राज्य का राज्यपाल : नियुक्ति, शक्तियाँ, विवेकाधिकार और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय
राज्य का संवैधानिक प्रमुख: अनुच्छेद 153 से 167, विधेयक (200), अध्यादेश (213), अनुच्छेद 356, हटाने की सीमा, 2023 से 2025 के निर्णय और हल किए हुए प्रश्न।
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II, "राज्य : राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद, राज्य सचिवालय, मुख्य सचिव, निदेशालयों की भूमिका, पुलिस प्रशासन, राजस्व मंडल, राज्य निर्वाचन आयोग, राज्य मानवाधिकार आयोग, लोकायुक्त।" (मूल पाठ: State: Governor, Chief Minister, Council of Ministers, State Secretariat, Chief Secretary, role of Directorates, police administration, Revenue Board, State Election Commission, State Human Rights Commission, Lokayukta.) यह पेज केवल "राज्यपाल" को पूरा कवर करता है: नियुक्ति, कार्यकाल, शक्तियाँ, विवेकाधिकार, विधेयक, अध्यादेश, अनुच्छेद 356 और संबंधित निर्णय। मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद का अलग पेज है।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- उपलब्ध छह मुख्य परीक्षा पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में राज्यपाल से सीधे तीन प्रश्न आए और तीनों 10 अंक (100 शब्द) के थे: 2018 में अध्यादेश की शक्ति, और 2024 में दो प्रश्न, यानी राज्यपाल की भूमिका व तमिलनाडु मामला तथा "दोपहर के पूर्ण चंद्रमा" वाला कथन। 2024 में एक ही पेपर में दो बार आना इस विषय के महत्व का संकेत है।
- तीनों प्रश्न अलग क़िस्म के हैं: अध्यादेश वाला तथ्यात्मक (अनुच्छेद 213 की धाराएँ), तमिलनाडु वाला हाल के निर्णय पर, और चंद्रमा वाला आलोचनात्मक मूल्यांकन। इसलिए केवल अनुच्छेद रटना काफ़ी नहीं; हर उत्तर में एक निर्णय का नाम और वर्ष चाहिए। यह पेज इसी तरह बँटा है।
- विश्लेषण: राज्यपाल के विषय से जुड़े तथ्य (अनुच्छेद 163, 200, 356 और बोम्मई व रामेश्वर प्रसाद) केंद्र-राज्य संबंध के प्रश्नों में भी काम आते हैं। 2016 में बोम्मई निर्णय और 2018 में अनुच्छेद 355 पर प्रश्न इसी मेल के उदाहरण हैं।
पहले सरल भाषा में समझें
किसी सरकारी दफ़्तर की कल्पना कीजिए जहाँ हर फ़ाइल आख़िर में एक वरिष्ठ अधिकारी की मुहर माँगती है। फ़ाइल असल में विभाग तैयार करता है, पर मुहर के बिना वह आगे नहीं बढ़ती। मुहर वाले अधिकारी के पास तीन रास्ते हैं: मंज़ूर कर दे, सवाल लिखकर फ़ाइल लौटा दे, या ऊपर भेज दे। पर अगर विभाग वही फ़ाइल जवाबों के साथ दोबारा भेज दे, तो उस पर मुहर लगानी ही पड़ती है, और फ़ाइल को हमेशा के लिए दराज़ में रख लेना उसका अधिकार नहीं है। राज्यपाल की हैसियत राज्य की ऐसी ही अंतिम मुहर वाले पद की है: क़ानून विधानमंडल बनाता है, सरकार मंत्रिपरिषद चलाती है, और संवैधानिक मुहर राज्यपाल की लगती है।
अब परीक्षा के लिए सटीक परिभाषा। राज्यपाल (Governor) राज्य का संवैधानिक प्रमुख है। राज्य की कार्यपालिका शक्ति उसी में निहित है (अनुच्छेद 154), वह राज्य विधानमंडल का अभिन्न अंग है (अनुच्छेद 168(1)), और वह सामान्यतः मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से काम करता है (अनुच्छेद 163(1))। एक बात ख़ास याद रखें: सर्वोच्च न्यायालय ने बी.पी. सिंघल (2010) में माना कि राज्यपाल संघ का कर्मचारी या एजेंट नहीं, बल्कि स्वतंत्र संवैधानिक पद है।
संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 153 से 162 एक नज़र में
| अनुच्छेद | क्या कहता है |
|---|---|
| 153 | प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल; एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल भी हो सकता है (परंतुक)। |
| 154 | राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित; वह इसे स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से प्रयोग करता है। |
| 155 | नियुक्ति राष्ट्रपति करता है, अपने हस्ताक्षर और मुहर वाले अधिपत्र (warrant) द्वारा। |
| 156 | राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद; राष्ट्रपति को लिखित त्यागपत्र; पाँच वर्ष का कार्यकाल; उत्तराधिकारी के पद सँभालने तक पद पर बने रहना। |
| 157 | पात्रता: भारत का नागरिक और 35 वर्ष की आयु पूरी। |
| 158 | संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं हो सकता (सदस्य हो तो पद ग्रहण करते ही सीट रिक्त); लाभ का अन्य पद नहीं; कार्यकाल में वेतन-भत्ते घटाए नहीं जा सकते। |
| 159 | शपथ राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (या उनकी अनुपस्थिति में वरिष्ठतम न्यायाधीश) के सामने। |
| 160 | जिस आकस्मिक स्थिति का प्रावधान नहीं, उसमें राज्यपाल के कार्य कैसे चलें, यह राष्ट्रपति तय कर सकता है। |
| 161 | राज्य के विषयों से जुड़े अपराधों में क्षमा, प्रविलंबन, विराम, परिहार, दंड का निलंबन या लघुकरण। |
| 162 | राज्य की कार्यपालिका शक्ति उन विषयों तक, जिन पर विधानमंडल क़ानून बना सकता है; समवर्ती विषयों में संसद या संघ की शक्ति के अधीन। |
नियुक्ति, कार्यकाल और हटाने की सीमाएँ
अनुच्छेद 155 के अनुसार राज्यपाल को राष्ट्रपति नियुक्त करता है; व्यवहार में यह निर्णय केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर होता है, क्योंकि राष्ट्रपति अनुच्छेद 74(1) की सलाह से बँधा है। संविधान में राज्यपाल को हटाने की महाभियोग जैसी कोई प्रक्रिया नहीं है। अनुच्छेद 156(1) केवल यह कहता है कि वह "राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत" पद धारण करता है। इसका मतलब सीधा पढ़ें तो यह निकलता है कि उसे कभी भी हटाया जा सकता है। पर क्या यह छूट असीम है?
इसी सवाल पर बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ (7 मई 2010, पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ) आया। पृष्ठभूमि: 2 जुलाई 2004 को उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और गोवा के राज्यपालों को केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर हटाया गया था। पीठ के निष्कर्ष: (1) राष्ट्रपति बिना कारण बताए और बिना सुनवाई के राज्यपाल को हटा सकता है; (2) पर यह शक्ति मनमाने, सनकी या अनुचित ढंग से प्रयोग नहीं हो सकती, केवल दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों में, ठोस कारणों से; (3) केंद्र की नीतियों या विचारधारा से मेल न खाना, या केंद्र का विश्वास खो देना हटाने का आधार नहीं; केंद्र में सरकार बदलना भी आधार नहीं; (4) हटाने का निर्णय सीमित न्यायिक समीक्षा के अधीन है: आरंभिक रूप से मनमानापन या दुर्भावना दिखाई जाए तो न्यायालय केंद्र से सामग्री मँगवा सकता है, पर पर्याप्तता की जाँच नहीं करता।
अब आयोगों की राय, जो सिफ़ारिशें हैं, क़ानून नहीं। सरकारिया आयोग (रिपोर्ट के पैरा 4.7.08 और 4.8.07 से 4.8.09, सिंघल निर्णय में उद्धृत) ने कहा कि पाँच वर्ष का कार्यकाल केवल बहुत कम और अत्यंत ठोस कारण से भंग हो; हटाने से पहले राज्यपाल को कारण बताकर सुनवाई का मौक़ा मिले; और समय से पहले कार्यकाल समाप्त होने पर केंद्र सरकार संसद के दोनों सदनों में कारण रखे। राज्यपाल के चयन के लिए सरकारिया आयोग (पैरा 4.16.01) के मापदंड: जीवन के किसी क्षेत्र में प्रतिष्ठित, राज्य के बाहर का, स्थानीय राजनीति से दूर और हाल के वर्षों में राजनीति में अधिक सक्रिय न रहा हुआ। संविधान समीक्षा आयोग (NCRWC) ने नियुक्ति राष्ट्रपति के हाथ में रखते हुए संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श का सुझाव दिया, सामान्यतः पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा हो, और हटाने या तबादले में भी वैसा ही परामर्श हो। पुंछी आयोग की रिपोर्ट के अध्याय 4 के जो अंश नबाम रेबिया (2016) में उद्धृत हैं, उनमें राज्यपाल की भूमिका पर संविधान सभा की बहस का हवाला है (आगे देखें)।
तालिका: राज्यपाल को हटाने पर क़ानून और सिफ़ारिशें
| बिंदु | संविधान / सर्वोच्च न्यायालय (बाध्यकारी) | आयोग की सिफ़ारिश (बाध्यकारी नहीं) |
|---|---|---|
| हटाने का आधार | प्रसादपर्यंत (156(1)); पर कारण ठोस और दुर्लभ हों, मनमाना नहीं (सिंघल 2010) | सरकारिया: केवल अत्यंत ठोस कारण से, शायद ही कभी |
| सुनवाई | कारण बताना या सुनवाई ज़रूरी नहीं (सिंघल) | सरकारिया: कारण बताकर सुनवाई का मौक़ा; सलाहकार समूह की जाँच |
| राजनीतिक कारण | केंद्र में सरकार बदलना या विचारधारा का टकराव आधार नहीं (सिंघल) | NCRWC: हटाने में भी संबंधित मुख्यमंत्री से परामर्श |
| न्यायिक समीक्षा | सीमित: मनमानापन या दुर्भावना दिखे तो सामग्री तलब | लागू नहीं |
| संसद को सूचना | संविधान में नहीं | सरकारिया: समय-पूर्व समाप्ति के कारण संसद में रखे जाएँ |
राज्यपाल की शक्तियाँ: एक सरल वर्गीकरण
सारी शक्तियाँ याद रखने की जगह उन्हें चार खानों में रखें: कार्यपालिका (काम चलाने की), विधायी (क़ानून बनवाने की), वित्तीय (पैसे के काम की) और न्यायिक या आपातकालीन। नीचे की तालिका में हर शक्ति के साथ अनुच्छेद दिया है, जिसे आप उत्तर में सीधे लिख सकते हैं।
तालिका: शक्तियाँ और अनुच्छेद
| क्षेत्र | शक्ति | अनुच्छेद |
|---|---|---|
| कार्यपालिका | मुख्यमंत्री की नियुक्ति; अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर; मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत | 164(1) |
| कार्यपालिका | राज्य सरकार की सारी कार्रवाई राज्यपाल के नाम से; कामकाज के नियम बनाना | 166(1), 166(3) |
| कार्यपालिका | महाधिवक्ता (Advocate-General) की नियुक्ति | 165(1) |
| कार्यपालिका | राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति | 316(1) |
| कार्यपालिका | राज्य निर्वाचन आयुक्त (पंचायत चुनावों के लिए) की नियुक्ति | 243K(1) |
| कार्यपालिका | ज़िला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति उच्च न्यायालय से परामर्श से | 233(1) |
| विधायी | सदन बुलाना, सत्रावसान, विधानसभा भंग करना; दो सत्रों के बीच छह माह से अधिक अंतर नहीं | 174 |
| विधायी | सदन को संबोधन और संदेश; पहले सत्र में अभिभाषण | 175, 176 |
| विधायी | विधेयक पर अनुमति देना, रोकना या राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना | 200 |
| विधायी | विधानमंडल के सत्र में न होने पर अध्यादेश जारी करना | 213 |
| वित्तीय | वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) सदन में रखवाना | 202(1) |
| वित्तीय | वित्त संबंधी विधेयक राज्यपाल की सिफ़ारिश के बिना पेश नहीं हो सकते (कर घटाने का संशोधन अपवाद) | 207(1) |
| न्यायिक | क्षमा, प्रविलंबन, परिहार, निलंबन, लघुकरण; मृत्युदंड को निलंबित, परिहार या लघु करने की शक्ति राष्ट्रपति की शक्ति से प्रभावित नहीं | 161; 72(3) |
| अन्य | विधायकों की अयोग्यता पर निर्णय, पर चुनाव आयोग की राय लेकर उसी के अनुसार | 192 |
| आपातकालीन | राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर राष्ट्रपति को रिपोर्ट (राष्ट्रपति "अन्यथा" भी संतुष्ट हो सकता है) | 356(1) |
आरेख: राज्यपाल की शक्तियाँ
राज्यपाल
कार्यपालिका
- मुख्यमंत्री और मंत्री (164)
- महाधिवक्ता (165)
- SPSC सदस्य (316)
- राज्य निर्वाचन आयुक्त (243K)
विधायी
- सत्र, सत्रावसान, विघटन (174)
- अभिभाषण और संदेश (175-176)
- विधेयकों पर अनुमति (200)
- अध्यादेश (213)
वित्तीय
- बजट रखवाना (202)
- वित्त विधेयकों की सिफ़ारिश (207)
न्यायिक
- क्षमा और दंड में रियायत (161)
- मृत्युदंड: निलंबन, परिहार, लघुकरण (72(3))
आपातकालीन
- अनुच्छेद 356 की रिपोर्ट
- अनुच्छेद 192 में चुनाव आयोग की राय
सहायता और सलाह बनाम विवेक: असली बहस
अनुच्छेद 163(1) कहता है कि मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद राज्यपाल को सहायता और सलाह देगी, उन कार्यों को छोड़कर जो संविधान के अनुसार राज्यपाल को अपने विवेक से करने हैं। अनुच्छेद 163(2) में विवेक का प्रश्न उठे तो राज्यपाल का निर्णय अंतिम है, और 163(3) में मंत्रियों ने क्या सलाह दी, इसकी जाँच न्यायालय में नहीं हो सकती।
शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (23 अगस्त 1974, सात न्यायाधीश) इस विषय का आधार-स्तंभ है। न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों संवैधानिक या औपचारिक प्रमुख हैं और वे अपनी शक्तियाँ मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से प्रयोग करते हैं, सिवाय उन क्षेत्रों के जहाँ संविधान स्वयं राज्यपाल को विवेक से काम करने को कहता है। संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर ने भी यही रेखा खींची थी, जैसा पुंछी आयोग और नबाम रेबिया में उद्धृत है: राज्यपाल का कोई ऐसा कार्य नहीं जो वह अकेले करे, पर कर्तव्य हैं, जैसे मंत्रिमंडल को सलाह देना, चेताना और पुनर्विचार का आग्रह करना।
नबाम रेबिया (13 जुलाई 2016, पाँच न्यायाधीश) इसका ताज़ा उदाहरण है। अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल ने 9 दिसंबर 2015 के आदेश से विधानसभा का छठा सत्र 14 जनवरी 2016 से घटाकर 16 दिसंबर 2015 कर दिया और सदन की कार्यवाही का तरीक़ा बताने वाला संदेश भी भेजा। न्यायालय ने आदेश को अनुच्छेद 163 सहित 174 का उल्लंघन और संदेश को अनुच्छेद 163 सहित 175 का उल्लंघन मानकर रद्द किया, सदन के सारे निर्णय अमान्य ठहराए और 15 दिसंबर 2015 की यथास्थिति बहाल की। सीख: सत्र बुलाने जैसे काम में राज्यपाल अपनी मर्ज़ी से नहीं चल सकता।
विश्लेषण: तब असली विवेक कहाँ बचता है? तीन जगहें अक्सर बताई जाती हैं। (1) त्रिशंकु विधानसभा में मुख्यमंत्री किसे बुलाया जाए; (2) अनुच्छेद 356 के लिए रिपोर्ट; (3) विधेयक को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय के दो हाल के फ़ैसले अलग-अलग राय रखते हैं (नीचे देखें)। पहले बिंदु पर भी रामेश्वर प्रसाद (2006) ने सीमा लगाई: राज्यपाल "स्वयंभू राजनीतिक लोकपाल" (autocratic political Ombudsman) नहीं है।
विधेयक और राज्यपाल: अनुच्छेद 200 और 201
अनुच्छेद 200 का सीधा पाठ: विधानसभा (और जहाँ परिषद है, दोनों सदनों) से पारित विधेयक राज्यपाल के पास आता है और वह घोषित करेगा कि (क) विधेयक पर अनुमति देता है, (ख) अनुमति रोकता है, या (ग) राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करता है। पहला परंतुक: धन विधेयक न हो तो राज्यपाल "यथाशीघ्र" विधेयक को संदेश के साथ पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है; सदन उसे संशोधन के साथ या बिना दोबारा पारित कर भेजे तो राज्यपाल अनुमति नहीं रोकेगा। दूसरा परंतुक: जो विधेयक उच्च न्यायालय की शक्तियों को इतना घटाए कि उसकी संवैधानिक स्थिति ख़तरे में पड़े, उसे राज्यपाल को आरक्षित करना ही होगा। अनुच्छेद 201: राष्ट्रपति अनुमति दे या रोके; धन विधेयक न हो तो वह राज्यपाल को संदेश के साथ लौटाने का निर्देश दे सकता है, और सदन ऐसे संदेश के छह माह के भीतर पुनर्विचार करे।
व्यवहार की समस्या यह है कि अनुच्छेद 200 में कोई समय-सीमा नहीं है, केवल "यथाशीघ्र"। नीचे के तीन निर्णय बताते हैं कि न्यायालय ने इस ख़ाली जगह को कैसे भरा।
आरेख: विधेयक का सफ़र (अनुच्छेद 200 और 201)
विधानसभा से पारित
जहाँ परिषद है, वहाँ दोनों सदनों से
राज्यपाल के पास प्रस्तुत
तीन विकल्प: अनुमति, अनुमति रोकना (धन विधेयक न हो तो संदेश के साथ लौटाना), या राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना
लौटाया गया तो पुनर्विचार
सदन फिर पारित करे और राज्यपाल को भेजे तो राज्यपाल अनुमति नहीं रोक सकता (पहला परंतुक)
राष्ट्रपति के पास आरक्षित
राष्ट्रपति अनुमति दे या रोके, या धन विधेयक न हो तो लौटाने का निर्देश दे (अनु. 201)
राष्ट्रपति द्वारा लौटाया गया
सदन छह माह में पुनर्विचार करे; फिर पारित हो तो राष्ट्रपति के सामने दोबारा जाए
तीन निर्णय, एक सवाल: राज्यपाल बिल कितनी देर रोक सकता है?
| निर्णय | तारीख़ और पीठ | मुख्य बात |
|---|---|---|
| पंजाब राज्य बनाम राज्यपाल के प्रधान सचिव (2023 INSC 1017) | 10-11-2023; तीन न्यायाधीश (मुख्य न्यायाधीश डॉ. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता) | राज्यपाल विधेयक को अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रख सकता। अनुमति रोकनी हो तो पहले परंतुक के अनुसार विधेयक संदेश के साथ विधानमंडल को लौटाना होगा; अन्यथा निर्वाचित विधायिका पर अनिर्वाचित प्रमुख का परोक्ष वीटो बन जाएगा। अध्यक्ष बिना सत्रावसान सदन की बैठक दोबारा बुला सकता है। |
| तमिलनाडु राज्य बनाम राज्यपाल (2025 INSC 481) | 08-04-2025; दो न्यायाधीश (न्यायमूर्ति पारदीवाला और न्यायमूर्ति महादेवन) | सामान्य नियम: अनुच्छेद 200 में राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह मानेगा (अपवाद: दूसरा परंतुक और अनु. 163(1)); रोकने या आरक्षित करने की समय-सीमाएँ एक माह या तीन माह; पुनर्विचार के बाद पुनः प्रस्तुत विधेयक पर एक माह में अनुमति। दस विधेयकों को न्यायालय ने अनुच्छेद 142 का प्रयोग कर, पुनर्विचार के बाद राज्यपाल के पास पहुँचने की तारीख़ (18-11-2023) पर "मानित रूप से स्वीकृत" घोषित किया। |
| राष्ट्रपति संदर्भ, विशेष संदर्भ सं. 1 of 2025 (2025 INSC 1333) | 20-11-2025; पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ (मुख्य न्यायाधीश गवई की अध्यक्षता); अनुच्छेद 143 की सलाहकारी राय | राज्यपाल के पास तीन ही विकल्प (अनुमति, आरक्षण, संदेश के साथ लौटाना); अनुच्छेद 200 में वह मंत्रिपरिषद की सलाह से बँधा नहीं; मेरिट पर न्यायिक समीक्षा नहीं, पर लंबी, अकारण और अनिश्चित निष्क्रियता पर सीमित आदेश संभव; न्यायालय द्वारा समय-सीमा तय करना उचित नहीं; "मानित अनुमति" की अवधारणा अनुच्छेद 142 से भी स्वीकार्य नहीं। |
विश्लेषण: संदर्भ की राय अप्रैल 2025 के फ़ैसले से समय-सीमा, मानित अनुमति और सलाह-बाध्यता पर अलग राह लेती है; उत्तर में दोनों तारीख़ें लिखें।
अध्यादेश: अनुच्छेद 213
राज्यपाल अध्यादेश तभी जारी कर सकता है जब विधानसभा सत्र में न हो (जहाँ परिषद है, दोनों सदन सत्र में न हों) और वह संतुष्ट हो कि तुरंत कार्रवाई ज़रूरी है। तीन स्थितियों में राष्ट्रपति के निर्देश चाहिए: जब वही प्रावधान वाले विधेयक को सदन में रखने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति लगती; जब राज्यपाल वैसा विधेयक राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना ज़रूरी समझता; या जब वैसा क़ानून राष्ट्रपति की अनुमति के बिना अवैध होता (213(1) के परंतुक)।
अध्यादेश का बल राज्य के क़ानून के बराबर है, पर यह विधानसभा के सामने रखा जाना चाहिए और विधानसभा के पुनः समवेत होने के छह सप्ताह बाद, या उससे पहले अस्वीकृति का संकल्प पारित होने पर, प्रभावी नहीं रहता। राज्यपाल इसे किसी भी समय वापस ले सकता है (213(2))। अगर वह ऐसा प्रावधान करे जो विधानसभा का अधिनियम होने पर अवैध होता, तो अध्यादेश शून्य है (213(3))।
अध्यादेश के दुरुपयोग पर दो निर्णय परीक्षा के लिए अनिवार्य हैं। डी.सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (20 दिसंबर 1986, पाँच न्यायाधीश): बिहार के राज्यपाल ने 1967 से 1981 के बीच 256 अध्यादेश जारी किए और उन्हें बार-बार दोबारा जारी करके एक से 14 वर्ष तक जीवित रखा; कुछ अध्यादेश लगभग 14 वर्ष तक चलते रहे। न्यायालय ने इस तरीक़े को संविधान के साथ धोखा माना। कृष्ण कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (2 जनवरी 2017, सात न्यायाधीश की पीठ) ने इसी बात को दोहराया और जोड़ा: अध्यादेश बनाने की शक्ति विधायी स्वरूप की है पर राज्यपाल समानांतर क़ानून-निर्माता नहीं है; अध्यादेश को विधानमंडल के सामने रखना अनिवार्य संवैधानिक दायित्व है; दोबारा जारी करना संविधान के साथ धोखा है; और अनुच्छेद 213 में राज्यपाल की संतुष्टि न्यायिक समीक्षा से मुक्त नहीं (44वें संशोधन में खंड 4 हटने के बाद)। कसौटी: क्या संतुष्टि किसी प्रासंगिक सामग्री पर आधारित थी; न्यायालय सामग्री की पर्याप्तता नहीं देखता, पर दुर्भावना या शक्ति के साथ धोखा देखता है।
तालिका: अधिनियम और अध्यादेश में अंतर
| बिंदु | अधिनियम (विधानमंडल का क़ानून) | अध्यादेश (अनुच्छेद 213) |
|---|---|---|
| कौन बनाता है | विधानमंडल; राज्यपाल की अनुमति से (अनु. 200) | राज्यपाल, मंत्रिपरिषद की सलाह पर, जब सदन सत्र में न हो |
| शर्त | विधेयक का पारित होना | सदन सत्र में न हो और तुरंत कार्रवाई ज़रूरी हो (राज्यपाल की संतुष्टि) |
| अवधि | जब तक निरसित न हो | विधानसभा के पुनः समवेत होने के छह सप्ताह तक, या अस्वीकृति या वापसी से पहले |
| नियंत्रण | विधानमंडल स्वयं | सदन के सामने रखना अनिवार्य; अस्वीकृति संभव; दोबारा जारी करना अवैध (वाधवा, कृष्ण कुमार सिंह) |
| न्यायिक समीक्षा | संवैधानिक वैधता पर | राज्यपाल की संतुष्टि पर सीमित समीक्षा (कृष्ण कुमार सिंह 2017) |
अनुच्छेद 356 और राज्यपाल की रिपोर्ट
अनुच्छेद 356(1): राष्ट्रपति "राज्यपाल से रिपोर्ट मिलने पर या अन्यथा" संतुष्ट हो कि राज्य की सरकार संविधान के अनुसार नहीं चलाई जा सकती, तो उद्घोषणा कर सकता है। उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों की दो माह में मंज़ूरी चाहिए (356(3)); मंज़ूरी के बाद वह छह माह चलती है और हर बार छह माह बढ़ाई जा सकती है, पर किसी भी हाल में तीन वर्ष से अधिक नहीं (356(4))।
एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (11 मार्च 1994, नौ न्यायाधीश) ने इस शक्ति पर पहरा बैठाया: राष्ट्रपति की संतुष्टि न्यायिक समीक्षा के दायरे में है, कम से कम इतनी कि देखा जाए कि उद्घोषणा की पूर्व-शर्तें थीं या नहीं; सामग्री की पर्याप्तता नहीं, पर उससे निकाले गए निष्कर्ष की वैधता देखी जा सकती है। कर्नाटक वाले हिस्से में राज्यपाल की रिपोर्ट पर टिप्पणी थी कि विधायकों के समर्थन की जाँच का सही रास्ता सदन में बहुमत-परीक्षण (floor test) था, राज्यपाल का स्वयं निष्कर्ष निकालना नहीं। 2016 के पेपर में इसी निर्णय की सुरक्षाएँ पूछी गई थीं; उनका विस्तार केंद्र-राज्य संबंध वाले पेज पर मिलेगा।
रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (24 जनवरी 2006, पाँच न्यायाधीश) बोम्मई का सबसे नज़दीकी उदाहरण है; उसका पूरा ब्योरा नीचे के केस स्टडी में है।
समय-रेखा: राज्यपाल से जुड़े प्रमुख निर्णय
1974
शमशेर सिंह: राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख, मंत्रिपरिषद की सलाह से चलेगा
1986
वाधवा: अध्यादेशों को बार-बार दोबारा जारी करना संविधान के साथ धोखा
1994
बोम्मई: अनुच्छेद 356 की उद्घोषणा न्यायिक समीक्षा के दायरे में
2006
रामेश्वर प्रसाद: बिहार विधानसभा का विघटन असंवैधानिक
2010
सिंघल: राज्यपाल को हटाने की शक्ति मनमानी नहीं हो सकती
2016
नबाम रेबिया: सत्र के मामले में राज्यपाल का विवेक सीमित
2017
कृष्ण कुमार सिंह: अध्यादेश दोबारा जारी करना धोखा, संतुष्टि की सीमित समीक्षा
2023
पंजाब: विधेयक अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रखे जा सकते
2025 (अप्रैल)
तमिलनाडु: एक और तीन माह की समय-सीमाएँ
2025 (नवंबर)
राष्ट्रपति संदर्भ की राय: समय-सीमा नहीं, सीमित समीक्षा
मुख्य तथ्य
- नियुक्ति (अनु. 155)
- राष्ट्रपति, अपने हस्ताक्षर और मुहर वाले अधिपत्र से (संविधान, 1950)।
- कार्यकाल (अनु. 156)
- राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत; सामान्यतः पाँच वर्ष; उत्तराधिकारी के पद सँभालने तक पद पर बने रहना (1950)।
- पात्रता (अनु. 157)
- भारत का नागरिक और 35 वर्ष की आयु पूरी (1950)।
- शपथ (अनु. 159)
- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, या उनकी अनुपस्थिति में वरिष्ठतम न्यायाधीश के सामने (1950)।
- सहायता और सलाह (अनु. 163)
- मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद सलाह देती है, विवेकाधीन क्षेत्रों को छोड़कर (1950)।
- सत्रों का अंतर (अनु. 174(1))
- पिछली बैठक और अगली बैठक के बीच छह माह नहीं बीतने चाहिए (1950)।
- विधेयक (अनु. 200)
- अनुमति, अनुमति रोकना या राष्ट्रपति के लिए आरक्षण; पुनर्विचार के बाद पारित विधेयक पर अनुमति रोकना वर्जित (1950)।
- राष्ट्रपति के लिए आरक्षित विधेयक (अनु. 201)
- लौटाया जाए तो सदन छह माह में पुनर्विचार करे (1950)।
- अध्यादेश (अनु. 213)
- सदन के पुनः समवेत होने के छह सप्ताह बाद प्रभावी नहीं रहता; राज्यपाल कभी भी वापस ले सकता है (1950)।
- अनुच्छेद 356
- उद्घोषणा को दो माह में संसद की मंज़ूरी; मंज़ूरी के बाद छह माह; अधिकतम तीन वर्ष (356(3), 356(4))।
- अनुच्छेद 361
- राज्यपाल अपने पद के कार्यों के लिए किसी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं; कार्यकाल में उस पर आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं हो सकती (361(1), 361(2))।
- शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य
- 23-08-1974, सात न्यायाधीश: राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख, सलाह से कार्य (1974)।
- वाधवा बनाम बिहार राज्य
- 20-12-1986: 1967-1981 में 256 अध्यादेश जारी; दोबारा जारी करने की प्रथा पर रोक (1986)।
- एस.आर. बोम्मई
- 11-03-1994, नौ न्यायाधीश: अनुच्छेद 356 की उद्घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन (1994)।
- रामेश्वर प्रसाद
- 24-01-2006, पाँच न्यायाधीश: बिहार विधानसभा का 23-05-2005 का विघटन असंवैधानिक (2006)।
- बी.पी. सिंघल
- 07-05-2010, पाँच न्यायाधीश: हटाने की शक्ति मनमानी नहीं (2010)।
- नबाम रेबिया
- 13-07-2016, पाँच न्यायाधीश: राज्यपाल का सत्र-आदेश और संदेश रद्द (2016)।
- कृष्ण कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य
- 02-01-2017: दोबारा अध्यादेश धोखा; संतुष्टि सीमित समीक्षा के अधीन (2017)।
- पंजाब राज्य बनाम राज्यपाल के प्रधान सचिव
- 10-11-2023: विधेयक अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रखे जा सकते (2023)।
- तमिलनाडु राज्य बनाम राज्यपाल
- 08-04-2025: एक और तीन माह की समय-सीमाएँ; दस विधेयक मानित रूप से स्वीकृत (2025)।
- राष्ट्रपति संदर्भ, विशेष संदर्भ सं. 1 of 2025
- 20-11-2025, पाँच न्यायाधीश: समय-सीमा तय नहीं; मानित अनुमति स्वीकार्य नहीं; लंबी निष्क्रियता पर सीमित आदेश (2025)।
- राजस्थान के राज्यपाल का पदभार
- 31-07-2024 को पदभार, आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार (2024)।
राजस्थान का पहलू
राजस्थान के राज्यपाल सचिवालय की आधिकारिक वेबसाइट अब "लोक भवन" (lokbhavan.rajasthan.gov.in) नाम से है। 01-10-2026 को इस वेबसाइट के "राज्यपाल को जानें" पृष्ठ पर श्री हरिभाऊ किसनराव बागडे को माननीय राज्यपाल बताया गया है, और उसी पृष्ठ के अनुसार उन्होंने 31 जुलाई 2024 को पदभार सँभाला। आकाशवाणी की 31-07-2024 की ख़बर के अनुसार शपथ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने दिलाई और राष्ट्रपति द्वारा जारी नियुक्ति-अधिपत्र मुख्य सचिव ने पढ़कर सुनाया; यह अनुच्छेद 159 और 155 का सीधा उदाहरण है। उसी आधिकारिक पृष्ठ पर राज्यपाल कई विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति (Chancellor) के रूप में सूचीबद्ध हैं, जैसे राजस्थान विश्वविद्यालय (जयपुर), जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय (जोधपुर) और मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय (उदयपुर); राज्य सैनिक बोर्ड और भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी की राजस्थान शाखा की अध्यक्षता जैसे पद भी वहाँ दिए हैं। विश्लेषण: ये भूमिकाएँ अनुच्छेद 153 से 167 में वर्णित संवैधानिक कार्यों का हिस्सा नहीं हैं, और उनकी शक्तियों का ब्योरा यहाँ नहीं दिया गया है। पदधारी बदलते रहते हैं, इसलिए परीक्षा से पहले आधिकारिक वेबसाइट पर नाम दोबारा देख लें।
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- "राज्यपाल पाँच वर्ष के लिए निश्चित है" लिखना। अनुच्छेद 156(1) में वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत है; पाँच वर्ष सामान्य कार्यकाल है। सिंघल (2010) जोड़ें: हटाना मनमाना नहीं हो सकता।
- "राज्यपाल पर महाभियोग चलता है" लिखना। संविधान में ऐसी प्रक्रिया नहीं है। NCRWC के मसौदे में राज्य विधानमंडल द्वारा महाभियोग का सुझाव आया था, पर अंतिम सिफ़ारिश में नियुक्ति और हटाने में मुख्यमंत्री से परामर्श है। सिफ़ारिश और क़ानून को मत मिलाइए।
- अनुच्छेद 200 में यह लिखना कि राज्यपाल बिल को हमेशा रोक सकता है। पुनर्विचार के बाद पारित बिल पर वह अनुमति नहीं रोक सकता, धन विधेयक को लौटा नहीं सकता, और "यथाशीघ्र" शब्द अनिश्चित काल की छूट नहीं देता (पंजाब, 2023)।
- 2025 के दो फ़ैसलों को एक ही बात बताना। अप्रैल 2025 (तमिलनाडु) में एक और तीन माह की समय-सीमाएँ और मानित अनुमति थीं, जबकि 20-11-2025 की राष्ट्रपति-संदर्भ राय में न समय-सीमा, न मानित अनुमति। दोनों तारीख़ों के साथ अंतर लिखें।
- अध्यादेश की आयु "जारी होने से छह सप्ताह" लिखना। गिनती सदन के पुनः समवेत होने की तारीख़ से होती है।
- अनुच्छेद 356 में राज्यपाल की रिपोर्ट को अनिवार्य बताना। पाठ में "रिपोर्ट मिलने पर या अन्यथा" है, यानी राष्ट्रपति स्वयं भी संतुष्ट हो सकता है।
- अनुच्छेद 361 की सुरक्षा को पूर्ण छूट बताना। कार्यकाल में आपराधिक कार्यवाही नहीं हो सकती और व्यक्तिगत हैसियत के कार्यों पर दीवानी कार्यवाही के लिए दो माह का पूर्व नोटिस चाहिए; 2025 की राय में व्यक्तिगत छूट बनी रही, पर पद पर सीमित न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
- वर्तमान राज्यपाल का नाम स्मृति से लिखना। नाम आधिकारिक वेबसाइट पर जाँचकर ही लिखें; उत्तर में नाम की जगह निर्णय और अनुच्छेद अधिक अंक दिलाते हैं।
केस स्टडी 1: बिहार विधानसभा का विघटन (रामेश्वर प्रसाद, 2006)
केस स्टडीराज्यपाल ने सरकार बनने से पहले ही विधानसभा भंग करवाई: क्या यह वैध था?
बिहार की 243 सदस्यों वाली विधानसभा के 2005 के चुनाव में किसी दल को बहुमत (122) नहीं मिला। राज्यपाल ने 6 मार्च 2005 की रिपोर्ट में सरकार बनाने का दावा न होने की बात कही और विधानसभा को "निलंबित अवस्था" में रखने की सिफ़ारिश की; 7 मार्च 2005 की उद्घोषणा हुई। 21 मई 2005 की दूसरी रिपोर्ट में राज्यपाल ने लिखा कि लोजपा के 17 या 18 विधायक जद(यू) की ओर जा रहे हैं और उन्हें प्रलोभन दिए जा रहे हैं, इससे लोगों के जनादेश का विरूपण होगा। इसी रिपोर्ट के आधार पर 23 मई 2005 को विधानसभा भंग कर दी गई।
- न्यायालय का निर्णय
- पाँच न्यायाधीशों की पीठ (मुख्य न्यायाधीश सब्बरवाल की अध्यक्षता) ने 23 मई 2005 की उद्घोषणा को असंवैधानिक ठहराया। अंतरिम आदेश 7 अक्टूबर 2005 को आया और विस्तृत निर्णय 24 जनवरी 2006 को।
- राज्यपाल की सीमा
- न्यायालय ने कहा कि किसी दल को सरकार बनाने से रोकने की कोशिश राज्यपाल के कार्य-क्षेत्र में पूरी तरह वर्जित है। अगर कोई दल बहुमत का दावा करके राज्यपाल को संतुष्ट कर दे, तो वह बहुमत को इस आधार पर ठुकरा नहीं सकता कि समर्थन अनैतिक ढंग से जुटाया गया। राज्यपाल "स्वयंभू राजनीतिक लोकपाल" नहीं है।
- दलबदल का मंच
- दलबदल का फ़ैसला दसवीं अनुसूची के तहत विधानसभा अध्यक्ष का है, राज्यपाल का नहीं। राज्यपाल को सदस्यों की अयोग्यता जैसे विवादों से दूर रखने के लिए ही अनुच्छेद 192(2) में चुनाव आयोग की राय की व्यवस्था है।
- फिर भी विधानसभा बहाल क्यों नहीं हुई
- चुनाव आयोग तब तक चार चरणों के चुनाव की तैयारी कर चुका था और पहले दो चरणों की अधिसूचना जारी हो चुकी थी; पहले चरण का मतदान 18 अक्टूबर 2005 को तय था। जनहित और व्यावहारिकता देखकर न्यायालय ने पुरानी विधानसभा बहाल करने का आदेश नहीं दिया।
सीख
निर्णय का सार तीन बातें हैं: राज्यपाल की रिपोर्ट अंतिम सत्य नहीं, न्यायालय उसकी जाँच कर सकता है; बहुमत का फ़ैसला सदन में होता है, राजभवन में नहीं; और असंवैधानिक ठहराने के बाद भी न्यायालय हर बार पुरानी स्थिति बहाल नहीं करता, परिस्थितियाँ देखता है।
केस स्टडी 2: बिलों पर बैठा राज्यपाल (पंजाब, 2023)
केस स्टडीसत्र ही अवैध बताकर बिल रोके गए: क्या राज्यपाल ऐसा कर सकता है?
पंजाब विधानसभा का बजट सत्र 3 मार्च 2023 से बुलाया गया था और अध्यक्ष ने उसे 22 मार्च 2023 को अनिश्चित काल के लिए स्थगित (adjourned sine die) कर दिया। सत्रावसान नहीं हुआ था। बाद में अध्यक्ष ने सदन की बैठकें 19 जून, 20 जून और 20 अक्टूबर 2023 को फिर बुलाईं और कुछ विधेयक पारित हुए। राज्यपाल ने इन बैठकों की वैधता पर सवाल उठाते हुए विधेयकों पर कोई कार्रवाई नहीं की। राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय पहुँची।
- न्यायालय का फ़ैसला (10-11-2023)
- अध्यक्ष सदन की कार्यवाही का संरक्षक है; सत्रावसान के बिना अनिश्चित काल के लिए स्थगित बैठक को दोबारा बुलाना वैध था। इसलिए सत्रों को अवैध मानकर विधेयक रोकना ग़लत ठहरा।
- अनुच्छेद 200 की व्याख्या
- राज्यपाल "यथाशीघ्र" कार्रवाई करे, विधेयक को अनिश्चित काल तक पड़ा नहीं रख सकता। अनुमति रोकनी हो तो पहला परंतुक लगे: विधेयक संदेश के साथ विधायिका को लौटाया जाए। अनिर्वाचित प्रमुख को सीधे वीटो जैसी शक्ति देना संसदीय लोकतंत्र की भावना के उलट है।
- आगे की कड़ी
- इसी विवाद-श्रृंखला का अगला मोड़ तमिलनाडु (8-4-2025) में समय-सीमाओं के रूप में आया, और 20-11-2025 की राष्ट्रपति-संदर्भ राय में समय-सीमाओं को अस्वीकार कर लंबित निष्क्रियता पर सीमित न्यायिक आदेश का रास्ता रखा गया।
सीख
राज्यपाल के पास विधेयक पर "अनुमति रोकना" एक वास्तविक विकल्प है, पर वह उसे लौटाने की प्रक्रिया के साथ जुड़ा है। चुपचाप रोके रखना संविधान की योजना में नहीं है। संघवाद के प्रश्नों में यही उदाहरण दें।
कार्य-उदाहरण: अध्यादेश की आयु कैसे गिनें
हल सहित उदाहरणकाल्पनिक तारीख़ों से अध्यादेश की अवधि
दिया है
- काल्पनिक तारीख़ें (वास्तविक घटना नहीं): विधानसभा की अंतिम बैठक 10 मार्च 2026।
- विधानसभा सत्र में नहीं है, इसलिए राज्यपाल 15 अप्रैल 2026 को एक अध्यादेश जारी करता है।
- विधानसभा का अगला सत्र 1 सितंबर 2026 को शुरू होता है।
- 1कदम 1: शर्त जाँचें अध्यादेश तभी वैध है जब जारी करते समय सदन सत्र में न हो और राज्यपाल संतुष्ट हो कि तुरंत कार्रवाई ज़रूरी है (213(1))। यहाँ दोनों शर्तें पूरी हैं।
- 2कदम 2: अगले सत्र की सीमा अनुच्छेद 174(1) के अनुसार पिछली बैठक और अगली बैठक के बीच छह माह का अंतर नहीं हो सकता। इसलिए अगला सत्र 10 सितंबर 2026 से पहले बैठना ही है (यहाँ 1 सितंबर को बैठ रहा है)।
- 3कदम 3: अध्यादेश सदन में रखें अध्यादेश को विधानसभा के सामने रखना अनिवार्य है; न रखना गंभीर संवैधानिक उल्लंघन है (कृष्ण कुमार सिंह, 2017)।
- 4कदम 4: छह सप्ताह गिनें 1 सितंबर 2026 से 42 दिन गिनें: 30 सितंबर तक 30 दिन, फिर 12 दिन, यानी 13 अक्टूबर 2026। इस तारीख़ को अध्यादेश प्रभावी नहीं रहता, जब तक उसकी जगह अधिनियम न बन जाए।
- 5कदम 5: जल्दी समाप्ति अगर इससे पहले विधानसभा अस्वीकृति का संकल्प पारित कर दे, तो अध्यादेश उसी क्षण समाप्त हो जाता है; राज्यपाल इसे कभी भी वापस भी ले सकता है (213(2))।
निष्कर्ष: इस उदाहरण में अध्यादेश 15 अप्रैल 2026 से 13 अक्टूबर 2026 तक चल सकता है, यानी लगभग छह माह। विश्लेषण: चूँकि अंतर छह माह तक हो सकता है और उसके ऊपर छह सप्ताह जुड़ते हैं, सिद्धांत में अध्यादेश की अधिकतम आयु लगभग साढ़े सात माह तक पहुँच सकती है। दोबारा जारी करने की अनुमति नहीं है।
पिछले वर्षों के प्रश्न (हल)
2018RAS मुख्य परीक्षापेपर III10 अंक
Describe the powers of the Governor regarding promulgation of ordinance. / अध्यादेश प्रख्यापित करने के सम्बन्ध में राज्यपाल की शक्तियों का वर्णन कीजिये।
आदर्श उत्तर
अनुच्छेद 213 में राज्यपाल अध्यादेश तब जारी कर सकता है जब विधानसभा सत्र में न हो और तुरंत कार्रवाई ज़रूरी हो। तीन स्थितियों में राष्ट्रपति के निर्देश चाहिए। अध्यादेश का बल अधिनियम के बराबर है, पर उसे सदन के सामने रखना होगा; पुनः समवेत होने के छह सप्ताह बाद, या अस्वीकृति संकल्प पर, वह समाप्त हो जाता है। राज्यपाल उसे वापस ले सकता है। राज्य-अधिनियम के रूप में अवैध प्रावधान वाला अध्यादेश शून्य है। वाधवा (1986) और कृष्ण कुमार सिंह (2017) के अनुसार दोबारा जारी करना संविधान के साथ धोखा है।
2024RAS मुख्य परीक्षापेपर III10 अंक
Governor's role; Tamil Nadu v Governor (Arts 200/201) and federalism (प्रश्न का सार)
आदर्श उत्तर
राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख है और सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह से चलता है (अनुच्छेद 163(1); शमशेर सिंह, 1974)। अनुच्छेद 200 में उसके पास अनुमति, अनुमति रोकना या राष्ट्रपति के लिए आरक्षण का विकल्प है। तमिलनाडु (8-4-2025) में एक और तीन माह की समय-सीमाएँ तय हुईं, पर 20-11-2025 की राष्ट्रपति-संदर्भ राय में न समय-सीमा, न मानित अनुमति मानी गई; केवल लंबी निष्क्रियता पर सीमित आदेश संभव है। पंजाब (2023) में विधेयक अनिश्चित काल तक रोकना ग़लत माना गया। संघवाद में निर्वाचित विधायिका की इच्छा और राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका का संतुलन ज़रूरी है।
2024RAS मुख्य परीक्षापेपर III10 अंक
Governor as "a faint presence like the full moon at mid-day" (प्रश्न का सार)
आदर्श उत्तर
कथन आधा सही है। सामान्य समय में राज्यपाल "फीका" ही है: अनुच्छेद 163(1) और शमशेर सिंह (1974) के अनुसार वह मंत्रिपरिषद की सलाह से चलता है, और नबाम रेबिया (2016) ने सत्र जैसे मामलों में उसका विवेक सीमित किया। पर संकट में वह निर्णायक बन जाता है: त्रिशंकु सदन, अनुच्छेद 356 की रिपोर्ट, विधेयकों पर निष्क्रियता। रामेश्वर प्रसाद (2006) और पंजाब (2023) दिखाते हैं कि अतिक्रमण पर न्यायालय रोकता है। अतः उपस्थिति फीकी, पर प्रभाव अवसर-आधारित है। सुधार के लिए सरकारिया आयोग ने निष्पक्ष, राजनीति से दूर व्यक्ति की नियुक्ति सुझाई।
अभ्यास प्रश्न (हमारे अपने, PYQ नहीं)
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
अनुच्छेद 156 के अनुसार राज्यपाल का कार्यकाल क्या है?
आदर्श उत्तर
राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत; सामान्यतः पाँच वर्ष; उत्तराधिकारी के पद सँभालने तक पद पर रहता है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
अनुच्छेद 163(2) में राज्यपाल के विवेक के बारे में क्या कहा गया है?
आदर्श उत्तर
राज्यपाल का निर्णय अंतिम है; विवेक के औचित्य पर न्यायालय में प्रश्न नहीं उठता।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
बी.पी. सिंघल (2010) के अनुसार राज्यपाल को हटाने की सीमाएँ बताइए।
आदर्श उत्तर
अनुच्छेद 156(1) में राज्यपाल प्रसादपर्यंत है, इसलिए बिना कारण बताए हटाना संभव है। पर शक्ति मनमानी नहीं हो सकती; केवल दुर्लभ, ठोस कारणों से प्रयोग होगी। केंद्र की नीतियों से असहमति, विश्वास की कमी या केंद्र में सरकार बदलना आधार नहीं। मनमानापन या दुर्भावना दिखे तो न्यायालय सीमित समीक्षा करेगा और सामग्री मँगवा सकता है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
अनुच्छेद 361 में राज्यपाल को क्या सुरक्षा मिली है? 2025 की राष्ट्रपति-संदर्भ राय ने इस पर क्या स्पष्ट किया?
आदर्श उत्तर
अनुच्छेद 361 में राज्यपाल अपने पद के कार्यों के लिए किसी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं है; कार्यकाल में उस पर आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं हो सकती। 20-11-2025 की राय में कहा गया कि यह व्यक्तिगत छूट है, और अनुच्छेद 200 की लंबी निष्क्रियता पर सीमित न्यायिक आदेश इससे नहीं रुकता।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों की चर्चा कीजिए। नबाम रेबिया (2016) और रामेश्वर प्रसाद (2006) से उदाहरण दीजिए।
आदर्श उत्तर
अनुच्छेद 163(1) के अनुसार राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह से चलता है; विवेक केवल वहाँ है जहाँ संविधान उसे अपने विवेक से कार्य करने को कहता है, और उसका निर्णय 163(2) में अंतिम है। शमशेर सिंह (1974) ने यही रेखा खींची। नबाम रेबिया (2016) में अरुणाचल के राज्यपाल का सत्र पहले बुलाने का आदेश और सदन को भेजा संदेश रद्द हुए। रामेश्वर प्रसाद (2006) में बिहार विधानसभा का विघटन असंवैधानिक ठहरा, क्योंकि राज्यपाल किसी दल को सरकार बनाने से नहीं रोक सकता। विश्लेषण: विवेक की वास्तविक गुंजाइश त्रिशंकु सदन, अनुच्छेद 356 की रिपोर्ट और विधेयकों के आरक्षण में है, जहाँ मतभेद बाक़ी है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
राज्यपाल और अनुच्छेद 356 के संबंध पर टिप्पणी कीजिए। बोम्मई (1994) की क्या भूमिका है?
आदर्श उत्तर
अनुच्छेद 356(1) में राष्ट्रपति "राज्यपाल की रिपोर्ट पर या अन्यथा" संतुष्ट होकर उद्घोषणा कर सकता है; उसे दो माह में संसद की मंज़ूरी चाहिए, और वह अधिकतम तीन वर्ष चल सकती है। दुरुपयोग की आशंका रही है। बोम्मई (1994, नौ न्यायाधीश) ने उद्घोषणा को न्यायिक समीक्षा के दायरे में लाया; कर्नाटक में राज्यपाल का निष्कर्ष निकालने के बजाय सदन में बहुमत-परीक्षण उचित रास्ता माना गया। रामेश्वर प्रसाद (2006) ने बिहार में राज्यपाल की रिपोर्ट पर विघटन असंवैधानिक ठहराया। इस तरह राज्यपाल की रिपोर्ट तथ्यों पर आधारित और सदन के निर्णय की पूरक होनी चाहिए, उसकी जगह लेने वाली नहीं।
10 अंक (100 शब्द) का उत्तर कैसे लिखें
भूमिका
संवैधानिक स्थिति से शुरू करें: राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख है (अनुच्छेद 153, 154, 163(1)); शमशेर सिंह (1974) में सलाह से चलने का सिद्धांत तय हुआ। फिर प्रश्न के शब्दों ("फीका", "अध्यादेश", "अनुच्छेद 200") की ओर मुड़ें।
मुख्य भाग
- मुख्य शक्ति (2 से 3 पंक्तियाँ): प्रश्न जिस शक्ति पर है उसका अनुच्छेद, शर्तें और सीमा, जैसे अनुच्छेद 213 की तीन शर्तें और छह सप्ताह का नियम।
- पक्ष (1 से 2 बिंदु): राज्यपाल की उपयोगिता, जैसे आपात स्थिति में अध्यादेश, त्रिशंकु सदन में संतुलन, केंद्र-राज्य कड़ी।
- सीमाएँ (2 से 3 बिंदु): सलाह-आधारित व्यवस्था; विवेक का दुरुपयोग; न्यायिक नियंत्रण।
- एक निर्णय, नाम और वर्ष के साथ: रामेश्वर प्रसाद (2006), नबाम रेबिया (2016), पंजाब (2023) या तमिलनाडु (2025), और 20-11-2025 की राय हो तो उसकी तारीख़ भी।
निष्कर्ष
निष्कर्ष: राज्यपाल संविधान की कड़ी है, राजनीतिक खिलाड़ी नहीं; सलाह और पारदर्शिता से ही यह पद संघवाद को मज़बूत करता है।
अतिरिक्त मूल्य
- एक सटीक संख्या या तारीख़ (जैसे 213 में छह सप्ताह या 356 में तीन वर्ष) जोड़ें।
- "विश्लेषण" शब्द लिखकर अपनी राय अलग रखें।
- समाप्ति से पहले एक पंक्ति में सुधार का सुझाव दें, जैसे समय-सीमा या सरकारिया की सिफ़ारिश।
एक पन्ने में दोहराव
- अनुच्छेद 153-154: राज्य का एक राज्यपाल; कार्यपालिका शक्ति उसी में निहित; 168(1): विधानमंडल का अंग।
- 155-159: राष्ट्रपति नियुक्त करे (अधिपत्र); प्रसादपर्यंत; पाँच वर्ष; नागरिक और 35 वर्ष; विधानमंडल का सदस्य नहीं; शपथ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के सामने।
- 163(1): सलाह से कार्य; 163(2): विवेक पर निर्णय अंतिम; शमशेर सिंह (1974) सात न्यायाधीश।
- सिंघल (2010): हटाना मनमाना नहीं; विचारधारा या सरकार बदलना आधार नहीं; सीमित समीक्षा।
- अनुच्छेद 200: तीन विकल्प; पुनर्विचार के बाद अनुमति रोकना वर्जित; आरक्षण अनिवार्य यदि उच्च न्यायालय की स्थिति ख़तरे में; 201: छह माह में पुनर्विचार।
- पंजाब (10-11-2023): अनिश्चित काल तक बिल नहीं; तमिलनाडु (8-4-2025): एक और तीन माह; राष्ट्रपति-संदर्भ राय (20-11-2025): समय-सीमा नहीं, मानित अनुमति नहीं, सीमित समीक्षा।
- अनुच्छेद 213: सत्र में न हो; तुरंत कार्रवाई; तीन शर्तों पर राष्ट्रपति के निर्देश; छह सप्ताह; वापसी योग्य; 213(3) शून्यता।
- वाधवा (1986): 256 अध्यादेश; कृष्ण कुमार सिंह (2017): दोबारा जारी करना धोखा, संतुष्टि की सीमित समीक्षा।
- अनुच्छेद 356: रिपोर्ट "या अन्यथा"; 2 माह; 6 माह; अधिकतम 3 वर्ष; बोम्मई (1994): समीक्षा संभव।
- रामेश्वर प्रसाद (2006): राज्यपाल "स्वयंभू राजनीतिक लोकपाल" नहीं; दलबदल का निर्णय अध्यक्ष का।
- नबाम रेबिया (2016): सत्र का आदेश और संदेश रद्द; विवेक सीमित।
याद रखने योग्य शब्द
- सहायता और सलाह
- प्रसादपर्यंत
- अनुच्छेद 200 और 201
- अध्यादेश (213)
- अनुच्छेद 356
- विवेकाधिकार
- सिंघल
- नबाम रेबिया
- रामेश्वर प्रसाद
- राष्ट्रपति संदर्भ 2025