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पेपर III · इकाई II

विकासशील और विकसित समाजों में लोक प्रशासन की भूमिका

विकासशील और विकसित समाजों में प्रशासन की अलग-अलग भूमिका, और प्रशासन सामाजिक परिवर्तन का उपकरण कैसे बनता है: भारत, अमेरिका, ब्रिटेन और राजस्थान के उदाहरण।

  • विकासशील बनाम विकसित
  • सामाजिक परिवर्तन
  • WDR 1997
  • हल PYQ 2016
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई II: "Public Administration: Theories and Principles. Meaning, nature, scope and significance; evolution as a discipline; role in developing and developed societies; New Public Administration, New Public Management, Good Governance, New Public Service." इस पृष्ठ पर 'role in developing and developed societies' है; विकास प्रशासन का अलग पृष्ठ है।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2016 के पेपर III में 2 अंक का प्रश्न आया: 'सामाजिक परिवर्तन के उपकरण के रूप में लोक प्रशासन के कोई दो लक्षण।' संकलित छह पेपरों में यही एकमात्र सीधा प्रश्न है; 2013-2024 के पेपरों में देखा गया तथ्य।
  • पास का विषय विकास प्रशासन 2016 में दो बार आया: 2 अंक (अवधारणा) और 10 अंक (नियामकीय बनाम विकास प्रशासन)। इस पृष्ठ का 'विकासशील समाज' वाला हिस्सा उन उत्तरों में भी मदद करता है।
  • उत्तर में विकासशील और विकसित का फ़र्क़ एक तालिका में, और सामाजिक परिवर्तन का एक-एक उदाहरण (भारत, अमेरिका या ब्रिटेन) देने से अंक बनते हैं। इस पृष्ठ पर तीनों तैयार हैं।

पहले सरल भाषा में: बिना बेंच वाला स्कूल और प्रयोगशाला वाला स्कूल

दो स्कूलों की कल्पना कीजिए। पहले में पक्का भवन ही नहीं, बच्चे ज़मीन पर बैठते हैं और आधे बच्चे दाख़िले से ही बाहर हैं। वहाँ प्रधानाध्यापक का पहला काम है भवन, शिक्षक और दाख़िला जुटाना। दूसरे स्कूल में सब बच्चे आते हैं, भवन और प्रयोगशाला हैं, और चिंता यह है कि पढ़ाई की गुणवत्ता कैसे बढ़े, हर बच्चे की ज़रूरत कैसे पूरी हो। दोनों में प्रशासक की ज़रूरत है, पर काम की प्रकृति अलग है। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया उदाहरण है।)

लोक प्रशासन की भूमिका भी विकासशील और विकसित समाजों में इसी तरह अलग दिखती है। विकासशील समाजों में प्रशासन को अक्सर बुनियादी ढाँचा, सेवाएँ और संस्थाएँ खड़ी करनी पड़ती हैं, और वही सामाजिक बदलाव का मुख्य औज़ार बनता है। विकसित समाजों में बुनियादी ढाँचा काफ़ी हद तक मौजूद है, इसलिए ध्यान सेवाओं की गुणवत्ता, नियमन और नागरिकों के अधिकारों पर टिकता है। (विश्लेषण: यह सामान्यीकरण है; हर देश में अपवाद हैं।)

परीक्षा के लिए सटीक रूप में: लोक प्रशासन सामाजिक परिवर्तन का उपकरण (instrument of social change) तब कहलाता है जब वह क़ानूनों, नीतियों और योजनाओं को लागू करके समाज की असमानताओं, अभावों और रूढ़ियों को बदलने का माध्यम बनता है, केवल यथास्थिति चलाने का नहीं।

विश्व बैंक की नज़र: राज्य की भूमिका और क्षमता

विकासशील समाजों में प्रशासन की भूमिका पर एक प्रामाणिक संदर्भ विश्व बैंक की विश्व विकास रिपोर्ट 1997 (The State in a Changing World) है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य केवल वृद्धि का सीधा प्रदाता नहीं, बल्कि विकास में ‘साझेदार, उत्प्रेरक और सुविधाप्रदाता’ (partner, catalyst, facilitator) है। उसका सबसे चर्चित वाक्य है कि बहुत-से राज्य कम संसाधनों और कम क्षमता के साथ बहुत ज़्यादा करने की कोशिश करते हैं।

इससे दो-भाग की रणनीति निकलती है। पहला, राज्य की भूमिका को उसकी क्षमता से मिलाना: जहाँ संस्थाएँ कमज़ोर हों, वहाँ मूल कामों पर ध्यान देना। दूसरा, संस्थाओं को पुनः सशक्त करना: मनमानी रोकने वाले प्रभावी नियम, सरकार के भीतर प्रतिस्पर्धा का दबाव, और नागरिकों की आवाज़ व भागीदारी बढ़ाना। रिपोर्ट के अनुसार राज्य के पाँच मूल कार्य हैं: क़ानून-व्यवस्था, समष्टि-आर्थिक स्थिरता, बुनियादी सामाजिक सेवाओं और अवसंरचना में निवेश, कमज़ोर वर्गों की सुरक्षा और पर्यावरण की रक्षा।

यहाँ से विश्लेषण: विकासशील समाज के प्रशासक के लिए यह चेतावनी भी है और रास्ता भी। चेतावनी यह कि हर काम अपने हाथ में लेने से क्षमता चूकती है; रास्ता यह कि पहले पाँच मूल कार्यों में मज़बूती आए और बाक़ी में साझेदारी हो।

WDR 1997: क्षमता बढ़ाने के तीन तंत्र

रिपोर्ट का एक मूल विचार है कि बाज़ार और सरकार एक-दूसरे के पूरक हैं: बाज़ार के लिए ज़रूरी संस्थागत नींव रखने का काम राज्य ही करता है। इसलिए 'राज्य को कम करो' या 'राज्य को सब कुछ दो' के बजाय सवाल यह है कि राज्य की क्षमता कैसे बढ़े। रिपोर्ट के अनुसार संस्थाओं को पुनः सशक्त करने के तीन तंत्र हैं: प्रभावी नियम और अंकुश (effective rules and restraints), अधिक प्रतिस्पर्धी दबाव (greater competitive pressure) और नागरिकों की बढ़ी हुई आवाज़ व साझेदारी (increased citizen voice and partnership)।

पहले तंत्र को रिपोर्ट सत्ता के बँटवारे से समझाती है: न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच, या केंद्रीय, प्रांतीय और स्थानीय सत्ताओं के बीच। बँटवारा जितना चौड़ा, मनमानी रोकने वाले 'वीटो बिंदु' उतने अधिक; पर रिपोर्ट चेताती है कि यह दोधारी तलवार है, क्योंकि हानिकारक नियमों को बदलना भी उतना ही कठिन हो जाता है। वह स्वतंत्र न्यायपालिका को ज़रूरी मानती है ताकि विधायिका और कार्यपालिका क़ानून के आगे जवाबदेह रहें, और भ्रष्टाचार घटाने की रणनीति में विवेकाधीन अधिकार कम करने पर ज़ोर देती है। क्षमता कमज़ोर हो तो रास्ता यह है कि पहले मूल कामों पर ध्यान दिया जाए, व्यापार-जगत और नागरिक-समाज से साझेदारी करके सीमित क्षमता का पूरा लाभ लिया जाए, और फिर धीरे-धीरे क्षमता बढ़ाई जाए।

विश्लेषण: भारत में पंचायती राज और सूचना के अधिकार जैसे उपाय 'नागरिक आवाज़' वाले तंत्र से मेल खाते हैं, पर यह मिलान उत्तर लिखने की सुविधा के लिए है; रिपोर्ट ने भारत की किसी योजना का नाम लेकर यह बात नहीं कही।

विकासशील बनाम विकसित समाज: प्रशासन की भूमिका

विकासशील समाज

मुख्य कार्यबुनियादी ढाँचा, सेवाएँ और संस्थाएँ खड़ी करना; सामाजिक-आर्थिक बदलाव की अगुआई

सरकार से अपेक्षाअभाव घटाना, पहुँच बढ़ाना (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार)

चुनौतीसीमित संसाधन और क्षमता; राज्य कई काम एक साथ करने का दबाव (WDR 1997)

नागरिकों का स्वरूपजागरूकता और संगठन में विषमता; भागीदारी बढ़ाने की ज़रूरत

प्रशासन का स्वरूपविकासोन्मुख, कई बार केंद्रीकृत और अगुआ

विकसित समाज

मुख्य कार्यमौजूद सेवाओं की गुणवत्ता, नियमन, नवाचार और अधिकारों की सुरक्षा

सरकार से अपेक्षाबेहतर सेवा, पारदर्शिता, जवाबदेही और विकल्प

चुनौतीजटिल नियमन, बदलती उम्मीदें, उम्रदराज़ आबादी जैसी नई ज़रूरतें

नागरिकों का स्वरूपअपेक्षाकृत संगठित; सक्रिय नागरिक-समाज और मीडिया

प्रशासन का स्वरूपनियामक और सुविधाप्रदाता पर ज़ोर

केवल 'चुनौती' पंक्ति में विकासशील समाज वाला हिस्सा WDR 1997 पर आधारित है; बाक़ी तालिका विश्लेषण है और सामान्य रुझान बताती है, हर देश पर लागू होने वाला नियम नहीं।

विकासशील समाजों में प्रशासन: चार बड़े काम (विश्लेषण)

पहला काम है बुनियादी ढाँचा और सेवाएँ पहुँचाना। जिस गाँव में स्कूल, अस्पताल और पीने का पानी तक नहीं पहुँचा, वहाँ प्रशासन की सफलता का पहला पैमाना यही है कि वे पहुँचें। WDR 1997 के पाँच मूल कार्यों में ‘बुनियादी सामाजिक सेवाओं और अवसंरचना में निवेश’ इसी की पुष्टि करता है। दूसरा काम है संस्थाओं का निर्माण: क़ानून लागू करने वाली संस्थाएँ, स्थानीय निकाय, नियामक। रिपोर्ट के अनुसार संस्थाओं को ‘पुनः सशक्त’ करना राज्य-क्षमता का दूसरा खंभा है।

तीसरा काम है कमज़ोर वर्गों की सुरक्षा। WDR 1997 ने ‘कमज़ोर आबादी की रक्षा’ को राज्य के मूल कामों में गिना है, और भारतीय संविधान में अनुच्छेद 15(4) और 46 इसी भावना के पाठ हैं। चौथा काम है भागीदारी का निर्माण: जब नागरिकों में जागरूकता और संगठन कम हो, तब प्रशासन को स्वयं ऐसे मंच बनाने पड़ते हैं जहाँ आम लोग बोल सकें, जैसे स्थानीय निकाय। रिपोर्ट भी ‘नागरिकों की आवाज़ और साझेदारी’ को संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण का साधन मानती है।

ध्यान रखिए, इन चारों में एक अंतर्निहित तनाव है। जब राज्य के पास क्षमता कम हो और अपेक्षाएँ ऊँची, तब एक साथ चारों में सफल होना कठिन है। इसी वजह से विश्व बैंक ने कहा कि भूमिका को क्षमता से मिलाया जाए और बाक़ी में साझेदारी हो। यही बात उत्तर में ‘संतुलित निष्कर्ष’ के रूप में लिखी जा सकती है।

विकसित समाजों में प्रशासन: बदलती भूमिका (विश्लेषण)

विकसित समाजों में प्रशासन को बुनियादी सेवाएँ पहुँचाने की जद्दोजहद कम होती है, पर नई तरह की चुनौतियाँ सामने आती हैं। सेवाएँ हैं तो अब सवाल यह है: क्या वे उचित गुणवत्ता की हैं, क्या वे सबके लिए बराबरी से उपलब्ध हैं, और क्या नागरिक के पास शिकायत और विकल्प का रास्ता है? ऐसे समाजों में नागरिक-समाज, मीडिया और अदालतें प्रशासन को अधिक कसकर देखते हैं, इसलिए पारदर्शिता और जवाबदेही प्रशासन की रोज़ की भाषा बन जाते हैं।

अमेरिका और ब्रिटेन के उदाहरण बताते हैं कि विकसित समाज भी सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रशासन का सहारा लेते रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रीय अभिलेखागार के अनुसार 1930 के दशक से पहले बुज़ुर्गों की मदद मुख्यतः स्थानीय, राज्य और परिवार का मामला मानी जाती थी; Social Security Act (1935) ने वृद्धावस्था-लाभ की राष्ट्रीय व्यवस्था, बेरोज़गारी बीमा और आश्रित बच्चों की सहायता जैसे ढाँचे खड़े किए। ब्रिटेन की NHS ने 1948 से निःशुल्क, ज़रूरत-आधारित स्वास्थ्य सेवा दी। यानी विकसित समाजों में भी प्रशासन ‘निर्माता’ बनता है, फ़र्क़ यह है कि वे उदाहरण समय के साथ स्थापित प्रणाली के रूप में चलते हैं और आज की चुनौती उन्हें टिकाऊ और बेहतर बनाए रखना है।

इस आधार पर उत्तर में लिखा जा सकता है कि विकसित समाजों में प्रशासन की भूमिका ‘निर्माण’ से ‘परिष्कार और नियमन’ की ओर झुकी रहती है, जबकि विकासशील समाजों में ‘निर्माण और पहुँच’ अधिक प्रमुख रहती है। साथ में यह जोड़ना न भूलें कि यह रुझान है, पक्का नियम नहीं।

सामाजिक परिवर्तन का उपकरण: प्रशासन यह कैसे करता है

प्रशासन समाज बदलने का काम चार तरीक़ों से करता है। पहला, क़ानून का क्रियान्वयन: विधायिका का क़ानून काग़ज़ पर रहता है, जब तक अधिकारी उसे लागू न करे। उदाहरण के लिए संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता समाप्त करता है, पर समाज में बदलाव तब आता है जब प्रशासन क़ानून को निष्पक्षता से लागू करे। दूसरा, सेवा-वितरण: शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, पेंशन जैसी सेवाएँ वंचितों तक पहुँचाना। तीसरा, जन-भागीदारी: पंचायतों, समितियों और स्थानीय निकायों के ज़रिये लोगों को निर्णय में शामिल करना। चौथा, फ़ीडबैक: ज़मीनी अनुभव से नीति-निर्माताओं को बताना कि क्या काम कर रहा है और क्या नहीं।

भारत के संदर्भ में MCRHRDI की सामग्री बताती है कि स्वतंत्रता के बाद सरकार की गतिविधियाँ चौड़ाई और गहराई, दोनों में बहुत बढ़ीं, और ग्रामीण आर्थिक समाज का ‘रूपांतरण और सक्रियण’ सरकार का एक काम बन गया। यानी प्रशासन केवल क़ानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, विकास का भी माध्यम बना।

सामाजिक परिवर्तन के साधन: उदाहरण सहित

साधनक्या करता हैउदाहरण (सत्यापित)
क़ानून का क्रियान्वयनअधिकारों को वास्तविक बनाता हैअनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत); संविधान का पाठ
सेवा-वितरणवंचितों तक शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा पहुँचाता हैअनुच्छेद 21A और RTE अधिनियम, 2009 (6 से 14 वर्ष के बच्चे); ब्रिटेन की NHS (5 जुलाई 1948)
सामाजिक सुरक्षा का ढाँचाजोखिम में पड़े वर्गों को बीमा-सहायताअमेरिका का Social Security Act (14 अगस्त 1935)
जन-भागीदारीस्थानीय स्वशासन के ज़रिये निर्णय में लोगराजस्थान: नागौर में त्रिस्तरीय पंचायती राज का उद्घाटन (2 अक्टूबर 1959)
विशेष प्रावधानवंचित वर्गों के लिए सकारात्मक क़दमअनुच्छेद 15(4), 46

हर उदाहरण की तारीख़/पाठ दो स्रोतों से मिलाया गया है (संविधान के पाठ के लिए मूल पाठ प्राथमिक स्रोत है)।

भारत का संदर्भ: संविधान से प्रशासन तक

भारत में प्रशासन की सामाजिक-परिवर्तन की भूमिका संविधान से सीधे जुड़ी है। प्रस्तावना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय तथा स्थिति और अवसर की समता की बात करती है। अनुच्छेद 38(2) राज्य से आय की असमानताएँ घटाने और स्थिति, सुविधाओं व अवसरों की असमानताएँ मिटाने के प्रयास की अपेक्षा करता है। अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है और अनुच्छेद 46 कमज़ोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की उन्नति का निर्देश देता है। अनुच्छेद 21A के तहत छह से चौदह वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है, जिसे 2009 के अधिनियम ने ज़मीन पर उतारने का ढाँचा दिया (PIB के अनुसार यह क़ानून 6 से 14 वर्ष के हर बच्चे को पड़ोस के स्कूल में निःशुल्क व अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा देने का दायित्व सरकार पर डालता है)।

विश्लेषण: ये प्रावधान राज्य को लक्ष्य देते हैं; लक्ष्य को वास्तविक बनाने का काम प्रशासन करता है। अधिकारी ही तय करता है कि स्कूल कहाँ खुले, दाख़िले किसे मिलें और दस्तावेज़ के अभाव में कोई बच्चा बाहर न रह जाए। इसलिए भारत में ‘प्रशासन = सामाजिक परिवर्तन का उपकरण’ वाक्य केवल सिद्धांत नहीं, संवैधानिक अपेक्षा भी है।

प्रशासन से सामाजिक परिवर्तन तक की कड़ी

  1. क़ानून/नीति

    विधायिका या सरकार लक्ष्य तय करती है

  2. प्रशासनिक संरचना

    विभाग, अधिकारी, बजट, स्थानीय निकाय

  3. सेवा-वितरण व नियमन

    योजनाएँ वंचितों तक, क़ानून का निष्पक्ष प्रवर्तन

  4. जन-भागीदारी

    पंचायतें, समितियाँ, नागरिक-संवाद

  5. फ़ीडबैक

    ज़मीनी अनुभव से नीति में सुधार

विश्लेषण: यही कड़ी बताती है कि क़ानून अकेले समाज नहीं बदलता।

समय-रेखा: सामाजिक परिवर्तन के उदाहरण

  1. 14 अगस्त 1935

    अमेरिका: Social Security Act पर राष्ट्रपति रूज़वेल्ट के हस्ताक्षर

  2. 6 नवंबर 1946

    ब्रिटेन: राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा अधिनियम को शाही स्वीकृति

  3. 5 जुलाई 1948

    ब्रिटेन: NHS शुरू

  4. 2 अक्टूबर 1959

    भारत (राजस्थान): नागौर में त्रिस्तरीय पंचायती राज का उद्घाटन

  5. 1997

    विश्व बैंक की विश्व विकास रिपोर्ट: राज्य की भूमिका 'साझेदार, उत्प्रेरक, सुविधाप्रदाता'

इनके अलावा किसी तारीख़ को पक्का तथ्य न लिखें।

सीमाएँ: प्रशासन अकेला समाज नहीं बदल सकता

विश्लेषण: पहली सीमा, क्षमता। WDR 1997 की चेतावनी याद रखें कि राज्य कम क्षमता में बहुत अधिक करने की कोशिश करता है। दूसरी, सामाजिक रूढ़ियाँ: क़ानून और योजनाएँ हों तो भी सोच बदलने में समय लगता है, इसलिए प्रशासन को जन-भागीदारी और जागरूकता का सहारा लेना पड़ता है। तीसरी, राजनीतिक और संसाधन सीमाएँ: परिवर्तन की गति बजट और राजनीतिक इच्छा पर टिकी रहती है। चौथी, भ्रष्टाचार और लालफ़ीताशाही: जहाँ सेवा पाने के लिए सिफ़ारिश या रिश्वत चाहिए, वहाँ वंचित सबसे पहले छूटते हैं।

संतुलित निष्कर्ष: प्रशासन समाज बदलने का शक्तिशाली औज़ार है, पर अकेला नहीं। क़ानून, संसाधन, राजनीतिक इच्छा और जन-सहयोग साथ आएँ तभी बदलाव टिकता है। विकासशील समाजों में प्रशासन की भूमिका बड़ी दिखती है, इसलिए उसकी जवाबदेही और क्षमता-निर्माण भी उतने ही ज़रूरी हैं।

2 अंक का उत्तर बनाने की विधि (2016 वाला प्रश्न)

2016 के प्रश्न में 15 शब्द की सीमा थी और ‘कोई दो’ लक्षण माँगे गए थे। इसलिए रणनीति सीधी है: दो ही बिंदु, हर बिंदु में एक क्रिया और एक परिणाम, उदाहरण की ज़रूरत नहीं। इस पृष्ठ का मॉडल उत्तर पहले बिंदु में योजनाओं के क्रियान्वयन और सेवा-वितरण को रखता है, और दूसरे में जन-भागीदारी को। इसके अलावा आप ‘क़ानून का निष्पक्ष प्रवर्तन’ या ‘फ़ीडबैक द्वारा नीति-सुधार’ भी चुन सकते हैं; मूल बात यह है कि बिंदु ‘उपकरण’ वाली भूमिका को दिखाएँ, यानी प्रशासन बदलाव लाने का माध्यम है, केवल निष्क्रिय चलाने वाला नहीं।

एक नज़र में: प्रशासन की भूमिका

विकासशील और विकसित समाजों में लोक प्रशासन

विकासशील

  • बुनियादी ढाँचा व सेवाएँ
  • संस्था-निर्माण
  • क्षमता की सीमा (WDR 1997)

विकसित

  • गुणवत्ता और नियमन
  • अधिकारों की सुरक्षा
  • नवाचार (विश्लेषण)

सामाजिक परिवर्तन के साधन

  • क़ानून का क्रियान्वयन
  • सेवा-वितरण
  • जन-भागीदारी
  • फ़ीडबैक

उदाहरण

  • अमेरिका: SSA 1935
  • ब्रिटेन: NHS 1948
  • भारत: अनुच्छेद 21A, RTE
  • राजस्थान: नागौर 1959

मुख्य तथ्य

WDR 1997: राज्य की भूमिका
साझेदार, उत्प्रेरक और सुविधाप्रदाता (partner, catalyst, facilitator)
WDR 1997: राज्य के पाँच मूल कार्य
क़ानून-व्यवस्था, समष्टि-आर्थिक स्थिरता, बुनियादी सामाजिक सेवाएँ व अवसंरचना, कमज़ोरों की रक्षा, पर्यावरण
US Social Security Act
14 अगस्त 1935 (राष्ट्रपति रूज़वेल्ट)
ब्रिटेन का NHS अधिनियम
शाही स्वीकृति 6 नवंबर 1946; सेवा 5 जुलाई 1948 से
RTE से जुड़ा संवैधानिक प्रावधान
अनुच्छेद 21A: 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा
नागौर में पंचायती राज का उद्घाटन
2 अक्टूबर 1959 (नेहरू)
अंतिम जाँच
1 अक्टूबर 2026

राजस्थान का पहलू

राजस्थान सरकार (वित्त विभाग) की तीसरी राज्य वित्त आयोग रिपोर्ट के अनुसार 2 अक्टूबर 1959 को नागौर में प्रधानमंत्री नेहरू ने लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की योजना का उद्घाटन किया और राजस्थान इस प्रणाली को शुरू करने वाला अग्रणी राज्य है; पंचायती राज मंत्रालय की रूपरेखा रिपोर्ट भी तिथि और स्थान की पुष्टि करती है। राजस्थान की अन्य योजनाओं के आँकड़े यहाँ जानबूझकर नहीं दिए गए, क्योंकि उनके लिए तारीख़ वाले आधिकारिक स्रोत चाहिए।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • विकासशील समाज में प्रशासन को केवल ‘क़ानून-व्यवस्था’ तक सीमित बताना: उसकी भूमिका विकास, सेवा-वितरण और संस्था-निर्माण तक फैली है।
  • विकसित समाज में प्रशासन की भूमिका को ‘कम’ बताना: वहाँ भूमिका बदलती है (गुणवत्ता, नियमन, अधिकार), घटती नहीं।
  • सामाजिक परिवर्तन का उपकरण केवल क़ानून को बताना: क़ानून के साथ क्रियान्वयन, सेवा-वितरण, भागीदारी और फ़ीडबैक भी साधन हैं।
  • 2 अंक के उत्तर में चार-पाँच बिंदु लिख देना: 15 शब्द की सीमा में दो ही लक्षण और उदाहरण-रहित; शब्द-सीमा पार करने पर अंक कटते हैं।
  • देशों के उदाहरणों में तारीख़ ग़लत लिखना: अमेरिका का सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 14 अगस्त 1935; ब्रिटेन का NHS 5 जुलाई 1948; नागौर 2 अक्टूबर 1959।
  • सामान्यीकरण को नियम बना देना: ‘सभी विकासशील देशों में प्रशासन केंद्रीकृत होता है’ जैसे वाक्य अपवाद-रहित नहीं हैं।