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पेपर III · इकाई III · भाग ख (विधि)

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023: धारा 1, 2 और 3(2), विस्तार, प्रारंभ और परिभाषाएँ

BNSS 2023 की धारा 1, धारा 2 की पंद्रह परिभाषाएँ और धारा 3(2); सिलेबस की धाराएँ, तुलना-तालिकाएँ और हल अभ्यास।

  • धारा 1
  • धारा 2
  • ज़मानत
  • संज्ञेय
  • समन-मामला
  • धारा 3(2)
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (विधि): "Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023: Section 1; Section 2 definitions (audio-video electronic means, bail, bailable and non-bailable offence, bail bond, bond, charge, cognizable offence, complaint, electronic communication, inquiry, investigation, non-cognizable offence, sub-division, summons case, warrant case); Sections 3(2)(a),(b), 14-17, 41-43, 126-129, 148-149, 152, 163-167, 173, 174, 187, 194-196." इस पृष्ठ पर धारा 1, धारा 2 की ये परिभाषाएँ और धारा 3(2) है। धारा 14 से 17 और 41 से 43 दूसरे पृष्ठ पर, धारा 126 से 129, 148, 149 और 152 तीसरे पर, धारा 163 से 167 चौथे पर, धारा 173, 174 और 187 पाँचवें पर तथा धारा 194 से 196 छठे पृष्ठ पर हैं। यह पृष्ठ परीक्षा की तैयारी के लिए है, क़ानूनी सलाह नहीं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2013 से 2024 के उपलब्ध पेपरों में दंड प्रक्रिया संहिता या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) से कोई प्रश्न नहीं मिलता, क्योंकि BNSS 2026 के सिलेबस में पहली बार जुड़ी है। इसलिए इस पृष्ठ पर पिछले प्रश्न नहीं हैं; तैयारी सिलेबस की धाराओं के सीधे पाठ पर टिकी है।
  • इसी खंड में दूसरे क़ानूनों से 2013 से 2024 के पेपरों में 2 अंक (15 शब्द) और 5 अंक (50 शब्द) के परिभाषा-प्रधान प्रश्न देखे गए हैं, जैसे किसी क़ानून की धारा 2 का कोई शब्द। BNSS की धारा 2 की 15 परिभाषाएँ उसी ढंग के प्रश्न की सबसे संभावित ज़मीन हैं, इसलिए खंड-अक्षर और मुख्य पद याद रखें।
  • ये परिभाषाएँ आगे की हर धारा में काम आती हैं: संज्ञेय और असंज्ञेय शब्द धारा 173 और 174 में, ज़मानत और बंधपत्र धारा 126 से 129 में, अन्वेषण धारा 187 में लौटते हैं। यहाँ की पकड़ बाक़ी पाँच पृष्ठ आसान कर देती है।

पहले सरल भाषा में

क्रिकेट में दो अलग किताबें होती हैं। एक बताती है कि कौन-सी गेंद वाइड है और कौन-सी नो-बॉल। दूसरी बताती है कि अंपायर कैसे निर्णय देगा, रिव्यू कब माँगा जाएगा और बल्लेबाज़ को कब बाहर माना जाएगा। आपराधिक क़ानून में भी यही दोहरी व्यवस्था है। भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) बताती है कि कौन-सा काम अपराध है और उसकी सज़ा क्या है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023, BNSS) बताती है कि पुलिस, मजिस्ट्रेट और अदालत उस अपराध से कैसे निपटेंगे: रिपोर्ट कहाँ लिखी जाएगी, गिरफ़्तारी कैसे होगी, हिरासत कितने दिन की होगी, ज़मानत कैसे मिलेगी और मुक़दमा कैसे चलेगा।

BNSS 2023 का अधिनियम क्रमांक 46 है। इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति 25 दिसंबर 2023 को मिली और उसी दिन इसे राजपत्र में छापा गया। राजपत्र में इसका उद्देश्य एक पंक्ति में दिया है: दंड प्रक्रिया से जुड़े क़ानून को समेकित करना और संशोधित करना ("to consolidate and amend the law relating to Criminal Procedure")। यह दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की जगह आई है। इस पृष्ठ की तीन चीज़ें हैं: धारा 1, जो बताती है कि संहिता कहाँ और कब से लागू होगी; धारा 2, जो शब्दों के अर्थ तय करती है; और धारा 3(2), जो बताती है कि दूसरे क़ानूनों में जहाँ "मजिस्ट्रेट" का काम आता है, वह किस प्रकार के मजिस्ट्रेट का होगा।

धारा 1: संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ (Short title, extent and commencement)

धारा 1 की तीन उपधाराएँ हैं। उपधारा (1) नाम देती है: यह अधिनियम "भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023" कहलाएगा। उपधारा (2) विस्तार तय करती है। संहिता के सभी उपबंध नागालैंड राज्य और जनजातीय क्षेत्रों (tribal areas) पर लागू नहीं होते, लेकिन तीन अध्याय इस रोक से बाहर हैं: अध्याय IX (शांति और सदाचार के लिए प्रतिभूति), अध्याय XI (लोक व्यवस्था और शांति बनाए रखना) और अध्याय XII (पुलिस की निवारक कार्रवाई)। संबंधित राज्य सरकार चाहे तो अधिसूचना निकालकर बाक़ी उपबंध भी पूरे या आंशिक रूप से नागालैंड या ऐसे जनजातीय क्षेत्रों में लागू कर सकती है, ज़रूरी बदलावों के साथ।

स्पष्टीकरण में "जनजातीय क्षेत्र" का अर्थ दिया है: वे इलाक़े जो 21 जनवरी 1972 से ठीक पहले असम के जनजातीय क्षेत्रों में शामिल थे, जैसा संविधान की छठी अनुसूची के पैरा 20 में बताया गया है, शिलांग नगरपालिका की स्थानीय सीमाओं के भीतर के इलाक़ों को छोड़कर। उपधारा (3) कहती है कि संहिता उस तारीख़ से लागू होगी जो केंद्र सरकार राजपत्र में अधिसूचना निकालकर तय करे। यही कारण है कि अधिनियम दिसंबर 2023 में बना, पर लागू जुलाई 2024 में हुआ।

गृह मंत्रालय ने लोक सभा को दिए उत्तर में बताया है कि BNSS 1 जुलाई 2024 से लागू है; BNS की धारा 106(2) से जुड़ी प्रविष्टि (BNSS की पहली अनुसूची में) इस प्रारंभ से बाहर रखी गई थी।

धारा 1 एक नज़र में

उपधाराक्या कहती हैयाद रखने का सूत्र
(1)संक्षिप्त नाम: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023नाम
(2)नागालैंड और जनजातीय क्षेत्रों पर लागू नहीं, पर अध्याय IX, XI और XII लागू; राज्य सरकार अधिसूचना से शेष भी लागू कर सकती हैनागालैंड + जनजातीय क्षेत्र, अपवाद तीन अध्याय
स्पष्टीकरणजनजातीय क्षेत्र: 21 जनवरी 1972 से पहले असम के जनजातीय क्षेत्र (छठी अनुसूची, पैरा 20), शिलांग नगरपालिका सीमा के भीतर के भाग को छोड़कर21-01-1972 की कट-ऑफ़ तारीख़
(3)प्रारंभ उस तारीख़ से जो केंद्र सरकार राजपत्र की अधिसूचना से तय करेतारीख़ केंद्र तय करेगा

संहिता के बनने से लागू होने तक

  1. 25 दिसंबर 2023

    राष्ट्रपति की स्वीकृति और राजपत्र (असाधारण) में प्रकाशन; अधिनियम 46/2023

  2. धारा 1(3)

    प्रारंभ की तारीख़ केंद्र सरकार की अधिसूचना से तय होनी थी

  3. 1 जुलाई 2024

    BNSS लागू (BNS की धारा 106(2) से जुड़ी प्रविष्टि को छोड़कर, जो पहली अनुसूची में है)

धारा 2: परिभाषाएँ (Definitions) की बनावट

धारा 2 संहिता का शब्दकोश है। उपधारा (1) "जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो" (unless the context otherwise requires) कहकर खंड (a) से (z) तक छब्बीस शब्दों के अर्थ देती है। सिलेबस इनमें से पंद्रह खंड माँगता है; ज़मानतीय और अज़मानतीय अपराध एक ही खंड (c) में हैं। उपधारा (2) एक अतिरिक्त नियम देती है: जो शब्द इस संहिता में परिभाषित नहीं हैं पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 या भारतीय न्याय संहिता, 2023 में परिभाषित हैं, उनके वही अर्थ माने जाएँगे जो उस अधिनियम या संहिता में दिए गए हैं।

परिभाषाओं को याद करने का सबसे अच्छा तरीक़ा उन्हें जोड़ों में पढ़ना है, क्योंकि परीक्षा में अकसर अंतर पूछा जाता है। ज़मानत, बंधपत्र और ज़मानतीय बंधपत्र एक त्रिकोण बनाते हैं। संज्ञेय और असंज्ञेय एक जोड़ी है। समन-मामला और वारंट-मामला एक जोड़ी है। परिवाद और पुलिस रिपोर्ट एक जोड़ी है। जाँच और अन्वेषण एक जोड़ी है। नीचे पहले पूरी सूची है, फिर हर जोड़ी का अंतर।

धारा 2(1) में सिलेबस के पंद्रह शब्द

खंडशब्दसरल भाषा में अर्थमुख्य पद
(a)श्रव्य-दृश्य इलेक्ट्रॉनिक साधन (audio-video electronic means)वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग, पहचान, तलाशी और ज़ब्ती या साक्ष्य की रिकॉर्डिंग और इलेक्ट्रॉनिक संचार के प्रसारण में किसी भी संचार-उपकरण का उपयोग; राज्य सरकार नियमों से और उद्देश्य या साधन जोड़ सकती है"shall include", वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग, राज्य के नियम
(b)ज़मानत (bail)किसी अपराध के अभियुक्त या संदिग्ध को विधि की अभिरक्षा से कुछ शर्तों पर छोड़ना; शर्तें अधिकारी या न्यायालय लगाता है और व्यक्ति बंधपत्र या ज़मानतीय बंधपत्र निष्पादित करता हैअभिरक्षा से मुक्ति, शर्तें, bond या bail bond
(c)ज़मानतीय अपराध (bailable offence) और अज़मानतीय अपराध (non-bailable offence)जो अपराध पहली अनुसूची में ज़मानतीय दिखाया गया है या किसी अन्य क़ानून से ज़मानतीय बनाया गया है; इनके अलावा हर अपराध अज़मानतीयपहली अनुसूची, "any other offence"
(d)ज़मानतीय बंधपत्र (bail bond)ज़मानतदार (surety) के साथ रिहाई का वचनwith surety
(e)बंधपत्र (bond)व्यक्तिगत बंधपत्र, यानी ज़मानतदार के बिना रिहाई का वचनpersonal bond, without surety
(f)आरोप (charge)इसमें आरोप का हर शीर्ष (head of charge) शामिल है जब आरोप में एक से अधिक शीर्ष होंincludes, any head of charge
(g)संज्ञेय अपराध (cognizable offence) और संज्ञेय मामला (cognizable case)ऐसा अपराध या मामला जिसमें पुलिस अधिकारी पहली अनुसूची या किसी अन्य क़ानून के अनुसार बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकता हैarrest without warrant
(h)परिवाद (complaint)मजिस्ट्रेट से मौखिक या लिखित शिकायत कि किसी व्यक्ति (ज्ञात या अज्ञात) ने अपराध किया है, ताकि वह संहिता के अधीन कार्रवाई करे; पुलिस रिपोर्ट इसमें नहीं आतीto a Magistrate, does not include a police report
(i)इलेक्ट्रॉनिक संचार (electronic communication)लिखित, मौखिक, चित्रात्मक सूचना या वीडियो सामग्री का किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण (फ़ोन, मोबाइल, कंप्यूटर, कैमरा, ऑडियो-वीडियो प्लेयर आदि) से भेजा या पहुँचाया जानाwritten, verbal, pictorial, video content
(k)जाँच (inquiry)संहिता के अधीन मजिस्ट्रेट या न्यायालय द्वारा की गई हर जाँच, विचारण (trial) को छोड़करother than a trial
(l)अन्वेषण (investigation)संहिता के अधीन साक्ष्य एकत्र करने की सारी कार्यवाही, जो पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति (मजिस्ट्रेट को छोड़कर) द्वारा की जाएcollection of evidence, police officer
(o)असंज्ञेय अपराध (non-cognizable offence) और असंज्ञेय मामला (non-cognizable case)ऐसा अपराध या मामला जिसमें पुलिस अधिकारी को बिना वारंट गिरफ़्तार करने का अधिकार नहींno authority to arrest without warrant
(w)उप-खंड (sub-division)ज़िले का एक उप-खंडsub-division of a district
(x)समन-मामला (summons-case)अपराध से जुड़ा ऐसा मामला जो वारंट-मामला न होnot being a warrant-case
(z)वारंट-मामला (warrant-case)मृत्युदंड, आजीवन कारावास या दो वर्ष से अधिक के कारावास से दंडनीय अपराध से जुड़ा मामलाdeath, life, exceeding two years

ज़मानत की तीन सीढ़ियाँ: bail, bond और bail bond

मान लीजिए किसी व्यक्ति को पुलिस ने पकड़ा है और अदालत उसे घर जाने देना चाहती है, पर यह भरोसा भी चाहती है कि वह तारीख़ पर आएगा। यह भरोसा दो तरह से लिया जा सकता है। पहला तरीक़ा: व्यक्ति स्वयं लिखकर देता है कि मैं हर तारीख़ पर हाज़िर रहूँगा, वरना तय रक़म देना होगा। यह बंधपत्र (bond) है, जिसे संहिता "personal bond" यानी ज़मानतदार के बिना वाला वचन कहती है। दूसरा तरीक़ा: वही वचन, पर साथ में कोई भरोसेमंद व्यक्ति ज़मानतदार (surety) बनकर कहता है कि यह आएगा, नहीं आया तो मैं उत्तरदायी हूँ। यह ज़मानतीय बंधपत्र (bail bond) है।

अब "ज़मानत" (bail) शब्द पर आइए। धारा 2(1)(b) के अनुसार ज़मानत रिहाई की पूरी प्रक्रिया का नाम है: अभियुक्त या संदिग्ध को विधि की अभिरक्षा से कुछ शर्तों पर छोड़ना, जहाँ शर्तें अधिकारी या न्यायालय लगाता है और बदले में व्यक्ति बंधपत्र या ज़मानतीय बंधपत्र निष्पादित करता है। यानी bail लक्ष्य है और bond या bail bond उस तक पहुँचने के साधन हैं। ध्यान दें कि BNSS में "bail" की परिभाषा पहली बार स्पष्ट रूप से दी गई है; CrPC की धारा 2 में यह शब्द परिभाषित नहीं था।

तुलना: बंधपत्र और ज़मानतीय बंधपत्र

बंधपत्र (bond)

खंडधारा 2(1)(e)

परिभाषाव्यक्तिगत बंधपत्र, ज़मानतदार के बिना रिहाई का वचन

अंग्रेज़ी का मुख्य पदpersonal bond or an undertaking for release without surety

ज़मानतदारनहीं

ज़मानत से संबंधज़मानत इन दोनों में से किसी के निष्पादन पर दी जाती है (धारा 2(1)(b))

ज़मानतीय बंधपत्र (bail bond)

खंडधारा 2(1)(d)

परिभाषाज़मानतदार सहित रिहाई का वचन

अंग्रेज़ी का मुख्य पदan undertaking for release with surety

ज़मानतदारहाँ

ज़मानत से संबंधज़मानत इन दोनों में से किसी के निष्पादन पर दी जाती है (धारा 2(1)(b))

ज़मानतीय और अज़मानतीय अपराध; संज्ञेय और असंज्ञेय अपराध

ये दो अलग वर्गीकरण हैं और विद्यार्थी अकसर इन्हें मिला देते हैं। ज़मानतीय या अज़मानतीय का सवाल यह है कि अभियुक्त ज़मानत माँगे तो क्या वह अधिकार से मिलेगी या विवेक से। संहिता इसे परिभाषा से तय करती है: जो अपराध पहली अनुसूची (First Schedule) में ज़मानतीय दिखाया गया है, या जिसे किसी अन्य क़ानून ने ज़मानतीय बनाया है, वह ज़मानतीय है, और "कोई भी अन्य अपराध" अज़मानतीय है। यानी अज़मानतीय की अपनी कोई परिभाषा नहीं, वह ज़मानतीय का शेष है।

संज्ञेय या असंज्ञेय का सवाल पुलिस की शक्ति से जुड़ा है: क्या पुलिस अधिकारी मजिस्ट्रेट के वारंट के बिना गिरफ़्तार कर सकता है? जहाँ कर सकता है, वह संज्ञेय अपराध (cognizable offence) है और जहाँ अधिकार नहीं है, वह असंज्ञेय (non-cognizable)। संज्ञेय अपराध की सूचना पर पुलिस सीधे प्राथमिकी दर्ज करती है (धारा 173); असंज्ञेय में पुलिस मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना अन्वेषण नहीं कर सकती (धारा 174)। इन दोनों धाराओं को पाँचवें पृष्ठ में विस्तार से पढ़ा गया है।

एक अपराध इन दोनों कसौटियों पर चार में से कोई भी मेल बना सकता है। संज्ञेय अपराध ज़मानतीय भी हो सकता है और अज़मानतीय भी; असंज्ञेय अपराध भी ज़मानतीय या अज़मानतीय हो सकता है। इसलिए एक कसौटी से दूसरी का अनुमान न लगाएँ। किसी विशेष अपराध की श्रेणी बताने के लिए पहली अनुसूची देखें; इस पृष्ठ पर अलग-अलग अपराधों के श्रेणी-वार नाम जानबूझकर नहीं दिए गए हैं।

तुलना: संज्ञेय और असंज्ञेय; ज़मानतीय और अज़मानतीय

कसौटीएक छोरदूसरा छोरखंड
गिरफ़्तारी का अधिकारसंज्ञेय: पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती हैअसंज्ञेय: पुलिस को बिना वारंट गिरफ़्तारी का अधिकार नहीं2(1)(g) और 2(1)(o)
निर्धारण का आधारपहली अनुसूची या कोई अन्य क़ानूनदोनों के लिए वही आधार2(1)(g) और 2(1)(o)
ज़मानत की पात्रताज़मानतीय: पहली अनुसूची या अन्य क़ानून में ज़मानतीय दिखाया गयाअज़मानतीय: ज़मानतीय के अलावा कोई भी अन्य अपराध2(1)(c)
मामले का नाम"cognizable case" और "non-cognizable case" भी परिभाषितमामला = वह केस जिसमें अपराध ऐसा हो2(1)(g), 2(1)(o)

समन-मामला और वारंट-मामला

यह बँटवारा सज़ा की गंभीरता से होता है। धारा 2(1)(z) के अनुसार वारंट-मामला वह है जो मृत्युदंड, आजीवन कारावास या दो वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय अपराध से जुड़ा हो। धारा 2(1)(x) समन-मामले को नकारात्मक रूप से परिभाषित करती है: जो अपराध से जुड़ा मामला वारंट-मामला नहीं है, वही समन-मामला है। इसका अर्थ है कि जिस अपराध में अधिकतम सज़ा दो वर्ष तक है, या केवल जुर्माना है, वह समन-मामला है। ठीक दो वर्ष की सज़ा भी समन-मामला है, क्योंकि वारंट-मामले में "दो वर्ष से अधिक" (exceeding two years) चाहिए।

इस बँटवारे का असर आगे पढ़ेंगे। उदाहरण के लिए, धारा 187(9) कहती है कि समन-मामले में गिरफ़्तारी की तारीख़ से छह माह में अन्वेषण पूरा न हो तो मजिस्ट्रेट आगे का अन्वेषण रोकने का आदेश देगा, जब तक अन्वेषण अधिकारी विशेष कारण देकर उसे आवश्यक सिद्ध न कर दे। यही कारण है कि परिभाषा का यह छोटा-सा शब्द परीक्षा में बाद की धाराओं के साथ जोड़कर भी पूछा जा सकता है।

तुलना: समन-मामला और वारंट-मामला

समन-मामला (summons-case)

खंड2(1)(x)

परिभाषा की शैलीनकारात्मक: जो वारंट-मामला नहीं है

अधिकतम कारावास (संकेत)दो वर्ष तक, या केवल जुर्माना

ठीक दो वर्ष का कारावाससमन-मामला

बाद की धारा में असरधारा 187(9): गिरफ़्तारी से छह माह में अन्वेषण पूरा न हो तो रोकने का आदेश

वारंट-मामला (warrant-case)

खंड2(1)(z)

परिभाषा की शैलीसकारात्मक: मृत्युदंड, आजीवन कारावास या दो वर्ष से अधिक कारावास से दंडनीय

अधिकतम कारावास (संकेत)दो वर्ष से ज़्यादा

ठीक दो वर्ष का कारावासनहीं, क्योंकि "exceeding" चाहिए

बाद की धारा में असरधारा 187(9) का यह छह माह वाला नियम इस पर लागू नहीं होता

परिवाद और पुलिस रिपोर्ट; आरोप, जाँच और अन्वेषण

परिवाद (complaint) की सबसे बड़ी पहचान उसका पता है: वह मजिस्ट्रेट को दिया जाता है, पुलिस को नहीं। धारा 2(1)(h) के अनुसार वह मौखिक या लिखित हो सकता है और उसमें यह आरोप हो कि कोई व्यक्ति, ज्ञात हो या अज्ञात, अपराध कर चुका है। उद्देश्य होता है कि मजिस्ट्रेट संहिता के अधीन कार्रवाई करे। इस परिभाषा में पुलिस रिपोर्ट शामिल नहीं है। अपवाद एक है: स्पष्टीकरण कहता है कि जब किसी मामले में अन्वेषण के बाद असंज्ञेय अपराध का होना पता चले और पुलिस अधिकारी उसकी रिपोर्ट दे, तो वह रिपोर्ट परिवाद मानी जाएगी और रिपोर्ट देने वाला पुलिस अधिकारी परिवादी (complainant)। पुलिस रिपोर्ट (police report) की अलग परिभाषा खंड (t) में है: धारा 193(3) के अधीन मजिस्ट्रेट को भेजी गई रिपोर्ट। (यह खंड सिलेबस की सूची में नहीं है; यहाँ केवल अंतर समझाने के लिए उल्लेख है।)

जाँच और अन्वेषण में अंतर "कौन" का है। अन्वेषण (investigation) साक्ष्य जुटाने की सारी कार्यवाही है और इसे पुलिस अधिकारी करता है, या मजिस्ट्रेट द्वारा प्राधिकृत कोई ऐसा व्यक्ति जो स्वयं मजिस्ट्रेट नहीं है। जाँच (inquiry) हर वह जाँच है जो मजिस्ट्रेट या न्यायालय संहिता के अधीन करता है, विचारण (trial) को छोड़कर। यानी विचारण जाँच नहीं है, जाँच विचारण से पहले का चरण है। अन्वेषण की परिभाषा के साथ एक स्पष्टीकरण भी जुड़ा है: यदि किसी विशेष अधिनियम के उपबंध इस संहिता से असंगत हों तो विशेष अधिनियम के उपबंध प्रभावी होंगे। आरोप (charge) की परिभाषा बहुत छोटी है: जहाँ आरोप में एक से अधिक शीर्ष हों, वहाँ "आरोप" में हर शीर्ष शामिल है।

तुलना: परिवाद बनाम पुलिस रिपोर्ट; जाँच बनाम अन्वेषण

पहला

परिवाद (complaint) और पुलिस रिपोर्टपरिवाद मजिस्ट्रेट को दिया जाता है, मौखिक या लिखित; अपराधी ज्ञात या अज्ञात

अपवादअन्वेषण के बाद असंज्ञेय अपराध की पुलिस रिपोर्ट को परिवाद माना जाता है; रिपोर्ट देने वाला परिवादी

जाँच (inquiry) बनाम अन्वेषण (investigation)जाँच: मजिस्ट्रेट या न्यायालय करता है; विचारण नहीं

विशेष अधिनियम से टकरावअन्वेषण की परिभाषा के स्पष्टीकरण के अनुसार विशेष अधिनियम प्रभावी

दूसरा

परिवाद (complaint) और पुलिस रिपोर्टपुलिस रिपोर्ट अन्वेषण पूरा होने पर पुलिस अधिकारी द्वारा मजिस्ट्रेट को भेजी जाती है (धारा 2(1)(t))

अपवादइसके अलावा पुलिस रिपोर्ट परिवाद नहीं है

जाँच (inquiry) बनाम अन्वेषण (investigation)अन्वेषण: पुलिस या मजिस्ट्रेट-प्राधिकृत व्यक्ति (मजिस्ट्रेट को छोड़कर) करता है; लक्ष्य साक्ष्य संकलन

विशेष अधिनियम से टकरावजाँच की परिभाषा में ऐसा स्पष्टीकरण नहीं

श्रव्य-दृश्य इलेक्ट्रॉनिक साधन, इलेक्ट्रॉनिक संचार और उप-खंड

BNSS का एक बड़ा जोर तकनीक पर है और ये दो परिभाषाएँ उसी की नींव हैं। श्रव्य-दृश्य इलेक्ट्रॉनिक साधन (audio-video electronic means) में किसी भी संचार-उपकरण का उपयोग शामिल है, चाहे वह वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के लिए हो, पहचान, तलाशी और ज़ब्ती की प्रक्रिया या साक्ष्य की रिकॉर्डिंग के लिए, या इलेक्ट्रॉनिक संचार भेजने के लिए। "shall include" शब्द बताते हैं कि यह सूची समावेशी है: राज्य सरकार नियम बनाकर और उद्देश्य और साधन जोड़ सकती है। इलेक्ट्रॉनिक संचार (electronic communication) में लिखित, मौखिक, चित्रात्मक सूचना या वीडियो सामग्री का किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से आना-जाना शामिल है, चाहे वह व्यक्ति से व्यक्ति के बीच हो, उपकरण से उपकरण के बीच, व्यक्ति से उपकरण या उपकरण से व्यक्ति के बीच। केंद्र सरकार अधिसूचना से कोई और इलेक्ट्रॉनिक रूप भी निर्दिष्ट कर सकती है।

आगे की धाराओं में आप इनका असर देखेंगे। धारा 173 में सूचना इलेक्ट्रॉनिक संचार से भी दी जा सकती है और तीन दिन में हस्ताक्षर कराकर अभिलेख पर ली जाती है। धारा 187(4) में पुलिस हिरासत देने के लिए अभियुक्त को पहली बार और फिर हर बार सशरीर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना ज़रूरी है, जबकि न्यायिक हिरासत आगे बढ़ाने के लिए श्रव्य-दृश्य इलेक्ट्रॉनिक साधन से पेशी भी चल जाती है। उप-खंड (sub-division) की परिभाषा सबसे छोटी है: ज़िले का एक उप-खंड। फिर भी यह महत्वपूर्ण है क्योंकि कार्यपालक मजिस्ट्रेटों का ढाँचा (ज़िला मजिस्ट्रेट, उप-खंड मजिस्ट्रेट) इसी इकाई पर टिका है, जिसे दूसरे पृष्ठ पर पढ़ेंगे।

धारा 3(2): दूसरे क़ानूनों में मजिस्ट्रेट के कार्य: न्यायिक या कार्यपालक?

देश में बहुत-से क़ानून हैं जो कहते हैं "मजिस्ट्रेट यह करेगा" या "मजिस्ट्रेट की अनुमति से", बिना यह बताए कि कौन-सा मजिस्ट्रेट। धारा 3(2) इसी उलझन का हल देती है। नियम कहता है कि जब किसी ऐसे क़ानून (जो BNSS नहीं है) में मजिस्ट्रेट के कार्य बताए गए हों, तो कार्य का स्वरूप देखकर तय होगा कि वह न्यायिक मजिस्ट्रेट करेगा या कार्यपालक।

खंड (a): यदि कार्य ऐसे मामलों से जुड़े हैं जिनमें साक्ष्य का मूल्यांकन या हेरफेर (appreciation or shifting of evidence) करना पड़ता है, या ऐसा कोई निर्णय लेना होता है जिससे किसी व्यक्ति को दंड, शास्ति या अन्वेषण, जाँच या विचारण के दौरान निरोध का सामना करना पड़े, या जिसका परिणाम व्यक्ति को किसी न्यायालय में विचारण के लिए भेजना हो, तो वे कार्य (संहिता के उपबंधों के अधीन रहते हुए) न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा किए जाएँगे। खंड (b): यदि कार्य प्रशासनिक या कार्यपालक प्रकृति के हैं, जैसे अनुज्ञप्ति (licence) देना, निलंबित या रद्द करना, अभियोजन की मंज़ूरी देना या अभियोजन वापस लेना, तो वे खंड (a) के उपबंधों के अधीन रहते हुए कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा किए जाएँगे।

सरल कसौटी यह है: जहाँ किसी की आज़ादी, दंड या मुक़दमे पर असर पड़ता है और साक्ष्य तौलना पड़ता है, वहाँ न्यायिक मजिस्ट्रेट; जहाँ केवल प्रशासनिक अनुमति या मंज़ूरी का सवाल है, वहाँ कार्यपालक मजिस्ट्रेट। ध्यान रहे कि अभियोजन की मंज़ूरी देना और अभियोजन वापस लेना, दोनों खंड (b) की सूची में हैं, यानी इन्हें कार्यपालक कार्य माना गया है।

धारा 3(2): खंड (a) और खंड (b) की तुलना

खंड (a)

कार्य का स्वरूपसाक्ष्य का मूल्यांकन, दंड, शास्ति या निरोध वाला निर्णय, विचारण के लिए भेजना

गिनाए गए उदाहरणसाक्ष्य का मूल्यांकन या हेरफेर; अन्वेषण, जाँच या विचारण के दौरान निरोध; विचारण के लिए भेजना

कौन करेगान्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate)

शर्तसंहिता के उपबंधों के अधीन

खंड (b)

कार्य का स्वरूपप्रशासनिक या कार्यपालक कार्य

गिनाए गए उदाहरणअनुज्ञप्ति देना; अनुज्ञप्ति निलंबित या रद्द करना; अभियोजन की मंज़ूरी देना; अभियोजन वापस लेना

कौन करेगाकार्यपालक मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate)

शर्तखंड (a) के उपबंधों के अधीन

धारा 3(2): कार्य किसके पास जाएगा

  1. दूसरे क़ानून में मजिस्ट्रेट का कार्य

    क़ानून ने केवल "मजिस्ट्रेट" लिखा है; BNSS के बाहर का क़ानून

  2. कार्य का स्वरूप देखें

    क्या साक्ष्य तौलना, दंड या निरोध का निर्णय, या विचारण के लिए भेजना शामिल है?

  3. हाँ: खंड (a)

    न्यायिक मजिस्ट्रेट करेगा

  4. नहीं, कार्य प्रशासनिक है: खंड (b)

    कार्यपालक मजिस्ट्रेट करेगा (अनुज्ञप्ति, अभियोजन की मंज़ूरी या वापसी जैसे कार्य)

धारा 2 के पंद्रह शब्द: जोड़ों का नक्शा

BNSS धारा 2(1) की परिभाषाएँ

रिहाई

  • ज़मानत (bail)
  • बंधपत्र (bond)
  • ज़मानतीय बंधपत्र (bail bond)
  • ज़मानतीय/अज़मानतीय अपराध

पुलिस की शक्ति

  • संज्ञेय अपराध
  • असंज्ञेय अपराध

मामले का प्रकार

  • समन-मामला
  • वारंट-मामला
  • आरोप (charge)

कार्यवाही

  • परिवाद (complaint)
  • जाँच (inquiry)
  • अन्वेषण (investigation)

तकनीक और इकाई

  • श्रव्य-दृश्य इलेक्ट्रॉनिक साधन
  • इलेक्ट्रॉनिक संचार
  • उप-खंड (sub-division)

मुख्य तथ्य

अधिनियम
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, अधिनियम क्रमांक 46, स्वीकृति और राजपत्र 25 दिसंबर 2023
प्रारंभ
1 जुलाई 2024 (BNS की धारा 106(2) से जुड़ी पहली-अनुसूची प्रविष्टि को छोड़कर)
धारा 1(2)
नागालैंड और जनजातीय क्षेत्रों पर लागू नहीं; अध्याय IX, XI और XII अपवाद; कट-ऑफ़ तारीख़ 21 जनवरी 1972
धारा 2(1)
खंड (a) से (z) तक छब्बीस परिभाषाएँ; सिलेबस के 15 शब्द इन्हीं में
ज़मानत की परिभाषा
धारा 2(1)(b); bond और bail bond क्रमशः खंड (e) और (d)
वारंट-मामला
मृत्युदंड, आजीवन कारावास या दो वर्ष से अधिक कारावास
असंज्ञेय अपराध की रिपोर्ट
अन्वेषण के बाद की पुलिस रिपोर्ट परिवाद मानी जाती है (धारा 2(1)(h) का स्पष्टीकरण)
धारा 3(2)
न्यायिक कार्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को, प्रशासनिक कार्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट को
पुराने क्रमांक (अध्ययन-सहायता)
धारा 1, 2, 3 क्रमशः CrPC की धारा 1, 2, 3 से मिलती हैं
अंतिम जाँच
2 अक्टूबर 2026

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • bond और bail bond को एक मान लेना। bond में ज़मानतदार नहीं होता; bail bond में होता है। खंड (e) और (d) उलटे न लिखें।
  • "ज़मानत" और "ज़मानतीय अपराध" को एक चीज़ समझना। पहली रिहाई की प्रक्रिया है; दूसरा अपराध का वर्ग, जो पहली अनुसूची या अन्य क़ानून से तय होता है।
  • वारंट-मामले में "दो वर्ष या उससे अधिक" लिख देना। पाठ में "exceeding two years" है, यानी दो वर्ष से अधिक; ठीक दो वर्ष समन-मामला है।
  • परिवाद में पुलिस रिपोर्ट को जोड़ देना। परिभाषा उसे बाहर रखती है; केवल असंज्ञेय अपराध वाली रिपोर्ट अपवाद है।
  • जाँच (inquiry) और अन्वेषण (investigation) को उलटना। अन्वेषण पुलिस का साक्ष्य-संकलन है, जाँच मजिस्ट्रेट या न्यायालय की।
  • धारा 3(2) में अभियोजन की मंज़ूरी को न्यायिक कार्य बता देना। मंज़ूरी देना और अभियोजन वापस लेना, दोनों खंड (b) में कार्यपालक कार्य हैं।
  • धारा 1(2) में अपवाद के तीन अध्याय भूल जाना: IX, XI और XII लागू रहते हैं।