लोकपाल (लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013)
लोकपाल क्या है, कैसे बना और कौन चुनता है, किसकी जाँच कर सकता है (प्रधानमंत्री सहित), जाँच और अभियोजन का रास्ता, सीमाएँ, कार्य-स्थिति और राजस्थान के लोकायुक्त से तुलना, अभ्यास-प्रश्नों के साथ।
- लोकपाल
- अधिनियम 2013
- जाँच-शाखा
- लोकायुक्त से तुलना
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II, संघ सरकार और प्रशासनिक संस्थाएँ: "Institutions: UPSC, Election Commission of India, C&AG, Finance Commission, Lokpal, NITI Aayog." इस पृष्ठ पर केंद्र का लोकपाल है; राजस्थान के लोकायुक्त का अलग पृष्ठ है और तुलना दोनों में दी गई है।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- लोकपाल पर सीधा प्रश्न 2013-2024 के संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में नहीं है, इसलिए इस पृष्ठ में नीचे केवल अभ्यास-प्रश्न हैं, PYQ नहीं।
- फिर भी विषय अहम है: 2018 के पेपर में "भारत में प्रशासन में सच्चरित्रता बढ़ाने के उपाय" (10 अंक) जैसे प्रश्न का पूरा उत्तर लोकपाल और लोकायुक्त के बिना अधूरा रहता है, और सिलेबस में लोकपाल का नाम सीधे है (विश्लेषण)।
- राजस्थान के लोकायुक्त पर 2018 और 2021 में सीधे प्रश्न आए हैं। लोकपाल और लोकायुक्त की तुलना उन उत्तरों में अतिरिक्त अंक दिलाती है, इसलिए इस पृष्ठ की तुलना-तालिका ज़रूर पढ़ें।
पहले सरल भाषा में: ऊपर की अदालत-जैसी खिड़की
मान लीजिए दिल्ली के किसी केंद्रीय दफ़्तर का एक अधिकारी किसी ठेके में रिश्वत लेता है। शिकायत सुनने का काम पहले उसी सरकार के भीतर के तंत्र के पास था, यानी जिसकी निगरानी की जानी है, उसी के अधीन वाला तंत्र जाँच करे। जनता को ऐसी स्वतंत्र खिड़की चाहिए थी जो सरकार से अलग हो, जिसकी अध्यक्षता न्यायाधीश स्तर के व्यक्ति के हाथ में हो, और जो इतनी ताक़तवर हो कि मंत्री, सांसद और प्रधानमंत्री तक के विरुद्ध भी शिकायत ले सके, भले ही बहुत सावधानी के साथ। यह खिड़की लोकपाल है। (समझाने के लिए गढ़ा गया दृश्य, किसी वास्तविक मामले का वर्णन नहीं।)
परीक्षा के लिए सटीक परिभाषा: लोकपाल केंद्र के स्तर पर भ्रष्टाचार की शिकायतों की जाँच के लिए लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (2014 का अधिनियम सं. 1) की धारा 3 से स्थापित वैधानिक निकाय (statutory body) है। अधिनियम की प्रस्तावना के अनुसार इसका उद्देश्य 'संघ के लिए लोकपाल और राज्यों के लिए लोकायुक्त' की स्थापना करके कुछ लोक पदाधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच कराना है, और प्रस्तावना यह भी कहती है कि भारत ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCAC) की अभिपुष्टि की है और यह क़ानून उसे अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए है। यह संविधान से बना निकाय नहीं है, संसद के क़ानून से बना है।
अधिनियम दो हिस्सों में है: भाग II केंद्र के लिए लोकपाल (धाराएँ 2 से 62), और भाग III राज्यों के लोकायुक्त (धारा 63), जो राज्यों को एक वर्ष में लोकायुक्त स्थापित करने को कहता है। राजस्थान सचिवालय की वेबसाइट के अनुसार अधिनियम को 1 जनवरी 2014 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और 16 जनवरी 2014 की अधिसूचना से यह प्रवृत्त हुआ; लोकपाल की अपनी वेबसाइट भी 16 जनवरी 2014 बताती है और कहती है कि अधिनियम एक बार (2016 में) संशोधित हुआ है। पृष्ठभूमि: वही वेबसाइट बताती है कि 1966 में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (अध्यक्ष मोरारजी देसाई) ने केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त की सिफ़ारिश की थी; PRS के अनुसार 2011 का विधेयक राज्य सभा से 17 दिसंबर 2013 को पारित हुआ।
संरचना और चयन: कौन बैठता है और कैसे चुना जाता है
धारा 3(2) के अनुसार लोकपाल में एक अध्यक्ष और अधिकतम आठ सदस्य होते हैं, जिनमें से आधे न्यायिक सदस्य हैं। यह भी शर्त है कि कम से कम आधे सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाओं में से हों। अध्यक्ष वह हो सकता है जो भारत का मुख्य न्यायाधीश रहा हो, या सर्वोच्च न्यायालय का वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश हो, या कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति जो गैर-न्यायिक सदस्य की पात्रता रखता हो।
पात्रता में अंतर है: न्यायिक सदस्य सर्वोच्च न्यायालय का वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय का वर्तमान या पूर्व मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए। गैर-न्यायिक सदस्य उच्च सत्यनिष्ठा और असाधारण योग्यता वाला हो और भ्रष्टाचार-निरोधक नीति, लोक प्रशासन, सतर्कता, वित्त (बीमा और बैंकिंग सहित), विधि और प्रबंधन में कम से कम 25 वर्ष का विशेष ज्ञान और अनुभव रखता हो। नियुक्ति के दिन आयु कम से कम 45 वर्ष हो; सांसद या विधायक, नैतिक अधमता के अपराध में दोषसिद्ध व्यक्ति, पंचायत या नगरपालिका का सदस्य और सेवा से हटाया या बर्ख़ास्त किया गया व्यक्ति पात्र नहीं है। लाभ का पद, राजनीतिक दल से जुड़ाव, कारोबार या पेशा नहीं चल सकता (धारा 3(3), 3(4))।
चयन की प्रक्रिया (धारा 4): राष्ट्रपति अध्यक्ष और सदस्यों को चयन-समिति की सिफ़ारिश पर नियुक्त करते हैं। समिति में पाँच लोग हैं: प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश, और पहले चार की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति द्वारा नामित एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता। यही समिति कम से कम सात व्यक्तियों की एक खोज-समिति (Search Committee) बनाती है, जिसमें कम से कम आधे सदस्य उपर्युक्त वर्गों से हों। समिति खोज-समिति के पैनल के बाहर के व्यक्ति पर भी विचार कर सकती है।
कार्यकाल और स्थिति: धारा 6 के अनुसार कार्यकाल पाँच वर्ष है या 70 वर्ष की आयु तक, जो पहले हो। अध्यक्ष का वेतन भारत के मुख्य न्यायाधीश और सदस्यों का सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान है (धारा 7)। पद छोड़ने के बाद वे दोबारा लोकपाल में नहीं आ सकते, कूटनीतिक नियुक्ति या सरकारी लाभ के पद नहीं ले सकते और पाँच वर्ष तक राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या संसद-विधानमंडल का चुनाव नहीं लड़ सकते (धारा 8)। हटाने की प्रक्रिया कड़ी है: कम से कम 100 सांसदों की याचिका पर राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय को संदर्भ भेजते हैं और उसकी जाँच-रिपोर्ट के बाद ही दुर्व्यवहार के आधार पर हटाया जा सकता है (धारा 37)। साथ ही, लोकपाल अपने अध्यक्ष या सदस्यों के विरुद्ध कोई शिकायत नहीं सुन सकता (धारा 37(1))।
नेता प्रतिपक्ष का प्रश्न: मूल पाठ में चयन-समिति में 'लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष' है। PRS के अनुसार दिसंबर 2014 के संशोधन-विधेयक में प्रस्ताव था कि मान्यता-प्राप्त नेता प्रतिपक्ष न होने पर सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता समिति में बैठे, और विधिवेत्ता तीन वर्ष के लिए नामित हो। लोकपाल की वेबसाइट अधिनियम का एक ही संशोधन (2016) बताती है, इसलिए ये बदलाव अधिनियम में जुड़े नहीं माने जा सकते (विश्लेषण)।
लोकपाल: एक नज़र में
| विषय | प्रावधान | धारा |
|---|---|---|
| अध्यक्ष और सदस्य | अध्यक्ष + अधिकतम 8 सदस्य; 50% न्यायिक; 50% SC/ST/OBC/अल्पसंख्यक/महिला | 3(2) |
| नियुक्ति | राष्ट्रपति; पाँच सदस्यीय चयन-समिति (PM, लोकसभा अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, CJI/नामित, विधिवेत्ता) | 4 |
| कार्यकाल | 5 वर्ष या 70 वर्ष आयु तक, जो पहले हो | 6 |
| वेतन | अध्यक्ष: CJI के समान; सदस्य: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान | 7 |
| सचिव व निदेशक | सचिव; जाँच-निदेशक; अभियोजन-निदेशक: अध्यक्ष केंद्र के पैनल में से नियुक्त करते हैं | 10 |
| जाँच-शाखा | जाँच-निदेशक के अधीन; प्रारंभिक जाँच के लिए | 11 |
| अभियोजन-शाखा | अभियोजन-निदेशक के अधीन; विशेष न्यायालय में अभियोजन | 12 |
| व्यय | भारत की संचित निधि पर भारित | 13 |
| हटाना | राष्ट्रपति; सर्वोच्च न्यायालय की जाँच; 100 सांसदों की याचिका | 37 |
2014 के संशोधन-विधेयक की बातें अधिनियम में नहीं जुड़ीं (विश्लेषण)।
जाँच-शाखा और अभियोजन-शाखा: दो हाथ
लोकपाल के काम को दो भागों में बाँटकर याद करें। पहला हाथ जाँच-शाखा (Inquiry Wing) है: धारा 11 के अनुसार लोकपाल को जाँच-निदेशक के नेतृत्व में जाँच-शाखा बनानी होती है, जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत किसी लोक सेवक के कथित अपराध की प्रारंभिक जाँच करती है। जब तक शाखा न बने, केंद्र सरकार अपने मंत्रालयों-विभागों से अधिकारी उपलब्ध कराती है। शाखा के अवर सचिव या उससे ऊपर के अधिकारियों को धारा 27 की शक्तियाँ प्राप्त हैं, यानी सिविल न्यायालय जैसी शक्ति (बुलाना, दस्तावेज़ मँगाना, शपथ-पत्र पर साक्ष्य लेना आदि)।
दूसरा हाथ अभियोजन-शाखा (Prosecution Wing) है (धारा 12): अभियोजन-निदेशक के अधीन, जो लोकपाल के निर्देश पर जाँच-रिपोर्ट के निष्कर्षों के अनुसार विशेष न्यायालय में मामला दाख़िल करता है। यह मामला दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत पुलिस की जाँच-पूर्ण रिपोर्ट माना जाता है (अधिनियम में CrPC की धारा 173 का उल्लेख है, जिसकी जगह अब BNSS की संबंधित धारा पढ़ें)। यहाँ भी जब तक अभियोजन-शाखा न बने, केंद्र सरकार अपने मंत्रालयों से अधिकारी देती है।
ज़मीन पर इन दोनों शाखाओं में देरी रही है। Business Standard/PTI के अनुसार लोकपाल ने जाँच-शाखा 5 सितंबर 2024 को बनाई, जिसकी रूपरेखा तीन पुलिस अधीक्षकों (सामान्य, आर्थिक व बैंकिंग, साइबर) के साथ पूर्ण पीठ ने 30 अगस्त 2024 को मंज़ूर की थी। ThePrint के अनुसार संसदीय समिति (दिसंबर 2025) ने कहा कि इन वैधानिक शाखाओं का संचालन अधूरा है और अभियोजन-शाखा अब तक स्थापित नहीं हुई, जबकि पूर्ण पीठ उसे बनाने का निर्णय ले चुकी है। अभियोजन-शाखा पर The Week (PTI) के अनुसार पूर्ण पीठ ने 5 जून 2025 को निर्णय लिया और शाखा 6 जून 2025 को गठित हुई (अधिसूचना 13 जून 2025); The Wire (मार्च 2026) बताता है कि समिति के अनुसार फ़िलहाल अभियोजन सीबीआई सँभाल रही है। प्रेस-रिपोर्टों में तिथियों की असंगति है, इसलिए परीक्षा में 'पहले जाँच-शाखा (सितंबर 2024); अभियोजन-शाखा का आदेश 2025 में, पर संचालन अधूरा (प्रेस-रिपोर्ट)' लिखना सुरक्षित है।
क्षेत्राधिकार: किसकी जाँच, और प्रधानमंत्री का विशेष मामला
धारा 14(1) का दायरा चौड़ा है। लोकपाल (क) वर्तमान या पूर्व प्रधानमंत्री, (ख) केंद्र के वर्तमान या पूर्व मंत्री, (ग) संसद के किसी सदन के वर्तमान या पूर्व सदस्य, (घ) केंद्र के मामलों से जुड़े समूह क और ख के अधिकारी (वर्तमान या पूर्व), (ङ) समूह ग और घ के अधिकारी, (च) संसद के अधिनियम से बने या केंद्र से पूर्ण या आंशिक रूप से वित्तपोषित या नियंत्रित किसी निकाय, बोर्ड, निगम, कंपनी, सोसायटी या न्यास के अध्यक्ष, सदस्य, अधिकारी और कर्मचारी, (छ) सरकार से पूर्ण या आंशिक वित्तपोषित, और केंद्र द्वारा अधिसूचित वार्षिक आय से अधिक आय वाली सोसायटी या न्यास के निदेशक या अन्य अधिकारी, और (ज) एक वर्ष में दस लाख रुपये से अधिक विदेशी दान (FCRA, 2010 के तहत) पाने वाली संस्थाओं के निदेशक या अधिकारी की जाँच कर सकता है। (च) से (ज) के व्यक्तियों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रयोजन से लोक सेवक माना गया है।
प्रधानमंत्री पर विशेष सुरक्षा-कवच: प्रधानमंत्री के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप लोकपाल के क्षेत्राधिकार में हैं, पर दो शर्तों के साथ। एक, अंतरराष्ट्रीय संबंध, बाहरी और आंतरिक सुरक्षा, लोक-व्यवस्था, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष से जुड़े मामलों में लोकपाल जाँच नहीं करेगा। दो, जाँच शुरू करने पर लोकपाल की पूर्ण पीठ (अध्यक्ष और सभी सदस्य) विचार करे और कम से कम दो-तिहाई सदस्य उसे मंज़ूर करें; ऐसी जाँच बंद कमरे में होगी, और शिकायत खारिज होने पर रिकॉर्ड प्रकाशित नहीं होगा और किसी को उपलब्ध नहीं कराया जाएगा। संसद में कही बात या दिए गए मत के लिए सांसद की जाँच नहीं हो सकती (धारा 14(2), अनुच्छेद 105(2)); जो कोई रिश्वत देने, लेने या षड्यंत्र में सहायता देने जैसे कार्य में फँसा हो, उसकी जाँच भी हो सकती है (धारा 14(3))।
राज्य का पहलू: समूह क और ख के जो अधिकारी पहले केंद्र के मामलों में सेवा में थे पर अब राज्य सरकार या उसके निकायों में काम कर रहे हों, उन पर लोकपाल का क्षेत्राधिकार संबंधित राज्य सरकार की सहमति मिलने के बाद ही होगा (धारा 14 का परंतुक)। इसी तरह राज्य के अधीन सेवारत किसी व्यक्ति पर धारा 14(3) की कार्रवाई भी राज्य की सहमति के बिना नहीं हो सकती।
लोकपाल की जाँच की सीमाएँ
| सीमा | स्वरूप | आधार |
|---|---|---|
| प्रधानमंत्री | अंतरराष्ट्रीय संबंध, सुरक्षा, लोक-व्यवस्था, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष बाहर; पूर्ण पीठ की विचार-प्रक्रिया और 2/3 की स्वीकृति; बंद कमरे में जाँच | धारा 14(1)(क) |
| संसद में कहा/दिया मत | सांसद की जाँच नहीं | धारा 14(2) |
| सशस्त्र बल | सेना/वायुसेना/नौसेना/तटरक्षक अधिनियमों के अधीन आने वाले लोक सेवक 'लोक सेवक' की परिभाषा से बाहर | धारा 2(o) |
| समय | शिकायत सात वर्ष के भीतर | धारा 53 |
| कार्यकाल-अवधि | शिकायत केवल उस अवधि से संबंधित जब व्यक्ति लोक सेवक था | धारा 14, स्पष्टीकरण |
| जाँच आयोग अधिनियम | जिस मामले की शिकायत लोकपाल को हुई, उसे आयोग अधिनियम, 1952 के तहत जाँच के लिए नहीं भेजा जाएगा | धारा 14(4) |
| अपने सदस्य | लोकपाल अपने अध्यक्ष/सदस्यों की शिकायत नहीं सुन सकता; हटाना केवल धारा 37 से | धारा 37(1) |
| न्यायपालिका | धारा 14(1) की सूची में न्यायाधीश नहीं गिनाए गए हैं (सूची की अनुपस्थिति पर आधारित विश्लेषण) | धारा 14(1) |
न्यायपालिका वाली पंक्ति विश्लेषण है: अधिनियम इसे अलग से बाहर नहीं बताता, पर सूची में गिनाता भी नहीं।
कार्यप्रणाली: शिकायत से अभियोजन तक
शुरुआत शिकायत से होती है। अधिनियम में 'शिकायत' का अर्थ है निर्धारित प्रपत्र में की गई ऐसी शिकायत जो किसी लोक सेवक के भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत दंडनीय अपराध का आरोप लगाती हो (धारा 2(1)(ङ))। लोकपाल की वेबसाइट कहती है कि शिकायत का प्रारूप अधिसूचित है और लोकपाल केवल उसी प्रारूप की शिकायतों पर कार्रवाई करेगा। धारा 20(1) के अनुसार शिकायत मिलने पर आगे बढ़ने का निर्णय होने पर लोकपाल या तो जाँच-शाखा या किसी एजेंसी (दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान यानी सीबीआई सहित) से प्रारंभिक जाँच कराता है, या प्रथमदृष्टया मामला बनने पर अन्वेषण कराता है।
प्रारंभिक जाँच में सबसे पहले एक अहम बात: लोकपाल जब प्रारंभिक जाँच का निर्णय करे, तब समूह क, ख, ग, घ के लोक सेवकों की शिकायतें सामान्य या विशेष आदेश से केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) को भेज सकता है। समूह क और ख के मामलों में आयोग प्रारंभिक जाँच की अपनी रिपोर्ट लोकपाल को देता है; समूह ग और घ के मामलों में आयोग अपने क़ानून के अनुसार चलता है (धारा 20(1) के परंतुक)। जाँच-शाखा या एजेंसी लोक सेवक और सक्षम प्राधिकारी की टिप्पणी लेकर 60 दिन में रिपोर्ट देती है (धारा 20(2))।
फिर कम से कम तीन सदस्यों की पीठ रिपोर्ट पर लोक सेवक को सुनकर तय करती है कि प्रथमदृष्टया मामला है या नहीं, और तीन में से एक राह चुनती है: अन्वेषण, सक्षम प्राधिकारी द्वारा विभागीय कार्रवाई, या कार्यवाही बंद करना और शिकायतकर्ता पर धारा 46 की कार्रवाई (धारा 20(3))। प्रारंभिक जाँच सामान्यतः 90 दिन में पूरी हो, और कारण लिखकर 90 दिन और बढ़ाए जा सकते हैं (धारा 20(4))। अन्वेषण छह माह में पूरा होना है और लोकपाल कारण लिखकर छह-छह माह की बढ़ोतरी दे सकता है (धारा 20(5))। अन्वेषण-रिपोर्ट अदालत में भेजते हुए एजेंसी उसकी प्रति लोकपाल को भी देती है, और तीन सदस्यों की पीठ सक्षम प्राधिकारी व लोक सेवक की टिप्पणी लेकर आरोप-पत्र की स्वीकृति देती है या मामला बंद करने का निर्देश देती है, या सक्षम प्राधिकारी को विभागीय कार्रवाई का निर्देश देती है (धारा 20(6), 20(7))।
अभियोजन-स्वीकृति: धारा 23 लोकपाल को अभियोजन की स्वीकृति देने की शक्ति देती है, भले ही दंड प्रक्रिया संहिता या भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में अलग स्वीकृति का प्रावधान हो (अधिनियम में CrPC की धारा 197 का उल्लेख है, जिसकी जगह अब BNSS की संबंधित धारा पढ़ें)। यह शक्ति उन संवैधानिक पदधारियों पर लागू नहीं होती जिन्हें हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया तय है (धारा 23(3))। प्रधानमंत्री, मंत्री या सांसद के मामले में लोकपाल निष्कर्ष के बाद विशेष न्यायालय में मामला दाख़िल कर सकता है और निष्कर्ष की प्रति सक्षम प्राधिकारी को भेजता है (धारा 24); अधिनियम की धारा 2(1)(ग) में प्रधानमंत्री का सक्षम प्राधिकारी लोकसभा, मंत्री का प्रधानमंत्री, और सांसद का संबंधित सदन का सभापति या अध्यक्ष है।
लोकपाल की जाँच का प्रवाह (धारा 20)
शिकायत
निर्धारित प्रपत्र में; भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अपराध का आरोप
प्रारंभिक जाँच
जाँच-शाखा या एजेंसी (सीबीआई सहित); समूह क-घ की शिकायतें CVC को भेजी जा सकती हैं; 60 दिन में रिपोर्ट
पीठ का निर्णय
कम से कम तीन सदस्य; लोक सेवक को सुनवाई; अन्वेषण, विभागीय कार्रवाई या बंद
अन्वेषण
छह माह; छह-छह माह की बढ़ोतरी कारण सहित
स्वीकृति
पीठ आरोप-पत्र की स्वीकृति या बंद करने का निर्देश देती है (धारा 20(7), 23)
विशेष न्यायालय
मुक़दमा एक वर्ष में, अधिकतम दो वर्ष तक (धारा 35); दोषसिद्धि पर नुक़सान का आकलन और वसूली (धारा 39)
शक्तियाँ: लोकपाल क्या कर सकता है
पुलिस-शक्ति की जगह निगरानी: लोकपाल को धारा 25 के तहत दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान (सीबीआई) पर, लोकपाल द्वारा भेजे गए मामलों में, अधीक्षण और निर्देश देने की शक्ति है (पर वह एजेंसी को किसी विशेष तरीक़े से मामला निपटाने को बाध्य नहीं कर सकता)। ऐसे मामले देख रहे सीबीआई अधिकारी का तबादला लोकपाल की मंज़ूरी के बिना नहीं हो सकता (धारा 25(3))। तलाशी और ज़ब्ती की अनुमति (धारा 26), जाँच-शाखा को सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ (धारा 27) और केंद्र या राज्य सरकार के अधिकारियों, संगठनों या जाँच-एजेंसियों की सेवाएँ लेने की छूट (धारा 28) भी है।
धन और पद पर असर: भ्रष्टाचार की आय के बारे में विश्वास का कारण हो तो लोकपाल या उसका अधिकृत अधिकारी संपत्ति की अस्थायी कुर्की 90 दिन के लिए कर सकता है (धारा 29) और 30 दिन के भीतर अभियोजन-शाखा से विशेष न्यायालय में पुष्टि की अर्ज़ी दिलवानी होती है (धारा 30)। जाँच के दौरान पद पर रहना जाँच को प्रभावित करने या सबूत से छेड़छाड़ का ख़तरा हो, तो लोकपाल केंद्र सरकार से समूह घ और उससे ऊपर के लोक सेवक के स्थानांतरण या निलंबन की सिफ़ारिश कर सकता है, जिसे केंद्र सामान्यतः मानेगा और न मानने पर लिखित कारण देगा (धारा 32)। दस्तावेज़ों को नष्ट या परिवर्तित होने या संपत्ति को हस्तांतरित होने से रोकने के निर्देश भी वह दे सकता है (धारा 33)। दोषसिद्धि पर विशेष न्यायालय सरकारी ख़ज़ाने के नुक़सान का आकलन करके उसकी वसूली का आदेश दे सकता है (धारा 39)।
पारदर्शिता और संपत्ति-घोषणा: लोकपाल को अपनी वेबसाइट पर लंबित और निस्तारित शिकायतों की संख्या दिखानी होती है (धारा 20(10)) और हर वर्ष राष्ट्रपति को रिपोर्ट देनी होती है, जिसे संसद के दोनों सदनों के सामने उस ज्ञापन के साथ रखा जाता है जिसमें बताया जाए कि लोकपाल की सलाह जहाँ नहीं मानी गई वहाँ क्यों (धारा 48)। धारा 49 के अनुसार जहाँ किसी अन्य क़ानून के तहत सेवा-प्रदान या शिकायत-निवारण की अपील में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के निष्कर्ष आए हों, वहाँ लोकपाल अंतिम अपील-प्राधिकारी है।
संपत्ति की घोषणा: मूल धारा 44 में हर लोक सेवक को पदभार के 30 दिन के भीतर अपनी, पति या पत्नी और आश्रित बच्चों की संपत्ति और देनदारियों का ब्यौरा देना था, और हर वर्ष 31 जुलाई तक वार्षिक विवरणी। लोकपाल और लोकायुक्त (संशोधन) अधिनियम, 2016 (अधिनियम 37/2016; स्वीकृति 29 जुलाई 2016) ने धारा 44 बदल दी: अब अधिनियम के प्रारंभ से हर लोक सेवक 'विहित रूप और ढंग' से संपत्ति और देनदारियाँ घोषित करेगा, और यह संशोधन 16 जनवरी 2014 से लागू माना गया। विहित नियमों के ब्यौरे यहाँ सत्यापित नहीं किए गए हैं। जानबूझकर या अनुचित कारण से संपत्ति न घोषित करने या भ्रामक जानकारी देने पर अघोषित संपत्ति को, जब तक अन्यथा सिद्ध न हो, भ्रष्ट साधनों से अर्जित माना जाएगा (धारा 45)।
दुरुपयोग से बचाव: झूठी, तुच्छ या तंग करने वाली शिकायत पर अधिकतम एक वर्ष का कारावास और अधिकतम एक लाख रुपये तक जुर्माना (धारा 46); पर सद्भाव से की गई शिकायत इसके दायरे में नहीं आती। जिसके विरुद्ध शिकायत हो, उसे लोकपाल के सामने बचाव के लिए अनुरोध पर क़ानूनी सहायता मिलती है (धारा 55), और सद्भाव में किए गए काम पर लोकपाल पर वाद नहीं चल सकता (धारा 51)।
काम की स्थिति: प्रेस-रिपोर्टों के अनुसार (सावधानी से पढ़ें)
| बिंदु | रिपोर्ट के अनुसार | स्रोत |
|---|---|---|
| प्रारंभिक जाँच के आदेश | 289 मामलों में प्रारंभिक जाँच का आदेश (शुरुआत से सितंबर 2025 तक; अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट) | The Wire, 26 अक्टूबर 2025 (The Hindu का हवाला) |
| अभियोजन-स्वीकृति | 7 मामलों में (उसी रिपोर्ट के अनुसार) | The Wire, 26 अक्टूबर 2025 |
| शिकायतें, 2023-24 और 2024-25 | क्रमशः 166 और 292; अप्रैल-दिसंबर 2025 में 318 पंजीकृत | The Wire, 23 मार्च 2026 (संसदीय समिति की रिपोर्ट के हवाले से) |
| जाँच-शाखा की स्थिति | संसदीय समिति: स्वीकृत 70 पद, पर निदेशक की नियुक्ति नहीं; शाखा अभी पूरी तरह चालू नहीं | The Wire, 23 मार्च 2026 |
| प्रारूप-सख़्ती | लोकपाल केवल अधिसूचित प्रारूप की शिकायत पर कार्रवाई करेगा | लोकपाल की वेबसाइट |
ये आँकड़े लोकपाल की वेबसाइट या वार्षिक रिपोर्ट से नहीं, प्रेस-रिपोर्टों से हैं; पूर्ववर्ती वर्षों के आँकड़े अलग-अलग रिपोर्टों में अलग मिलते हैं, इसलिए परीक्षा-उत्तर में आँकड़ा बिना स्रोत और वर्ष के न लिखें। विश्लेषण: शिकायतों का आँकड़ा (हज़ारों से सैकड़ों तक) बताता है कि शिकायत-प्रारूप की सख़्ती और जागरूकता का असर पड़ा हो सकता है, पर कारण स्रोतों से सिद्ध नहीं।
लोकपाल बनाम राजस्थान का लोकायुक्त
लोकपाल (अधिनियम 2013)
स्थितिकेंद्र के स्तर पर वैधानिक निकाय; संसद का क़ानून
संरचनाअध्यक्ष + अधिकतम 8 सदस्य; 50% न्यायिक
नियुक्तिराष्ट्रपति; चयन-समिति और खोज-समिति
कार्यकाल5 वर्ष या 70 वर्ष आयु
सर्वोच्च कार्यपालकप्रधानमंत्री दायरे में, शर्तों सहित
जाँच-अभियोजनजाँच-शाखा, अभियोजन-शाखा; अभियोजन-स्वीकृति
समय-सीमा7 वर्ष (धारा 53)
झूठी शिकायतअधिकतम 1 वर्ष और 1 लाख रुपये तक जुर्माना
राजस्थान लोकायुक्त (अधिनियम 1973)
स्थितिराज्य के स्तर पर वैधानिक संस्था; राज्य विधानमंडल का क़ानून
संरचनालोकायुक्त + एक या अधिक उप-लोकायुक्त
नियुक्तिराज्यपाल; मुख्य न्यायाधीश और नेता प्रतिपक्ष से परामर्श मात्र
कार्यकाल5 वर्ष
सर्वोच्च कार्यपालकमुख्यमंत्री 'मंत्री' की परिभाषा से बाहर
जाँच-अभियोजनसिफ़ारिश सक्षम प्राधिकारी को; असंतोष पर राज्यपाल को विशेष प्रतिवेदन
समय-सीमा5 वर्ष (धारा 8(3))
झूठी शिकायतअधिकतम 3 वर्ष और जुर्माना
राजस्थान की पंक्तियाँ अधिनियम की 31-01-2015 तक संशोधित आधिकारिक प्रति से हैं।
आलोचना और सुधार: सीमा, प्रमाण, सुझाव
| सीमा | प्रमाण (स्रोत) | सुधार का सुझाव (विश्लेषण) |
|---|---|---|
| शाखाओं का देर से बनना | जाँच-शाखा 5 सितंबर 2024, अभियोजन-शाखा का आदेश 2025; संसदीय समिति: संचालन अधूरा (प्रेस-रिपोर्टें) | शाखाओं का समयबद्ध संचालन और नियमित पदों पर भर्ती |
| जाँच के लिए एजेंसियों पर निर्भरता | धारा 20(1): सीबीआई सहित एजेंसी से जाँच; The Wire: अभियोजन फ़िलहाल सीबीआई के पास | लोकपाल की अपनी जाँच-क्षमता मज़बूत करना |
| प्रधानमंत्री पर शर्तें | धारा 14(1)(क): सुरक्षा आदि बाहर; 2/3 पूर्ण पीठ | शर्तों की स्पष्ट परिभाषा, ताकि 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का अत्यधिक विस्तार न हो |
| शिकायत-प्रारूप की सख़्ती | लोकपाल की वेबसाइट: केवल अधिसूचित प्रारूप में शिकायत पर कार्रवाई | सहायता-डेस्क और भाषा-सरल मार्गदर्शन |
| पद की रिक्ति | 27 मई 2022 से फ़रवरी 2024 तक कार्यवाहक अध्यक्ष (The Tribune, LiveLaw) | धारा 5 के अनुसार कार्यकाल-समाप्ति से तीन माह पहले प्रक्रिया शुरू हो |
| चयन में विपक्ष की भूमिका | मान्यता-प्राप्त नेता प्रतिपक्ष न हो तो अधिनियम का पाठ चुप; 2014 का विधेयक अधिनियम नहीं बना (PRS; लोकपाल वेबसाइट) | स्पष्ट प्रावधान (विश्लेषण) |
| आँकड़ों में पारदर्शिता | धारा 20(10): वेबसाइट पर लंबित/निस्तारित संख्या; वेबसाइट के मुख पृष्ठ पर आँकड़े नहीं मिले | नियमित और अद्यतन सांख्यिकी का प्रकाशन |
पहले दो कॉलम तथ्य-आधारित (स्रोत सहित) हैं; तीसरे कॉलम की बातें विश्लेषण हैं।
समय-रेखा: ARC से लोकपाल की शाखाओं तक
5 जनवरी 1966
प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन; बाद में लोकपाल/लोकायुक्त की सिफ़ारिश (राजस्थान सचिवालय का इतिहास-पृष्ठ)
17 दिसंबर 2013
2011 का विधेयक राज्य सभा से पारित (PRS)
1 जनवरी 2014
राष्ट्रपति की स्वीकृति; अधिनियम सं. 1/2014 (राजपत्र)
16 जनवरी 2014
अधिनियम प्रवृत्त (लोकपाल की वेबसाइट; राजपत्र 2016)
29 जुलाई 2016
संशोधन अधिनियम 37/2016: धारा 44
मार्च 2019
पहले अध्यक्ष की नियुक्ति (न्यायमूर्ति पी.सी. घोष)
27 मई 2022
घोष का कार्यकाल पूरा; कार्यवाहक अध्यक्ष
27 फ़रवरी 2024
न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर और छह सदस्य नियुक्त
5 सितंबर 2024
जाँच-शाखा का गठन
जून 2025
अभियोजन-शाखा का गठन-आदेश (The Week/PTI); संचालन अधूरा
एक नज़र में: लोकपाल
लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013
संरचना
- अध्यक्ष + अधिकतम 8 सदस्य
- 50% न्यायिक
- 50% SC/ST/OBC/अल्पसंख्यक/महिला
चयन (धारा 4)
- PM, लोकसभा अध्यक्ष
- नेता प्रतिपक्ष, CJI/नामित
- विधिवेत्ता; खोज-समिति (7)
क्षेत्र (धारा 14)
- PM (शर्तों सहित)
- मंत्री, सांसद
- समूह क-घ
- FCRA > 10 लाख
शाखाएँ
- जाँच-शाखा (धारा 11)
- अभियोजन-शाखा (धारा 12)
समय-सीमाएँ
- 60 दिन रिपोर्ट
- 90+90 दिन प्रारंभिक जाँच
- 6 माह अन्वेषण
- मुक़दमा 1-2 वर्ष
- शिकायत 7 वर्ष
मुख्य तथ्य
- अधिनियम
- लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (सं. 1/2014); स्वीकृति 1 जनवरी 2014; प्रवृत्त 16 जनवरी 2014
- संशोधन
- 2016 में एक बार (अधिनियम 37/2016; स्वीकृति 29 जुलाई 2016; धारा 44)
- संरचना
- अध्यक्ष + अधिकतम आठ सदस्य; आधे न्यायिक; कम से कम आधे SC/ST/OBC/अल्पसंख्यक/महिला (धारा 3)
- चयन-समिति
- PM (अध्यक्ष), लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, CJI या नामित, एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता (धारा 4)
- कार्यकाल
- 5 वर्ष या 70 वर्ष की आयु (धारा 6)
- PM पर जाँच
- सुरक्षा/अंतरराष्ट्रीय संबंध/लोक-व्यवस्था/परमाणु ऊर्जा/अंतरिक्ष बाहर; पूर्ण पीठ, 2/3 स्वीकृति; बंद कमरे में (धारा 14(1)(क))
- प्रारंभिक जाँच
- 60 दिन में रिपोर्ट; सामान्यतः 90 दिन, कारण सहित 90 दिन और (धारा 20)
- अन्वेषण
- 6 माह; 6-6 माह की बढ़ोतरी (धारा 20(5))
- विशेष न्यायालय में मुक़दमा
- 1 वर्ष, अधिकतम 2 वर्ष (धारा 35)
- शिकायत की समय-सीमा
- 7 वर्ष (धारा 53)
- राज्यों के लोकायुक्त
- एक वर्ष में स्थापना का दायित्व (धारा 63)
- जाँच-शाखा का गठन
- 5 सितंबर 2024 (प्रेस-रिपोर्ट)
- वर्तमान अध्यक्ष (लोकपाल वेबसाइट)
- न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर; 27 फ़रवरी 2024 को नियुक्त; पदधारी बदल सकते हैं, परीक्षा से पहले जाँच लें
- अंतिम जाँच
- 1 अक्टूबर 2026 (अधिनियम-पाठ और आधिकारिक वेबसाइट से मिलान; प्रेस-आधारित आँकड़े ऊपर चिह्नित)
राजस्थान का पहलू
राजस्थान का अपना क़ानून लोकपाल से चार दशक पहले का है: राजस्थान लोकायुक्त तथा उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1973 (अधिनियम सं. 9/1973), जिसका 31-01-2015 तक संशोधित पाठ लोकायुक्त सचिवालय की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध है (1 अक्टूबर 2026 को देखा गया)। सचिवालय का इतिहास-पृष्ठ लोकपाल अधिनियम की स्वीकृति और 16 जनवरी 2014 की प्रवर्तन-तिथि भी बताता है। लोकपाल अधिनियम की धारा 63 हर राज्य से एक वर्ष में लोकायुक्त स्थापित कराने को कहती है; राजस्थान की वेबसाइट पर 1973 का अधिनियम ही उपलब्ध है, और उसके बाद के संशोधन की पुष्टि नहीं हो सकी। राज्य के अधीन कार्यरत समूह क/ख अधिकारियों पर लोकपाल का क्षेत्राधिकार राज्य की सहमति से ही चलता है (धारा 14 का परंतुक)। विस्तार के लिए लोकायुक्त का अलग पृष्ठ देखें।
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- "प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे से बाहर है": ग़लत। प्रधानमंत्री दायरे में हैं, पर सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय संबंध, लोक-व्यवस्था, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष के मामलों में नहीं, और पूर्ण पीठ की 2/3 स्वीकृति के साथ।
- लोकपाल को संवैधानिक निकाय लिखना: यह संसद के अधिनियम से बना वैधानिक निकाय है।
- 1 जनवरी 2014 (राष्ट्रपति की स्वीकृति) और 16 जनवरी 2014 (प्रवर्तन) को आपस में बदल देना।
- चयन-समिति में सदस्यों की संख्या ग़लत लिखना: पाँच सदस्य हैं (PM, लोकसभा अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, CJI या नामित, विधिवेत्ता)। खोज-समिति अलग है (कम से कम सात)।
- प्रारंभिक जाँच के 60 दिन (रिपोर्ट की समय-सीमा) और 90 दिन (पूर्ण प्रारंभिक जाँच की सामान्य अवधि) को मिला देना।
- लोकपाल और राजस्थान के लोकायुक्त की समय-सीमाएँ उलट देना: लोकपाल में सात वर्ष, राजस्थान लोकायुक्त में पाँच वर्ष।
- अधिनियम के 2014 के संशोधन-विधेयक को क़ानून मान लेना: लोकपाल की वेबसाइट एक ही संशोधन (2016) बताती है।
- प्रेस-रिपोर्टों के आँकड़ों (289 जाँच, 7 स्वीकृतियाँ) को आधिकारिक आँकड़ा बताना: उत्तर में 'प्रेस-रिपोर्ट के अनुसार' लिखें।
कार्य-उदाहरण: समय-सीमा की गिनती (कल्पित, केवल समझाने के लिए)
हल सहित उदाहरणशिकायत से मुक़दमे तक कितना समय?
दिया है
- यह उदाहरण समझाने के लिए गढ़ा गया है; मामला, तारीख़ें और व्यक्ति वास्तविक नहीं हैं।
- मान लें लोकपाल को एक समूह 'क' अधिकारी के विरुद्ध शिकायत मिलती है और वह प्रारंभिक जाँच का आदेश देता है।
- मान लें हर चरण में अधिकतम सामान्य अवधि लगती है, और अन्वेषण में एक बार छह माह की बढ़ोतरी होती है।
- 1चरण 1: प्रारंभिक जाँच (धारा 20(4)) सामान्यतः 90 दिन, यानी लगभग 3 माह। कारण लिखकर 90 दिन और मिल सकते हैं: अधिकतम 180 दिन, लगभग 6 माह (जाँच-शाखा की 60 दिन की रिपोर्ट इसी अवधि के भीतर आती है)।
- 2चरण 2: अन्वेषण (धारा 20(5)) आदेश की तारीख़ से 6 माह। एक बार 6 माह की बढ़ोतरी मानें तो 6 + 6 = 12 माह।
- 3चरण 3: स्वीकृति के बाद विशेष न्यायालय (धारा 35) मुक़दमा एक वर्ष (12 माह) में पूरा होना चाहिए; कारण दर्ज करके कुल मिलाकर अधिकतम दो वर्ष (24 माह) तक।
- 4चरण 4: जोड़ें सामान्य मार्ग: 3 + 6 + 12 = 21 माह। लंबा मार्ग: 6 + 12 + 24 = 42 माह, यानी साढ़े तीन वर्ष। (अन्वेषण की बढ़ोतरी की कोई ऊपरी सीमा अधिनियम में नहीं है, इसलिए यह गणना केवल एक बार की बढ़ोतरी मानकर है।)
निष्कर्ष: अधिनियम की घड़ियाँ जोड़ने पर भी शिकायत से निर्णय तक का सामान्य मार्ग लगभग पौने दो वर्ष और लंबा मार्ग साढ़े तीन वर्ष बैठता है। परीक्षा में यह दिखाता है कि 'समयबद्ध' प्रक्रिया भी कई चरणों की है, और असली देरी तब बनती है जब ये समय-सीमाएँ बढ़ती हैं।
केस स्टडी: क़ानून से काम तक की यात्रा (2014 से 2025)
केस स्टडीलोकपाल की संस्थागत तैयारी: समय-रेखा
क़ानून जनवरी 2014 में लागू हुआ, पर संस्था के ज़मीन पर काम करने में बरसों लगे। नीचे की समय-रेखा अधिनियम के राजपत्र, 2016 के संशोधन के राजपत्र, लोकपाल की वेबसाइट और प्रमुख प्रेस-रिपोर्टों (LiveLaw, The Tribune, Business Standard/PTI, The Week/PTI, The Wire) से जोड़ी गई है।
- 16 जनवरी 2014
- अधिनियम प्रवृत्त (राजपत्र; लोकपाल की वेबसाइट)।
- 29 जुलाई 2016
- संशोधन अधिनियम 37/2016: धारा 44 (संपत्ति की घोषणा) बदली, 16 जनवरी 2014 से प्रभावी (राजपत्र)।
- मार्च 2019
- पहले अध्यक्ष न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष की नियुक्ति (विकिपीडिया के अनुसार 19 मार्च 2019, शपथ 23 मार्च 2019)। The Week (PTI) के अनुसार लोकपाल मार्च 2019 में नियुक्तियों के बाद ही कार्य करने लगा।
- 27 मई 2022
- घोष का कार्यकाल पूरा; The Tribune/LiveLaw के अनुसार इसके बाद क़रीब दो वर्ष कार्यवाहक अध्यक्ष (न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार मोहंती)।
- 27 फ़रवरी 2024
- राष्ट्रपति ने न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर को अध्यक्ष और छह सदस्य नियुक्त किए (LiveLaw, The Tribune); लोकपाल की वेबसाइट इन्हीं को दर्शाती है।
- 5 सितंबर 2024
- जाँच-शाखा का गठन (Business Standard/PTI; ThePrint)।
- जून 2025
- अभियोजन-शाखा: पूर्ण पीठ का निर्णय 5 जून और गठन-आदेश 6 जून (The Week/PTI)। पर ThePrint (दिसंबर 2025) के अनुसार संसदीय समिति ने शाखा को अब तक स्थापित नहीं बताया और The Wire (मार्च 2026) के अनुसार अभियोजन फ़िलहाल सीबीआई सँभालती है; रिपोर्टों में स्थिति एक-सी नहीं है।
सीख
क़ानून बनना आधी जीत है; संस्था को चलाने वाले पदों, शाखाओं और कर्मचारियों की नियुक्ति भी उतनी ही अहम है। उत्तर में 'क़ानून 2014, काम 2019, शाखाएँ 2024-25' की यह तीन-चरणों वाली पंक्ति आलोचना को तथ्य से जोड़ती है (विश्लेषण)।
अभ्यास प्रश्न (मौलिक; संकलित पेपरों में इस विषय का कोई PYQ नहीं है)
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
लोकपाल की संरचना बताइए।
आदर्श उत्तर
अध्यक्ष और अधिकतम आठ सदस्य; आधे न्यायिक और कम से कम आधे SC/ST/OBC/अल्पसंख्यक/महिला वर्ग से (धारा 3)।
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
लोकपाल की चयन-समिति में कौन-कौन होते हैं?
आदर्श उत्तर
प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, मुख्य न्यायाधीश या नामित न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता (धारा 4)।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
लोकपाल के अधिकार-क्षेत्र में प्रधानमंत्री की स्थिति स्पष्ट कीजिए।
आदर्श उत्तर
प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में हैं, पर शर्तों के साथ। अंतरराष्ट्रीय संबंध, बाहरी और आंतरिक सुरक्षा, लोक-व्यवस्था, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष के मामलों की जाँच नहीं होगी। जाँच पर पूर्ण पीठ विचार करेगी और दो-तिहाई सदस्य स्वीकृति देंगे। जाँच बंद कमरे में होगी; खारिज होने पर रिकॉर्ड प्रकाशित नहीं होगा (धारा 14)।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
लोकपाल की जाँच-प्रक्रिया के चरण लिखिए।
आदर्श उत्तर
शिकायत मिलने पर लोकपाल जाँच-शाखा या एजेंसी से प्रारंभिक जाँच कराता है; 60 दिन में रिपोर्ट आती है। तीन सदस्यों की पीठ सुनकर प्रथमदृष्टया मामला तय करती है। फिर अन्वेषण छह माह में पूरा होता है, पीठ अभियोजन-स्वीकृति देती है, और विशेष न्यायालय एक से दो वर्ष में मुक़दमा निपटाता है (धारा 20, 23, 35)।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
लोकपाल और राजस्थान के लोकायुक्त में दो प्रमुख अंतर बताइए।
आदर्श उत्तर
पहला, नियुक्ति: लोकपाल प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन-समिति की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं; राजस्थान के लोकायुक्त को राज्यपाल मुख्य न्यायाधीश और नेता प्रतिपक्ष से परामर्श पर नियुक्त करते हैं। दूसरा, शीर्ष कार्यपालक: प्रधानमंत्री शर्तों सहित लोकपाल के दायरे में हैं, जबकि मुख्यमंत्री राजस्थान अधिनियम की 'मंत्री' की परिभाषा से बाहर हैं।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
लोकपाल की कार्यप्रणाली की सीमाओं का विश्लेषण करते हुए सुधार सुझाइए।
आदर्श उत्तर
लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 16 जनवरी 2014 से प्रवृत्त हुआ, पर पहले अध्यक्ष की नियुक्ति मार्च 2019 में हुई। प्रेस-रिपोर्टों के अनुसार जाँच-शाखा सितंबर 2024 में बनी और अभियोजन-शाखा का आदेश 2025 में हुआ; संसदीय समिति ने संचालन अधूरा बताया।
प्रधानमंत्री पर विशेष शर्तें, सात वर्ष की समय-सीमा (धारा 53) और केवल अधिसूचित प्रारूप की शिकायत भी व्यवहार में सीमा बनती हैं। जाँच के लिए एजेंसियों पर निर्भरता है।
सुधार: शाखाओं में नियमित भर्ती, कार्यकाल-समाप्ति से तीन माह पहले नियुक्ति-प्रक्रिया शुरू करना, शिकायतकर्ता-सहायता, और लंबित-निस्तारित मामलों के आँकड़ों का नियमित प्रकाशन।
उत्तर कैसे लिखें (10 अंक, 100 शब्द)
भूमिका
प्रश्न: "लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के प्रमुख प्रावधानों की चर्चा करते हुए इसकी कार्य-स्थिति का मूल्यांकन कीजिए।" पहले वाक्य में: अधिनियम 2013 (सं. 1/2014), प्रवृत्त 16 जनवरी 2014; केंद्र में लोकपाल, राज्यों में लोकायुक्त (धारा 63)।
मुख्य भाग
- संरचना: अध्यक्ष + अधिकतम 8 सदस्य; 50% न्यायिक; 50% SC/ST/OBC/अल्पसंख्यक/महिला; चयन-समिति (PM, लोकसभा अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, CJI, विधिवेत्ता)
- क्षेत्र: PM (शर्तों सहित), मंत्री, सांसद, समूह क-घ, FCRA > 10 लाख रुपये की संस्थाएँ
- प्रक्रिया: जाँच-शाखा और अभियोजन-शाखा; 60 दिन, 90+90 दिन, 6 माह; अभियोजन-स्वीकृति; विशेष न्यायालय (1-2 वर्ष)
- शक्तियाँ: सीबीआई पर अधीक्षण, 90 दिन की कुर्की, निलंबन/स्थानांतरण की सिफ़ारिश, संपत्ति-घोषणा (2016 का संशोधन)
- मूल्यांकन: क़ानून 2014, अध्यक्ष मार्च 2019, जाँच-शाखा सितंबर 2024, अभियोजन-शाखा का आदेश 2025 (संचालन अधूरा; प्रेस-रिपोर्ट)
निष्कर्ष
निष्कर्ष: ढाँचा सशक्त है, पर संस्था की साख समय पर नियुक्तियों, शाखाओं के संचालन और पारदर्शी आँकड़ों से बनेगी; राज्यों के लोकायुक्त के साथ तालमेल भी चाहिए।
अतिरिक्त मूल्य
- राजस्थान के लोकायुक्त (अधिनियम 1973) से एक पंक्ति की तुलना
- 2016 के संशोधन (धारा 44) का उल्लेख
- आँकड़े प्रेस-रिपोर्ट के रूप में, वर्ष सहित
त्वरित पुनरावृत्ति
- लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (सं. 1/2014): स्वीकृति 1-1-2014; प्रवृत्त 16-1-2014; एक संशोधन 2016 (धारा 44)
- लोकपाल: वैधानिक निकाय; अध्यक्ष + अधिकतम 8 सदस्य; 50% न्यायिक; 50% SC/ST/OBC/अल्पसंख्यक/महिला
- चयन (धारा 4): PM, लोकसभा अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, CJI/नामित, विधिवेत्ता; खोज-समिति कम से कम 7
- कार्यकाल 5 वर्ष या 70 वर्ष आयु; वेतन: अध्यक्ष CJI के, सदस्य SC न्यायाधीश के समान; हटाना: 100 सांसद + सर्वोच्च न्यायालय की जाँच
- PM: दायरे में, पर सुरक्षा/अंतरराष्ट्रीय संबंध/लोक-व्यवस्था/परमाणु/अंतरिक्ष बाहर; पूर्ण पीठ 2/3; बंद कमरे में
- समय-सीमाएँ: 60 दिन (रिपोर्ट); 90+90 दिन (प्रारंभिक जाँच); 6 माह (अन्वेषण); 1-2 वर्ष (मुक़दमा); 7 वर्ष (शिकायत)
- शक्तियाँ: सीबीआई पर अधीक्षण (धारा 25); अभियोजन-स्वीकृति (धारा 23); कुर्की 90 दिन (धारा 29); स्थानांतरण/निलंबन की सिफ़ारिश (धारा 32)
- झूठी शिकायत: अधिकतम 1 वर्ष और 1 लाख रुपये (धारा 46); राजस्थान लोकायुक्त में 3 वर्ष (धारा 13)
- जाँच-शाखा 5 सितंबर 2024; अभियोजन-शाखा का आदेश 2025, संचालन अधूरा (प्रेस-रिपोर्ट); पहले अध्यक्ष मार्च 2019; खानविलकर 27 फ़रवरी 2024
- धारा 63: राज्य एक वर्ष में लोकायुक्त स्थापित करें; राजस्थान का 1973 का अधिनियम पहले से
याद रखने योग्य शब्द
- लोकपाल
- धारा 14
- धारा 20
- चयन-समिति
- जाँच-शाखा
- अभियोजन-शाखा
- धारा 63
- 2016 का संशोधन