परिचय
किसी भी अर्थव्यवस्था में बचतकर्ताओं (households) की बचत को उत्पादक निवेश की ओर मोड़ने का काम वित्तीय बाज़ार (Financial Markets) करते हैं। भारत में यह तंत्र मुख्यतः दो स्तरों पर बँटा है — मुद्रा बाज़ार (अल्पकालिक कोषों का बाज़ार) और पूंजी बाज़ार (दीर्घकालिक निधियों का बाज़ार) — और इसका नियमन एक बहु-नियामक ढाँचे के अंतर्गत होता है जिसमें RBI, SEBI, IRDAI और PFRDA अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। 1991 के आर्थिक उदारीकरण से पहले भारतीय पूंजी बाज़ार अत्यंत नियंत्रित था — शेयरों की कीमत नियंत्रक पूंजी निर्गम नियंत्रक (Controller of Capital Issues) तय करता था — पर उदारीकरण के बाद मुक्त मूल्य-निर्धारण, स्क्रीन-आधारित व्यापार, डिमैटरियलाइज़ेशन और एक सशक्त, स्वतंत्र नियामक — सेबी (SEBI) — के उदय ने इस बाज़ार को आधुनिक रूप दिया। RAS प्रारंभिक परीक्षा में यह विषय मुद्रा बाज़ार के उपकरणों (T-Bills, CP, CD), पूंजी बाज़ार की संरचना (प्राथमिक व द्वितीयक), स्टॉक एक्सचेंजों (BSE, NSE), IPO प्रक्रिया, म्यूचुअल फंड, बॉन्ड बाज़ार, डेरिवेटिव और नियामक संस्थाओं के इर्द-गिर्द बार-बार पूछा जाता है।
मुख्य अवधारणाएँ
1. वित्तीय बाज़ार का अर्थ एवं वर्गीकरण
वित्तीय बाज़ार वह मंच है जहाँ निधियों (funds) के आपूर्तिकर्ता (बचतकर्ता, निवेशक) और निधियों के माँगकर्ता (सरकार, कंपनियाँ) वित्तीय आस्तियों — शेयर, बॉन्ड, डिबेंचर, ट्रेज़री बिल आदि — के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ते हैं। परिपक्वता अवधि के आधार पर इसे दो व्यापक भागों में बाँटा जाता है: मुद्रा बाज़ार, जहाँ एक वर्ष तक की परिपक्वता वाले अल्पकालिक, अत्यंत तरल उपकरणों का लेन-देन होता है और जिसका मुख्य नियामक RBI है; और पूंजी बाज़ार, जहाँ एक वर्ष से अधिक अवधि की दीर्घकालिक निधियों का लेन-देन इक्विटी (शेयर) और ऋण (बॉन्ड, डिबेंचर) दोनों साधनों के माध्यम से होता है, जिसका मुख्य नियामक SEBI है। दोनों बाज़ार आगे प्राथमिक बाज़ार (नई प्रतिभूतियों का पहली बार निर्गमन) और द्वितीयक बाज़ार (पहले से जारी प्रतिभूतियों का निवेशकों के बीच पुनः क्रय-विक्रय) में विभाजित होते हैं। एक स्वस्थ वित्तीय बाज़ार अर्थव्यवस्था में बचत-निवेश अंतराल को पाटता है, संसाधनों का कुशल आवंटन सुनिश्चित करता है और मौद्रिक नीति के प्रसारण (transmission) का माध्यम भी बनता है।
इसके अतिरिक्त वित्तीय बाज़ार को प्रतिभागियों के आधार पर भी देखा जा सकता है — खुदरा निवेशक (retail investors), संस्थागत निवेशक जैसे म्यूचुअल फंड व बीमा कंपनियाँ, और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI)। हर वर्ग की भागीदारी बाज़ार की गहराई (depth) और तरलता (liquidity) बढ़ाती है, जो बदले में मूल्य-खोज (price discovery) की प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाती है।
2. मुद्रा बाज़ार के प्रमुख उपकरण
मुद्रा बाज़ार में सरकार, बैंक और बड़ी कंपनियाँ अपनी अल्पकालिक तरलता-आवश्यकताएँ पूरी करती हैं। ट्रेज़री बिल (T-Bills) भारत सरकार द्वारा RBI के माध्यम से जारी अल्पकालिक, शून्य-जोखिम प्रतिभूतियाँ हैं जो 91 दिन, 182 दिन और 364 दिन की तीन अवधियों में जारी होती हैं; इन पर कोई ब्याज-कूपन नहीं मिलता — इन्हें अंकित मूल्य से छूट (discount) पर बेचा जाता है और परिपक्वता पर पूर्ण अंकित मूल्य चुकाया जाता है, जिससे छूट ही निवेशक का प्रतिफल बन जाती है। वाणिज्यिक पत्र (Commercial Paper — CP), जिसे 1990 में भारत में प्रस्तुत किया गया, बड़ी, वित्तीय रूप से सुदृढ़ कंपनियों द्वारा जारी असुरक्षित (unsecured) अल्पकालिक साख-लिखत है, जिसकी अवधि 7 दिन से लेकर अधिकतम 1 वर्ष तक होती है और जो कार्यशील पूंजी की तत्काल आवश्यकता पूरी करने हेतु प्रयुक्त होता है। जमा प्रमाणपत्र (Certificate of Deposit — CD), 1989 में प्रस्तुत, बैंकों व वित्तीय संस्थाओं द्वारा जारी परक्राम्य (negotiable), असुरक्षित मुद्रा-बाज़ार लिखत है जो जमाकर्ता की सावधि जमा राशि का प्रमाण होता है — बैंकों के लिए इसकी अवधि सामान्यतः 7 दिन से 1 वर्ष और वित्तीय संस्थाओं के लिए 1 से 3 वर्ष तक हो सकती है।
इनके अतिरिक्त कॉल मनी बाज़ार वह अंतर-बैंक बाज़ार है जहाँ बैंक एक-दूसरे से केवल एक रात (overnight) के लिए उधार लेते-देते हैं ताकि CRR/SLR जैसी सांविधिक आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके; इसकी दर को कॉल मनी दर कहा जाता है। रेपो और रिवर्स रेपो लेन-देन भी मुद्रा बाज़ार का ही हिस्सा हैं, जिनके माध्यम से RBI अल्पकालिक तरलता का प्रबंधन करता है (जैसा बैंकिंग एवं मौद्रिक नीति में विस्तार से पढ़ा जाता है)। इन सभी उपकरणों की साझा विशेषता है — कम जोखिम, उच्च तरलता और अल्प अवधि — जो इन्हें बैंकों, म्यूचुअल फंडों (विशेषकर लिक्विड फंडों) और बड़े निगमों के लिए आदर्श अल्पकालिक निवेश साधन बनाती है।
3. पूंजी बाज़ार — प्राथमिक बाज़ार एवं IPO प्रक्रिया
प्राथमिक बाज़ार (Primary Market) में कंपनियाँ पहली बार जनता से पूंजी जुटाने के लिए नई प्रतिभूतियाँ जारी करती हैं। इसका सबसे चर्चित रूप है प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (Initial Public Offer — IPO), जिसके अंतर्गत कोई निजी कंपनी पहली बार अपने शेयर आम जनता को बेचकर सूचीबद्ध (listed) कंपनी बनती है। प्रक्रिया सामान्यतः इस प्रकार चलती है: कंपनी सर्वप्रथम एक मर्चेंट बैंकर नियुक्त करती है, जो प्रारूप प्रविवरण-पत्र (Draft Red Herring Prospectus — DRHP) तैयार कर सेबी के पास दाखिल करता है; सेबी इसकी समीक्षा कर टिप्पणियाँ माँगता है और अनुमोदन के बाद कंपनी बुक-बिल्डिंग पद्धति से एक मूल्य-सीमा (price band) घोषित करती है, जिसके भीतर निवेशक बोली लगाते हैं; निर्गम बंद होने पर मांग के आधार पर अंतिम निर्गम-मूल्य तय होता है, आवंटन (allotment) होता है और अंततः शेयर स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध होकर द्वितीयक बाज़ार में व्यापार-योग्य बनते हैं। इसके सहयोगी रूप हैं — अनुवर्ती सार्वजनिक निर्गम (Follow-on Public Offer — FPO), जहाँ पहले से सूचीबद्ध कंपनी अतिरिक्त शेयर जारी करती है; राइट्स इश्यू, जिसमें वर्तमान शेयरधारकों को रियायती मूल्य पर नए शेयर खरीदने का पहला अधिकार मिलता है; और वरीयता आवंटन (Preferential Allotment) व निजी नियोजन (Private Placement), जिनमें शेयर चुनिंदा निवेशकों को सीधे बेचे जाते हैं।
प्राथमिक बाज़ार को कुशल व पारदर्शी बनाने में डिपॉज़िटरी प्रणाली की केंद्रीय भूमिका है। राष्ट्रीय प्रतिभूति निक्षेपागार (NSDL), 1996 में स्थापित भारत का पहला डिपॉज़िटरी, और केंद्रीय डिपॉज़िटरी सेवा लिमिटेड (CDSL), 1999 में स्थापित, दोनों भौतिक शेयर प्रमाणपत्रों को इलेक्ट्रॉनिक (डीमैट) रूप में रखने की सुविधा देते हैं, जिससे जालसाज़ी, चोरी और स्टाम्प शुल्क संबंधी समस्याएँ लगभग समाप्त हो गई हैं। हर निवेशक का डीमैट खाता एक डिपॉज़िटरी सहभागी (Depository Participant — DP, जैसे कोई ब्रोकर या बैंक) के माध्यम से खोला जाता है।
4. द्वितीयक बाज़ार एवं स्टॉक एक्सचेंज — BSE और NSE
द्वितीयक बाज़ार (Secondary Market) वह मंच है जहाँ पहले से जारी शेयरों व बॉन्डों का निवेशकों के बीच निरंतर क्रय-विक्रय होता है, जिससे प्रतिभूतियों को तरलता (liquidity) और वास्तविक-समय मूल्य-खोज मिलती है। भारत का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) है, जिसकी स्थापना 1875 में हुई और जो एशिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज माना जाता है; इसका बेंचमार्क सूचकांक सेंसेक्स (Sensex) है, जो 30 सबसे बड़ी व सर्वाधिक तरल कंपनियों के शेयरों पर आधारित है और जिसका आधार वर्ष 1978-79 (आधार मूल्य 100) है। इसके विपरीत राष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज (NSE) की स्थापना 1992 में हुई और इसने 1994 से पूर्णतः स्क्रीन-आधारित (electronic) व्यापार से परिचालन शुरू किया, जिसने भारतीय पूंजी बाज़ार को पारदर्शिता व गति की नई दिशा दी; इसका बेंचमार्क सूचकांक निफ्टी 50 (Nifty 50) है, जो 50 प्रमुख कंपनियों पर आधारित है और जिसका आधार वर्ष 1995 (आधार मूल्य 1000) है। दोनों एक्सचेंज आज इक्विटी, डेरिवेटिव और डेट सेगमेंट में कारोबार कराते हैं तथा सेबी के प्रत्यक्ष विनियमन के अधीन कार्य करते हैं।
व्यापार के निपटान (settlement) चक्र में भी भारी सुधार हुआ है — पूर्व में साप्ताहिक निपटान होता था, जो क्रमिक रूप से घटते हुए अब अधिकांश शेयरों के लिए T+1 (लेन-देन के अगले कारोबारी दिन) रोलिंग निपटान तक पहुँच गया है, जिससे प्रतिपक्ष जोखिम (counterparty risk) काफी कम हो गया है। यह सुधार वैश्विक स्तर पर भी भारत को अग्रणी बाज़ारों में गिनाता है।
5. भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) — गठन एवं नियामक भूमिका
सेबी (Securities and Exchange Board of India — SEBI) की स्थापना 1988 में एक गैर-सांविधिक निकाय के रूप में हुई थी, परंतु सेबी अधिनियम, 1992 पारित होने के बाद इसे पूर्ण सांविधिक व स्वायत्त नियामक का दर्जा मिला (जैसा कि 1992 को पूंजी बाज़ार सुधारों के वर्ष के रूप में भी जाना जाता है)। इसका मुख्यालय मुंबई में है और इसके साथ ही 1992 में ही पुराने पूंजी निर्गम नियंत्रक (Controller of Capital Issues) कार्यालय को समाप्त कर दिया गया, जिससे शेयरों का मूल्य-निर्धारण बाज़ार-चालित (market-determined) हो गया। सेबी के कार्यों को तीन व्यापक श्रेणियों में बाँटा जाता है: संरक्षणात्मक कार्य — निवेशकों को कपटपूर्ण व अनुचित व्यापार प्रथाओं, मूल्य में हेरफेर (price rigging) और इनसाइडर ट्रेडिंग से बचाना; नियामक कार्य — स्टॉक एक्सचेंजों, ब्रोकरों, मर्चेंट बैंकरों, म्यूचुअल फंडों, क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों व अन्य मध्यस्थों का पंजीकरण व निगरानी करना, तथा IPO व टेकओवर संबंधी नियम बनाना; और विकासात्मक कार्य — निवेशक शिक्षा को बढ़ावा देना, नए उत्पादों (जैसे REITs, InvITs) को अनुमति देना और बाज़ार-मध्यस्थों को प्रशिक्षण देना।
सेबी का शासन एक बोर्ड द्वारा होता है जिसमें एक अध्यक्ष (केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त), वित्त मंत्रालय व विधि मंत्रालय के अधिकारी, RBI का एक प्रतिनिधि और अन्य पूर्णकालिक व अंशकालिक सदस्य शामिल होते हैं। सेबी को अर्ध-न्यायिक शक्तियाँ भी प्राप्त हैं — यह जुर्माना लगा सकता है, जाँच कर सकता है और आदेश पारित कर सकता है; इसके निर्णयों के विरुद्ध अपील प्रतिभूति अपीलीय अधिकरण (Securities Appellate Tribunal — SAT) में की जा सकती है।
6. म्यूचुअल फंड
म्यूचुअल फंड एक ऐसा साझा निवेश माध्यम है जो अनेक निवेशकों से धन एकत्र कर उसे विविध प्रतिभूतियों (शेयर, बॉन्ड, मुद्रा-बाज़ार लिखत) में निवेश करता है, जिससे छोटे निवेशकों को भी व्यावसायिक प्रबंधन व विविधीकरण (diversification) का लाभ मिलता है। भारत में पहला म्यूचुअल फंड यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया (UTI) था, जिसकी स्थापना 1963 में हुई; आज यह क्षेत्र सेबी (म्यूचुअल फंड) विनियम, 1996 के अंतर्गत विनियमित है और इसका स्वशासी उद्योग निकाय भारतीय म्यूचुअल फंड संघ (AMFI) है। एक म्यूचुअल फंड की संरचना में तीन प्रमुख पक्ष होते हैं — प्रायोजक (Sponsor) जो फंड की स्थापना करता है, न्यासी (Trustees) जो निवेशकों के हितों की रक्षा हेतु उत्तरदायी होते हैं, और परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी (Asset Management Company — AMC) जो वास्तविक निवेश-निर्णय लेती है। किसी फंड की प्रति-यूनिट कीमत निवल आस्ति मूल्य (Net Asset Value — NAV) कहलाती है, जो प्रतिदिन फंड की कुल परिसंपत्तियों व देनदारियों के आधार पर घटती-बढ़ती है।
संरचना के आधार पर फंड ओपन-एंडेड (जब चाहें खरीद-बिक्री की सुविधा) या क्लोज़्ड-एंडेड (निश्चित अवधि व सीमित यूनिट) हो सकते हैं, और निवेश-उद्देश्य के आधार पर इक्विटी फंड, डेट फंड, हाइब्रिड फंड व इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम (ELSS) जैसी कर-बचत योजनाओं में बँटते हैं। व्यवस्थित निवेश योजना (Systematic Investment Plan — SIP) निवेशकों को नियमित अंतराल पर एक निश्चित राशि निवेश करने की सुविधा देती है, जिससे रुपये-लागत औसतीकरण (rupee-cost averaging) का लाभ मिलता है और यह छोटे, अनुशासित निवेशकों में अत्यंत लोकप्रिय हो गई है।
7. बॉन्ड (ऋण) बाज़ार
बॉन्ड बाज़ार वह मंच है जहाँ ऋण-प्रतिभूतियों का निर्गमन व व्यापार होता है — यह इक्विटी बाज़ार से इस मायने में भिन्न है कि निवेशक स्वामित्व नहीं, बल्कि ऋणदाता की भूमिका में होता है और उसे निश्चित ब्याज (कूपन) व परिपक्वता पर मूलधन वापसी का अधिकार मिलता है। इसके दो प्रमुख खंड हैं: सरकारी प्रतिभूति बाज़ार (G-Sec Market), जिसमें केंद्र व राज्य सरकारों की ओर से RBI दीर्घकालिक ऋणपत्र जारी करता है ताकि राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित किया जा सके — इन्हें सर्वाधिक सुरक्षित (सॉवरेन जोखिम-मुक्त) प्रतिभूति माना जाता है; और कॉर्पोरेट बॉन्ड बाज़ार, जिसमें कंपनियाँ विस्तार व पूंजी-आवश्यकताओं हेतु डिबेंचर व बॉन्ड जारी करती हैं। डिबेंचर आगे परिवर्तनीय (convertible) — जिन्हें भविष्य में शेयरों में बदला जा सकता है — और अपरिवर्तनीय (non-convertible) में बँटते हैं।
निवेशकों को जोखिम आँकने में सहायता के लिए क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ — जैसे CRISIL, ICRA, CARE और India Ratings — जारीकर्ता की ऋण-चुकौती क्षमता के आधार पर रेटिंग (AAA से D तक) देती हैं, जो सेबी के नियमन के अंतर्गत कार्य करती हैं। भारत का कॉर्पोरेट बॉन्ड बाज़ार वैश्विक तुलना में अभी अपेक्षाकृत अविकसित माना जाता है, इसीलिए हाल के वर्षों में इसे गहरा करने हेतु कई सुधार — जैसे इलेक्ट्रॉनिक बॉन्ड प्लेटफॉर्म व निवेशक-आधार विस्तार — किए गए हैं।
8. डेरिवेटिव बाज़ार की बुनियाद
डेरिवेटिव वे वित्तीय अनुबंध हैं जिनका मूल्य किसी अंतर्निहित आस्ति (underlying asset) — जैसे शेयर, सूचकांक, मुद्रा या वस्तु — के मूल्य से व्युत्पन्न (derive) होता है। भारत में डेरिवेटिव व्यापार की औपचारिक शुरुआत सेबी की अनुमति के बाद NSE पर वर्ष 2000 में सूचकांक वायदा (index futures) से हुई। इसके प्रमुख प्रकार हैं — वायदा अनुबंध (Futures), जो एक्सचेंज पर मानकीकृत व अनिवार्य क्रय-विक्रय अनुबंध होते हैं; विकल्प अनुबंध (Options), जो खरीदार को (बाध्यता नहीं) किसी निश्चित मूल्य पर भविष्य में खरीदने (कॉल) या बेचने (पुट) का अधिकार देते हैं; वायदा संविदाएँ (Forwards), जो एक्सचेंज से बाहर (OTC) दो पक्षों के बीच होने वाले अनुकूलित अनुबंध हैं; और स्वैप (Swaps), जिनमें दो पक्ष भविष्य के नकदी-प्रवाह का आदान-प्रदान करते हैं (जैसे ब्याज-दर स्वैप)।
डेरिवेटिव का प्राथमिक उपयोग जोखिम-प्रबंधन/बचाव (hedging) के लिए होता है — उदाहरणतः कोई निर्यातक भविष्य की विनिमय-दर में उतार-चढ़ाव से बचने हेतु मुद्रा वायदा अनुबंध खरीद सकता है — पर इनका उपयोग सट्टेबाज़ी (speculation) व मध्यस्थता (arbitrage) के लिए भी होता है, इसीलिए इन्हें उच्च-जोखिम वाला किंतु बाज़ार-दक्षता बढ़ाने वाला साधन माना जाता है, और सेबी इनके लिए मार्जिन व स्थिति-सीमा (position limits) जैसे सख़्त नियंत्रण लागू करता है।
9. वित्तीय बाज़ार सुधार एवं बहु-नियामक ढाँचा
1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय वित्तीय बाज़ार में क्रांतिकारी सुधार हुए — पूंजी निर्गम नियंत्रक की समाप्ति व मुक्त मूल्य-निर्धारण (1992), सेबी को सांविधिक अधिकार (1992), NSE के माध्यम से स्क्रीन-आधारित व्यापार (1994), डिपॉज़िटरी प्रणाली व डिमैटरियलाइज़ेशन (NSDL 1996, CDSL 1999), रोलिंग निपटान की शुरुआत, विदेशी संस्थागत निवेशकों (अब FPI) को प्रवेश, तथा डेरिवेटिव व्यापार की अनुमति (2000) — इन सभी ने भारतीय पूंजी बाज़ार को वैश्विक मानकों के समकक्ष खड़ा किया। इन सुधारों ने बाज़ार को अधिक पारदर्शी, तरल और निवेशक-अनुकूल बनाया, साथ ही धोखाधड़ी व हेरफेर पर अंकुश लगाने वाले तंत्र भी सुदृढ़ किए।
वित्तीय बाज़ार का समग्र विनियमन आज एक बहु-नियामक ढाँचे के अंतर्गत होता है, जिसमें प्रत्येक नियामक की भूमिका स्पष्ट रूप से विभाजित है: RBI मुद्रा बाज़ार, सरकारी प्रतिभूति बाज़ार, बैंकिंग तंत्र व विदेशी मुद्रा बाज़ार को नियमित करता है; SEBI पूंजी बाज़ार, स्टॉक एक्सचेंजों, म्यूचुअल फंडों व डेरिवेटिव बाज़ार का नियामक है; भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI), जिसकी स्थापना 1999 के IRDA अधिनियम के तहत हुई, बीमा क्षेत्र (जीवन व सामान्य बीमा दोनों) को नियमित करता है; और पेंशन निधि नियामक एवं विकास प्राधिकरण (PFRDA), जिसकी स्थापना 2003 में हुई व जिसे 2013 के PFRDA अधिनियम से सांविधिक दर्जा मिला, राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) सहित संपूर्ण पेंशन क्षेत्र को नियमित करता है। इन चारों नियामकों के बीच समन्वय हेतु वित्तीय स्थिरता एवं विकास परिषद (Financial Stability and Development Council — FSDC) का गठन किया गया है, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय वित्त मंत्री करते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
- मुद्रा बाज़ार — 1 वर्ष तक की परिपक्वता, नियामक RBI; पूंजी बाज़ार — 1 वर्ष से अधिक, नियामक SEBI।
- T-Bills: 91/182/364 दिन, बिना कूपन, छूट (discount) पर जारी; CP: 1990 में प्रस्तुत, असुरक्षित, 7 दिन–1 वर्ष; CD: 1989 में प्रस्तुत, बैंकों/वित्तीय संस्थाओं द्वारा जारी।
- BSE की स्थापना 1875 (एशिया का सबसे पुराना), सूचकांक सेंसेक्स (30 शेयर, आधार वर्ष 1978-79=100)।
- NSE की स्थापना 1992, परिचालन 1994 से (स्क्रीन-आधारित व्यापार), सूचकांक निफ्टी 50 (50 शेयर, आधार वर्ष 1995=1000)।
- SEBI की स्थापना 1988 (गैर-सांविधिक); सेबी अधिनियम 1992 से सांविधिक दर्जा; मुख्यालय मुंबई।
- सेबी के तीन कार्य — संरक्षणात्मक, नियामक, विकासात्मक; अपील प्रतिभूति अपीलीय अधिकरण (SAT) में।
- NSDL (1996) और CDSL (1999) — भारत की दो डिपॉज़िटरी, डिमैट खातों के लिए उत्तरदायी।
- पहला भारतीय म्यूचुअल फंड — UTI (1963); नियमन सेबी (म्यूचुअल फंड) विनियम, 1996 के अंतर्गत; उद्योग निकाय AMFI।
- डेरिवेटिव व्यापार NSE पर 2000 में सूचकांक वायदा से आरंभ; प्रकार — फ्यूचर्स, ऑप्शंस, फॉरवर्ड्स, स्वैप।
- IRDAI स्थापना 1999 (IRDA अधिनियम); PFRDA स्थापना 2003, सांविधिक दर्जा 2013 के अधिनियम से; समन्वय हेतु FSDC (अध्यक्ष: वित्त मंत्री)।
परीक्षा टिप्स
- मुद्रा बाज़ार बनाम पूंजी बाज़ार — अवधि (1 वर्ष) और नियामक (RBI बनाम SEBI) दोनों को जोड़े में याद रखें।
- BSE (1875, सेंसेक्स, 30 शेयर) बनाम NSE (1992/1994, निफ्टी 50, 50 शेयर) — स्थापना वर्ष व सूचकांक शेयर-संख्या मिलाकर पूछे जाते हैं।
- सेबी की स्थापना (1988) और सांविधिक दर्जा (1992 अधिनियम) की तिथियाँ अलग-अलग हैं — इन्हें एक न मानें।
- NSDL बनाम CDSL — दोनों डिपॉज़िटरी हैं, इन्हें स्टॉक एक्सचेंज न समझें; स्थापना वर्ष क्रमशः 1996 व 1999।
- CP (असुरक्षित, कंपनियाँ जारी करती हैं) बनाम CD (बैंक/वित्तीय संस्थाएँ जारी करती हैं) — जारीकर्ता याद रखें।
"T-C-C" याद रखें: T-Bills (सरकार, बिना कूपन, छूट पर), CP यानी Commercial Paper (कंपनियाँ, असुरक्षित), CD यानी Certificate of Deposit (बैंक/वित्तीय संस्थाएँ) — तीनों की अवधि 1 वर्ष तक। स्टॉक एक्सचेंजों के लिए: "बूढ़ा बॉम्बे, नया नेशनल" — BSE (1875, सबसे पुराना) बनाम NSE (1992, स्क्रीन-आधारित नया)।
यह जोड़ी बार-बार भ्रमित करती है। प्राथमिक बाज़ार में कंपनी पहली बार नई प्रतिभूतियाँ जारी करती है और धन सीधे कंपनी के पास जाता है — IPO, FPO, राइट्स इश्यू इसी के उदाहरण हैं। द्वितीयक बाज़ार (जैसे BSE या NSE पर रोज़ाना होने वाला कारोबार) में पहले से जारी प्रतिभूतियों का निवेशकों के बीच आपस में क्रय-विक्रय होता है — यहाँ धन कंपनी को नहीं बल्कि बेचने वाले निवेशक को मिलता है। त्वरित पहचान: "नया निर्गम = प्राथमिक; पुराने शेयर की अदला-बदली = द्वितीयक।"
Q1. भारत में सेबी (SEBI) की स्थापना कब हुई और इसे सांविधिक दर्जा कब मिला?
✅ स्थापना 1988 में (गैर-सांविधिक निकाय के रूप में); सेबी अधिनियम, 1992 के तहत सांविधिक दर्जा मिला।
Q2. BSE और NSE के बेंचमार्क सूचकांकों के नाम व उनमें शामिल शेयरों की संख्या बताइए।
✅ BSE का सेंसेक्स — 30 शेयर; NSE का निफ्टी 50 — 50 शेयर।
Q3. ट्रेज़री बिल (T-Bills) की तीन अवधियाँ कौन-सी हैं, और इन पर ब्याज किस रूप में मिलता है?
✅ 91 दिन, 182 दिन और 364 दिन; कोई कूपन नहीं, बल्कि अंकित मूल्य से छूट (discount) पर जारी होने के कारण प्रतिफल मिलता है।
Q4. NSDL और CDSL क्या हैं, और इनकी स्थापना कब हुई?
✅ ये भारत की दो डिपॉज़िटरी (निक्षेपागार) हैं जो शेयरों को डीमैट रूप में रखती हैं; NSDL 1996 में और CDSL 1999 में स्थापित हुई।
Q5. भारत में पेंशन क्षेत्र का नियामक कौन है, और इसे सांविधिक दर्जा कब मिला?
✅ पेंशन निधि नियामक एवं विकास प्राधिकरण (PFRDA), जिसकी स्थापना 2003 में हुई और जिसे 2013 के PFRDA अधिनियम से सांविधिक दर्जा मिला।
सारांश
भारतीय वित्तीय बाज़ार दो स्तंभों पर टिका है — अल्पकालिक मुद्रा बाज़ार (T-Bills, CP, CD जैसे उपकरणों सहित, RBI द्वारा नियमित) और दीर्घकालिक पूंजी बाज़ार (इक्विटी व ऋण, SEBI द्वारा नियमित), जो आगे प्राथमिक बाज़ार (IPO/FPO के माध्यम से नई पूंजी जुटाना) और द्वितीयक बाज़ार (BSE व NSE पर रोज़ाना कारोबार) में विभाजित है। सेबी की स्थापना (1988) व सांविधिक सशक्तीकरण (1992) ने पूंजी निर्गम नियंत्रक जैसे पुराने नियंत्रित ढाँचे को समाप्त कर बाज़ार को मुक्त, पारदर्शी व निवेशक-केंद्रित बनाया, जिसे NSDL/CDSL जैसी डिपॉज़िटरी प्रणाली, म्यूचुअल फंड उद्योग, बॉन्ड बाज़ार और डेरिवेटिव खंड ने और गहरा किया। आज संपूर्ण वित्तीय तंत्र RBI, SEBI, IRDAI व PFRDA के बहु-नियामक ढाँचे के अंतर्गत कार्य करता है, जिसे FSDC समन्वित करती है। RAS प्रारंभिक परीक्षा के लिए स्थापना वर्ष, सूचकांकों की संरचना, उपकरणों के जारीकर्ता, तथा प्राथमिक-द्वितीयक व मुद्रा-पूंजी बाज़ार के भेद को मज़बूती से याद रखें।
⚡ त्वरित रिवीजन — One-Liners
- •GDP = C + I + G + (X−M); यह एक वर्ष में देश की सीमा के भीतर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य है।
- •भारत की पहली पंचवर्षीय योजना 1951-56 में 'हैरोड-डोमर' मॉडल पर आधारित थी।
- •RBI की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को हुई; 1949 में राष्ट्रीयकरण; मुख्यालय मुंबई।
- •भारत में GST 1 जुलाई 2017 से लागू; 101वें संशोधन (2016)।
- •GDP = देश की भौगोलिक सीमा के भीतर एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं/सेवाओं का बाजार मूल्य।