RTI अधिनियम 2005: धारा 12 से 17, केंद्रीय और राज्य सूचना आयोग, कार्यकाल, वेतन और पदमुक्ति
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (विधि): "Right to Information Act, 2005: Sections 1-20." इस पृष्ठ पर धारा 12 से 14 (केंद्रीय सूचना आयोग का गठन, कार्यकाल और पदमुक्ति) और धारा 15 से 17 (राज्य सूचना आयोग की वही व्यवस्थाएँ) हैं। यह पृष्ठ परीक्षा की तैयारी के लिए है, क़ानूनी सलाह नहीं।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- उपलब्ध छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में इन धाराओं से कोई सीधा प्रश्न नहीं आया। फिर भी 2 अंक के प्रश्न "आयोग की संरचना" या "आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया" पर बन सकते हैं, और ये धाराएँ लोक-प्रशासन के संस्थागत प्रश्नों में भी काम आती हैं।
- यह पृष्ठ अधिनियम का सबसे अधिक बदला हुआ हिस्सा है: 2019 के संशोधन ने कार्यकाल और वेतन को नियमों के हवाले कर दिया। परीक्षा में मूल पाठ (पाँच वर्ष, चुनाव आयुक्त के बराबर वेतन) और संशोधित पाठ का अंतर लिखना उत्तर को अलग बनाता है।
- संख्याएँ सँभालकर याद रखें: आयुक्त दस से अधिक नहीं, आयु 65 वर्ष, नियुक्ति-समिति में तीन सदस्य, कुल पाँच वर्ष की सीमा जब आयुक्त मुख्य आयुक्त बने।
पहले सरल भाषा में
सोचिए एक न्यायाधीश नहीं, पर न्यायाधीश जैसा काम करने वाला निकाय चाहिए, जिसके सामने नागरिक यह कहने जा सके कि "अधिकारी ने मेरी सूचना रोकी"। वह निकाय तब ही भरोसेमंद होगा जब उसके सदस्य सरकार के दबाव से स्वतंत्र हों: उनका चयन निष्पक्ष समिति करे, उन्हें मनमर्ज़ी से हटाया न जा सके, और वे किसी राजनीतिक दल या कारोबार से न जुड़े हों। धाराएँ 12 से 17 इन्हीं तीन बातों का ढाँचा हैं: गठन, कार्यकाल और पदमुक्ति।
केंद्र के लिए यही ढाँचा धाराओं 12 से 14 में है और राज्य के लिए धाराओं 15 से 17 में। दोनों लगभग एक जैसे हैं, इसलिए एक बार केंद्र की व्यवस्था समझ लें तो राज्य की व्यवस्था में केवल यह बदलना है कि राष्ट्रपति की जगह राज्यपाल, प्रधानमंत्री की जगह मुख्यमंत्री और लोक सभा की जगह विधान सभा आती है। फ़र्क़ केवल 2019 के बाद वेतन और कार्यकाल में रहता है, जहाँ दोनों के लिए नियम केंद्र सरकार बनाती है।
धारा 12: केंद्रीय सूचना आयोग का गठन (Constitution of Central Information Commission)
उप-धारा (1): केंद्र सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा एक निकाय गठित करेगी जो केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission) कहलाएगा, ताकि वह इस अधिनियम से मिली शक्तियों का प्रयोग और सौंपे कार्य कर सके। उप-धारा (2): आयोग में (a) मुख्य सूचना आयुक्त (Chief Information Commissioner) और (b) ऐसी संख्या में केंद्रीय सूचना आयुक्त होंगे, जो दस से अधिक न हों, जितनी आवश्यक समझी जाए।
उप-धारा (3): मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करेंगे, एक समिति की सिफ़ारिश पर। समिति में तीन सदस्य हैं: (i) प्रधानमंत्री, जो अध्यक्ष होंगे; (ii) लोक सभा में विपक्ष का नेता; और (iii) प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री। स्पष्टीकरण (Explanation): यदि लोक सभा में विपक्ष के नेता को मान्यता नहीं मिली हो, तो सरकार के विपक्ष में सबसे बड़े समूह का नेता विपक्ष का नेता माना जाएगा।
उप-धारा (4): आयोग के कार्यों का सामान्य अधीक्षण, निर्देशन और प्रबंध मुख्य सूचना आयुक्त में निहित है, जिनकी सहायता सूचना आयुक्त करेंगे। आयोग ये सभी शक्तियाँ और कार्य "स्वायत्त रूप से" (autonomously), इस अधिनियम के अधीन किसी अन्य प्राधिकारी के निर्देश के बिना, कर सकता है। उप-धारा (5): नियुक्त व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित हों और विधि, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, जनसंचार माध्यम या प्रशासन और शासन में व्यापक ज्ञान और अनुभव रखते हों।
उप-धारा (6): मुख्य आयुक्त या आयुक्त संसद सदस्य या किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के विधान-मंडल का सदस्य नहीं होगा, न कोई अन्य लाभ का पद धारण करेगा, न किसी राजनीतिक दल से संबद्ध होगा, न कोई कारोबार या पेशा करेगा। उप-धारा (7): आयोग का मुख्यालय दिल्ली में है; केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति से भारत में अन्य स्थानों पर कार्यालय खोले जा सकते हैं।
धारा 13: कार्यकाल और सेवा की शर्तें, संशोधित स्वरूप (Term of office and conditions of service)
यह धारा सूचना का अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2019 (2019 का 24) से बदली है। अधिनियम को राष्ट्रपति की स्वीकृति 1 अगस्त 2019 को मिली; संशोधित पाठ में दर्ज है कि ये बदलाव 24 अक्टूबर 2019 से प्रभावी हैं। धारा 13 का वर्तमान पाठ क्रम से यह है।
उप-धारा (1): मुख्य सूचना आयुक्त "ऐसी अवधि के लिए पद धारण करेगा जो केंद्र सरकार द्वारा विहित की जाए" (for such term as may be prescribed by the Central Government) और पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा। परंतुक: कोई मुख्य आयुक्त 65 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद पद पर नहीं रहेगा। मूल पाठ में "पाँच वर्ष की अवधि के लिए" लिखा था। उप-धारा (2): प्रत्येक सूचना आयुक्त भी उसी विहित अवधि के लिए, या 65 वर्ष की आयु होने तक, जो भी पहले हो, पद धारण करेगा और आयुक्त के रूप में पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा। पहला परंतुक: सूचना आयुक्त पद छोड़ने पर, धारा 12(3) की रीति से, मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में नियुक्ति का पात्र होगा। दूसरा परंतुक: यदि आयुक्त मुख्य आयुक्त बने तो उसकी कुल अवधि, आयुक्त और मुख्य आयुक्त के रूप में मिलाकर, पाँच वर्ष से अधिक नहीं होगी।
उप-धारा (3): पद ग्रहण से पहले शपथ या प्रतिज्ञान, पहली अनुसूची के प्रारूप में, राष्ट्रपति या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के सामने। उप-धारा (4): राष्ट्रपति को लिखित त्यागपत्र कभी भी; परंतुक: धारा 14 की रीति से पदमुक्ति भी हो सकती है। उप-धारा (5) (2019 से प्रतिस्थापित): वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तें "ऐसी होंगी जो केंद्र सरकार द्वारा विहित की जाएँ"। पहला परंतुक: नियुक्ति के बाद वेतन, भत्ते और सेवा की शर्तों में उनके प्रतिकूल बदलाव नहीं होगा। दूसरा परंतुक: 2019 के अधिनियम के प्रारंभ से पहले नियुक्त आयुक्त पहले की व्यवस्था से शासित होते रहेंगे। उप-धारा (6): केंद्र सरकार आयोग को आवश्यक अधिकारी और कर्मचारी देगी और उनका वेतन और सेवा-शर्तें विहित होंगी।
2019 से पहले और बाद: कार्यकाल और वेतन
| बिंदु | मूल पाठ (2005 से 2019 तक) | वर्तमान स्थिति (2019 के बाद) |
|---|---|---|
| कार्यकाल (धारा 13(1), 13(2), 16(1), 16(2)) | पद ग्रहण से पाँच वर्ष, या 65 वर्ष की आयु तक (आयुक्त के लिए, जो पहले हो); मुख्य आयुक्त पर 65 वर्ष का परंतुक | "for such term as may be prescribed by the Central Government"; 65 वर्ष की सीमा बनी हुई; नियम 2019 में कार्यकाल तीन वर्ष |
| केंद्र: मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन [13(5)] | मुख्य निर्वाचन आयुक्त के समान | केंद्र सरकार द्वारा विहित; नियम 2019 में 2,50,000 रुपये प्रति माह |
| केंद्र: सूचना आयुक्त का वेतन [13(5)] | निर्वाचन आयुक्त के समान | केंद्र सरकार द्वारा विहित; नियम 2019 में 2,25,000 रुपये प्रति माह |
| राज्य: मुख्य और आयुक्त का वेतन [16(5)] | राज्य मुख्य आयुक्त: निर्वाचन आयुक्त के समान; राज्य आयुक्त: राज्य के मुख्य सचिव के समान | केंद्र सरकार द्वारा विहित; नियम 2019 में राज्य मुख्य आयुक्त और राज्य आयुक्त, दोनों के लिए 2,25,000 रुपये प्रति माह |
| पेंशन-कटौती वाले परंतुक | पहले की पेंशन या सेवानिवृत्ति-लाभ की राशि वेतन से घटाने के परंतुक थे | अधिनियम के 2019 के प्रतिस्थापन में नहीं; नियम 2019 में पेंशन-कटौती का प्रावधान है |
| सुरक्षा | कोई ऐसा परंतुक नहीं | प्रतिस्थापित परंतुक: नियुक्ति के बाद शर्तों में प्रतिकूल बदलाव नहीं; 2019 से पहले नियुक्त आयुक्त पुरानी व्यवस्था से शासित |
| किसके हाथ में | संसद के अधिनियम में | केंद्र सरकार के नियमों में (धारा 27(2) के नए खंड (ca) और (cb) से नियम बनाने की शक्ति) |
2019 का संशोधन: दो पक्ष
सरकार का तर्क (PIB की विज्ञप्ति से): सूचना आयोग संवैधानिक नहीं, वैधानिक (statutory) निकाय हैं, जबकि चुनाव आयोग अनुच्छेद 324 से बना संवैधानिक निकाय है। दोनों के कार्य अलग हैं, इसलिए उनकी हैसियत और सेवा-शर्तों को युक्तिसंगत बनाने की ज़रूरत है।
आलोचकों का तर्क (The Tribune में उद्धृत कार्यकर्ताओं के अनुसार): नियमों से कार्यकाल घटाना और वेतन तय करना आयोगों की स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर आघात है, क्योंकि चुनाव आयुक्तों और मुख्य सचिवों से बराबरी की सुरक्षा हट गई और अब वेतन तभी बदलेगा जब केंद्र सरकार नियम बदले।
परीक्षा-उत्तर में दोनों पक्ष एक-एक पंक्ति में लिखना संतुलित माना जाएगा। आलोचना और समर्थन के निष्कर्ष की जगह तथ्य लिखें: क्या बदला (कार्यकाल, वेतन), किसके नियमों से (केंद्र सरकार), और किस तारीख़ से (24 अक्टूबर 2019 से)।
RTI नियम 2019 (G.S.R. 810(E)): कार्यकाल और वेतन
| बिंदु | स्थिति |
|---|---|
| अधिसूचना | G.S.R. 810(E), 24 अक्टूबर 2019; राजपत्र में प्रकाशन की तिथि से प्रवृत्त (नियम 1) |
| कार्यकाल | केंद्र और राज्य दोनों में तीन वर्ष, पद ग्रहण की तिथि से (नियम 3 और 12) |
| केंद्र: मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन | 2,50,000 रुपये प्रति माह, नियत (नियम 5(1)) |
| केंद्र: सूचना आयुक्त का वेतन | 2,25,000 रुपये प्रति माह, नियत (नियम 5(2)) |
| राज्य: मुख्य और आयुक्त का वेतन | दोनों के लिए 2,25,000 रुपये प्रति माह, नियत (नियम 14(1) और (2)) |
| पेंशन की कटौती | पहले से मिल रही पेंशन या सेवानिवृत्ति-लाभ की रकम वेतन से घटाई जाएगी (नियम 5(3), 5(4), 14(3), 14(4)) |
धारा 14: पदमुक्ति (Removal of Chief Information Commissioner or Information Commissioner)
पदमुक्ति की धारा अधिनियम की रीढ़ है, क्योंकि स्वतंत्रता का असली अर्थ यह है कि पद से हटाना कठिन हो। धारा 14 में दो रास्ते हैं। पहला रास्ता न्यायिक जाँच वाला है, दूसरा बिना जाँच के पाँच सीमित आधारों वाला।
पहला रास्ता, उप-धारा (1): उप-धारा (3) के अधीन रहते हुए, मुख्य आयुक्त या आयुक्त को केवल राष्ट्रपति के आदेश से और "सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता" (proved misbehaviour or incapacity) के आधार पर हटाया जा सकता है, वह भी तब जब राष्ट्रपति के संदर्भ पर सर्वोच्च न्यायालय ने जाँच करके प्रतिवेदन दिया हो कि संबंधित व्यक्ति को इस आधार पर हटाया जाना चाहिए। उप-धारा (2): राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय को संदर्भ भेजने के बाद, उसके प्रतिवेदन पर आदेश देने तक, संबंधित आयुक्त को पद से निलंबित कर सकते हैं और आवश्यक लगे तो कार्यालय आने से भी रोक सकते हैं।
दूसरा रास्ता, उप-धारा (3): उप-धारा (1) के होते हुए भी, राष्ट्रपति आदेश से पदमुक्त कर सकते हैं यदि आयुक्त (a) दिवालिया घोषित हो; (b) ऐसे अपराध में दोषसिद्ध हो जो राष्ट्रपति की राय में नैतिक अधमता (moral turpitude) से जुड़ा हो; (c) कार्यकाल में अपने पद के कर्तव्यों से बाहर किसी वेतनभोगी नियोजन में लगे; (d) राष्ट्रपति की राय में मानसिक या शारीरिक अक्षमता के कारण पद पर बने रहने के अयोग्य हो; या (e) ऐसा वित्तीय या अन्य हित अर्जित करे जो उसके कार्यों पर प्रतिकूल असर डाले।
उप-धारा (4): यदि आयुक्त भारत सरकार की ओर से या उसके द्वारा किए गए किसी संविदा या करार में किसी भी रूप से संबद्ध या हितबद्ध हो, या उसके लाभ में हिस्सा ले, सिवाय किसी निगमित कंपनी के अन्य सदस्यों के साथ सामान्य सदस्य के रूप में, तो उप-धारा (1) के प्रयोजन से उसे दुर्व्यवहार का दोषी माना जाएगा।
पदमुक्ति के दो रास्ते [धारा 14]
| बिंदु | रास्ता 1: उप-धारा (1) | रास्ता 2: उप-धारा (3) |
|---|---|---|
| आधार | सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता | दिवालिया; नैतिक अधमता वाले अपराध में दोषसिद्धि; बाहर वेतनभोगी नियोजन; मानसिक या शारीरिक अक्षमता; वित्तीय या अन्य हित जो कार्य पर असर डाले |
| जाँच | सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रपति के संदर्भ पर जाँच कर प्रतिवेदन देता है | अधिनियम में सर्वोच्च न्यायालय की जाँच का उल्लेख नहीं |
| आदेश कौन देता है | राष्ट्रपति | राष्ट्रपति |
| निलंबन | उप-धारा (2): संदर्भ के बाद और आदेश तक निलंबन संभव | उप-धारा (2) संदर्भ के मामले के लिए है; उप-धारा (3) में निलंबन का उल्लेख नहीं |
| विशेष | राज्य में यही प्रक्रिया धारा 17(1) और (2) में, राज्यपाल के संदर्भ से | उप-धारा (4): सरकारी संविदा में हित को दुर्व्यवहार माना जाता है |
धारा 15 से 17: राज्य सूचना आयोग
राज्य की व्यवस्था केंद्र की प्रतिलिपि जैसी है। धारा 15(1): राज्य सरकार राजपत्र की अधिसूचना से "(राज्य का नाम) सूचना आयोग" गठित करेगी। धारा 15(2): राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और ऐसी संख्या में राज्य सूचना आयुक्त, जो दस से अधिक न हों। धारा 15(3): नियुक्ति राज्यपाल करेंगे, समिति की सिफ़ारिश पर, जिसमें (i) मुख्यमंत्री अध्यक्ष, (ii) विधान सभा में विपक्ष का नेता और (iii) मुख्यमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री हैं। विपक्ष के नेता की मान्यता न होने पर विधान सभा में सरकार के विपक्ष में सबसे बड़े समूह का नेता गिना जाएगा।
धारा 15(4) से (6): आयोग के कार्यों का सामान्य अधीक्षण राज्य मुख्य सूचना आयुक्त में निहित और आयोग स्वायत्त; योग्यता वही (प्रतिष्ठित, विभिन्न क्षेत्रों का ज्ञान और अनुभव); अयोग्यता वही (संसद या विधान-मंडल का सदस्य, लाभ का पद, राजनीतिक दल से संबंध, कारोबार या पेशा)। धारा 15(7): मुख्यालय राज्य के भीतर ऐसे स्थान पर, जिसे राज्य सरकार राजपत्र की अधिसूचना से तय करे, और राज्य सरकार की पूर्व अनुमति से अन्य स्थानों पर कार्यालय।
धारा 16 धारा 13 के समान है, 2019 के संशोधित रूप में। कार्यकाल "ऐसी अवधि जो केंद्र सरकार द्वारा विहित की जाए" और 65 वर्ष की आयु तक (आयुक्त के लिए जो पहले हो); शपथ राज्यपाल के सामने; त्यागपत्र राज्यपाल को; वेतन, भत्ते और सेवा की शर्तें केंद्र सरकार द्वारा विहित। यहाँ ध्यान दें कि राज्य आयोगों के लिए भी नियम केंद्र सरकार बनाती है। धारा 17 धारा 14 के समान है: राज्यपाल के आदेश से हटाना, राज्यपाल के संदर्भ पर सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद, और वही पाँच आधार उप-धारा (3) में, तथा सरकारी संविदा में हित को दुर्व्यवहार मानना उप-धारा (4) में, इस अंतर के साथ कि "भारत सरकार" की जगह "राज्य सरकार" है।
केंद्रीय और राज्य सूचना आयोग की तुलना
केंद्रीय सूचना आयोग (धारा 12 से 14)
गठनकेंद्र सरकार, राजपत्र की अधिसूचना
संरचनामुख्य सूचना आयुक्त और दस से अधिक नहीं आयुक्त
नियुक्ति करता हैराष्ट्रपति
समितिप्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोक सभा में विपक्ष का नेता, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री
मुख्यालयदिल्ली (12(7))
कार्यकाल और वेतनकेंद्र सरकार द्वारा विहित (13)
शपथ और त्यागपत्रराष्ट्रपति के समक्ष और राष्ट्रपति को
पदमुक्तिराष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद (14)
राज्य सूचना आयोग (धारा 15 से 17)
गठनराज्य सरकार, राजपत्र की अधिसूचना
संरचनाराज्य मुख्य सूचना आयुक्त और दस से अधिक नहीं राज्य सूचना आयुक्त
नियुक्ति करता हैराज्यपाल
समितिमुख्यमंत्री (अध्यक्ष), विधान सभा में विपक्ष का नेता, मुख्यमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री
मुख्यालयराज्य सरकार द्वारा अधिसूचित स्थान (15(7))
कार्यकाल और वेतनकेंद्र सरकार द्वारा विहित (16)
शपथ और त्यागपत्रराज्यपाल के समक्ष और राज्यपाल को
पदमुक्तिराज्यपाल, सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद (17)
नियुक्ति और पदमुक्ति का रास्ता
नियुक्ति-समिति
प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री (अध्यक्ष), विपक्ष का नेता, नामित कैबिनेट मंत्री [12(3), 15(3)]
नियुक्ति
राष्ट्रपति (केंद्र) या राज्यपाल (राज्य)
शपथ
पहली अनुसूची के प्रारूप में [13(3), 16(3)]
कार्यकाल
केंद्र सरकार द्वारा विहित (नियम 2019: तीन वर्ष) या 65 वर्ष की आयु तक, जो पहले हो; आयुक्त के लिए
पदमुक्ति (रास्ता 1)
राष्ट्रपति या राज्यपाल का संदर्भ, सर्वोच्च न्यायालय की जाँच, फिर आदेश [14(1), 17(1)]
पदमुक्ति (रास्ता 2)
पाँच आधारों पर सीधे आदेश [14(3), 17(3)]
मुख्य तथ्य
- आयोग की संरचना
- मुख्य सूचना आयुक्त और दस से अधिक नहीं आयुक्त (केंद्र और राज्य दोनों)
- नियुक्ति-समिति (केंद्र)
- प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोक सभा में विपक्ष का नेता, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री
- 2019 का संशोधन
- RTI (संशोधन) अधिनियम 2019 (2019 का 24); स्वीकृति 1 अगस्त 2019; धारा 13 और 16 में बदलाव 24-10-2019 से प्रभावी (2019)
- RTI नियम 2019
- G.S.R. 810(E), 24 अक्टूबर 2019; कार्यकाल तीन वर्ष; केंद्र में मुख्य आयुक्त 2,50,000 और आयुक्त 2,25,000 रुपये प्रति माह; राज्य में दोनों 2,25,000 रुपये (2019)
- आयु और कुल अवधि
- 65 वर्ष की आयु; आयुक्त से मुख्य आयुक्त बनने पर कुल अवधि पाँच वर्ष से अधिक नहीं
- पदमुक्ति
- सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता: सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद; पाँच आधार बिना जाँच [14(3), 17(3)]
- अंतिम जाँच
- 2 अक्टूबर 2026 (CIC का 18 नवंबर 2025 तक का संशोधित पाठ)
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- आज भी "पाँच वर्ष का कार्यकाल" और "चुनाव आयुक्त के बराबर वेतन" को वर्तमान स्थिति बताना। 2019 के संशोधन के बाद दोनों केंद्र सरकार के नियमों से तय होते हैं।
- आयुक्तों की अधिकतम संख्या ग़लत लिखना। धारा 12(2)(b) और 15(2)(b) में आयुक्तों की संख्या दस से अधिक नहीं है (मुख्य आयुक्त अलग)।
- नियुक्ति-समिति में "मुख्य न्यायाधीश" लिख देना। समिति में प्रधानमंत्री, लोक सभा में विपक्ष का नेता और एक कैबिनेट मंत्री हैं।
- पदमुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय की जाँच को हर स्थिति पर लगा देना। धारा 14(3) के पाँच आधारों में सीधा राष्ट्रपति का आदेश है।
- राज्य सूचना आयोग का मुख्यालय दिल्ली-जैसा तय बताना। यह राज्य सरकार की अधिसूचना से तय होता है, 15(7)।
- धारा 13 और 16 में आयु-सीमा पूरी तरह हटी मान लेना। 65 वर्ष की सीमा संशोधन के बाद भी पाठ में है।
चरणों में हल करें
हल सहित उदाहरणकार्यकाल और आयु-सीमा की गणना (काल्पनिक आयु और तिथियाँ)
दिया है
- नियम 2019 के अनुसार कार्यकाल तीन वर्ष है।
- धारा 13(2): आयुक्त का कार्यकाल विहित अवधि या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो। पहला परंतुक: आयुक्त बाद में मुख्य आयुक्त बन सकता है। दूसरा परंतुक: दोनों पदों की कुल अवधि पाँच वर्ष से अधिक नहीं। धारा 13(1) परंतुक: 65 वर्ष के बाद मुख्य आयुक्त पद पर नहीं।
- 1स्थिति 1 एक आयुक्त 58 वर्ष की आयु में नियुक्त होता है। विहित अवधि तीन वर्ष है और 65 वर्ष में अभी समय है, इसलिए उसका कार्यकाल तीन वर्ष चलेगा और वह 61 वर्ष की आयु में पद छोड़ेगा।
- 2स्थिति 2 यही व्यक्ति 61 वर्ष में मुख्य आयुक्त नियुक्त होता है। मुख्य आयुक्त का विहित कार्यकाल तीन वर्ष है, पर दूसरे परंतुक के अनुसार आयुक्त और मुख्य आयुक्त के रूप में कुल अवधि पाँच वर्ष से अधिक नहीं। आयुक्त के रूप में तीन वर्ष हो चुके, इसलिए मुख्य आयुक्त के रूप में अधिकतम दो वर्ष शेष हैं।
- 3स्थिति 3 आयु-सीमा भी देखें: 61 + 2 = 63 वर्ष, जो 65 से कम है। इसलिए कुल पाँच वर्ष की सीमा बाध्यकारी बनती है, आयु-सीमा नहीं।
- 4स्थिति 4 यदि कोई आयुक्त 63 वर्ष की आयु में नियुक्त हो, तो उसका कार्यकाल 65 वर्ष की आयु पर समाप्त हो जाएगा, यानी दो वर्ष में, क्योंकि "whichever is earlier" वाला नियम धारा 13(2) में है।
निष्कर्ष: स्थिति 1 में 3 वर्ष; स्थिति 2 में अधिकतम 2 वर्ष और मुख्य आयुक्त का कार्यकाल 63 वर्ष की आयु पर समाप्त; स्थिति 4 में 2 वर्ष। (आयु और अवधि काल्पनिक, गणना अधिनियम और नियम 2019 के प्रावधानों से।)
व्यवहार में
उदाहरण (काल्पनिक)पदमुक्ति के दो रास्ते: दो काल्पनिक आयुक्त
काल्पनिक राज्य "क" के दो सूचना आयुक्तों के बारे में शिकायतें आती हैं। (आयुक्त, राज्य और तथ्य सब अपने रचे हुए हैं।) राज्यपाल के सामने प्रश्न है कि किसके विरुद्ध कौन-सा रास्ता चुना जाए।
- आयुक्त अ
- आरोप है कि उन्होंने अपने पद के दुरुपयोग से कुछ पक्षों को लाभ दिया। यह "दुर्व्यवहार" का मामला है, जिसके लिए सिद्ध होना ज़रूरी है। राज्यपाल सर्वोच्च न्यायालय को संदर्भ भेजेंगे और जाँच-प्रतिवेदन आने के बाद ही आदेश देंगे; तब तक वे निलंबन और कार्यालय आने पर रोक का आदेश धारा 17(2) से दे सकते हैं।
- आयुक्त ब
- न्यायालय ने उन्हें ऐसे अपराध में दोषसिद्ध किया है जो राज्यपाल की राय में नैतिक अधमता से जुड़ा है। यह धारा 17(3)(b) का आधार है। राज्यपाल सीधे आदेश से पदमुक्त कर सकते हैं, सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बिना।
- तीसरा पहलू
- आयुक्त ब यदि राज्य सरकार की एक संविदा में हिस्सेदार निकलें, तो धारा 17(4) से यह दुर्व्यवहार माना जाएगा और धारा 17(1) की प्रक्रिया लग सकती है।
सीख
आरोप की प्रकृति तय करती है कि रास्ता कौन-सा है: सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता के लिए सर्वोच्च न्यायालय की जाँच, और पाँच गिनाए गए आधारों के लिए सीधा आदेश। निलंबन उप-धारा (2) के अधीन जाँच के दौरान मिलता है।
अभ्यास प्रश्न (अपने)
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
केंद्रीय सूचना आयोग की संरचना बताइए।
आदर्श उत्तर
एक मुख्य सूचना आयुक्त और आवश्यकतानुसार दस से अधिक नहीं केंद्रीय सूचना आयुक्त (धारा 12(2))।
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति कौन करता है और किसकी सिफ़ारिश पर?
आदर्श उत्तर
राष्ट्रपति; प्रधानमंत्री, लोक सभा में विपक्ष के नेता और नामित कैबिनेट मंत्री की समिति की सिफ़ारिश पर।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
2019 के संशोधन से सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और वेतन में क्या परिवर्तन हुआ?
आदर्श उत्तर
RTI (संशोधन) अधिनियम 2019 से धारा 13 और 16 में पाँच वर्ष का कार्यकाल और निर्वाचन आयुक्त या मुख्य सचिव के समान वेतन हटा। अब कार्यकाल, वेतन और सेवा-शर्तें केंद्र सरकार द्वारा विहित हैं। नियम 2019 में कार्यकाल तीन वर्ष है। नियुक्ति के बाद शर्तों में प्रतिकूल बदलाव नहीं होगा।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
सूचना आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया बताइए।
आदर्श उत्तर
धारा 14(1): राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय को संदर्भ भेजते हैं; जाँच में सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता पर ही हटाया जा सकता है। संदर्भ के दौरान निलंबन संभव है। धारा 14(3): दिवालिया, नैतिक अधमता के अपराध में दोषसिद्धि, बाहरी वेतनभोगी नियोजन, अक्षमता या हानिकारक हित पर बिना जाँच आदेश।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
केंद्रीय और राज्य सूचना आयोग के गठन, कार्यकाल और पदमुक्ति की तुलना कीजिए।
आदर्श उत्तर
केंद्रीय आयोग का गठन केंद्र सरकार और राज्य आयोग का राज्य सरकार करती है। दोनों में मुख्य आयुक्त और दस से अधिक नहीं आयुक्त होते हैं। नियुक्ति केंद्र में राष्ट्रपति और राज्य में राज्यपाल करते हैं, समिति की सिफ़ारिश पर, जिसमें प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अध्यक्ष होते हैं। 2019 के बाद कार्यकाल, वेतन और सेवा-शर्तें दोनों के लिए केंद्र सरकार द्वारा विहित हैं; आयु-सीमा 65 वर्ष बनी है। पदमुक्ति में राष्ट्रपति या राज्यपाल सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद ही सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता पर हटाते हैं; पाँच आधारों पर सीधा आदेश संभव है।
उत्तर कैसे लिखें (10 अंक, 100 शब्द)
भूमिका
नमूना प्रश्न: "केंद्रीय सूचना आयोग की संरचना, नियुक्ति और पदमुक्ति की प्रक्रिया की विवेचना कीजिए।" पहली पंक्ति में लिखें कि आयोग धारा 12(1) के अधीन केंद्र सरकार की अधिसूचना से गठित वैधानिक निकाय है। (5 अंक में संरचना, नियुक्ति और पदमुक्ति की एक-एक पंक्ति।)
मुख्य भाग
- संरचना: मुख्य आयुक्त और दस से अधिक नहीं आयुक्त
- नियुक्ति: राष्ट्रपति, समिति (प्रधानमंत्री अध्यक्ष, लोक सभा में विपक्ष का नेता, नामित कैबिनेट मंत्री)
- कार्यकाल और वेतन: 2019 से केंद्र सरकार द्वारा विहित, 65 वर्ष की सीमा, आयुक्त से मुख्य आयुक्त बनने पर कुल अवधि पाँच वर्ष से अधिक नहीं
- पदमुक्ति: सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता; पाँच आधारों पर सीधा आदेश
निष्कर्ष
निष्कर्ष: समिति और कठिन पदमुक्ति आयोग की स्वतंत्रता के आधार हैं, जबकि 2019 के बाद कार्यकाल और वेतन का विहित होना बहस का विषय बना हुआ है।
अतिरिक्त मूल्य
- 2019 के संशोधन के पक्ष और आलोचना, एक-एक पंक्ति में
- राज्य आयोग के लिए राष्ट्रपति की जगह राज्यपाल का उल्लेख
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RTI अधिनियम 2005: धारा 6 से 11, आवेदन, निपटारा, छूट (धारा 8), पृथक्करण और तृतीय पक्ष
RTI अधिनियम 2005: धारा 18 से 20, आयोग की शक्तियाँ, प्रथम और द्वितीय अपील, दंड
भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India)
राजस्थान लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त
प्रशासन पर नियंत्रण (विधायी, कार्यकारी, न्यायिक)
त्वरित पुनरावृत्ति
- धारा 12(2): मुख्य सूचना आयुक्त और दस से अधिक नहीं आयुक्त; 12(3): राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं, समिति: प्रधानमंत्री, लोक सभा में विपक्ष का नेता, नामित कैबिनेट मंत्री
- 12(4): सामान्य अधीक्षण मुख्य आयुक्त में, आयोग स्वायत्त; 12(5): प्रतिष्ठित व्यक्ति, विभिन्न क्षेत्रों का अनुभव; 12(6): सांसद, विधायक, लाभ का पद, दल, कारोबार वर्जित; 12(7): मुख्यालय दिल्ली
- धारा 13 (2019 से): कार्यकाल और वेतन "as may be prescribed by the Central Government"; मुख्य आयुक्त 65 वर्ष के बाद नहीं; आयुक्त विहित अवधि या 65 वर्ष तक, जो पहले; पुनर्नियुक्ति नहीं
- आयुक्त मुख्य आयुक्त बन सकता है; दोनों पदों की कुल अवधि पाँच वर्ष से अधिक नहीं
- RTI नियम 2019 (G.S.R. 810(E), 24 अक्टूबर 2019): कार्यकाल तीन वर्ष; केंद्र में मुख्य आयुक्त 2,50,000 और आयुक्त 2,25,000 रुपये; राज्य में दोनों 2,25,000 रुपये प्रति माह
- धारा 14(1): सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता, सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद राष्ट्रपति का आदेश; 14(2): निलंबन
- धारा 14(3): दिवालिया, नैतिक अधमता वाला अपराध, बाहरी वेतनभोगी नियोजन, मानसिक या शारीरिक अक्षमता, हानिकारक वित्तीय हित; 14(4): सरकारी संविदा में हित दुर्व्यवहार
- धारा 15 से 17: राज्य में वही व्यवस्था; राज्यपाल, मुख्यमंत्री की समिति, विधान सभा में विपक्ष का नेता; मुख्यालय राज्य सरकार की अधिसूचना से
- धारा 16(5) का 2019 से पहले का पाठ: राज्य मुख्य आयुक्त निर्वाचन आयुक्त के समान, राज्य आयुक्त मुख्य सचिव के समान; अब विहित
याद रखने योग्य शब्द
- धारा 12
- धारा 13
- धारा 14
- स्वायत्त
- 65 वर्ष
- दस से अधिक नहीं
- 2019 संशोधन
- सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता