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पेपर III · इकाई II · लोक प्रशासन

कार्मिक प्रशासन: भर्ती, प्रशिक्षण और पदोन्नति

क्रिकेट अकादमी की मिसाल से भर्ती, प्रशिक्षण और पदोन्नति का चक्र समझिए, फिर अनुच्छेद 315 से 323, DPC, APAR और मिशन कर्मयोगी के सत्यापित तथ्यों के साथ उत्तर लिखिए।

  • भर्ती
  • प्रशिक्षण
  • पदोन्नति
  • 2 PYQ हल
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II, लोक प्रशासन: "Personnel administration: recruitment, training, promotion, neutrality and anonymity in civil services, code of conduct." यह पन्ना पहले तीन पदों (भर्ती, प्रशिक्षण, पदोन्नति) को पूरा कवर करता है। तटस्थता, अनामता और आचरण संहिता का अलग पन्ना है।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2013-2024 के उपलब्ध पेपरों में इस विषय से सीधे दो प्रश्न देखे गए: 2024 में सेवा से हटाने (removal) और बर्ख़ास्तगी (dismissal) का अंतर (2 अंक) तथा 2021 में उच्च लोक सेवाओं में पार्श्विक प्रवेश (lateral entry) के प्रभाव का विश्लेषण (5 अंक)।
  • 2023 में अनुच्छेद 315 (राज्य लोक सेवा आयोग) पर 5 अंक का प्रश्न भी आया था। इसलिए अनुच्छेद 315 से 323 का पूरा ढाँचा इसी पन्ने से तैयार कर लें।
  • परीक्षक सही शब्दावली (जैसे removal बनाम dismissal), संवैधानिक अनुच्छेद और ताज़ा उदाहरण (मिशन कर्मयोगी, लेटरल एंट्री) देखता है। इसलिए हर तथ्य के साथ वर्ष और स्रोत याद रखें।

सबसे पहले सरल भाषा में

किसी क्रिकेट अकादमी को सोचिए। पहले ट्रायल से खिलाड़ी चुने जाते हैं (भर्ती)। फिर कोचिंग कैंप में उनकी तकनीक सुधरती है (प्रशिक्षण)। हर सीज़न के प्रदर्शन पर कुछ खिलाड़ी ऊपर की टीम या कप्तानी तक पहुँचते हैं (पदोन्नति)। सरकारी विभाग में यही चक्र चलता है, बस खिलाड़ी की जगह पटवारी, तहसीलदार या RAS अधिकारी होते हैं।

इस चक्र में तीन सवाल हैं: किसे चुना जाए, उसे कैसे तैयार किया जाए, और आगे कौन बढ़े? जवाब क्रम से भर्ती-व्यवस्था, प्रशिक्षण संस्थान और पदोन्नति के नियम देते हैं, जिनके बीच सालाना मूल्यांकन (APAR) कड़ी का काम करता है। नियम तोड़ने पर अनुशासन की प्रक्रिया चलती है, जिसके दो सबसे कड़े नतीजे हैं सेवा से हटाया जाना और बर्ख़ास्तगी। 2024 के पेपर में इन्हीं का अंतर पूछा गया था।

परीक्षा के लिए सटीक परिभाषाएँ

कार्मिक प्रशासन (Personnel administration): सरकारी सेवाओं के लिए लोगों को चुनने, प्रशिक्षित करने, उनके काम का मूल्यांकन करने, पदोन्नत करने और अनुशासित रखने की पूरी व्यवस्था। (सारांश-परिभाषा, किसी लेखक का उद्धरण नहीं।)

भर्ती (Recruitment): रिक्त पदों के लिए योग्य उम्मीदवार आकर्षित करना और चयन-प्रक्रिया से नियुक्ति तक पहुँचाना। प्रशिक्षण (Training): पद के लिए ज़रूरी ज्ञान, कौशल और दृष्टिकोण विकसित करना। पदोन्नति (Promotion): कर्मचारी को उच्च पद, ग्रेड या वेतन-स्तर पर ले जाना, जिसके साथ ज़िम्मेदारी बढ़ती है।

मेरिट प्रणाली (Merit system): नियुक्ति और पदोन्नति का आधार योग्यता यानी परीक्षा, प्रदर्शन और उपयुक्तता। लूट प्रणाली (Spoils system): जीतने वाला राजनीतिक दल अपने समर्थकों को सरकारी पद बाँटता है।

मेरिट प्रणाली बनाम लूट प्रणाली: अंतर एक नज़र में

मेरिट प्रणाली (Merit system)

चयन का आधारयोग्यता, परीक्षा और प्रदर्शन

कार्यकालस्थायी सेवा, सरकार बदलने से असर नहीं

तटस्थताहर सरकार की सेवा कर सकता है

उदाहरणब्रिटेन: नॉर्थकोट-ट्रेवेलियन रिपोर्ट (1854); अमेरिका: पेंडलटन अधिनियम (1883)

लूट प्रणाली (Spoils system)

चयन का आधारराजनीतिक वफ़ादारी और दल की सेवा

कार्यकालसरकार बदलते ही पद बदलने का चलन

तटस्थतासत्ताधारी दल के दबाव में

उदाहरणअमेरिका में 1828 में जैक्सन के चुनाव तक पूरी तरह स्थापित

पहली चार पंक्तियाँ तुलना का विश्लेषण हैं। अंतिम पंक्ति अमेरिकी राष्ट्रीय अभिलेखागार और ब्रिटिश संसद पुस्तकालय के स्रोतों पर आधारित है।

लूट से मेरिट तक: तीन देशों की कहानी

अमेरिका: राष्ट्रीय अभिलेखागार के अनुसार 1828 में एंड्रयू जैक्सन के चुनाव तक "स्पॉयल्स सिस्टम" पूरी तरह जम चुका था, जिसका नाम "to the victor go the spoils" यानी जीतने वाले को लूट का माल वाली कहावत से आया। राष्ट्रपति गारफ़ील्ड की हत्या एक नाराज़ नौकरी-माँगने वाले ने की, जिसके बाद 16 जनवरी 1883 को पेंडलटन अधिनियम बना। इसने प्रतियोगी परीक्षा से चयन की व्यवस्था की, राजनीतिक कारणों से बर्ख़ास्तगी या पदावनति को ग़ैरक़ानूनी बनाया और Civil Service Commission बनाया। शुरू में यह कुल 1,32,000 कर्मचारियों में से केवल 10 प्रतिशत पर लागू था।

ब्रिटेन: फ़रवरी 1854 की नॉर्थकोट-ट्रेवेलियन रिपोर्ट ने प्रतियोगी परीक्षा से भर्ती, योग्यता पर आंतरिक पदोन्नति और सेवा के एकीकृत ढाँचे की सिफ़ारिश की। ब्रिटिश संसद पुस्तकालय के अनुसार इसने राजनीतिक रूप से निरपेक्ष, स्थायी सिविल सेवा की नींव रखी।

भारत: भारत सरकार अधिनियम, 1919 और ली आयोग (1924) के बाद 1 अक्टूबर 1926 को लोक सेवा आयोग बना। बाद में यह फ़ेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन कहलाया और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने पर संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) बना (PIB, 12 अगस्त 2025)।

समय-रेखा: मेरिट आधारित सेवा के पड़ाव

  1. फ़रवरी 1854

    ब्रिटेन: नॉर्थकोट-ट्रेवेलियन रिपोर्ट, परीक्षा से भर्ती और योग्यता पर पदोन्नति की सिफ़ारिश

  2. 16 जनवरी 1883

    अमेरिका: पेंडलटन अधिनियम, प्रतियोगी परीक्षा से चयन और Civil Service Commission

  3. 1 अक्टूबर 1926

    भारत: लोक सेवा आयोग की स्थापना

  4. 26 जनवरी 1950

    संविधान लागू, आयोग का नाम UPSC, भाग XIV में अनुच्छेद 315 से 323

  5. 2019

    10 संयुक्त सचिव पदों के लिए पार्श्विक प्रवेश, UPSC ने नौ नाम सुझाए

  6. सितंबर 2020

    राष्ट्रीय सिविल सेवा क्षमता निर्माण कार्यक्रम (मिशन कर्मयोगी) को मंज़ूरी

  7. 20 अगस्त 2024

    45 पदों का पार्श्विक प्रवेश विज्ञापन रद्द किया गया

तारीख़ें PIB, राष्ट्रीय अभिलेखागार और ब्रिटिश संसद पुस्तकालय के स्रोतों से।

भर्ती के तरीक़े: सीधी भर्ती, पदोन्नति, प्रतिनियुक्ति और पार्श्विक प्रवेश

सीधी भर्ती (direct recruitment) में पद के लिए खुली प्रतियोगिता होती है और चयन आयोग या बोर्ड करता है। अनुच्छेद 320(1) संघ और राज्य आयोगों का कर्तव्य बताता है कि वे क्रमशः संघ और राज्य की सेवाओं के लिए परीक्षाएँ कराएँ। अनुच्छेद 309 के अनुसार भर्ती और सेवा-शर्तें विधानमंडल के अधिनियम से तय होती हैं, और अधिनियम बनने तक राष्ट्रपति या राज्यपाल नियम बना सकते हैं।

पदोन्नति (promotion) में पद उसी सेवा के कर्मचारियों से भरा जाता है। DoPT के दिशानिर्देशों के अनुसार यह तब होता है जब भर्ती नियमों में उसे भर्ती का तरीक़ा बताया गया हो, और उपयुक्तता का आकलन वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष होना चाहिए।

प्रतिनियुक्ति (deputation) की सामान्य परिभाषा: अधिकारी मूल विभाग से निश्चित अवधि के लिए दूसरे विभाग या संस्था में जाता है और बाद में लौटता है। केंद्र में वरिष्ठ प्रशासनिक पदों के लिए Central Staffing Scheme इसकी व्यवस्थित प्रणाली है, जिसमें संगठित समूह A सेवाओं में समाहित या UPSC द्वारा भरे जाने वाले पद शामिल नहीं हैं (DoPT, 28 मार्च 2024)। पार्श्विक प्रवेश (lateral entry) में बाहर के विशेषज्ञ को खुले विज्ञापन से सीधे मध्य या वरिष्ठ स्तर पर लाया जाता है; 2019 में इसका चयन UPSC को सौंपा गया था।

IAS का उदाहरण: IAS (भर्ती) नियम, 1954 के नियम 4(1) में तीन रास्ते हैं: (क) प्रतियोगी परीक्षा, (ख) राज्य सिविल सेवा के स्थायी सदस्य की पदोन्नति, (ग) विशेष मामलों में राज्य सिविल सेवा से बाहर के राजपत्रित अधिकारियों में से चयन।

भर्ती के तरीक़ों की तुलना

तरीक़ाकौन आता हैचयन कैसेलाभ (विश्लेषण)सीमा (विश्लेषण)
सीधी भर्तीबाहर के उम्मीदवार, प्रवेश-स्तर परआयोग या बोर्ड की परीक्षानई प्रतिभाविभाग का अनुभव नहीं
पदोन्नतिउसी सेवा के कर्मचारीDPC का आकलनअनुभव का सम्मानजड़ता
प्रतिनियुक्तिदूसरे विभाग का अधिकारीकेंद्रीय स्टाफ़िंग योजना या सेवा-नियमतुरंत अनुभवअस्थायी, निरंतरता कम
पार्श्विक प्रवेशबाहर के विशेषज्ञखुला विज्ञापन, UPSC चयन (2019)विशेषज्ञताआरक्षण, तटस्थता के प्रश्न

पहले तीन कॉलम तथ्य आधारित हैं (DoPT, संविधान, PIB)। अंतिम दो कॉलम लेखक का विश्लेषण हैं।

संविधान का ढाँचा: अनुच्छेद 309, 311, 312 और 315 से 323

सरकारी सेवा का संवैधानिक आधार भाग XIV में है। अनुच्छेद 309 भर्ती और सेवा-शर्तों का अधिकार विधायिका को देता है, अनुच्छेद 311 हटाने और बर्ख़ास्तगी में सुरक्षा देता है, और अनुच्छेद 312 में राज्यसभा के दो-तिहाई उपस्थित सदस्यों के प्रस्ताव पर संसद नई अखिल भारतीय सेवा बना सकती है (IAS और IPS इसी अनुच्छेद से बनी माने गए हैं)।

अनुच्छेद 315 से 323 लोक सेवा आयोगों का अध्याय हैं। आयोग वह निष्पक्ष चयन-समिति है जो मंत्री से स्वतंत्र रहकर तय करती है कि कौन योग्य है, जैसे बोर्ड परीक्षा में कॉपी जाँचने वाला शिक्षक छात्र को पहचानता नहीं। इस स्वतंत्रता के लिए संविधान ने नियुक्ति, कार्यकाल, हटाने की प्रक्रिया और ख़र्च तक तय किए हैं।

अनुच्छेद 315 से 323 एक नज़र में

अनुच्छेदक्या कहता है
315संघ और प्रत्येक राज्य के लिए एक आयोग; राज्य सहमत हों तो संयुक्त आयोग; राज्यपाल के अनुरोध और राष्ट्रपति की मंज़ूरी से UPSC किसी राज्य की ज़रूरतें भी पूरी कर सकता है।
316नियुक्ति: UPSC और संयुक्त आयोग में राष्ट्रपति, राज्य आयोग में राज्यपाल। लगभग आधे सदस्य कम से कम दस वर्ष सरकारी पद पर रहे हों। कार्यकाल छह वर्ष या आयु 65 (UPSC) और 62 (राज्य, संयुक्त) तक, जो पहले हो। पुनर्नियुक्ति नहीं।
317हटाना केवल राष्ट्रपति के आदेश से, दुराचरण पर, सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद। दिवालिया होने, बाहर वेतनभोगी काम करने या शारीरिक या मानसिक अक्षमता पर राष्ट्रपति बिना जाँच भी हटा सकते हैं।
318 और 319सेवा-शर्तें नियम से तय, नियुक्ति के बाद सदस्य के नुक़सान में नहीं बदलतीं। पद छोड़ने पर UPSC अध्यक्ष को आगे सरकारी रोज़गार नहीं; अन्य सदस्यों को केवल कुछ आयोग-पद।
320परीक्षाएँ कराना; भर्ती-पद्धति, नियुक्ति, पदोन्नति और स्थानांतरण के सिद्धांतों, उपयुक्तता और अनुशासनात्मक मामलों पर परामर्श। अनुच्छेद 16(4) के प्रावधान और अनुच्छेद 335 पर परामर्श अनिवार्य नहीं।
321 से 323अतिरिक्त कार्य क़ानून से संभव; ख़र्च संचित निधि पर भारित; हर वर्ष रिपोर्ट, और सलाह न मानने पर कारण-ज्ञापन विधायिका में रखा जाता है।

RPSC और UPSC की भूमिका: क्या बाध्यकारी है, क्या नहीं

राजस्थान में अनुच्छेद 315(1) के अनुसार राज्य का आयोग RPSC है। इसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं (अनुच्छेद 316), पर हटाने का आदेश राष्ट्रपति देते हैं, वह भी सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद (अनुच्छेद 317)। परीक्षा में यही अंतर अक्सर चूकता है।

अनुच्छेद 320(3) में शब्द "consulted" है, यानी आयोग से सलाह ली जाती है। अनुच्छेद 323 के अनुसार सलाह न मानने पर कारणों का ज्ञापन विधायिका के सामने रखना होता है। इसलिए आयोग की सलाह परामर्शी है, बाध्यकारी नहीं।

समानता और आरक्षण: अनुच्छेद 16(1) सरकारी रोज़गार में सभी नागरिकों को अवसर की समानता देता है। अनुच्छेद 16(4) कहता है कि राज्य ऐसे पिछड़े वर्ग के लिए पदों के आरक्षण का प्रावधान कर सकता है, जिसका सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व राज्य की राय में नहीं है। पदोन्नति में आरक्षण के लिए अलग खंड 16(4A) है। इन्हें यहाँ केवल संवैधानिक प्रावधान के रूप में पढ़ें।

प्रशिक्षण: तैयारी के तीन मौक़े

प्रशिक्षण का काम वही है जो ड्राइविंग स्कूल का होता है: पद की ज़िम्मेदारी निभाने लायक़ बनाना। सामान्य वर्गीकरण (विश्लेषण) में तीन चरण हैं: नियुक्ति के बाद का बुनियादी प्रशिक्षण (foundation), सेवा के दौरान का प्रशिक्षण (in-service) और ऊँचे पदों के लिए मध्य-कैरियर प्रशिक्षण।

LBSNAA, मसूरी: संस्थान के इतिहास-पृष्ठ के अनुसार 15 अप्रैल 1958 को गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने लोकसभा में राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी की घोषणा की। दिल्ली के IAS ट्रेनिंग स्कूल और शिमला के IAS स्टाफ़ कॉलेज को मिलाया गया। 1959 में प्रशिक्षण मेटकाफ़ हाउस से मसूरी की चार्लेविल एस्टेट में गया। नाम 1972 में "लाल बहादुर शास्त्री एकेडमी ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन" और 1973 में "नेशनल" जुड़कर वर्तमान बना। 1960 में IAS, IFS और अन्य केंद्रीय सेवाओं के लिए सामान्य फ़ाउंडेशन कोर्स शुरू हुआ।

HCM रीपा, जयपुर: संस्थान की वेबसाइट के अनुसार राजस्थान प्रशासनिक सेवा अधिकारी प्रशिक्षण विद्यालय 14 नवंबर 1957 को जोधपुर में अस्तित्व में आया। ब्रोशर इसे राज्य और अखिल भारतीय सिविल सेवाओं के अधिकारियों के प्रशिक्षण का राजस्थान सरकार का प्रमुख संस्थान बताता है। राजस्थान राज्य एवं अधीनस्थ सेवाएँ (संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा द्वारा सीधी भर्ती) नियम, 1999 से नियुक्त लोगों का बुनियादी प्रशिक्षण यहीं होता है।

LBSNAA बनाम HCM रीपा

LBSNAA

स्थानमसूरी (उत्तराखंड)

शुरुआत1959 में मसूरी में एकीकृत अकादमी (घोषणा 15 अप्रैल 1958)

सरकारकेंद्र सरकार की राष्ट्रीय अकादमी

किसे प्रशिक्षणIAS और अन्य केंद्रीय सेवाओं के लिए फ़ाउंडेशन कोर्स

वर्तमान नामलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (नाम 1972 और 1973 में बदला)

HCM रीपा

स्थानजयपुर, चार क्षेत्रीय केंद्र: उदयपुर, बीकानेर, जोधपुर, कोटा

शुरुआत14 नवंबर 1957, जोधपुर में अधिकारी प्रशिक्षण विद्यालय के रूप में

सरकारराजस्थान सरकार का प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान

किसे प्रशिक्षणराजस्थान की राज्य और अधीनस्थ सेवाओं के अधिकारी, 1999 के नियमों के अंतर्गत बुनियादी प्रशिक्षण

वर्तमान नामहरिश्चंद्र माथुर राजस्थान राज्य लोक प्रशासन संस्थान

LBSNAA पंक्तियाँ संस्थान के इतिहास-पृष्ठ से। HCM रीपा पंक्तियाँ राजस्थान सरकार की संस्थान-वेबसाइट और ब्रोशर से।

मिशन कर्मयोगी: प्रशिक्षण की नई सोच

मिशन कर्मयोगी, यानी राष्ट्रीय सिविल सेवा क्षमता निर्माण कार्यक्रम (NPCSCB), को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2 सितंबर 2020 को मंज़ूरी दी। पहले कर्मचारी को रैंक के हिसाब से नियम पढ़ाए जाते थे; अब काम की भूमिका के हिसाब से ज़रूरी योग्यताएँ सिखाने का इरादा है। सरकार ने इसे 'नियम-आधारित (rules based)' से 'भूमिका-आधारित (roles based)' HR प्रबंधन की ओर बदलाव कहा है। मंच का नाम Integrated Government Online Training, यानी iGOT-कर्मयोगी, है।

17 सितंबर 2020 के PIB उत्तर के अनुसार इसके छह स्तंभ हैं: नीति, संस्थागत, योग्यता और डिजिटल लर्निंग (iGOT-कर्मयोगी) के ढाँचे, e-HRMS तथा निगरानी-मूल्यांकन ढाँचा। संस्थागत ढाँचे में प्रधानमंत्री की सार्वजनिक मानव संसाधन परिषद, कैबिनेट सचिवालय की समन्वय इकाई, क्षमता निर्माण आयोग (CBC), धारा 8 की विशेष प्रयोजन इकाई (SPV) और कार्यक्रम प्रबंधन इकाई हैं।

2020 की मंज़ूरी में लगभग 46 लाख केंद्रीय कर्मचारियों के लिए 2020-21 से 2024-25 तक 510.86 करोड़ रुपये का प्रावधान था। 6 फ़रवरी 2026 तक iGOT पर 1.49 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता जुड़े, पाठ्यक्रम 4,342 से अधिक हैं और 23 भाषाओं में उपलब्ध हैं (PIB, 11 फ़रवरी 2026)। 28 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ त्रिपक्षीय MoU हो चुके हैं (PIB, 5 फ़रवरी 2026)।

मिशन कर्मयोगी का ढाँचा

मिशन कर्मयोगी (NPCSCB)

संस्थागत ढाँचा

  • प्रधानमंत्री की सार्वजनिक मानव संसाधन परिषद
  • क्षमता निर्माण आयोग (CBC)
  • विशेष प्रयोजन इकाई (धारा 8 कंपनी)
  • कैबिनेट सचिवालय की समन्वय इकाई

छह स्तंभ

  • नीति ढाँचा
  • संस्थागत ढाँचा
  • योग्यता ढाँचा
  • iGOT-कर्मयोगी (डिजिटल लर्निंग)
  • e-HRMS
  • निगरानी और मूल्यांकन

मूल सोच

  • नियम-आधारित से भूमिका-आधारित HR
  • भूमिका, गतिविधि, योग्यता का ढाँचा (FRACs)
  • ऑन-साइट और ऑफ़-साइट सीख

फ़रवरी 2026 की स्थिति (PIB)

  • 1.49 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता
  • 4,342 से अधिक पाठ्यक्रम, 23 भाषाएँ
  • 28 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों से MoU
संरचना PIB के 2 सितंबर 2020 और 17 सितंबर 2020 के विवरण पर, आँकड़े PIB के फ़रवरी 2026 के संसदीय उत्तरों पर आधारित।

पदोन्नति: वरिष्ठता बनाम योग्यता

पदोन्नति के पीछे दो तर्क हैं। वरिष्ठता (seniority): जो पहले आया उसे पहले मौक़ा, इससे पक्षपात घटता है पर औसत प्रदर्शन भी ऊपर पहुँच सकता है। योग्यता (merit): जो ज़्यादा सक्षम हो वही ऊपर जाए, इससे दक्षता बढ़ती है पर आकलन में पसंद-नापसंद का ख़तरा रहता है। कक्षा में मॉनिटर चुनने का उदाहरण लें: केवल रोल-नंबर देखें तो वरिष्ठता, केवल अंक देखें तो योग्यता। (यह तुलना विश्लेषण है।) सरकारी व्यवस्था में दोनों का मिश्रण है, जैसा आगे DPC के नियमों में दिखता है।

DPC और पदोन्नति के मौजूदा नियम

विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) पदोन्नति के लिए अधिकारियों की उपयुक्तता परखती है। DoPT के दिशानिर्देशों के अनुसार समूह A और B के पदों की DPC में पदोन्नति वाले पद से कम से कम एक स्तर ऊपर के अधिकारी होते हैं। समूह B से समूह A में पदोन्नति में UPSC से परामर्श आवश्यक है और तब आयोग का अध्यक्ष या सदस्य DPC की अध्यक्षता करता है (DoPT, 15 मार्च 2024)।

इन दिशानिर्देशों में पदोन्नति का तरीक़ा अब केवल 'चयन (selection)' है; 'selection by merit' और 'selection-cum-seniority' के पुराने भेद हटा दिए गए। कड़ाई बेंचमार्क से तय होती है: वेतन स्तर 12 और ऊपर के पदों के लिए 'Very Good' और उससे नीचे के ग्रेड के लिए (निचले समूह से समूह A सहित) 'Good'।

DPC अधिकारी को केवल 'उपयुक्त (fit)' या 'अनुपयुक्त (unfit)' ठहराती है। उपयुक्तों का पैनल फ़ीडर ग्रेड की आपसी वरिष्ठता के क्रम में बनता है और उनके बीच अतिक्रमण (supersession) नहीं होता। नियुक्तियाँ पैनल के क्रम में होती हैं। आकलन में APAR के साथ दंड या अप्रसन्नता का रिकॉर्ड भी देखा जाता है। स्तर 14 और ऊपर के पदों के लिए DPC यह सुनिश्चित कर सकती है कि पाँचों वर्षों के सभी APAR में 'Very Good' बेंचमार्क पूरा हो।

APAR: सालाना रिपोर्ट-कार्ड

APAR (Annual Performance Assessment Report) अधिकारी का सालाना रिपोर्ट-कार्ड है; 2008-09 से पहले इसे वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) कहते थे। MCR HRD संस्थान की पठन-सामग्री के अनुसार इसके दो उद्देश्य हैं: वर्तमान काम में सुधार और भावी अवसरों के लिए क्षमता का आकलन। इसे विकासात्मक होना चाहिए, नियंत्रण का औज़ार नहीं।

DoPT के निर्देशों में रिपोर्टिंग और समीक्षा अधिकारी मूल्यांकन करते हैं, और जहाँ व्यवस्था है वहाँ स्वीकारकर्ता प्राधिकारी भी। 2008-09 की रिपोर्ट से पूरी APAR अधिकारी को बताई जाती है ताकि वह प्रतिवेदन दे सके। ऑनलाइन भरने के लिए NIC का SPARROW सॉफ़्टवेयर है। DPC इसी APAR के ग्रेड को पदोन्नति का आधार बनाती है।

APAR का चक्र

  1. स्व-मूल्यांकन

    अधिकारी अपना काम स्वयं लिखता है

  2. रिपोर्टिंग अधिकारी

    मूल्यांकन और ग्रेड

  3. समीक्षा अधिकारी

    समीक्षा, मतभेद दर्ज

  4. स्वीकारकर्ता प्राधिकारी

    जहाँ व्यवस्था है, जैसे अखिल भारतीय सेवाएँ

  5. खुलासा और प्रतिवेदन

    अधिकारी को प्रविष्टियाँ बताई जाती हैं

  6. DPC में उपयोग

    पदोन्नति के आकलन में आधार

चरण MCR HRD संस्थान की सामग्री और DoPT के निर्देशों के अनुसार; अखिल भारतीय सेवाओं में असहमति के लिए संदर्भ बोर्ड की भी व्यवस्था है।

हटाना बनाम बर्ख़ास्तगी: अनुशासन की सबसे ऊँची सीढ़ी

अनुशासन के दंड छोटे और बड़े होते हैं। केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1965 के नियम 11 में बड़े दंडों में (vii) अनिवार्य सेवानिवृत्ति, (viii) सेवा से हटाना, जो भविष्य की सरकारी नौकरी के लिए अयोग्यता नहीं होगा, और (ix) बर्ख़ास्त करना, जो सामान्यतः अयोग्यता होगा, गिनाए गए हैं। परंतुक के अनुसार आय से अधिक संपत्ति या रिश्वत का आरोप सिद्ध होने पर (viii) या (ix) का दंड दिया जाना है, पर असाधारण मामले में लिखित कारण देकर अन्य दंड संभव है।

संवैधानिक सुरक्षा: अनुच्छेद 311(1) के अनुसार नागरिक सेवक को नियुक्त करने वाले प्राधिकारी से अधीनस्थ अधिकारी बर्ख़ास्त या सेवा से हटा नहीं सकता। अनुच्छेद 311(2) में बर्ख़ास्तगी, हटाने या पदावनति से पहले जाँच, आरोपों की जानकारी और सुनवाई का उचित अवसर ज़रूरी है। तीन अपवाद हैं: आपराधिक दोषसिद्धि वाला आचरण; जाँच व्यावहारिक रूप से संभव न होना (कारण लिखित में); राज्य की सुरक्षा के हित में राष्ट्रपति या राज्यपाल की संतुष्टि।

राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1958 के नियम 14 में भी हटाना और बर्ख़ास्तगी बड़े दंडों के रूप में अलग-अलग गिनाए गए हैं।

हटाना (removal) बनाम बर्ख़ास्तगी (dismissal)

सेवा से हटाना (removal)

दंड का वर्गबड़ा दंड

CCS (CCA) नियम, 1965 का नियम 11खंड (viii)

भविष्य की सरकारी नौकरीअयोग्यता नहीं होगी (केंद्रीय नियम); राजस्थान के नियम 14 में 'सामान्यतः' अयोग्यता नहीं

अनुच्छेद 311 की सुरक्षालागू: नियुक्ति-प्राधिकारी से अधीनस्थ नहीं हटा सकता, जाँच और सुनवाई ज़रूरी

राजस्थान CCA नियम, 1958 का नियम 14खंड (vi)

बर्ख़ास्तगी (dismissal)

दंड का वर्गबड़ा दंड

CCS (CCA) नियम, 1965 का नियम 11खंड (ix)

भविष्य की सरकारी नौकरीसामान्यतः अयोग्यता होगी

अनुच्छेद 311 की सुरक्षालागू: वही सुरक्षा

राजस्थान CCA नियम, 1958 का नियम 14खंड (vii), सामान्यतः आगे की नौकरी में अयोग्यता

एक पंक्ति में उत्तर: दोनों बड़े दंड हैं और दोनों पर अनुच्छेद 311 लागू है; अंतर यह है कि हटाना सामान्यतः भविष्य की सरकारी नौकरी में बाधा नहीं बनता, बर्ख़ास्तगी सामान्यतः बनती है।

पार्श्विक प्रवेश (lateral entry): प्रभाव का विश्लेषण

तथ्य: PIB (4 जुलाई 2019) के अनुसार NITI Aayog की तीन वर्षीय कार्य-योजना और फ़रवरी 2017 की सचिवों के क्षेत्रीय समूह की रिपोर्ट ने मध्य और वरिष्ठ प्रबंधन स्तर पर बाहरी कर्मियों को लाने की सिफ़ारिश की थी। इसी आधार पर 10 संयुक्त सचिव और 40 उप सचिव या निदेशक स्तर के पदों पर बाहरी विशेषज्ञ लाने का सिद्धांततः निर्णय हुआ।

विश्लेषण (लाभ): विशेषज्ञता का सीधा प्रवेश, नई सोच, कैरियर सेवा पर प्रतिस्पर्धा का दबाव। विश्लेषण (जोखिम): भीतर के अधिकारियों का मनोबल, तटस्थता और हितों के टकराव का प्रश्न, संस्थागत स्मृति की कमी और आरक्षण का सवाल। केंद्रीय कार्मिक राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने अगस्त 2024 में UPSC अध्यक्ष को लिखे पत्र में कहा कि इन पदों को विशेषज्ञ और एकल-संवर्ग (single-cadre) पद माना गया था, इसलिए इनमें आरक्षण का प्रावधान नहीं रहा।

उत्तर का निष्कर्ष संतुलित रखें: UPSC जैसी संवैधानिक संस्था से पारदर्शी चयन, स्पष्ट आचरण-नियम, सामाजिक न्याय पर स्पष्टता और अवधि के बाद जवाबदेही।

मुख्य तथ्य

संघ लोक सेवा आयोग
1 अक्टूबर 1926 को लोक सेवा आयोग बना; 26 जनवरी 1950 से UPSC (PIB, 2025)
राज्य आयोग का आधार
अनुच्छेद 315(1): संघ और प्रत्येक राज्य के लिए आयोग; सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष या आयु 65 (UPSC) और 62 (राज्य) तक (अनुच्छेद 316), संविधान का 2024 का पाठ
सदस्य को हटाना
राष्ट्रपति के आदेश से, दुराचरण पर, सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद (अनुच्छेद 317), संविधान का 2024 का पाठ
आयोग का परामर्श
अनुच्छेद 320(3): भर्ती-पद्धति, पदोन्नति के सिद्धांत, अनुशासन आदि पर परामर्श; अनुच्छेद 16(4) के प्रावधान पर परामर्श अनिवार्य नहीं (320(4)), संविधान का 2024 का पाठ
आरक्षण (संवैधानिक तथ्य)
अनुच्छेद 16(4): राज्य पर्याप्त प्रतिनिधित्व न पाने वाले पिछड़े वर्ग के लिए पदों में आरक्षण का प्रावधान कर सकता है; संविधान का 2024 का पाठ
IAS में भर्ती के तरीक़े
नियम 4(1), IAS (भर्ती) नियम, 1954: प्रतियोगी परीक्षा, राज्य सिविल सेवा से पदोन्नति, विशेष मामलों में चयन
LBSNAA
राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी की घोषणा 15 अप्रैल 1958; 1959 में मसूरी; नाम 1972 और 1973 में बदला (संस्थान का इतिहास-पृष्ठ)
HCM रीपा, जयपुर
अधिकारी प्रशिक्षण विद्यालय 14 नवंबर 1957 को जोधपुर में; पहुँच: 1 अक्टूबर 2026
HCM रीपा के क्षेत्रीय केंद्र
उदयपुर 1 दिसंबर 1982; बीकानेर, जोधपुर, कोटा अगस्त 1983 (ब्रोशर 2023)
मिशन कर्मयोगी की मंज़ूरी
2 सितंबर 2020; 510.86 करोड़ रुपये, 2020-21 से 2024-25, लगभग 46 लाख केंद्रीय कर्मचारी
iGOT-कर्मयोगी
6 फ़रवरी 2026 तक 1.49 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता, 4,342 से अधिक पाठ्यक्रम, 23 भाषाएँ (PIB, 11 फ़रवरी 2026)
हटाना और बर्ख़ास्तगी
CCS (CCA) नियम, 1965 के नियम 11 के खंड (viii) और (ix); हटाना भविष्य की नौकरी में अयोग्यता नहीं, बर्ख़ास्तगी सामान्यतः अयोग्यता
DPC का बेंचमार्क
वेतन स्तर 12 और ऊपर 'Very Good', उससे नीचे 'Good'; तरीक़ा केवल 'selection' (DoPT के 2002 के ज्ञापन का समेकित पाठ, 15 मार्च 2024)
ACR से APAR
2008-09 से पहले वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) कहलाती थी
पार्श्विक प्रवेश 2019
10 संयुक्त सचिव पदों का विज्ञापन; UPSC ने नौ की सिफ़ारिश की (राज्यसभा उत्तर, 4 जुलाई 2019)
पार्श्विक प्रवेश 2024
45 पदों का UPSC विज्ञापन 20 अगस्त 2024 को DoPT के निर्देश पर रद्द
अंतिम जाँच
1 अक्टूबर 2026

राजस्थान का पहलू

नीचे के तथ्य राजस्थान सरकार और केंद्र सरकार के आधिकारिक स्रोतों से हैं, पहुँच-तिथि 1 अक्टूबर 2026। (1) RPSC राजस्थान का राज्य लोक सेवा आयोग है और अनुच्छेद 315(1) के अंतर्गत संवैधानिक निकाय है। इसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं (अनुच्छेद 316)। (2) HCM रीपा, जयपुर राजस्थान सरकार का प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान है। यह 14 नवंबर 1957 को जोधपुर में अधिकारी प्रशिक्षण विद्यालय के रूप में अस्तित्व में आया। राजस्थान राज्य एवं अधीनस्थ सेवाएँ (संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा द्वारा सीधी भर्ती) नियम, 1999 से नियुक्त लोगों का बुनियादी प्रशिक्षण यहाँ होता है। इसके क्षेत्रीय केंद्र उदयपुर, बीकानेर, जोधपुर और कोटा में हैं। (3) राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1958 के नियम 14 में सेवा से हटाना (खंड vi) और बर्ख़ास्तगी (खंड vii) अलग बड़े दंड हैं। (4) PIB की वर्षांत समीक्षा 2025 (24 दिसंबर 2025) के अनुसार 2025 में क्षमता निर्माण आयोग के साथ MoU करने वाले राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में राजस्थान शामिल है।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • हटाने (removal) और बर्ख़ास्तगी (dismissal) को एक ही मान लेना। उत्तर में भविष्य की सरकारी नौकरी वाला अंतर और अनुच्छेद 311 की सुरक्षा दोनों लिखें।
  • यह लिखना कि राज्य आयोग के सदस्य को राज्यपाल हटाते हैं। नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, पर हटाने का आदेश राष्ट्रपति देते हैं और वह भी सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद (अनुच्छेद 317)।
  • आयोग की सलाह को बाध्यकारी बताना। अनुच्छेद 320(3) में परामर्श है, और अनुच्छेद 323 के अनुसार सलाह न मानने पर कारण-ज्ञापन रखा जाता है।
  • पदोन्नति में आज भी 'selection by merit' और 'selection-cum-seniority' दो श्रेणियाँ बताना। मौजूदा दिशानिर्देशों में केवल 'selection' है और कड़ाई बेंचमार्क से तय होती है।
  • मिशन कर्मयोगी को केवल ऑनलाइन कोर्स का पोर्टल समझना। यह नियम-आधारित से भूमिका-आधारित HR की ओर बदलाव का कार्यक्रम है, iGOT उसका मंच है।
  • लेटरल एंट्री के 2024 के विज्ञापन के रद्द होने का कारण बिना बताए केवल 'विवाद' लिख देना। DoPT के निर्देश, आरक्षण और सामाजिक न्याय का संदर्भ साथ दें।
  • आरक्षण के प्रतिशत या सूची बिना आधिकारिक स्रोत के लिख देना। इस विषय में अनुच्छेद 16(4) का नाम और उसका सार काफ़ी है।
  • APAR को आज भी ACR लिखना। 2008-09 से पहले ACR कहा जाता था।