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पेपर III · इकाई III · भाग ख (विधि)

IT अधिनियम 2000: धारा 71 से 78

मिथ्या-निरूपण (71), गोपनीयता-भंग (72, 72A), प्रमाणपत्र-संबंधी अपराध (73, 74), विदेश में किए अपराध पर लागू होना (75), ज़ब्ती (76), अन्य दंड से अप्रभावित (77), शमन (77A), संज्ञेय और जमानतीय का नियम (77B) और जाँच का अधिकारी (78)।

  • धारा 71, 72, 72A
  • 73, 74 प्रमाणपत्र
  • 75 विदेश में अपराध
  • 76 ज़ब्ती
  • 77A शमन
  • 77B
  • 78 जाँच
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (विधि, धारानुसार): सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धाराएँ 71 से 78। इस पृष्ठ में धारा 71, 72, 73, 74, 75, 76, 77 और 78 हैं। बीच में आने वाली धाराएँ 72A, 77A और 77B इसी सीमा में आती हैं, इसलिए वे भी शामिल हैं (यह पाठ्यक्रम-सीमा की व्याख्या है)। धारा 70 से पहले की और 79 के बाद की धाराएँ इस पृष्ठ का विषय नहीं हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • उपलब्ध 2013 से 2024 के पेपरों में धारा 71 से 78 पर सीधा प्रश्न नहीं मिला। यह समूह इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इसमें अपराधों की प्रक्रिया वाले नियम (विदेश में अपराध, ज़ब्ती, शमन, संज्ञेय, जाँच-अधिकारी) एक जगह मिलते हैं, जिन पर 5 अंक का संक्षिप्त प्रश्न बन सकता है।
  • धारा 75 सबसे अधिक पूछे जाने लायक़ है: अधिनियम भारत के बाहर किए अपराध पर भी लागू है, बशर्ते कृत्य में भारत में स्थित कंप्यूटर, कंप्यूटर प्रणाली या नेटवर्क शामिल हो। शर्त का शब्द-विन्यास याद रखिए।
  • धारा 77A (शमन) और 77B (संज्ञेय और जमानतीय) में आँकड़े हैं: "तीन वर्ष" की सीमाएँ। इन्हें ग़लत पढ़ना सबसे आम चूक है, इसलिए नीचे पाठ के शब्द और सारणी दोनों दिए हैं।

आठ धाराएँ: एक नज़र में

धारा 71 से 78 एक ही प्रकार की नहीं हैं। इन्हें तीन समूहों में बाँटकर पढ़ना आसान रहता है। पहला समूह कृत्य-आधारित अपराधों का है: धारा 71 (लाइसेंस या प्रमाणपत्र पाने के लिए Controller या Certifying Authority से झूठ बोलना), धारा 72 और 72A (गोपनीयता और निजी सूचना का भंग), धारा 73 और 74 (इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर प्रमाणपत्र से जुड़े अपराध)। दूसरा समूह लागू होने और परिणाम का है: धारा 75 (भारत के बाहर किए अपराध), धारा 76 (ज़ब्ती) और धारा 77 (अन्य दंड से अप्रभावित)। तीसरा समूह प्रक्रिया का है: धारा 77A (शमन), 77B (संज्ञेय और जमानतीय) और 78 (जाँच का अधिकारी)।

पहले समूह में धारा 71, 73 और 74 की सज़ा एक-सी है: दो वर्ष तक कारावास, या एक लाख रुपये तक जुर्माना, या दोनों। धारा 72 और 72A अलग हैं। जन विश्वास (उपबंधों का संशोधन) अधिनियम, 2023 ने इनमें कारावास की जगह शास्ति (penalty) रखी: धारा 72 में पाँच लाख रुपये तक और धारा 72A में पच्चीस लाख रुपये तक। यह बदलाव 30 नवंबर 2023 से लागू है। सारणी में यह साफ़ दिखता है, और परीक्षा में यही तुलना सबसे अधिक काम आती है।

कृत्य-आधारित अपराध: धारा 71, 72, 72A, 73, 74

धाराअपराधकौन दोषी हो सकता हैसज़ा या शास्ति
71मिथ्या-निरूपण (misrepresentation) या महत्त्वपूर्ण तथ्य छिपाना (suppresses any material fact), Controller या Certifying Authority से, लाइसेंस या electronic signature Certificate पाने के लिएकोई भी व्यक्ति ("Whoever")कारावास 2 वर्ष तक, या जुर्माना 1 लाख रुपये तक, या दोनों
72इस अधिनियम, नियमों या विनियमों के अधीन मिली शक्तियों के प्रयोग में बिना संबंधित व्यक्ति की सहमति के इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख, पुस्तक, रजिस्टर, पत्राचार, सूचना, दस्तावेज़ या अन्य सामग्री तक पहुँच पाकर उसे किसी दूसरे को प्रकट करनावह व्यक्ति जिसे इन शक्तियों के अधीन पहुँच मिलीशास्ति (penalty) 5 लाख रुपये तक; कारावास नहीं (2023 से पहले: 2 वर्ष तक कारावास, या 1 लाख रुपये तक जुर्माना, या दोनों)
72Aवैध अनुबंध (lawful contract) के अधीन सेवा देते समय किसी दूसरे व्यक्ति की निजी सूचना वाली सामग्री तक पहुँच पाकर, हानि पहुँचाने के आशय से या यह जानते हुए कि हानि या लाभ होना संभव है, सहमति के बिना या अनुबंध के उल्लंघन में उसे किसी दूसरे को प्रकट करनाकोई भी व्यक्ति, मध्यवर्ती (intermediary) सहितशास्ति 25 लाख रुपये तक; कारावास नहीं (2023 से पहले: 3 वर्ष तक कारावास, या 5 लाख रुपये तक जुर्माना, या दोनों)
73प्रमाणपत्र को प्रकाशित करना या किसी और को उपलब्ध कराना, यह जानते हुए कि (a) उसे Certifying Authority ने जारी नहीं किया, (b) सूचीबद्ध subscriber ने उसे स्वीकार नहीं किया, या (c) वह रद्द या निलंबित हैकोई भी व्यक्तिकारावास 2 वर्ष तक, या जुर्माना 1 लाख रुपये तक, या दोनों
74जानबूझकर किसी electronic signature Certificate को किसी कपटपूर्ण या ग़ैरक़ानूनी प्रयोजन के लिए बनाना, प्रकाशित करना या उपलब्ध करानाकोई भी व्यक्तिकारावास 2 वर्ष तक, या जुर्माना 1 लाख रुपये तक, या दोनों

धारा 71: मिथ्या-निरूपण (Penalty for misrepresentation)

पाठ का सार: जो कोई Controller या Certifying Authority से लाइसेंस या electronic signature Certificate प्राप्त करने के लिए कोई मिथ्या-निरूपण करता है या किसी महत्त्वपूर्ण तथ्य को छिपाता है, वह दंडनीय है। यहाँ दो कृत्य हैं: झूठा कथन देना (makes any misrepresentation) और ज़रूरी बात छिपाना (suppresses any material fact)। दोनों का लक्ष्य एक ही है: लाइसेंस या प्रमाणपत्र पाना।

Controller और Certifying Authority अधिनियम के अध्याय VI (Regulation of Certifying Authorities) और अध्याय VII (Electronic Signature Certificates) की संस्थाएँ हैं। इसलिए यह धारा आम इंटरनेट-उपयोगकर्ता से अधिक उन आवेदकों के लिए है जो प्रमाणन-व्यवस्था में प्रवेश चाहते हैं या हस्ताक्षर प्रमाणपत्र बनवाते हैं। सज़ा: कारावास दो वर्ष तक, या जुर्माना एक लाख रुपये तक, या दोनों।

स्मरण-सूत्र: "झूठ बोला या छिपाया, लाइसेंस या प्रमाणपत्र के लिए: 2 वर्ष या 1 लाख रुपये या दोनों"।

धारा 72 और 72A: गोपनीयता और निजी सूचना का भंग

धारा 72 का शीर्षक है "Penalty for Breach of confidentiality and privacy"। इसका दायरा सीमित है, और यही परीक्षा में पूछा जाने वाला बिंदु है। यह उस व्यक्ति पर लागू होती है जिसने "in pursuance of any of the powers conferred under this Act, rules or regulations made thereunder", यानी अधिनियम, नियमों या विनियमों से मिली शक्तियों के प्रयोग में किसी इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख, पुस्तक, रजिस्टर, पत्राचार, सूचना, दस्तावेज़ या अन्य सामग्री तक पहुँच पाई हो। उसने यदि संबंधित व्यक्ति की सहमति के बिना उसे किसी दूसरे को प्रकट किया, तो वह शास्ति का दायी है। पाठ "Save as otherwise provided in this Act or any other law" से शुरू होता है, यानी जहाँ इस अधिनियम या किसी अन्य क़ानून में अलग व्यवस्था हो, वहाँ वही लागू होगी। वर्तमान पाठ में वह पाँच लाख रुपये तक की शास्ति ("liable to penalty which may extend to five lakh rupees") का दायी है; कारावास का प्रावधान नहीं है। जन विश्वास (उपबंधों का संशोधन) अधिनियम, 2023 से पहले यहाँ दो वर्ष तक कारावास, या एक लाख रुपये तक जुर्माना, या दोनों थे।

उदाहरण के तौर पर, इस अधिनियम के अधीन किसी अधिकारी ने जाँच या निरीक्षण में किसी का इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख देखा और उसे बिना सहमति किसी तीसरे को बता दिया: यह धारा 72 का क्षेत्र है। यह सामान्य नागरिक-से-नागरिक गोपनीयता-भंग की धारा नहीं है।

धारा 72A (Penalty for disclosure of information in breach of lawful contract; 2023 से पहले शीर्षक में "Punishment" था) 2009 के संशोधन से जोड़ी गई है (भारत कोड का फ़ुटनोट: Act 10 of 2009 की धारा 37, प्रभावी 27-10-2009)। यहाँ दायरा बड़ा है: "any person including an intermediary", यानी कोई भी व्यक्ति, मध्यवर्ती सहित, जो वैध अनुबंध के अधीन सेवाएँ देते समय किसी दूसरे की निजी सूचना ("personal information") वाली सामग्री तक पहुँच पाता है।

72A की शर्तें तीन हैं। एक, सेवा देते समय वैध अनुबंध के अधीन पहुँच मिलना। दो, आशय या ज्ञान: "with the intent to cause or knowing that he is likely to cause wrongful loss or wrongful gain", यानी अनुचित हानि या अनुचित लाभ पहुँचाने का आशय, या यह जानना कि ऐसा होना संभव है। तीन, प्रकट करना: सहमति के बिना, या वैध अनुबंध के उल्लंघन में, किसी दूसरे को। शास्ति: पच्चीस लाख रुपये तक ("liable to penalty which may extend to twenty-five lakh rupees"); कारावास नहीं। ध्यान दीजिए कि 72 की शास्ति पाँच लाख रुपये तक और 72A की पच्चीस लाख रुपये तक है। 2023 से पहले 72A में तीन वर्ष तक कारावास, या पाँच लाख रुपये तक जुर्माना, या दोनों थे।

आशय की शर्त का अर्थ है कि केवल लापरवाही से सूचना का बाहर जाना 72A के दायरे में नहीं आता। आशय या ज्ञान सिद्ध होना चाहिए। इसी कारण "wrongful loss or wrongful gain" शब्द उत्तर में ज़रूर लिखिए। जन विश्वास अधिनियम 2023 ने धारा 46(1) में "under this Chapter" के स्थान पर "under this Act" किया है, यानी न्यायनिर्णायक अधिकारी (adjudicating officer) की शक्ति अब पूरे अधिनियम के उल्लंघन पर है। शास्ति लगाने वाला प्राधिकारी और प्रक्रिया का ब्योरा परीक्षा के लिए अनिवार्य नहीं है; विस्तार के लिए देखें: आधिकारिक अधिनियम पाठ।

धारा 73 और 74: इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर प्रमाणपत्र से जुड़े अपराध

धारा 73 का शीर्षक है "Penalty for publishing electronic signature Certificate false in certain particulars"। उप-धारा (1) निषेध बताती है: कोई व्यक्ति प्रमाणपत्र को प्रकाशित न करे या किसी और को उपलब्ध न कराए, यह जानते हुए कि (a) Certifying Authority ने उसे जारी नहीं किया, (b) प्रमाणपत्र में सूचीबद्ध subscriber ने उसे स्वीकार नहीं किया, या (c) प्रमाणपत्र रद्द या निलंबित हो चुका है। इसमें एक अपवाद है: प्रकाशन यदि रद्दीकरण या निलंबन से पहले बनाए गए electronic signature को सत्यापित करने के लिए हो, तो यह निषेध लागू नहीं होता। उप-धारा (2) सज़ा देती है: कारावास दो वर्ष तक, या जुर्माना एक लाख रुपये तक, या दोनों।

धारा 73 का मूल शब्द "knowledge" है: प्रकाशक को इन तीन स्थितियों का ज्ञान होना चाहिए। अपवाद का तर्क यह है कि पुराने हस्ताक्षर की वैधता जाँचने के लिए रद्द प्रमाणपत्र भी देखना पड़ सकता है।

धारा 74 (Publication for fraudulent purpose) में आशय निर्णायक है: जो कोई जानबूझकर ("knowingly") किसी electronic signature Certificate को "fraudulent or unlawful purpose" के लिए बनाता, प्रकाशित करता या उपलब्ध कराता है, वह दंडनीय है। सज़ा वही: दो वर्ष तक कारावास, या एक लाख रुपये तक जुर्माना, या दोनों। 73 और 74 का अंतर: 73 में प्रमाणपत्र का स्वरूप या स्थिति झूठी है (जारी नहीं हुआ, स्वीकार नहीं हुआ, रद्द है) और प्रकाशक जानता है; 74 में प्रयोजन कपटपूर्ण या ग़ैरक़ानूनी है।

शब्दावली: "electronic signature Certificate" पहले "Digital Signature Certificate" था। भारत कोड का फ़ुटनोट बताता है कि 2009 के संशोधन (Act 10 of 2009, प्रभावी 27-10-2009) ने "Digital Signature" शब्द को "electronic signature" से बदला। पुराने पाठ और नई पुस्तकों में दोनों शब्द मिल सकते हैं; परीक्षा में वर्तमान शब्द "electronic signature" लिखिए और ज़रूरत हो तो पुराना नाम कोष्ठक में।

धारा 75: भारत के बाहर किए गए अपराध (Act to apply for offence or contravention committed outside India)

इंटरनेट की कोई सीमा नहीं होती, इसलिए अपराधी विदेश में हो और पीड़ित भारत में, यह स्थिति आम है। धारा 75 इसी का उत्तर है। उप-धारा (1): "Subject to the provisions of sub-section (2), the provisions of this Act shall apply also to any offence or contravention committed outside India by any person irrespective of his nationality", यानी इस अधिनियम के प्रावधान भारत के बाहर किसी भी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध या उल्लंघन पर भी लागू होंगे, उसकी राष्ट्रीयता चाहे जो हो।

उप-धारा (2) शर्त लगाती है: उप-धारा (1) के प्रयोजन से अधिनियम तभी लागू होगा जब अपराध या उल्लंघन बनाने वाले कृत्य या आचरण में "a computer, computer system or computer network located in India" शामिल हो, यानी भारत में स्थित कंप्यूटर, कंप्यूटर प्रणाली या कंप्यूटर नेटवर्क। यही "भारत से जोड़ने वाली कड़ी" है। केवल यह कि अपराधी विदेशी है, या पीड़ित भारतीय है, इस उप-धारा की शर्त का शब्द-विन्यास नहीं है; शर्त कंप्यूटर संसाधन के भारत में स्थित होने की है।

यह धारा अधिनियम की धारा 1(2) से जुड़ी है, जो कहती है कि अधिनियम पूरे भारत पर लागू है और, इसमें अन्यथा बताई व्यवस्था के अधीन, भारत के बाहर किए गए अपराध या उल्लंघन पर भी लागू होता है, जिसमें कोई व्यक्ति शामिल हो (पहले पृष्ठ पर धारा 1 देखें)। 75(1) का "irrespective of his nationality" इसी का विस्तार है: राष्ट्रीयता से फ़र्क़ नहीं पड़ता, कंप्यूटर की अवस्थिति से पड़ता है।

धारा 76 और 77: ज़ब्ती और अन्य दंड से अप्रभावित

धारा 76 (Confiscation) कहती है कि कोई भी कंप्यूटर, कंप्यूटर प्रणाली, floppies, compact disks, tape drives या उनसे जुड़े अन्य उपकरण, जिनके संबंध में इस अधिनियम, नियमों, आदेशों या विनियमों के किसी प्रावधान का उल्लंघन हुआ है या हो रहा है, ज़ब्ती के योग्य (liable to confiscation) हैं। ज़ब्ती का अर्थ यह है कि सामग्री राज्य के पास चली जाती है।

इसका परंतुक (proviso) निर्दोष क़ब्ज़ेदार की रक्षा करता है। यदि ज़ब्ती का निर्णय करने वाली अदालत को यह संतोषजनक रूप से सिद्ध हो जाए कि जिस व्यक्ति के क़ब्ज़े, शक्ति या नियंत्रण में ऐसा उपकरण मिला है, वह अधिनियम के उल्लंघन के लिए उत्तरदायी नहीं है, तो अदालत ज़ब्ती का आदेश देने के बजाय उल्लंघन करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध अधिनियम द्वारा प्राधिकृत कोई अन्य उचित आदेश दे सकती है। मुख्य शब्द: "not responsible for the contravention"।

धारा 77 का वर्तमान रूप 2009 के संशोधन से आया है (भारत कोड का फ़ुटनोट: Act 10 of 2009 की धारा 38, प्रभावी 27-10-2009)। शीर्षक है "Compensation, penalties or confiscation not to interfere with other punishment"। अर्थ: इस अधिनियम के अधीन दिया गया मुआवज़ा, लगाया गया दंड या की गई ज़ब्ती किसी अन्य क़ानून के अधीन मुआवज़े या दंड को नहीं रोकती। यानी एक ही कृत्य पर इस अधिनियम के साथ किसी अन्य क़ानून के अधीन भी कार्रवाई संभव है, बशर्ते उस क़ानून की शर्तें पूरी हों।

इस अंतिम बिंदु के लिए एक सावधानी: "दोहरे दंड" पर संविधान और दंड-प्रक्रिया के अपने नियम हैं। धारा 77 केवल इतना कहती है कि इस अधिनियम का दंड अन्य क़ानूनों के दंड को रोकता नहीं। एक ही कृत्य के लिए एक से अधिक कार्रवाई के प्रश्न का अंतिम निर्णय तथ्यों और संबंधित प्रावधानों पर निर्भर है, और उस पर इस पृष्ठ में चर्चा नहीं की गई है।

धारा 77A: अपराधों का शमन (Compounding of offences)

शमन (compounding) का अर्थ है कि पीड़ित और अभियुक्त के बीच समझौता होने पर अदालत की अनुमति से मामला समाप्त हो जाना। धारा 77A(1) कहती है कि सक्षम अदालत इस अधिनियम के अपराधों का शमन कर सकती है, "other than offences for which the punishment for life or imprisonment for a term exceeding three years has been provided", यानी उन अपराधों को छोड़कर जिनके लिए आजीवन कारावास या तीन वर्ष से अधिक की अवधि का कारावास निर्धारित है।

दो परंतुक (provisos) और जुड़े हैं। पहला: यदि अभियुक्त अपनी पिछली दोषसिद्धि के कारण बढ़ी हुई सज़ा या भिन्न प्रकार की सज़ा का पात्र है, तो अदालत शमन नहीं करेगी। दूसरा: यदि अपराध देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है, या किसी 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे या किसी महिला के विरुद्ध किया गया है, तो भी शमन नहीं होगा। पाठ के शब्द: "affects the socio economic conditions of the country or has been committed against a child below the age of 18 years or a woman"।

उप-धारा (2): अपराध का अभियुक्त उस अदालत में शमन के लिए आवेदन दे सकता है जिसमें मामला विचारण के लिए लंबित है, और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धाराएँ 265B और 265C लागू होंगी। अधिनियम के पाठ में संदर्भ पुरानी संहिता का है।

अध्ययन-सहायता (पुराना और नया): भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) में याचिका-सौदेबाज़ी (plea bargaining) की व्यवस्था धारा 289 से 291 में है; इनमें धारा 290 "आवेदन" वाली और धारा 291 "पारस्परिक रूप से संतोषजनक निपटारे के दिशानिर्देश" वाली है, जो पहले की 265B और 265C की जगह लेती हैं। यह तुलना पढ़ाई की सुविधा के लिए है; IT अधिनियम का मूल पाठ अपने स्थान पर 265B और 265C का नाम लेता है, और BNSS की धारा 531 पुरानी संहिता का निरसन करती है (BNSS पाठ)। परीक्षा-उत्तर में अधिनियम का शब्द पहले लिखिए और नई संख्या कोष्ठक में।

तीन वर्ष की रेखा समझिए: जिस अपराध की अधिकतम सज़ा तीन वर्ष तक है, वह शमन-योग्य हो सकता है (परंतुकों के अधीन); जिसकी सज़ा तीन वर्ष से अधिक हो सकती है, वह नहीं। इस अधिनियम में उदाहरण के लिए धारा 67 की पहली दोषसिद्धि की सज़ा तीन वर्ष तक है और बाद की पाँच वर्ष तक: इसलिए पहली दोषसिद्धि पर शमन की संभावना और बाद की दोषसिद्धि पर परंतुक का बंधन, दोनों चर्चा के बिंदु हैं (यह विश्लेषण है, पाठ का कथन नहीं)।

धारा 77B और 78: संज्ञेय, जमानतीय और जाँच का अधिकारी

धारा 77B का पाठ (भारत कोड): "Notwithstanding anything contained in the Code of Criminal Procedure, 1973, the offence punishable with imprisonment of three years and above shall be cognizable and the offence punishable with imprisonment of three years shall be bailable." अर्थात, तीन वर्ष और उससे अधिक के कारावास से दंडनीय अपराध संज्ञेय (cognizable) होगा, और तीन वर्ष के कारावास से दंडनीय अपराध जमानतीय (bailable) होगा।

पाठ में एक आंतरिक अस्पष्टता है: "तीन वर्ष" दोनों वाक्यांशों में आता है, इसलिए तीन वर्ष की सज़ा वाला अपराध पाठ के अनुसार संज्ञेय भी है और जमानतीय भी। तीन वर्ष से अधिक की सज़ा वाले अपराधों की जमानतीयता पर धारा 77B कुछ नहीं कहती। धारा का हाशिया-शीर्षक (marginal heading) केवल "Offences with three years imprisonment to be bailable" है, यानी उसमें जमानतीय का उल्लेख है और संज्ञेय का नहीं; इसलिए शीर्षक के आधार पर नहीं, पाठ के शब्दों के आधार पर लिखें। यह पृष्ठ पाठ के शब्द देता है और उनके आगे की व्याख्या को "विश्लेषण" कहकर अलग रखता है। परीक्षा में पाठ का हूबहू वाक्य लिखना सबसे सुरक्षित है।

संज्ञेय अपराध वह है जिसमें पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तारी कर सकती है और जाँच शुरू कर सकती है। जमानतीय का अर्थ है कि अभियुक्त अधिकार के रूप में ज़मानत माँग सकता है। BNSS की धारा 2(1)(g) संज्ञेय अपराध और धारा 2(1)(c) जमानतीय अपराध की परिभाषा देती है (BNSS पाठ)। पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का निरसन BNSS की धारा 531 से हुआ।

अध्ययन-सहायता (विश्लेषण): यदि किसी IT अपराध की सज़ा तीन वर्ष से कम है, तो धारा 77B उसे नहीं छूती, और वह BNSS की प्रथम अनुसूची के भाग II (अन्य क़ानूनों के अपराधों का वर्गीकरण) से तय होगा। उस सारणी के अनुसार तीन वर्ष से कम की सज़ा या केवल जुर्माने वाला अपराध असंज्ञेय और जमानतीय है, और उसे कोई भी मजिस्ट्रेट सुन सकता है। इस पृष्ठ की धाराएँ 71, 73, 74 में सज़ा दो वर्ष तक है, इसलिए वे इस सारणी की इसी श्रेणी में आती प्रतीत होती हैं। धारा 72 और 72A में अब कारावास नहीं, केवल शास्ति है, इसलिए कारावास की अवधि पर टिका यह वर्गीकरण उन पर नहीं बैठता (यह भी विश्लेषण है, आधिकारिक वर्गीकरण नहीं)।

धारा 78 (Power to investigate offences): "Notwithstanding anything contained in the Code of Criminal Procedure, 1973, a police officer not below the rank of Inspector shall investigate any offence under this Act", यानी इस अधिनियम के अपराध की जाँच कम से कम Inspector स्तर का पुलिस अधिकारी करेगा। यह शब्द 2009 के संशोधन से आया है। भारत कोड का फ़ुटनोट बताता है कि पहले यहाँ "Deputy Superintendent of Police" था, और MeitY पर प्रकाशित मूल पाठ में भी यही शब्द है। यानी जाँच के लिए अपेक्षित स्तर घटाकर Inspector किया गया।

प्रक्रिया के चार नियम: 77A, 77B और 78

धाराविषयमुख्य शर्तध्यान रखें
77A(1)शमन (compounding)आजीवन कारावास या 3 वर्ष से अधिक के कारावास वाले अपराध शमन-योग्य नहींदो परंतुक: पूर्व दोषसिद्धि; सामाजिक-आर्थिक स्थिति, 18 वर्ष से कम का बच्चा या महिला
77A(2)आवेदनअभियुक्त उस अदालत में आवेदन दे जहाँ विचारण लंबित हैपाठ में CrPC की 265B और 265C का संदर्भ; BNSS में 290, 291 (अध्ययन-सहायता)
77Bसंज्ञेय और जमानतीय3 वर्ष और उससे अधिक: संज्ञेय; 3 वर्ष: जमानतीय3 वर्ष दोनों में आता है; पाठ हूबहू लिखें
78जाँच का अधिकारीInspector से नीचे नहींपहले Deputy Superintendent of Police था (2009 से Inspector)

धारा 75: लागू होने का प्रवाह

  1. अपराध या उल्लंघन भारत के बाहर हुआ

    75(1): अधिनियम लागू हो सकता है, राष्ट्रीयता से फ़र्क़ नहीं

  2. 75(2) की जाँच

    क्या कृत्य में भारत में स्थित कंप्यूटर, कंप्यूटर प्रणाली या नेटवर्क शामिल है?

  3. हाँ

    अधिनियम लागू

  4. नहीं

    75(2) की शर्त पूरी नहीं; धारा 75 से लागू होना सिद्ध नहीं

चित्र पाठ के शब्द-विन्यास का क्रम दिखाता है।

मानचित्र: धारा 71 से 78

धारा 71 से 78

कृत्य

  • 71 मिथ्या-निरूपण
  • 72 गोपनीयता-भंग (अधिनियम की शक्तियाँ)
  • 72A निजी सूचना, अनुबंध
  • 73 झूठा प्रमाणपत्र
  • 74 कपटपूर्ण प्रयोजन

दायरा और परिणाम

  • 75 भारत के बाहर
  • 76 ज़ब्ती और परंतुक
  • 77 अन्य दंड से अप्रभावित

प्रक्रिया

  • 77A शमन
  • 77B संज्ञेय और जमानतीय
  • 78 जाँच: Inspector

मुख्य तथ्य

धारा 71
कारावास 2 वर्ष तक, या जुर्माना 1 लाख रुपये तक, या दोनों
धारा 72
वर्तमान पाठ: शास्ति 5 लाख रुपये तक, कारावास नहीं (जन विश्वास अधिनियम 2023 से; पहले 2 वर्ष तक कारावास, या 1 लाख रुपये तक जुर्माना, या दोनों); केवल अधिनियम, नियम या विनियम से मिली शक्ति के प्रयोग में पहुँच पाने वाले पर
धारा 72A
वर्तमान पाठ: शास्ति 25 लाख रुपये तक, कारावास नहीं (जन विश्वास अधिनियम 2023 से; पहले 3 वर्ष तक कारावास, या 5 लाख रुपये तक जुर्माना, या दोनों); शीर्षक में अब "Penalty"; धारा 2009 के संशोधन से जोड़ी गई (27-10-2009)
धारा 73 और 74
दोनों में कारावास 2 वर्ष तक, या जुर्माना 1 लाख रुपये तक, या दोनों
धारा 75
(1) भारत के बाहर अपराध पर भी, राष्ट्रीयता से स्वतंत्र; (2) यदि कृत्य में भारत में स्थित कंप्यूटर, प्रणाली या नेटवर्क शामिल
धारा 77A
आजीवन कारावास या 3 वर्ष से अधिक की सज़ा वाले अपराध शमन-योग्य नहीं; दो परंतुक; आवेदन उप-धारा (2) में
धारा 77B
3 वर्ष और उससे अधिक: संज्ञेय; 3 वर्ष: जमानतीय (पाठ के शब्द)
धारा 78
जाँच: Inspector से नीचे के पद का पुलिस अधिकारी नहीं (पहले Deputy Superintendent of Police)
जन विश्वास अधिनियम 2023
IT अधिनियम की धाराएँ 72 और 72A (साथ में 67C, 68, 69B, 70B आदि) संशोधित; 30 नवंबर 2023 से प्रभावी (MeitY कार्यालय-ज्ञापन, 3 नवंबर 2023)
अंतिम जाँच
2 अक्टूबर 2026 (भारत कोड की प्रति और जन विश्वास अधिनियम 2023 की अनुसूची का मिलान)

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • धारा 72 और 72A में पुरानी सज़ा (कारावास या जुर्माना) लिखना। जन विश्वास अधिनियम, 2023 के बाद 72 में शास्ति 5 लाख रुपये तक और 72A में 25 लाख रुपये तक है, कारावास नहीं; धारा 71, 73 और 74 में 2 वर्ष तक कारावास, या 1 लाख रुपये तक जुर्माना, या दोनों।
  • धारा 72 को हर प्रकार के गोपनीयता-भंग की धारा समझ लेना। यह अधिनियम की शक्तियों के प्रयोग में पहुँच पाने वाले पर है; निजी सूचना और अनुबंध वाला मामला 72A है।
  • धारा 72A में आशय या ज्ञान ("wrongful loss or wrongful gain") का उल्लेख न करना।
  • धारा 75 में "विदेशी अपराधी" को पर्याप्त शर्त बता देना। शर्त है कि कृत्य में भारत में स्थित कंप्यूटर, कंप्यूटर प्रणाली या नेटवर्क शामिल हो।
  • धारा 76 के परंतुक की अनदेखी, यानी यह मान लेना कि कंप्यूटर हर हाल में ज़ब्त होता है।
  • धारा 77A में तीन वर्ष की रेखा उलटना। तीन वर्ष से अधिक की सज़ा वाले अपराध का शमन नहीं हो सकता।
  • धारा 77B की "तीन वर्ष" को दोनों जगह अलग-अलग न पढ़ पाना, या अपनी व्याख्या को पाठ बताना।
  • धारा 78 में Inspector की जगह पुराना पद Deputy Superintendent of Police लिख देना।

सूचना

यह सामग्री परीक्षा की तैयारी के लिए है और कानूनी सलाह नहीं है। किसी वास्तविक मामले में अधिवक्ता से परामर्श लें।