पारदर्शिता (Transparency)
RAS मुख्य परीक्षा, पत्र II, इकाई I, बिंदु 3: "liberal society: transparency, media and bureaucracy" (उदार समाज: पारदर्शिता, मीडिया और नौकरशाही); इस पृष्ठ में पारदर्शिता
- जनवरी 2026 के पाठ्यक्रम के अनुसार अद्यतन
- पढ़ने का समय: लगभग 11 मिनट
परीक्षा-भार (2018-2024 के प्रश्नों के आधार पर)
"पारदर्शिता" नाम से 0 प्रश्न। यह पाठ्यक्रम की नई पंक्ति है, इसलिए हमारा अनुमान है कि यह आगे आ सकती है (RPSC की सूचना नहीं)। RTI अधिनियम पत्र III के विधि-खंड में भी है (धारा 1-20), इसलिए यह पृष्ठ दोनों जगह काम आएगा।
30 सेकंड का सार
याद रखें
- पारदर्शिता का अर्थ है कि सरकार का निर्णय और कामकाज जनता और मीडिया की जाँच के लिए खुला हो।
- तीन औज़ार: माँगने पर सूचना (RTI), बिना माँगे सूचना (स्वतः प्रकटीकरण) और सार्वजनिक सुनवाई या सामाजिक अंकेक्षण।
- राजस्थान का इसमें विशेष स्थान है: MKSS का जन-आंदोलन, राज्य का 2000 का RTI कानून और 2019 का जन सूचना पोर्टल।
- सीमाएँ: राष्ट्रीय सुरक्षा, निजता और गोपनीय सलाह; पर इनके लिए "स्पष्ट और विधिसम्मत कारण" चाहिए।
- पारदर्शिता जवाबदेही की पूर्व-शर्त है, पर अपने आप में उसकी गारंटी नहीं।
भाग क के लिए छोटे उत्तर (15 शब्द तक)
याद रखें
- प्रश्न: शासन में पारदर्शिता का क्या अर्थ है?
- उत्तर: पारदर्शिता यानी निर्णय और कामकाज का जनता और मीडिया की जाँच के लिए खुला होना।
- स्वतः प्रकटीकरण का अर्थ है बिना माँगे सरकारी जानकारी जनता तक पहुँचाना।
- पारदर्शिता जवाबदेही की पूर्व-शर्त है, पर उसकी गारंटी नहीं।
1. अर्थ
2nd ARC (चौथी रिपोर्ट, जनवरी 2007, अनुच्छेद 6.5.1): लोक प्रशासन में पारदर्शिता का अर्थ खुलापन और जवाबदेही है; संगठन तब पारदर्शी है जब उसका निर्णय-प्रक्रिया और कार्यशैली जनता और मीडिया की जाँच और सार्वजनिक चर्चा के लिए खुली हो। इससे जनता की भागीदारी बढ़ती है और ज़मीनी लोकतंत्र मज़बूत होता है।
2. उदार समाज में इसका स्थान
उदार लोकतंत्र में सत्ता जनता की धरोहर है और नागरिक के अधिकार पहले हैं। इसलिए राज्य को खुला रहना पड़ता है और व्यक्ति की निजता सुरक्षित रखनी पड़ती है। दोनों का संतुलन इस विषय का सार है (यह हमारी व्याख्या है)।
3. पारदर्शिता के चार लाभ
भ्रष्टाचार में कमी: विवेकाधिकार जहाँ खुले में, वहाँ दुरुपयोग कठिन। 2nd ARC (6.7.1) ने कर्नाटक में शिक्षकों के तबादले का उदाहरण दिया: कारण-सहित आवेदन, कंप्यूटर-निर्मित वरीयता-सूची का सूचना-पट पर प्रकाशन और आपत्तियों का आमंत्रण; रिपोर्ट के अनुसार इससे भ्रष्टाचार काफ़ी घटा।
जवाबदेही: जो दिखता है, उसी से जवाब माँगा जा सकता है।
भरोसा: नागरिक को निर्णय के कारण पता हों तो स्वीकार्यता बढ़ती है।
भागीदारी: जानकारी हो तो नागरिक सुझाव और शिकायत दे पाता है।
4. सिद्धांत और विचारक
नोलन का "ओपननेस" सिद्धांत: पदधारी खुले और पारदर्शी ढंग से निर्णय लें; सूचना तब तक न रोकी जाए जब तक "स्पष्ट और विधिसम्मत कारण" न हों (gov.uk का वर्तमान पाठ)।
लुई ब्रैंडाइस (दिसंबर 1913): "Sunlight is said to be the best of disinfectants." (हार्पर्स वीकली में "What Publicity Can Do"; स्रोत: विकिपीडिया)
5. भारत का कानूनी ढाँचा
(राजस्थान सहित)
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005: राष्ट्रपति की स्वीकृति 15 जून 2005; पूर्ण रूप से लागू 12 अक्तूबर 2005। लोक प्राधिकरण को सामान्यतः 30 दिन में जवाब देना है (जीवन और स्वतंत्रता के मामले में 48 घंटे, धारा 7(1))। धारा 4: अभिलेख सुव्यवस्थित और कंप्यूटरीकृत रखना और निर्धारित श्रेणियों की सूचना स्वयं प्रकाशित करना। धारा 8(1): छूटें, जैसे संप्रभुता और सुरक्षा (खंड a), व्यापारिक गोपनीयता (d), जाँच में बाधा (h), मंत्रिमंडल के कागज़ात (i) और व्यक्तिगत जानकारी (j)। धारा 8(2): जहाँ जनहित हानि से भारी हो, वहाँ प्राधिकारी छूट के बावजूद सूचना दे सकता है। धारा 24: खुफ़िया और सुरक्षा संगठनों को छूट, पर भ्रष्टाचार या मानवाधिकार-उल्लंघन के आरोप पर नहीं। (स्रोत: अधिनियम का पाठ, Indian Kanoon; पत्र III के पाठ्यक्रम में धारा 1-20)
2025 का बदलाव, जो उत्तर में ज़रूर जोड़ें: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 की धारा 44(3) ने RTI की धारा 8(1)(j) बदल दी। पुराना पाठ: निजी जानकारी तभी रोकी जाए जब उसका किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से संबंध न हो या वह निजता का अनुचित हनन करे, जब तक बड़ा जनहित प्रकटीकरण को उचित न ठहराए। नया पाठ केवल "व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित सूचना" कहता है; जनहित वाली शर्त हट गई है। यह बदलाव नवंबर 2025 से लागू है (अधिसूचना 13 नवंबर 2025)। सर्वोच्च न्यायालय में इसे चुनौती है; 7 अगस्त 2026 की सुनवाई की रिपोर्ट के अनुसार न्यायालय ने केंद्र से जवाब माँगा और रोक नहीं लगाई। धारा 8(2) का जनहित-परीक्षण अधिनियम में बना है, पर निजी जानकारी पर उसका असर अभी अदालत में परखा जाना है (यह हमारा आकलन है)। लिखते समय "वर्तमान प्रावधान और उस पर चल रही बहस" दोनों दें, कानून की स्थिति बदलती रहती है: नवीनतम आधिकारिक पाठ देख लें।
राजस्थान सूचना का अधिकार अधिनियम, 2000 (2000 का अधिनियम सं. 13): राज्यपाल की स्वीकृति 11 मई 2000, लागू 26 जनवरी 2001 (CHRI पर अधिनियम-पाठ के अनुसार)। 2005 में केंद्रीय अधिनियम आया।
राजस्थान लोक सेवाओं के गारंटीशुदा वितरण अधिनियम, 2011 (2011; लागू 14 नवंबर 2011, द्वितीयक स्रोत): अधिसूचित सेवाएँ समय-सीमा में देनी हैं; चूक पर अपील और अधिकारी पर जुर्माने की व्यवस्था (₹500 से ₹5,000, या विलंब पर ₹250 प्रतिदिन, अधिकतम ₹5,000)। स्रोत: अधिनियम का सारांश (द्वितीयक स्रोत; दंड-राशि दो स्रोतों में एक जैसी)।
उच्चतम न्यायालय: यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (2 मई 2002): उम्मीदवारों को अपने आपराधिक, वित्तीय और शैक्षिक विवरण का शपथ-पत्र देना होगा, ताकि मतदाता जान सकें। 15 फ़रवरी 2024 को सर्वोच्च न्यायालय (ADR बनाम भारत संघ) ने चुनावी बॉन्ड योजना को मतदाता के सूचना के अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(क)) का उल्लंघन मानकर असंवैधानिक ठहराया। स्रोत: विकिपीडिया (ADR पृष्ठ)।
6. पारदर्शिता की सीमाएँ
राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफ़िया सूचना (धारा 24 का आधार ऊपर)।
निजता: पुट्टस्वामी (24 अगस्त 2017) में निजता अनुच्छेद 21 का अंग मानी गई; RTI की धारा 8(1)(j) भी व्यक्तिगत जानकारी रोकती है (2025 के बदले पाठ के साथ, ऊपर)। इसलिए व्यक्तिगत विवरण का खुलासा सावधानी से।
गोपनीय सलाह और चल रही जाँच का नुकसान न हो।
पारदर्शिता का बोझ: बिना समझी गई सूचना-भरमार से भ्रम; इसलिए सूचना सरल और उपयोगी रूप में हो।
नोलन की शर्त: रोक के लिए "स्पष्ट और विधिसम्मत कारण"।
वास्तविक उदाहरण
MKSS, राजस्थान (1990 से)
मज़दूर किसान शक्ति संगठन की स्थापना 1 मई 1990 को हुई; संस्थापकों में अरुणा रॉय, निखिल डे और शंकर सिंह। उसने "जन सुनवाई" में सरकारी खर्च-अभिलेख गाँव वालों के सामने पढ़कर सुनाए और उनकी गवाही से तुलना की। 6 अप्रैल 1996 को ब्यावर में 40 दिन का धरना शुरू हुआ।
स्रोत: विकिपीडिया (MKSS पृष्ठ)।
जन सूचना पोर्टल, राजस्थान सरकार (13 सितंबर 2019)
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की उपस्थिति में शुरू; 21 योजनाओं की जानकारी स्वतः प्रकटीकरण के रूप में। लोकार्पण-कार्यक्रम का वर्णन संयुक्त राष्ट्र भारत की साइट पर है, जहाँ इसे पंचायत स्तर पर RTI के अंतर्गत स्वतः प्रकटीकरण की पहली पहल बताया गया (वक्ता का दावा; "पहली" का दावा अन्यत्र पुष्ट नहीं, इसलिए इसे वक्ता का दावा कहकर ही लिखें)।
सेवा-गारंटी कानून (2011)
समय-सीमा और जुर्माने से सेवा-वितरण को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने का प्रयास।
एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (2002)
पारदर्शिता का चुनावी रूप, "मतदाता का जानने का अधिकार"।
उत्तर में कैसे लगाएँ
परिभाषा (ARC 6.5.1) → कानूनी औज़ार (RTI, स्वतः प्रकटीकरण) → राजस्थान का उदाहरण (MKSS, 2000/2001, 2019) → सीमाएँ (सुरक्षा, निजता) → निष्कर्ष (संतुलन)।
विचारक और उद्धरण
| नाम | विचार | प्रयोग-योग्य पंक्ति |
|---|---|---|
| लुई ब्रैंडाइस (दिसंबर 1913) | प्रचार से सफ़ाई | "Sunlight is said to be the best of disinfectants." (हार्पर्स वीकली, "What Publicity Can Do") |
| नोलन समिति | खुलापन | "Information should not be withheld from the public unless there are clear and lawful reasons for so doing." (gov.uk का वर्तमान पाठ) |
| 2nd ARC (2007) | पारदर्शिता = खुलापन + जवाबदेही | अनुच्छेद 6.5.1 की परिभाषा (ऊपर) |
चित्र: 3 वृत्त और एक द्वार
माँगने पर सूचना (RTI)
तीन वृत्त: · ·
बिना माँगे सूचना (धारा 4, जन सूचना पोर्टल)
सार्वजनिक सुनवाई और सामाजिक अंकेक्षण (MKSS)
जवाबदेही
तीनों के बीच
सीमा-द्वार: सुरक्षा, निजता, गोपनीय सलाह (कारण लिखित, विधिसम्मत)
दाईं ओर द्वार
2018, 2021, 2023, 2024 के पत्र II में "पारदर्शिता" नाम से कोई प्रश्न नहीं मिला। यह गिनती 2018, 2021, 2023, 2024 के सभी 52 इकाई-I प्रश्नों पर आधारित है; यह RPSC की सूचना नहीं।
निकट संबंधी: 2018 और 2024 के भाग ख प्रश्न (राजनीतिक तटस्थता और पूर्वाग्रह, पृष्ठ 3.3, 3.4) नौकरशाही-राजनीति के कोण से इसी इकाई-पंक्ति को छूते हैं।
तैयारी-सलाह: चूँकि पंक्ति नई है, भाग ख (5 अंक) में "पारदर्शिता और जवाबदेही", और भाग क (2 अंक) में "स्वतः प्रकटीकरण" जैसे प्रश्न संभव हैं। यह हमारा अनुमान है।
आम गलतियाँ
याद रखें
- पारदर्शिता को केवल RTI तक सीमित कर देना; स्वतः प्रकटीकरण और सामाजिक अंकेक्षण छोड़ देना।
- सीमाएँ न लिखना, या सीमा के लिए बिना कारण "सुरक्षा" कह देना।
- राजस्थान के उदाहरण में तारीखें गड़बड़ाना (MKSS 1990, राज्य कानून 2000, लागू 2001, केंद्र 2005, पोर्टल 2019)।
आत्म-जाँच (5 प्रश्न)
याद रखें
- ARC के अनुसार पारदर्शिता का अर्थ क्या है?
- RTI 2005 कब लागू हुआ और जवाब की सामान्य अवधि क्या है?
- MKSS की "जन सुनवाई" क्या थी?
- जन सूचना पोर्टल कब शुरू हुआ?
- पारदर्शिता की दो सीमाएँ बताइए।
काल्पनिक केस
उदाहरण (काल्पनिक)काल्पनिक केस (Hypothetical case)
उप-खंड अधिकारी (SDM) विनय को एक RTI आवेदन मिलता है, जिसमें वृद्धावस्था पेंशन योजना के लाभार्थियों की सूची, उनके नाम-पते, भुगतान की राशि और निरीक्षण रिपोर्टें माँगी गई हैं। कार्यालय का बाबू कहता है, "निजता का हवाला देकर मना कर दीजिए, झंझट नहीं रहेगा।" स्थानीय विधायक के एक रिश्तेदार का नाम सूची में संदिग्ध लगता है।
- हितधारक
- विनय, आवेदक, पेंशन-लाभार्थी, संदिग्ध नाम वाला व्यक्ति और विधायक, कार्यालय-कर्मचारी, विभाग, सूचना आयोग।
- मुद्दा और टकराते मूल्य
- पारदर्शिता और जवाबदेही बनाम निजता और राजनीतिक असुविधा का भय।
- तीन विकल्प
- (क) निजता के नाम पर पूरी सूचना रोकना, योजना-स्तर के आँकड़े भी। लाभ: झंझट कम। हानि: वह जानकारी भी रुकती है जो रोकी नहीं जानी चाहिए (धारा 4 की सूचना, योजना-स्तर के आँकड़े); अपील और बदनामी का जोखिम; गड़बड़ी छिपने की आशंका। (ख) बिना छाँटे सब कुछ दे देना, पहचान-संख्या सहित। लाभ: पूर्ण खुलापन। हानि: लाभार्थियों की निजता और सुरक्षा को खतरा। (ग) कानून के अनुसार सूचना देना: नाम, योजना और भुगतान की राशि जैसी लोक-हित की जानकारी देना, पर संवेदनशील व्यक्तिगत पहचान-विवरण हटाकर; जो अंश रोका जाए, उसका कारण लिखित में बताना; संदिग्ध नाम की स्वतंत्र जाँच कराना। लाभ: दोनों मूल्यों का संतुलन। हानि: अतिरिक्त परिश्रम और संभावित राजनीतिक दबाव।
- सर्वोत्तम विकल्प और समर्थक मूल्य
- विकल्प (ग)। मूल्य: पारदर्शिता, जवाबदेही और निजता का सम्मान; नोलन का "स्पष्ट और विधिसम्मत कारण" का मापदंड। कानूनी टिप्पणी: 2025 के बाद धारा 8(1)(j) में जनहित-शर्त नहीं है, इसलिए नाम-पते देना अधिकारी का विवेक-भरा निर्णय है; जो लाभार्थी-सूची योजना-नियमों के तहत स्वतः प्रकाशन के लिए है, वह दें, शेष पहचान-विवरण रोकें और कारण लिखें। संदिग्ध नाम की जाँच सूचना देने या न देने से अलग, विभाग स्वयं करे।
सीख
कदम: अल्पकालिक: निर्धारित अवधि में जवाब, रोके गए अंश का कारण, संदिग्ध नाम की जाँच। दीर्घकालिक: लाभार्थी-सूची का स्वतः प्रकटीकरण (धारा 4) जन सूचना पोर्टल जैसे माध्यम पर, पहचान-विवरण छिपाकर, और ग्राम-स्तर पर सामाजिक अंकेक्षण।
अभ्यास प्रश्न
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
पारदर्शिता जवाबदेही को कैसे मज़बूत करती है? इसकी दो सीमाएँ बताइए।
आदर्श उत्तर
पारदर्शिता में निर्णय जनता और मीडिया की जाँच के लिए खुले होते हैं, इसलिए अधिकारी से जवाब माँगना संभव होता है; RTI 2005 इसका औज़ार है। सीमाएँ: राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफ़िया सूचना, तथा निजता, जिसे पुट्टस्वामी (2017) ने अनुच्छेद 21 का अंग माना। रोक के लिए कारण स्पष्ट और विधिसम्मत हों।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
"पारदर्शिता सबसे अच्छा कीटाणुनाशक है, पर रामबाण नहीं।" RTI और राजस्थान के अनुभव के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
आदर्श उत्तर
ब्रैंडाइस की उक्ति के अनुसार सूर्य-प्रकाश सबसे अच्छा कीटाणुनाशक है। राजस्थान में MKSS की जन सुनवाइयों (1990 से) ने खर्च-अभिलेखों को गाँव के सामने रखा; इसी पृष्ठभूमि में राज्य का 2000 का RTI कानून और 2005 का केंद्रीय अधिनियम आया। 2019 के जन सूचना पोर्टल ने स्वतः प्रकटीकरण को आगे बढ़ाया। फिर भी सूचना अकेली पर्याप्त नहीं: अपील, कार्रवाई और जागरूक नागरिक चाहिए। आयोग की अपील और जन सुनवाई ही सूचना को कार्रवाई में बदलती हैं। सुरक्षा और निजता की सीमाएँ भी हैं। इसलिए पारदर्शिता को जवाबदेही-तंत्र, सरल सूचना और निजता की रक्षा के साथ जोड़ना होगा।
यह उत्तर कैसे लिखें
भूमिका
ARC की परिभाषा
मुख्य भाग
- औज़ार, राजस्थान, सीमाएँ
निष्कर्ष
पारदर्शिता + जवाबदेही-तंत्र
अतिरिक्त मूल्य
- ब्रैंडाइस, नोलन, ADR 2002
एक पेज में दोहराव
- पारदर्शिता = खुलापन + जवाबदेही (ARC 6.5.1)
- तीन औज़ार (माँगने पर, बिना माँगे, सामाजिक अंकेक्षण)
- नोलन ओपननेस
- ब्रैंडाइस दिसंबर 1913
- MKSS 1.5.1990, ब्यावर धरना 6.4.1996 (40 दिन)
- राजस्थान RTI 2000 (स्वीकृति 11.5.2000, लागू 26.1.2001)
- RTI 2005 (स्वीकृति 15.6.2005, पूर्ण 12.10.2005; 30 दिन, 48 घंटे)
- धारा 4, धारा 24
- जन सूचना पोर्टल 13.9.2019
- सेवा-गारंटी अधिनियम 2011 (लागू 14.11.2011)
- ADR 2.5.2002
- चुनावी बॉन्ड 15.2.2024
- पुट्टस्वामी 24.8.2017
- कर्नाटक शिक्षक-तबादला (ARC 6.7.1)
- काल्पनिक केस: SDM विनय, पहचान छिपाकर सूचना + कारण लिखित।