लगभग 18-19% अवमूल्यन किया गया, ताकि निर्यात प्रतिस्पर्धी बन सकें और भुगतान संतुलन संतुलित हो सके।

इसी पृष्ठभूमि में 24 जुलाई 1991 को नई आर्थिक नीति (NEP), 1991 की घोषणा हुई, जिसका मूल आधार तीन स्तंभों — उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण (LPG) — पर टिका था। इसी दिन औद्योगिक नीति 1991 के अंतर्गत औद्योगिक लाइसेंसिंग की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया (केवल 18 रणनीतिक/संवेदनशील उद्योगों को छोड़कर), जिससे दशकों पुराने "लाइसेंस राज" का अंत हुआ। यह नीति केवल एक संकटकालीन प्रतिक्रिया मात्र नहीं थी, बल्कि भारत के विकास-दर्शन में एक स्थायी बदलाव थी — राज्य-नियंत्रित नियोजित अर्थव्यवस्था से बाज़ार-उन्मुख, प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था की ओर।

3. उदारीकरण (Liberalization) — औद्योगिक एवं वित्तीय क्षेत्र सुधार

उदारीकरण का अर्थ है आर्थिक गतिविधियों पर लगे अनावश्यक सरकारी नियंत्रणों एवं प्रतिबंधों को हटाना। इसके प्रमुख उपायों में औद्योगिक लाइसेंसिंग की समाप्ति (18 उद्योगों को छोड़कर) तथा उत्पादन-क्षमता नियंत्रण की समाप्ति शामिल है, जिससे उद्योगों को अपनी उत्पादन क्षमता विस्तार की पूर्ण स्वतंत्रता मिली। इसके साथ ही एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम (MRTP Act) के तहत बड़े औद्योगिक समूहों के विस्तार पर लगी रोक में भारी कमी की गई, ताकि बड़ी कंपनियाँ बिना पूर्व-अनुमति के विस्तार व विलय कर सकें।

वित्तीय क्षेत्र में नरसिम्हम समिति (1991) की सिफारिशों पर बैंकिंग सुधार शुरू हुए — ब्याज दरों का विनियमन (deregulation) समाप्त किया गया, विवेकपूर्ण मानदंड (Prudential Norms) व आस्ति वर्गीकरण (Asset Classification) प्रणाली लागू हुई, तथा निजी क्षेत्र के बैंकों के प्रवेश को अनुमति दी गई। बाद में नरसिम्हम समिति (1998) की सिफारिशों पर पूँजी पर्याप्तता मानकों को और सुदृढ़ किया गया। व्यापार उदारीकरण के तहत आयात-निर्यात प्रक्रिया को सरल बनाया गया तथा आयात शुल्कों में क्रमिक कमी की गई। कुल मिलाकर उदारीकरण के इन उपायों का परिणाम प्रतिस्पर्धा में वृद्धि, दक्षता में सुधार, संसाधनों का बेहतर आवंटन तथा नवाचार को प्रोत्साहन के रूप में सामने आया।

4. निजीकरण (Privatization) — विनिवेश एवं सार्वजनिक क्षेत्र सुधार

निजीकरण का उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र की प्रत्यक्ष आर्थिक भूमिका को घटाना और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना था, ताकि सार्वजनिक उपक्रमों की परिचालन दक्षता बढ़े और सरकार पर वित्तीय बोझ कम हो। इसका सबसे प्रमुख उपकरण विनिवेश (Disinvestment) रहा — सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) में सरकारी हिस्सेदारी की आंशिक या पूर्ण बिक्री। जहाँ प्रबंधन नियंत्रण भी निजी हाथों में हस्तांतरित किया गया, उसे रणनीतिक बिक्री (Strategic Sale) कहा गया। साथ ही, चुनिंदा उत्कृष्ट-प्रदर्शन वाले PSUs को नवरत्न/महारत्न दर्जा (1997 से शुरू) देकर उन्हें अधिक वित्तीय व परिचालन स्वायत्तता प्रदान की गई, ताकि वे बिना नौकरशाही अड़चनों के बड़े निवेश निर्णय ले सकें।

इसके अतिरिक्त, पहले जो क्षेत्र पूर्णतः सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित थे, उन्हें क्रमशः निजी क्षेत्र के लिए खोला गया (क्षेत्र-आरक्षण की समाप्ति), और अवसंरचना परियोजनाओं में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnership — PPP) मॉडल को बढ़ावा दिया गया। इन उपायों से बेहतर परिचालन दक्षता, राजकोषीय बोझ में कमी, सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार तथा समग्र प्रतिस्पर्धा में वृद्धि हुई — यद्यपि विनिवेश की प्रक्रिया में सार्वजनिक परिसंपत्तियों के कम मूल्यांकन (Undervaluation) को लेकर आलोचना भी होती रही।

5. वैश्वीकरण (Globalization) — व्यापार, विदेशी निवेश एवं मुद्रा सुधार

वैश्वीकरण का अर्थ था भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था के साथ गहराई से एकीकृत करना। इसके प्रमुख उपायों में आयात शुल्कों में क्रमिक कमी (जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा मिला), निर्यात संवर्धन उपाय (जिससे निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता सुधरी), तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का उदारीकरण — विभिन्न क्षेत्रों में स्वचालित मार्ग (Automatic Route) से FDI सीमाएँ बढ़ाना — शामिल है। एक महत्वपूर्ण कदम मुद्रा परिवर्तनीयता (Currency Convertibility) था — रुपये को चालू खाता लेन-देन (Current Account) पर परिवर्तनीय बनाया गया, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक लेन-देन आसान हुए।

वैश्वीकरण की दिशा में सबसे संस्थागत कदम था 1995 में विश्व व्यापार संगठन (WTO) की सदस्यता, जिसने पुराने GATT ढाँचे का स्थान लेते हुए भारत को बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली में औपचारिक रूप से एकीकृत किया। इन उपायों से भारत को उन्नत प्रौद्योगिकी तक पहुँच, विदेशी पूँजी प्रवाह, निर्यात वृद्धि तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता जैसे लाभ मिले, विशेष रूप से आईटी एवं सेवा क्षेत्र में जहाँ भारत ने अगले दो दशकों में तीव्र वृद्धि दर्ज की।

6. NEP 1991 का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव — उपलब्धियाँ एवं आलोचनाएँ

NEP 1991 के आर्थिक परिणाम व्यापक और स्थायी रहे। GDP वृद्धि दर अर्थशास्त्री राज कृष्ण द्वारा गढ़े गए शब्द "हिंदू वृद्धि दर" (Hindu Rate of Growth) — लगभग 3.5% प्रतिवर्ष की धीमी दर — से बढ़कर औसतन 6-7% प्रतिवर्ष हो गई। विदेशी मुद्रा भंडार जो संकट के समय मात्र लगभग 5.8 अरब डॉलर रह गया था, बाद के वर्षों में कई गुना बढ़ गया। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में उल्लेखनीय एवं निरंतर वृद्धि देखी गई, निर्यात का तीव्र विस्तार हुआ, औद्योगिक क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार आया, और सेवा क्षेत्र — विशेषकर आईटी व दूरसंचार — में सेवा-आधारित उछाल (Services-led Boom) आया जिसने भारत को वैश्विक आईटी हब के रूप में स्थापित किया।

परंतु इन सुधारों की कड़ी आलोचना भी हुई। सबसे बड़ी आलोचना यह रही कि सुधारों का लाभ मुख्यतः कुशल एवं उच्च-आय वर्ग तक सीमित रहा, जिससे बढ़ती असमानता की स्थिति पैदा हुई। विकास पहले से विकसित राज्यों में अधिक केंद्रित रहा, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन गहराया। GDP वृद्धि की तुलना में रोजगार वृद्धि काफी धीमी रही, जिसे "रोजगार-विहीन विकास" (Jobless Growth) कहा गया। उद्योग व सेवा क्षेत्र की तुलना में कृषि क्षेत्र को सुधारों का लाभ बहुत कम मिला, जिससे कृषि संकट गहराया। अंत में, अर्थव्यवस्था वैश्विक झटकों (Global Shocks) के प्रति अधिक संवेदनशील हो गई, क्योंकि अब वह विश्व अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ चुकी थी — जैसा 2008 की वैश्विक वित्तीय मंदी के दौरान स्पष्ट देखा गया।

7. 1990 के दशक से 2000 के दशक तक — सुधारों की अगली लहरें

1991 के बाद सुधार एक निरंतर प्रक्रिया के रूप में आगे बढ़े। 1992 में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) को पूँजी बाज़ार नियामक के रूप में वैधानिक दर्जा दिया गया। 1994-95 में रुपये को चालू खाते पर पूर्ण परिवर्तनीय बनाया गया तथा 1995 में WTO की सदस्यता मिली। 2000 में राष्ट्रीय दूरसंचार नीति के साथ दूरसंचार क्षेत्र का उदारीकरण हुआ, जिसने भारत में मोबाइल क्रांति की नींव रखी। 2002 में पुराने MRTP अधिनियम का स्थान लेते हुए प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 लागू हुआ, जिसके तहत भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की स्थापना हुई — यह नीतिगत बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है कि MRTP अधिनियम एकाधिकार को "नियंत्रित" करने पर केंद्रित था (नियंत्रण-आधारित दृष्टिकोण), जबकि प्रतिस्पर्धा अधिनियम स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को "बढ़ावा" देने पर केंद्रित है (प्रोत्साहन-आधारित दृष्टिकोण) — यही सोच में बदलाव LPG युग की पहचान है।

इसके बाद भी सुधारों की शृंखला जारी रही — 2005 में विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) अधिनियम, 2006 में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास (MSMED) अधिनियम, तथा 2011 में राष्ट्रीय विनिर्माण नीति (NMP) की घोषणा हुई, जिसने आगे चलकर "मेक इन इंडिया" कार्यक्रम की आधारशिला रखी। इस प्रकार 1991 के LPG सुधार केवल एक एकल घटना नहीं, बल्कि तीन दशकों में फैली एक सतत सुधार-प्रक्रिया की शुरुआत थे, जिसकी अगली कड़ियाँ 2016 का दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2017 का वस्तु एवं सेवा कर (GST) तथा 2020 की उत्पादन-सहबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के रूप में सामने आईं।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • NEP 1991 की घोषणा 24 जुलाई 1991 को हुई — प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव, वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह; LPG = उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण।
  • 1991 संकट के कारण — भुगतान संतुलन संकट, उच्च राजकोषीय घाटा, सार्वजनिक ऋण GDP का ~30% से ~53%, खाड़ी युद्ध 1990-91, लगभग 67 टन सोना गिरवी।
  • औद्योगिक नीति 1991 ने 18 उद्योगों को छोड़कर औद्योगिक लाइसेंसिंग समाप्त की — "लाइसेंस राज" का अंत।
  • 1992 — SEBI को वैधानिक दर्जा; 1995 — WTO सदस्यता (GATT का स्थान); 2002 — प्रतिस्पर्धा अधिनियम व CCI (MRTP अधिनियम का स्थान)।
  • "हिंदू वृद्धि दर" शब्द राज कृष्ण द्वारा गढ़ा गया — लगभग 3.5% की धीमी वृद्धि दर, जिसे NEP 1991 के बाद पीछे छोड़ दिया गया (औसत 6-7% वृद्धि)।
  • नरसिम्हम समिति (1991 व 1998) — बैंकिंग क्षेत्र सुधार, ब्याज दर विनियमन-मुक्ति, प्रुडेंशियल नॉर्म्स।
  • नवरत्न/महारत्न दर्जा 1997 से चयनित PSUs को अधिक वित्तीय व परिचालन स्वायत्तता हेतु दिया गया।

परीक्षा टिप्स

  • 1991 संकट के पाँच कारणों (BoP, राजकोषीय घाटा, ऋण-GDP अनुपात, खाड़ी युद्ध, स्वर्ण गिरवी) को एक क्रम में याद रखें — परीक्षा में इनमें से किसी एक को अलग से पूछा जा सकता है।
  • LPG के तीनों स्तंभों (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) से जुड़े विशिष्ट उपायों को गड्डमड्ड न करें — उदारीकरण = नियंत्रण हटाना, निजीकरण = हिस्सेदारी घटाना, वैश्वीकरण = विश्व से जोड़ना।
  • MRTP अधिनियम बनाम प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 का अंतर (नियंत्रण-आधारित बनाम प्रोत्साहन-आधारित) बार-बार पूछा जाता है।
  • 1991 के बाद के सुधारों का कालक्रम (1992 SEBI, 1995 WTO, 2002 CCI, 2005 SEZ) दिनांक सहित याद रखें — तिथि-आधारित प्रश्न सामान्य हैं।
🧠 स्मरण ट्रिक — LPG के तीन स्तंभ

"L हटाओ, P बेचो, G जोड़ो": Liberalization — सरकारी नियंत्रण हटाओ; Privatization — सार्वजनिक हिस्सेदारी बेचो/घटाओ; Globalization — भारत को विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ो। तीनों 24 जुलाई 1991 को एक साथ शुरू हुए।

⚠️ कन्फ्यूज़न बस्टर — निजीकरण बनाम विनिवेश

दोनों शब्द अक्सर एक-दूसरे के पर्याय समझ लिए जाते हैं, पर तकनीकी रूप से भिन्न हैं। विनिवेश (Disinvestment) व्यापक शब्द है — इसका अर्थ है सरकार द्वारा किसी PSU में अपनी हिस्सेदारी का आंशिक या पूर्ण रूप से बेचा जाना, भले ही प्रबंधन नियंत्रण सरकार के पास ही रहे। निजीकरण (Privatization) इसका एक विशिष्ट व गहरा रूप है, जिसमें हिस्सेदारी बेचने के साथ-साथ प्रबंधन नियंत्रण भी निजी हाथों में स्थानांतरित हो जाता है (जिसे रणनीतिक बिक्री कहा जाता है)। इसलिए हर निजीकरण विनिवेश है, पर हर विनिवेश निजीकरण नहीं।

📝 अभ्यास प्रश्न
Q1. नई आर्थिक नीति (NEP), 1991 की घोषणा किस तिथि को और किसके नेतृत्व में हुई?

✅ 24 जुलाई 1991 को, प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव एवं वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में।

Q2. 1991 के भुगतान संतुलन संकट के दौरान भारत को अपना सोना किन दो संस्थाओं के पास गिरवी रखना पड़ा था?

✅ बैंक ऑफ इंग्लैंड और यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड (लगभग 67 टन सोना)।

Q3. "हिंदू वृद्धि दर" शब्द किसने गढ़ा था और यह किस दर को दर्शाता है?

✅ अर्थशास्त्री राज कृष्ण ने; यह स्वतंत्रता के बाद के दशकों की भारत की धीमी (लगभग 3.5% प्रतिवर्ष) औसत GDP वृद्धि दर को दर्शाता है।

Q4. प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 ने किस पुराने अधिनियम का स्थान लिया, और नई नियामक संस्था कौन-सी बनी?

✅ एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम (MRTP Act) का स्थान लिया; भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की स्थापना हुई।

Q5. भारत विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सदस्य किस वर्ष बना और इससे पहले कौन-सा ढाँचा प्रचलित था?

✅ 1995 में; इससे पहले GATT (General Agreement on Tariffs and Trade) ढाँचा प्रचलित था।

सारांश

1991 के आर्थिक सुधार भारत की आर्थिक यात्रा का सबसे निर्णायक मोड़ थे — गहराते भुगतान संतुलन संकट, ऊँचे राजकोषीय घाटे व सोना गिरवी रखने की नौबत ने प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव व वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को 24 जुलाई 1991 को नई आर्थिक नीति (NEP) लागू करने पर मजबूर किया, जिसके तीन स्तंभ — उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण (LPG) — ने लाइसेंस राज को समाप्त कर भारत को एक खुली, प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था में बदल दिया। इन सुधारों ने GDP वृद्धि दर को "हिंदू वृद्धि दर" के जाल से निकाला और निर्यात, FDI व सेवा क्षेत्र में तीव्र वृद्धि दर्ज कराई, यद्यपि बढ़ती असमानता, रोजगार-विहीन विकास व कृषि संकट जैसी आलोचनाएँ भी साथ रहीं। 1992 से 2002 तक SEBI, WTO सदस्यता व प्रतिस्पर्धा अधिनियम जैसे कदमों के साथ सुधार-प्रक्रिया निरंतर आगे बढ़ती रही। RAS प्रारंभिक परीक्षा के लिए 1991 संकट के कारण, LPG के तीन स्तंभ, प्रमुख समितियाँ (नरसिम्हम) व सुधारों का कालक्रम सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।

त्वरित रिवीजन — One-Liners

  • GDP = C + I + G + (X−M); यह एक वर्ष में देश की सीमा के भीतर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य है।
  • भारत की पहली पंचवर्षीय योजना 1951-56 में 'हैरोड-डोमर' मॉडल पर आधारित थी।
  • RBI की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को हुई; 1949 में राष्ट्रीयकरण; मुख्यालय मुंबई।
  • भारत में GST 1 जुलाई 2017 से लागू; 101वें संशोधन (2016)।
  • GDP = देश की भौगोलिक सीमा के भीतर एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं/सेवाओं का बाजार मूल्य।
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