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पेपर III · इकाई III · भाग ख (विधि)

IT अधिनियम 2000: धारा 67 से 67C

इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री (67), यौन-स्पष्ट कृत्य (67A), बच्चों से जुड़ी सामग्री (67B) और मध्यवर्तियों का सूचना-संरक्षण का दायित्व (67C): तत्व, सज़ा और तुलना।

  • धारा 67
  • 67A
  • 67B बाल-सामग्री
  • 67C intermediary
  • पहली और बाद की दोषसिद्धि
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (विधि, धारानुसार): सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धाराएँ 67 और 67(A-C), यानी 67, 67A, 67B और 67C। परिभाषाएँ पृष्ठ 1, धारा 65-66 पृष्ठ 2, 66B-66F पृष्ठ 3 और धारा 71-78 पृष्ठ 5 पर हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2013 से 2024 तक के उपलब्ध पेपरों में धारा 67 से 67C पर सीधा प्रश्न नहीं मिला। इन धाराओं का क्षेत्र समाज में बहुचर्चित है, इसलिए 2 अंक का "तत्व और सज़ा" प्रश्न सहज रूप से बन सकता है।
  • चारों धाराओं की सज़ा में पहली और बाद की दोषसिद्धि का फ़र्क़ है (67, 67A, 67B में), और 67C अलग क़िस्म की है। यह सारणी एक नज़र में याद हो जाए तो उत्तर तैयार है।
  • धारा 67B बच्चों से जुड़ी है और बच्चे की परिभाषा उसी में है: जिसने 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं की। इसे बाल-यौन अपराधों के अलग क़ानून (POCSO अधिनियम, 2012) के साथ जोड़कर पढ़ें।

चार धाराएँ: सीढ़ी की तरह

इन चार धाराओं को एक सीढ़ी की तरह देखिए। पहली सीढ़ी धारा 67 है: इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री का प्रकाशन या प्रसारण। उससे ऊपर धारा 67A है: यौन-स्पष्ट कृत्य या आचरण वाली सामग्री, जहाँ सज़ा अधिक है। सबसे ऊपर धारा 67B है: बच्चों से जुड़ी सामग्री, जिसमें बनाना, खोजना, देखना, डाउनलोड करना, फैलाना, सब अपराध गिने गए हैं। चौथी धारा 67C अलग प्रकृति की है: इसमें सामग्री का अपराध नहीं, मध्यवर्तियों (intermediaries) का सूचना-संरक्षण का कर्तव्य है।

तीनों सामग्री-संबंधी धाराओं में कृत्य एक जैसे हैं ("publishes or transmits or causes to be published or transmitted") और अंतर सामग्री की प्रकृति और सज़ा की मात्रा में है। इस ढाँचे को याद रखने से तीनों धाराओं के उत्तर एक साथ बन जाते हैं।

धारा 67: अश्लील सामग्री का इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रकाशन या प्रसारण (Punishment for publishing or transmitting obscene material in electronic form)

पाठ: "Whoever publishes or transmits or causes to be published or transmitted in the electronic form, any material which is lascivious or appeals to the prurient interest or if its effect is such as to tend to deprave and corrupt persons who are likely, having regard to all relevant circumstances, to read, see or hear the matter contained or embodied in it, shall be punished on first conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to three years and with fine which may extend to five lakh rupees and in the event of second or subsequent conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to five years and also with fine which may extend to ten lakh rupees."

कृत्य तीन हैं: प्रकाशित करना (publishes), प्रेषित करना (transmits) और दूसरे से प्रकाशित या प्रेषित कराना (causes to be published or transmitted)। सामग्री की कसौटी तीन में से कोई एक पूरी हो: एक, "lascivious" (कामुक); दो, "appeals to the prurient interest" (कामुक रुचि को उभारने वाली); तीन, ऐसी कि उसका प्रभाव "tend to deprave and corrupt", यानी उन लोगों को भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति वाला हो जो सभी प्रासंगिक परिस्थितियों को देखते हुए उसे पढ़ने, देखने या सुनने की संभावना रखते हैं। तीसरी कसौटी को "प्रभाव-कसौटी" कहा जा सकता है, क्योंकि वहाँ सामग्री के संभावित पाठकों और परिस्थितियों को देखा जाता है।

सज़ा दो चरणों में है। पहली दोषसिद्धि (first conviction): किसी भी प्रकार का कारावास तीन वर्ष तक और जुर्माना पाँच लाख रुपये तक। दूसरी या बाद की दोषसिद्धि: किसी भी प्रकार का कारावास पाँच वर्ष तक और जुर्माना दस लाख रुपये तक। दोनों में कारावास और जुर्माना, दोनों जुड़े हैं ("and with fine")। पुनरावृत्ति पर सज़ा बढ़ना उसी आशय को दिखाता है जो दंड-क़ानूनों में सामान्य है: बार-बार अपराध करने वाले को कठोर दंड।

धारा 67A: यौन-स्पष्ट कृत्य वाली सामग्री (Punishment for publishing or transmitting of material containing sexually explicit act, etc., in electronic form)

पाठ: "Whoever publishes or transmits or causes to be published or transmitted in the electronic form any material which contains sexually explicit act or conduct shall be punished on first conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to five years and with fine which may extend to ten lakh rupees and in the event of second or subsequent conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to seven years and also with fine which may extend to ten lakh rupees."

धारा 67 और 67A का मुख्य अंतर सामग्री की प्रकृति है। 67 में सामग्री अश्लील होने की कसौटियाँ हैं (कामुक, कामुक रुचि को उभारने वाली, भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति वाली)। 67A में सामग्री में "sexually explicit act or conduct" होना चाहिए, यानी यौन-स्पष्ट कृत्य या आचरण। अधिनियम इस शब्द की अलग परिभाषा नहीं देता, इसलिए इसका अर्थ तथ्यों और अदालत की व्याख्या पर निर्भर रहता है (विश्लेषण)। सज़ा अधिक है: पहली दोषसिद्धि पर पाँच वर्ष तक और दस लाख रुपये तक जुर्माना; बाद की दोषसिद्धि पर सात वर्ष तक और दस लाख रुपये तक जुर्माना।

धारा 67B: बच्चों को यौन-स्पष्ट कृत्य में दर्शाने वाली सामग्री (Punishment for publishing or transmitting of material depicting children in sexually explicit act, etc., in electronic form)

यह तीनों में सबसे विस्तृत धारा है। इसमें पाँच अलग-अलग अपराध गिनाए गए हैं, खंड (a) से (e), और स्पष्टीकरण कहता है: "children means a person who has not completed the age of 18 years", यानी बच्चा वह है जिसने 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं की। यह दायरा सामग्री के सृजन से लेकर बच्चों को ऑनलाइन फुसलाने (grooming) तक फैला है।

धारा 67B के पाँच खंड

खंडकृत्य (पाठ का सार)मुख्य शब्दसरल अर्थ
(a)बच्चों को यौन-स्पष्ट कृत्य या आचरण में दर्शाने वाली सामग्री को किसी भी इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रकाशित, प्रेषित या प्रकाशित-प्रेषित करानाpublishes or transmits or causes to be published or transmittedसामग्री फैलाना
(b)बच्चों को अश्लील, अभद्र या यौन-स्पष्ट ढंग से दर्शाने वाली सामग्री के पाठ या डिजिटल चित्र बनाना, एकत्र करना, खोजना, ब्राउज़ करना, डाउनलोड करना, विज्ञापित या प्रचारित करना, आदान-प्रदान या वितरण करनाcreates, collects, seeks, browses, downloads, advertises, promotes, exchanges or distributesबनाना, जमा करना, खोजना, देखना, डाउनलोड करना, बाँटना
(c)बच्चों को ऑनलाइन संबंध के लिए फुसलाना या प्रेरित करना, यौन-स्पष्ट कृत्य के लिए या ऐसे ढंग से जो किसी उचित वयस्क को आपत्तिजनक लगेcultivates, entices or induces children to online relationshipबच्चों को ऑनलाइन फुसलाना (grooming)
(d)बच्चों के साथ ऑनलाइन दुर्व्यवहार को सुगम बनानाfacilitates abusing children onlineदुर्व्यवहार में सहायता
(e)बच्चों के साथ यौन-स्पष्ट कृत्य से जुड़े अपने या दूसरों के दुर्व्यवहार को किसी भी इलेक्ट्रॉनिक रूप में अभिलेखित करनाrecords in any electronic form own abuse or that of othersदुर्व्यवहार की रिकॉर्डिंग

सज़ा धारा 67A जैसी है: पहली दोषसिद्धि पर किसी भी प्रकार का कारावास पाँच वर्ष तक और जुर्माना दस लाख रुपये तक; दूसरी या बाद की दोषसिद्धि पर सात वर्ष तक और दस लाख रुपये तक जुर्माना। परीक्षा-योग्य बारीकी खंड (b) है: उसमें "browses, downloads" भी हैं, यानी केवल सामग्री फैलाना नहीं, उसे खोजना, देखना या डाउनलोड करना भी अपराध की श्रेणी में आता है। इसी कारण यह धारा केवल "प्रकाशकों" पर नहीं, उपभोक्ताओं पर भी लागू हो सकती है (विश्लेषण)।

धारा 67B का एक परंतुक (proviso) भी है, और उसकी भाषा पर ध्यान दीजिए: "the provisions of section 67, section 67A and this section does not extend to ..."। यानी यह छूट केवल 67B पर नहीं, तीनों धाराओं 67, 67A और 67B पर लागू है। छूट दो आधारों पर है: (i) जिस पुस्तक, पर्चे, लेख, चित्र, पेंटिंग या आकृति का प्रकाशन "for the public good" साबित हो, इस आधार पर कि वह विज्ञान, साहित्य, कला या शिक्षा या सामान्य महत्त्व के अन्य उद्देश्यों के हित में है; (ii) जो वास्तविक विरासत या धार्मिक प्रयोजनों के लिए रखी या प्रयुक्त हो ("kept or used for bona fide heritage or religious purposes")। इसका भार प्रकाशन करने वाले पर रहता है, क्योंकि पाठ कहता है "is proved to be justified" (साबित हो) (विश्लेषण)।

धारा 67C: मध्यवर्तियों द्वारा सूचना का संरक्षण और धारण (Preservation and retention of information by intermediaries)

पहले "intermediary" समझिए। धारा 2(1)(w) के अनुसार, किसी इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के संबंध में, मध्यवर्ती वह कोई भी व्यक्ति है जो किसी दूसरे की ओर से उस अभिलेख को प्राप्त करता, संग्रहीत करता या प्रेषित करता है, या उसके संबंध में कोई सेवा देता है; और इसमें "telecom service providers, network service providers, internet service providers, web-hosting service providers, search engines, online payment sites, online-auction sites, online-market places and cyber cafes" शामिल हैं। यानी डाकघर की तरह, जो चिट्ठी लिखता नहीं, पर उसे ले जाता और रखता है।

धारा 67C का पाठ: "(1) Intermediary shall preserve and retain such information as may be specified for such duration and in such manner and format as the Central Government may prescribe. (2) Any intermediary who intentionally or knowingly contravenes the provisions of sub-section (1) shall be liable to penalty which may extend to twenty-five lakh rupees." उप-धारा (2) का यह रूप जन विश्वास (उपबंधों का संशोधन) अधिनियम, 2023 से आया है, जो 30 नवंबर 2023 से लागू है; उससे पहले यहाँ तीन वर्ष तक कारावास और जुर्माना था।

इस धारा की बनावट सरल है। उप-धारा (1) कर्तव्य बनाती है: मध्यवर्ती केंद्र सरकार द्वारा निर्दिष्ट सूचना को निर्धारित अवधि, तरीक़े और प्रारूप में सुरक्षित रखे। कौन-सी सूचना, कितने समय के लिए, किस प्रारूप में, यह अधिनियम में नहीं, केंद्र सरकार द्वारा बनाए नियमों में आता है, इसलिए अधिनियम का पाठ याद रखते समय आँकड़े न गढ़ें। उप-धारा (2) उल्लंघन पर शास्ति (penalty) लगाती है: "intentionally or knowingly" उल्लंघन करने वाला मध्यवर्ती पच्चीस लाख रुपये तक की शास्ति का दायी है; अब इसमें कारावास नहीं है। यहाँ दो बातें 67 से अलग हैं: दायित्व "सामग्री" का नहीं, "कर्तव्य के उल्लंघन" का है, और पहली-दूसरी दोषसिद्धि का भेद नहीं है। जन विश्वास अधिनियम 2023 ने धारा 46(1) में "under this Chapter" के स्थान पर "under this Act" किया है, यानी न्यायनिर्णायक अधिकारी (adjudicating officer) की शक्ति अब पूरे अधिनियम के उल्लंघन पर है। शास्ति लगाने वाला प्राधिकारी और प्रक्रिया का ब्योरा परीक्षा के लिए अनिवार्य नहीं है; विस्तार के लिए देखें: आधिकारिक अधिनियम पाठ।

तुलना: धारा 67, 67A, 67B और 67C

बिंदु6767A67B67C
विषयअश्लील सामग्रीयौन-स्पष्ट कृत्य या आचरण वाली सामग्रीबच्चों से जुड़ी यौन-स्पष्ट सामग्री और संबंधित आचरणमध्यवर्तियों द्वारा सूचना का संरक्षण
कृत्यpublishes, transmits, causes to be published or transmittedवहीखंड (a) से (e): प्रकाशन, सृजन, खोज, डाउनलोड, फुसलाना, सुगमता, रिकॉर्डिंगनिर्धारित सूचना न रखना
पहली दोषसिद्धिकारावास 3 वर्ष तक और जुर्माना 5 लाख रुपये तककारावास 5 वर्ष तक और जुर्माना 10 लाख रुपये तककारावास 5 वर्ष तक और जुर्माना 10 लाख रुपये तकशास्ति 25 लाख रुपये तक; कारावास नहीं (2023 से; पहले 3 वर्ष तक कारावास और जुर्माना)
दूसरी या बाद की दोषसिद्धिकारावास 5 वर्ष तक और जुर्माना 10 लाख रुपये तककारावास 7 वर्ष तक और जुर्माना 10 लाख रुपये तककारावास 7 वर्ष तक और जुर्माना 10 लाख रुपये तकभेद नहीं
कारावास का प्रकारeither descriptioneither descriptioneither descriptionलागू नहीं (कारावास नहीं)
मानसिक अवस्थापाठ में अलग उल्लेख नहीं (कृत्य और सामग्री की कसौटी)वहीवहीintentionally or knowingly

प्रक्रिया की झलक: ये अपराध किस श्रेणी के हैं

अपराध की सज़ा के साथ यह जानना भी काम का है कि पुलिस सीधे कार्रवाई कर सकती है या नहीं, ज़मानत का स्वरूप क्या है और समझौता हो सकता है या नहीं। इनका उत्तर इसी अधिनियम की धारा 77A, 77B और 78 में है, जिनका विस्तार पृष्ठ 5 पर है। धारा 77B के अनुसार तीन वर्ष और उससे अधिक के कारावास वाले अपराध संज्ञेय (cognizable) हैं और तीन वर्ष के कारावास वाले अपराध जमानतीय (bailable)। धारा 78 के अनुसार जाँच इंस्पेक्टर से नीचे के पद का पुलिस अधिकारी नहीं कर सकता।

इस पृष्ठ की धाराओं पर इसका सार (विश्लेषण): 67 की पहली दोषसिद्धि की सज़ा तीन वर्ष है, तो वह संज्ञेय है और धारा 77B के पाठ से जमानतीय भी; 67A और 67B में पाँच वर्ष तक की सज़ा है, इसलिए वे संज्ञेय हैं। समझौता (compounding) धारा 77A के अनुसार उन अपराधों में नहीं हो सकता जिनमें तीन वर्ष से अधिक या आजीवन कारावास का प्रावधान है, और उस अपराध में भी नहीं जो 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे या किसी महिला के विरुद्ध किया गया हो। इसलिए 67A और 67B में समझौता नहीं हो सकता, और 67B तो सीधे बच्चों से जुड़ी है।

सीढ़ी: सज़ा की मात्रा (पहली दोषसिद्धि पर कारावास की अधिकतम अवधि)

  1. 67: 3 वर्ष और 5 लाख रुपये तक

    अश्लील सामग्री

  2. 67A: 5 वर्ष और 10 लाख रुपये तक

    यौन-स्पष्ट कृत्य या आचरण

  3. 67B: 5 वर्ष और 10 लाख रुपये तक

    बच्चों से जुड़ी सामग्री और पाँच प्रकार का आचरण

  4. बाद की दोषसिद्धि

    67: 5 वर्ष और 10 लाख रुपये; 67A और 67B: 7 वर्ष और 10 लाख रुपये

सीढ़ी सज़ा की तुलना के लिए है; 67C का कर्तव्य-उल्लंघन अलग प्रकृति का है (25 लाख रुपये तक की शास्ति, कारावास नहीं)।

मानचित्र: धारा 67B के पाँच खंड

67B: बच्चे (18 वर्ष से कम)

(a)

  • प्रकाशन या प्रेषण

(b)

  • बनाना, एकत्र करना
  • खोजना, ब्राउज़ करना, डाउनलोड करना
  • विज्ञापन, प्रचार, आदान-प्रदान, वितरण

(c)

  • ऑनलाइन फुसलाना (grooming)

(d) और (e)

  • दुर्व्यवहार को सुगम बनाना
  • दुर्व्यवहार की रिकॉर्डिंग

मुख्य तथ्य

धारा 67 (पहली दोषसिद्धि)
किसी भी प्रकार का कारावास तीन वर्ष तक और जुर्माना पाँच लाख रुपये तक
धारा 67 (बाद की दोषसिद्धि)
किसी भी प्रकार का कारावास पाँच वर्ष तक और जुर्माना दस लाख रुपये तक
धारा 67A (पहली / बाद की दोषसिद्धि)
पाँच वर्ष और दस लाख रुपये तक / सात वर्ष और दस लाख रुपये तक
धारा 67B (पहली / बाद की दोषसिद्धि)
पाँच वर्ष और दस लाख रुपये तक / सात वर्ष और दस लाख रुपये तक
"Children" (67B का स्पष्टीकरण)
वह व्यक्ति जिसने 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं की
67B का परंतुक
धाराएँ 67, 67A और 67B लागू नहीं: public good (विज्ञान, साहित्य, कला, शिक्षा) या bona fide विरासत या धार्मिक प्रयोजन
धारा 67C
मध्यवर्ती निर्दिष्ट सूचना केंद्र द्वारा निर्धारित अवधि, तरीक़े और प्रारूप में रखे; जानबूझकर उल्लंघन पर 25 लाख रुपये तक की शास्ति, कारावास नहीं (जन विश्वास अधिनियम 2023 से; पहले 3 वर्ष तक कारावास और जुर्माना)
जन विश्वास अधिनियम 2023
धारा 67C(2) संशोधित: कारावास की जगह 25 लाख रुपये तक की शास्ति; 30 नवंबर 2023 से प्रभावी (MeitY कार्यालय-ज्ञापन, 3 नवंबर 2023)
अंतिम जाँच
2 अक्टूबर 2026 (भारत कोड की प्रति और जन विश्वास अधिनियम 2023 की अनुसूची का मिलान)

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • तीनों धाराओं (67, 67A, 67B) की सज़ा बराबर बताना। 67 की पहली दोषसिद्धि 3 वर्ष और 5 लाख रुपये तक है; 67A और 67B की 5 वर्ष और 10 लाख रुपये तक।
  • दूसरी या बाद की दोषसिद्धि का भेद भूल जाना। 67 में 5 वर्ष, 67A और 67B में 7 वर्ष।
  • धारा 67B को केवल "प्रकाशन" तक सीमित करना। खंड (b) में डाउनलोड, ब्राउज़ और एकत्र करना, खंड (c) में फुसलाना, खंड (e) में रिकॉर्डिंग भी हैं।
  • बच्चे की आयु 16 वर्ष या "नाबालिग" लिख देना। धारा 67B की परिभाषा है: जिसने 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं की।
  • परंतुक को केवल 67B पर लागू बताना। पाठ में "section 67, section 67A and this section" तीनों हैं।
  • धारा 67C को सामग्री का अपराध समझना। यह मध्यवर्तियों के सूचना-संरक्षण के कर्तव्य का उल्लंघन है, और इसमें अवधि के आँकड़े अधिनियम में नहीं, नियमों में हैं।
  • "Intermediary" की परिभाषा न लिखना। 67C के उत्तर की शुरुआत धारा 2(1)(w) के हवाले से हो तो उत्तर पूरा लगता है।
  • धारा 67C(2) में तीन वर्ष का कारावास लिखना। जन विश्वास अधिनियम, 2023 के बाद वहाँ 25 लाख रुपये तक की शास्ति है, कारावास नहीं।

सूचना

यह सामग्री परीक्षा की तैयारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। किसी वास्तविक मामले में अधिवक्ता से परामर्श लें।