मुख्य सामग्री पर जाएं
पेपर III · इकाई III · भाग ख (Law)

कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम, 2013: धारा 1 से 4

अधिनियम की पृष्ठभूमि, धारा 1 से 4: लैंगिक उत्पीड़न की परिभाषा, कार्यस्थल का दायरा और आंतरिक समिति का गठन।

  • धारा 1 से 4
  • धारा 2(n)
  • पीड़ित महिला
  • कार्यस्थल
  • आंतरिक समिति
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (Law, section-exact): "Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013: Sections 1-9, 11-20." इस पृष्ठ में धारा 1 से 4 है: संक्षिप्त नाम और विस्तार, परिभाषाएँ (धारा 2), लैंगिक उत्पीड़न का निषेध (धारा 3) और आंतरिक समिति का गठन (धारा 4)। धारा 5 से 9 अगले पृष्ठ में और धारा 11 से 20 उसके बाद वाले पृष्ठ में हैं। सिलेबस में धारा 10 (conciliation) शामिल नहीं है।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2013 से 2024 के उपलब्ध पेपरों में इस अधिनियम से एक ही प्रश्न मिलता है: 2021 (पेपर III) में 2 अंक का प्रश्न, जिसमें 'लैंगिक उत्पीड़न' का अर्थ पूछा गया। उसका उत्तर इसी पृष्ठ की धारा 2(n) में है, इसलिए यह पृष्ठ सबसे पहले पढ़ें।
  • Law की परीक्षा में परिभाषा वाले प्रश्न आते हैं: पीड़ित महिला, कार्यस्थल, नियोक्ता और आंतरिक समिति जैसे पद इसी पृष्ठ पर हैं। हर पद के साथ अधिनियम का अंग्रेज़ी शब्द कोष्ठक में दिया है, ताकि उत्तर में सटीक शब्द लिखे जा सकें।
  • व्यवहार इकाई के 'कार्यस्थल पर लैंगिक मुद्दे' पृष्ठ में इस अधिनियम का संक्षिप्त परिचय है। यहाँ वही तथ्य धारा-दर-धारा विस्तार से हैं, इसलिए दोनों पृष्ठ एक-दूसरे के पूरक हैं।

अधिनियम क्यों बना: पृष्ठभूमि और उद्देश्य

एक सरकारी दफ़्तर की कल्पना कीजिए जिसमें आग से बचाव का कोई नियम नहीं है। सब जानते हैं कि आग लग सकती है, पर किसकी क्या ज़िम्मेदारी है, यह तय नहीं। कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न के मामले में लंबे समय तक यही स्थिति रही। PIB की विज्ञप्ति के अनुसार पहले भारतीय दंड संहिता की आपराधिक धाराएँ और सर्वोच्च न्यायालय के 1997 के विशाखा दिशानिर्देश (Vishakha guidelines) एक ढाँचा देते थे, पर सरकार ने ऐसा विस्तृत क़ानून आवश्यक समझा जो कार्यस्थल से जुड़े हर पहलू को समेटे। इसी आवश्यकता से कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 [The Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013] बना। इसे आम बोलचाल में POSH अधिनियम (Prevention of Sexual Harassment) कहा जाता है।

अधिनियम की प्रस्तावना (preamble) उसका तर्क साफ़ बताती है। उसके अनुसार लैंगिक उत्पीड़न से महिला के संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में दिए समानता के अधिकार, अनुच्छेद 21 में गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार और किसी भी पेशे या व्यवसाय को करने के अधिकार का उल्लंघन होता है, और इस अधिकार में उत्पीड़न से मुक्त सुरक्षित वातावरण भी शामिल है। प्रस्तावना यह भी दर्ज करती है कि महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव की समाप्ति संबंधी अभिसमय (CEDAW) को भारत सरकार ने 25 जून 1993 को अनुसमर्थित किया था और यह अधिनियम उस अभिसमय को प्रभावी बनाने के लिए है। PIB की विज्ञप्ति में अनुच्छेद 19(1)(g) का भी उल्लेख है, जो पेशा करने की स्वतंत्रता से जुड़ा है।

अधिनियम की तीन बातें नाम में ही छिपी हैं, और परीक्षा में इनका फ़र्क़ पूछा जा सकता है। निवारण (Prevention) का अर्थ है घटना होने से पहले वातावरण को सुरक्षित बनाना, जैसे नियोक्ता की जागरूकता और प्रशिक्षण की ज़िम्मेदारी। प्रतिषेध (Prohibition) का अर्थ है उत्पीड़न पर स्पष्ट रोक, जो धारा 3(1) में है। प्रतितोष (Redressal) का अर्थ है घटना होने पर शिकायत, जाँच और सज़ा या राहत की व्यवस्था, जो समितियों के माध्यम से मिलती है (विश्लेषण)।

धारा 1: संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ

धारा 1 अधिनियम का परिचय देती है। उपधारा (1) के अनुसार इसका नाम 'कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013' है (Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013)। उपधारा (2) कहती है कि यह पूरे भारत में लागू होता है (It extends to the whole of India)। उपधारा (3) के अनुसार यह उस तिथि से लागू होगा जो केंद्र सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे।

तिथियों में उलझन न हो, इसके लिए यह क्रम याद रखें: अधिनियम सं. 14 सन् 2013 है और राजपत्र में उसकी तिथि 22 अप्रैल 2013 दी गई है, जब राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली। वह लागू 9 दिसंबर 2013 से हुआ, जब केंद्र सरकार की अधिसूचना (S.O. 3606(E)) से प्रारंभ की तिथि तय हुई। PIB की 2026 की विज्ञप्ति में भी अधिनियम के साथ 9 दिसंबर 2013 की तिथि आती है। इसलिए 'पारित/स्वीकृत: 22 अप्रैल 2013' और 'लागू: 9 दिसंबर 2013' अलग-अलग लिखें।

धारा 2: परिभाषाओं का नक्शा

धारा 2 में अंग्रेज़ी वर्णमाला के क्रम में (a) से (p) तक सोलह परिभाषाएँ हैं। इन्हें रटने की जगह समूहों में बाँटकर समझना आसान है। पहला समूह लोगों का है: पीड़ित महिला, प्रत्यर्थी, कर्मचारी, नियोक्ता और घरेलू कामगार। दूसरा समूह जगह का है: कार्यस्थल और असंगठित क्षेत्र। तीसरा समूह सरकारी तंत्र का है: उपयुक्त सरकार और ज़िला अधिकारी। चौथा समूह समितियों का है: आंतरिक समिति, स्थानीय समिति, अध्यक्ष, पीठासीन अधिकारी और सदस्य। पाँचवाँ समूह स्वयं अपराध-व्यवहार की परिभाषा है: लैंगिक उत्पीड़न। 'विहित' (prescribed) का अर्थ केवल इतना है कि बात अधिनियम के अधीन बने नियमों में तय होगी।

ध्यान रखें कि परिभाषाएँ अधिनियम के भीतर ही लागू होती हैं और 'जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो' जैसी शर्त के साथ आती हैं (unless the context otherwise requires)। नीचे की तालिका में सभी सोलह परिभाषाएँ अधिनियम के शब्दों के साथ संक्षेप में दी हैं।

धारा 2 की सोलह परिभाषाएँ एक नज़र में

खंडपद (अंग्रेज़ी शब्द)अर्थ (संक्षेप में)
2(a)पीड़ित महिला (aggrieved woman)कार्यस्थल के संदर्भ में किसी भी आयु की महिला, नियोजित या नहीं, जो प्रत्यर्थी द्वारा लैंगिक उत्पीड़न के किसी कृत्य का आरोप लगाती है; आवास या घर के संदर्भ में किसी भी आयु की ऐसी महिला जो उस घर में नियोजित है
2(b)उपयुक्त सरकार (appropriate Government)जो कार्यस्थल केंद्र सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन द्वारा स्थापित, स्वामित्व वाला, नियंत्रित या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष निधि से पूर्णतः या सारतः वित्तपोषित हो, उसके लिए केंद्र सरकार; ऐसा ही कार्यस्थल राज्य सरकार का हो तो राज्य सरकार; शेष कार्यस्थलों के लिए अपने क्षेत्र में राज्य सरकार
2(c)अध्यक्ष (Chairperson)धारा 7(1) के अधीन नामित स्थानीय समिति का अध्यक्ष
2(d)ज़िला अधिकारी (District Officer)धारा 5 के अधीन अधिसूचित अधिकारी
2(e)घरेलू कामगार (domestic worker)वह महिला जो नक़द या वस्तु के रूप में पारिश्रमिक पर, सीधे या एजेंसी के माध्यम से, अस्थायी, स्थायी, अंशकालिक या पूर्णकालिक आधार पर किसी घर का काम करने के लिए नियोजित है; नियोक्ता के परिवार का सदस्य इसमें शामिल नहीं
2(f)कर्मचारी (employee)कार्यस्थल पर किसी काम के लिए नियमित, अस्थायी, तदर्थ या दैनिक मज़दूरी के आधार पर, सीधे या ठेकेदार सहित किसी अभिकर्ता के माध्यम से नियोजित व्यक्ति, चाहे पारिश्रमिक के लिए हो या नहीं, या स्वैच्छिक आधार पर; इसमें सहकर्मी, संविदा कामगार, परिवीक्षाधीन, प्रशिक्षु और शिक्षु शामिल
2(g)नियोक्ता (employer)सरकार या स्थानीय प्राधिकारी के विभाग आदि में उसका प्रमुख या उपयुक्त सरकार द्वारा आदेश से निर्दिष्ट अन्य अधिकारी; अन्य कार्यस्थल में प्रबंधन, पर्यवेक्षण और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी व्यक्ति; इनके कर्मचारियों के प्रति संविदागत दायित्व निभाने वाला व्यक्ति; घर के संदर्भ में घरेलू कामगार को नियोजित करने वाला या उसके नियोजन से लाभ पाने वाला व्यक्ति या परिवार
2(h)आंतरिक समिति (Internal Committee)धारा 4 के अधीन गठित आंतरिक परिवाद समिति (Internal Complaints Committee)
2(i)स्थानीय समिति (Local Committee)धारा 6 के अधीन गठित समिति
2(j)सदस्य (Member)आंतरिक समिति या स्थानीय समिति का सदस्य
2(k)विहित (prescribed)अधिनियम के अधीन बने नियमों द्वारा विहित
2(l)पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer)धारा 4(2) के अधीन नामित आंतरिक परिवाद समिति का पीठासीन अधिकारी
2(m)प्रत्यर्थी (respondent)वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध पीड़ित महिला ने धारा 9 के अधीन शिकायत की है
2(n)लैंगिक उत्पीड़न (sexual harassment)पाँच प्रकार के अवांछित कृत्य या व्यवहार, प्रत्यक्ष या विवक्षित रूप से: शारीरिक संपर्क और प्रस्ताव; यौन अनुग्रह की माँग या प्रार्थना; यौन अर्थ वाली टिप्पणियाँ; अश्लील सामग्री दिखाना; यौन प्रकृति का कोई अन्य अवांछित शारीरिक, मौखिक या अमौखिक आचरण
2(o)कार्यस्थल (workplace)छह प्रकार के स्थान (अलग तालिका में)
2(p)असंगठित क्षेत्र (unorganised sector)कार्यस्थल के संदर्भ में व्यक्तियों या स्वनियोजित कामगारों के स्वामित्व वाला उद्यम, जो माल के उत्पादन या विक्रय या किसी भी प्रकार की सेवा में लगा है, और जहाँ कामगार नियोजित हों तो उनकी संख्या दस से कम है

आधार: अधिनियम सं. 14 सन् 2013 की धारा 2, India Code का पाठ और राज्य सभा सचिवालय का संकलन। खंड 2(a), (f), (g), (o) की व्याख्या PIB की विज्ञप्ति में भी है।

पीड़ित महिला: सुरक्षा का दायरा बहुत चौड़ा है

'पीड़ित महिला' की परिभाषा इस अधिनियम का सबसे अहम दरवाज़ा है, क्योंकि शिकायत का अधिकार इसी से तय होता है। धारा 2(a)(i) के अनुसार कार्यस्थल के संदर्भ में किसी भी आयु की ऐसी महिला, 'चाहे वह नियोजित हो या नहीं' (whether employed or not), जो आरोप लगाती है कि प्रत्यर्थी ने उसके साथ लैंगिक उत्पीड़न का कृत्य किया, पीड़ित महिला है। यानी दफ़्तर में काम से आई महिला आगंतुक, प्रशिक्षण के लिए आई छात्रा या अस्थायी रूप से मौजूद कोई भी महिला शिकायत कर सकती है, भले वह वहाँ की कर्मचारी न हो। PIB की 25 मार्च 2026 की विज्ञप्ति भी यही कहती है कि कोई भी महिला, जो किसी कार्यस्थल पर है, चाहे उसकी भूमिका कुछ भी हो, अधिनियम के दायरे में आती है।

धारा 2(a)(ii) एक अलग स्थिति के लिए है: आवास या घर (dwelling place or house) के संदर्भ में पीड़ित महिला वह है जो ऐसे घर में नियोजित है, यानी घरेलू कामगार। इन दोनों उपखंडों का फ़र्क़ परीक्षा में काम आता है: कार्यस्थल के संदर्भ में 'नियोजित हो या न हो' दोनों चलता है, जबकि घर के संदर्भ में महिला का वहाँ नियोजित होना आवश्यक है।

एक बात और। अधिनियम पुरुष कर्मचारी की शिकायत को इस ढाँचे में नहीं सँभालता, क्योंकि 'पीड़ित महिला' की परिभाषा और अधिनियम का शीर्षक, दोनों महिला के लिए हैं। इसलिए उत्तर में 'अधिनियम महिलाओं के संरक्षण के लिए है' लिखना सुरक्षित है।

कर्मचारी और नियोक्ता: कौन किसके प्रति ज़िम्मेदार

धारा 2(f) के 'कर्मचारी' में पक्की नौकरी वाले ही नहीं गिने गए। नियमित, अस्थायी, तदर्थ (ad hoc) और दैनिक मज़दूरी वाले सब आते हैं, चाहे वे सीधे नियुक्त हों या ठेकेदार जैसे अभिकर्ता (agent) के ज़रिए, और मुख्य नियोक्ता को इसका पता हो या न हो। पारिश्रमिक मिलना भी आवश्यक नहीं: स्वैच्छिक काम करने वाले भी शामिल हैं। सहकर्मी, संविदा कामगार, परिवीक्षाधीन (probationer), प्रशिक्षु (trainee) और शिक्षु (apprentice) का नाम पाठ में स्वयं लिखा है। PIB के अनुसार इसका उद्देश्य यह है कि सुरक्षा पाने के लिए नियोक्ता पर आर्थिक निर्भरता कोई शर्त न रहे।

'नियोक्ता' (employer) की परिभाषा तय करती है कि समिति बनाने की ज़िम्मेदारी किस पर आएगी। सरकार या स्थानीय प्राधिकारी के किसी विभाग, कार्यालय, शाखा या इकाई में नियोक्ता उसका प्रमुख है, या ऐसा अन्य अधिकारी जिसे उपयुक्त सरकार या स्थानीय प्राधिकारी आदेश से निर्दिष्ट करे। निजी या अन्य कार्यस्थल में नियोक्ता वह व्यक्ति है जो कार्यस्थल के प्रबंधन, पर्यवेक्षण और नियंत्रण का उत्तरदायी है; व्याख्या के अनुसार 'प्रबंधन' में वह व्यक्ति, बोर्ड या समिति भी शामिल है जो संगठन की नीतियाँ बनाती और चलाती है। जहाँ कर्मचारियों के प्रति संविदागत दायित्व कोई अन्य व्यक्ति निभाता है, वह भी नियोक्ता है। घर के संदर्भ में नियोक्ता वह व्यक्ति या परिवार है जो घरेलू कामगार को नियोजित करता है या उसके नियोजन से लाभ पाता है, कामगार की संख्या, अवधि या काम की प्रकृति चाहे जो हो।

इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि एक सरकारी विभाग में समिति गठित करने का दायित्व उस इकाई के प्रमुख (या आदेश से निर्दिष्ट अधिकारी) पर है। यही व्यक्ति आगे धारा 12, 13 और 19 में बार-बार आएगा, जब समिति की सिफ़ारिशें लागू करनी होंगी और सुरक्षित वातावरण देना होगा।

धारा 2(o): 'कार्यस्थल' के छह रूप

उपखंडकौन सी जगह (अधिनियम के शब्दों का आशय)एक सरल उदाहरण (कल्पित)
(i)सरकार या स्थानीय प्राधिकारी या सरकारी कंपनी, निगम या सहकारी समिति द्वारा स्थापित, स्वामित्व वाला, नियंत्रित या पूर्णतः या सारतः वित्तपोषित कोई विभाग, संगठन, उपक्रम, संस्थान, कार्यालय, शाखा या इकाईज़िला कलेक्ट्रेट का कोई अनुभाग
(ii)कोई निजी संगठन, उपक्रम, संस्था, न्यास, गैर-सरकारी संगठन या सेवा प्रदाता जो वाणिज्यिक, व्यावसायिक, व्यावृत्तिक, शैक्षिक, मनोरंजन, औद्योगिक, स्वास्थ्य सेवा या वित्तीय गतिविधियों में लगा हो, उत्पादन, आपूर्ति, विक्रय, वितरण या सेवा सहितनिजी कोचिंग संस्थान या कपड़े की फ़ैक्टरी
(iii)अस्पताल या नर्सिंग होमएक निजी नर्सिंग होम
(iv)खेल संस्थान, स्टेडियम, खेल परिसर या प्रतियोगिता या खेल स्थल, आवासीय हो या नहीं, जो प्रशिक्षण, खेल या उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए प्रयुक्त होप्रशिक्षण के लिए प्रयुक्त स्टेडियम
(v)कर्मचारी द्वारा नियोजन से उत्पन्न या उसके दौरान जाया गया कोई भी स्थान, जिसमें नियोक्ता द्वारा उस यात्रा के लिए उपलब्ध कराया गया परिवहन शामिल हैऑफ़िस के काम से बाहर का दौरा या कंपनी की गाड़ी
(vi)आवास या घर (dwelling place or house)जिस घर में घरेलू कामगार काम करती है

आधार: अधिनियम की धारा 2(o), India Code का पाठ; PIB (25 मार्च 2026) भी इसे व्यापक परिभाषा बताती है। तीसरा स्तंभ समझाने के लिए गढ़े गए कल्पित उदाहरण हैं।

धारा 2(n): लैंगिक उत्पीड़न का अर्थ (सबसे अहम परिभाषा)

रोज़मर्रा की भाषा में किसी बात का 'बुरा लगना' और 'अपराध होना' अलग-अलग माने जाते हैं। अधिनियम इन दोनों के बीच एक साफ़ कसौटी रखता है: अवांछित (unwelcome) होना। यानी वही व्यवहार उत्पीड़न है जो सामने वाली महिला को स्वीकार्य नहीं है। धारा 2(n) के अनुसार 'लैंगिक उत्पीड़न' में निम्न में से कोई एक या अधिक अवांछित कृत्य या व्यवहार शामिल हैं, चाहे वे प्रत्यक्ष हों या विवक्षित (whether directly or by implication): शारीरिक संपर्क और प्रस्ताव (physical contact and advances); यौन अनुग्रह की माँग या प्रार्थना (a demand or request for sexual favours); यौन अर्थ वाली टिप्पणियाँ (making sexually coloured remarks); अश्लील सामग्री दिखाना (showing pornography); और यौन प्रकृति का कोई अन्य अवांछित शारीरिक, मौखिक या अमौखिक आचरण (any other unwelcome physical, verbal or non-verbal conduct of sexual nature)।

इस परिभाषा के तीन शब्द ध्यान से पढ़ें। पहला, 'includes' (शामिल हैं): यह खुली परिभाषा है, इसलिए पाँचवाँ खंड एक प्रकार से सब छूटे हुए व्यवहारों को पकड़ता है। दूसरा, 'any one or more' (कोई एक या अधिक): पाँचों में से एक भी पूरा होना काफ़ी है, सब होना ज़रूरी नहीं। तीसरा, 'whether directly or by implication' (प्रत्यक्ष या विवक्षित): बात सीधे न कही गई हो, इशारे से कही गई हो, तब भी गिनी जा सकती है। पाँचवें खंड में 'अमौखिक' (non-verbal) शब्द है, जिससे इशारे, घूरना या बिना शब्द के भेजा गया संकेत जैसे व्यवहार भी विचार में आते हैं। ये उदाहरण समझाने के लिए हैं, पाठ में इनके नाम नहीं हैं (विश्लेषण)।

परीक्षा के 2 अंक वाले प्रश्न में पाँचों खंड एक पंक्ति में गिनाना पर्याप्त है, और अंत में 'धारा 2(n)' लिख देना चाहिए। 5 अंक के प्रश्न में इसके साथ धारा 3(2) की परिस्थितियाँ और एक कल्पित उदाहरण जोड़ा जा सकता है।

धारा 2(n) के पाँच खंड: कल्पित कार्यालय-उदाहरण के साथ

खंडअधिनियम का शब्दआशयकल्पित उदाहरण
(i)physical contact and advancesअवांछित शारीरिक संपर्क और प्रस्तावफ़ाइल देते समय बार-बार जानबूझकर हाथ छूना
(ii)a demand or request for sexual favoursयौन अनुग्रह की माँग या प्रार्थनाकाम के बदले व्यक्तिगत 'मेल-जोल' का आग्रह
(iii)making sexually coloured remarksयौन अर्थ वाली टिप्पणियाँपहनावे या शरीर पर द्विअर्थी टिप्पणी
(iv)showing pornographyअश्लील सामग्री दिखानासहकर्मी को अश्लील वीडियो या तस्वीर दिखाना
(v)any other unwelcome physical, verbal or non-verbal conduct of sexual natureअन्य कोई अवांछित यौन प्रकृति का शारीरिक, मौखिक या अमौखिक आचरणदेर रात अनुचित संदेश भेजना, लगातार घूरना

आधार: धारा 2(n), India Code और राज्य सभा सचिवालय का पाठ। चौथा स्तंभ केवल समझाने के लिए गढ़ा गया कल्पित उदाहरण है।

धारा 3: निषेध और वे परिस्थितियाँ जो उत्पीड़न बना सकती हैं

धारा 3(1) अधिनियम का मूल आदेश है: 'किसी भी महिला के साथ किसी भी कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न नहीं किया जाएगा' (No woman shall be subjected to sexual harassment at any workplace)। यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 की भावना को सीधे कार्यालय के भीतर उतारता है।

धारा 3(2) उन परिस्थितियों की सूची देती है, जो उत्पीड़न के किसी कृत्य या व्यवहार के साथ घटित हों या उससे जुड़ी हों, तो उसे लैंगिक उत्पीड़न बना सकती हैं (may amount to sexual harassment)। पाठ में पाँच परिस्थितियाँ हैं: रोज़गार में तरजीही व्यवहार का निहित या स्पष्ट वादा; रोज़गार में हानिकारक व्यवहार की निहित या स्पष्ट धमकी; उसकी वर्तमान या भावी रोज़गार स्थिति के बारे में निहित या स्पष्ट धमकी; उसके काम में हस्तक्षेप या उसके लिए भयभीत करने वाला, आपत्तिजनक या शत्रुतापूर्ण कार्य-वातावरण बनाना; और ऐसा अपमानजनक व्यवहार जिससे उसके स्वास्थ्य या सुरक्षा पर असर पड़ने की संभावना हो। उपधारा की शुरुआत में 'among other circumstances' (अन्य परिस्थितियों के अतिरिक्त) लिखा है, इसलिए यह सूची पूर्ण नहीं है।

व्यवहार इकाई में पढ़ा 'प्रतिदान-आधारित उत्पीड़न' (quid pro quo) और 'शत्रुतापूर्ण वातावरण' (hostile environment) का भेद इसी उपधारा से जोड़कर समझा जा सकता है। पहली और दूसरी परिस्थिति में लाभ का वादा या हानि की धमकी है, जो प्रतिदान-आधारित स्वरूप से मेल खाती है; चौथी परिस्थिति शत्रुतापूर्ण वातावरण से मेल खाती है। ये दोनों नाम अधिनियम के पाठ में नहीं हैं, ये पाठ्यपुस्तकों की शब्दावली हैं, इसलिए विधि-उत्तर में केवल धारा 3(2) के शब्द लिखें और व्यवहार-उत्तर में दोनों नाम जोड़ें (विश्लेषण)।

धारा 3(2): पाँच परिस्थितियाँ और व्यवहार-इकाई के नामों से मेल (विश्लेषण)

खंडअधिनियम का शब्दआशयव्यवहार-इकाई का नाम (विश्लेषण)
(i)implied or explicit promise of preferential treatment in her employmentरोज़गार में तरजीह का निहित या स्पष्ट वादाप्रतिदान-आधारित (quid pro quo)
(ii)implied or explicit threat of detrimental treatment in her employmentरोज़गार में हानिकारक व्यवहार की निहित या स्पष्ट धमकीप्रतिदान-आधारित
(iii)implied or explicit threat about her present or future employment statusवर्तमान या भावी रोज़गार स्थिति पर निहित या स्पष्ट धमकीप्रतिदान-आधारित
(iv)interference with her work or creating an intimidating or offensive or hostile work environment for herकाम में हस्तक्षेप या भयभीत करने वाला, आपत्तिजनक या शत्रुतापूर्ण वातावरणशत्रुतापूर्ण वातावरण (hostile environment)
(v)humiliating treatment likely to affect her health or safetyअपमानजनक व्यवहार जिससे स्वास्थ्य या सुरक्षा प्रभावित होने की संभावना होशत्रुतापूर्ण वातावरण के निकट

आधार: धारा 3(2), India Code का पाठ। अंतिम स्तंभ अधिनियम का भाग नहीं, विश्लेषण है; व्यवहार पृष्ठ की शब्दावली से मेल के लिए।

धारा 4: आंतरिक समिति का गठन

अब तक परिभाषाएँ और निषेध थे। धारा 4 पहली बार तंत्र खड़ा करती है। उपधारा (1) के अनुसार कार्यस्थल का हर नियोक्ता लिखित आदेश द्वारा एक समिति गठित करेगा, जो 'आंतरिक परिवाद समिति' (Internal Complaints Committee) कहलाएगी। अधिनियम में आगे इसे संक्षेप में 'Internal Committee' कहा गया है (धारा 2(h))। यहाँ 'by an order in writing' (लिखित आदेश द्वारा) परीक्षा-योग्य शब्द है: समिति मौखिक या अनौपचारिक रूप से नहीं बनती।

उपधारा (1) का परंतुक कहता है कि जहाँ कार्यस्थल के कार्यालय या प्रशासनिक इकाइयाँ अलग-अलग स्थानों पर या संभागीय या उप-संभागीय स्तर पर हों, वहाँ आंतरिक समिति सभी प्रशासनिक इकाइयों या कार्यालयों में गठित की जाएगी। एक ही मुख्यालय में समिति बना देना काफ़ी नहीं है, ताकि दूरस्थ कार्यालय की महिला को दूर जाकर शिकायत न करनी पड़े (विश्लेषण)।

उपधारा (2) समिति की रचना बताती है, जिसके सदस्य नियोक्ता द्वारा नामित होते हैं। (क) एक पीठासीन अधिकारी, जो कार्यस्थल पर वरिष्ठ स्तर की महिला कर्मचारी हो और कर्मचारियों में से हो। अगर वरिष्ठ स्तर की महिला कर्मचारी उपलब्ध न हो, तो पीठासीन अधिकारी कार्यस्थल के अन्य कार्यालयों या प्रशासनिक इकाइयों से नामित होगी; वहाँ भी उपलब्ध न हो तो उसी नियोक्ता के किसी अन्य कार्यस्थल या किसी अन्य विभाग या संगठन से। (ख) कर्मचारियों में से कम से कम दो सदस्य, जो प्राथमिकता से महिलाओं के हित के प्रति प्रतिबद्ध हों या जिन्हें समाज सेवा का अनुभव या विधिक ज्ञान हो। (ग) एक सदस्य महिलाओं के हित के प्रति प्रतिबद्ध गैर-सरकारी संगठनों या संघों में से, या ऐसा व्यक्ति जो लैंगिक उत्पीड़न के विषयों से परिचित हो। इस पूरी नामांकन-सूची पर परंतुक यह बाध्यता लगाता है कि इस प्रकार नामित कुल सदस्यों में कम से कम आधी महिलाएँ होंगी (at least one-half of the total Members so nominated shall be women)।

उपधारा (3) में कार्यकाल है: पीठासीन अधिकारी और प्रत्येक सदस्य नामांकन की तिथि से उतनी अवधि तक पद पर रहेंगे जो नियोक्ता निर्दिष्ट करे, पर वह तीन वर्ष से अधिक नहीं होगी (not exceeding three years)। उपधारा (4) कहती है कि गैर-सरकारी संगठन या संघ से नियुक्त सदस्य को समिति की कार्यवाही के लिए शुल्क या भत्ता नियोक्ता देगा, जैसा विहित हो।

उपधारा (5) हटाने की व्यवस्था है। पीठासीन अधिकारी या कोई सदस्य हटाया जाएगा, यदि वह (क) धारा 16 का उल्लंघन करे, यानी गोपनीयता भंग करे; (ख) किसी अपराध में दोषसिद्ध हो या किसी विधि के अधीन अपराध की जाँच उसके विरुद्ध लंबित हो; (ग) अनुशासनिक कार्यवाही में दोषी पाया जाए या ऐसी कार्यवाही लंबित हो; या (घ) अपने पद का ऐसा दुरुपयोग करे कि उसका पद पर बना रहना लोकहित के प्रतिकूल हो। रिक्त स्थान, और आकस्मिक रिक्ति भी, इसी धारा के अनुसार नए नामांकन से भरी जाएगी।

धारा 4(2): आंतरिक समिति की संरचना

पदकौन हो सकता है (अधिनियम का आशय)अंग्रेज़ी शब्दटिप्पणी
पीठासीन अधिकारी (1)कार्यस्थल पर वरिष्ठ स्तर की महिला कर्मचारीPresiding Officerउपलब्ध न होने पर दो चरणों में अन्य इकाई या अन्य कार्यस्थल से (दो परंतुक)
कर्मचारी सदस्य (कम से कम 2)कर्मचारियों में से, प्राथमिकता से महिलाओं के हित के प्रति प्रतिबद्ध या समाज सेवा या विधिक ज्ञान वालेnot less than two Members from amongst employees'preferably' शब्द: यह प्राथमिकता है, कठोर शर्त नहीं
बाहरी सदस्य (1)महिलाओं के हित के प्रति प्रतिबद्ध गैर-सरकारी संगठन या संघ में से, या यौन उत्पीड़न के विषयों से परिचित व्यक्तिone member from amongst non-governmental organisations or associations committed to the cause of women or a person familiar with the issues relating to sexual harassmentशुल्क या भत्ता नियोक्ता देता है (4)
महिला-अनुपातनामित कुल सदस्यों में कम से कम आधी महिलाएँat least one-half of the total Members so nominated shall be womenपरंतुक: पीठासीन अधिकारी भी महिला होने से गिनी जाती है (विश्लेषण)

आधार: धारा 4(2), (3), (4), India Code और राज्य सभा सचिवालय का पाठ। अंतिम स्तंभ की टिप्पणियों में 'विश्लेषण' वाली पंक्तियाँ अधिनियम का पाठ नहीं हैं।

आंतरिक समिति और स्थानीय समिति: पहली तुलना

आंतरिक समिति (धारा 4)

कौन गठित करता हैकार्यस्थल का नियोक्ता, लिखित आदेश से

कहाँकार्यस्थल के सभी प्रशासनिक इकाइयों या कार्यालयों में

किसकी शिकायतेंअपने कार्यस्थल की

अध्यक्षतापीठासीन अधिकारी: वरिष्ठ महिला कर्मचारी

कार्यकालनामांकन से अधिकतम तीन वर्ष

स्थानीय समिति (धारा 6, 7)

कौन गठित करता हैज़िला अधिकारी (District Officer)

कहाँसंबंधित ज़िले में; अधिकार-क्षेत्र ज़िले तक

किसकी शिकायतेंजहाँ आंतरिक समिति दस से कम कामगारों के कारण गठित न हो या शिकायत नियोक्ता के विरुद्ध हो

अध्यक्षताअध्यक्ष: समाज सेवा के क्षेत्र की प्रतिष्ठित महिलाओं में से

कार्यकालनियुक्ति से अधिकतम तीन वर्ष

आधार: धारा 4, 6, 7 का पाठ, India Code। स्थानीय समिति का विस्तार अगले पृष्ठ (धारा 5 से 9) में है; अधिनियम के अद्यतन पाठ में नाम 'Local Committee' है, पहले इसे Local Complaints Committee कहा गया था।

धारा 1 से 4 का मानचित्र

POSH अधिनियम 2013: धारा 1 से 4

धारा 1

  • अधिनियम सं. 14 सन् 2013 (22 अप्रैल 2013)
  • पूरे भारत में लागू
  • प्रारंभ: 9 दिसंबर 2013

धारा 2: लोग

  • पीड़ित महिला 2(a)
  • कर्मचारी 2(f)
  • नियोक्ता 2(g)
  • प्रत्यर्थी 2(m)
  • घरेलू कामगार 2(e)

धारा 2: स्थान और तंत्र

  • कार्यस्थल 2(o): छह रूप
  • असंगठित क्षेत्र 2(p)
  • उपयुक्त सरकार 2(b)
  • आंतरिक समिति 2(h), स्थानीय समिति 2(i)

धारा 2(n) और 3

  • लैंगिक उत्पीड़न: पाँच खंड
  • 3(1): निषेध
  • 3(2): पाँच परिस्थितियाँ

धारा 4

  • लिखित आदेश से आंतरिक समिति
  • सभी प्रशासनिक इकाइयों में
  • पीठासीन अधिकारी + 2 + 1
  • कम से कम आधी महिलाएँ; कार्यकाल अधिकतम 3 वर्ष
आधार: अधिनियम सं. 14 सन् 2013 का पाठ, India Code।

मुख्य तथ्य

अधिनियम
The Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013, अधिनियम सं. 14 सन् 2013 (2013)
राष्ट्रपति की स्वीकृति
22 अप्रैल 2013
प्रारंभ
9 दिसंबर 2013 (अधिसूचना S.O. 3606(E)); धारा 1(3) के अनुसार तिथि केंद्र सरकार की अधिसूचना से
प्रारंभ की तिथि: दूसरी पुष्टि
PIB की 2026 की विज्ञप्ति में अधिनियम के साथ यही तिथि (9 दिसंबर 2013)
विस्तार
पूरा भारत, धारा 1(2)
लैंगिक उत्पीड़न की परिभाषा
धारा 2(n): पाँच खंड; धारा 3(2): पाँच परिस्थितियाँ
आंतरिक समिति
धारा 4: लिखित आदेश; पीठासीन अधिकारी वरिष्ठ महिला; कम से कम दो कर्मचारी सदस्य; एक बाहरी सदस्य; कम से कम आधी महिलाएँ; कार्यकाल अधिकतम तीन वर्ष
व्यापक परिभाषाएँ
PIB (25 मार्च 2026) में धारा 2(a), (f), (g), (o) की व्यापक व्याख्या
अंतिम जाँच
2 अक्टूबर 2026

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • 'पीड़ित महिला' को केवल कर्मचारी समझ लेना। धारा 2(a)(i) में 'नियोजित हो या नहीं' लिखा है; घर के संदर्भ में ही नियोजित होना आवश्यक है (धारा 2(a)(ii)).
  • धारा 2(n) में सिर्फ़ शारीरिक व्यवहार गिनना। मौखिक और अमौखिक आचरण, टिप्पणियाँ और अश्लील सामग्री भी सूची में हैं, और पाँचवाँ खंड अन्य सब अवांछित यौन आचरण को पकड़ता है।
  • धारा 3(2) की पाँच परिस्थितियों को पूर्ण सूची मानना। पाठ में 'among other circumstances' और 'may amount to' है, यानी ये परिस्थितियाँ उत्पीड़न बना सकती हैं और सूची खुली है।
  • धारा 4(1) में दस कर्मचारियों की शर्त ढूँढना। धारा 4 में संख्या नहीं लिखी; दस से कम कामगारों वाली बात धारा 6(1) में स्थानीय समिति के संदर्भ में आती है।
  • पीठासीन अधिकारी को बाहरी सदस्य समझ लेना। पीठासीन अधिकारी कर्मचारियों में से वरिष्ठ महिला होती है; बाहरी सदस्य अलग है, गैर-सरकारी संगठन या संघ से।
  • प्रारंभ की तिथि (9 दिसंबर 2013) और अधिनियम की स्वीकृति तिथि (22 अप्रैल 2013) को एक मान लेना।