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पेपर III · इकाई III · भाग ख (विधि)

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955, धारा 206 से 218: राजस्व न्यायालयों का क्षेत्राधिकार, प्रक्रिया, परिसीमा और शक्तियाँ

काश्तकारी अधिनियम 1955 की धारा 206 से 218: लंबित मामले, केवल राजस्व न्यायालय के वाद, प्रक्रिया, पूर्व-क्रय, परिसीमा, कोर्ट फीस और अधिकारियों की शक्तियाँ।

  • लंबित मामले
  • क्षेत्राधिकार
  • प्रक्रिया
  • पूर्व-क्रय
  • शक्तियाँ
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (विधि): "Rajasthan Tenancy Act, 1955: ... Sections 14-17A, 31-37, 38-54A, 206-232, 239-242." इस पृष्ठ पर धारा 206 से 218 हैं: धारा 206 (लंबित मामले), 207 (केवल राजस्व न्यायालय के वाद), 208 से 212 (प्रक्रिया), 213 (खातेदार के हित की नीलामी), 214 और 215 (परिसीमा और कोर्ट फीस), 216 से 218 (बैठने का स्थान और राजस्व न्यायालयों की शक्तियाँ)। धारा 219 से 232 और 239 से 242 अगले पृष्ठ पर हैं। यह पृष्ठ परीक्षा की तैयारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं है; संशोधनों के लिए देखें: आधिकारिक अधिनियम पाठ।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • इन धाराओं पर 2016 से 2024 के पेपरों में सीधा प्रश्न नहीं देखा गया; अधिनियम से आए प्रश्न धारा 5 की परिभाषाओं और धारा 16 के हैं। फिर भी ये धाराएँ बताती हैं कि भूमि-विवाद किस अदालत में जाएगा, कौन सुनेगा और कितने समय में, इसलिए 5 या 10 अंक का प्रश्न "राजस्व न्यायालयों का क्षेत्राधिकार" पर आए तो यही पृष्ठ आधार बनेगा।
  • याद रखने लायक चार चीज़ें: (क) धारा 207: तीसरी अनुसूची के वाद केवल राजस्व न्यायालय सुनेगा, दीवानी अदालत नहीं; (ख) धारा 213(3): नीलामी में बिके खातेदार के हित को पन्द्रह दिन में पूर्व-क्रय का दावा, पाँच वर्गों की प्राथमिकता से; (ग) धारा 215 का परंतुक: राज्य सरकार के वाद में कोर्ट फीस नहीं; (घ) धारा 217(2): तहसीलदार की सीमा तीन सौ रुपये, कम से कम सौ रुपये।
  • उत्तर लिखते समय सीढ़ी का क्रम साफ़ रखें: तहसीलदार, सहायक कलक्टर, उप-खंड अधिकारी, कलक्टर, राजस्व अपीलीय प्राधिकारी, राजस्व मंडल। नीचे की तालिकाएँ और आरेख इसी क्रम में हैं।

पहले सरल भाषा में: ज़मीन का झगड़ा किस दरवाज़े जाएगा

मान लीजिए खातेदार और भूधारक के बीच लगान या बेदखली का झगड़ा है। सवाल यह उठता है कि वह तहसील में जाए या दीवानी अदालत में। काश्तकारी अधिनियम का भाग "प्रक्रिया" इसी का उत्तर देता है। नियम सीधा है: जो मामले तीसरी अनुसूची (Third Schedule) में गिनाए गए हैं, उन्हें केवल राजस्व न्यायालय (revenue court) सुनेगा। दीवानी अदालत उनमें हाथ नहीं डाल सकती।

दूसरा सवाल है कि राजस्व न्यायालय में भी कौन-सा अधिकारी। इसका उत्तर तीसरी अनुसूची के सातवें स्तंभ में है और धारा 217 उसमें एक सीमा जोड़ती है: तहसीलदार केवल छोटे वाद सुनेगा, जहाँ राज्य सरकार पक्षकार नहीं है और मूल्य सीमा के भीतर है। बड़े वाद सहायक कलक्टर के पास जाते हैं। इस पृष्ठ की हर धारा इन्हीं दो सवालों के आसपास है: कौन-सी अदालत, और उसमें कौन-सी प्रक्रिया।

तीसरी और चौथी अनुसूची की सूचियाँ विस्तृत हैं और इस पृष्ठ में उनका सार नहीं दिया गया है; केवल वही कहा गया है जो धाराओं के पाठ में लिखा है। अनुसूचियों की प्रविष्टियों के लिए आधिकारिक अधिनियम पाठ देखें।

धारा 206: अधिनियम लागू होने के समय लंबित मामले

जब कोई नया कानून लागू होता है तो पहले से चल रहे मुकदमों का क्या होगा, यह धारा 206 बताती है। उप-धारा (1): अधिनियम के प्रारंभ पर राजस्व न्यायालय में लंबित सभी वाद, मामले, अपील, आवेदन, संदर्भ और कार्यवाहियाँ, अधिनियम के किसी विपरीत विशेष प्रावधान के अधीन रहते हुए, इसी अधिनियम के अंतर्गत शुरू हुई मानी जाएँगी और अधिनियम में बताई रीति से चलेंगी।

उप-धारा (2): यदि ऐसा कोई मामला अधिनियम के अनुसार उस राजस्व न्यायालय में चल ही नहीं सकता जहाँ लंबित है, तो उसे उस राजस्व न्यायालय को भेजा जाएगा जहाँ वह चल सकता है। उप-धारा (3): जो मामला उस समय दीवानी अदालत में लंबित था और जिसे धारा 207 ने केवल राजस्व न्यायालय के लिए तय कर दिया है, उसे दीवानी अदालत राजस्व न्यायालय को भेजेगी। उप-धारा (4) उलटा कहती है: राजस्व न्यायालय में लंबित जो मामले धारा 207 में नहीं आते, उन्हें वह दीवानी अदालत को भेजेगा जिसे उसे सुनने का क्षेत्राधिकार है।

संक्षेप में चारों उप-धाराएँ एक ही बात का अलग-अलग पहलू हैं: मामला उसी अदालत में पहुँचे जो उसे सुनने के लिए नए कानून में तय है। यह एक संक्रमणकालीन (transitional) प्रावधान है, इसलिए आज के वादों पर इसकी भूमिका सीमित है, पर परीक्षा में धारा का शीर्षक "Provision for pending cases" और चार उप-धाराओं की दिशा पूछी जा सकती है।

धारा 206: लंबित मामलों का स्थानांतरण

उप-धारास्थितिक्या होगा
206(1)अधिनियम के प्रारंभ पर राजस्व न्यायालय में लंबित मामलेअधिनियम के अंतर्गत शुरू हुए माने जाएँगे, विपरीत विशेष प्रावधान के अधीन
206(2)राजस्व न्यायालय में लंबित, पर अधिनियम के अनुसार वहाँ चलने योग्य नहींजिस राजस्व न्यायालय में चलने योग्य हैं, वहाँ भेजे जाएँगे
206(3)दीवानी अदालत में लंबित, जिन्हें धारा 207 केवल राजस्व न्यायालय के लिए कहती हैदीवानी अदालत सक्षम राजस्व न्यायालय को भेजेगी
206(4)राजस्व न्यायालय में लंबित, जो धारा 207 में नहीं आतेराजस्व न्यायालय क्षेत्राधिकार वाली दीवानी अदालत को भेजेगा

धारा 207: केवल राजस्व न्यायालय का क्षेत्राधिकार

यह इस पृष्ठ की सबसे महत्वपूर्ण धारा है। उप-धारा (1): तीसरी अनुसूची में बताए स्वरूप के सभी वाद और आवेदन राजस्व न्यायालय ही सुनेगा और निर्णीत करेगा। उप-धारा (2): राजस्व न्यायालय के अलावा कोई अन्य अदालत ऐसे वाद या आवेदन का, या ऐसे वाद-हेतुक पर आधारित किसी वाद का, संज्ञान नहीं लेगी, जिसमें ऐसे वाद या आवेदन से कोई राहत मिल सकती थी।

स्पष्टीकरण (Explanation) परीक्षा के लिए उपयोगी है: यदि वाद-हेतुक (cause of action) ऐसा है जिसमें राजस्व न्यायालय राहत दे सकता था, तो यह बात महत्वहीन है कि दीवानी अदालत से माँगी गई राहत उससे अधिक है, अतिरिक्त है, या उससे मेल नहीं खाती। यानी वादी "राहत का नाम बदलकर" दीवानी अदालत नहीं जा सकता। मूल कसौटी राहत का नाम नहीं, वाद-हेतुक है।

इसके साथ धारा 239 और 242 को जोड़कर पढ़ें (अगले पृष्ठ पर): जहाँ राजस्व न्यायालय में स्वामित्व का प्रश्न उठे, वह मुद्दा दीवानी अदालत को जाता है, और जहाँ दीवानी अदालत में काश्तकारी का प्रश्न उठे, वह मुद्दा राजस्व न्यायालय को। धारा 207 सामान्य नियम है और वे दोनों धाराएँ उसके अपवाद की तरह काम करती हैं।

धारा 208 से 212: प्रक्रिया की धाराएँ

धारा 208 (सिविल प्रक्रिया संहिता का लागू होना): सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के प्रावधान अधिनियम के अंतर्गत सभी वादों और कार्यवाहियों पर लागू होंगे, तीन अपवादों के साथ: (a) जो प्रावधान अधिनियम से असंगत हों, उस सीमा तक; (b) जो केवल विशेष वादों या कार्यवाहियों पर लागू हों और अधिनियम के दायरे से बाहर हों; और (c) चौथी अनुसूची की सूची I में दिए प्रावधान। लागू प्रावधान चौथी अनुसूची की सूची II के संशोधनों के अधीन होंगे।

धारा 209 (वादी जिस राहत का हक़दार है वह देना): किसी वाद या कार्यवाही में न्यायालय, वादी के आवेदन पर और आवश्यक वाद-बिंदु (issues) तय करने के बाद, कोई भी राहत दे सकता है जिसे देने की उसे शक्ति है और जिसका वादी हक़दार पाया जाए, भले ही वह वाद-पत्र या आवेदन में न माँगी गई हो। परंतुक: वाद-बिंदु तय करने के बाद, किसी भी पक्ष के अनुरोध पर, न्यायालय साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए उचित समय देगा।

धारा 210 (तीसरे व्यक्ति को सद्भाव से भुगतान की दलील): लगान की बकाया के लिए काश्तकार पर वाद में यदि काश्तकार कहे कि उसने उस अवधि का लगान किसी तीसरे व्यक्ति को दे दिया, जिसे वह सद्भाव (good faith) से लेने का हक़दार मानता था, तो न्यायालय काश्तकार के ख़र्च पर उस तीसरे व्यक्ति को पक्षकार बनाएगा और प्रश्न की जाँच कर निर्णय देगा।

धारा 211 (सह-हिस्सेदारों के वाद): दो या अधिक सह-हिस्सेदार (co-sharers) जब किसी अधिकार, हक़ या हित में हों, तो जो कुछ उस हित के कब्ज़ाधारी को करना या करने की अनुमति है, वह सब वे संयुक्त रूप से करेंगे, जब तक उन्होंने सबकी ओर से कार्य करने के लिए अभिकर्ता (agent) नियुक्त न किया हो (उप-धारा 1)। स्थानीय प्रथा या विशेष संविदा से, जिसमें कोई सह-हिस्सेदार लगान का पूरा या अपना हिस्सा अलग से लेने का हक़दार हो, यह प्रभावित नहीं होता (उप-धारा 2)।

उप-धारा (3) अकेले वाद का रास्ता देती है: जहाँ कोई सह-हिस्सेदार अकेले वाद नहीं कर सकता और बाकी सह-हिस्सेदार संयुक्त रूप से वसूली योग्य धन के वाद में शामिल होने से मना कर दें, वह अपने हिस्से के लिए अलग से वाद कर सकता है, बाकी को प्रतिवादी बनाकर। उप-धारा (4): जहाँ जोत का काश्तकार या उसका अवैध अंतरिती उसी जोत में स्वामित्व अधिकार का सह-हिस्सेदार भी हो, उसके विरुद्ध वाद में उसे वादी या आवेदक बनाना आवश्यक नहीं।

धारा 212 (निषेधाज्ञा और रिसीवर की नियुक्ति): किसी वाद या कार्यवाही में, शपथ-पत्र या अन्य प्रकार से, यदि सिद्ध हो कि (a) संपत्ति को किसी पक्षकार द्वारा नष्ट किए जाने, क्षति पहुँचाने या अंतरित किए जाने का ख़तरा है, या (b) कोई पक्षकार न्याय के उद्देश्य को विफल करने के लिए संपत्ति हटाने या बेचने की धमकी देता या इरादा रखता है, तो न्यायालय अस्थायी निषेधाज्ञा (temporary injunction) दे सकता है और आवश्यक हो तो रिसीवर (receiver) नियुक्त कर सकता है। उप-धारा (2): जिस पर निषेधाज्ञा हुई या जिसकी संपत्ति पर रिसीवर बैठा, वह न्यायालय द्वारा तय राशि की नकद प्रतिभूति (cash security) जमा कर सकता है, तब न्यायालय निषेधाज्ञा या रिसीवर का आदेश वापस ले सकता है।

धारा 208 से 212 एक नज़र में

धाराशीर्षकमुख्य बात
208Application of Civil Procedure CodeCPC 1908 लागू; तीन अपवाद; चौथी अनुसूची की सूची II के संशोधन
209Granting any relief to which plaintiff is entitledवाद-बिंदु तय कर, जो माँगा नहीं गया वह राहत भी; परंतुक: साक्ष्य के लिए उचित समय
210Procedure when plea of payment in good faith to a third person is takenकाश्तकार के ख़र्च पर तीसरे व्यक्ति को पक्षकार बनाना
211Suits etc. by co-sharersसंयुक्त कार्य; मना करने पर अपने हिस्से का अलग वाद
212Provision for injunction and appointment of a receiverअस्थायी निषेधाज्ञा, रिसीवर; नकद प्रतिभूति पर वापसी

धारा 213: खातेदार के हित की नीलामी और पूर्व-क्रय का अधिकार

लगान की बकाया की डिक्री के निष्पादन में खातेदार के हित को बेचा जा सकता है। उप-धारा (1): धारा 42 के अधीन रहते हुए, खातेदार काश्तकार का अपनी जोत या उसके किसी भाग में हित, उस जोत के लगान की बकाया की डिक्री के निष्पादन में बेचा जा सकता है। जब तक हित उसका भूधारक ही न खरीद ले, क्रेता, उप-धारा (3) के अधीन, उसी हित का और उन्हीं दायित्वों का धारक होता है जो काश्तकार के थे।

उप-धारा (2): यदि जोत के केवल एक भाग का हित बेचा जाना है, तो डिक्री का निष्पादन करने वाला न्यायालय राजस्व मंडल (Board) के नियमों के अनुसार पहले जोत का लगान उस भाग और शेष भाग पर बाँटेगा।

उप-धारा (3) परीक्षा की दृष्टि से सबसे उपयोगी है। हित बिकने पर, नीचे लिखे क्रम की प्राथमिकता से, पाँच वर्गों में से कोई भी बिक्री की तारीख़ से पन्द्रह दिन के भीतर "सबसे ऊँची बोली पर" उस हित को ले लेने का दावा कर सकता है: (a) उप-काश्तकार (sub tenant); (b) गाँव में रहने वाला कृषि या अन्य मज़दूर या ग्राम-सेवक (village servant); (c) गाँव में रहने वाला कोई कृषक (agriculturist); (d) भूधारक (landholder), राज्य सरकार को छोड़कर, या estate-holder; (e) estate-holder। खंड (d) का छपा पाठ "the landholder, other than the State Government, or an estate holders" है और खंड (e) का "the estate holder": estate holder दोनों में आता है, यह दोहराव अधिनियम के पाठ में ही है। उत्तर में खंड (d) और (e) को पाठ के इन्हीं शब्दों में लिखें।

दो परंतुक हैं। पहला: यदि खंड (a) या खंड (c) के एक ही वर्ग के दो या अधिक व्यक्ति दावा करें, तो वरीयता उसे मिलेगी जो गाँव में सबसे कम क्षेत्र जोतता है; यदि क्षेत्र बराबर हो तो निर्धारित रीति से निर्णय होगा। दूसरा: यदि खंड (b) के वर्ग के दो या अधिक व्यक्ति दावा करें, तो दावे का निर्णय निर्धारित रीति से होगा।

उप-धारा (4): उप-धारा (3) में कुछ भी लिखा हो, जहाँ बिके हित का खातेदार अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य है, वहाँ खंड (a), (b) और (c) के प्रतिद्वंद्वी दावेदारों में वरीयता उस वर्ग के उस दावेदार को मिलेगी जो अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य है। यह धारा 42 की उसी सुरक्षा-नीति का विस्तार है जो पिछले पृष्ठ पर बिक्री, उपहार और वसीयत के बारे में पढ़ी गई।

धारा 213(3): पूर्व-क्रय का दावा, प्राथमिकता का क्रम

क्रमदावेदार (अधिनियम का शब्द)एक ही वर्ग के दो दावेदार हों तो
(a)उप-काश्तकार (sub tenant)गाँव में सबसे कम क्षेत्र जोतने वाले को वरीयता; बराबर हो तो निर्धारित रीति
(b)गाँव में रहने वाला कृषि या अन्य मज़दूर या ग्राम-सेवक (agricultural or other labourer or a village servant)निर्धारित रीति से निर्णय
(c)गाँव में रहने वाला कृषक (agriculturist)गाँव में सबसे कम क्षेत्र जोतने वाले को वरीयता; बराबर हो तो निर्धारित रीति
(d)भूधारक (landholder), राज्य सरकार को छोड़कर, या estate-holderअधिनियम में अलग परंतुक नहीं
(e)estate-holderअधिनियम में अलग परंतुक नहीं

समय-सीमा: बिक्री की तारीख़ से पन्द्रह दिन; मूल्य: सबसे ऊँची बोली। खंड (d) और (e) में estate holder का दोहराव अधिनियम के पाठ में ही है।

धारा 214 और 215: परिसीमा और कोर्ट फीस

धारा 214(1): तीसरी अनुसूची में बताए वाद और आवेदन उसी अनुसूची में निर्धारित समय के भीतर ही किए जाएँगे, और निर्धारित अवधि बीतने के बाद किया गया कोई वाद या आवेदन ख़ारिज किया जाएगा। दो परंतुक संक्रमण के लिए हैं: पहला, जहाँ अनुसूची की अवधि अधिनियम से पहले के कानून की अवधि से छोटी है, वहाँ वाद या आवेदन अधिनियम के प्रारंभ से छह महीने के भीतर, या पुराने कानून की अवधि में, जो पहले समाप्त हो, किया जा सकता है। दूसरा, जहाँ अनुसूची में अवधि है पर पुराने कानून में कोई अवधि नहीं थी, वहाँ अनुसूची की अवधि अधिनियम के प्रारंभ की तारीख़ से गिनी जाएगी।

उप-धारा (2): यदि कृषि-संकट (agricultural calamity) के कारण सक्षम प्राधिकारी के आदेश से लगान का भुगतान स्थगित हुआ है, तो उस लगान की वसूली के वाद की परिसीमा की गणना में स्थगन की अवधि छोड़ दी जाएगी। उप-धारा (3): उप-धारा (1) और (2) के अधीन, अधिनियम के अंतर्गत वादों, अपीलों, आवेदनों और कार्यवाहियों पर परिसीमा अधिनियम (अधिनियम के पाठ में "Indian Limitation Act, 1908" लिखा है) के प्रावधान लागू होंगे।

धारा 215: वादों और आवेदनों पर देय कोर्ट फीस तीसरी अनुसूची के छठे स्तंभ में बताई गई होगी। परंतुक: राज्य सरकार द्वारा या उसकी ओर से किए गए किसी वाद या आवेदन पर कोई कोर्ट फीस देय नहीं होगी। स्तंभों की संख्या याद रखना उपयोगी है: छठा स्तंभ कोर्ट फीस का, सातवाँ स्तंभ (धारा 217(1)) सक्षम न्यायालयों का।

धारा 216 से 218: कहाँ बैठेंगे, किसके पास क्या शक्ति

धारा 216 में बैठने का स्थान है। राजस्व मंडल (Board) राज्य में किसी भी स्थान पर बैठकर मामले निपटा सकता है (उप-धारा 1)। राजस्व अपीलीय प्राधिकारी (revenue appellate authority) उन स्थानों पर बैठेगा जो राज्य सरकार समय-समय पर निर्देशित करे (उप-धारा 2)। कलक्टर, उप-खंड अधिकारी या सहायक कलक्टर अपनी अदालत उस ज़िले, उप-खंड या स्थानीय क्षेत्र में कहीं भी लगा सकता है जिसमें उसे नियुक्त किया गया है (उप-धारा 3)। तहसीलदार अपनी तहसील में कहीं भी अदालत लगा सकता है (उप-धारा 4)।

धारा 217(1): अधिनियम के अंतर्गत वाद और आवेदन निपटाने में सक्षम राजस्व न्यायालयों के वर्ग वही होंगे जो तीसरी अनुसूची के सातवें स्तंभ में बताए हैं। उप-धारा (2) में तहसीलदार की सीमा है: तहसीलदार केवल ऐसे वाद या आवेदन निपटा सकता है जिनमें राज्य सरकार पक्षकार नहीं है और विषय-वस्तु की रकम या मूल्य तीन सौ रुपये से अधिक नहीं है, या राज्य सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना से तय ऐसी अधिकतम सीमा से, जो सौ रुपये से कम न हो। जो वाद या आवेदन अनुसूची में तहसीलदार की क्षमता में बताया गया हो, पर इस रकम या मूल्य से अधिक हो या राज्य सरकार के विरुद्ध या उसकी ओर से हो, उसे सहायक कलक्टर सुनकर निपटाएगा।

धारा 218 में निहित शक्तियाँ (inherent powers) हैं, जो ऊपर के अधिकारी को नीचे के अधिकारियों की शक्तियाँ देती हैं: (i) राजस्व अपीलीय प्राधिकारी के पास कलक्टर, उप-खंड अधिकारी, सहायक कलक्टर और तहसीलदार की सब शक्तियाँ; (ii) कलक्टर के पास उप-खंड अधिकारी, सहायक कलक्टर और तहसीलदार की; (iii) उप-खंड अधिकारी के पास सहायक कलक्टर और तहसीलदार की; (iv) सहायक कलक्टर के पास तहसीलदार की। यह नियम सीढ़ी की तरह ऊपर से नीचे की ओर चलता है, उलटी दिशा में नहीं।

धारा 218: ऊपर के अधिकारी के पास नीचे वालों की शक्तियाँ

अधिकारी (क्रम धारा 218 का)किनकी सब शक्तियाँ उसके पास होती हैं
(i) राजस्व अपीलीय प्राधिकारी (revenue appellate authority)कलक्टर, उप-खंड अधिकारी, सहायक कलक्टर, तहसीलदार
(ii) कलक्टर (Collector)उप-खंड अधिकारी, सहायक कलक्टर, तहसीलदार
(iii) उप-खंड अधिकारी (Sub-Divisional Officer)सहायक कलक्टर, तहसीलदार
(iv) सहायक कलक्टर (Assistant Collector)तहसीलदार

धारा 218 राजस्व मंडल का नाम इस सूची में नहीं लेती; मंडल की शक्तियाँ अन्य धाराओं में हैं।

धारा 216 और 217: कौन कहाँ बैठे, तहसीलदार की सीमा

प्रश्नउत्तरधारा
राजस्व मंडल कहाँ बैठ सकता हैराज्य में किसी भी स्थान पर216(1)
राजस्व अपीलीय प्राधिकारी कहाँजहाँ राज्य सरकार निर्देश दे216(2)
कलक्टर, उप-खंड अधिकारी, सहायक कलक्टरअपने ज़िले, उप-खंड या स्थानीय क्षेत्र में कहीं भी216(3)
तहसीलदारअपनी तहसील में कहीं भी216(4)
तहसीलदार किन वादों को सुनेराज्य सरकार पक्ष नहीं; रकम या मूल्य तीन सौ रुपये तक, या अधिसूचित सीमा (सौ रुपये से कम नहीं)217(2)
सीमा से अधिक या राज्य सरकार के विरुद्ध वादसहायक कलक्टर सुनेगा217(2)

भूमि-विवाद की सीढ़ी: कौन सुनेगा (धारा 207, 217, 218)

  1. वाद या आवेदन

    तीसरी अनुसूची का स्वरूप?

  2. हाँ: केवल राजस्व न्यायालय

    धारा 207; दीवानी अदालत का संज्ञान वर्जित

  3. निम्नतम सक्षम न्यायालय में संस्था

    धारा 220 (अगले पृष्ठ पर); श्रेणी तीसरी अनुसूची का सातवाँ स्तंभ

  4. तहसीलदार या सहायक कलक्टर?

    धारा 217(2): तीन सौ रुपये की सीमा और राज्य सरकार का पक्षकार न होना

  5. सुनवाई और निर्णय

    CPC (धारा 208), परिसीमा (धारा 214), कोर्ट फीस (धारा 215)

आरेख धाराओं का सरल क्रम दिखाता है; वाद की सूची के लिए तीसरी अनुसूची देखें।

मुख्य तथ्य

धारा 206
अधिनियम के प्रारंभ पर लंबित मामलों का स्थानांतरण, चार उप-धाराएँ
धारा 207
तीसरी अनुसूची के वाद केवल राजस्व न्यायालय; दीवानी अदालत का संज्ञान वर्जित
धारा 208
CPC 1908 लागू; चौथी अनुसूची की सूची I अपवाद, सूची II संशोधन
धारा 213(3)
पूर्व-क्रय का दावा बिक्री से पन्द्रह दिन में; पाँच वर्गों की प्राथमिकता
धारा 213(4)
अनुसूचित जाति या जनजाति के खातेदार का हित बिके तो उसी समुदाय के दावेदार को वरीयता
धारा 214(2)
कृषि-संकट में लगान का स्थगन हो तो स्थगन की अवधि परिसीमा से बाहर
धारा 215
कोर्ट फीस तीसरी अनुसूची के छठे स्तंभ के अनुसार; राज्य सरकार को कोई फीस नहीं
धारा 217(2)
तहसीलदार की सीमा: तीन सौ रुपये, अधिसूचित सीमा सौ रुपये से कम नहीं
धारा 218
चार स्तर: राजस्व अपीलीय प्राधिकारी, कलक्टर, उप-खंड अधिकारी, सहायक कलक्टर
अंतिम जाँच
2 अक्तूबर 2026

राजस्थान का पहलू

अधिनियम के पाठ से: धारा 206 से 218 राजस्थान के राजस्व न्यायालयों की व्यवस्था तय करती हैं। राजस्व मंडल (Board) पूरे राज्य में बैठ सकता है, राजस्व अपीलीय प्राधिकारी वहाँ बैठता है जहाँ राज्य सरकार निर्देश दे, और तहसीलदार की मौद्रिक सीमा राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना से बदल सकती है, पर सौ रुपये से नीचे नहीं। अधिसूचना से तय वर्तमान सीमा इस पृष्ठ में नहीं दी गई है; देखें: आधिकारिक अधिनियम पाठ।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • धारा 207 में "दीवानी अदालत भी सुन सकती है" लिख देना: तीसरी अनुसूची के वाद केवल राजस्व न्यायालय सुनता है।
  • धारा 213(3) की पन्द्रह दिन की अवधि को तीस या साठ दिन लिख देना: तीस, साठ और नब्बे दिन अपील की सीमाएँ (धारा 228) हैं, पूर्व-क्रय की नहीं।
  • पूर्व-क्रय की प्राथमिकता में उप-काश्तकार को पीछे रख देना: क्रम (a) उप-काश्तकार से शुरू होता है।
  • धारा 215 के परंतुक को भूलना: राज्य सरकार के वाद या आवेदन पर कोर्ट फीस देय नहीं।
  • तहसीलदार की सीमा "तीन सौ रुपये" के साथ यह भूल जाना कि राज्य सरकार पक्षकार हो तो वाद तहसीलदार नहीं सुनता।
  • धारा 218 की सीढ़ी को उलटा पढ़ना: ऊपर वाले के पास नीचे वालों की शक्तियाँ हैं, नीचे वाले के पास ऊपर वालों की नहीं।
  • धारा 206 को आज के वादों पर सीधा लागू समझना: यह प्रारंभ के समय लंबित मामलों का संक्रमणकालीन प्रावधान है।