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📚 आर्थिक अवधारणाएं एवं भारतीय अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्यवस्था — मुख्य संकेतक

Indian Economy GDP GNP Inflation Fiscal Deficit

13 मिनटintermediate✓ अपडेटेड: जुलाई 2026· Economic Concepts and Indian Economy

परिचय

हर साल जब केंद्रीय बजट पेश होता है, तो अखबारों में कुछ गिने-चुने आँकड़े सुर्खियों में रहते हैं — GDP वृद्धि दर, राजकोषीय घाटा, राजस्व घाटा — जिन्हें अर्थव्यवस्था की सेहत के संकेतक के रूप में देखा जाता है। RAS प्रारंभिक परीक्षा के लिए यह समझना कि इन शब्दों का वास्तव में क्या अर्थ है और वे एक-दूसरे से किस तरह जुड़े हैं, किसी एक वर्ष के प्रतिशत आँकड़े को रटने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये आँकड़े हर बजट के साथ बदलते रहते हैं। इस गाइड में GDP और GNP को संक्षेप में समझाया गया है (GDP/GNP और राष्ट्रीय आय लेखांकन की गहराई एक अलग साथी गाइड में कवर की गई है) और फिर विस्तार से उन राजकोषीय संकेतकों पर ध्यान केंद्रित किया गया है जिन्हें RPSC सबसे अधिक पूछता है — राजकोषीय घाटा, राजस्व घाटा, प्राथमिक घाटा, और उन्हें नियंत्रित करने वाला कानूनी ढांचा, अर्थात FRBM अधिनियम।

मुख्य अवधारणाएँ

1. GDP बनाम GNP — संक्षिप्त अंतर

सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी देश की भौगोलिक सीमा के भीतर एक निश्चित वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य है, चाहे उत्पादनकर्ता भारतीय निवासी हों या भारत में कार्यरत विदेशी कंपनियाँ। इसके विपरीत, सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) उस उत्पादन को मापता है जो किसी देश के निवासियों से जुड़ा है, चाहे वे विश्व में कहीं भी कार्यरत हों, और इसकी गणना इस प्रकार होती है: GNP = GDP + विदेशों से शुद्ध कारक आय (Net Factor Income from Abroad, NFIA) — यानी भारतीय निवासियों/कंपनियों द्वारा विदेश में अर्जित आय में से भारत में विदेशी निवासियों/कंपनियों द्वारा अर्जित आय घटाकर। जब NFIA धनात्मक होती है, GNP, GDP से अधिक होता है; जब यह ऋणात्मक होती है, GNP, GDP से कम रहता है। हाल के दशकों में भारत की NFIA सामान्यतः ऋणात्मक रही है (विदेशी कंपनियाँ भारत में जितना कमाती हैं, उससे कम भारतीय विदेश में कमाते हैं), इसलिए भारत का GNP प्रायः उसके GDP से थोड़ा कम रहा है।

2. नॉमिनल GDP बनाम रियल GDP

नॉमिनल GDP उत्पादन का मूल्यांकन प्रचलित (वर्तमान) बाज़ार कीमतों पर करता है, इसलिए इसमें वास्तविक भौतिक उत्पादन में बदलाव और सामान्य मूल्य स्तर (मुद्रास्फीति) में बदलाव दोनों मिल जाते हैं। रियल GDP कीमतों में बदलाव के प्रभाव को हटाकर, उत्पादन का मूल्यांकन एक निश्चित आधार वर्ष की कीमतों पर करता है, जिससे रियल GDP में बदलाव उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की मात्रा में वास्तविक परिवर्तन को दर्शाता है। भारत वर्तमान में राष्ट्रीय आय गणना के लिए 2011-12 को आधार वर्ष मानता है। नॉमिनल GDP और रियल GDP के अनुपात को सूचकांक के रूप में व्यक्त करने पर जो प्राप्त होता है, उसे GDP डिफ्लेटर कहते हैं — यह समग्र अर्थव्यवस्था में मूल्य परिवर्तन का एक व्यापक माप है, जो CPI और WPI (जिन्हें एक अलग मुद्रास्फीति-केंद्रित गाइड में कवर किया गया है) से भिन्न है। चूँकि रियल GDP वृद्धि दर ही "अर्थव्यवस्था वास्तव में कितनी बढ़ी" इसकी तुलना के लिए प्रयोग होती है, अधिकांश आधिकारिक संदर्भों में "GDP वृद्धि दर" से आशय सामान्यतः रियल GDP वृद्धि दर से ही होता है, नॉमिनल से नहीं।

3. राजकोषीय घाटा — परिभाषा और इसका अर्थ

राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) को सरकार के कुल व्यय में से उधार को छोड़कर कुल प्राप्तियों को घटाकर परिभाषित किया जाता है। दूसरे शब्दों में: राजकोषीय घाटा = कुल व्यय − (राजस्व प्राप्तियाँ + ऋण-रहित पूँजीगत प्राप्तियाँ)। ऋण-रहित पूँजीगत प्राप्तियों में ऋणों की वसूली और विनिवेश से प्राप्त राशि जैसी मदें शामिल हैं, लेकिन बाज़ार से लिया गया उधार और अन्य देनदारियाँ इसमें शामिल नहीं की जातीं, क्योंकि वे स्वयं घाटे का परिणाम हैं, न कि "वास्तविक" आय का स्रोत। सैद्धांतिक रूप से, राजकोषीय घाटा किसी वित्तीय वर्ष के लिए सरकार की कुल उधार आवश्यकता को मापता है — यानी सरकार को अपने व्यय और गैर-उधार स्रोतों से होने वाली आय के बीच के अंतर को पाटने के लिए (बाज़ार, RBI या अन्य स्रोतों से) कितनी राशि उधार लेनी पड़ती है। एक बड़ा और लगातार बना रहने वाला राजकोषीय घाटा यह दर्शाता है कि सरकार उधार ली गई राशि पर अत्यधिक निर्भर है, जिससे कुल बकाया सार्वजनिक ऋण और भविष्य के ब्याज दायित्व दोनों बढ़ते हैं।

4. राजस्व घाटा

राजस्व घाटा (Revenue Deficit) एक संकुचित अवधारणा है: यह राजस्व व्यय में से राजस्व प्राप्तियों को घटाने पर प्राप्त होता है। राजस्व व्यय सरकार के दैनिक संचालन खर्चों को कवर करता है — वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान, सब्सिडी — ऐसा व्यय जिससे कोई स्थायी परिसंपत्ति नहीं बनती। राजस्व प्राप्तियों में कर राजस्व (आयकर, GST, सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क आदि) और गैर-कर राजस्व (ब्याज प्राप्तियाँ, लाभांश, शुल्क) शामिल हैं। अतः राजस्व घाटे का होना यह संकेत देता है कि सरकार की नियमित, आवर्ती आय उसके नियमित, आवर्ती व्यय को कवर करने के लिए भी पर्याप्त नहीं है — जिसका अर्थ है कि सरकार को सड़क, बांध या अस्पताल जैसी पूँजीगत परिसंपत्तियाँ बनाने के बजाय केवल उपभोग-प्रकार के व्यय के वित्तपोषण के लिए ही उधार लेना पड़ रहा है। यह स्थिति सामान्यतः उस स्थिति से कम वांछनीय मानी जाती है जिसमें उधार केवल पूँजीगत व्यय के वित्तपोषण के लिए लिया जाता हो, क्योंकि गैर-परिसंपत्ति-निर्माण उपभोग पर खर्च की गई उधार राशि भविष्य में ऐसा कोई प्रतिफल उत्पन्न नहीं करती जो ऋण चुकाने में मदद करे।

5. प्राथमिक घाटा

प्राथमिक घाटा (Primary Deficit) = राजकोषीय घाटा − पूर्व उधार पर ब्याज भुगतान। यह चालू वर्ष की उधार राशि के उस हिस्से को अलग करता है जो केवल पिछले ऋण की सेवा में नहीं जा रहा। यदि राजकोषीय घाटे का अधिकांश भाग ब्याज भुगतान (पिछले उधार की विरासत) से बना है, तो यह स्थिति उस स्थिति से भिन्न है जिसमें प्राथमिक घाटा स्वयं बड़ा हो, क्योंकि बाद वाली स्थिति यह दर्शाती है कि सरकार ब्याज दायित्वों को अलग रखने के बाद भी भारी उधार ले रही है, अर्थात चालू वर्ष की गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए नया उधार। "शून्य प्राथमिक घाटा" का अर्थ है कि सरकार का उस वर्ष का उधार ठीक उसके ब्याज भुगतान के बराबर है — चालू वर्ष का गैर-ब्याज व्यय पूरी तरह चालू वर्ष की गैर-उधार प्राप्तियों से कवर हो रहा है।

6. FRBM अधिनियम, 2003 — राजकोषीय अनुशासन का कानूनी ढांचा

राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003 राजकोषीय अनुशासन को संस्थागत रूप देने, राजकोषीय प्रबंधन में सुधार लाने, और एक निर्धारित समय-सीमा में राजकोषीय एवं राजस्व घाटे को टिकाऊ स्तर तक घटाने के उद्देश्य से बनाया गया था। इस अधिनियम और बाद में अधिसूचित FRBM नियमों का मूल लक्ष्य राजस्व घाटे को समाप्त करना और राजकोषीय घाटे को चरणबद्ध ढंग से GDP के 3% तक सीमित करना था। समय के साथ, लक्ष्य वर्ष और विशिष्ट संख्यात्मक सीमाओं को संशोधनों तथा क्रमिक वित्त आयोगों एवं विशेषज्ञ समितियों (जैसे एन.के. सिंह समिति, जिसने युद्ध, राष्ट्रीय सुरक्षा खतरों या बड़े आर्थिक झटकों जैसी असाधारण परिस्थितियों में लक्ष्यों से विचलन की अनुमति देने वाला "एस्केप क्लॉज़" प्रस्तावित किया) की सिफारिशों के अनुसार कई बार संशोधित किया गया है। यह अधिनियम सरकार को बजट के साथ मध्यावधि राजकोषीय नीति विवरण और अन्य राजकोषीय-पारदर्शिता दस्तावेज़ प्रस्तुत करने के लिए भी अनिवार्य करता है। परीक्षा की दृष्टि से, किसी एक वर्ष के वर्तमान संख्यात्मक लक्ष्य के बजाय अधिनियम के उद्देश्य और मूल हेडलाइन लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करें, क्योंकि ये आँकड़े समय-समय पर संशोधित होते रहते हैं।

7. केंद्रीय बजट की मूल बातें — प्राप्तियाँ और व्यय

केंद्रीय बजट के प्राप्ति पक्ष के दो व्यापक शीर्ष हैं: राजस्व प्राप्तियाँ (कर राजस्व एवं गैर-कर राजस्व, जिनमें से कोई भी न तो कोई देनदारी बनाता है और न ही किसी परिसंपत्ति को घटाता है) और पूँजीगत प्राप्तियाँ (बाज़ार उधार, ऋणों की वसूली, और विनिवेश से प्राप्त राशि — ऐसी मदें जो या तो कोई देनदारी बनाती हैं या सरकारी परिसंपत्ति को घटाती हैं)। व्यय पक्ष पर, राजस्व व्यय उपभोग-प्रकार के व्यय को कवर करता है जिससे कोई परिसंपत्ति नहीं बनती (वेतन, ब्याज, सब्सिडी, पेंशन), जबकि पूँजीगत व्यय ऐसे व्यय को कवर करता है जिससे भौतिक या वित्तीय परिसंपत्तियाँ बनती हैं (बुनियादी ढांचे का निर्माण, उपकरण खरीद, या ऐसे निवेश/ऋण जो बाद में वसूल किए जाएँगे)। 2017 तक, बजट दस्तावेज़ व्यय को "योजना" (पंचवर्षीय योजना से जुड़ी योजनाओं पर व्यय) और "गैर-योजना" (शेष सभी) में भी वर्गीकृत करते थे; योजना/गैर-योजना का यह विभाजन 2017-18 के बजट से औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया गया, जो योजना आयोग के समापन और केवल राजस्व/पूँजीगत व्यय वर्गीकरण अपनाए जाने के बाद हुआ — यह एक ऐसा बदलाव है जिसे याद रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि पुरानी संदर्भ सामग्री में अब भी पुरानी शब्दावली मिल सकती है।

8. यह विषय बार-बार क्यों पूछा जाता है

RAS प्रारंभिक परीक्षा बार-बार यह परखती है कि उम्मीदवार राजकोषीय घाटे, राजस्व घाटे और प्राथमिक घाटे — तीन संबंधित लेकिन वैचारिक रूप से भिन्न मापों — के बीच सही अंतर कर पाते हैं या नहीं, जिन्हें आपस में गड्डमड्ड करना आसान है। FRBM अधिनियम पर प्रश्न सामान्यतः इसके अधिनियमन वर्ष, उद्देश्य, और मूल लक्ष्यों पर केंद्रित होते हैं, न कि किसी वर्तमान में लागू संख्यात्मक सीमा पर। केंद्रीय बजट की संरचना से जुड़े प्रश्न यह परखते हैं कि प्राप्तियों/व्यय को राजस्व बनाम पूँजीगत शीर्षों में सही ढंग से वर्गीकृत किया गया है या नहीं, और कभी-कभी यह भी कि उम्मीदवार को पुराने योजना/गैर-योजना वर्गीकरण के समाप्त होने की जानकारी है या नहीं।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • GDP = किसी देश की सीमाओं के भीतर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य; GNP = GDP + विदेशों से शुद्ध कारक आय (NFIA)।
  • नॉमिनल GDP का मूल्यांकन वर्तमान कीमतों पर होता है; रियल GDP का मूल्यांकन स्थिर/आधार वर्ष की कीमतों पर होता है (भारत का वर्तमान आधार वर्ष: 2011-12)।
  • राजकोषीय घाटा = कुल व्यय − कुल प्राप्तियाँ (उधार को छोड़कर) = कुल व्यय − (राजस्व प्राप्तियाँ + ऋण-रहित पूँजीगत प्राप्तियाँ)।
  • राजकोषीय घाटा वित्तीय वर्ष के लिए सरकार की कुल उधार आवश्यकता को दर्शाता है।
  • राजस्व घाटा = राजस्व व्यय − राजस्व प्राप्तियाँ।
  • प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा − ब्याज भुगतान।
  • FRBM अधिनियम 2003 में लागू हुआ; मूल लक्ष्य: राजस्व घाटा समाप्त करना और राजकोषीय घाटे को GDP के 3% तक सीमित करना (बाद में कई बार संशोधित)।
  • एन.के. सिंह समिति ने FRBM ढांचे की समीक्षा की और असाधारण परिस्थितियों में लक्ष्यों से विचलन के लिए "एस्केप क्लॉज़" प्रस्तावित किया।
  • राजस्व प्राप्तियाँ = कर राजस्व + गैर-कर राजस्व। पूँजीगत प्राप्तियाँ = बाज़ार उधार + ऋणों की वसूली + विनिवेश आय।
  • योजना/गैर-योजना व्यय वर्गीकरण 2017-18 के केंद्रीय बजट से समाप्त कर दिया गया, जिसे पूरी तरह राजस्व/पूँजीगत व्यय वर्गीकरण ने प्रतिस्थापित किया।

परीक्षा टिप्स

  • राजकोषीय घाटे (कुल व्यय − उधार छोड़कर कुल प्राप्तियाँ) को राजस्व घाटे (राजस्व व्यय − राजस्व प्राप्तियाँ) के साथ भ्रमित न करें — राजकोषीय घाटा पूरी सरकार के उधार का व्यापक माप है, जबकि राजस्व घाटा केवल राजस्व खाते को अलग करता है।
  • घटाव की श्रृंखला याद रखें: राजकोषीय घाटा − ब्याज भुगतान = प्राथमिक घाटा। यदि प्रश्न में इन तीनों में से कोई दो दिए गए हों, तो तीसरा निकाला जा सकता है।
  • किसी विशेष वर्ष के राजकोषीय घाटे का प्रतिशत आँकड़ा रटने से बचें — ये हर बजट के साथ बदलते हैं। इसके बजाय परिभाषाओं, सूत्रों, और घाटे के "बढ़ने" बनाम "घटने" की दिशा पर ध्यान दें।
  • FRBM पर वर्ष (2003) और उद्देश्य ठीक से याद रखें; किसी भी विशिष्ट संख्यात्मक लक्ष्य को स्थायी तथ्य नहीं बल्कि संशोधन के अधीन मानें।
  • बजट की किसी मद को राजस्व या पूँजीगत में वर्गीकृत करते समय पूछें: "क्या इससे कोई परिसंपत्ति/देनदारी बनती या समाप्त होती है?" यदि हाँ, तो यह पूँजीगत है; यदि यह नियमित संचालन व्यय है, तो यह राजस्व है।
🧠 स्मरण ट्रिक — घाटों की घटाव श्रृंखला

तीन भाई-बहनों की कल्पना करें — राजकोषीय, राजस्व और प्राथमिक — जो एक सीढ़ी पर खड़े हैं। राजकोषीय घाटा पूरी तस्वीर है: कुल व्यय घटा उधार को छोड़कर कुल प्राप्तियाँ। एक सीढ़ी नीचे उतरें — ब्याज भुगतान हटाएँ — तो प्राथमिक घाटा मिलता है, यानी केवल नया उधार। बगल में देखें — केवल राजस्व खाता (राजस्व व्यय घटा राजस्व प्राप्तियाँ) — तो राजस्व घाटा मिलता है। दो घटावों को याद रखें: "राजकोषीय − ब्याज भुगतान = प्राथमिक" और "राजस्व व्यय − राजस्व प्राप्तियाँ = राजस्व घाटा"।

⚠️ कन्फ्यूज़न बस्टर — राजकोषीय घाटा बनाम राजस्व घाटा बनाम प्राथमिक घाटा

ये तीनों घाटे एक ही बजट के बारे में तीन अलग-अलग सवालों के जवाब देते हैं। राजकोषीय घाटा बताता है कि "सरकार को इस वर्ष कुल कितना उधार लेना होगा?" — यह पूरे बजट (राजस्व और पूँजी दोनों खाते) को कवर करता है और प्राप्तियों में से केवल उधार को बाहर रखता है। राजस्व घाटा एक संकुचित सवाल का जवाब देता है — "क्या नियमित (राजस्व) आय नियमित (राजस्व) व्यय को कवर कर रही है?" — यह बुनियादी ढांचे जैसे पूँजीगत व्यय के बारे में कुछ नहीं बताता, जिसे उधार से वित्तपोषित करना उचित माना जाता है। प्राथमिक घाटा एक तीसरे सवाल का जवाब देता है — "पिछले ऋणों के बोझ (ब्याज भुगतान) को छोड़कर, इस वर्ष सरकार कितना नया उधार ले रही है?" किसी सरकार का राजकोषीय घाटा बड़ा हो सकता है जो लगभग पूरी तरह पुराने ऋण पर ब्याज भुगतान से बना हो (यानी प्राथमिक घाटा छोटा हो) — इसका अर्थ है कि उसका चालू खर्च अनुशासन वास्तव में उचित है, भले ही राजकोषीय घाटे का हेडलाइन आँकड़ा बड़ा दिखे। हमेशा जाँचें कि प्रश्न वास्तव में इन तीनों में से किसकी बात कर रहा है।

Relationship between Fiscal Deficit, Interest Payments, Primary Deficit and Revenue Deficit (schematic) Baseline Fiscal Deficit: Total Expenditure minus Total Receipts excluding borrowings — the full borrowing requirement Fiscal Deficit Interest Payments on past borrowings, subtracted from Fiscal Deficit to get Primary Deficit Interest Pay. Primary Deficit = Fiscal Deficit minus Interest Payments — fresh borrowing only Primary Deficit Revenue Deficit = Revenue Expenditure minus Revenue Receipts — a separate measure covering only the revenue account, not directly derived from Fiscal Deficit Revenue Deficit Schematic bar heights only — not to scale; illustrates conceptual relationship, not actual values
📝 अभ्यास प्रश्न
Q1. राजकोषीय घाटे का सूत्र क्या है?

✅ राजकोषीय घाटा = कुल व्यय − उधार को छोड़कर कुल प्राप्तियाँ (अर्थात कुल व्यय − [राजस्व प्राप्तियाँ + ऋण-रहित पूँजीगत प्राप्तियाँ])। यह वर्ष के लिए सरकार की कुल उधार आवश्यकता को दर्शाता है।

Q2. प्राथमिक घाटा राजकोषीय घाटे से किस प्रकार भिन्न है?

✅ प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा − ब्याज भुगतान। यह दर्शाता है कि सरकार इस वर्ष पिछले ऋण की सेवा के बोझ को छोड़कर कितना नया उधार ले रही है।

Q3. राजस्व घाटा सरकार की वित्तीय स्थिति के बारे में क्या दर्शाता है?

✅ राजस्व घाटा = राजस्व व्यय − राजस्व प्राप्तियाँ। इसका होना दर्शाता है कि सरकार की नियमित आवर्ती आय (कर + गैर-कर राजस्व) उसके नियमित आवर्ती व्यय (वेतन, ब्याज, सब्सिडी, पेंशन) को कवर करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जिससे उसे उपभोग-प्रकार के व्यय के लिए भी उधार लेना पड़ता है।

Q4. FRBM अधिनियम किस वर्ष लागू हुआ और इसका मूल उद्देश्य क्या था?

✅ राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम 2003 में लागू हुआ, जिसका उद्देश्य राजकोषीय अनुशासन को संस्थागत रूप देना, राजकोषीय प्रबंधन में सुधार लाना, और कानूनी रूप से निर्धारित लक्ष्यों के माध्यम से राजकोषीय व राजस्व घाटे को टिकाऊ स्तर तक लाना था।

Q5. 2017-18 से केंद्रीय बजट के व्यय वर्गीकरण में क्या बदलाव आया?

✅ पहले प्रचलित योजना/गैर-योजना वर्गीकरण को 2017-18 के बजट से समाप्त कर दिया गया, और इसे पूरी तरह राजस्व व्यय/पूँजीगत व्यय वर्गीकरण से प्रतिस्थापित किया गया, जो योजना आयोग के समापन के बाद हुआ।

सारांश

GDP और GNP अर्थव्यवस्था के आकार को मापते हैं — GDP राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर, और GNP उसमें विदेश से अर्जित शुद्ध आय जोड़कर — जबकि नॉमिनल और रियल GDP वास्तविक उत्पादन वृद्धि को केवल मूल्य-स्तर परिवर्तन से अलग करते हैं। लेकिन जिन संकेतकों की RAS प्रारंभिक परीक्षा सबसे कठोरता से जाँच करती है, वे तीन घाटा माप हैं: राजकोषीय घाटा (सरकार की कुल उधार आवश्यकता), राजस्व घाटा (क्या नियमित आय नियमित व्यय को कवर कर रही है), और प्राथमिक घाटा (पिछले ब्याज दायित्वों को छोड़कर नया उधार)। FRBM अधिनियम, 2003 इन घाटों को टिकाऊ सीमा में रखने के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है, हालाँकि इसके विशिष्ट संख्यात्मक लक्ष्यों में अधिनियमन के बाद से कई बार संशोधन हो चुका है। किसी एक वर्ष के प्रतिशत आँकड़ों को रटने के बजाय — जो हर बजट के साथ बदलते हैं — अपनी तैयारी को सूत्रों, प्रत्येक घाटा माप के अर्थ, और बजट प्राप्तियों व व्यय के राजस्व/पूँजीगत वर्गीकरण पर केंद्रित रखें।

त्वरित रिवीजन — One-Liners

  • GDP = C + I + G + (X−M); यह एक वर्ष में देश की सीमा के भीतर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य है।
  • भारत की पहली पंचवर्षीय योजना 1951-56 में 'हैरोड-डोमर' मॉडल पर आधारित थी।
  • RBI की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को हुई; 1949 में राष्ट्रीयकरण; मुख्यालय मुंबई।
  • भारत में GST 1 जुलाई 2017 से लागू; 101वें संशोधन (2016)।
  • GDP = देश की भौगोलिक सीमा के भीतर एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं/सेवाओं का बाजार मूल्य।
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राजकोषीय घाटा (Fiscal deficit) का तात्पर्य है:

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2012-13 के बजट में सब्सिडी पर व्यय को सीमित करने का लक्ष्य रखा गया —

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भारत में मुद्रास्फीति को किसके द्वारा मापा जाता है —

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