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📚 आर्थिक अवधारणाएं एवं भारतीय अर्थव्यवस्था

उद्योग — औद्योगिक नीति, LPG सुधार, MSME एवं मेक इन इंडिया — RAS 2026 नोट्स

Industry — Industrial Policy, LPG Reforms, MSME & Make in India — RAS 2026 Notes

14 मिनटintermediate✓ अपडेटेड: अगस्त 2026· Economic Concepts and Indian Economy

परिचय

RAS प्रारंभिक परीक्षा के आर्थिक भाग में उद्योग (Industry) उन कुछ विषयों में से है जो अकेले ही तीन दशकों के आर्थिक इतिहास (1948 से 1991 तक की नीति-यात्रा), एक संरचनात्मक सुधार-कथा (1991 के LPG सुधारों का औद्योगिक पक्ष) तथा एक सतत बदलते करेंट-अफेयर्स ब्लॉक (मेक इन इंडिया, PLI योजनाएँ, औद्योगिक गलियारे, राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन) — तीनों को एक साथ जोड़ता है। भारत में औद्योगिक नीति का अर्थ है वह सरकारी ढाँचा जो यह तय करता है कि किन उद्योगों में सार्वजनिक, निजी अथवा दोनों क्षेत्रों की भागीदारी होगी, किन उद्योगों के लिए लाइसेंस अनिवार्य होगा, तथा विदेशी पूँजी व प्रौद्योगिकी को किस सीमा तक अनुमति दी जाएगी। स्वतंत्रता के बाद भारत ने "मिश्रित अर्थव्यवस्था" मॉडल अपनाया, जिसमें भारी व आधारभूत उद्योग राज्य के नियंत्रण में रहे; 1991 के बाद लाइसेंस-परमिट राज को क्रमिक रूप से समाप्त कर औद्योगिक क्षेत्र को प्रतिस्पर्धा, निजी निवेश तथा वैश्विक पूँजी के लिए खोला गया। आज का MSME, मेक इन इंडिया, PLI तथा औद्योगिक गलियारों का ढाँचा उसी 1991 की नींव पर खड़ा है।

मुख्य अवधारणाएँ

1. औद्योगिक नीति का विकासक्रम — 1948 से 1991 तक

भारत की पहली औद्योगिक नीति — औद्योगिक नीति संकल्प, 1948 — ने उद्योगों को चार वर्गों में बाँटा: रक्षा, परमाणु ऊर्जा एवं रेल जैसे उद्योग पूर्णतः राज्य के लिए आरक्षित; कोयला, इस्पात व दूरसंचार जैसे आधारभूत उद्योगों पर राज्य का नियंत्रण किंतु मौजूदा निजी इकाइयाँ यथावत; शेष उद्योग सरकारी नियमन के अधीन निजी क्षेत्र के लिए खुले। इसी नीति ने भारत में "मिश्रित अर्थव्यवस्था" मॉडल की नींव रखी। औद्योगिक नीति संकल्प, 1956 — जिसे प्रायः भारत का "आर्थिक संविधान" कहा जाता है — ने उद्योगों को तीन अनुसूचियों में विभाजित किया: अनुसूची-A (17 उद्योग पूर्णतः सार्वजनिक क्षेत्र हेतु आरक्षित, जैसे रेल, परमाणु ऊर्जा, भारी मशीन-निर्माण), अनुसूची-B (राज्य द्वारा क्रमिक रूप से विस्तारित किए जाने वाले उद्योग, जिनमें निजी क्षेत्र भी सहभागी हो सकता है) तथा अनुसूची-C (शेष सभी उद्योग निजी क्षेत्र के लिए खुले)। इस नीति ने भारी व पूँजीगत वस्तु उद्योगों (द्वितीय पंचवर्षीय योजना की महालनोबिस रणनीति के अनुरूप) पर विशेष बल दिया तथा आयात-प्रतिस्थापन रणनीति को संस्थागत रूप दिया।

औद्योगिक नीति, 1977 ने विकेंद्रीकृत औद्योगिक विकास पर बल देते हुए ग्राम, कुटीर एवं लघु उद्योगों को प्रोत्साहन दिया — इसके अंतर्गत जिला उद्योग केंद्रों (District Industries Centres — DIC) की स्थापना की गई और लगभग 800 उत्पाद विशेष रूप से लघु-स्तरीय क्षेत्र (Small-Scale Sector) के लिए आरक्षित किए गए, ताकि श्रम-प्रधान उत्पादन व रोजगार सृजन को बढ़ावा मिले। औद्योगिक नीति, 1980 ने आधुनिकीकरण एवं तकनीकी उन्नयन पर ज़ोर दिया — क्षमता-विस्तार (capacity expansion) के नियमों में ढील दी गई, बीमार उद्योगों (sick industries) के पुनरुद्धार को समर्थन मिला, तथा आर्थिक संघवाद को प्रोत्साहित किया गया। इन क्रमिक परिवर्तनों को 1991 के व्यापक सुधारों की "पूर्वपीठिका" (prelude) माना जाता है, क्योंकि 1980 के दशक में ही लाइसेंसिंग व्यवस्था को धीरे-धीरे उदार बनाया जाने लगा था।

स्वतंत्रता-पश्चात भारत के औद्योगिक विकास को नीतिगत दिशा एवं वृद्धि-दर के आधार पर चार व्यापक चरणों में बाँटा जाता है — चरण-I (1951-1965): तीव्र औद्योगिक विस्तार (औसत वृद्धि लगभग 7.6% प्रतिवर्ष, विशेषकर भारी उद्योगों में); चरण-II (1966-1979): कृषि संकट, युद्धों (1962, 1965, 1971) से उपजी राजकोषीय बाधाओं, माँग-संकुचन तथा लाइसेंस-परमिट राज के चलते औद्योगिक मंदी एवं ठहराव; चरण-III (1980-2000): क्रमिक नीतिगत उदारीकरण से औद्योगिक पुनरुद्धार, जिसमें वृद्धि उत्पादकता-आधारित होने लगी; तथा चरण-IV (2000 से आगे): वैश्वीकरण एवं प्रतिस्पर्धात्मक औद्योगिक विकास का दौर। यह कालानुक्रमिक फ्रेमवर्क RAS परीक्षा में समय-सीमा आधारित प्रश्नों के लिए अत्यंत उपयोगी है।

2. LPG सुधार 1991 — औद्योगिक नीति का पक्ष

1991 का भुगतान संतुलन संकट (विदेशी मुद्रा भंडार मात्र कुछ सप्ताह के आयात लायक शेष, सार्वजनिक ऋण GDP के लगभग 53% तक पहुँचना, राजकोषीय घाटे में लगातार वृद्धि, खाड़ी युद्ध से तेल आयात बिल में उछाल, तथा संकट से निपटने हेतु लगभग 67 टन स्वर्ण गिरवी रखना) ने भारत को अपने आर्थिक ढाँचे में मौलिक परिवर्तन के लिए बाध्य किया। प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव एवं वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में 24 जुलाई 1991 को नई आर्थिक नीति (NEP) की घोषणा हुई, जिसे संक्षेप में LPG मॉडल — उदारीकरण (Liberalization), निजीकरण (Privatization) एवं वैश्वीकरण (Globalization) — कहा जाता है।

इसका सबसे सीधा औद्योगिक-नीतिगत प्रभाव यह हुआ कि दशकों पुराने औद्योगिक लाइसेंसिंग तंत्र को लगभग समाप्त कर दिया गया — पूर्व में लगभग सभी उद्योगों के लिए अनिवार्य रहा लाइसेंस अब केवल 18 रणनीतिक/संवेदनशील उद्योगों तक सीमित कर दिया गया (जिसे बाद के वर्षों में क्रमशः और घटाया गया)। MRTP अधिनियम (Monopolies and Restrictive Trade Practices Act) के अंतर्गत बड़े औद्योगिक समूहों पर लगी परिसंपत्ति-सीमा (asset limit) की बाध्यता हटाई गई, जिससे कंपनियों को बिना पूर्व सरकारी अनुमति के विस्तार व विलय की छूट मिली। इसके साथ ही 34 उच्च-प्राथमिकता वाले उद्योगों में विदेशी निवेश को 51% तक स्वचालित अनुमोदन (Automatic Route) दिया गया — यह भारत में उदार FDI नीति की शुरुआत थी। व्यापार उदारीकरण के अंतर्गत आयात-निर्यात प्रक्रिया को सरल बनाया गया तथा वित्तीय क्षेत्र सुधारों के तहत ब्याज दरों का विनियमन (deregulation) आरंभ हुआ।

NEP 1991 के परिणामस्वरूप GDP वृद्धि दर लगभग 3.5% की तथाकथित "हिंदू वृद्धि दर" (Hindu Rate of Growth) — यह शब्द अर्थशास्त्री राज कृष्ण द्वारा गढ़ा गया — से बढ़कर औसतन 6-7% प्रतिवर्ष हो गई, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, विदेशी मुद्रा भंडार 5.8 अरब डॉलर से बढ़कर आज 700 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है, और औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता में उल्लेखनीय सुधार हुआ। साथ ही आलोचनाएँ भी सामने आईं — सुधारों का लाभ मुख्यतः कुशल एवं उच्च-आय वर्ग तक सीमित रहा, क्षेत्रीय असमानता बढ़ी (विकास पहले से विकसित राज्यों में अधिक केंद्रित रहा), रोजगार-विहीन वृद्धि (Jobless Growth) की समस्या उभरी क्योंकि रोजगार वृद्धि दर GDP वृद्धि की तुलना में काफी धीमी रही, तथा अर्थव्यवस्था वैश्विक झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गई।

3. औद्योगिक लाइसेंसिंग एवं डी-लाइसेंसिंग — वर्तमान स्थिति

औद्योगिक लाइसेंसिंग का कानूनी आधार उद्योग (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1951 (IDR अधिनियम) है, जिसके अंतर्गत केंद्र सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि वह किसी उद्योग की स्थापना, विस्तार अथवा उत्पाद-मिश्रण में परिवर्तन हेतु लाइसेंस अनिवार्य कर सके। 1991 से पहले यह लाइसेंसिंग तंत्र लगभग सभी उद्योगों पर लागू था और इसे व्यापक रूप से "लाइसेंस-परमिट राज" कहा जाता था, जो निवेश, नवाचार व उद्यमिता को हतोत्साहित करने का प्रमुख कारण माना जाता है। 1991 के सुधारों ने इसे 18 उद्योगों तक सीमित किया; उसके बाद के वर्षों में डी-लाइसेंसिंग की प्रक्रिया निरंतर आगे बढ़ती गई।

वर्तमान में औद्योगिक लाइसेंस केवल गिने-चुने उद्योगों के लिए अनिवार्य है — जिनमें रक्षा उपकरण व एयरोस्पेस से जुड़े कुछ उत्पाद, विस्फोटक व आतिशबाज़ी, अत्यंत खतरनाक रसायन, सिगरेट/तंबाकू उत्पाद, तथा आसवन (distillation) द्वारा निर्मित अल्कोहलिक पेय पदार्थ शामिल हैं — शेष लगभग सभी क्षेत्र लाइसेंस-मुक्त हैं और केवल पर्यावरण, सुरक्षा व श्रम संबंधी सामान्य विनियमन के अधीन हैं। नीतिगत दृष्टि से इस पूरे तंत्र की देखरेख अब उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) करता है, जो वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत औद्योगिक नीति, FDI नीति, स्टार्टअप इंडिया तथा व्यापार करने में सुगमता (Ease of Doing Business) से जुड़े सुधारों का नोडल निकाय है।

4. MSME क्षेत्र — वर्गीकरण, महत्व एवं प्रमुख योजनाएँ

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र भारत के औद्योगिक विकास की रीढ़ माना जाता है — यह विनिर्माण उत्पादन में लगभग 35.4%, कुल निर्यात में लगभग 45% (कुछ आँकड़ों में 48.5% तक) तथा GDP में लगभग 30% का योगदान देता है, और कृषि क्षेत्र के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा रोजगारदाता है, जो 23 करोड़ से अधिक व्यक्तियों को रोजगार देता है — देश के लगभग 90% व्यवसाय MSME क्षेत्र से संबंधित हैं। MSME क्षेत्र का विधिक आधार सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास (MSMED) अधिनियम, 2006 है।

1 जुलाई 2020 से लागू संशोधित MSME वर्गीकरण ने निवेश एवं टर्नओवर — दोनों को संयुक्त मानदंड (composite criteria) बनाया, जो पहले केवल निवेश पर आधारित था। नई सीमाएँ इस प्रकार हैं — सूक्ष्म (Micro): निवेश ₹2.5 करोड़ तक, टर्नओवर ₹10 करोड़ तक; लघु (Small): निवेश ₹25 करोड़ तक, टर्नओवर ₹100 करोड़ तक; मध्यम (Medium): निवेश ₹125 करोड़ तक, टर्नओवर ₹500 करोड़ तक। यह वर्गीकरण उद्यम (Udyam) पंजीकरण पोर्टल के माध्यम से स्व-घोषणा आधारित, पूर्णतः ऑनलाइन एवं पेपरलेस प्रक्रिया के ज़रिए लागू होता है, तथा हालिया संशोधन ने निवेश सीमाएँ ढाई गुना व टर्नओवर सीमाएँ लगभग दोगुनी बढ़ाकर अधिक इकाइयों को MSME के लाभ के दायरे में लाने का प्रयास किया है।

MSME क्षेत्र को समर्थन देने वाली प्रमुख योजनाओं में शामिल हैं — CGTMSE (क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट), जो बिना संपार्श्विक ऋण की गारंटी देता है; PMEGP (प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम), जो नए सूक्ष्म उद्यमों की स्थापना हेतु सब्सिडी प्रदान करता है; TReDS मंच, जो MSMEs के व्यापार प्राप्तियों (trade receivables) की डिस्काउंटिंग के ज़रिए कार्यशील पूँजी की समस्या दूर करता है; तथा ZED (Zero Defect Zero Effect) प्रमाणन योजना, जो गुणवत्तापूर्ण एवं पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन को प्रोत्साहित करती है। इन सभी योजनाओं का साझा उद्देश्य ऋण उपलब्धता, प्रौद्योगिकी उन्नयन एवं बाज़ार पहुँच के मामले में MSMEs के समक्ष आने वाली संरचनात्मक बाधाओं को दूर करना है।

5. औद्योगिक गलियारे (Industrial Corridors) एवं राष्ट्रीय निवेश व विनिर्माण क्षेत्र (NIMZ)

औद्योगिक गलियारा एक ऐसी नियोजित अवसंरचना-पट्टी है जो औद्योगिक नोड्स को बंदरगाहों, राजमार्गों, रेल एवं समर्पित माल ढुलाई गलियारों (Dedicated Freight Corridors) से जोड़कर एकीकृत विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करती है। भारत में इसका सबसे बड़ा एवं प्रथम उदाहरण दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा (DMIC) है, जो पश्चिमी समर्पित माल ढुलाई गलियारे के समानांतर विकसित किया गया। इसके अतिरिक्त चेन्नई-बेंगलुरु औद्योगिक गलियारा (CBIC), अमृतसर-कोलकाता औद्योगिक गलियारा (AKIC), बेंगलुरु-मुंबई आर्थिक गलियारा (BMEC), पूर्वी तटीय आर्थिक गलियारा (ECEC) तथा हैदराबाद-बेंगलुरु व हैदराबाद-नागपुर गलियारे भी विकसित किए जा रहे हैं — कुल मिलाकर लगभग 11-12 गलियारों के अंतर्गत 32 से अधिक परियोजनाएँ चल रही हैं।

इन सभी गलियारों के नियोजन, वित्तपोषण एवं क्रियान्वयन की देखरेख राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास कार्यक्रम (National Industrial Corridor Development Programme — NICDP) के अंतर्गत राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास एवं कार्यान्वयन ट्रस्ट (NICDIT) करता है, जो DPIIT के अधीन कार्य करता है। इससे संबंधित एक और महत्वपूर्ण अवधारणा है राष्ट्रीय निवेश एवं विनिर्माण क्षेत्र (National Investment and Manufacturing Zones — NIMZ), जिसे राष्ट्रीय विनिर्माण नीति 2011 के अंतर्गत परिकल्पित किया गया — ये कम-से-कम 5,000 हेक्टेयर क्षेत्रफल के बड़े, एकीकृत, स्वतः-शासित (self-governing) औद्योगिक टाउनशिप हैं, जिनका प्रबंधन एक विशेष प्रयोजन वाहन (Special Purpose Vehicle — SPV) करता है, ताकि विश्वस्तरीय अवसंरचना के साथ विनिर्माण इकाइयों को एक ही स्थान पर केंद्रित किया जा सके।

6. मेक इन इंडिया एवं उत्पादन-सहबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ

मेक इन इंडिया पहल 25 सितंबर 2014 को आरंभ की गई, जिसका उद्देश्य भारत को वैश्विक विनिर्माण एवं निवेश केंद्र में बदलना है। यह चार स्तंभों पर आधारित है — नई प्रक्रियाएँ (New Processes): व्यापार करने में सुगमता (Ease of Doing Business) को प्राथमिकता; नई अवसंरचना (New Infrastructure): औद्योगिक गलियारे, कुशल कौशल विकास एवं आधुनिक तकनीकी अवसंरचना; नए क्षेत्र (New Sectors): रक्षा उत्पादन, रेलवे, बीमा एवं चिकित्सा उपकरण जैसे 25 से अधिक क्षेत्रों को FDI के लिए उदार बनाना; तथा नई सोच (New Mindset): सरकार की भूमिका नियामक (Regulator) से बदलकर सुविधाप्रदाता (Facilitator) बनाना। इसका लक्ष्य विनिर्माण की GDP-हिस्सेदारी को बढ़ाकर 25% करना तथा 10 करोड़ नए रोजगार सृजित करना था।

मेक इन इंडिया को गति देने के लिए 2020 में आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत उत्पादन-सहबद्ध प्रोत्साहन (Production Linked Incentive — PLI) योजनाएँ शुरू की गईं, जिनके तहत कंपनियों को भारत में उत्पादन की वृद्धिशील बिक्री (incremental sales) पर वित्तीय प्रोत्साहन दिया जाता है — यह परंपरागत आयात-प्रतिस्थापन के बजाय निर्यात-प्रधान, वैश्विक मूल्य-शृंखला (Global Value Chain) में एकीकरण की रणनीति पर आधारित है। कुल मिलाकर लगभग ₹1.97 लाख करोड़ के परिव्यय के साथ 14 प्रमुख क्षेत्रों को PLI के दायरे में लाया गया — जिनमें मोबाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक घटक विनिर्माण, फार्मास्युटिकल्स (बल्क ड्रग्स/KSM), चिकित्सा उपकरण, दूरसंचार एवं नेटवर्किंग उत्पाद, वस्त्र (मानव-निर्मित रेशा — MMF), खाद्य प्रसंस्करण, श्वेत वस्तुएँ (AC एवं LED), विशेष इस्पात, ऑटोमोबाइल एवं ऑटो घटक, उन्नत रसायन सेल (ACC) बैटरी, सौर PV मॉड्यूल, ड्रोन तथा IT हार्डवेयर शामिल हैं। ऑटोमोबाइल क्षेत्र में PLI योजना का उद्देश्य उन्नत ऑटोमोटिव प्रौद्योगिकी (AAT) उत्पादों को बढ़ावा देना है, जबकि PLI-ACC बैटरी योजना का लक्ष्य लगभग 50 GWh क्षमता का घरेलू बैटरी विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है।

7. राष्ट्रीय विनिर्माण नीति (NMP), 2011 एवं राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन (NMM), 2025

राष्ट्रीय विनिर्माण नीति, 2011 का उद्देश्य भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र में बदलना था — इसके लक्ष्यों में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर 12-14% प्रतिवर्ष तक ले जाना, GDP में विनिर्माण की हिस्सेदारी को 16% से बढ़ाकर 25% करना, 10 करोड़ रोजगार सृजित करना, अधिक घरेलू मूल्य संवर्धन (Domestic Value Addition), समावेशी विकास (कौशल विकास एवं रोजगार सृजन पर बल), वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता तथा सतत/पर्यावरण-अनुकूल औद्योगिकीकरण शामिल थे। इसी नीति ने NIMZ की अवधारणा प्रस्तुत की तथा आगे चलकर मेक इन इंडिया कार्यक्रम की आधारशिला रखी।

केंद्रीय बजट 2025-26 में विनिर्माण को भारत के आर्थिक रूपांतरण का प्रमुख चालक बनाने की परिकल्पना के साथ राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन (National Manufacturing Mission — NMM) की घोषणा की गई। इसके 2035 तक के लक्ष्य हैं — GDP में विनिर्माण की हिस्सेदारी लगभग 13% से बढ़ाकर 25% करना, 4.3 करोड़ नए रोजगार सृजित करना, तथा माल निर्यात को लगभग 2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक ले जाना। इसके पाँच प्रमुख फोकस क्षेत्र हैं — व्यवसाय करने में सुगमता एवं अनुपालन-लागत में कमी, भविष्य के लिए तैयार कार्यबल (कौशल विकास), MSME क्षेत्र को सशक्त बनाना, उन्नत विनिर्माण तकनीकों तक प्रौद्योगिकी उपलब्धता, तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता हासिल करने हेतु गुणवत्तापूर्ण उत्पाद। NMM को मेक इन इंडिया व PLI के अगले चरण के रूप में देखा जा सकता है।

8. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) एवं औद्योगिक वृद्धि रुझान

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (Index of Industrial Production — IIP) समय के साथ भारत में औद्योगिक उत्पादन की मात्रा में हो रहे परिवर्तन को मापने वाला सूचकांक है, जिसे राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा मासिक आधार पर प्रकाशित किया जाता है — वर्तमान आधार वर्ष 2011-12 है। IIP में तीन क्षेत्रीय भार निर्धारित हैं — विनिर्माण (77.63%), खनन (14.37%) एवं विद्युत (7.94%) — जिससे स्पष्ट है कि IIP मुख्यतः विनिर्माण-केंद्रित सूचकांक है।

IIP के भीतर आठ प्रमुख कोर उद्योगों (Eight Core Industries) — कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पाद, उर्वरक, इस्पात, सीमेंट एवं विद्युत — का समग्र भार 40.27% है, जिसके कारण इन्हें "औद्योगिक विकास की रीढ़" कहा जाता है, क्योंकि ये शेष विनिर्माण क्षेत्र को कच्चा माल, ऊर्जा एवं मूल इनपुट उपलब्ध कराते हैं। इन आठ उद्योगों में सबसे अधिक भार रिफाइनरी उत्पादों का है (लगभग 28.04%), इसके बाद विद्युत (19.85%), इस्पात (17.92%), कोयला (10.33%), कच्चा तेल (8.98%), प्राकृतिक गैस (6.88%), सीमेंट (5.37%) तथा उर्वरक (2.63%) का स्थान आता है। ये आठ उद्योग अर्थव्यवस्था में आर्थिक गतिविधियों के अग्रणी संकेतक (Leading Indicators) के रूप में कार्य करते हैं तथा अवसंरचना एवं विनिर्माण — दोनों क्षेत्रों को सीधे प्रभावित करते हैं, इसलिए इनकी मासिक वृद्धि दर पर नीति-निर्माताओं की करीबी नज़र रहती है।

9. उद्योग में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI)

1991 से पहले भारत में विदेशी निवेश अत्यंत सीमित एवं भारी नियामकीय अनुमोदन के अधीन था। NEP 1991 के बाद इसे क्रमिक रूप से उदार बनाया गया, और आज अधिकांश क्षेत्रों में FDI या तो स्वचालित मार्ग (Automatic Route) के तहत अनुमत है — जहाँ निवेशक को केवल रिज़र्व बैंक को सूचित करना होता है, पूर्व सरकारी अनुमोदन की आवश्यकता नहीं — अथवा सरकारी मार्ग (Government Route) के तहत, जहाँ संबंधित मंत्रालय की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होती है (जैसे रक्षा उत्पादन में 74% से ऊपर, मीडिया, दूरसंचार के कुछ उप-क्षेत्र)। इस पूरी नीति का नोडल निकाय DPIIT है, जो समेकित FDI नीति (Consolidated FDI Policy) जारी करता है और सेक्टर-वार निवेश सीमाएँ (sectoral caps) निर्धारित करता है।

औद्योगिक क्षेत्र में FDI का प्रवाह मुख्यतः विनिर्माण, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्युटिकल्स एवं दूरसंचार उपकरण जैसे क्षेत्रों में केंद्रित रहा है, और PLI योजनाओं के आने के बाद इसमें और तेज़ी आई है, क्योंकि वैश्विक कंपनियाँ भारत को "चीन+1" रणनीति के अंतर्गत एक वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र के रूप में देख रही हैं। राष्ट्रीय सिंगल विंडो प्रणाली (National Single Window System) जैसी पहलों ने निवेशकों के लिए मंजूरियाँ प्राप्त करना तथा नई औद्योगिक इकाई स्थापित करना आसान बनाया है, जो व्यापार करने में सुगमता की समग्र रैंकिंग सुधार की दिशा में एक अहम कदम है।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • औद्योगिक नीति संकल्प 1956 को भारत का "आर्थिक संविधान" कहा जाता है; इसमें अनुसूची-A के अंतर्गत 17 उद्योग पूर्णतः सार्वजनिक क्षेत्र हेतु आरक्षित थे।
  • NEP 1991 की घोषणा 24 जुलाई 1991 को PM पी.वी. नरसिम्हा राव एवं वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में हुई; LPG = उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण।
  • 1991 सुधारों ने औद्योगिक लाइसेंसिंग को 18 उद्योगों तक सीमित किया; वर्तमान में यह केवल कुछ रणनीतिक/संवेदनशील उद्योगों (रक्षा, विस्फोटक, खतरनाक रसायन, तंबाकू, शराब) तक सीमित है — कानूनी आधार IDR अधिनियम, 1951।
  • संशोधित MSME वर्गीकरण (2020): सूक्ष्म — निवेश ₹2.5 करोड़/टर्नओवर ₹10 करोड़ तक; लघु — ₹25 करोड़/₹100 करोड़ तक; मध्यम — ₹125 करोड़/₹500 करोड़ तक।
  • MSME क्षेत्र GDP में लगभग 30%, विनिर्माण उत्पादन में लगभग 35.4%, निर्यात में लगभग 45% का योगदान देता है तथा 23 करोड़ से अधिक को रोजगार देता है।
  • प्रमुख औद्योगिक गलियारे: DMIC, CBIC, AKIC, BMEC, ECEC — कुल लगभग 11-12 गलियारे, 32+ परियोजनाएँ, देखरेख NICDIT (DPIIT के अंतर्गत)।
  • मेक इन इंडिया की शुरुआत 25 सितंबर 2014; चार स्तंभ — नई प्रक्रियाएँ, नई अवसंरचना, नए क्षेत्र, नई सोच।
  • PLI योजना 2020 में शुरू; 14 क्षेत्र शामिल; कुल परिव्यय लगभग ₹1.97 लाख करोड़।
  • राष्ट्रीय विनिर्माण नीति (NMP) 2011 का लक्ष्य: GDP में विनिर्माण हिस्सेदारी 16% से 25%, 10 करोड़ रोजगार; राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन (NMM), बजट 2025-26 का लक्ष्य: 2035 तक 25% GDP हिस्सेदारी, 4.3 करोड़ रोजगार, $2 ट्रिलियन निर्यात।
  • IIP का प्रकाशन NSO द्वारा मासिक होता है, आधार वर्ष 2011-12; विनिर्माण भार 77.63%, खनन 14.37%, विद्युत 7.94%; आठ कोर उद्योगों का समग्र भार IIP में 40.27% (रिफाइनरी उत्पादों का भार सर्वाधिक — 28.04%)।

परीक्षा टिप्स

  • औद्योगिक नीतियों के वर्ष (1948, 1956, 1977, 1980, 1991, 2011) तथा उनकी एक-एक विशिष्ट पहचान (जैसे 1956="आर्थिक संविधान", 1977="जिला उद्योग केंद्र") को क्रमबद्ध ढंग से याद रखें — RAS में वर्ष व नीति को जोड़ने वाले प्रश्न बार-बार आते हैं।
  • PLI, मेक इन इंडिया, NMP 2011 तथा NMM 2025 — चारों को अलग-अलग वर्षों व उद्देश्यों के साथ न मिलाएँ; ये एक-दूसरे के पूरक हैं, विकल्प नहीं।
  • MSME वर्गीकरण की संख्याएँ (2.5-10, 25-100, 125-500) रटने के बजाय पैटर्न याद रखें — प्रत्येक अगली श्रेणी में निवेश-सीमा 10 गुना व टर्नओवर-सीमा 10 गुना बढ़ती है (सूक्ष्म से लघु तक), जबकि लघु से मध्यम में यह क्रमशः 5 गुना है।
  • IIP के आठ कोर उद्योगों के व्यक्तिगत भार को क्रम में याद करना कठिन है — बस याद रखें कि रिफाइनरी उत्पाद, विद्युत व इस्पात — इन तीन का मिलाकर भार 65% से अधिक है।
🧠 स्मरण ट्रिक — MSME वर्गीकरण सीढ़ी

"अढ़ाई-दस, पच्चीस-सौ, सवा सौ-पाँच सौ" — सूक्ष्म (2.5/10), लघु (25/100), मध्यम (125/500) — हर अंक को दायें से बायें पढ़ें तो निवेश-सीमा ठीक 10 गुना (2.5→25→125) बढ़ती दिखती है, और टर्नओवर-सीमा भी ठीक इसी क्रम में (10→100→500) बढ़ती है। "1-4-1" पैटर्न: लघु से मध्यम में निवेश 5 गुना (25→125) व टर्नओवर 5 गुना (100→500) बढ़ता है।

⚠️ कन्फ्यूज़न बस्टर — MRTP अधिनियम बनाम प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002

दोनों बड़ी कंपनियों के व्यवहार को नियंत्रित करने से जुड़े हैं, इसलिए अक्सर मिलाए जाते हैं। अंतर है दृष्टिकोण का: MRTP अधिनियम (1969) "नियंत्रण-आधारित" था — यह एकाधिकार व बड़े औद्योगिक घरानों के आकार को सीमित करने पर केंद्रित था (LPG-पूर्व सोच)। प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 ने MRTP का स्थान लिया और यह "प्रोत्साहन-आधारित" है — यह आकार को सीमित करने के बजाय बाज़ार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ाने तथा प्रतिस्पर्धा-विरोधी व्यवहार, कार्टेल व एकाधिकार पर रोक लगाने पर केंद्रित है, और इसके क्रियान्वयन हेतु भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की स्थापना की गई। त्वरित पहचान: "M" for "Monopoly-सीमित करना" (MRTP), "C" for "Competition-बढ़ाना" (CCI)।

📝 अभ्यास प्रश्न
Q1. नई आर्थिक नीति (NEP) 1991 की घोषणा कब हुई थी, और इसके नेतृत्वकर्ता कौन थे?

✅ 24 जुलाई 1991 को; PM पी.वी. नरसिम्हा राव एवं वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में।

Q2. औद्योगिक नीति संकल्प 1956 के अंतर्गत अनुसूची-A, अनुसूची-B व अनुसूची-C में क्या अंतर था?

✅ अनुसूची-A: 17 उद्योग पूर्णतः सार्वजनिक क्षेत्र हेतु आरक्षित; अनुसूची-B: राज्य द्वारा क्रमिक विस्तार वाले उद्योग (निजी क्षेत्र भी सहभागी); अनुसूची-C: निजी क्षेत्र हेतु खुले शेष उद्योग।

Q3. संशोधित MSME वर्गीकरण के अंतर्गत "सूक्ष्म उद्यम" की निवेश एवं टर्नओवर सीमा क्या है?

✅ निवेश ₹2.5 करोड़ तक तथा टर्नओवर ₹10 करोड़ तक।

Q4. PLI योजना कब शुरू हुई, इसमें कितने क्षेत्र शामिल हैं तथा कुल परिव्यय कितना है?

✅ 2020 में शुरू; 14 प्रमुख क्षेत्र शामिल; कुल परिव्यय लगभग ₹1.97 लाख करोड़।

Q5. IIP में आठ प्रमुख कोर उद्योगों का समग्र भार कितना है, और इनमें सबसे अधिक भार किस उद्योग का है?

✅ समग्र भार 40.27%; इनमें सबसे अधिक भार रिफाइनरी उत्पादों का है (लगभग 28.04%)।

सारांश

भारत का औद्योगिक विकास 1948 की पहली नीति से शुरू होकर 1956 के "आर्थिक संविधान", 1977 व 1980 की क्रमिक ढील, तथा अंततः 1991 के LPG सुधारों तक की एक सतत यात्रा है, जिसने लाइसेंस-परमिट राज को समाप्त कर उद्योग को प्रतिस्पर्धा व वैश्विक पूँजी के लिए खोला। आज इसी नींव पर MSME क्षेत्र (देश का दूसरा सबसे बड़ा रोजगारदाता), औद्योगिक गलियारे (DMIC, CBIC आदि), मेक इन इंडिया एवं PLI योजनाएँ, तथा राष्ट्रीय विनिर्माण नीति/मिशन जैसी पहलें भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने की दिशा में कार्य कर रही हैं, जिनकी प्रगति को IIP जैसे सूचकांकों के माध्यम से मापा जाता है। RAS प्रारंभिक परीक्षा के लिए नीतियों का कालक्रम, MSME वर्गीकरण, तथा PLI/NMP/NMM के लक्ष्यों व वर्षों में अंतर करना सर्वाधिक फलदायी है।

त्वरित रिवीजन — One-Liners

  • GDP = C + I + G + (X−M); यह एक वर्ष में देश की सीमा के भीतर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य है।
  • भारत की पहली पंचवर्षीय योजना 1951-56 में 'हैरोड-डोमर' मॉडल पर आधारित थी।
  • RBI की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को हुई; 1949 में राष्ट्रीयकरण; मुख्यालय मुंबई।
  • भारत में GST 1 जुलाई 2017 से लागू; 101वें संशोधन (2016)।
  • GDP = देश की भौगोलिक सीमा के भीतर एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं/सेवाओं का बाजार मूल्य।
इस टॉपिक को पूरा करने के बाद मार्क करें — सिलेबस प्रगति में जुड़ जाएगा।

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