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RTI अधिनियम 2005: धारा 12 से 17, केंद्रीय और राज्य सूचना आयोग, कार्यकाल, वेतन और पदमुक्ति

3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (विधि): "Right to Information Act, 2005: Sections 1-20." इस पृष्ठ पर धारा 12 से 14 (केंद्रीय सूचना आयोग का गठन, कार्यकाल और पदमुक्ति) और धारा 15 से 17 (राज्य सूचना आयोग की वही व्यवस्थाएँ) हैं। यह पृष्ठ परीक्षा की तैयारी के लिए है, क़ानूनी सलाह नहीं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • उपलब्ध छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में इन धाराओं से कोई सीधा प्रश्न नहीं आया। फिर भी 2 अंक के प्रश्न "आयोग की संरचना" या "आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया" पर बन सकते हैं, और ये धाराएँ लोक-प्रशासन के संस्थागत प्रश्नों में भी काम आती हैं।
  • यह पृष्ठ अधिनियम का सबसे अधिक बदला हुआ हिस्सा है: 2019 के संशोधन ने कार्यकाल और वेतन को नियमों के हवाले कर दिया। परीक्षा में मूल पाठ (पाँच वर्ष, चुनाव आयुक्त के बराबर वेतन) और संशोधित पाठ का अंतर लिखना उत्तर को अलग बनाता है।
  • संख्याएँ सँभालकर याद रखें: आयुक्त दस से अधिक नहीं, आयु 65 वर्ष, नियुक्ति-समिति में तीन सदस्य, कुल पाँच वर्ष की सीमा जब आयुक्त मुख्य आयुक्त बने।

पहले सरल भाषा में

सोचिए एक न्यायाधीश नहीं, पर न्यायाधीश जैसा काम करने वाला निकाय चाहिए, जिसके सामने नागरिक यह कहने जा सके कि "अधिकारी ने मेरी सूचना रोकी"। वह निकाय तब ही भरोसेमंद होगा जब उसके सदस्य सरकार के दबाव से स्वतंत्र हों: उनका चयन निष्पक्ष समिति करे, उन्हें मनमर्ज़ी से हटाया न जा सके, और वे किसी राजनीतिक दल या कारोबार से न जुड़े हों। धाराएँ 12 से 17 इन्हीं तीन बातों का ढाँचा हैं: गठन, कार्यकाल और पदमुक्ति।

केंद्र के लिए यही ढाँचा धाराओं 12 से 14 में है और राज्य के लिए धाराओं 15 से 17 में। दोनों लगभग एक जैसे हैं, इसलिए एक बार केंद्र की व्यवस्था समझ लें तो राज्य की व्यवस्था में केवल यह बदलना है कि राष्ट्रपति की जगह राज्यपाल, प्रधानमंत्री की जगह मुख्यमंत्री और लोक सभा की जगह विधान सभा आती है। फ़र्क़ केवल 2019 के बाद वेतन और कार्यकाल में रहता है, जहाँ दोनों के लिए नियम केंद्र सरकार बनाती है।

धारा 12: केंद्रीय सूचना आयोग का गठन (Constitution of Central Information Commission)

उप-धारा (1): केंद्र सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा एक निकाय गठित करेगी जो केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission) कहलाएगा, ताकि वह इस अधिनियम से मिली शक्तियों का प्रयोग और सौंपे कार्य कर सके। उप-धारा (2): आयोग में (a) मुख्य सूचना आयुक्त (Chief Information Commissioner) और (b) ऐसी संख्या में केंद्रीय सूचना आयुक्त होंगे, जो दस से अधिक न हों, जितनी आवश्यक समझी जाए।

उप-धारा (3): मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करेंगे, एक समिति की सिफ़ारिश पर। समिति में तीन सदस्य हैं: (i) प्रधानमंत्री, जो अध्यक्ष होंगे; (ii) लोक सभा में विपक्ष का नेता; और (iii) प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री। स्पष्टीकरण (Explanation): यदि लोक सभा में विपक्ष के नेता को मान्यता नहीं मिली हो, तो सरकार के विपक्ष में सबसे बड़े समूह का नेता विपक्ष का नेता माना जाएगा।

उप-धारा (4): आयोग के कार्यों का सामान्य अधीक्षण, निर्देशन और प्रबंध मुख्य सूचना आयुक्त में निहित है, जिनकी सहायता सूचना आयुक्त करेंगे। आयोग ये सभी शक्तियाँ और कार्य "स्वायत्त रूप से" (autonomously), इस अधिनियम के अधीन किसी अन्य प्राधिकारी के निर्देश के बिना, कर सकता है। उप-धारा (5): नियुक्त व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित हों और विधि, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, जनसंचार माध्यम या प्रशासन और शासन में व्यापक ज्ञान और अनुभव रखते हों।

उप-धारा (6): मुख्य आयुक्त या आयुक्त संसद सदस्य या किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के विधान-मंडल का सदस्य नहीं होगा, न कोई अन्य लाभ का पद धारण करेगा, न किसी राजनीतिक दल से संबद्ध होगा, न कोई कारोबार या पेशा करेगा। उप-धारा (7): आयोग का मुख्यालय दिल्ली में है; केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति से भारत में अन्य स्थानों पर कार्यालय खोले जा सकते हैं।

धारा 13: कार्यकाल और सेवा की शर्तें, संशोधित स्वरूप (Term of office and conditions of service)

यह धारा सूचना का अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2019 (2019 का 24) से बदली है। अधिनियम को राष्ट्रपति की स्वीकृति 1 अगस्त 2019 को मिली; संशोधित पाठ में दर्ज है कि ये बदलाव 24 अक्टूबर 2019 से प्रभावी हैं। धारा 13 का वर्तमान पाठ क्रम से यह है।

उप-धारा (1): मुख्य सूचना आयुक्त "ऐसी अवधि के लिए पद धारण करेगा जो केंद्र सरकार द्वारा विहित की जाए" (for such term as may be prescribed by the Central Government) और पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा। परंतुक: कोई मुख्य आयुक्त 65 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद पद पर नहीं रहेगा। मूल पाठ में "पाँच वर्ष की अवधि के लिए" लिखा था। उप-धारा (2): प्रत्येक सूचना आयुक्त भी उसी विहित अवधि के लिए, या 65 वर्ष की आयु होने तक, जो भी पहले हो, पद धारण करेगा और आयुक्त के रूप में पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा। पहला परंतुक: सूचना आयुक्त पद छोड़ने पर, धारा 12(3) की रीति से, मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में नियुक्ति का पात्र होगा। दूसरा परंतुक: यदि आयुक्त मुख्य आयुक्त बने तो उसकी कुल अवधि, आयुक्त और मुख्य आयुक्त के रूप में मिलाकर, पाँच वर्ष से अधिक नहीं होगी।

उप-धारा (3): पद ग्रहण से पहले शपथ या प्रतिज्ञान, पहली अनुसूची के प्रारूप में, राष्ट्रपति या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के सामने। उप-धारा (4): राष्ट्रपति को लिखित त्यागपत्र कभी भी; परंतुक: धारा 14 की रीति से पदमुक्ति भी हो सकती है। उप-धारा (5) (2019 से प्रतिस्थापित): वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तें "ऐसी होंगी जो केंद्र सरकार द्वारा विहित की जाएँ"। पहला परंतुक: नियुक्ति के बाद वेतन, भत्ते और सेवा की शर्तों में उनके प्रतिकूल बदलाव नहीं होगा। दूसरा परंतुक: 2019 के अधिनियम के प्रारंभ से पहले नियुक्त आयुक्त पहले की व्यवस्था से शासित होते रहेंगे। उप-धारा (6): केंद्र सरकार आयोग को आवश्यक अधिकारी और कर्मचारी देगी और उनका वेतन और सेवा-शर्तें विहित होंगी।

2019 से पहले और बाद: कार्यकाल और वेतन

बिंदुमूल पाठ (2005 से 2019 तक)वर्तमान स्थिति (2019 के बाद)
कार्यकाल (धारा 13(1), 13(2), 16(1), 16(2))पद ग्रहण से पाँच वर्ष, या 65 वर्ष की आयु तक (आयुक्त के लिए, जो पहले हो); मुख्य आयुक्त पर 65 वर्ष का परंतुक"for such term as may be prescribed by the Central Government"; 65 वर्ष की सीमा बनी हुई; नियम 2019 में कार्यकाल तीन वर्ष
केंद्र: मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन [13(5)]मुख्य निर्वाचन आयुक्त के समानकेंद्र सरकार द्वारा विहित; नियम 2019 में 2,50,000 रुपये प्रति माह
केंद्र: सूचना आयुक्त का वेतन [13(5)]निर्वाचन आयुक्त के समानकेंद्र सरकार द्वारा विहित; नियम 2019 में 2,25,000 रुपये प्रति माह
राज्य: मुख्य और आयुक्त का वेतन [16(5)]राज्य मुख्य आयुक्त: निर्वाचन आयुक्त के समान; राज्य आयुक्त: राज्य के मुख्य सचिव के समानकेंद्र सरकार द्वारा विहित; नियम 2019 में राज्य मुख्य आयुक्त और राज्य आयुक्त, दोनों के लिए 2,25,000 रुपये प्रति माह
पेंशन-कटौती वाले परंतुकपहले की पेंशन या सेवानिवृत्ति-लाभ की राशि वेतन से घटाने के परंतुक थेअधिनियम के 2019 के प्रतिस्थापन में नहीं; नियम 2019 में पेंशन-कटौती का प्रावधान है
सुरक्षाकोई ऐसा परंतुक नहींप्रतिस्थापित परंतुक: नियुक्ति के बाद शर्तों में प्रतिकूल बदलाव नहीं; 2019 से पहले नियुक्त आयुक्त पुरानी व्यवस्था से शासित
किसके हाथ मेंसंसद के अधिनियम मेंकेंद्र सरकार के नियमों में (धारा 27(2) के नए खंड (ca) और (cb) से नियम बनाने की शक्ति)

2019 का संशोधन: दो पक्ष

सरकार का तर्क (PIB की विज्ञप्ति से): सूचना आयोग संवैधानिक नहीं, वैधानिक (statutory) निकाय हैं, जबकि चुनाव आयोग अनुच्छेद 324 से बना संवैधानिक निकाय है। दोनों के कार्य अलग हैं, इसलिए उनकी हैसियत और सेवा-शर्तों को युक्तिसंगत बनाने की ज़रूरत है।

आलोचकों का तर्क (The Tribune में उद्धृत कार्यकर्ताओं के अनुसार): नियमों से कार्यकाल घटाना और वेतन तय करना आयोगों की स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर आघात है, क्योंकि चुनाव आयुक्तों और मुख्य सचिवों से बराबरी की सुरक्षा हट गई और अब वेतन तभी बदलेगा जब केंद्र सरकार नियम बदले।

परीक्षा-उत्तर में दोनों पक्ष एक-एक पंक्ति में लिखना संतुलित माना जाएगा। आलोचना और समर्थन के निष्कर्ष की जगह तथ्य लिखें: क्या बदला (कार्यकाल, वेतन), किसके नियमों से (केंद्र सरकार), और किस तारीख़ से (24 अक्टूबर 2019 से)।

RTI नियम 2019 (G.S.R. 810(E)): कार्यकाल और वेतन

बिंदुस्थिति
अधिसूचनाG.S.R. 810(E), 24 अक्टूबर 2019; राजपत्र में प्रकाशन की तिथि से प्रवृत्त (नियम 1)
कार्यकालकेंद्र और राज्य दोनों में तीन वर्ष, पद ग्रहण की तिथि से (नियम 3 और 12)
केंद्र: मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन2,50,000 रुपये प्रति माह, नियत (नियम 5(1))
केंद्र: सूचना आयुक्त का वेतन2,25,000 रुपये प्रति माह, नियत (नियम 5(2))
राज्य: मुख्य और आयुक्त का वेतनदोनों के लिए 2,25,000 रुपये प्रति माह, नियत (नियम 14(1) और (2))
पेंशन की कटौतीपहले से मिल रही पेंशन या सेवानिवृत्ति-लाभ की रकम वेतन से घटाई जाएगी (नियम 5(3), 5(4), 14(3), 14(4))

धारा 14: पदमुक्ति (Removal of Chief Information Commissioner or Information Commissioner)

पदमुक्ति की धारा अधिनियम की रीढ़ है, क्योंकि स्वतंत्रता का असली अर्थ यह है कि पद से हटाना कठिन हो। धारा 14 में दो रास्ते हैं। पहला रास्ता न्यायिक जाँच वाला है, दूसरा बिना जाँच के पाँच सीमित आधारों वाला।

पहला रास्ता, उप-धारा (1): उप-धारा (3) के अधीन रहते हुए, मुख्य आयुक्त या आयुक्त को केवल राष्ट्रपति के आदेश से और "सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता" (proved misbehaviour or incapacity) के आधार पर हटाया जा सकता है, वह भी तब जब राष्ट्रपति के संदर्भ पर सर्वोच्च न्यायालय ने जाँच करके प्रतिवेदन दिया हो कि संबंधित व्यक्ति को इस आधार पर हटाया जाना चाहिए। उप-धारा (2): राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय को संदर्भ भेजने के बाद, उसके प्रतिवेदन पर आदेश देने तक, संबंधित आयुक्त को पद से निलंबित कर सकते हैं और आवश्यक लगे तो कार्यालय आने से भी रोक सकते हैं।

दूसरा रास्ता, उप-धारा (3): उप-धारा (1) के होते हुए भी, राष्ट्रपति आदेश से पदमुक्त कर सकते हैं यदि आयुक्त (a) दिवालिया घोषित हो; (b) ऐसे अपराध में दोषसिद्ध हो जो राष्ट्रपति की राय में नैतिक अधमता (moral turpitude) से जुड़ा हो; (c) कार्यकाल में अपने पद के कर्तव्यों से बाहर किसी वेतनभोगी नियोजन में लगे; (d) राष्ट्रपति की राय में मानसिक या शारीरिक अक्षमता के कारण पद पर बने रहने के अयोग्य हो; या (e) ऐसा वित्तीय या अन्य हित अर्जित करे जो उसके कार्यों पर प्रतिकूल असर डाले।

उप-धारा (4): यदि आयुक्त भारत सरकार की ओर से या उसके द्वारा किए गए किसी संविदा या करार में किसी भी रूप से संबद्ध या हितबद्ध हो, या उसके लाभ में हिस्सा ले, सिवाय किसी निगमित कंपनी के अन्य सदस्यों के साथ सामान्य सदस्य के रूप में, तो उप-धारा (1) के प्रयोजन से उसे दुर्व्यवहार का दोषी माना जाएगा।

पदमुक्ति के दो रास्ते [धारा 14]

बिंदुरास्ता 1: उप-धारा (1)रास्ता 2: उप-धारा (3)
आधारसिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमतादिवालिया; नैतिक अधमता वाले अपराध में दोषसिद्धि; बाहर वेतनभोगी नियोजन; मानसिक या शारीरिक अक्षमता; वित्तीय या अन्य हित जो कार्य पर असर डाले
जाँचसर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रपति के संदर्भ पर जाँच कर प्रतिवेदन देता हैअधिनियम में सर्वोच्च न्यायालय की जाँच का उल्लेख नहीं
आदेश कौन देता हैराष्ट्रपतिराष्ट्रपति
निलंबनउप-धारा (2): संदर्भ के बाद और आदेश तक निलंबन संभवउप-धारा (2) संदर्भ के मामले के लिए है; उप-धारा (3) में निलंबन का उल्लेख नहीं
विशेषराज्य में यही प्रक्रिया धारा 17(1) और (2) में, राज्यपाल के संदर्भ सेउप-धारा (4): सरकारी संविदा में हित को दुर्व्यवहार माना जाता है

धारा 15 से 17: राज्य सूचना आयोग

राज्य की व्यवस्था केंद्र की प्रतिलिपि जैसी है। धारा 15(1): राज्य सरकार राजपत्र की अधिसूचना से "(राज्य का नाम) सूचना आयोग" गठित करेगी। धारा 15(2): राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और ऐसी संख्या में राज्य सूचना आयुक्त, जो दस से अधिक न हों। धारा 15(3): नियुक्ति राज्यपाल करेंगे, समिति की सिफ़ारिश पर, जिसमें (i) मुख्यमंत्री अध्यक्ष, (ii) विधान सभा में विपक्ष का नेता और (iii) मुख्यमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री हैं। विपक्ष के नेता की मान्यता न होने पर विधान सभा में सरकार के विपक्ष में सबसे बड़े समूह का नेता गिना जाएगा।

धारा 15(4) से (6): आयोग के कार्यों का सामान्य अधीक्षण राज्य मुख्य सूचना आयुक्त में निहित और आयोग स्वायत्त; योग्यता वही (प्रतिष्ठित, विभिन्न क्षेत्रों का ज्ञान और अनुभव); अयोग्यता वही (संसद या विधान-मंडल का सदस्य, लाभ का पद, राजनीतिक दल से संबंध, कारोबार या पेशा)। धारा 15(7): मुख्यालय राज्य के भीतर ऐसे स्थान पर, जिसे राज्य सरकार राजपत्र की अधिसूचना से तय करे, और राज्य सरकार की पूर्व अनुमति से अन्य स्थानों पर कार्यालय।

धारा 16 धारा 13 के समान है, 2019 के संशोधित रूप में। कार्यकाल "ऐसी अवधि जो केंद्र सरकार द्वारा विहित की जाए" और 65 वर्ष की आयु तक (आयुक्त के लिए जो पहले हो); शपथ राज्यपाल के सामने; त्यागपत्र राज्यपाल को; वेतन, भत्ते और सेवा की शर्तें केंद्र सरकार द्वारा विहित। यहाँ ध्यान दें कि राज्य आयोगों के लिए भी नियम केंद्र सरकार बनाती है। धारा 17 धारा 14 के समान है: राज्यपाल के आदेश से हटाना, राज्यपाल के संदर्भ पर सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद, और वही पाँच आधार उप-धारा (3) में, तथा सरकारी संविदा में हित को दुर्व्यवहार मानना उप-धारा (4) में, इस अंतर के साथ कि "भारत सरकार" की जगह "राज्य सरकार" है।

केंद्रीय और राज्य सूचना आयोग की तुलना

केंद्रीय सूचना आयोग (धारा 12 से 14)

गठनकेंद्र सरकार, राजपत्र की अधिसूचना

संरचनामुख्य सूचना आयुक्त और दस से अधिक नहीं आयुक्त

नियुक्ति करता हैराष्ट्रपति

समितिप्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोक सभा में विपक्ष का नेता, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री

मुख्यालयदिल्ली (12(7))

कार्यकाल और वेतनकेंद्र सरकार द्वारा विहित (13)

शपथ और त्यागपत्रराष्ट्रपति के समक्ष और राष्ट्रपति को

पदमुक्तिराष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद (14)

राज्य सूचना आयोग (धारा 15 से 17)

गठनराज्य सरकार, राजपत्र की अधिसूचना

संरचनाराज्य मुख्य सूचना आयुक्त और दस से अधिक नहीं राज्य सूचना आयुक्त

नियुक्ति करता हैराज्यपाल

समितिमुख्यमंत्री (अध्यक्ष), विधान सभा में विपक्ष का नेता, मुख्यमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री

मुख्यालयराज्य सरकार द्वारा अधिसूचित स्थान (15(7))

कार्यकाल और वेतनकेंद्र सरकार द्वारा विहित (16)

शपथ और त्यागपत्रराज्यपाल के समक्ष और राज्यपाल को

पदमुक्तिराज्यपाल, सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद (17)

नियुक्ति और पदमुक्ति का रास्ता

  1. नियुक्ति-समिति

    प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री (अध्यक्ष), विपक्ष का नेता, नामित कैबिनेट मंत्री [12(3), 15(3)]

  2. नियुक्ति

    राष्ट्रपति (केंद्र) या राज्यपाल (राज्य)

  3. शपथ

    पहली अनुसूची के प्रारूप में [13(3), 16(3)]

  4. कार्यकाल

    केंद्र सरकार द्वारा विहित (नियम 2019: तीन वर्ष) या 65 वर्ष की आयु तक, जो पहले हो; आयुक्त के लिए

  5. पदमुक्ति (रास्ता 1)

    राष्ट्रपति या राज्यपाल का संदर्भ, सर्वोच्च न्यायालय की जाँच, फिर आदेश [14(1), 17(1)]

  6. पदमुक्ति (रास्ता 2)

    पाँच आधारों पर सीधे आदेश [14(3), 17(3)]

केंद्र और राज्य दोनों में ढाँचा एक जैसा है।

मुख्य तथ्य

आयोग की संरचना
मुख्य सूचना आयुक्त और दस से अधिक नहीं आयुक्त (केंद्र और राज्य दोनों)
नियुक्ति-समिति (केंद्र)
प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोक सभा में विपक्ष का नेता, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री
2019 का संशोधन
RTI (संशोधन) अधिनियम 2019 (2019 का 24); स्वीकृति 1 अगस्त 2019; धारा 13 और 16 में बदलाव 24-10-2019 से प्रभावी (2019)
RTI नियम 2019
G.S.R. 810(E), 24 अक्टूबर 2019; कार्यकाल तीन वर्ष; केंद्र में मुख्य आयुक्त 2,50,000 और आयुक्त 2,25,000 रुपये प्रति माह; राज्य में दोनों 2,25,000 रुपये (2019)
आयु और कुल अवधि
65 वर्ष की आयु; आयुक्त से मुख्य आयुक्त बनने पर कुल अवधि पाँच वर्ष से अधिक नहीं
पदमुक्ति
सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता: सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद; पाँच आधार बिना जाँच [14(3), 17(3)]
अंतिम जाँच
2 अक्टूबर 2026 (CIC का 18 नवंबर 2025 तक का संशोधित पाठ)

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • आज भी "पाँच वर्ष का कार्यकाल" और "चुनाव आयुक्त के बराबर वेतन" को वर्तमान स्थिति बताना। 2019 के संशोधन के बाद दोनों केंद्र सरकार के नियमों से तय होते हैं।
  • आयुक्तों की अधिकतम संख्या ग़लत लिखना। धारा 12(2)(b) और 15(2)(b) में आयुक्तों की संख्या दस से अधिक नहीं है (मुख्य आयुक्त अलग)।
  • नियुक्ति-समिति में "मुख्य न्यायाधीश" लिख देना। समिति में प्रधानमंत्री, लोक सभा में विपक्ष का नेता और एक कैबिनेट मंत्री हैं।
  • पदमुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय की जाँच को हर स्थिति पर लगा देना। धारा 14(3) के पाँच आधारों में सीधा राष्ट्रपति का आदेश है।
  • राज्य सूचना आयोग का मुख्यालय दिल्ली-जैसा तय बताना। यह राज्य सरकार की अधिसूचना से तय होता है, 15(7)।
  • धारा 13 और 16 में आयु-सीमा पूरी तरह हटी मान लेना। 65 वर्ष की सीमा संशोधन के बाद भी पाठ में है।