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पेपर III · इकाई III · भाग ख (Law)

कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम, 2013: धारा 11 से 20

जाँच, राहत, रिपोर्ट, कार्रवाई, दंड, अपील और नियोक्ता व ज़िला अधिकारी के कर्तव्य: धारा 11 से 20।

  • धारा 11 से 20
  • जाँच 90 दिन
  • धारा 14
  • धारा 15
  • धारा 19
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (Law, section-exact): महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध एवं प्रतितोष) अधिनियम, 2013 की धारा 1 से 9 और 11 से 20। इस पृष्ठ में धारा 11 से 20 है: जाँच, कार्रवाई, दंड, अपील और नियोक्ता व ज़िला अधिकारी के कर्तव्य। धारा 10 (समाधान) सिलेबस में नहीं है, इसलिए केवल एक पंक्ति में आती है।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2013 से 2024 के उपलब्ध पेपरों में धारा 11 से 20 पर सीधा प्रश्न नहीं मिलता। इस अधिनियम से अब तक एक ही प्रश्न आया है और वह धारा 2(n) की परिभाषा पर है (पहले पृष्ठ पर हल सहित)।
  • इन धाराओं में समय-सीमाओं की भरमार है: 90 दिन, 10 दिन, 60 दिन, 90 दिन अपील के लिए, और सात दिन। परिभाषा-प्रधान Law प्रश्नों में अक्सर यही संख्याएँ पूछी जा सकती हैं।
  • धारा 14 और 17 में दंड का स्वरूप 'सेवा नियमों के अनुसार' है, अधिनियम में कोई जुर्माना या जेल की अवधि नहीं लिखी। इसे ठीक से समझना सबसे ज़रूरी है।

शिकायत के बाद की यात्रा: एक नज़र

मान लीजिए कि शिकायत दर्ज हो गई और धारा 9 की समय-सीमा का पालन हुआ। अब क्या होगा? अधिनियम का अध्याय V, धारा 11 से 18, इसी का उत्तर देता है। क्रम इस प्रकार है: जाँच (धारा 11), जाँच के दौरान राहत (धारा 12), रिपोर्ट और सिफ़ारिश (धारा 13), झूठी शिकायत पर कार्रवाई (धारा 14), मुआवज़े का निर्धारण (धारा 15), गोपनीयता (धारा 16) और उसके उल्लंघन पर दंड (धारा 17), और अंत में अपील (धारा 18)। उसके बाद अध्याय VI और VII में नियोक्ता (धारा 19) और ज़िला अधिकारी (धारा 20) के कर्तव्य हैं।

धारा 10 (समाधान) शिकायत और जाँच के बीच की एक वैकल्पिक सीढ़ी है। पीड़ित महिला के अनुरोध पर समिति जाँच से पहले आपसी सहमति का प्रयास कर सकती है, पर उसका आधार मौद्रिक समझौता नहीं हो सकता। यह धारा सिलेबस में नहीं है, इसलिए इससे आगे नहीं पढ़ना है; बस यह जानना है कि धारा 11 इसी के 'अधीन' शुरू होती है।

धारा 11: शिकायत की जाँच

धारा 11(1) के अनुसार आंतरिक समिति या स्थानीय समिति, जहाँ प्रत्यर्थी (respondent) कर्मचारी है, शिकायत की जाँच प्रत्यर्थी पर लागू सेवा नियमों के अनुसार करेगी। जहाँ ऐसे नियम नहीं हैं, वहाँ विहित रीति से। जाँच कैसे चलेगी, इसकी विस्तृत प्रक्रिया अधिनियम में नहीं, सेवा नियमों या अधिनियम के नियमों में है, और उसके लिए 'देखें: आधिकारिक अधिनियम पाठ और नियम'।

घरेलू कामगार (domestic worker) के लिए अलग रास्ता है। यदि प्रथम दृष्टया मामला बनता है तो स्थानीय समिति शिकायत सात दिन के भीतर पुलिस को भेजेगी ताकि मामला दर्ज हो। अधिनियम के पाठ में यहाँ भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 509 और अन्य संबंधित उपबंधों का नाम है। दंड संहिता अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) से बदल चुकी है। अध्ययन-सहायक पुल: IPC धारा 509 का संबंधित उपबंध BNS 2023 की धारा 79 ("Word, gesture or act intended to insult the modesty of a woman"; सादा कारावास तीन वर्ष तक और जुर्माना) है। POSH अधिनियम का पाठ स्वयं अभी IPC धारा 509 ही लिखता है, इसलिए उत्तर में पहले अधिनियम का शब्द, फिर यह पुल लिखें। परीक्षा-दृष्टि से याद रखें कि घरेलू कामगार के मामले में स्थानीय समिति की भूमिका 'जाँच करने वाली' नहीं बल्कि 'प्रथम दृष्टया मामला होने पर पुलिस को अग्रेषित करने वाली' है।

धारा 11(1) के दो परंतुक हैं। पहला: यदि पीड़ित महिला समिति को बताती है कि धारा 10(2) के अधीन हुए समझौते की किसी शर्त का प्रत्यर्थी ने पालन नहीं किया, तो समिति जाँच करेगी या मामला पुलिस को भेजेगी। दूसरा: जहाँ दोनों पक्ष कर्मचारी हैं, वहाँ जाँच के दौरान दोनों को सुनवाई का अवसर दिया जाएगा और निष्कर्षों की प्रति दोनों को उपलब्ध कराई जाएगी ताकि वे समिति के सामने निष्कर्षों के विरुद्ध अभ्यावेदन दे सकें। यानी निष्पक्ष सुनवाई का सिद्धांत अधिनियम में लिखा है।

धारा 11(2) अदालत की शक्ति है। भारतीय दंड संहिता की धारा 509 (अब BNS की धारा 79 के समतुल्य, अध्ययन-सहायक पुल) में जो भी हो, उसके बावजूद, जब प्रत्यर्थी अपराध में दोषसिद्ध हो, तब अदालत पीड़ित महिला को ऐसी राशि के भुगतान का आदेश दे सकती है जो वह उचित समझे, और वह धारा 15 के उपबंधों को ध्यान में रखेगी।

धारा 11(3) समिति को दीवानी न्यायालय के समान शक्तियाँ देती है, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन वाद का विचारण करते समय: (क) किसी व्यक्ति को बुलाना, उपस्थिति सुनिश्चित करना और शपथ पर परीक्षा लेना; (ख) दस्तावेज़ों का प्रकटन और प्रस्तुतीकरण माँगना; और (ग) कोई अन्य विहित विषय। धारा 11(4) समय-सीमा तय करती है: जाँच 90 दिन के भीतर पूरी होनी चाहिए।

धारा 12: जाँच के दौरान राहत

जाँच लंबी चल सकती है और इस बीच महिला को उसी कार्यस्थल पर आरोपी के साथ काम करना पड़ सकता है। धारा 12(1) इसी असुविधा का इलाज है। पीड़ित महिला के लिखित अनुरोध पर समिति नियोक्ता को सिफ़ारिश कर सकती है कि (क) पीड़ित महिला या प्रत्यर्थी को किसी अन्य कार्यस्थल पर स्थानांतरित किया जाए; (ख) पीड़ित महिला को तीन माह तक का अवकाश दिया जाए; या (ग) उसे ऐसी अन्य राहत दी जाए जो विहित हो।

यहाँ तीन बातें ध्यान से पढ़ें। पहली, यह राहत 'लिखित अनुरोध' पर है; अनुरोध पीड़ित महिला का होना चाहिए। दूसरी, स्थानांतरण पीड़ित महिला का भी हो सकता है और प्रत्यर्थी का भी। तीसरी, धारा 12(2) में यह अवकाश उसके अन्य सामान्य अवकाश के अतिरिक्त है। धारा 12(3) कहती है कि नियोक्ता समिति की सिफ़ारिश को लागू करेगा और कार्यान्वयन की रिपोर्ट समिति को भेजेगा। यहाँ भाषा 'shall' की है, इसलिए नियोक्ता के लिए यह कर्तव्य है।

धारा 13: जाँच रिपोर्ट और कार्रवाई

धारा 13(1) के अनुसार जाँच पूरी होने पर समिति अपने निष्कर्षों की रिपोर्ट नियोक्ता को, या स्थानीय समिति के मामले में ज़िला अधिकारी को, जाँच पूरी होने की तिथि से दस दिन के भीतर देगी, और रिपोर्ट संबंधित पक्षों को उपलब्ध कराई जाएगी।

धारा 13(2) में आरोप साबित न होने पर समिति नियोक्ता और ज़िला अधिकारी को सिफ़ारिश करेगी कि कोई कार्रवाई आवश्यक नहीं है। धारा 13(3) में आरोप साबित होने पर समिति नियोक्ता या ज़िला अधिकारी को दो बातों की सिफ़ारिश करेगी। (i) सेवा नियमों के अनुसार लैंगिक उत्पीड़न को कदाचार (misconduct) मानकर कार्रवाई, या जहाँ सेवा नियम नहीं हैं, वहाँ विहित रीति से। (ii) प्रत्यर्थी के वेतन या मज़दूरी से ऐसी राशि की कटौती जो पीड़ित महिला या उसके विधिक वारिसों को दी जाए, धारा 15 के अनुसार, चाहे सेवा नियम कुछ भी कहें।

कटौती के लिए दो परंतुक हैं। पहला: यदि प्रत्यर्थी की अनुपस्थिति या सेवा समाप्त हो जाने के कारण नियोक्ता वेतन से कटौती नहीं कर सकता, तो वह प्रत्यर्थी को सीधे पीड़ित महिला को राशि चुकाने का निर्देश दे सकता है। दूसरा: यदि प्रत्यर्थी राशि न चुकाए, तो समिति वसूली का आदेश भू-राजस्व के बकाया (arrear of land revenue) की तरह वसूल करने के लिए संबंधित ज़िला अधिकारी को भेज सकती है। धारा 13(4) में नियोक्ता या ज़िला अधिकारी सिफ़ारिश प्राप्त होने के 60 दिन के भीतर उस पर कार्रवाई करेगा।

यहाँ एक बारीकी: समिति 'सिफ़ारिश' करती है, और निर्णय नहीं देती। कार्रवाई का अधिकार नियोक्ता या ज़िला अधिकारी के पास रहता है। इसी कारण धारा 13(4) में 60 दिन की सीमा नियोक्ता और ज़िला अधिकारी पर लगाई गई है।

धारा 14: झूठी या द्वेषपूर्ण शिकायत और झूठा साक्ष्य

कोई भी सुरक्षात्मक क़ानून दुरुपयोग की आशंका से मुक्त नहीं होता, और धारा 14 इसका उत्तर देती है। धारा 14(1) के अनुसार यदि समिति इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि प्रत्यर्थी के विरुद्ध आरोप द्वेषपूर्ण (malicious) है, या शिकायतकर्ता ने शिकायत यह जानते हुए की कि वह झूठी है, या कूटरचित या भ्रामक दस्तावेज़ प्रस्तुत किया, तो वह नियोक्ता या ज़िला अधिकारी को सिफ़ारिश कर सकती है कि शिकायतकर्ता पर उस पर लागू सेवा नियमों के अनुसार, या जहाँ नियम नहीं हैं वहाँ विहित रीति से, कार्रवाई की जाए।

दो परंतुक शिकायतकर्ता की रक्षा करते हैं और यही इस धारा का मूल है। पहला: केवल शिकायत को साबित न कर पाना या पर्याप्त प्रमाण न दे पाना अपने आप में कार्रवाई को आमंत्रित नहीं करता। दूसरा: कोई कार्रवाई सिफ़ारिश करने से पहले शिकायतकर्ता की द्वेषपूर्ण मंशा विहित प्रक्रिया के अनुसार जाँच के बाद स्थापित की जानी चाहिए। इसलिए 'शिकायत साबित नहीं हुई' और 'शिकायत झूठी थी' दो अलग बातें हैं।

धारा 14(2) साक्षी पर लागू होती है। यदि समिति इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जाँच के दौरान किसी साक्षी ने झूठा साक्ष्य दिया या कूटरचित या भ्रामक दस्तावेज़ प्रस्तुत किया, तो वह साक्षी के नियोक्ता या ज़िला अधिकारी को सिफ़ारिश कर सकती है कि साक्षी पर लागू सेवा नियमों के अनुसार, या उनके न होने पर विहित रीति से, कार्रवाई की जाए।

धारा 15: मुआवज़े का निर्धारण

धारा 13(3)(ii) में जो राशि पीड़ित महिला को दी जानी है, उसे तय करने के लिए धारा 15 पाँच कारकों की सूची देती है, और समिति इन पर 'ध्यान देगी' (shall have regard to)। (क) पीड़ित महिला को हुआ मानसिक आघात, पीड़ा, कष्ट और भावनात्मक संताप। (ख) उत्पीड़न की घटना के कारण करियर के अवसर की हानि। (ग) पीड़ित द्वारा शारीरिक या मनोरोग चिकित्सा पर किया गया चिकित्सा-व्यय। (घ) प्रत्यर्थी की आय और वित्तीय स्थिति। (ङ) एकमुश्त या किस्तों में ऐसे भुगतान की व्यवहार्यता। पहले तीन कारक पीड़ित की क्षति से जुड़े हैं और अंतिम दो प्रत्यर्थी की क्षमता से।

धारा 15 में कोई निश्चित रकम या अधिकतम सीमा नहीं लिखी है। यह इसलिए भी उपयोगी बिंदु है कि परीक्षा में 'अधिनियम में मुआवज़े की अधिकतम राशि क्या है' जैसा भ्रामक प्रश्न आ सकता है; इसका उत्तर यह है कि धारा 15 कारक बताती है, राशि नहीं।

धारा 16 और 17: गोपनीयता और उसके उल्लंघन का दंड

धारा 16 का शीर्षक है 'शिकायत और जाँच-कार्यवाही की विषय-वस्तु के प्रकाशन या सार्वजनिक करने का प्रतिषेध'। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में जो भी हो, उसके बावजूद नीचे लिखी बातें जनता, प्रेस और मीडिया के सामने किसी भी प्रकार से प्रकाशित, संप्रेषित या ज्ञात नहीं कराई जाएँगी: धारा 9 के अधीन शिकायत की विषय-वस्तु; पीड़ित महिला, प्रत्यर्थी और साक्षियों की पहचान और पते; समाधान और जाँच-कार्यवाही से संबंधित कोई भी जानकारी; समिति की सिफ़ारिशें; और नियोक्ता या ज़िला अधिकारी द्वारा की गई कार्रवाई।

एक परंतुक में छूट है: पीड़ित को मिले न्याय के बारे में जानकारी प्रसारित की जा सकती है, पर पीड़ित महिला और साक्षियों का नाम, पता, पहचान या कोई भी विवरण जो उनकी पहचान की ओर ले जा सकता है, बताए बिना। इसलिए 'न्याय की जानकारी' और 'पहचान की जानकारी' का अंतर याद रखें।

धारा 17 में दंड का स्वरूप है। जो भी व्यक्ति शिकायत, जाँच या सिफ़ारिशों के संचालन का कर्तव्य निभा रहा है और धारा 16 का उल्लंघन करे, वह उस पर लागू सेवा नियमों के अनुसार, या जहाँ सेवा नियम नहीं हैं वहाँ विहित रीति से, दंड का भागी होगा। इस धारा में न जुर्माने की रकम है, न कारावास। इसे 'सेवा नियमों के अनुसार दंड' ही लिखें, और कोई संख्या न जोड़ें। धारा 26 के जुर्माने से इसे भ्रमित न करें; धारा 26 इस पृष्ठ के सिलेबस-क्षेत्र से बाहर है।

धारा 18: अपील

धारा 18(1) के अनुसार कोई भी व्यक्ति, जो इन सिफ़ारिशों से व्यथित है, न्यायालय या अधिकरण में अपील कर सकता है: धारा 13(2) (कार्रवाई आवश्यक नहीं), धारा 13(3)(i) या (ii), धारा 14(1) या (2) और धारा 17 के अधीन की गई सिफ़ारिशें, या इन सिफ़ारिशों का 'क्रियान्वयन न होना'। अपील उस व्यक्ति पर लागू सेवा नियमों के अनुसार की जाएगी, और जहाँ नियम नहीं हैं वहाँ, अन्य किसी क़ानून पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, विहित रीति से।

धारा 18(2) की समय-सीमा है: अपील सिफ़ारिशों की तिथि से 90 दिन के भीतर की जाएगी। इसका अर्थ यह भी है कि पीड़ित महिला भी अपील कर सकती है, उदाहरण के लिए जब समिति का निष्कर्ष 'आरोप साबित नहीं हुआ' हो या जब सिफ़ारिशें लागू न की गई हों। इसलिए 'अपील केवल दोषी ठहराए गए व्यक्ति कर सकता है' वाला कथन ग़लत है।

धारा 19: नियोक्ता के कर्तव्य (Duties of employer)

धारा 19 में 'every employer shall' के बाद दस कर्तव्य हैं, अंग्रेज़ी में (a) से (j) तक; यहाँ हिंदी वर्णक्रम (क) से (ञ) में दिए गए हैं। इन्हें तीन समूहों में पढ़ना आसान है। पहला समूह रोकथाम का है: सुरक्षित कार्य-वातावरण, जिसमें कार्यस्थल पर संपर्क में आने वाले व्यक्तियों से भी सुरक्षा शामिल है (क); कार्यस्थल पर प्रमुख स्थान पर लैंगिक उत्पीड़न के दंडात्मक परिणाम और धारा 4(1) के अधीन समिति गठित करने वाले आदेश का प्रदर्शन (ख); और नियमित अंतराल पर कार्यशालाएँ और जागरूकता कार्यक्रम तथा समिति के सदस्यों के लिए अभिमुखीकरण कार्यक्रम (ग)।

दूसरा समूह समिति की सहायता का है: समिति को शिकायत और जाँच के लिए आवश्यक सुविधाएँ देना (घ); प्रत्यर्थी और साक्षियों की समिति के सामने उपस्थिति सुनिश्चित करने में सहायता (ङ); और समिति द्वारा माँगी गई जानकारी उपलब्ध कराना (च)। तीसरा समूह कार्रवाई का है: पीड़ित महिला की इच्छा पर भारतीय दंड संहिता या किसी अन्य क़ानून के अधीन अपराध की शिकायत में सहायता (छ); दंड संहिता या अन्य क़ानून के अधीन अपराधी के विरुद्ध कार्रवाई शुरू करवाना, या, यदि अपराधी कर्मचारी नहीं है और पीड़ित महिला चाहे, तो उस कार्यस्थल पर जहाँ घटना हुई (ज); लैंगिक उत्पीड़न को सेवा नियमों के अधीन कदाचार मानना और उस पर कार्रवाई शुरू करना (झ); और समिति द्वारा रिपोर्टों की समय पर प्रस्तुति की निगरानी (ञ)।

ऊपर के तीन समूह इस पृष्ठ का अपना वर्गीकरण हैं, अधिनियम के खंड-शीर्षक नहीं। परीक्षा में केवल कुछ कर्तव्य लिखने हों तो अधिनियम के खंड की भाषा सीधे लिखें।

धारा 20: ज़िला अधिकारी के कर्तव्य

धारा 20 बहुत छोटी है: ज़िला अधिकारी (क) स्थानीय समिति द्वारा दी जाने वाली रिपोर्ट की समय पर प्रस्तुति की निगरानी करेगा, और (ख) लैंगिक उत्पीड़न और महिलाओं के अधिकारों पर जागरूकता पैदा करने के लिए गैर-सरकारी संगठनों को लगाने हेतु आवश्यक उपाय करेगा। इसकी तुलना धारा 19 के अंतिम खंड (ञ) से करें: नियोक्ता आंतरिक समिति की रिपोर्ट की निगरानी करता है और ज़िला अधिकारी स्थानीय समिति की। यह समानता प्रश्नों में 'मिलान' के रूप में आ सकती है।

जाँच से अपील तक की समय-रेखा

  1. घटना से 3 माह

    धारा 9(1): शिकायत; कारण लिखकर अधिकतम 3 माह और

  2. शिकायत के बाद

    धारा 10 (केवल जानकारी): अनुरोध पर समाधान का प्रयास; सिलेबस से बाहर

  3. जाँच: 90 दिन

    धारा 11(4): जाँच 90 दिन में पूरी

  4. रिपोर्ट: 10 दिन

    धारा 13(1): जाँच पूरी होने से 10 दिन में रिपोर्ट

  5. कार्रवाई: 60 दिन

    धारा 13(4): नियोक्ता या ज़िला अधिकारी सिफ़ारिश मिलने से 60 दिन में कार्रवाई करे

  6. अपील: 90 दिन

    धारा 18(2): सिफ़ारिशों की तिथि से 90 दिन में

घरेलू कामगार के मामले में धारा 11(1): प्रथम दृष्टया मामला होने पर 7 दिन में पुलिस को अग्रेषण।

जाँच के बाद के नतीजे: कौन क्या कर सकता है

पदधारीक्या करता हैधारा
आंतरिक या स्थानीय समितिजाँच करती है, दीवानी न्यायालय की शक्तियों के साथ; 90 दिन में पूरी11(1), 11(3), 11(4)
आंतरिक या स्थानीय समितिपीड़ित महिला के लिखित अनुरोध पर स्थानांतरण या तीन माह तक अवकाश की सिफ़ारिश12(1)
नियोक्तासमिति की अंतरिम सिफ़ारिश लागू करता है और रिपोर्ट भेजता है12(3)
समिति10 दिन में रिपोर्ट; साबित होने पर कदाचार और वेतन-कटौती की सिफ़ारिश13(1), 13(3)
नियोक्ता या ज़िला अधिकारी60 दिन में कार्रवाई13(4)
ज़िला अधिकारीअदा न की गई राशि भू-राजस्व के बकाया की तरह वसूल कराता है (समिति के भेजने पर)13(3) दूसरा परंतुक
न्यायालयदोषसिद्धि पर उचित राशि के भुगतान का आदेश दे सकता है11(2)
कोई भी व्यथित व्यक्तिन्यायालय या अधिकरण में 90 दिन के भीतर अपील18

धारा 15: मुआवज़ा तय करने के पाँच कारक

खंडकारक (अंग्रेज़ी आशय)किससे जुड़ा
(क)मानसिक आघात, पीड़ा, कष्ट और भावनात्मक संताप (mental trauma, pain, suffering and emotional distress)पीड़ित महिला की क्षति
(ख)करियर के अवसर की हानि (loss in the career opportunity)पीड़ित महिला की क्षति
(ग)शारीरिक या मनोरोग चिकित्सा का व्यय (medical expenses)पीड़ित महिला की क्षति
(घ)प्रत्यर्थी की आय और वित्तीय स्थिति (income and financial status of the respondent)प्रत्यर्थी की क्षमता
(ङ)एकमुश्त या किस्तों में भुगतान की व्यवहार्यता (feasibility of lump sum or instalments)प्रत्यर्थी की क्षमता

'किससे जुड़ा' स्तंभ पढ़ने की सुविधा के लिए जोड़ा गया विश्लेषण है।

धारा 19: नियोक्ता के दस कर्तव्य

खंडकर्तव्य (संक्षेप में)
(क)सुरक्षित कार्य-वातावरण, कार्यस्थल पर संपर्क में आने वाले व्यक्तियों से सुरक्षा सहित
(ख)प्रमुख स्थान पर दंडात्मक परिणाम और धारा 4(1) का समिति-गठन आदेश प्रदर्शित करना
(ग)नियमित अंतराल पर कार्यशालाएँ, जागरूकता और समिति-सदस्यों के लिए अभिमुखीकरण कार्यक्रम
(घ)समिति को शिकायत और जाँच के लिए आवश्यक सुविधाएँ देना
(ङ)प्रत्यर्थी और साक्षियों की उपस्थिति में सहायता
(च)समिति द्वारा माँगी गई जानकारी उपलब्ध कराना
(छ)पीड़ित महिला की इच्छा पर अन्य क़ानून के अधीन अपराध की शिकायत में सहायता
(ज)अन्य क़ानून के अधीन अपराधी के विरुद्ध कार्रवाई शुरू कराना; अपराधी बाहरी हो और महिला चाहे तो उस कार्यस्थल पर जहाँ घटना हुई
(झ)लैंगिक उत्पीड़न को सेवा नियमों के अधीन कदाचार मानना और कार्रवाई शुरू करना
(ञ)आंतरिक समिति की रिपोर्टों की समय पर प्रस्तुति की निगरानी

अधिनियम में ये खंड (a) से (j) हैं; यहाँ हिंदी वर्णक्रम में दिए गए हैं।

धारा 11 से 20 का मानचित्र

POSH अधिनियम 2013: धारा 11 से 20

धारा 11 और 12

  • जाँच सेवा नियमों के अनुसार
  • दीवानी न्यायालय की शक्तियाँ
  • 90 दिन
  • अंतरिम राहत: स्थानांतरण या 3 माह का अवकाश

धारा 13 और 14

  • रिपोर्ट 10 दिन में
  • कार्रवाई 60 दिन में
  • झूठी शिकायत: सिद्ध द्वेष, परंतुक

धारा 15

  • पाँच कारक
  • कोई तय राशि नहीं

धारा 16 और 17

  • गोपनीयता, RTI के बावजूद
  • उल्लंघन पर सेवा नियमों के अनुसार दंड

धारा 18

  • अपील 90 दिन
  • न्यायालय या अधिकरण

धारा 19 और 20

  • नियोक्ता के दस कर्तव्य
  • ज़िला अधिकारी: निगरानी और NGO जागरूकता
आधार: अधिनियम सं. 14 सन् 2013 का पाठ, India Code।

मुख्य तथ्य

जाँच की अवधि
धारा 11(4): 90 दिन
जाँच की अवधि: दूसरी पुष्टि
PIB (12 फ़रवरी 2026) भी 90 दिन बताता है
रिपोर्ट
धारा 13(1): जाँच पूरी होने से 10 दिन
कार्रवाई
धारा 13(4): सिफ़ारिश मिलने से 60 दिन
अपील
धारा 18(2): सिफ़ारिशों की तिथि से 90 दिन
अंतरिम अवकाश
धारा 12(1)(ख): तीन माह तक; सामान्य अवकाश के अतिरिक्त (12(2))
गोपनीयता
धारा 16: RTI अधिनियम के बावजूद; उल्लंघन पर धारा 17 के अनुसार सेवा नियमों के अधीन दंड
नियोक्ता के कर्तव्य
धारा 19: खंड (क) से (ञ) तक दस कर्तव्य (अंग्रेज़ी में (a) से (j))
अंतिम जाँच
2 अक्टूबर 2026

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • धारा 14 और 17 में जुर्माना या कारावास ढूँढना। दोनों धाराओं में दंड 'सेवा नियमों के अनुसार' है; कोई राशि या अवधि नहीं लिखी।
  • 'शिकायत साबित नहीं हुई' को 'झूठी शिकायत' मान लेना। धारा 14 के परंतुक के अनुसार साबित न कर पाना कार्रवाई का आधार नहीं है; द्वेष जाँच के बाद स्थापित होना चाहिए।
  • जाँच की 90 दिन और अपील की 90 दिन को मिला देना। पहली धारा 11(4) में जाँच की सीमा है और दूसरी धारा 18(2) में अपील की सीमा।
  • रिपोर्ट के 10 दिन और कार्रवाई के 60 दिन को उलट देना। 10 दिन समिति पर, 60 दिन नियोक्ता या ज़िला अधिकारी पर।
  • समिति को निर्णय देने वाला मानना। धारा 13 में समिति 'सिफ़ारिश' करती है; कार्रवाई नियोक्ता या ज़िला अधिकारी करता है।
  • धारा 12 की राहत को स्वतः मिलने वाली मानना। यह पीड़ित महिला के लिखित अनुरोध पर है।
  • धारा 20 में ज़िला अधिकारी के कर्तव्य बहुत लंबे समझना। धारा 20 में केवल दो खंड हैं, (क) और (ख)।

ध्यान दें

यह सामग्री परीक्षा की तैयारी के लिए है, क़ानूनी सलाह नहीं। वास्तविक मामले में अधिनियम का आधिकारिक पाठ और विधिक सलाहकार देखें।