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पेपर III · इकाई II

राजस्थान लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त

राजस्थान का लोकायुक्त: अधिनियम 1973 का ढाँचा, कौन जाँच के दायरे में और कौन बाहर, शक्तियाँ और प्रक्रिया, आधिकारिक रिपोर्ट के आँकड़े, सीमाएँ और सुधार, हल PYQ के साथ।

  • लोकायुक्त
  • उप-लोकायुक्त
  • क्षेत्राधिकार
  • धारा 22 की छूट
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II, राज्य एवं ज़िला प्रशासन: "State: Governor, Chief Minister, Council of Ministers, State Secretariat, Chief Secretary, role of Directorates, police administration, Revenue Board, State Election Commission, State Human Rights Commission, Lokayukta." इस पृष्ठ पर राजस्थान का लोकायुक्त है; केंद्र के लोकपाल का अलग पृष्ठ है, और तुलना-तालिका दोनों में है।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • लोकायुक्त सीधे दो बार पूछा गया: 2018 में "राजस्थान में लोकायुक्त के क्षेत्राधिकार से कौन से पदों एवं व्यक्तियों को छूट दी गई है?" और 2021 में "राजस्थान में लोकायुक्त के क्षेत्राधिकार की विवेचना" (दोनों 5 अंक, 50 शब्द)। संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में यह विषय 2018 और 2021 दोनों में सीधे पूछा गया, यानी दोहराव का विषय है।
  • दोनों प्रश्न एक ही सिक्के के दो पहलू हैं: कौन अंदर (धारा 2, 7) और कौन बाहर (धारा 8, 22)। एक ही तालिका दोनों के उत्तर बना देती है, इसलिए यह पृष्ठ दोनों तालिकाएँ आमने-सामने रखता है।
  • 10 अंक के प्रश्न में नियुक्ति, शक्तियाँ, सीमाएँ और सुधार चाहिए: इसके लिए नीचे प्रक्रिया, कार्य-स्थिति (आधिकारिक वार्षिक रिपोर्ट) और आलोचना-सुधार वाला खंड तैयार है।

पहले सरल भाषा में: विभाग के बाहर की शिकायत-खिड़की

मान लीजिए किसी तहसील में एक विधवा की पेंशन-फ़ाइल सिर्फ़ इसलिए अटकी है कि बाबू को रिश्वत चाहिए। वह उसी विभाग के बड़े अफ़सर के पास जाए तो फ़ाइल घूम-फिरकर उसी दफ़्तर में लौट आती है, क्योंकि जिसकी शिकायत है और जो सुनवाई कर रहा है, दोनों एक ही महकमे के हैं। इसलिए ज़रूरत पड़ी एक ऐसी खिड़की की जो महकमे और सरकार दोनों से अलग बैठी हो, जिसे चलाने वाला पूर्व न्यायाधीश हो और जो मंत्री से लेकर बाबू तक की शिकायत सुन सके। राजस्थान में यह खिड़की लोकायुक्त है। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया दृश्य है, किसी वास्तविक मामले का वर्णन नहीं।)

परीक्षा के लिए सटीक परिभाषा: लोकायुक्त राजस्थान लोकायुक्त तथा उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1973 (अधिनियम सं. 9/1973) से बनी स्वतंत्र वैधानिक संस्था है, जो मंत्रियों (मुख्यमंत्री को छोड़कर), सचिवों और अन्य निर्दिष्ट लोक सेवकों के विरुद्ध आरोपों की जाँच करती है। 'आरोप' (allegation) का मतलब अधिनियम की धारा 2(b) में तीन बातें हैं: पद का दुरुपयोग करके अपने या किसी और के लिए लाभ लेना या किसी को अनुचित हानि पहुँचाना; निजी हित या अनुचित अथवा भ्रष्ट उद्देश्य से काम करना; और भ्रष्टाचार या सत्यनिष्ठा की कमी का दोषी होना। धारा 2(a) में 'कार्रवाई' (action) में काम न करना भी शामिल है, इसलिए निष्क्रियता भी जाँच के दायरे में आ सकती है।

यह संस्था दुनिया भर के ओम्बड्समैन (Ombudsman) का भारतीय रूप है। लोकायुक्त सचिवालय की वेबसाइट के अनुसार ओम्बड्समैन की अवधारणा सबसे पहले स्वीडन से आई, जहाँ 1809 के संविधान में 'ओम्बड्समैन फ़ॉर जस्टिस' की व्यवस्था हुई, और भारत में 'लोकपाल' तथा 'लोकायुक्त' नाम 1963 में डॉ. एल.एम. सिंघवी ने दिए। वेबसाइट यह भी बताती है कि 1963 में राजस्थान की प्रशासनिक सुधार समिति ने इस तरह की वैधानिक संस्था की सिफ़ारिश की थी, और 1966 में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (अध्यक्ष मोरारजी देसाई) ने केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त की सिफ़ारिश की।

अधिनियम 1973: जन्म, संरचना और नियुक्ति

राजस्थान ने यह संस्था केंद्र के क़ानून से चार दशक पहले बनाई। सचिवालय के इतिहास-पृष्ठ के अनुसार राजस्थान लोकायुक्त तथा उप-लोकायुक्त अध्यादेश 3 फ़रवरी 1973 से प्रभावी हुआ और 26 मार्च 1973 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर अधिनियम बन गया। धारा 1(3) इसे 3 फ़रवरी 1973 से प्रभावी मानती है और धारा 23 उस अध्यादेश (सं. 3/1973) को निरसित करती है। आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध पाठ 31-01-2015 तक संशोधित रूप का है। बाद में राजस्थान लोकायुक्त तथा उप-लोकायुक्त (संशोधन) अधिनियम, 2019 (सं. 13/2019, राजपत्र 18 जुलाई 2019) ने धारा 5(1) में 'आठ वर्ष' के स्थान पर 'पाँच वर्ष' किया; इसे 6 मार्च 2019 से प्रभावी माना गया। इसके बाद के किसी और संशोधन की पुष्टि नहीं हो सकी, इसलिए उत्तर में 5 वर्ष का कार्यकाल ही लिखें।

पदों की रचना: अधिनियम में एक लोकायुक्त होता है और राज्यपाल एक या अधिक उप-लोकायुक्त भी नियुक्त कर सकते हैं (धारा 3(1))। दोनों की नियुक्ति राज्यपाल अपने हस्ताक्षर और मुहर के वारंट से करते हैं। लोकायुक्त की नियुक्ति उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष से परामर्श के बाद होती है; यदि नेता प्रतिपक्ष न हो तो विपक्ष के सदस्यों द्वारा अध्यक्ष के निर्देशित तरीक़े से चुना गया व्यक्ति परामर्श में रहता है। उप-लोकायुक्त की नियुक्ति लोकायुक्त से परामर्श पर होती है। ध्यान दें, यहाँ 'परामर्श' है, चयन-समिति नहीं; यह लोकपाल से अहम अंतर है (नीचे तालिका)।

अयोग्यताएँ और शर्तें: धारा 4 के अनुसार पदधारी संसद या किसी राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं हो सकता, लाभ का कोई पद नहीं रख सकता, किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं रह सकता, कारोबार या पेशा नहीं कर सकता; इसलिए नियुक्ति से पहले उसे ये बंधन छोड़ने पड़ते हैं। धारा 5 में कार्यकाल पाँच वर्ष है। इस्तीफ़ा राज्यपाल को लिखकर दिया जाता है। पद छोड़ने के बाद राजस्थान सरकार, केंद्र सरकार और अधिनियम में गिनाई गई संस्थाओं में आगे कोई नौकरी नहीं मिल सकती। वेतन, भत्ते और पेंशन लोकायुक्त के लिए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के और उप-लोकायुक्त के लिए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान हैं (धारा 5(4))।

हटाने की प्रक्रिया (धारा 6) सुरक्षा-कवच है: राज्यपाल केवल दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर हटा सकते हैं, और उससे पहले राज्यपाल द्वारा नियुक्त न्यायाधीश जाँच करते हैं (लोकायुक्त के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश; उप-लोकायुक्त के मामले में सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश)। इसके साथ विधानसभा का प्रस्ताव भी चाहिए, जो कुल सदस्य-संख्या के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वालों के दो-तिहाई से पारित हो और उसी सत्र में राज्यपाल को सौंपा जाए। अधिनियम का पाठ पात्रता में 'पूर्व न्यायाधीश' होना अनिवार्य नहीं लिखता, पर आधिकारिक कार्यकाल-सारणी में अब तक सभी लोकायुक्त न्यायाधीश रहे हैं (विश्लेषण)।

लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त: अंतर

आधारलोकायुक्तउप-लोकायुक्त
नियुक्तिराज्यपाल; मुख्य न्यायाधीश और नेता प्रतिपक्ष से परामर्श (धारा 3 का पहला परंतुक)राज्यपाल; लोकायुक्त से परामर्श (धारा 3 का परंतुक (ख))
किनकी जाँच (धारा 7)मंत्री, सचिव; ज़िला परिषद, पंचायत समिति व नगर निकायों के पदाधिकारी; अधिसूचित अन्य वर्गमंत्री/सचिव/उक्त वर्गों के अलावा अन्य लोक सेवक
स्वतः जाँचबिना शिकायत भी उप-लोकायुक्त वाले मामले की जाँच कर सकते हैं, पर कारण लिखित में दर्ज करके (धारा 7(3))शिकायत पर, या अपने क्षेत्र में स्वयं की राय पर (धारा 7(2))
प्रशासनिक नियंत्रणउप-लोकायुक्त पर निर्देश दे सकते हैं, पर उनके निष्कर्ष पर प्रश्न नहीं उठा सकते (धारा 3(3) का परंतुक)लोकायुक्त के प्रशासनिक नियंत्रण में
वेतन व दर्जाउच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समान (धारा 5(4))उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान (धारा 5(4))
हटाने की जाँचसर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान/पूर्व न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशसर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के वर्तमान/पूर्व न्यायाधीश

पहला उप-लोकायुक्त पद की शर्त के रूप में उस व्यक्ति को बनना था जो अधिनियम लागू होने से ठीक पहले सतर्कता आयुक्त था (धारा 3 का दूसरा परंतुक)।

क्षेत्राधिकार (2021 का प्रश्न): कौन जाँच के दायरे में है

क्षेत्राधिकार का सीधा सूत्र अधिनियम की धारा 2(i) की 'लोक सेवक' की परिभाषा है। इसे छह हिस्सों में समझें। पहला, मुख्यमंत्री के अलावा मंत्रिपरिषद का हर सदस्य, यानी मंत्री, राज्य मंत्री और उप-मंत्री (धारा 2(f))। दूसरा, राजस्थान राज्य के कार्यकलापों के संबंध में किसी लोक सेवा या पद पर नियुक्त हर अधिकारी (धारा 2(g)); इसी में सचिव भी हैं, जिनकी परिभाषा धारा 2 में दी गई है और जिनमें विशेष, अतिरिक्त और संयुक्त सचिव भी शामिल हैं।

तीसरा हिस्सा पंचायती राज के पदाधिकारी हैं: ज़िला परिषद के प्रमुख और उप-प्रमुख, पंचायत समिति के प्रधान और उप-प्रधान, तथा राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 के अधीन गठित किसी स्थायी समिति के अध्यक्ष। चौथा हिस्सा नगर निकाय हैं: नगर निगम के महापौर व उप-महापौर, नगर परिषद या नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष तथा राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 1959 के अधीन बनी समिति के अध्यक्ष (नगर निगम के महापौर वाला पाठ 2008 के राजस्थान अधिनियम 13 से जोड़ा गया)।

पाँचवाँ हिस्सा उन संस्थाओं के कर्मचारी हैं जिनमें सरकार की पैठ है: राज्यपाल की अधिसूचना से घोषित कोई स्थानीय प्राधिकरण; राज्य अधिनियम से बना और राज्य सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण वाला निगम; ऐसी सरकारी कंपनी जिसकी समादत्त अंश-पूँजी का कम से कम 51 प्रतिशत राज्य सरकार के पास हो (और उसकी सहायक कंपनी); तथा राजस्थान सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1958 के अधीन पंजीकृत वह सोसायटी जो राज्य सरकार के नियंत्रण में हो और अधिसूचित हो। छठे हिस्से में वे अन्य वर्ग हैं जिन्हें राज्य सरकार लोकायुक्त से परामर्श कर अधिसूचित करे (धारा 7(1)(iii))।

कौन किसकी जाँच करे: धारा 7 के अनुसार लोकायुक्त मंत्री, सचिव और ऊपर के स्थानीय निकाय-पदाधिकारियों वाली कार्रवाई की जाँच करते हैं; बाक़ी लोक सेवकों की जाँच उप-लोकायुक्त करते हैं, पर लोकायुक्त चाहें तो कारण लिखकर उन्हें भी स्वयं देख सकते हैं। कार्रवाई वह भी गिनी जाती है जो इन लोगों ने स्वयं की हो या जिसे इनके सामान्य या विशेष अनुमोदन से किया गया हो।

शिकायत कौन कर सकता है: धारा 9 के अनुसार कोई भी व्यक्ति, बशर्ते वह स्वयं लोक सेवक न हो। पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु हो जाए या वह स्वयं न कर पाए तो उसकी संपदा का प्रतिनिधि या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति शिकायत कर सकता है। पुलिस हिरासत, जेल या विक्षिप्तों के आश्रय से लिखा पत्र बिना खोले, बिना देरी के लोकायुक्त को भेजना ज़रूरी है और वह उसे शिकायत मान सकते हैं। शिकायत के साथ शपथ-पत्र लगता है; वेबसाइट के अनुसार 10 रुपये के नॉन-ज्यूडिशियल स्टाम्प पर नोटरी से सत्यापित शपथ-पत्र न हो तो सचिवालय स्तर पर कोई कार्यवाही नहीं होती।

क्षेत्राधिकार एक नज़र में (अधिनियम 1973 की धारा 2 और 7)

समूहकौनआधार
1. मंत्रीमंत्री, राज्य मंत्री, उप-मंत्री; मुख्यमंत्री नहींधारा 2(f), 2(i)(i)
2. अधिकारीराज्य के कार्यकलापों से जुड़ा हर लोक पद या सेवा का व्यक्ति, सचिव सहितधारा 2(g), 2(i)(ii) और सचिव की परिभाषा
3. पंचायती राजज़िला परिषद के प्रमुख/उप-प्रमुख, पंचायत समिति के प्रधान/उप-प्रधान, स्थायी समितियों के अध्यक्षधारा 2(i)(iii)(क)
4. नगर निकायमहापौर/उप-महापौर, नगर परिषद व पालिका बोर्ड के अध्यक्ष/उपाध्यक्ष, समितियों के अध्यक्षधारा 2(i)(iii)(ख)
5. सरकारी संस्थाएँअधिसूचित स्थानीय प्राधिकरण, राज्य निगम, 51% सरकारी कंपनी (व सहायक), अधिसूचित सोसायटी के सेवकधारा 2(i)(iv)
6. अधिसूचित वर्गराज्य सरकार द्वारा लोकायुक्त से परामर्श पर अधिसूचित अन्य लोक सेवक-वर्गधारा 7(1)(iii)

सचिवालय की वेबसाइट के 'कार्यक्षेत्र' पृष्ठ पर यही सूची सरल भाषा में दी है (मंत्री, सचिव, विभागाध्यक्ष, ज़िला परिषद व पंचायत समिति के पदाधिकारी, महापौर, नगर निकायों के अध्यक्ष, राजकीय कंपनियाँ और निगम)।

छूट (2018 का प्रश्न): कौन-से पद और व्यक्ति बाहर हैं

छूट तीन तरह की है। पहली, पदों के आधार पर: धारा 22 (जो 'संदेह निवारण' के नाम से जोड़ी गई है) साफ़ कहती है कि अधिनियम का कोई भी प्रावधान लोकायुक्त या उप-लोकायुक्त को इन छह श्रेणियों के विरुद्ध आरोप की जाँच का अधिकार नहीं देता। कारण समझना आसान है: ये सब या तो संविधान के स्वतंत्र संस्थान हैं (न्यायपालिका, निर्वाचन, लोक सेवा आयोग, महालेखाकार) या विधानमंडल के अपने कर्मचारी हैं, और इनकी जाँच का अलग संवैधानिक या न्यायिक तंत्र है। (यह कारण विश्लेषण है, अधिनियम में दर्ज नहीं।)

दूसरी छूट, मामलों के आधार पर (धारा 8): जिस कार्रवाई पर लोक सेवक (जाँच) अधिनियम, 1850 के अधीन औपचारिक सार्वजनिक जाँच या जाँच आयोग अधिनियम, 1952 के अधीन जाँच लोकायुक्त की पूर्व सहमति से बैठ चुकी हो, उसकी जाँच नहीं हो सकती; और कार्रवाई के पाँच वर्ष बाद की शिकायत पर भी जाँच नहीं हो सकती। तीसरी, वर्गों के आधार पर (धारा 19): राज्य सरकार लोकायुक्त की सिफ़ारिश पर और जनहित में किसी लोक सेवक-वर्ग को अधिसूचना से बाहर कर सकती है, पर राजपत्रित रैंक के लोक सेवकों के लिए ऐसी अधिसूचना नहीं निकल सकती; अधिसूचना को विधानमंडल के पटल पर रखना होता है और सदन उसे बदल या रद्द कर सकता है।

अलावा इनके, मुख्यमंत्री अधिनियम में 'मंत्री' की परिभाषा से ही बाहर हैं (धारा 2(f)), इसलिए परीक्षा में "मुख्यमंत्री" को पहली पंक्ति में लिखना न भूलें। सचिवालय की वेबसाइट के 'कार्यक्षेत्र' पृष्ठ पर बाहर वालों की सूची में सरपंच, पंच, विधायक और सेवानिवृत्त लोक सेवक भी हैं: सरपंच-पंच-विधायकों के विरुद्ध शिकायतें आती तो हैं पर उन पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता, क्योंकि वे अधिकार-क्षेत्र में नहीं हैं। अधिनियम की धारा 2(i) की सूची में ये नहीं हैं, इसलिए यह सूची में उनकी अनुपस्थिति का परिणाम है (विश्लेषण); सेवानिवृत्त लोक सेवकों वाली पंक्ति का आधार अकेले वेबसाइट है।

छूट-सारणी: कौन बाहर, किस आधार पर

बाहर कौनआधारयाद रखने का सूत्र
मुख्यमंत्रीधारा 2(f): 'मंत्री' से बाहरशीर्ष कार्यपालिका अलग
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश/न्यायाधीश; न्यायिक सेवा के सदस्य (अनुच्छेद 236(ख))धारा 22(क)न्यायपालिका
भारत में किसी भी न्यायालय के अधिकारी या कर्मचारीधारा 22(ख)न्यायालय-स्टाफ़
महालेखाकार, राजस्थानधारा 22(ग)लेखा-परीक्षा
राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्यधारा 22(घ)भर्ती-आयोग
मुख्य निर्वाचन आयुक्त, निर्वाचन आयुक्त, क्षेत्रीय आयुक्त (अनुच्छेद 324) और मुख्य निर्वाचन अधिकारी, राजस्थानधारा 22(ङ)निर्वाचन
राजस्थान विधानसभा सचिवालय का कोई सदस्य (कर्मचारी)धारा 22(च)विधानमंडल का स्टाफ़
सरपंच, पंच, विधायक; सेवानिवृत्त लोक सेवकवेबसाइट 'कार्यक्षेत्र' पृष्ठ; धारा 2(i) की सूची में अनुपस्थितसूची से बाहर
पाँच वर्ष से पुरानी कार्रवाई की शिकायतधारा 8(3)समय-सीमा
1850 के अधिनियम के अधीन सार्वजनिक जाँच या 1952 के अधिनियम के अधीन भेजे गए मामलेधारा 8(1), लोकायुक्त की पूर्व सहमति सेपहले से जाँच-अधीन
धारा 19 की अधिसूचना से बाहर किए गए अराजपत्रित वर्गधारा 19सरकार, सिफ़ारिश पर

शक्तियाँ: जाँच कैसे चलती है और अंत में क्या होता है

जाँच की चाल: जब लोकायुक्त या उप-लोकायुक्त प्रारंभिक जाँच (preliminary inquiry) के बाद अन्वेषण (investigation) करने का मन बनाते हैं, तब वे शिकायत की प्रति संबंधित लोक सेवक और सक्षम प्राधिकारी को भेजते हैं, लोक सेवक को अपनी टिप्पणी देने का मौक़ा देते हैं और ज़रूरी दस्तावेज़ों की अभिरक्षा के आदेश दे सकते हैं (धारा 10(1))। जाँच निजी तौर पर होती है और शिकायतकर्ता या लोक सेवक की पहचान जनता या प्रेस को नहीं बताई जाती; केवल निश्चित जनहित के मामले में कारण लिखकर सार्वजनिक सुनवाई हो सकती है (धारा 10(2))। शिकायत तुच्छ, तंग करने वाली, बिना सद्भाव या पर्याप्त आधार के बिना हो, या शिकायतकर्ता के पास दूसरे उपाय हों, तो लोकायुक्त जाँच से इनकार या उसे बंद कर सकते हैं, पर कारण लिखकर बताने होंगे (धारा 10(4)-(5))।

शक्तियाँ: साक्ष्य के लिए (धारा 11) जाँच के दौरान लोकायुक्त को सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत सिविल न्यायालय की शक्तियाँ हैं: किसी को बुलाकर शपथ पर बयान लेना, दस्तावेज़ मँगवाना, शपथ-पत्र पर साक्ष्य लेना, किसी न्यायालय या दफ़्तर से अभिलेख माँगना, गवाहों की जाँच के लिए कमीशन जारी करना। कार्यवाही 'न्यायिक कार्यवाही' मानी जाती है (अधिनियम में भारतीय दंड संहिता की धारा 193 का उल्लेख है, जिसकी जगह अब BNS की संबंधित धारा पढ़ें)। गोपनीयता के नियम या विशेषाधिकार जाँच में बाधा नहीं बनते, सिवाय दो अपवादों के: देश की सुरक्षा, रक्षा, अंतरराष्ट्रीय संबंध और अपराध की जाँच-पड़ताल को हानि पहुँचाने वाली जानकारी, तथा मंत्रिमंडल या उसकी समिति की कार्यवाही का प्रकटीकरण; यहाँ मुख्य सचिव का प्रमाण-पत्र अंतिम माना जाता है (धारा 11(5))। साथ ही, लोकायुक्त दूसरी एजेंसियों (राज्य या केंद्र की जाँच-एजेंसी) की मदद ले सकते हैं (धारा 14(3))।

अंत में क्या होता है (धारा 12): आरोप पूर्णतः या अंशतः सिद्ध होने पर लोकायुक्त अपने निष्कर्ष और सिफ़ारिशें दस्तावेज़ों व साक्ष्य समेत सक्षम प्राधिकारी को लिखित में भेजते हैं। सक्षम प्राधिकारी रिपोर्ट की जाँच करके तीन महीने के भीतर बताता है कि क्या कार्रवाई हुई या होनी है। लोकायुक्त संतुष्ट हों तो मामला बंद; असंतुष्ट हों और मामला योग्य लगे तो वे राज्यपाल को विशेष प्रतिवेदन दे सकते हैं और शिकायतकर्ता को सूचित करते हैं। हर साल एकीकृत वार्षिक प्रतिवेदन भी राज्यपाल को जाता है, और राज्यपाल उसे स्पष्टीकरण-ज्ञापन के साथ विधानसभा के पटल पर रखवाते हैं। यानी लोकायुक्त की सिफ़ारिश बाध्यकारी आदेश नहीं है, उसकी ताक़त जनता और विधानसभा के सामने रिपोर्ट रखे जाने में है। यह अंतिम बात विश्लेषण है, पर धारा 12 के पाठ से सीधी निकलती है।

सुरक्षा और दंड: झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायत पर तीन वर्ष तक कारावास और जुर्माना हो सकता है, पर मुक़दमा पीड़ित लोक सेवक की शिकायत पर और लोकायुक्त की पूर्व स्वीकृति से ही चलता है (धारा 13)। लोकायुक्त या उप-लोकायुक्त का जाँच के समय जानबूझकर अपमान या बाधा छह माह तक साधारण कारावास या जुर्माना या दोनों का कारण बन सकता है (धारा 16)। सद्भाव से की गई कार्रवाई पर कोई वाद या अभियोजन नहीं चलता, और अधिकारिता के सिवा उनकी कार्यवाही को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती (धारा 17)। राज्यपाल अतिरिक्त कार्य भी सौंप सकते हैं, भ्रष्टाचार-निरोध एजेंसियों पर निगरानी की शक्ति दे सकते हैं, और आदेश देकर किसी कार्रवाई की जाँच करने को कह सकते हैं, जिसे लोकायुक्त को मानना होगा (धारा 18)।

सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority): कार्रवाई की सिफ़ारिश किसे जाती है

लोक सेवकसक्षम प्राधिकारी
मंत्री या सचिवमुख्यमंत्री (धारा 2(c)(i))
अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्य, विभागाध्यक्ष, राज्य सेवाओं के सदस्यकार्मिक विभाग के प्रभारी मंत्री (1974 के नियम, नियम 2)
अन्य राजपत्रित अधिकारीसंबंधित विभाग के प्रभारी मंत्री (नियम 2)
अराजपत्रित अधिकारीसंबंधित विभाग के शासन सचिव (नियम 2)

नियम 2 अधिसूचना दिनांक 25-9-1996 से प्रतिस्थापित है। नियमावली के अनुसार कार्मिक विभाग ही लोकायुक्त और सरकार के बीच संपर्क-माध्यम है।

शिकायत से रिपोर्ट तक: आधिकारिक प्रक्रिया

  1. शिकायत

    सचिव/उप सचिव को; शपथ-पत्र के साथ; डाक, फ़ैक्स, ई-मेल या स्वयं उपस्थित होकर

  2. प्रथम परीक्षण

    आरोप अस्पष्ट हों तो ब्यौरा माँगा जाता है; विभाग से तथ्यात्मक रिपोर्ट मँगाई जाती है; शिकायतकर्ता आपत्ति दे सकता है

  3. प्रारंभिक जाँच

    प्रथमदृष्टया आरोप सही न मिलें तो नस्तीबद्ध; सही मिलें तो आगे

  4. अन्वेषण (धारा 10)

    लोक सेवक को नोटिस, बचाव, सुनवाई और प्रतिपरीक्षण का अवसर

  5. रिपोर्ट (धारा 12(1))

    सक्षम प्राधिकारी को: दंडात्मक मामला या अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफ़ारिश

  6. तीन माह

    सक्षम प्राधिकारी की कार्रवाई की सूचना; असंतोष पर राज्यपाल को विशेष प्रतिवेदन; वार्षिक रिपोर्ट विधानसभा के पटल पर

चरण सचिवालय की वेबसाइट के 'कार्यप्रणाली' पृष्ठ और धारा 10-12 पर आधारित हैं। वेबसाइट यह भी कहती है कि प्रक्रिया में गड़बड़ी का अवसर दिखे तो सचिवालय नियम बदलने का सुझाव भी देता है।

लोकायुक्त (राजस्थान) और लोकपाल (केंद्र): तुलना

राजस्थान लोकायुक्त (अधिनियम 1973)

संरचनाएक लोकायुक्त और एक या अधिक उप-लोकायुक्त (धारा 3)

नियुक्तिराज्यपाल; मुख्य न्यायाधीश व नेता प्रतिपक्ष से परामर्श

कार्यकालपाँच वर्ष (धारा 5)

सर्वोच्च पदाधिकारीमुख्यमंत्री अधिकार-क्षेत्र से बाहर (धारा 2(f))

जाँच व अभियोजनलोकायुक्त की अपनी अभियोजन-शाखा का उल्लेख अधिनियम में नहीं; सिफ़ारिश सक्षम प्राधिकारी को

समय-सीमा (शिकायत)कार्रवाई के पाँच वर्ष तक (धारा 8(3))

निष्कर्ष की शक्तिसिफ़ारिश; असंतोष पर राज्यपाल को विशेष प्रतिवेदन (धारा 12)

लोकपाल (अधिनियम 2013)

संरचनाअध्यक्ष और अधिकतम आठ सदस्य, आधे न्यायिक (धारा 3)

नियुक्तिराष्ट्रपति; प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन-समिति की सिफ़ारिश पर, खोज-समिति (धारा 4)

कार्यकालपाँच वर्ष या 70 वर्ष की आयु, जो पहले हो (धारा 6)

सर्वोच्च पदाधिकारीप्रधानमंत्री अधिकार-क्षेत्र में, पर विशेष शर्तों के साथ (धारा 14(1)(क))

जाँच व अभियोजनजाँच-शाखा, अभियोजन-शाखा; अभियोजन-स्वीकृति देने की शक्ति (धाराएँ 11, 12, 23)

समय-सीमा (शिकायत)सात वर्ष तक (धारा 53)

निष्कर्ष की शक्तिनिर्देश-आधारित: अभियोजन-स्वीकृति, विशेष न्यायालय में मुक़दमा (धाराएँ 20, 23)

राजस्थान वाली कॉलम की 'अभियोजन-शाखा का उल्लेख नहीं' पंक्ति अधिनियम के पाठ में उसकी अनुपस्थिति पर आधारित विश्लेषण है।

कार्यकाल-सारणी: पदधारक और अंतराल (आधिकारिक सारणी से)

क्रमपदधारक (लोकायुक्त)अवधि (सारणी के अनुसार)
1न्यायमूर्ति आई.डी. दुआ (पूर्व न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय)28-8-1973 से 27-08-1978
5न्यायमूर्ति एम.एल. श्रीमाल (पूर्व मुख्य न्यायाधीश, सिक्किम उच्च न्यायालय)04-01-1985 से 03-01-1990
10न्यायमूर्ति मिलाप चन्द जैन (पूर्व मुख्य न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय)26-11-1999 से 26-11-2004
11न्यायमूर्ति जी.एल. गुप्ता (पूर्व न्यायाधीश, राजस्थान उच्च न्यायालय)01-05-2007 से 30-04-2012
12न्यायमूर्ति एस.एस. कोठारी (पूर्व न्यायाधीश, राजस्थान उच्च न्यायालय)25-3-2013 से 07-03-2019
13न्यायमूर्ति प्रताप कृष्ण लोहरा (पूर्व न्यायाधीश, राजस्थान उच्च न्यायालय)09-3-2021 से 08-03-2026

सारणी में कुल 13 लोकायुक्त दर्ज हैं; यहाँ चुनिंदा पंक्तियाँ हैं। विश्लेषण: सारणी के क्रमिक पदधारकों के बीच सबसे लंबे अंतराल लगभग 2 वर्ष 5 माह (26-11-2004 से 01-05-2007), लगभग 2 वर्ष (07-03-2019 से 09-03-2021) और लगभग 1 वर्ष 8 माह (07-08-1982 से 04-04-1984) हैं; कार्यवाहक व्यवस्था (धारा 5(2)) सारणी में दर्ज नहीं है। 8 मार्च 2026 के बाद के पदधारी की जानकारी आधिकारिक पृष्ठों से सत्यापित नहीं हुई।

आलोचना और सुधार: सीमा, प्रमाण, सुझाव

सीमाप्रमाण (स्रोत)सुधार का सुझाव (विश्लेषण)
सिफ़ारिश बाध्यकारी नहींधारा 12: सक्षम प्राधिकारी केवल तीन माह में कार्रवाई की सूचना देता है; असंतोष पर राज्यपाल को विशेष प्रतिवेदनरिपोर्ट पर कार्रवाई न होने पर कारण-सहित विधानसभा में चर्चा अनिवार्य; या अभियोजन-स्वीकृति जैसी शक्ति
मुख्यमंत्री और विधायक बाहरधारा 2(f); वेबसाइट: विधायक/सरपंच/पंच अधिकार-क्षेत्र से बाहरलोकपाल जैसी शर्तों के साथ शीर्ष पदों को भी दायरे में लाना, और निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए अलग प्रक्रिया
दायरा सीमित37वीं रिपोर्ट में लोकायुक्त की माँग: विश्वविद्यालय जैसी और संस्थाएँ अधिकार-क्षेत्र में आएँधारा 2(i)(iv) और 7(1)(iii) की अधिसूचनाओं का विस्तार
संवर्ग और बकायारिपोर्ट: संवर्ग-संख्या बढ़ाने की माँग; 2025 में 3,400 से अधिक बकायाअन्वेषण-शाखा की पदों में वृद्धि, समयबद्ध निस्तारण
नियुक्ति की प्रक्रियाधारा 3: परामर्श मात्र, चयन-समिति नहीं (केंद्र में चयन और खोज-समिति है)परामर्श के बजाय औपचारिक चयन-समिति और पारदर्शी पैनल
पद की रिक्तियाँकार्यकाल-सारणी में लंबे अंतराल (ऊपर तालिका)कार्यकाल समाप्त होने से पहले नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करना (लोकपाल अधिनियम की धारा 5 में तीन माह पहले का नियम है)
केंद्रीय क़ानून के साथ तालमेललोकपाल अधिनियम की धारा 63: राज्य एक वर्ष में लोकायुक्त स्थापित करें; राजस्थान की वेबसाइट पर 1973 का अधिनियम, 31-01-2015 तक संशोधित, उपलब्ध हैराज्य द्वारा अपने क़ानून को लोकपाल अधिनियम के अनुरूप करने पर विचार (बाद के किसी संशोधन की पुष्टि नहीं)

तीसरे कॉलम की बातें विश्लेषण हैं; पहले दो कॉलम की बातें अधिनियम, वेबसाइट और वार्षिक रिपोर्ट से हैं।

समय-रेखा: ओम्बड्समैन से राजस्थान लोकायुक्त तक

  1. 1809

    स्वीडन के संविधान में 'ओम्बड्समैन फ़ॉर जस्टिस' (सचिवालय के इतिहास-पृष्ठ के अनुसार)

  2. 1963

    डॉ. एल.एम. सिंघवी ने 'लोकपाल/लोकायुक्त' नाम दिया; राजस्थान की प्रशासनिक सुधार समिति ने भी ऐसी संस्था सुझाई

  3. 5 जनवरी 1966

    प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (अध्यक्ष मोरारजी देसाई) का गठन; बाद में लोकपाल व लोकायुक्त की सिफ़ारिश

  4. 3 फ़रवरी 1973

    राजस्थान लोकायुक्त तथा उप-लोकायुक्त अध्यादेश प्रभावी

  5. 26 मार्च 1973

    राष्ट्रपति की स्वीकृति; अधिनियम सं. 9/1973

  6. 5 जून 1973 / 28 अगस्त 1973

    पहले उप-लोकायुक्त (के.पी.यू. मेनन) और पहले लोकायुक्त (न्यायमूर्ति आई.डी. दुआ) का कार्यकाल शुरू (कार्यकाल-सारणी)

  7. 16 जनवरी 2014

    लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 प्रवृत्त; राज्यों को एक वर्ष में लोकायुक्त स्थापित करना था (धारा 63)

  8. 31 जनवरी 2015

    राजस्थान अधिनियम का संशोधित पाठ (आधिकारिक वेबसाइट)

  9. 9 मार्च 2021 से 8 मार्च 2026

    न्यायमूर्ति प्रताप कृष्ण लोहरा का कार्यकाल (कार्यकाल-सारणी); 37वीं रिपोर्ट 1 जनवरी 2026 को हस्ताक्षरित

तारीख़ें 2018 और 2021 जैसे प्रश्नों में उदाहरण के रूप में काम आती हैं।

एक नज़र में: राजस्थान लोकायुक्त

राजस्थान लोकायुक्त (अधिनियम 9/1973)

संरचना

  • लोकायुक्त + उप-लोकायुक्त
  • राज्यपाल की नियुक्ति (परामर्श)
  • 5 वर्ष कार्यकाल
  • हटाना: जाँच + सदन प्रस्ताव

क्षेत्र (धारा 2, 7)

  • मंत्री (CM नहीं), सचिव
  • प्रमुख/प्रधान/महापौर
  • निगम, 51% कंपनी, सोसायटी

छूट (धारा 22)

  • मुख्यमंत्री
  • न्यायपालिका व कोर्ट-स्टाफ़
  • महालेखाकार, RPSC
  • निर्वाचन अधिकारी
  • विधानसभा सचिवालय

सीमाएँ

  • 5 वर्ष की समय-सीमा (धारा 8(3))
  • धारा 8(1), 19
  • सिफ़ारिश, बाध्यकारी नहीं

प्रक्रिया

  • शपथ-पत्र के साथ शिकायत
  • धारा 10: निजी जाँच
  • धारा 12: सक्षम प्राधिकारी, 3 माह

मुख्य तथ्य

अधिनियम
राजस्थान लोकायुक्त तथा उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1973 (सं. 9/1973); स्वीकृति 26 मार्च 1973; 3 फ़रवरी 1973 से प्रभावी
पाठ की स्थिति
आधिकारिक वेबसाइट पर 31-01-2015 तक संशोधित पाठ
नियुक्ति
राज्यपाल; मुख्य न्यायाधीश और नेता प्रतिपक्ष से परामर्श पर (धारा 3)
कार्यकाल
5 वर्ष (धारा 5(1)); वेतन HC मुख्य न्यायाधीश/न्यायाधीश के समान
क्षेत्राधिकार (धारा 7)
लोकायुक्त: मंत्री, सचिव, पंचायती राज/नगर निकाय पदाधिकारी, अधिसूचित वर्ग; उप-लोकायुक्त: अन्य
छूट (धारा 22)
HC मुख्य न्यायाधीश/न्यायाधीश, न्यायिक सेवा, न्यायालय-स्टाफ़, महालेखाकार, RPSC, CEC/निर्वाचन आयुक्त/CEO, विधानसभा सचिवालय; मुख्यमंत्री 2(f) से बाहर
समय-सीमा
कार्रवाई के 5 वर्ष के भीतर शिकायत (धारा 8(3))
सक्षम प्राधिकारी की उत्तर-अवधि
3 माह (धारा 12(2))
झूठी शिकायत पर दंड
अधिकतम 3 वर्ष कारावास व जुर्माना (धारा 13)
पहला लोकायुक्त
न्यायमूर्ति आई.डी. दुआ, 28-8-1973 से 27-08-1978
2025 के आँकड़े (रिपोर्ट के अनुसार)
2,296 नए परिवाद; 2,636 निस्तारित; 224 में राहत; 5 में धारा 12 की सिफ़ारिश
अंतिम जाँच
1 अक्टूबर 2026 (अधिनियम-पाठ और आधिकारिक वेबसाइट के पृष्ठों से मिलान; बाद के संशोधन की पुष्टि नहीं)

राजस्थान का पहलू

इस पूरे पृष्ठ का आधार राजस्थान सरकार के लोकायुक्त सचिवालय की आधिकारिक वेबसाइट (lokayukta.rajasthan.gov.in) और उसी पर उपलब्ध अधिनियम, नियम और वार्षिक रिपोर्ट हैं, जिन्हें 1 अक्टूबर 2026 को देखा गया। वेबसाइट के मुख्य पृष्ठ पर 'Last Update: 18-09-2024' लिखा है। नोडल अधिकारी, ज़िलों या कार्यालयों की संख्या यहाँ जानबूझकर नहीं दी गई, क्योंकि उसके लिए तारीख़ वाली अधिसूचना चाहिए। लोकायुक्त का पता और अधिकारी-सूची भी बदल सकती है; परीक्षा में वर्तमान पदधारी का नाम पूछे जाने पर जाँचकर ही लिखें।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • "मुख्यमंत्री भी लोकायुक्त के दायरे में है": ग़लत। अधिनियम की धारा 2(f) में 'मंत्री' से मुख्यमंत्री बाहर हैं।
  • "विधायक और सरपंच लोकायुक्त के क्षेत्र में हैं": आधिकारिक वेबसाइट इन्हें बाहर बताती है। ज़िला परिषद प्रमुख, प्रधान और नगर निकाय अध्यक्ष अंदर हैं, सरपंच-पंच नहीं। इनका भेद साफ़ लिखें।
  • धारा 22 की सूची में सिर्फ़ न्यायाधीश लिख देना: छह श्रेणियाँ हैं (न्यायाधीश, न्यायालय-स्टाफ़, महालेखाकार, RPSC, निर्वाचन अधिकारी, विधानसभा सचिवालय)।
  • सिफ़ारिश को बाध्यकारी आदेश लिखना: धारा 12 में लोकायुक्त सिफ़ारिश करते हैं, सक्षम प्राधिकारी तीन माह में कार्रवाई बताता है।
  • पाँच वर्ष की सीमा (धारा 8(3)) को लोकपाल की सात वर्ष की सीमा (धारा 53) से मिला देना।
  • लोकायुक्त को पुलिस जैसी गिरफ़्तारी या अभियोजन की शक्ति वाला मान लेना: अधिनियम में ऐसी शक्ति नहीं है।
  • वर्तमान पदधारी का नाम या आँकड़े बिना तारीख़ के लिखना: रिपोर्ट के आँकड़े कैलेंडर वर्ष 2025 के हैं और कार्यकाल-सारणी में लोहरा की अवधि 8 मार्च 2026 तक दर्ज है।