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पेपर III · इकाई III · भाग ख (विधि)

BNSS 2023: धारा 163 से 167, तत्काल निषेध-आदेश और भूमि-जल के विवाद

BNSS 2023 की धारा 163 से 167: तत्काल निषेध-आदेश, भूमि या जल के कब्ज़े और उपयोग के विवाद, कुर्की, रिसीवर और स्थानीय जाँच।

  • धारा 163
  • धारा 164
  • धारा 165
  • धारा 166
  • धारा 167
  • निषेधाज्ञा
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (विधि): "Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023: ... Sections ... 163-167, 173, 174, 187, 194-196." इस पृष्ठ पर धारा 163 (उपद्रव या आशंकित ख़तरे के तत्काल मामलों में आदेश), 164 (भूमि या जल के विवाद की प्रक्रिया), 165 (विवाद की वस्तु को कुर्क करना और रिसीवर नियुक्त करना), 166 (भूमि या जल के उपयोग के अधिकार का विवाद) और 167 (स्थानीय जाँच) हैं। धारा 1 से 3 पहले, 14 से 17 और 41 से 43 दूसरे, 126 से 152 तीसरे, 173, 174 और 187 पाँचवें तथा 194 से 196 छठे पृष्ठ पर हैं। यह पृष्ठ परीक्षा की तैयारी के लिए है, क़ानूनी सलाह नहीं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2013 से 2024 के उपलब्ध पेपरों में BNSS या CrPC से कोई प्रश्न नहीं मिलता, क्योंकि BNSS 2026 के सिलेबस में पहली बार जुड़ी है। इसलिए इस पृष्ठ पर पिछले प्रश्न नहीं हैं; तैयारी सिलेबस की पाँच धाराओं के सीधे पाठ पर टिकी है।
  • इस खंड के बाक़ी क़ानूनों में 2013 से 2024 के पेपरों में 2 और 5 अंक के परिभाषा या सूची वाले प्रश्न देखे गए हैं। यहाँ तारीख़ और अवधियाँ सबसे उपयोगी हैं: दो माह, छह माह (धारा 163), दो माह (धारा 164 का परंतुक) और तीन माह (धारा 166)। इन्हें उलटना आसान है, इसलिए तालिका पक्की करें।
  • ये धाराएँ उन विषयों को छूती हैं जो इकाई II (ज़िला प्रशासन, विधि-व्यवस्था) और राजस्थान के भूमि-क़ानूनों (काश्तकारी और भू-राजस्व अधिनियम) से जुड़ते हैं: कब्ज़े के झगड़े में मजिस्ट्रेट स्वामित्व तय नहीं करता, केवल कब्ज़े की स्थिति बचाता है। यह भेद आगे के पृष्ठों में भी काम आएगा।

पहले सरल भाषा में

ज़िला मजिस्ट्रेट किसी दिन सुबह-सुबह किसी क़स्बे में "निषेधाज्ञा" लगा देता है कि सभाएँ और जुलूस नहीं होंगे, क्योंकि आज दो समुदायों के जुलूस आमने-सामने आ सकते हैं (यह एक कल्पित उदाहरण है)। यह धारा 163 है: ख़तरा सामने खड़ा है और अदालत की पूरी प्रक्रिया की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती। दूसरी ओर, दो पड़ोसी किसान खेत के रास्ते या तालाब के पानी पर आमने-सामने हैं और लाठियाँ निकलने की नौबत है। यहाँ मजिस्ट्रेट मालिकाना हक़ का फ़ैसला नहीं करता; वह केवल यह देखता है कि आज असल में कब्ज़ा किसका है और उसी को बनाए रखता है, ताकि हक़ का फ़ैसला सिविल न्यायालय शांति से कर सके। यह धारा 164 से 167 का काम है।

इसलिए इस पृष्ठ की पाँचों धाराएँ एक ही अध्याय XI ("Maintenance of Public Order and Tranquillity") की हैं। उसके उपखंड हैं: अवैध जमाव (धारा 148, 149), लोक उपद्रव (धारा 152), उपद्रव या आशंकित ख़तरे के तत्काल मामले ("C.-Urgent cases of nuisance or apprehended danger", धारा 163) और अचल संपत्ति के विवाद ("D.-Disputes as to immovable property", धारा 164 से 167)।

धारा 163: उपद्रव या आशंकित ख़तरे के तत्काल मामलों में आदेश (Power to issue order in urgent cases of nuisance or apprehended danger)

उपधारा (1): ज़िला मजिस्ट्रेट, उप-खंड मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा इसके लिए विशेष रूप से सशक्त कोई अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट, जब यह राय बनाए कि कार्यवाही के पर्याप्त आधार हैं और तत्काल रोकथाम या शीघ्र उपचार वांछनीय है, तो लिखित आदेश दे सकता है। आदेश में मामले के तात्त्विक तथ्य लिखे जाएँगे और उसकी तामील धारा 153 में बताई रीति से होगी। वह किसी भी व्यक्ति को किसी कार्य से दूर रहने का, या अपने कब्ज़े या प्रबंध की किसी संपत्ति के बारे में कोई व्यवस्था करने का निर्देश दे सकता है, यदि उसे लगे कि ऐसा निर्देश वैध रूप से नियोजित किसी व्यक्ति को बाधा, परेशानी या क्षति, या मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा को ख़तरा, लोक शांति में विघ्न, दंगा (riot) या मारपीट (affray) को रोकता है या रोकने की प्रवृत्ति रखता है।

उपधारा (2): आपातकाल में, या जब परिस्थितियाँ उस व्यक्ति को समय पर नोटिस देने की अनुमति न दें जिसके विरुद्ध आदेश है, तो आदेश एकतरफ़ा (ex parte) पारित हो सकता है। उपधारा (3): आदेश किसी विशेष व्यक्ति के नाम हो सकता है, किसी स्थान या क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों के नाम, या किसी स्थान या क्षेत्र में आने-जाने वाली आम जनता के नाम। उदाहरण के लिए, किसी इलाक़े में सभा या जुलूस पर रोक का आदेश आम जनता के नाम होता है।

उपधारा (4) में समय-सीमा है: कोई भी आदेश बनने की तारीख़ से दो माह से अधिक लागू नहीं रहेगा। परंतुक: यदि राज्य सरकार मानवीय जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा के लिए ख़तरा या दंगा या मारपीट रोकने के लिए आवश्यक समझे, तो वह अधिसूचना से निर्देश दे सकती है कि मजिस्ट्रेट का आदेश, अपनी समाप्ति की तारीख़ से, उतनी और अवधि तक लागू रहे जो अधिसूचना में बताई जाए, पर छह माह से अधिक नहीं। (विश्लेषण: यानी एक आदेश अधिकतम दो माह, और राज्य के बढ़ाने पर उसके बाद अधिकतम छह माह और; दोनों मिलाकर आठ माह से अधिक नहीं।)

उपधारा (5): कोई भी मजिस्ट्रेट, स्वतः या पीड़ित के आवेदन पर, अपने, अपने अधीनस्थ या अपने पूर्ववर्ती के किए आदेश को रद्द या बदल सकता है। उपधारा (6): राज्य सरकार, स्वतः या पीड़ित के आवेदन पर, उपधारा (4) के परंतुक के अधीन अपने आदेश को रद्द या बदल सकती है। उपधारा (7): आवेदन मिलने पर मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार आवेदक को स्वयं या अधिवक्ता के द्वारा उपस्थित होकर आदेश के विरुद्ध कारण बताने का शीघ्र अवसर देगी, और आवेदन पूर्णतः या अंशतः अस्वीकार करे तो लिखित कारण दर्ज करेगी।

धारा 163 की उपधाराएँ एक नज़र में

उपधाराविषयमुख्य बात
(1)कौन और किस आधार परज़िला मजिस्ट्रेट, उप-खंड मजिस्ट्रेट या विशेष सशक्त कार्यपालक मजिस्ट्रेट; लिखित आदेश, तात्त्विक तथ्य, तामील धारा 153 की रीति से; किसी कार्य से दूर रहने या संपत्ति पर कोई व्यवस्था करने का निर्देश
(2)एकतरफ़ा आदेशआपातकाल या समय पर नोटिस असंभव होने पर
(3)आदेश किसके नामविशेष व्यक्ति, किसी स्थान के निवासी, या उस स्थान पर आने-जाने वाली आम जनता
(4)अवधिदो माह से अधिक नहीं; राज्य सरकार की अधिसूचना से उसके बाद छह माह से अधिक नहीं
(5)रद्द या परिवर्तनकोई भी मजिस्ट्रेट स्वतः या पीड़ित के आवेदन पर, अपने, अधीनस्थ या पूर्ववर्ती के आदेश को
(6)राज्य का आदेशराज्य सरकार अपने परंतुक वाले आदेश को रद्द या बदल सकती है
(7)सुनवाईआवेदक को शीघ्र सुनवाई का अवसर; अस्वीकार पर लिखित कारण

धारा 164: भूमि या जल का विवाद जिससे शांति-भंग की आशंका हो (Procedure where dispute concerning land or water is likely to cause breach of peace)

उपधारा (1): जब कार्यपालक मजिस्ट्रेट को पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट या अन्य सूचना से संतोष हो कि उसकी स्थानीय अधिकारिता में किसी भूमि या जल, या उसकी सीमाओं के बारे में ऐसा विवाद है जिससे शांति-भंग की आशंका है, तब वह लिखित आदेश देगा जिसमें अपने संतुष्ट होने के कारण होंगे। आदेश संबंधित पक्षों को निर्धारित तारीख़ और समय पर स्वयं या अधिवक्ता द्वारा उपस्थित होने और विवाद की वस्तु के वास्तविक कब्ज़े (actual possession) के तथ्य के बारे में अपने-अपने दावों का लिखित बयान देने को कहेगा।

उपधारा (2) में "भूमि या जल" (land or water) का दायरा बताया गया है: इसमें इमारतें, बाज़ार, मत्स्य-क्षेत्र, फ़सलें या भूमि की अन्य उपज, और ऐसी किसी संपत्ति का किराया या लाभ भी शामिल हैं। उपधारा (3): आदेश की प्रति मजिस्ट्रेट द्वारा निर्देशित व्यक्तियों पर समन की तामील की रीति से तामील होगी, और कम से कम एक प्रति विवाद की वस्तु के पास या निकट किसी प्रमुख स्थान पर चिपकाकर प्रकाशित की जाएगी।

उपधारा (4) इस पूरे विषय का मर्म है। मजिस्ट्रेट पक्षों के किसी भी कब्ज़े के अधिकार के गुण-दोष या दावों का विचार किए बिना बयान पढ़ेगा, पक्षों की सुनवाई करेगा, उनके साक्ष्य लेगा, आवश्यक हो तो और साक्ष्य लेगा, और यदि संभव हो तो यह तय करेगा कि उपधारा (1) के आदेश की तारीख़ पर कौन-सा पक्ष, यदि कोई हो, विवाद की वस्तु के कब्ज़े में था। परंतुक: यदि मजिस्ट्रेट को लगे कि पुलिस रिपोर्ट या सूचना मिलने से ठीक पहले दो माह में, या उसके बाद और आदेश की तारीख़ से पहले, किसी पक्ष को बलपूर्वक और ग़लत तरीक़े से बेदख़ल किया गया है, तो वह उस बेदख़ल पक्ष को आदेश की तारीख़ पर कब्ज़े में मान सकता है।

उपधारा (5): कोई पक्ष या अन्य हितबद्ध व्यक्ति यह दिखा सकता है कि ऐसा कोई विवाद है ही नहीं या कभी था ही नहीं; तब मजिस्ट्रेट अपना आदेश रद्द करेगा और आगे की कार्यवाही रोक दी जाएगी; रद्द न होने पर उपधारा (1) का आदेश अंतिम रहेगा। उपधारा (6): यदि मजिस्ट्रेट तय करे कि एक पक्ष कब्ज़े में था (या परंतुक के अनुसार माना जाना चाहिए), तो वह घोषणा का आदेश देगा कि वह पक्ष विधिवत बेदख़ली तक कब्ज़े का हक़दार है और बेदख़ली तक उसके कब्ज़े में सभी बाधा निषिद्ध है; परंतुक के अंतर्गत कार्यवाही करते हुए वह बलपूर्वक बेदख़ल पक्ष को कब्ज़ा लौटा भी सकता है। आदेश उपधारा (3) की रीति से तामील और प्रकाशित होगा।

उपधारा (7): किसी पक्ष की मृत्यु पर मजिस्ट्रेट उसके विधिक प्रतिनिधि को पक्ष बना सकता है और जाँच जारी रखेगा। उपधारा (8): यदि मजिस्ट्रेट को लगे कि विवादित संपत्ति की कोई फ़सल या उपज शीघ्र और स्वाभाविक रूप से सड़ने वाली है, तो वह उसकी उचित अभिरक्षा या बिक्री का आदेश दे सकता है और जाँच पूर्ण होने पर बिक्री-आगम या संपत्ति के निपटान का उचित आदेश देगा। उपधारा (9): किसी भी स्तर पर पक्ष के आवेदन पर वह गवाह को समन देकर बुला सकता है या दस्तावेज़ या वस्तु मँगा सकता है। उपधारा (10): यह धारा धारा 126 के अधीन कार्यवाही करने की मजिस्ट्रेट की शक्ति में कटौती नहीं करती।

धारा 164 की कार्यवाही का क्रम

  1. सूचना या रिपोर्ट

    पुलिस की रिपोर्ट या अन्य सूचना से कार्यपालक मजिस्ट्रेट को संतोष कि विवाद से शांति-भंग की आशंका है (164(1))

  2. लिखित आदेश

    कारण सहित; पक्षों को तारीख़ पर उपस्थित होकर कब्ज़े पर बयान देने को कहता है; तामील और चिपकाना (164(3))

  3. सुनवाई और साक्ष्य

    मजिस्ट्रेट कब्ज़े के अधिकार के गुण-दोष में नहीं जाता; आदेश की तारीख़ पर कब्ज़ा किसका (164(4))

  4. दो माह का परंतुक

    बलपूर्वक और ग़लत बेदख़ल पक्ष को कब्ज़े में माना जा सकता है

  5. आदेश (164(6))

    कब्ज़े वाला पक्ष विधिवत बेदख़ली तक हक़दार; बाधा निषिद्ध; आवश्यक हो तो कब्ज़ा लौटाना

  6. कब्ज़ा तय न हो या आपातकाल

    धारा 165: कुर्की और रिसीवर, जब तक सक्षम न्यायालय हक़ तय न करे

धारा 165: विवाद की वस्तु को कुर्क करना और रिसीवर नियुक्त करना (Power to attach subject of dispute and to appoint receiver)

धारा 164(1) का आदेश देने के बाद मजिस्ट्रेट तीन स्थितियों में विवाद की वस्तु को कुर्क (attach) कर सकता है: (1) वह मामले को आपातकाल का मानता है, या (2) वह तय करता है कि उस समय किसी भी पक्ष का कब्ज़ा नहीं था, या (3) वह स्वयं संतुष्ट नहीं हो पाता कि किसके कब्ज़े में थी। कुर्की तब तक चलती है जब तक सक्षम न्यायालय पक्षों के कब्ज़े के हक़ के बारे में निर्णय न दे। परंतुक: यदि मजिस्ट्रेट संतुष्ट हो जाए कि अब वस्तु के बारे में शांति-भंग की संभावना नहीं रही, तो वह किसी भी समय कुर्की वापस ले सकता है।

कुर्की के बाद उपधारा (2): यदि किसी सिविल न्यायालय ने उस वस्तु के लिए कोई रिसीवर (receiver) नियुक्त न किया हो, तो मजिस्ट्रेट देखभाल की उचित व्यवस्था कर सकता है या चाहे तो रिसीवर नियुक्त कर सकता है, जिसे मजिस्ट्रेट के नियंत्रण में, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन नियुक्त रिसीवर की सारी शक्तियाँ होंगी। परंतुक: बाद में सिविल न्यायालय रिसीवर नियुक्त कर दे तो मजिस्ट्रेट (क) अपने रिसीवर को सिविल न्यायालय के रिसीवर को कब्ज़ा सौंपने और फिर उसे मुक्त करने का आदेश देगा, और (ख) और उचित आनुषंगिक आदेश दे सकता है।

धारा 166: भूमि या जल के उपयोग के अधिकार का विवाद (Dispute concerning right of use of land or water)

कभी विवाद कब्ज़े का नहीं, बल्कि दूसरे की भूमि या जल के उपयोग के अधिकार का होता है: जैसे खेत तक जाने का रास्ता, या कुएँ से पानी भरने का अधिकार। धारा 166(1) में कार्यपालक मजिस्ट्रेट पुलिस रिपोर्ट या अन्य सूचना से संतुष्ट हो कि उसकी अधिकारिता में ऐसे उपयोग के किसी कथित अधिकार के बारे में शांति-भंग की आशंका वाला विवाद है, चाहे अधिकार सुखाधिकार (easement) के रूप में दावा किया गया हो या अन्यथा, तो वह लिखित आदेश देगा और पक्षों को उपस्थित होकर अपने-अपने दावों के लिखित बयान देने को कहेगा। स्पष्टीकरण: "भूमि या जल" का अर्थ वही है जो धारा 164(2) में है।

उपधारा (2): मजिस्ट्रेट बयान पढ़ेगा, सुनवाई करेगा, साक्ष्य लेगा, उसके प्रभाव पर विचार करेगा और यदि संभव हो तो तय करेगा कि अधिकार है या नहीं; इस जाँच में धारा 164 के उपबंध यथासंभव लागू होंगे। उपधारा (3): यदि अधिकार प्रतीत हो तो मजिस्ट्रेट उस अधिकार के प्रयोग में हस्तक्षेप को प्रतिबंधित करने का आदेश दे सकता है, और उचित मामले में अवरोध हटाने का भी। परंतुक: यदि अधिकार वर्ष के हर समय प्रयोग किया जा सकता है तो ऐसा आदेश तभी होगा जब वह अधिकार रिपोर्ट या सूचना मिलने से ठीक पहले तीन माह के भीतर प्रयोग किया गया हो; और यदि अधिकार केवल विशेष ऋतुओं या अवसरों पर प्रयोग्य है तो आदेश तभी जब वह अंतिम ऋतु या अंतिम अवसर के दौरान प्रयोग हुआ हो।

उपधारा (4) दोनों धाराओं के बीच आवाजाही की छूट देती है: यदि धारा 164(1) के अधीन शुरू कार्यवाही में मजिस्ट्रेट पाए कि विवाद उपयोग के कथित अधिकार का है, तो कारण दर्ज करके वह उसे ऐसे जारी रख सकता है मानो धारा 166(1) के अधीन शुरू हुई हो; और उलटा भी, जब धारा 166(1) की कार्यवाही में उसे लगे कि विवाद धारा 164 के अंतर्गत निपटाना चाहिए, तो कारण दर्ज करके उसे धारा 164(1) के अधीन चला सकता है।

धारा 167: स्थानीय जाँच (Local inquiry)

जब धारा 164, 165 या 166 के प्रयोजन के लिए स्थानीय जाँच आवश्यक हो, तब ज़िला मजिस्ट्रेट या उप-खंड मजिस्ट्रेट अपने किसी अधीनस्थ मजिस्ट्रेट को जाँच के लिए नियुक्त कर सकता है, उसे मार्गदर्शन के लिए आवश्यक लिखित निर्देश दे सकता है और यह भी घोषित कर सकता है कि जाँच का पूरा या कुछ ख़र्च कौन देगा (उपधारा 1)। नियुक्त व्यक्ति की रिपोर्ट मामले में साक्ष्य के रूप में पढ़ी जा सकती है (उपधारा 2)।

उपधारा (3) लागत (costs) पर है: जब धारा 164, 165 या 166 की कार्यवाही में किसी पक्ष ने ख़र्च किया हो, तो निर्णय देने वाला मजिस्ट्रेट निर्देश दे सकता है कि वह किसके द्वारा चुकाया जाए, चाहे उस पक्ष द्वारा या किसी अन्य पक्ष द्वारा, पूर्ण रूप से या अंश या अनुपात में। इसमें गवाहों पर किए गए ख़र्च और अधिवक्ताओं की वह फ़ीस भी हो सकती है जिसे न्यायालय उचित समझे।

तुलना: धारा 163, 164 और 166

बिंदुधारा 163धारा 164धारा 166
विषयउपद्रव या आशंकित ख़तरे में तत्काल निषेध-आदेशभूमि या जल के कब्ज़े का विवादभूमि या जल के उपयोग के अधिकार का विवाद
कौनज़िला मजिस्ट्रेट, उप-खंड मजिस्ट्रेट या विशेष सशक्त कार्यपालक मजिस्ट्रेटकार्यपालक मजिस्ट्रेटकार्यपालक मजिस्ट्रेट
क्या तय होता हैकिसी कार्य से दूर रहने या संपत्ति पर कोई व्यवस्था करने का निर्देशआदेश की तारीख़ पर वास्तविक कब्ज़ा किसका (हक़ का नहीं)अधिकार है या नहीं; हस्तक्षेप पर रोक
पक्षों की भूमिकाएकतरफ़ा आदेश संभव (उपधारा 2)पक्षों को बुलाकर कब्ज़े पर लिखित बयान लिए जाते हैंपक्षों को बुलाकर दावों के लिखित बयान लिए जाते हैं
समय-संबंधी नियमदो माह; राज्य के बढ़ाने पर उसके बाद छह माह तकबलपूर्वक बेदख़ली: दो माह का परंतुकअधिकार वर्ष-भर प्रयोग्य हो तो तीन माह में प्रयोग; मौसमी हो तो अंतिम ऋतु या अवसर में प्रयोग
अंत मेंआदेश अवधि के बाद समाप्त, या रद्द या बदला जा सकताकब्ज़े वाले पक्ष के पक्ष में घोषणा, बाधा निषिद्ध; या धारा 165 की कुर्कीहस्तक्षेप पर रोक का आदेश, उचित मामले में अवरोध हटाना

चार संख्याएँ जो अवधि के रूप में आती हैं

धाराअवधिकिसके लिए
163(4)दो माहमजिस्ट्रेट के आदेश की अधिकतम अवधि, बनने की तारीख़ से
163(4) परंतुकछह माहराज्य अधिसूचना से आदेश का और विस्तार, समाप्ति की तारीख़ से, इससे अधिक नहीं
164(4) परंतुकदो माहबलपूर्वक और ग़लत बेदख़ली की पूर्व-अवधि जिसमें बेदख़ल पक्ष को कब्ज़े में माना जा सकता है
166(3) परंतुकतीन माहवर्ष-भर के अधिकार का प्रयोग रिपोर्ट या सूचना से पहले इस अवधि में हुआ हो

मुख्य तथ्य

अध्याय XI के उपखंड
अवैध जमाव (148, 149); लोक उपद्रव (152); तत्काल मामले (163); अचल संपत्ति के विवाद (164 से 167)
धारा 163(4)
मजिस्ट्रेट का आदेश दो माह से अधिक नहीं; राज्य अधिसूचना से और छह माह तक
धारा 163(2)
आपातकाल या नोटिस असंभव होने पर आदेश एकतरफ़ा (ex parte)
धारा 164(2)
"भूमि या जल" में इमारतें, बाज़ार, मत्स्य-क्षेत्र, फ़सलें या भूमि की उपज, और किराया या लाभ
धारा 164(4) परंतुक
पूर्व दो माह में बलपूर्वक और ग़लत बेदख़ली पर बेदख़ल पक्ष को कब्ज़े में माना जा सकता है
धारा 165
कुर्की: आपातकाल, किसी का कब्ज़ा नहीं, या निश्चय न हो; सक्षम न्यायालय के निर्णय तक; रिसीवर को CPC 1908 वाली शक्तियाँ
धारा 166(3) परंतुक
वर्ष-भर के अधिकार का प्रयोग पूर्व तीन माह में; मौसमी अधिकार का अंतिम ऋतु या अवसर पर
धारा 167
ज़िला मजिस्ट्रेट या उप-खंड मजिस्ट्रेट अधीनस्थ मजिस्ट्रेट से स्थानीय जाँच करा सकते हैं; रिपोर्ट साक्ष्य; लागत का निर्णय
पुराने क्रमांक (अध्ययन-सहायता)
धारा 163, 164, 165, 166, 167 क्रमशः CrPC की 144, 145, 146, 147, 148; CrPC की धारा 144A (हथियार ले जाने पर रोक) BNSS में नहीं है
अंतिम जाँच
2 अक्टूबर 2026

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • धारा 163 की दो माह की अवधि को राज्य सरकार की छह माह वाली अवधि के साथ मिला देना। मजिस्ट्रेट का आदेश दो माह; राज्य अधिसूचना से उसके बाद अधिकतम छह माह और।
  • धारा 164 में मजिस्ट्रेट को मालिकाना हक़ तय करने वाला बता देना। पाठ कहता है कि वह कब्ज़े के हक़ के गुण-दोष में गए बिना केवल आदेश की तारीख़ पर कब्ज़ा देखता है।
  • धारा 164 के परंतुक में "दो माह" की जगह "तीन माह" लिख देना। तीन माह धारा 166 का है।
  • धारा 165 को पहली ही सुनवाई की कार्रवाई बताना। यह धारा 164(1) का आदेश देने के बाद ही लगती है और केवल आपातकाल, किसी का कब्ज़ा न होने या निश्चय न हो पाने पर।
  • धारा 166 के विवाद को कब्ज़े का विवाद कहना। यह उपयोग के अधिकार (easement या अन्यथा) का विवाद है।
  • रिसीवर की शक्तियाँ "सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908" वाली न लिखकर "दंड प्रक्रिया" वाली लिख देना।
  • धारा 144A (CrPC) को BNSS की धारा बता देना। हथियार ले जाने पर रोक वाली वह धारा BNSS में नहीं है।