मुख्य सामग्री पर जाएं
पेपर III · इकाई III · भाग ख (विधि)

BNSS 2023: धारा 173, 174 और 187, प्रथम सूचना, असंज्ञेय मामले और 24 घंटे के बाद निरोध

BNSS 2023 की धारा 173, 174 और 187: प्रथम सूचना का तरीक़ा, असंज्ञेय मामलों की प्रक्रिया और अन्वेषण के दौरान निरोध की समय-सीमाएँ।

  • धारा 173
  • शून्य प्राथमिकी
  • धारा 174
  • धारा 187
  • 60 और 90 दिन
  • पुलिस अभिरक्षा
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (विधि): "Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023: ... Sections ... 173, 174, 187, 194-196." इस पृष्ठ पर धारा 173 (संज्ञेय मामलों में सूचना), 174 (असंज्ञेय मामलों में सूचना और उनका अन्वेषण) और 187 (अन्वेषण 24 घंटे में पूरा न हो तो प्रक्रिया) हैं। धारा 1 से 3 पहले, 14 से 17 और 41 से 43 दूसरे, 126 से 152 तीसरे, 163 से 167 चौथे तथा 194 से 196 छठे पृष्ठ पर हैं। यह पृष्ठ परीक्षा की तैयारी के लिए है, क़ानूनी सलाह नहीं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2013 से 2024 के उपलब्ध पेपरों में BNSS या CrPC से कोई प्रश्न नहीं मिलता, क्योंकि BNSS 2026 के सिलेबस में पहली बार जुड़ी है। इसलिए इस पृष्ठ पर पिछले प्रश्न नहीं हैं; तैयारी इन तीन धाराओं के सटीक पाठ और उसकी संख्याओं पर टिकी है।
  • ये तीनों धाराएँ आम नागरिक के सबसे ज़्यादा काम की हैं: थाने में रिपोर्ट कैसे लिखी जाएगी (173), असंज्ञेय मामले में पुलिस क्या कर सकती है (174) और गिरफ़्तारी के बाद हिरासत और ज़मानत की सीमाएँ क्या हैं (187)। इसलिए 2 और 5 अंक के प्रश्नों के साथ इन पर विस्तृत उत्तर लिखने का अभ्यास भी उपयोगी है।
  • संख्याएँ यहाँ सबसे ज़्यादा अंक देती हैं और सबसे ज़्यादा ग़लत भी होती हैं: तीन दिन (इलेक्ट्रॉनिक सूचना पर हस्ताक्षर), चौदह दिन (प्रारंभिक जाँच), 24 घंटे, पंद्रह दिन, चालीस और साठ दिन, साठ और नब्बे दिन, सात दिन, छह माह। तालिका में सब एक जगह दी गई हैं।

पहले सरल भाषा में

किसी अपराध की कहानी थाने की रिपोर्ट से शुरू होती है, जैसे मैच सीटी से शुरू होता है। धारा 173 बताती है कि सूचना किसे दी जाएगी, कैसे दी जाएगी (बोलकर या इलेक्ट्रॉनिक संचार से), रिपोर्ट में क्या दर्ज होगा, शिकायतकर्ता को क्या मिलेगा और थाना अगर मना कर दे तो आगे क्या रास्ता है। धारा 174 उन असंज्ञेय अपराधों के लिए है जिनमें पुलिस सीधे जाँच शुरू नहीं कर सकती; वहाँ पुलिस पहले रिपोर्ट दर्ज करती है और शिकायतकर्ता को मजिस्ट्रेट के पास भेजती है।

धारा 187 उस मोड़ की है जब पुलिस ने किसी को गिरफ़्तार कर लिया है पर 24 घंटे में अन्वेषण पूरा नहीं हो सकता। तब पुलिस को हिरासत बढ़वाने के लिए मजिस्ट्रेट के पास जाना पड़ता है, और मजिस्ट्रेट हिरासत की कुल सीमा तय करता है: साठ या नब्बे दिन। सीमा पार होते ही अभियुक्त को ज़मानत पर छोड़ना पड़ता है, यदि वह ज़मानत देने को तैयार हो। इन्हीं सीमाओं में नागरिक की आज़ादी और पुलिस के अन्वेषण के बीच संतुलन है।

धारा 173: संज्ञेय मामलों में सूचना (Information in cognizable cases)

उपधारा (1): संज्ञेय अपराध (cognizable offence, धारा 2(1)(g)) के होने की हर सूचना, अपराध चाहे जिस क्षेत्र में हुआ हो ("irrespective of the area where the offence is committed"), पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी, यानी थाना प्रभारी (officer in charge of a police station) को मौखिक रूप से या इलेक्ट्रॉनिक संचार से दी जा सकती है। इसी वाक्यांश के कारण वह स्थिति बनती है जिसे लोकप्रिय भाषा में "शून्य प्राथमिकी" (Zero FIR) कहा जाता है: जिस थाने में सूचना दी गई, वह अपराध के क्षेत्र से बाहर हो तो भी सूचना दर्ज होती है। यदि सूचना (i) मौखिक है तो थाना प्रभारी उसे या उसके निर्देश से लिखा जाएगा और सूचना देने वाले को पढ़कर सुनाया जाएगा; हर सूचना, चाहे लिखित हो या लिखी गई, सूचना देने वाले के हस्ताक्षर से युक्त होगी; (ii) इलेक्ट्रॉनिक संचार से दी गई है तो उसे अभिलेख पर तब लिया जाएगा जब सूचना देने वाला तीन दिन के भीतर उस पर हस्ताक्षर कर दे, और उसका सार राज्य सरकार द्वारा नियमों से निर्धारित रूप में थाने की पुस्तक में दर्ज होगा।

पहला परंतुक: यदि सूचना उस महिला द्वारा दी जा रही हो जिसके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, 65, 66, 67, 68, 69, 70, 71, 74, 75, 76, 77, 78, 79 या 124 के अंतर्गत अपराध किए जाने या किए जाने के प्रयास का आरोप है, तो सूचना महिला पुलिस अधिकारी या किसी भी महिला अधिकारी द्वारा दर्ज की जाएगी। दूसरा परंतुक: (क) यदि वही पीड़ित अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से दिव्यांग है, तो सूचना पुलिस अधिकारी द्वारा, रिपोर्ट करने वाले के निवास पर या उसकी पसंद के सुविधाजनक स्थान पर, दुभाषिया या विशेष शिक्षक की उपस्थिति में दर्ज की जाएगी; (ख) दर्ज करने की प्रक्रिया की वीडियोग्राफ़ी होगी; (ग) पुलिस अधिकारी यथाशीघ्र धारा 183 की उपधारा (6) के खंड (क) के अंतर्गत मजिस्ट्रेट से उस व्यक्ति का कथन दर्ज कराएगा।

उपधारा (2): उपधारा (1) के अनुसार दर्ज सूचना की प्रति तत्काल, निःशुल्क, सूचना देने वाले या पीड़ित को दी जाएगी। उपधारा (3): धारा 175 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जब किसी संज्ञेय अपराध की सूचना मिले जो तीन वर्ष या उससे अधिक पर सात वर्ष से कम के कारावास से दंडनीय है, तो थाना प्रभारी, अपराध की प्रकृति और गंभीरता देखकर और उप-पुलिस अधीक्षक (Deputy Superintendent of Police) से नीचे न रैंक के अधिकारी की पूर्व अनुमति से, या तो (i) चौदह दिन की अवधि के भीतर प्रारंभिक जाँच (preliminary enquiry) करे कि मामले में कार्यवाही के लिए प्रथम दृष्टया मामला है या नहीं, या (ii) प्रथम दृष्टया मामला होने पर अन्वेषण आगे बढ़ाए।

उपधारा (4): यदि थाना प्रभारी उपधारा (1) की सूचना दर्ज करने से मना कर दे, तो पीड़ित व्यक्ति उस सूचना का सार लिखित रूप में, डाक से, संबंधित पुलिस अधीक्षक को भेज सकता है। यदि अधीक्षक संतुष्ट हो कि सूचना से संज्ञेय अपराध का होना प्रकट होता है, तो वह स्वयं अन्वेषण करेगा या अपने अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी से अन्वेषण कराएगा, और वह अधिकारी उस अपराध के संबंध में थाना प्रभारी की सभी शक्तियों से युक्त होगा; ऐसा न होने पर (failing which) पीड़ित व्यक्ति मजिस्ट्रेट को आवेदन कर सकता है।

धारा 173 की उपधाराएँ और संख्याएँ

उपधाराविषयमुख्य बात
(1)सूचना देने का तरीक़ाक्षेत्र चाहे जो हो; मौखिक या इलेक्ट्रॉनिक संचार से; मौखिक सूचना लिखी और पढ़कर सुनाई जाए, हस्ताक्षर; इलेक्ट्रॉनिक सूचना पर तीन दिन में हस्ताक्षर
(1) पहला परंतुकमहिला से सूचनाधाराओं 64 से 71, 74 से 79 या 124 (BNS) में महिला से सूचना महिला पुलिस अधिकारी या महिला अधिकारी दर्ज करे
(1) दूसरा परंतुकदिव्यांग पीड़ितनिवास या पसंद के स्थान पर, दुभाषिया या विशेष शिक्षक के साथ, वीडियोग्राफ़ी, मजिस्ट्रेट से कथन (धारा 183(6)(क))
(2)प्रतितत्काल, निःशुल्क, सूचना देने वाले या पीड़ित को
(3)प्रारंभिक जाँचतीन वर्ष या अधिक पर सात वर्ष से कम दंड वाले संज्ञेय अपराध; DSP से कम नहीं रैंक के अधिकारी की पूर्व अनुमति; चौदह दिन में
(4)थाने के इनकार परलिखित सार डाक से पुलिस अधीक्षक को; वह स्वयं या अधीनस्थ से अन्वेषण कराए; ऐसा न हो तो मजिस्ट्रेट को आवेदन

धारा 174: असंज्ञेय मामलों में सूचना और उनका अन्वेषण (Information as to non-cognizable cases and investigation of such cases)

उपधारा (1): जब थाना प्रभारी को उस थाने की सीमा के भीतर हुए किसी असंज्ञेय अपराध (non-cognizable offence, धारा 2(1)(o)) की सूचना दी जाए, तो वह सूचना का सार राज्य सरकार द्वारा नियमों से निर्धारित रूप की पुस्तक में दर्ज करेगा या कराएगा, और (i) सूचना देने वाले को मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा, तथा (ii) ऐसे सभी मामलों की दैनिक डायरी रिपोर्ट (daily diary report) पखवाड़े में एक बार मजिस्ट्रेट को भेजेगा। उपधारा (2): कोई पुलिस अधिकारी असंज्ञेय मामले का अन्वेषण उस मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना नहीं करेगा जिसे उस मामले का विचारण करने या उसे विचारण के लिए सुपुर्द करने की शक्ति है।

उपधारा (3): ऐसा आदेश पाने वाला पुलिस अधिकारी अन्वेषण के संबंध में वही शक्तियाँ प्रयोग कर सकता है जो थाना प्रभारी संज्ञेय मामले में करता है, केवल बिना वारंट गिरफ़्तारी की शक्ति को छोड़कर। उपधारा (4): यदि किसी मामले में दो या अधिक अपराध हों जिनमें कम से कम एक संज्ञेय है, तो पूरा मामला संज्ञेय माना जाएगा, भले ही अन्य अपराध असंज्ञेय हों।

तुलना: धारा 173 और धारा 174

धारा 173 (संज्ञेय)

किसे सूचनाथाना प्रभारी, क्षेत्र चाहे जो हो

सूचना का तरीक़ामौखिक या इलेक्ट्रॉनिक संचार; मौखिक पर हस्ताक्षर; इलेक्ट्रॉनिक पर तीन दिन में

आगे क्याअन्वेषण (धारा 175 के अधीन); 3 से 7 वर्ष से कम में अनुमति से 14 दिन की प्रारंभिक जाँच

अन्वेषण के लिए आदेशआवश्यक नहीं

गिरफ़्तारीबिना वारंट संभव (संज्ञेय की परिभाषा)

मिश्रित मामलाएक भी संज्ञेय अपराध हो तो पूरा मामला संज्ञेय

धारा 174 (असंज्ञेय)

किसे सूचनाथाना प्रभारी, उस थाने की सीमा के भीतर हुए अपराध की

सूचना का तरीक़ाराज्य द्वारा निर्धारित रूप की पुस्तक में सार दर्ज

आगे क्यासूचना देने वाले को मजिस्ट्रेट के पास भेजना; पखवाड़े में दैनिक डायरी रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को

अन्वेषण के लिए आदेशमजिस्ट्रेट का आदेश आवश्यक, जो मामला सुनने या सुपुर्द करने में सक्षम हो

गिरफ़्तारीआदेश मिलने पर भी बिना वारंट गिरफ़्तारी की शक्ति नहीं

मिश्रित मामलाधारा 174(4)

धारा 187: अन्वेषण 24 घंटे में पूरा न हो तो प्रक्रिया (Procedure when investigation cannot be completed in twenty-four hours)

उपधारा (1): जब किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार कर निरुद्ध किया गया हो और लगे कि धारा 58 द्वारा तय चौबीस घंटे की अवधि में अन्वेषण पूरा नहीं हो सकता, और यह मानने के आधार हों कि आरोप या सूचना सही है, तो थाना प्रभारी या अन्वेषण करने वाला पुलिस अधिकारी (उप-निरीक्षक से नीचे का न हो तो) तत्काल निकटतम मजिस्ट्रेट को केस-डायरी की प्रविष्टियों की प्रति भेजेगा और साथ ही अभियुक्त को भी उस मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा।

उपधारा (2): जिस मजिस्ट्रेट के पास अभियुक्त भेजा गया है, वह मामले की सुनवाई की अधिकारिता रखता हो या न रखता हो, यह देखकर कि अभियुक्त ज़मानत पर छोड़ा नहीं गया है या उसकी ज़मानत रद्द नहीं हुई है, समय-समय पर अभियुक्त की ऐसी अभिरक्षा में निरोध प्राधिकृत कर सकता है जो वह उचित समझे, कुल या अंशों में पंद्रह दिन से अधिक नहीं, और यह पंद्रह दिन उपधारा (3) में बताई गई साठ दिन या नब्बे दिन की निरोध-अवधि में से, मामले के अनुसार, प्रारंभिक चालीस दिन या साठ दिन के दौरान किसी भी समय हो सकता है। यदि उसे मामले की सुनवाई या सुपुर्दगी की अधिकारिता न हो और वह आगे के निरोध को अनावश्यक माने, तो अभियुक्त को अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट के पास भेजने का आदेश दे सकता है। अंग्रेज़ी पाठ में इस उपधारा में अभिरक्षा के लिए "such custody as such Magistrate thinks fit" लिखा है, पर इन पंद्रह दिनों को पुलिस अभिरक्षा की सीमा के रूप में समझा जाता है: PIB पर प्रकाशित तुलना-सारणी इन्हें "15 day PC spread over 40 or 60 days" दर्ज करती है, और राजपत्र के हिंदी पाठ की उपधारा (3) में पंद्रह दिन के बाद का निरोध "पुलिस अभिरक्षा से अन्यथा" बताया गया है। अंग्रेज़ी राजपत्र पाठ की उपधारा (3) में ये शब्द नहीं हैं, इसलिए उत्तर में "आधिकारिक पाठ के अनुसार" लिखकर 15 दिन की संख्या दें और अर्थ पर न्यायालयों की व्याख्या देखें।

उपधारा (3): मजिस्ट्रेट पंद्रह दिन के बाद भी निरोध प्राधिकृत कर सकता है यदि पर्याप्त आधार हों, पर कुल अवधि (i) नब्बे दिन से अधिक नहीं, जहाँ अन्वेषण मृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय अपराध का हो; (ii) साठ दिन से अधिक नहीं, जहाँ अन्वेषण किसी अन्य अपराध का हो। नब्बे या साठ दिन की अवधि समाप्त होने पर, मामले के अनुसार, यदि अभियुक्त ज़मानत देने को तैयार हो और दे, तो उसे ज़मानत पर छोड़ दिया जाएगा, और इस उपधारा के अधीन ज़मानत पर छोड़ा गया हर व्यक्ति उस अध्याय (अध्याय XXXV) के प्रयोजनों के लिए उसी अध्याय के उपबंधों के अधीन छोड़ा गया माना जाएगा।

उपधारा (4): पुलिस की अभिरक्षा में निरोध तभी प्राधिकृत होगा जब अभियुक्त पहली बार और फिर जब तक वह पुलिस हिरासत में रहे, हर बार मजिस्ट्रेट के सामने सशरीर प्रस्तुत किया जाए; पर न्यायिक अभिरक्षा में आगे का निरोध सशरीर या श्रव्य-दृश्य इलेक्ट्रॉनिक साधन से प्रस्तुति पर बढ़ाया जा सकता है। उपधारा (5): कोई द्वितीय श्रेणी मजिस्ट्रेट, जिसे उच्च न्यायालय ने इसके लिए विशेष रूप से सशक्त न किया हो, पुलिस अभिरक्षा में निरोध प्राधिकृत नहीं करेगा। उपधारा (5) के साथ दो स्पष्टीकरण और दो परंतुक जुड़े हैं। स्पष्टीकरण I: संदेह दूर करने के लिए घोषित है कि उपधारा (3) की अवधि समाप्त होने पर भी अभियुक्त तब तक अभिरक्षा में रखा जाएगा जब तक वह ज़मानत न दे। स्पष्टीकरण II: यदि प्रश्न उठे कि अभियुक्त उपधारा (4) के अनुसार प्रस्तुत किया गया था या नहीं, तो प्रस्तुति निरोध प्राधिकृत करने वाले आदेश पर उसके हस्ताक्षर से, या श्रव्य-दृश्य साधन से प्रस्तुति पर मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणित आदेश से सिद्ध की जा सकती है। परंतुक: अठारह वर्ष से कम आयु की महिला का निरोध रिमांड-होम या मान्यता प्राप्त सामाजिक संस्था की अभिरक्षा में प्राधिकृत होगा; और किसी व्यक्ति को थाने में पुलिस अभिरक्षा, कारागार में न्यायिक अभिरक्षा, या केंद्र या राज्य सरकार द्वारा कारागार घोषित स्थान के अलावा किसी स्थान पर निरुद्ध नहीं रखा जाएगा।

उपधारा (6): जहाँ मजिस्ट्रेट उपलब्ध न हो, थाना प्रभारी या अन्वेषण अधिकारी (उप-निरीक्षक से नीचे का न हो) निकटतम कार्यपालक मजिस्ट्रेट को, जिसे मजिस्ट्रेट की शक्तियाँ सौंपी गई हों, डायरी की प्रविष्टि की प्रति भेज सकता है और अभियुक्त को भी भेज सकता है; तब वह कार्यपालक मजिस्ट्रेट लिखित कारणों से अभियुक्त का निरोध कुल सात दिन से अधिक नहीं प्राधिकृत कर सकता है। अवधि पूरी होने पर अभियुक्त ज़मानत पर छोड़ा जाएगा, जब तक आगे के निरोध का आदेश सक्षम मजिस्ट्रेट ने न दिया हो; और यदि ऐसा आदेश हुआ तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट के आदेशों के अंतर्गत बिताई गई अवधि उपधारा (3) की अवधि की गणना में गिनी जाएगी। परंतुक: अवधि समाप्त होने से पहले कार्यपालक मजिस्ट्रेट मामले के अभिलेख, और डायरी की प्रविष्टियों की प्रति, निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजेगा।

उपधारा (7): पुलिस अभिरक्षा में निरोध प्राधिकृत करने वाला मजिस्ट्रेट अपने कारण दर्ज करेगा। उपधारा (8): मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के अतिरिक्त कोई मजिस्ट्रेट ऐसा आदेश दे तो अपने कारणों सहित उसकी प्रति मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजेगा। उपधारा (9): समन-मामले (summons-case, धारा 2(1)(x)) में, यदि अभियुक्त की गिरफ़्तारी की तारीख़ से छह माह के भीतर अन्वेषण पूर्ण न हो, तो मजिस्ट्रेट आगे का अन्वेषण रोकने का आदेश देगा, जब तक अन्वेषण अधिकारी मजिस्ट्रेट को संतुष्ट न कर दे कि विशेष कारणों और न्याय के हित में छह माह के बाद भी अन्वेषण जारी रखना आवश्यक है। उपधारा (10): जहाँ उपधारा (9) के अधीन अन्वेषण रोकने का आदेश दिया गया हो, वहाँ सत्र न्यायाधीश, आवेदन पर या अन्यथा, यदि संतुष्ट हो कि आगे अन्वेषण होना चाहिए, तो उपधारा (9) का आदेश रद्द कर सकता है और ज़मानत आदि के बारे में अपने निर्देशों के साथ आगे अन्वेषण का निर्देश दे सकता है।

हिंदी और अंग्रेज़ी राजपत्र में अंतर

राजपत्र के हिंदी पाठ में उपधारा (3) "पुलिस अभिरक्षा से अन्यथा" निरोध को पंद्रह दिन से आगे बताती है; अंग्रेज़ी पाठ में ये शब्द नहीं हैं। उपधारा (6) में हिंदी पाठ "न्यायिक मजिस्ट्रेट न मिल सकता हो" कहता है, जबकि अंग्रेज़ी पाठ "a Magistrate is not available"। परीक्षा में दोनों में समान संख्याएँ (15, 40, 60, 90, 7 दिन, 6 माह) हैं; शब्दों के अंतर पर टिप्पणी की ज़रूरत हो तो "आधिकारिक पाठ देखें" लिखें।

धारा 187: संख्याएँ और सीमाएँ

उपधारासंख्याकिस बारे में
(1)24 घंटे (धारा 58)अन्वेषण 24 घंटे में पूरा न हो तो निकटतम मजिस्ट्रेट को डायरी की प्रति और अभियुक्त
(2)15 दिनअभिरक्षा की अधिकतम कुल अवधि, कुल या अंशों में; पुलिस अभिरक्षा की सीमा के रूप में समझी जाती है (PIB सारणी; हिंदी पाठ की उपधारा (3)), जबकि अंग्रेज़ी पाठ में "such custody as such Magistrate thinks fit"
(2)प्रारंभिक 40 या 60 दिन15 दिन की पुलिस अभिरक्षा इसी अवधि के भीतर: 60-दिन वाले मामले में प्रारंभिक 40 दिन, 90-दिन वाले में प्रारंभिक 60 दिन
(3)(i)90 दिनमृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय अपराध
(3)(ii)60 दिनकोई अन्य अपराध
(3) अंत मेंअवधि पूरी होने पर ज़मानतअभियुक्त ज़मानत देने को तैयार हो और दे तो छोड़ा जाएगा
(6)7 दिनकार्यपालक मजिस्ट्रेट, जब मजिस्ट्रेट उपलब्ध न हो; आगे के निरोध का आदेश होने पर गणना में गिनी जाती है
(9)6 माहसमन-मामले में गिरफ़्तारी से; पूरा न हो तो अन्वेषण रोकने का आदेश

आधिकारिक हिंदी पाठ के शब्द (उत्तर में प्रयोग के लिए)

अंग्रेज़ी पाठआधिकारिक हिंदी पाठसरल बोलचाल
officer in charge of a police stationपुलिस थाने का भारसाधक अधिकारीथाना प्रभारी
electronic communication (धारा 173)इलैक्ट्रानिक संसूचनाइलेक्ट्रॉनिक संचार
not below the rank of Deputy Superintendent of Police (173(3))उप-पुलिस अधीक्षक की पंक्ति से अन्यूनDSP से कम नहीं रैंक
preliminary enquiry (173(3))आरंभिक जांचप्रारंभिक जाँच
fortnightly daily diary report (174(1)(ii))पाक्षिक दैनिक डायरी रिपोर्टपखवाड़े में दैनिक डायरी रिपोर्ट
not below the rank of sub-inspector (187(1))उप निरीक्षक से निम्नतर पंक्ति का नहींउप-निरीक्षक या ऊपर
detained in custody; detention (धारा 187)अभिरक्षा में निरुद्ध; निरोधहिरासत
police custody; judicial custodyपुलिस अभिरक्षा; न्यायिक अभिरक्षापुलिस हिरासत; न्यायिक हिरासत
remand home (187(5))प्रतिप्रेषण गृहरिमांड होम
summons-case (187(9))समन मामलासमन-मामला

भारत के राजपत्र (असाधारण) के हिंदी पाठ में प्रयुक्त शब्द।

गिरफ़्तारी से ज़मानत तक: धारा 187 का समय-क्रम

  1. गिरफ़्तारी

    थाना प्रभारी या अन्वेषण अधिकारी (उप-निरीक्षक या ऊपर) अभियुक्त और डायरी की प्रति निकटतम मजिस्ट्रेट को भेजता है, 24 घंटे के भीतर (धारा 58, 187(1))

  2. पुलिस अभिरक्षा

    कुल अधिकतम 15 दिन, कुल या अंशों में, प्रारंभिक 40 या 60 दिन के भीतर (187(2)); हर बार सशरीर प्रस्तुति (187(4))

  3. न्यायिक अभिरक्षा

    पर्याप्त आधार होने पर कुल निरोध 60 या 90 दिन तक; आगे का निरोध सशरीर या श्रव्य-दृश्य साधन से प्रस्तुति पर (187(3), (4))

  4. 60 या 90 दिन पूरे

    अभियुक्त ज़मानत देने को तैयार हो और दे तो उसे छोड़ा जाएगा; न दे तो अभिरक्षा में (स्पष्टीकरण I)

मृत्यु, आजीवन या दस वर्ष या अधिक के अपराध: 90 दिन; अन्य: 60 दिन।

मुख्य तथ्य

धारा 173(1)
सूचना क्षेत्र-निरपेक्ष; मौखिक या इलेक्ट्रॉनिक संचार; इलेक्ट्रॉनिक सूचना पर तीन दिन में हस्ताक्षर
धारा 173(2)
प्रति तत्काल और निःशुल्क, सूचना देने वाले या पीड़ित को
धारा 173(3)
तीन वर्ष या अधिक पर सात वर्ष से कम दंड वाले संज्ञेय अपराध: DSP से कम नहीं रैंक की अनुमति से 14 दिन में प्रारंभिक जाँच
धारा 173(4)
थाने के इनकार पर लिखित सार डाक से पुलिस अधीक्षक को; फिर मजिस्ट्रेट को आवेदन
धारा 174
असंज्ञेय: पुस्तक में सार; सूचना देने वाले को मजिस्ट्रेट के पास भेजना; पखवाड़े में दैनिक डायरी रिपोर्ट; बिना मजिस्ट्रेट के आदेश अन्वेषण नहीं; बिना वारंट गिरफ़्तारी की शक्ति नहीं
धारा 187(2)
15 दिन की पुलिस अभिरक्षा, कुल या अंशों में, प्रारंभिक 40 या 60 दिन में (60 या 90 दिन की निरोध-अवधि के अनुसार)
धारा 187(3)
90 दिन (मृत्यु, आजीवन या दस वर्ष या अधिक); 60 दिन (अन्य); अवधि पूरी होने पर ज़मानत देने पर रिहाई
धारा 187(6)
कार्यपालक मजिस्ट्रेट: कुल 7 दिन; आगे के निरोध का आदेश होने पर इसे उपधारा (3) की अवधि में गिना जाता है
धारा 187(9)
समन-मामला: गिरफ़्तारी से छह माह में अन्वेषण पूरा न हो तो रोकने का आदेश
CrPC में बदलाव (अध्ययन-सहायता)
धारा 187 में 15 दिन की पुलिस अभिरक्षा को 40 या 60 दिन में फैलाने का नया उपबंध; धारा 173 में शून्य प्राथमिकी, इलेक्ट्रॉनिक सूचना, प्रति और प्रारंभिक जाँच जोड़े गए; धारा 174(1)(ii) में पखवाड़े की रिपोर्ट नई
पुराने क्रमांक (अध्ययन-सहायता)
धारा 173, 174, 187 क्रमशः CrPC की 154, 155, 167
अंतिम जाँच
3 अक्टूबर 2026

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • धारा 173 की "तीन दिन" (इलेक्ट्रॉनिक सूचना पर हस्ताक्षर) और "चौदह दिन" (प्रारंभिक जाँच) को आपस में बदल देना।
  • प्रारंभिक जाँच (धारा 173(3)) को सभी संज्ञेय अपराधों पर लागू बताना। यह केवल तीन वर्ष या अधिक पर सात वर्ष से कम दंड वाले संज्ञेय अपराधों के लिए है, और DSP से कम नहीं रैंक के अधिकारी की अनुमति से।
  • असंज्ञेय मामले (धारा 174) में पुलिस को बिना आदेश अन्वेषण या बिना वारंट गिरफ़्तारी की शक्ति बता देना। अन्वेषण मजिस्ट्रेट के आदेश से; गिरफ़्तारी की शक्ति आदेश मिलने पर भी नहीं।
  • धारा 187 की 15 दिन की सीमा को 60 या 90 दिन के साथ मिला देना। 15 दिन केवल पुलिस अभिरक्षा के हैं और 40 या 60 दिन की खिड़की में आते हैं; 60 या 90 दिन कुल निरोध की सीमा हैं।
  • दस वर्ष की सीमा चूकना: "दस वर्ष या उससे अधिक" पर 90 दिन; नौ वर्ष पर 60 दिन।
  • कार्यपालक मजिस्ट्रेट के सात दिन को अतिरिक्त अवधि मान लेना। आगे के निरोध का आदेश होने पर वह 60 या 90 दिन की गणना में गिना जाता है।
  • यह कहना कि 60 या 90 दिन पूरे होते ही अभियुक्त अपने आप छूट जाता है। पाठ के अनुसार वह तभी छोड़ा जाएगा जब वह ज़मानत देने को तैयार हो और दे (स्पष्टीकरण I)।