मुख्य सामग्री पर जाएं

RTI अधिनियम 2005: धारा 18 से 20, आयोग की शक्तियाँ, प्रथम और द्वितीय अपील, दंड

3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (विधि): "Right to Information Act, 2005: Sections 1-20." इस पृष्ठ पर धारा 18 (आयोग की शक्तियाँ और कार्य, शिकायत), धारा 19 (अपील) और धारा 20 (दंड) हैं। यह पृष्ठ परीक्षा की तैयारी के लिए है, क़ानूनी सलाह नहीं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • उपलब्ध छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में इन तीन धाराओं से कोई सीधा प्रश्न नहीं आया। फिर भी "अपील की प्रक्रिया" और "दंड" ऐसे विषय हैं जिन पर 5 या 10 अंक का प्रश्न सहज बनता है, क्योंकि अधिनियम का पूरा तंत्र यहीं तक आकर पूरा होता है।
  • इस पृष्ठ में सबसे अधिक संख्याएँ हैं: 30 दिन, 90 दिन, 45 दिन, 250 रुपये प्रतिदिन, 25,000 रुपये। संख्या-प्रधान 2 अंक के प्रश्न में एक भी अंक ग़लत हुआ तो पूरे अंक जाते हैं, इसलिए तालिकाओं से इन्हें पक्का करें।
  • शिकायत (धारा 18) और अपील (धारा 19) का अंतर परीक्षा का पुराना जाल है। दोनों के आधार, मंच और परिणाम अलग हैं। तुलना-तालिका इसी अंतर को साफ़ करती है।

पहले सरल भाषा में

मान लीजिए आपने रेल टिकट-खिड़की पर जाकर कोई जानकारी माँगी और बाबू ने कहा "बाद में आना"। अब आपके पास तीन रास्ते हैं। पहला, उसी दफ़्तर के बड़े साहब के पास जाइए। दूसरा, यदि वहाँ भी बात न बने तो उससे ऊपर की स्वतंत्र संस्था के पास जाइए। तीसरा, यदि आपको खिड़की पर आवेदन ही जमा नहीं करने दिया गया, तो सीधे उस स्वतंत्र संस्था के पास शिकायत कीजिए। सूचना का अधिकार अधिनियम ने ठीक यही तीन रास्ते बनाए हैं: प्रथम अपील, द्वितीय अपील और शिकायत।

पर केवल रास्ते काफ़ी नहीं होते। यदि अधिकारी को सज़ा का डर न हो तो वह दिन-दिन आवेदन टालता रहेगा। इसलिए धारा 20 में एक सीधा नियम है: हर दिन की देरी पर जुर्माना, जो अधिकारी पर लगता है। और सुबूत का बोझ भी अधिकारी पर है कि वह साबित करे कि उसने जायज़ तरीक़े से काम किया।

इन तीन धाराओं को याद रखने का आसान क्रम है: धारा 18 बताती है आयोग क्या सुन सकता है और उसके पास कैसी ताक़त है; धारा 19 बताती है अपील कब, कहाँ और कितने दिन में; धारा 20 बताती है ग़लती करने वाले अधिकारी पर क्या दंड लगेगा।

धारा 18: आयोग में शिकायत (Complaint)

धारा 18(1) के अनुसार केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग का कर्तव्य (duty) है कि वह किसी भी व्यक्ति की शिकायत प्राप्त करे और उसकी जाँच करे, यदि वह व्यक्ति इन छह में से किसी स्थिति में हो। (क) वह लोक सूचना अधिकारी को आवेदन ही नहीं दे पाया, या तो इसलिए कि अधिनियम के अधीन कोई अधिकारी नियुक्त ही नहीं हुआ, या इसलिए कि सहायक लोक सूचना अधिकारी ने उसका आवेदन या अपील आगे भेजने के लिए लेने से मना कर दिया। (ख) उसे माँगी गई सूचना तक पहुँच देने से इनकार कर दिया गया। (ग) अधिनियम में तय समय-सीमा में उसे कोई उत्तर ही नहीं मिला। (घ) उससे ऐसी फ़ीस माँगी गई जिसे वह अनुचित मानता है। (ङ) उसे लगता है कि उसे अधूरी, भ्रामक या झूठी सूचना दी गई है। (च) सूचना या अभिलेखों तक पहुँच पाने या माँगने से जुड़ा कोई अन्य विषय।

ध्यान दें कि छह आधारों की सूची में "अन्य कोई भी विषय" वाला अंतिम खंड इसे बहुत व्यापक बना देता है। दूसरी ओर धारा 18(2) बताती है कि आयोग तभी जाँच शुरू करेगा जब वह संतुष्ट हो कि जाँच के लिए उचित आधार (reasonable grounds) हैं। यानी हर शिकायत पर जाँच अपने आप शुरू नहीं होती। आयोग पहले यह देखता है कि मामले में दम है या नहीं।

धारा 18(3) आयोग को जाँच करते समय वही शक्तियाँ देती है जो सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के अधीन किसी सिविल न्यायालय को मुक़दमे की सुनवाई में होती हैं। ये शक्तियाँ छह बातों पर हैं: (क) व्यक्तियों को समन भेजकर बुलाना और शपथ पर मौखिक या लिखित साक्ष्य देने तथा दस्तावेज़ या वस्तुएँ पेश करने को बाध्य करना; (ख) दस्तावेज़ों का प्रकटीकरण और निरीक्षण (discovery and inspection) माँगना; (ग) शपथ-पत्र पर साक्ष्य लेना; (घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से कोई लोक अभिलेख या उसकी प्रतिलिपि मँगवाना; (ङ) गवाहों या दस्तावेज़ों की जाँच के लिए समन जारी करना; और (च) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए।

सबसे असरदार प्रावधान धारा 18(4) है। इसके अनुसार किसी अन्य संसदीय या राज्य-विधान की असंगत बात होते हुए भी आयोग शिकायत की जाँच के दौरान उस लोक प्राधिकारी के नियंत्रण में रखा अधिनियम के दायरे का कोई भी अभिलेख देख सकता है, और ऐसा कोई अभिलेख "किसी भी आधार पर" उससे रोका नहीं जा सकता। इसका अर्थ यह है कि धारा 8 की छूटें नागरिक के विरुद्ध ढाल हो सकती हैं, पर आयोग के विरुद्ध नहीं: आयोग फ़ाइल देखकर तय कर सकता है कि छूट सचमुच लागू होती है या नहीं। (यह अंतिम वाक्य विश्लेषण है, अधिनियम का पाठ नहीं।)

धारा 19: अपील (Appeal)

धारा 19(1) प्रथम अपील का प्रावधान करती है। जो व्यक्ति धारा 7(1) या 7(3)(क) में बताए समय में निर्णय न पाए, या लोक सूचना अधिकारी के निर्णय से असंतुष्ट हो, वह समय-सीमा समाप्त होने से या निर्णय की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर उस लोक प्राधिकारी में लोक सूचना अधिकारी से वरिष्ठ पद के अधिकारी (officer senior in rank) को अपील कर सकता है। परंतुक के अनुसार वह अधिकारी तीस दिन बीत जाने के बाद भी अपील स्वीकार कर सकता है, यदि वह संतुष्ट हो कि अपीलार्थी को समय पर अपील करने से पर्याप्त कारण (sufficient cause) ने रोका था।

धारा 19(2) तृतीय पक्षकार के लिए है। यदि लोक सूचना अधिकारी ने धारा 11 के अधीन तृतीय पक्ष की सूचना प्रकट करने का आदेश दिया है, तो संबंधित तृतीय पक्षकार को अपील आदेश की तिथि से तीस दिन में करनी होती है। ध्यान रहे कि यहाँ तीस दिन आदेश की तारीख़ से गिने जाते हैं।

धारा 19(3) द्वितीय अपील का प्रावधान करती है। प्रथम अपील के निर्णय के विरुद्ध दूसरी अपील केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग में उस तिथि से नब्बे दिन में हो सकती है जब निर्णय होना चाहिए था या वह वास्तव में प्राप्त हुआ। यहाँ भी परंतुक है कि पर्याप्त कारण दिखाने पर आयोग नब्बे दिन के बाद अपील स्वीकार कर सकता है। धारा 19 में द्वितीय अपील के आगे किसी तीसरी अपील का प्रावधान नहीं है।

धारा 19(4) कहती है कि यदि जिस निर्णय के विरुद्ध अपील है वह तृतीय पक्ष की सूचना से जुड़ा है, तो आयोग उस तृतीय पक्षकार को सुनवाई का उचित अवसर देगा। धारा 19(5) अधिनियम की सबसे नागरिक-हितैषी पंक्तियों में है: किसी भी अपील कार्यवाही में अस्वीकृति को उचित सिद्ध करने का भार (onus) उस लोक सूचना अधिकारी पर है जिसने अनुरोध अस्वीकार किया। यानी नागरिक को यह नहीं दिखाना कि इनकार ग़लत था, अधिकारी को दिखाना है कि इनकार सही था।

धारा 19(6) निपटारे की समय-सीमा देती है: उप-धारा (1) या (2) के अधीन अपील का निपटारा प्राप्ति के तीस दिन के भीतर, या ऐसी बढ़ाई गई अवधि में होगा जो अपील दाख़िल करने की तिथि से कुल पैंतालीस दिन से अधिक न हो, और बढ़ाने के कारण लिखित में दर्ज करने होंगे। ध्यान दें कि धारा 19(6) की यह समय-सीमा शब्दों में प्रथम अपील और तृतीय पक्षकार की अपील पर लागू होती है। द्वितीय अपील के निपटारे की कोई वैधानिक समय-सीमा इन तीन धाराओं में नहीं दी गई।

धारा 19(7) कहती है कि आयोग का निर्णय बाध्यकारी (binding) होगा। धारा 19(9) के अनुसार आयोग अपने निर्णय की सूचना, अपील के अधिकार सहित, शिकायतकर्ता और लोक प्राधिकारी दोनों को देगा, और धारा 19(10) के अनुसार आयोग अपील का निर्णय विहित प्रक्रिया से करेगा।

धारा 19(8): आयोग अपने निर्णय में क्या-क्या आदेश दे सकता है

धाराशक्तिसरल अर्थ
19(8)(क)(i)माँगे गए रूप में सूचना तक पहुँच दिलानानागरिक जिस रूप (प्रति, निरीक्षण, डिस्क आदि) में माँगे उसी में
19(8)(क)(ii)सूचना अधिकारी की नियुक्ति करानायदि अधिकारी ही नहीं है तो नियुक्ति का निर्देश
19(8)(क)(iii)कुछ सूचना या सूचना की श्रेणियाँ प्रकाशित करानास्वतः प्रकटीकरण बढ़ाना
19(8)(क)(iv)अभिलेख सँभालने, प्रबंधन और नष्ट करने की रीति में बदलावरिकॉर्ड-रखरखाव सुधारना
19(8)(क)(v)कर्मचारियों को RTI का प्रशिक्षण बढ़ानाप्रशिक्षण
19(8)(क)(vi)धारा 4(1)(ख) के अनुसार वार्षिक रिपोर्ट देनारिपोर्ट
19(8)(ख)शिकायतकर्ता को हुई हानि की क्षतिपूर्ति करानामुआवज़ा (compensation)
19(8)(ग)अधिनियम में दिए दंड लगानाधारा 20 के दंड
19(8)(घ)आवेदन अस्वीकार करनाआयोग कह सकता है कि माँग टिकती नहीं

(क) के छह उप-खंड एक सूत्र में: पहुँच, नियुक्ति, प्रकाशन, अभिलेख, प्रशिक्षण, रिपोर्ट।

धारा 20: दंड (Penalties)

धारा 20(1) लोक सूचना अधिकारी पर दंड की व्यवस्था करती है, पर एक शर्त के साथ। आयोग शिकायत या अपील तय करते समय इस राय में हो कि अधिकारी ने बिना किसी उचित कारण (without any reasonable cause) के इनमें से कोई काम किया है: आवेदन लेने से इनकार किया; धारा 7(1) में दिए समय में सूचना नहीं दी; सद्भाव के बिना (malafidely) अनुरोध अस्वीकार किया; जानबूझकर ग़लत, अधूरी या भ्रामक सूचना दी; माँगी गई सूचना नष्ट कर दी; या सूचना देने में किसी भी तरह बाधा डाली। तब आयोग के लिए दंड लगाना अनिवार्य भाषा में है: "shall impose", यानी "लगाएगा", "लगा सकता है" नहीं।

दंड की मात्रा: जब तक आवेदन लिया नहीं जाता या सूचना दी नहीं जाती, प्रतिदिन 250 रुपये, पर कुल दंड 25,000 रुपये से अधिक नहीं। इसका अर्थ है कि अधिकतम सीमा 100 दिन की देरी पर आ जाती है (100 × 250 = 25,000), उसके बाद की देरी पर जुर्माना और नहीं बढ़ता।

दो परंतुक अधिकारी को सुरक्षा भी देते हैं और बोझ भी। पहला, दंड लगाने से पहले अधिकारी को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा। दूसरा, यह सिद्ध करने का भार कि उसने उचित और तत्परता से (reasonably and diligently) काम किया, स्वयं लोक सूचना अधिकारी पर है। यहाँ भी वही सिद्धांत है जो धारा 19(5) में था: सबूत देने की ज़िम्मेदारी अधिकारी की है।

धारा 20(2) एक अलग क़दम है। यदि आयोग की राय है कि अधिकारी ने उन्हीं चूकों में से कोई बिना उचित कारण और लगातार (persistently) की है, तो आयोग उसके विरुद्ध उस पर लागू सेवा-नियमों के अधीन अनुशासनिक कार्रवाई की अनुशंसा (recommend) करेगा। ध्यान दें कि यहाँ आयोग स्वयं अनुशासनिक दंड नहीं देता, केवल अनुशंसा करता है; निर्णय सेवा-नियमों के अनुसार नियोक्ता का रहता है।

शिकायत (धारा 18) और अपील (धारा 19) की तुलना

धारा 18 शिकायत

किसके सामनेकेवल केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग

समय-सीमाधारा 18 में कोई दिन-संख्या नहीं है

आधारछह स्थितियाँ, जिनमें आवेदन जमा न हो पाना भी शामिल

आयोग का रुख़उचित आधार पर जाँच शुरू कर सकता है, 18(2)

अभिलेख देखना18(4): कोई अभिलेख रोका नहीं जा सकता

क्षतिपूर्ति और दंडधारा 20 के दंड निर्णय के समय लगते हैं

धारा 19 अपील

किसके सामनेप्रथम अपील: वरिष्ठ अधिकारी; द्वितीय अपील: आयोग

समय-सीमाप्रथम अपील 30 दिन; द्वितीय अपील 90 दिन; तृतीय पक्षकार 30 दिन

आधारनिर्णय न मिलना या निर्णय से असंतोष

आयोग का रुख़निर्णय करता है, बाध्यकारी, 19(7)

अभिलेख देखना19(8) की शक्तियों से आदेश

क्षतिपूर्ति और दंड19(8)(ख) और (ग) में स्पष्ट

सूचना माँगने से अंतिम निर्णय तक का रास्ता

  1. आवेदन

    लोक सूचना अधिकारी को, धारा 6

  2. निपटारा

    30 दिन में निर्णय, धारा 7

  3. प्रथम अपील

    30 दिन के भीतर वरिष्ठ अधिकारी को [19(1)]

  4. प्रथम अपील का निर्णय

    30 दिन में, कारण लिखकर अधिकतम कुल 45 दिन [19(6)]

  5. द्वितीय अपील

    90 दिन के भीतर सूचना आयोग में [19(3)]

  6. आयोग का आदेश

    बाध्यकारी [19(7)], धारा 19(8) की शक्तियाँ, दंड धारा 20

शिकायत (धारा 18) सीधे आयोग में जा सकती है, इस क्रम से बाहर।

मुख्य तथ्य

प्रथम अपील
निर्णय या समय-सीमा समाप्ति से 30 दिन में, वरिष्ठ अधिकारी को [धारा 19(1)]
तृतीय पक्षकार की अपील
धारा 11 के आदेश की तिथि से 30 दिन [धारा 19(2)]
द्वितीय अपील
90 दिन में केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग में [धारा 19(3)]
अपील निपटारा
30 दिन, कारण लिखकर कुल अधिकतम 45 दिन [धारा 19(6)]
अस्वीकृति सिद्ध करने का भार
लोक सूचना अधिकारी पर [धारा 19(5)]
दंड
250 रुपये प्रतिदिन, कुल 25,000 रुपये से अधिक नहीं [धारा 20(1)]
लगातार चूक
अनुशासनिक कार्रवाई की अनुशंसा [धारा 20(2)]
स्रोत-पाठ
संशोधित अधिनियम, 18 नवंबर 2025 तक

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • शिकायत और अपील को एक ही चीज़ मान लेना। शिकायत धारा 18 है, अपील धारा 19; मंच, आधार और परिणाम अलग हैं।
  • द्वितीय अपील के लिए भी 30 दिन लिख देना। प्रथम अपील 30 दिन और द्वितीय अपील 90 दिन है।
  • अपील के निपटारे की सीमा में 45 दिन को स्थायी समय मान लेना। मूल सीमा 30 दिन है; 45 दिन तक कारण लिखकर बढ़ाया जा सकता है।
  • दंड को "250 रुपये प्रतिदिन, अधिकतम 25,000 रुपये" की जगह उल्टा लिखना, या इसे "लगा सकता है" कहना जबकि पाठ में "shall impose" है।
  • यह कहना कि दंड बिना सुने लग जाता है। सुनवाई का उचित अवसर पहला परंतुक है।
  • धारा 20(2) में आयोग को अनुशासनिक दंड देने वाला बताना। वह केवल अनुशंसा करता है।
  • आयोग के निर्णय को सलाह मात्र समझना। धारा 19(7) के अनुसार वह बाध्यकारी है।