प्रबंध के कार्य: नियोजन, संगठन, कर्मचारी-व्यवस्था, निर्देशन और नियंत्रण
नियोजन से नियंत्रण तक पाँचों कार्य, उनके चरण और महत्त्व, तथा 2016 के प्रश्न "नियंत्रण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्यों?" का हल, उत्तर-लेखन की दृष्टि से।
- नियोजन
- संगठन
- कर्मचारी-व्यवस्था
- निर्देशन
- नियंत्रण
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग B (Management): "General Management: concept of management, managerial skills and levels, management functions; MBO; decision making: process, techniques and models." इस पृष्ठ पर "management functions" हैं; अवधारणा, कौशल-स्तर, MBO और निर्णय के अलग पृष्ठ हैं।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- 2016 के पेपर I में "नियंत्रण प्रबंध कार्य सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्यों है?" पूछा गया (2 अंक, 15 शब्द)। 2013-2024 के संकलित छह पेपरों में प्रबंध के कार्यों पर यही एक सीधा प्रश्न आया; इसलिए नियंत्रण के महत्त्व वाला हिस्सा पक्का कीजिए।
- 2018 के पेपर III (लोक प्रशासन खंड) में "फ़ेयोल द्वारा दिए प्रबंध के पाँच कार्य" (2 अंक) पूछे गए थे। यानी कार्यों की सूची और फ़ेयोल की सूची का भेद दोनों खंडों में काम आता है।
- नियोजन, नियंत्रण और निर्णय एक-दूसरे में गुँथे हैं; MBO और निर्णय-प्रक्रिया वाले पृष्ठ इसी चक्र पर बनते हैं। इसलिए यहाँ का "नियोजन से नियंत्रण तक का चक्र" आगे के पृष्ठों की भाषा तय करता है।
पहले सरल भाषा में: सरकारी स्कूल का नया सत्र
एक सरकारी विद्यालय का प्रधानाचार्य नया सत्र शुरू करता है। जुलाई से पहले वह तय करता है कि इस साल कितने बच्चे जोड़ने हैं, किन कक्षाओं में परिणाम सुधारना है और पुस्तकें कब तक पहुँचनी चाहिए। यह नियोजन (Planning) है। फिर वह कक्षाएँ और खंड बनाता है, विषय-शिक्षकों में काम बाँटता है और बताता है कि किस काम के लिए कौन किसे जवाबदेह होगा। यह संगठन (Organising) है।
अब रिक्त पदों पर शिक्षक चाहिए, अतिथि-शिक्षक चाहिए और नए शिक्षकों को प्रशिक्षण भी। सही शिक्षक को सही कक्षा देना कर्मचारी-व्यवस्था (Staffing) है। सत्र चलने लगता है तो प्रधानाचार्य शिक्षकों को निर्देश देता है, उन्हें प्रेरित करता है और रोज़ की गतिविधियों पर नज़र रखता है। यह निर्देशन (Directing) है। अंत में हर तिमाही परीक्षा के परिणाम की तुलना लक्ष्य से की जाती है और जहाँ गड़बड़ी है वहाँ सुधार किया जाता है। यह नियंत्रण (Controlling) है।
ध्यान रहे, यह क्रम किताबी है। वास्तव में प्रधानाचार्य एक ही दिन में पाँचों काम करता है: सुबह निरीक्षण, दोपहर शिक्षक से बातचीत, शाम को अगले महीने की योजना। NCERT इसी को प्रबंध की "सतत प्रक्रिया" कहता है। शीर्ष स्तर के प्रबंधक निचले स्तर वालों से ज़्यादा समय नियोजन और संगठन में लगाते हैं।
परीक्षा-योग्य परिभाषा और फ़ेयोल की सूची से भेद
NCERT के अनुसार प्रबंध नियोजन, संगठन, निर्देशन और नियंत्रण द्वारा संगठन के सदस्यों के प्रयासों और संसाधनों को निर्दिष्ट लक्ष्यों की ओर लगाने की प्रक्रिया है। पाठ्यपुस्तक पाँच कार्य गिनाती है: नियोजन, संगठन, कर्मचारी-व्यवस्था, निर्देशन और नियंत्रण।
फ़ेयोल (अनुवाद 1949) के अनुसार प्रबंध करना यानी पूर्वानुमान और योजना, संगठन, आदेश, समन्वय और नियंत्रण करना। दोनों सूचियाँ मिलती-जुलती पर एक नहीं हैं। फ़ेयोल की "आदेश" को आधुनिक पाठ्यपुस्तकें निर्देशन कहती हैं; कर्मचारी-व्यवस्था उनमें अलग कार्य के रूप में है; और समन्वय को NCERT किसी अलग कार्य के बजाय प्रबंध का सार कहता है, क्योंकि वह सभी कार्यों में चलता है। उत्तर में सूची के साथ यह एक पंक्ति लिख दें तो "फ़ेयोल की सूची बनाम पाठ्यपुस्तक की सूची" वाला हर प्रश्न सध जाता है।
ध्यान दें कि एक ही शब्द के दो अर्थ हो सकते हैं। फ़ेयोल के "नियंत्रण" की परिभाषा यह है: यह देखना कि सब कुछ अपनाई गई योजना, जारी निर्देशों और स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप हो रहा है; इसका उद्देश्य कमज़ोरियाँ और त्रुटियाँ पकड़कर उन्हें सुधारना और दोबारा होने से रोकना है। यह परिभाषा नियंत्रण के सभी आधुनिक वर्णनों की बुनियाद है।
नियोजन (Planning): पहले तय करना, फिर करना
नियोजन का अर्थ है पहले से तय करना कि क्या करना है और कैसे करना है, यानी उद्देश्य निर्धारित करना और उन्हें पाने के लिए उपयुक्त कार्य-योजना बनाना। NCERT के अनुसार यह साध्य (क्या) और साधन (कैसे), दोनों से जुड़ा है और समय-सीमा इसका अनिवार्य हिस्सा है।
महत्त्व के छह बिंदु NCERT में हैं: नियोजन दिशा देता है, अनिश्चितता का जोखिम घटाता है (बदलावों को रोका नहीं जा सकता, पर उनका पूर्वानुमान किया जा सकता है), अतिव्यापन और बेकार की गतिविधियाँ घटाता है, नवीन विचारों को बढ़ावा देता है, निर्णय-निर्माण आसान करता है और नियंत्रण के लिए मानक तय करता है। इसी अंतिम बिंदु से नियोजन नियंत्रण का आधार बनता है।
विशेषताएँ सात हैं: उद्देश्य-प्राप्ति पर केंद्रित, प्रबंध का प्राथमिक कार्य (अन्य सभी कार्य योजना के ढाँचे में होते हैं), सर्वव्यापी (शीर्ष के साथ मध्यम और निचले स्तर पर भी, पर दायरा अलग), सतत, भविष्योन्मुखी (पूर्वानुमान पर आधारित), निर्णय-निर्माण से जुड़ा (विकल्प हों तभी नियोजन की ज़रूरत) और मानसिक अभ्यास (कल्पना, पूर्वानुमान और विवेक)।
सीमाएँ भी छह हैं: कठोरता, गतिशील वातावरण में असफलता, रचनात्मकता में कमी (योजना शीर्ष बनाता है, नीचे वाले केवल लागू करते हैं), भारी लागत, समय-साध्य प्रक्रिया और सफलता की गारंटी न होना। NCERT का निष्कर्ष है कि सीमाओं के बावजूद नियोजन बेकार नहीं, पर सावधानी से इस्तेमाल करने का औज़ार है।
नियोजन-प्रक्रिया के सात चरण हैं: (1) उद्देश्य निर्धारण, (2) आधारभूत मान्यताएँ (premises) बनाना, यानी भविष्य के बारे में पूर्वानुमान, (3) वैकल्पिक कार्य-पद्धतियाँ पहचानना, (4) विकल्पों का मूल्यांकन, (5) एक विकल्प का चयन, (6) योजना को लागू करना और (7) अनुवर्ती कार्रवाई, यानी देखना कि योजना ठीक चल रही है। NCERT ख़ुद इसे "निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया" कहता है। इसलिए नियोजन और निर्णय को अलग-अलग नहीं, एक-दूसरे में गुँथे हुए पढ़ना चाहिए; निर्णय-प्रक्रिया का पृष्ठ यही कड़ी आगे बढ़ाता है।
संगठन (Organising): काम और लोगों को ढाँचे में बाँधना
NCERT के अनुसार संगठन वह प्रक्रिया है जो नौकरियों और कार्य-संबंधों को स्पष्ट करके तथा संसाधनों को प्रभावी ढंग से लगाकर योजनाओं का क्रियान्वयन शुरू करती है। अर्थात नियोजन में जो तय हुआ, उसे करने लायक ढाँचा संगठन देता है।
प्रक्रिया के चार चरण हैं: (1) कार्य की पहचान और विभाजन, ताकि दोहराव न हो और बोझ बँटे; (2) विभागीकरण, यानी मिलते-जुलते कार्यों को क्षेत्र या उत्पाद जैसे आधार पर एक विभाग में रखना; (3) कर्तव्यों का सौंपना, यानी योग्यता के अनुसार काम का मेल; (4) अधिकार और रिपोर्टिंग-संबंध तय करना, ताकि हर व्यक्ति जाने कि किससे आदेश लेना है और किसे जवाब देना है। इन्हीं चरणों से पदानुक्रम और विभागों का समन्वय बनता है।
महत्त्व के सात बिंदु हैं: विशेषज्ञता का लाभ, कार्य-संबंधों में स्पष्टता, संसाधनों का उचित उपयोग, परिवर्तन के अनुकूलन, प्रभावी प्रशासन (प्रत्यायोजन की सुविधा), कर्मचारियों का विकास और विस्तार तथा वृद्धि। पद-सोपान, प्रत्यायोजन और अधिकार-उत्तरदायित्व जैसे संगठन के सिद्धांतों के लिए लोक प्रशासन वाले पृष्ठ देखिए: लोक प्रशासन में प्रत्यायोजन, केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण तथा नियंत्रण का विस्तार।
कर्मचारी-व्यवस्था (Staffing): सही व्यक्ति, सही जगह
NCERT के अनुसार सरलतम शब्दों में कर्मचारी-व्यवस्था का अर्थ है "लोगों को काम पर लगाना"। यह कार्यबल नियोजन से शुरू होकर भर्ती, चयन, प्रशिक्षण, विकास, पदोन्नति, पारिश्रमिक और निष्पादन-मूल्यांकन तक जाती है। एक चालू संगठन में यह सतत प्रक्रिया है, क्योंकि नए पद बनते हैं और पुराने कर्मचारी जाते हैं।
महत्त्व पाँच बिंदुओं में: सक्षम कर्मचारी खोजकर पाना, सही व्यक्ति को सही काम देकर उच्च निष्पादन, प्रबंधकों की उत्तराधिकार-योजना से संगठन का निरंतर अस्तित्व और वृद्धि, मानव संसाधन का इष्टतम उपयोग (न ज़रूरत से ज़्यादा, न कम कर्मचारी) और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन तथा उचित पुरस्कार से कार्य-संतुष्टि। NCERT इसे इतना बुनियादी मानता है कि मानव संसाधन को "किसी भी व्यवसाय की नींव" कहता है।
ध्यान दें कि पाठ्यपुस्तकें कर्मचारी-व्यवस्था को अलग कार्य मानती हैं, जबकि कुछ सूचियों में वह संगठन में समा जाती है। सिलेबस का अगला उप-विषय "मानव संसाधन प्रबंध" है, जहाँ भर्ती, चयन, प्रशिक्षण और मूल्यांकन के अलग पृष्ठ हैं। इसलिए इस पृष्ठ पर इसका केवल परिचय पर्याप्त है।
निर्देशन (Directing): काम को गति देना
अगर नियोजन, संगठन और कर्मचारी-व्यवस्था मंच सजाते हैं, तो निर्देशन अभिनय शुरू कराता है। NCERT के अनुसार निर्देशन संगठन के लक्ष्य पाने के लिए लोगों को निर्देश देने, मार्गदर्शन करने, परामर्श देने, अभिप्रेरित करने और नेतृत्व देने की प्रक्रिया है। यह केवल संप्रेषण का मामला नहीं है; इसमें पर्यवेक्षण, अभिप्रेरण और नेतृत्व जैसे तत्व शामिल हैं।
निर्देशन के चार तत्व गिनाए जाते हैं: पर्यवेक्षण, अभिप्रेरण, नेतृत्व और संप्रेषण। इनमें हर एक पर अलग-अलग पृष्ठ आगे के अध्यायों में हैं: अभिप्रेरण, संगठन-व्यवहार खंड में; नेतृत्व और संप्रेषण, पेपर III के व्यवहार खंड में।
चार विशेषताएँ: निर्देशन कार्रवाई शुरू करता है (अन्य कार्य पृष्ठभूमि तैयार करते हैं, निर्देशन काम चलाता है), हर स्तर पर होता है (जहाँ भी वरिष्ठ-अधीनस्थ संबंध है), सतत प्रक्रिया है और ऊपर से नीचे चलता है। महत्त्व: यह कार्रवाई शुरू कराता है, साझा लक्ष्यों की ओर ले जाता है, कर्मचारियों की क्षमता को अभिप्रेरण और नेतृत्व से उभारता है, और परिवर्तन के प्रति प्रतिरोध घटाकर बदलाव लागू कराता है।
नियंत्रण (Controlling): योजना से मिलान
नियंत्रण का अर्थ है वास्तविक निष्पादन की मानकों से तुलना करके विचलनों का पता लगाना, उनके कारण खोजना और सुधारात्मक कार्रवाई करना। NCERT में उद्धृत कूंट्ज़ और ओ’डोनेल की परिभाषा के अनुसार प्रबंधकीय नियंत्रण में मानक के विरुद्ध उपलब्धि का मापन और योजनाओं के अनुसार उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए विचलनों का सुधार निहित है।
NCERT दो बातें साफ़ करता है। पहली, नियंत्रण केवल अंतिम कार्य नहीं है; वह प्रबंध-चक्र को वापस नियोजन तक ले आता है, क्योंकि पिछले विचलनों से सीखकर अगली योजना बेहतर बनती है। दूसरी, हर स्तर का प्रबंधक नियंत्रण करता है, और यह केवल कारोबार में नहीं, शिक्षण-संस्थान, सेना, अस्पताल और क्लब में भी उतना ही चाहिए।
नियंत्रण-प्रक्रिया के पाँच चरण: (1) निष्पादन-मानक तय करना, जो मात्रात्मक (लागत, उत्पादन, समय) और गुणात्मक (साख, कर्मचारी-अभिप्रेरण) दोनों हो सकते हैं; (2) वास्तविक निष्पादन का मापन; (3) मानकों से तुलना; (4) विचलनों का विश्लेषण; (5) सुधारात्मक कार्रवाई। विचलन का विश्लेषण करते समय दो तरीक़े काम आते हैं। क्रांतिक बिंदु नियंत्रण (Critical Point Control) में केवल उन मुख्य परिणाम-क्षेत्रों पर निगरानी रखी जाती है जिनकी गड़बड़ी से पूरा संगठन प्रभावित हो। अपवाद द्वारा प्रबंध (Management by Exception) में सिद्धांत यह है कि सब कुछ नियंत्रित करने की कोशिश में कुछ भी नियंत्रित नहीं होता; इसलिए केवल अनुमत सीमा से बाहर के विचलन ऊपर बताए जाते हैं।
नियंत्रण की सीमाएँ चार हैं: मात्रात्मक मानक तय करने में कठिनाई (जैसे कर्मचारी-मनोबल), बाहरी कारकों पर कम नियंत्रण, कर्मचारियों का प्रतिरोध (निगरानी को स्वतंत्रता पर पाबंदी मानना) और ख़र्चीलापन। इसलिए नियंत्रण-प्रणाली का लाभ उसकी लागत से ज़्यादा होना चाहिए।
PYQ 2016 का आधार: नियंत्रण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्यों?
प्रश्न की भाषा "सर्वाधिक" कहती है, पर NCERT नियोजन को "प्राथमिक कार्य" और नियंत्रण को नियोजन का साथी कहता है। इसलिए उत्तर में दावे का आधार नियंत्रण के महत्त्व के छह तर्कों से बनाइए और एक उचित सावधानी जोड़िए।
NCERT के छह तर्क: (1) संगठन के लक्ष्य पाना: प्रगति मापकर विचलन उजागर करता है और संगठन को सही रास्ते पर रखता है। (2) मानकों की सटीकता परखना: बदलते वातावरण में मानक समीक्षा और संशोधन के योग्य रहते हैं। (3) संसाधनों का कुशल उपयोग: बर्बादी और क्षति घटती है। (4) कर्मचारी-अभिप्रेरण में सुधार: कर्मचारी पहले से जानते हैं कि क्या अपेक्षित है और किस आधार पर मूल्यांकन होगा। (5) व्यवस्था और अनुशासन: निगरानी से बेईमानी घटती है। (6) कार्रवाई में समन्वय: हर विभाग पूर्वनिर्धारित, परस्पर संगत मानकों से बँधा रहता है।
सावधानी यह जोड़िए कि नियंत्रण अकेले अर्थहीन है, क्योंकि मानक नियोजन ही देता है; अर्थात नियोजन के बिना नियंत्रण अंधा है और नियंत्रण के बिना नियोजन अर्थहीन। 2 अंक के 15 शब्द में यह पूरा नहीं आएगा, पर 5 अंक में यह पंक्ति उत्तर को संतुलित बनाती है।
पाँच कार्य एक नज़र में
| कार्य | मूल प्रश्न | मुख्य गतिविधियाँ | उदाहरण (विद्यालय) |
|---|---|---|---|
| नियोजन | क्या और कैसे करना है? | उद्देश्य, पूर्वानुमान, विकल्प, चयन | सत्र का लक्ष्य और कैलेंडर |
| संगठन | काम किसे और कैसे सौंपा जाए? | कार्य-विभाजन, विभागीकरण, कर्तव्य, रिपोर्टिंग | कक्षाओं और विषयों में शिक्षकों का बँटवारा |
| कर्मचारी-व्यवस्था | कौन-सा व्यक्ति किस पद पर? | भर्ती, चयन, प्रशिक्षण, पदोन्नति, मूल्यांकन | रिक्त पदों पर शिक्षक लगाना |
| निर्देशन | काम कैसे चलवाया जाए? | पर्यवेक्षण, अभिप्रेरण, नेतृत्व, संप्रेषण | शिक्षकों से बातचीत और मार्गदर्शन |
| नियंत्रण | जो हुआ, वह योजना जैसा है? | मानक, मापन, तुलना, विचलन-विश्लेषण, सुधार | तिमाही परिणाम की लक्ष्य से तुलना |
आधार: NCERT, कक्षा 12 Business Studies, अध्याय 4-8; तालिका की रचना और उदाहरण विश्लेषण हैं।
प्रबंध-चक्र: नियोजन से नियंत्रण और वापस
नियोजन
उद्देश्य और कार्य-योजना
संगठन
ढाँचा और कार्य-विभाजन
कर्मचारी-व्यवस्था
सही व्यक्ति, सही पद
निर्देशन
अभिप्रेरण और नेतृत्व
नियंत्रण
तुलना और सुधार; सीख अगली योजना में
मुख्य तथ्य
- प्रबंध के कार्य (NCERT)
- पाँच: नियोजन, संगठन, कर्मचारी-व्यवस्था, निर्देशन, नियंत्रण
- फ़ेयोल के पाँच तत्व
- पूर्वानुमान और योजना, संगठन, आदेश, समन्वय, नियंत्रण (अनुवाद 1949)
- नियोजन के चरण
- सात: उद्देश्य, आधारभूत मान्यताएँ, विकल्प पहचानना, मूल्यांकन, चयन, क्रियान्वयन, अनुवर्ती कार्रवाई
- संगठन के चरण
- चार: कार्य-विभाजन, विभागीकरण, कर्तव्य सौंपना, अधिकार और रिपोर्टिंग
- निर्देशन के तत्व
- चार: पर्यवेक्षण, अभिप्रेरण, नेतृत्व, संप्रेषण
- नियंत्रण के चरण
- पाँच: मानक, मापन, तुलना, विचलन-विश्लेषण, सुधारात्मक कार्रवाई
- नियंत्रण का महत्त्व
- छह तर्क (लक्ष्य-प्राप्ति, मानकों की जाँच, संसाधन-उपयोग, अभिप्रेरण, अनुशासन, समन्वय)
- नियंत्रण पर फ़ेयोल
- योजना, निर्देश और सिद्धांतों के अनुरूप होने की जाँच; त्रुटि सुधार और पुनरावृत्ति-रोक
- सिलेबस की पंक्ति
- RPSC सिलेबस, 09-01-2026, पेपर I, इकाई III (ख)
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- फ़ेयोल के पाँच तत्वों और आधुनिक पाँच कार्यों को एक ही सूची समझना। फ़ेयोल में आदेश और समन्वय हैं; पाठ्यपुस्तक में निर्देशन और कर्मचारी-व्यवस्था।
- नियंत्रण को केवल "निगरानी" या "दंड" बताना। नियंत्रण का मूल मानक, मापन, तुलना, विश्लेषण और सुधार है; उसका उद्देश्य सुधार है।
- "नियंत्रण अंतिम कार्य है" लिखना। NCERT के अनुसार वह प्रबंध-चक्र को वापस नियोजन तक लाता है।
- नियोजन को निर्णय से अलग कर देना। नियोजन के सात चरणों में विकल्प का चयन निर्णय ही है और NCERT उसे निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया कहता है।
- नियंत्रण के महत्त्व में केवल सकारात्मक बातें लिखना और सीमाएँ भूल जाना: मात्रात्मक मानक की कठिनाई, बाहरी कारक, प्रतिरोध और ख़र्च।
केस स्टडी: एक कल्पित पंचायत समिति की सड़क-मरम्मत योजना
उदाहरण (काल्पनिक)"फ़ाइलें ठीक थीं, सड़क देर से बनी"
यह पूरी तरह गढ़ा गया उदाहरण है; पंचायत समिति, संख्याएँ और पात्र वास्तविक नहीं हैं। इसका उद्देश्य पाँचों कार्यों का चक्र और नियंत्रण की कमी दिखाना है।
- नियोजन
- कल्पित पंचायत समिति ने 20 किलोमीटर ग्रामीण सड़क-मरम्मत के लिए चार माह का लक्ष्य तय किया और मासिक 5 किलोमीटर की समय-सारिणी बनाई।
- संगठन और कर्मचारी-व्यवस्था
- काम चार खंडों में बाँटा गया, हर खंड पर एक कनिष्ठ अभियंता और ठेकेदार लगाया गया, और ज़रूरी श्रमिक-दल लिए गए।
- निर्देशन
- विकास अधिकारी ने मासिक बैठकों में अभियंताओं को लक्ष्य बताए और ठेकेदारों को समय-सीमा याद दिलाई।
- नियंत्रण की कमी
- किसी ने पहले माह के अंत में वास्तविक प्रगति की तुलना नहीं की। तीसरे माह में पता चला कि केवल 6 किलोमीटर बने हैं, जबकि 15 किलोमीटर बनने चाहिए थे। तब तक बजट का बड़ा हिस्सा ख़र्च हो चुका था।
- सबक
- नियोजन, संगठन और निर्देशन ठीक होने पर भी नियंत्रण न हो तो विचलन देर से दिखता है। मासिक तुलना और अपवाद-रिपोर्ट से समय रहते सुधार हो सकता था (विश्लेषण)।
सीख
नियंत्रण वह कड़ी है जो योजना और वास्तविकता का फ़ासला समय रहते दिखाती है। उत्तर में "विचलन" और "सुधारात्मक कार्रवाई" शब्द ज़रूर लिखिए।
कार्य-उदाहरण: नियंत्रण-प्रक्रिया के पाँच चरण, अंकों में (कल्पित)
हल सहित उदाहरणमानक, मापन, तुलना, विश्लेषण, सुधार
दिया है
- यह उदाहरण गढ़ा गया है; संख्याएँ वास्तविक नहीं हैं।
- कल्पित पंचायत समिति में सड़क-मरम्मत का मानक: प्रति माह 5 किलोमीटर, प्रति किलोमीटर 4 लाख रुपये की लागत। अनुमत विचलन: 10 प्रतिशत तक। पहले माह का वास्तविक परिणाम: 4 किलोमीटर, लागत 18 लाख रुपये।
- 1चरण 1: मानक प्रगति: 5 किमी; कुल लागत: 5 × 4 = 20 लाख रुपये; अनुमत विचलन: 10 प्रतिशत।
- 2चरण 2: मापन वास्तविक प्रगति 4 किमी; वास्तविक लागत 18 लाख रुपये।
- 3चरण 3: तुलना प्रगति में कमी = (5 − 4) / 5 = 20 प्रतिशत। लागत की तुलना सीधे नहीं हो सकती, क्योंकि काम कम हुआ। लागत प्रति किमी: 18 / 4 = 4.5 लाख रुपये, यानी मानक 4 लाख से (4.5 − 4) / 4 = 12.5 प्रतिशत अधिक।
- 4चरण 4: विश्लेषण दोनों विचलन 10 प्रतिशत की अनुमत सीमा से बाहर हैं, इसलिए अपवाद के रूप में ऊपर सूचित होंगे। कारण खोजे जाएँ: श्रमिकों की कमी, सामग्री की देरी या मानक की अव्यावहारिकता।
- 5चरण 5: सुधार यदि कारण श्रमिकों की कमी है तो दूसरा दल लगाना; यदि कारण अव्यावहारिक मानक है तो मानक संशोधित करना; दोनों स्थितियों में अगले माह फिर तुलना।
निष्कर्ष: निष्कर्ष: नियंत्रण में तुलना (प्रतिशत विचलन) और अपवाद-आधारित सूचना से प्रबंधक का ध्यान केवल उन्हीं पर जाता है जो अनुमत सीमा से बाहर हैं।
पिछले वर्षों के प्रश्न (हल सहित)
2016RAS मुख्य परीक्षापेपर I2 अंक
नियंत्रण प्रबन्ध कार्य सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्यों है? (Why controlling function of management is the most significant?)
आदर्श उत्तर
नियंत्रण विचलन पकड़कर योजना को लक्ष्य तक पहुँचाता है, संसाधन बचाता है; इसलिए निर्णायक है।
अभ्यास प्रश्न (मौलिक; PYQ नहीं)
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
प्रबंध के पाँच कार्यों के नाम लिखिए।
आदर्श उत्तर
नियोजन, संगठन, कर्मचारी-व्यवस्था, निर्देशन और नियंत्रण प्रबंध के पाँच कार्य हैं; ये एक-दूसरे से जुड़े सतत कार्य हैं।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
नियंत्रण की प्रक्रिया के चरण संक्षेप में लिखिए।
आदर्श उत्तर
नियंत्रण में पहले निष्पादन-मानक तय होते हैं। फिर वास्तविक निष्पादन मापा जाता है और मानक से तुलना होती है। इसके बाद विचलनों के कारणों का विश्लेषण होता है। अंत में, यदि विचलन अनुमत सीमा से बाहर हों, तो सुधारात्मक कार्रवाई की जाती है। इस प्रकार सीख अगली योजना में जुड़ती है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
नियोजन और नियंत्रण के संबंध की व्याख्या कीजिए।
आदर्श उत्तर
नियोजन और नियंत्रण प्रबंध के अविभाज्य जुड़वाँ हैं। नियंत्रण के लिए मानक चाहिए और वे नियोजन से मिलते हैं, इसलिए नियोजन के बिना नियंत्रण अंधा है। उधर नियंत्रण के बिना नियोजन अर्थहीन है, क्योंकि योजना के अनुसार काम हुआ या नहीं, यह वही बताता है। नियोजन भविष्योन्मुखी और निर्देशात्मक है, जबकि नियंत्रण पिछले निष्पादन का मूल्यांकन करता है। फिर भी दोनों आगे-पीछे देखते हैं: योजना अतीत के अनुभव से बनती है और नियंत्रण का सुधार भविष्य का निष्पादन सुधारता है। तथ्य-आधारित योजना नियंत्रण को आसान बनाती है और नियंत्रण से मिली जानकारी अगली योजना बेहतर बनाती है।
उत्तर कैसे लिखें (10 अंक, 100 शब्द)
भूमिका
प्रश्न: "प्रबंध के कार्यों का वर्णन कीजिए।" पहली पंक्ति: प्रबंध के पाँच कार्य हैं, नियोजन, संगठन, कर्मचारी-व्यवस्था, निर्देशन और नियंत्रण, जो एक सतत चक्र बनाते हैं।
मुख्य भाग
- नियोजन: उद्देश्य और कार्य-योजना; सात चरण (दो-तीन नाम)
- संगठन: कार्य-विभाजन, विभागीकरण, कर्तव्य और रिपोर्टिंग
- कर्मचारी-व्यवस्था: भर्ती से मूल्यांकन तक; "लोगों को काम पर लगाना"
- निर्देशन: पर्यवेक्षण, अभिप्रेरण, नेतृत्व, संप्रेषण
- नियंत्रण: मानक, मापन, तुलना, विश्लेषण, सुधार; चक्र वापस नियोजन तक
निष्कर्ष
निष्कर्ष: पाँचों कार्य परस्पर निर्भर हैं और समन्वय हर कार्य में चलता है; इसलिए प्रबंध एक सतत और एकीकृत प्रक्रिया है।
अतिरिक्त मूल्य
- फ़ेयोल की सूची से तुलना की एक पंक्ति
- किसी सरकारी योजना (जैसे सड़क-मरम्मत) पर पाँचों कार्यों का एक-एक वाक्य (विश्लेषण)
त्वरित पुनरावृत्ति
- प्रबंध के कार्य (NCERT): नियोजन, संगठन, कर्मचारी-व्यवस्था, निर्देशन, नियंत्रण
- फ़ेयोल के पाँच तत्व: योजना, संगठन, आदेश, समन्वय, नियंत्रण
- नियोजन: पहले तय करना; प्राथमिक कार्य; सात चरण; निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया
- संगठन: कार्य-विभाजन, विभागीकरण, कर्तव्य, रिपोर्टिंग
- कर्मचारी-व्यवस्था: लोगों को काम पर लगाना; भर्ती, चयन, प्रशिक्षण, मूल्यांकन
- निर्देशन: पर्यवेक्षण, अभिप्रेरण, नेतृत्व, संप्रेषण; कार्रवाई शुरू करता है
- नियंत्रण: मानक, मापन, तुलना, विचलन-विश्लेषण, सुधार
- क्रांतिक बिंदु नियंत्रण और अपवाद द्वारा प्रबंध: ध्यान केवल मुख्य और अनुमत सीमा से बाहर के विचलनों पर
- नियंत्रण का महत्त्व: लक्ष्य-प्राप्ति, मानकों की जाँच, संसाधन-उपयोग, अभिप्रेरण, अनुशासन, समन्वय
- नियोजन के बिना नियंत्रण अंधा, नियंत्रण के बिना नियोजन अर्थहीन
- PYQ: 2016, पेपर I, 2 अंक: नियंत्रण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्यों
याद रखने योग्य शब्द
- नियोजन
- संगठन
- कर्मचारी-व्यवस्था
- निर्देशन
- नियंत्रण
- विचलन
- अपवाद द्वारा प्रबंध