समश्रुत भिन्नार्थक शब्द
सुनने में एक जैसे, अर्थ में एक-दूसरे से कोसों दूर — ‘अनल’ आग है और ‘अनिल’ हवा, ‘नियत’ तय किया हुआ है और ‘नीयत’ मन का इरादा। RPSC इन शब्दों का अर्थ नहीं पूछता, वाक्य में प्रयोग करके अर्थ स्पष्ट करने को कहता है। इसीलिए इस अध्याय के हर शब्द के साथ उसका अपना वाक्य दिया गया है, और पूरे अध्याय को बनने के कारण के अनुसार चार पृष्ठों में बाँटा गया है।
समश्रुत भिन्नार्थक शब्द किसे कहते हैं
समश्रुत भिन्नार्थक शब्द वे शब्द हैं जो सुनने में लगभग एक जैसे लगते हैं, पर अर्थ में एक-दूसरे से बहुत दूर खड़े हैं। ‘समश्रुत’ का अर्थ ही है — समान रूप से सुनाई देने वाला, और ‘भिन्नार्थक’ का अर्थ है — भिन्न अर्थ वाला। नाम में ही पूरा अध्याय बंद है।
इस अध्याय की ख़ास बात यह है कि इसका उत्तर अर्थ बताकर पूरा नहीं होता। प्रश्न यह नहीं होता कि ‘कूल’ का अर्थ क्या है, बल्कि यह होता है कि ‘कूल’ का प्रयोग किसी वाक्य में करके उसका अर्थ स्पष्ट कीजिए। इसलिए इस पूरे अध्याय में हर शब्द के साथ उसका अपना वाक्य दिया गया है — केवल अर्थ नहीं। जिस दिन वाक्य बनाना आ गया, अर्थ अपने आप सिद्ध हो जाएगा; उल्टा रास्ता काम नहीं करता।
इस अध्याय की बनावट
ये शब्द चार अलग-अलग कारणों से बनते हैं, और चारों की पढ़ने की विधि अलग है। कहीं केवल एक मात्रा बदलती है, कहीं एक व्यंजन, कहीं आगे लगा उपसर्ग। और कुछ जगह तो दो नहीं, तीन शब्द एक साथ खड़े मिलते हैं। इसीलिए इस अध्याय को एक लंबी सूची के रूप में नहीं, चार अलग पृष्ठों में बाँटा गया है — हर पृष्ठ पर वे ही शब्द जो एक ही कारण से बने हैं।
यह बँटवारा सुविधा के लिए नहीं है। एक ही कारण से बने शब्द एक साथ पढ़ने पर दिमाग़ कारण पकड़ लेता है, और फिर नया शब्द सामने आने पर भी उसका अनुमान लगा लेता है। वर्णक्रम वाली मिली-जुली सूची यह काम कभी नहीं करती।
समश्रुत भिन्नार्थक शब्द — चार पृष्ठों में
मात्रा के भेद से अर्थ-भेद
14 युग्म जहाँ केवल एक मात्रा बदलती है — अनल-अनिल, नियत-नीयत
व्यंजन के भेद से अर्थ-भेद
14 युग्म जहाँ एक व्यंजन बदलता है — शुक्ल-शुल्क, परिणाम-परिमाण
उपसर्ग के भेद से अर्थ-भेद
12 युग्म जहाँ उपसर्ग बदलता है — उपकार-अपकार, अवलंब-अविलंब
तीन शब्दों वाले समश्रुत समूह
6 समूह जिनमें तीन-तीन शब्द हैं — तरणि-तरणी-तरुणी सहित
अनेकार्थक शब्द — एक शब्द, अनेक अर्थ
यहाँ दो अलग शब्द सुनने में एक जैसे लगते हैं; वहाँ एक ही शब्द कई अर्थ ढोता है। परीक्षा में इन्हीं दोनों का अंतर पूछा जाता है।
सबसे अधिक पूछे जाने वाले 12 युग्म — एक नज़र में
| शब्द-युग्म | अंतर एक पंक्ति में |
|---|---|
| नियत / नीयत | तय किया हुआ / मन का इरादा |
| ग्रह / गृह | आकाश का पिंड / घर |
| समान / सामान | बराबर / वस्तुएँ |
| शुक्ल / शुल्क | सफ़ेद, चाँदनी पक्ष / फ़ीस |
| अपेक्षा / उपेक्षा | उम्मीद / अनदेखी |
| प्रसाद / प्रासाद | कृपा, भोग / महल |
| अभिराम / अविराम | सुंदर / बिना रुके |
| परिणाम / परिमाण | नतीजा / मात्रा |
| उपकार / अपकार | भलाई / बुराई |
| अवलंब / अविलंब | सहारा / तुरंत |
| कुल / कूल | वंश / नदी का किनारा |
| चरम / चर्म | अंतिम / चमड़ा |
किन परीक्षाओं में पूछा जाता है
| परीक्षा | कहाँ पूछा जाता है |
|---|---|
| RSSB CET वरिष्ठ माध्यमिक (12वीं) स्तर | प्रश्न-पत्र 120 प्रश्न / 240 अंक / 2 घंटे 30 मिनट · सामान्य हिन्दी में ‘शब्द – युग्म’ के रूप में सूचीबद्ध — पाठ्यक्रम दिनांक 29-08-2024 · विषयवार प्रश्न-संख्या आयोग द्वारा प्रकाशित नहीं |
| RPSC RAS मुख्य परीक्षा | प्रश्न-पत्र IV, इकाई I (सामान्य हिन्दी) का भाग अ · 30 अंक वाले भाग के सात बिंदुओं में से एक — आधिकारिक पाठ्यक्रम दिनांक 09-01-2026 |
| RSSB पटवारी | एक ही प्रश्न-पत्र 150 प्रश्न / 300 अंक / 3 घंटे · ‘General English & Hindi’ खंड 22 प्रश्न / 44 अंक · सामान्य हिन्दी के पाठ्यक्रम में ‘शब्द युग्मों का अर्थ भेद’ नाम से — विस्तृत विज्ञप्ति दिनांक 20-02-2025 · ऋणात्मक अंकन 1/3 |
यह सूची जान-बूझकर छोटी रखी गई है। ऊपर वही परीक्षा दी गई है जिसके आधिकारिक पाठ्यक्रम में यह बिंदु इसी नाम से लिखा हुआ मिला। कई अन्य भर्तियों के पाठ्यक्रम में मिलते-जुलते शब्द ‘शब्द युग्म’ या ‘समोच्चरित शब्द’ जैसे नामों से आते हैं, पर जब तक वह नाम उनके अपने पाठ्यक्रम में पढ़ न लिया जाए, उसे यहाँ जोड़ना अनुमान होगा। आयोग अपने पाठ्यक्रम में जो लिखता है, हम वही लिखते हैं।
साथ ही RPSC का अपना नोट भी ध्यान में रखिए — ‘परीक्षा योजना केवल सामान्य मार्गदर्शन के लिए है, अंक और प्रश्न-संख्या बदल सकती है।’
उत्तर लिखने का ढंग, जो अंक दिलाता है
इस प्रश्न में अर्थ लिखकर छोड़ देना आधा उत्तर है। पूरा उत्तर दो हिस्सों का होता है — पहले शब्द का अर्थ, फिर उसी शब्द को रखकर बनाया गया एक छोटा वाक्य। और वाक्य ऐसा हो जिसमें शब्द का अर्थ अपने आप खुल जाए। ‘कूल पर बैठे थे’ लिखने से कुछ सिद्ध नहीं होता; ‘संध्या के समय हम गंगा के कूल पर जा बैठे’ लिखने से यह अपने आप स्पष्ट हो जाता है कि कूल किनारे को कहते हैं। यही वह अंतर है जिस पर अंक कटते या मिलते हैं।
इस अध्याय को शब्द शुद्धि और पारिभाषिक शब्दावली के साथ रखकर पढ़ना सबसे अच्छा रहता है। तीनों में एक जैसी ध्वनियाँ अलग-अलग तरीक़े से परखी जाती हैं — शब्द शुद्धि में वर्तनी की दृष्टि से, पारिभाषिक शब्दावली में शासकीय प्रयोग की दृष्टि से, और यहाँ अर्थ की दृष्टि से। एक ही शब्द तीन कोणों से देख लेने पर वह फिर भूलता नहीं।