राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955, धारा 14 से 17A और 31 से 37: काश्तकारों के वर्ग, खातेदारी अधिकार और काश्तकार के अधिकार
काश्तकारी अधिनियम 1955 की धारा 14 से 17A और 31 से 37: काश्तकारों के वर्ग, खातेदार की कसौटी, धारा 16 की चौदह भूमियाँ और काश्तकार के सामान्य हक़; 2016 का प्रश्न हल सहित।
- खातेदार
- धारा 16
- खुदकाश्त
- अनुप्रमाणन
- नालबट
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (विधि): "Rajasthan Tenancy Act, 1955: ... Sections 14-17A, 31-37, 38-54A, 206-232, 239-242." इस पृष्ठ पर धारा 14 से 17A (धाराएँ 14, 15, 15A, 15AA, 15AAA, 15B, 16, 16A, 17, 17A) और धारा 31 से 37 (धाराएँ 31, 32, 33, 34, 35, 36, 36A, 37) हैं। धारा 18 से 30A इस पाठ्यक्रम में नहीं हैं, इसलिए यहाँ नहीं ली गई हैं। यह पृष्ठ परीक्षा की तैयारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं है; संशोधनों के लिए देखें: आधिकारिक अधिनियम पाठ।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- इस पृष्ठ की धारा 16 से 2016 के पेपर में 5 अंक (लगभग 50 शब्द) का प्रश्न आया था: खातेदारी अधिकार जिन पाँच प्रकार की भूमि पर उत्पन्न नहीं होते, उन्हें बताइए। धारा 16 में चौदह प्रकार गिनाए गए हैं, पाँच बताने हैं, इसलिए सूची आसान अंक देती है।
- धारा 14, 15, 17 और 31 से 37 पर 2016 से 2024 के पेपरों में सीधा प्रश्न नहीं देखा गया। फिर भी काश्तकार के वर्ग (धारा 14), खातेदार कौन है (धारा 15) और काश्तकार के हक़ (आवासीय भूखंड, लिखित पट्टा, अतिरिक्त भुगतान पर रोक, कुर्की से संरक्षण) तथ्य-आधारित अनुच्छेदों में अच्छे उत्तर बनाते हैं।
- इंदिरा गांधी नहर, चंबल परियोजना और आबू-अजमेर-सुनेल क्षेत्र वाली धाराएँ (15A, 15AA, 15AAA, 15B) लंबी हैं; इन्हें पूरा रटना ज़रूरी नहीं, पर "कहाँ खातेदारी बनती है, कहाँ नहीं" की रूपरेखा याद रखें।
पहले सरल भाषा में: काश्तकारी के पाँच दर्जे
किसी मकान के किरायेदारों में कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें मालिक आसानी से नहीं हटा सकता, और कुछ ऐसे जो महीने-दर-महीने रहते हैं। खेती की ज़मीन पर भी दर्जे हैं। अधिनियम की धारा 14 बताती है कि काश्तकार तीन वर्ग (और मालिक नाम का एक जोड़ा गया वर्ग) में बँटते हैं: खातेदार (Khatedar tenant) जिनके हक़ सबसे मज़बूत हैं, खुदकाश्त के काश्तकार (tenant of Khudkasht) जो किसी संपदा-धारक की स्वयं-जोती भूमि पर बैठे हैं, और गैर-खातेदार (Gair Khatedar tenant), यानी बाक़ी सब, और बीच में जोड़ा गया वर्ग मालिक (Malik)। उप-काश्तकार (sub-tenant) इस सूची में अलग हैं और धारा 15(1) के रास्ते से सीधे खातेदार नहीं बनते।
यह वर्गीकरण इसलिए अहम है कि आगे के सारे अधिकार (उत्तराधिकार, हस्तांतरण, बंधक, पट्टा देना, लगान, बेदखली) वर्ग के हिसाब से बदलते हैं। यानी "काश्तकार" लिखकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता; पहले वर्ग बताना पड़ता है। धारा 15 से 17A इसी वर्गीकरण की व्याख्या हैं और धारा 31 से 37 सभी काश्तकारों को मिलने वाले सामान्य हक़ गिनाती हैं।
धारा 14: काश्तकारों के वर्ग
| खंड | वर्ग (statutory term) | मोटा अर्थ |
|---|---|---|
| 14(a) | खातेदार काश्तकार (Khatedar tenants) | धारा 15 के अनुसार वे काश्तकार जिन्हें खातेदारी अधिकार मिले हैं |
| 14(aa) | मालिक (Maliks) | वे जो ज़मींदारी या बिस्वेदारी के उन्मूलन के बाद अपनी खुदकाश्त के मालिक बने (धारा 17A) |
| 14(b) | खुदकाश्त के काश्तकार (Tenants of Khudkasht) | संपदा-धारक की खुदकाश्त पर विधिवत बिठाए गए काश्तकार (धारा 16A) |
| 14(c) | गैर-खातेदार काश्तकार (Gair Khatedar tenants) | इन वर्गों से बाहर का हर काश्तकार (धारा 17) |
"For the purposes of this Act, there shall be the following classes of tenants": यही धारा 14 की शुरुआत है।
धारा 15: खातेदार काश्तकार कौन बनता है
धारा 15(1) का सूत्र यह है: जो व्यक्ति इस अधिनियम के प्रारंभ पर उप-काश्तकार या खुदकाश्त के काश्तकार के अलावा किसी भूमि का काश्तकार है, या प्रारंभ के बाद उप-काश्तकार या खुदकाश्त के काश्तकार के अलावा काश्तकार के रूप में बिठाया जाता है, वह खातेदार काश्तकार है। इसी में दो और रास्ते जुड़े हैं: राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 101 के अधीन बने नियमों के अंतर्गत भूमि पाने वाला आबंटिती, और वह व्यक्ति जो इस अधिनियम, राजस्थान भूमि सुधार और जागीर पुनर्ग्रहण अधिनियम, 1952 या किसी अन्य प्रचलित विधि के अनुसार खातेदारी अधिकार प्राप्त कर ले। यह सब "subject to the provisions of section 16 and clause (d) of sub-section (1) of section 180" है, यानी धारा 16 की भूमियाँ बाहर रहती हैं।
एक महत्त्वपूर्ण परंतुक (proviso) जोड़ता है कि जिस काश्तकार को गंग नहर, भाखड़ा, चंबल या जवाई परियोजना क्षेत्र में (या राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित किसी अन्य क्षेत्र में) भूमि अस्थायी रूप से दी गई हो, उसे इस धारा के अंतर्गत खातेदारी अधिकार नहीं बनेंगे। यही परंतुक आगे धारा 15A से जुड़ता है।
उप-धाराएँ (2) से (5) एक विशेष स्थिति सँभालती हैं। यदि किसी व्यक्ति को अधिनियम के प्रारंभ से पहले राज्य सरकार ने "Grow More Food Campaign" में, किसी विशेष आदेश की शर्तों पर, या वैधानिक या अवैधानिक नियमों के अनुसार भूमि दी थी और उसने प्रारंभ से पहले उस अभियान का उद्देश्य पूरा करने में चूक की या आदेश, शर्त या नियम तोड़ा, तो उसे उप-धारा (1) से खातेदारी अधिकार नहीं बनते। ऐसा व्यक्ति प्रारंभ से तीन वर्ष के भीतर सहायक कलक्टर के पास घोषणा के लिए आवेदन कर सकता है, और सहायक कलक्टर निर्धारित रीति से जाँच करके, उसे सुनवाई का उचित अवसर देकर, आवेदन अस्वीकार न करे तो उसे खातेदार घोषित करेगा। आवेदन के चार आधार हैं: भूमि प्रारंभ के बाद दी गई थी; वह उपरोक्त परिस्थितियों में नहीं दी गई थी; भूमि देते समय उसे ऐसी परिस्थितियाँ बताई नहीं गई थीं; उसने प्रारंभ से पहले ऐसी कोई चूक या उल्लंघन नहीं किया था।
खातेदारी अधिकारों के क्षेत्रीय प्रावधान: धारा 15A, 15AA, 15AAA, 15B
| धारा | क्षेत्र | मुख्य बात |
|---|---|---|
| 15A | इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र (Indira Gandhi Canal area) | इस क्षेत्र में किसी भी शर्त पर दी गई भूमि को धारा 15(1) के परंतुक के अर्थ में अस्थायी रूप से दी गई माना जाएगा और खातेदारी अधिकार नहीं बनेंगे। परंतुक: राजस्थान उपनिवेशन (सामान्य कॉलोनी) शर्तें, 1955 या उपनिवेशन अधिनियम, 1954 की धारा 7 की शर्तों या नहर क्षेत्र में खुदकाश्त के आबंटन-नियमों के अंतर्गत जिन्हें खातेदारी अधिकार बनते हैं, वे प्रभावित नहीं। उप-धारा (2): प्रारंभ से पहले स्थायी रूप से भूमि पाने का दावा करने वाला चार वर्ष में सहायक कलक्टर को आवेदन कर सकता है। |
| 15AA | चंबल परियोजना क्षेत्र (Chambal Irrigation Project area) | इस क्षेत्र में भूमि धारण करने वाले किसी भी व्यक्ति को खातेदारी अधिकार कभी बने नहीं माने जाएँगे। उप-धारा (2) अपवाद: जिन्हें प्रारंभ से पहले पूर्व कोटा या बूँदी राज्य के काश्तकारी कानूनों से वंशानुगत और अंतरणीय अधिकार थे; जिन्हें धारा 13 या 19 से या राजस्थान उपनिवेशन (चंबल परियोजना) नियम, 1957 से या 1952 के भूमि सुधार और जागीर पुनर्ग्रहण अधिनियम या 1959 के ज़मींदारी और बिस्वेदारी उन्मूलन अधिनियम से खातेदारी बनी। |
| 15AAA | इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में खातेदारी का उदय (accrual) | धारा 15A के होते हुए भी: (1) प्रारंभ पर खुदकाश्त-धारक, occupancy tenant, Maurusidar, खातेदार या वंशानुगत-अंतरणीय अधिकार वाला काश्तकार, चाहे वार्षिक रजिस्टर में दर्ज हो या न हो, खातेदार के सब अधिकार और दायित्व पाता है; (2) जो दर्ज नहीं था उसे 1979 के संशोधन अधिनियम के प्रारंभ से एक वर्ष में आवेदन देना था; (2-A) सर्वेक्षण में दर्ज काश्तकार सीलिंग की सीमा तक खातेदार; (3) 1983 के संशोधन के प्रारंभ से 1426 दिन यानी 30 जून 1987 तक आवेदन, सीलिंग तक खातेदारी, पर 25 बीघा सिंचित या 50 बीघा असिंचित से अधिक पर आरक्षित मूल्य (reserve price) देय; (4) 16 समान किस्तें; (5) एकमुश्त भुगतान पर 25 प्रतिशत कम; (6) भुगतान में विफल को खातेदारी नहीं; (7) लंबित आवेदन उप-धारा (3) के माने जाएँगे; (8) जो रिकॉर्ड में नहीं उसकी स्थिति साक्ष्य और ग्राम सभा की सहमति-राय से तय। |
| 15B | आबू, अजमेर और सुनेल क्षेत्र | जो व्यक्ति राजस्थान राजस्व विधि (विस्तार) अधिनियम, 1957 के प्रारंभ पर इन क्षेत्रों में उप-काश्तकार या खुदकाश्त के काश्तकार के अलावा काश्तकार है, वह खातेदार काश्तकार है, पर यह धारा 15 के परंतुक और उप-धाराओं (2) से (5), धारा 15A, धारा 16 और धारा 180(1)(d) के अधीन है। परंतुक: यदि उसने पहले की विधि से अधिक हैसियत या संपत्ति पाई थी या अधिक दायित्व लिया था, तो वह कायम रहेगा। |
धारा 15A और 15AAA का आपसी संबंध
दोनों धाराएँ इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र पर लागू हैं और पहली नज़र में विरोधी लगती हैं। धारा 15A सामान्य नियम बनाती है कि इस क्षेत्र में पट्टे पर दी गई भूमि अस्थायी रूप से दी गई है और खातेदारी अधिकार नहीं बनेंगे। धारा 15AAA "notwithstanding anything contained in section 15A" से शुरू होकर उन व्यक्तियों को खातेदारी देती है जो पहले से खुदकाश्त-धारक, occupancy tenant, Maurusidar, खातेदार या वंशानुगत-अंतरणीय अधिकार वाले थे। यानी पहली धारा नए पट्टेदारों के लिए रोक है और दूसरी पुराने अधिकार-धारकों के लिए रक्षा-कवच। विश्लेषण: यह जोड़ी "सामान्य नियम और उसके अपवाद" का क्लासिक नमूना है, इसलिए उत्तर में पहले नियम, फिर अपवाद लिखें।
धारा 15AAA(3) से (5) की संख्याएँ ध्यान से याद करें: आवेदन की अवधि 1983 के संशोधन अधिनियम के प्रारंभ से 1426 दिन, अर्थात् 30 जून 1987 तक (राज्य सरकार अधिसूचना से अधिकतम छह महीने बढ़ा सकती है); खातेदारी सीलिंग की सीमा तक; आरक्षित मूल्य उस भूमि के लिए जो 25 बीघा सिंचित या 50 बीघा असिंचित से अधिक हो; मूल्य की दर उपनिवेशन अधिनियम, 1954 की धारा 7 और धारा 28 के अनुसार; भुगतान सोलह समान किस्तों में, जिनमें पहली आवेदन के साथ और बाक़ी हर साल 1 जनवरी और 1 जुलाई को; एकमुश्त भुगतान पर देय राशि 25 प्रतिशत कम।
धारा 16: जिन भूमियों पर खातेदारी अधिकार नहीं बनते (2016 का प्रश्न)
धारा 16 शुरू होती है "Notwithstanding anything in this Act or in any other law ..." से, यानी यह इतनी मज़बूत है कि अधिनियम की अन्य धाराएँ और राज्य की दूसरी विधि भी इसे नहीं हिला सकती। इसमें चौदह प्रकार की भूमि गिनाई गई है जिन पर खातेदारी अधिकार "shall not accrue" हैं। सामान्य सूत्र यह है कि ये वे भूमियाँ हैं जिनका उपयोग सार्वजनिक, सामूहिक या अस्थायी प्रकृति का है: चराई, सरकारी बाग-वन-फार्म, रेल-नहर-छावनी-सैन्य भूमि, नदी-तालाब का पेटा, जल-आच्छादित भूमि और पेयजल-जलाशय का जलग्रहण क्षेत्र।
याद रखने की सुविधा के लिए चौदह भूमियों को चार समूहों में रखें। पहला समूह खेती की अस्थिर या सामूहिक प्रकृति: (i) चरागाह, (ii) नदी या टैंक के पेटे में आकस्मिक या यदा-कदा खेती, (iii) सिंघाड़ा जैसी उपज वाली जल-आच्छादित भूमि, (iv) अस्थिर (shifting or unstable) खेती वाली भूमि। दूसरा समूह राज्य की अपनी भूमि: (v) राज्य सरकार के स्वामित्व और रख-रखाव वाले बाग, (x) सरकारी वन की सीमा, (xiii) सरकारी कृषि या घास फार्म। तीसरा समूह सार्वजनिक प्रयोजन: (vi) सार्वजनिक प्रयोजन या उपयोगिता के काम के लिए अर्जित या धारित भूमि, (vii) सैन्य पड़ाव-भूमि, (viii) छावनी की सीमा, (ix) रेलवे या नहर की सीमा, (xi) नगरपालिका की खाई-भूमि (trenching ground), (xii) शिक्षण संस्थाओं की कृषि-शिक्षा या खेल-मैदान की भूमि। चौथा समूह: (xiv) वह भूमि जो किसी गाँव या आस-पास के गाँवों के पेयजल के जलाशय या टांके में पानी के बहाव के लिए आरक्षित हो या कलक्टर की राय में आवश्यक हो।
धारा 16 की चौदह भूमियाँ
| क्रम | भूमि (statutory term) | समूह |
|---|---|---|
| (i) | चरागाह (pasture land) | खेती की अस्थिर या सामूहिक प्रकृति |
| (ii) | नदी या टैंक के पेटे में आकस्मिक या यदा-कदा खेती की भूमि (casual or occasional cultivation in the bed of river or tank) | खेती की अस्थिर या सामूहिक प्रकृति |
| (iii) | जल-आच्छादित भूमि जिसमें सिंघाड़ा या वैसी उपज उगाई जाती हो (land covered by water used for growing singhara or like produce) | खेती की अस्थिर या सामूहिक प्रकृति |
| (iv) | अस्थिर खेती वाली भूमि (land under shifting or unstable cultivation) | खेती की अस्थिर या सामूहिक प्रकृति |
| (v) | राज्य सरकार के स्वामित्व और रख-रखाव वाले बाग (gardens owned and maintained by the State Government) | राज्य की अपनी भूमि |
| (vi) | सार्वजनिक प्रयोजन या सार्वजनिक उपयोगिता के कार्य के लिए अर्जित या धारित भूमि (land acquired or held for a public purpose or a work of public utility) | सार्वजनिक प्रयोजन |
| (vii) | सैन्य पड़ाव-भूमि (military encamping grounds), प्रारंभ पर या बाद में आरक्षित | सार्वजनिक प्रयोजन |
| (viii) | छावनी की सीमा के भीतर की भूमि (land within the limits of cantonment) | सार्वजनिक प्रयोजन |
| (ix) | रेलवे या नहर की सीमा में आने वाली भूमि (land within railway or canal boundaries) | सार्वजनिक प्रयोजन |
| (x) | सरकारी वन की सीमा के भीतर की भूमि (land within the boundaries of any Government forest) | राज्य की अपनी भूमि |
| (xi) | नगरपालिका की खाई-भूमि (municipal trenching grounds) | सार्वजनिक प्रयोजन |
| (xii) | शिक्षण संस्थाओं द्वारा कृषि-शिक्षा या खेल-मैदान के लिए धारित या अर्जित भूमि (land held or acquired by educational institutions for instruction in agriculture or for playground) | सार्वजनिक प्रयोजन |
| (xiii) | सरकारी कृषि या घास फार्म की सीमा की भूमि (land within the boundaries of a Government agricultural or grass farm) | राज्य की अपनी भूमि |
| (xiv) | गाँव या आस-पास के गाँवों के पेयजल के जलाशय या टांके में पानी के बहाव के लिए आरक्षित या कलक्टर की राय में आवश्यक भूमि | जलग्रहण क्षेत्र |
परंतुक: राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा घोषित कर सकती है कि अस्थिर खेती की कोई भूमि अब उस श्रेणी की नहीं रही, तब वह खातेदारी अधिकारों के अनुदान के लिए उपलब्ध हो जाएगी; और वैसी ही अधिसूचना से प्रारंभ के बाद अस्थिर खेती वाली घोषित भूमि पर वही खेती हो सकेगी।
खातेदार बनने की पहचान: धारा 15 और 16 का क्रम
काश्तकार
उप-काश्तकार या खुदकाश्त का काश्तकार नहीं (धारा 15(1))
भूमि धारा 16 की चौदह में है?
यदि हाँ, तो खातेदारी अधिकार नहीं बनते
परियोजना क्षेत्र में अस्थायी पट्टा?
गंग नहर, भाखड़ा, चंबल, जवाई: परंतुक से रोक; क्षेत्र-विशेष धाराएँ 15A, 15AA, 15AAA
उप-धारा (2) का दोषी आबंटिती?
तीन वर्ष में सहायक कलक्टर को आवेदन (उप-धाराएँ (3) से (5))
खातेदार काश्तकार
सब अधिकार और दायित्व, अधिनियम के अधीन
तीन उपधाराओं का सार: धारा 16A, 17 और 17A
| धारा | वर्ग | कौन | मुख्य बात |
|---|---|---|---|
| 16A | खुदकाश्त का काश्तकार (tenant of Khudkasht) | वह जिसे प्रारंभ पर या बाद में किसी संपदा-धारक ने खुदकाश्त विधिवत दी | परंतुक: जब संपदा-धारक धारा 13 से अपनी खुदकाश्त का खातेदार बन जाए, तब ऐसा काश्तकार उस खातेदार के अधीन उप-काश्तकार (sub-tenant) हो जाता है। |
| 17 | गैर-खातेदार काश्तकार (Gair Khatedar tenant) | खातेदार, खुदकाश्त के काश्तकार और उप-काश्तकार को छोड़कर कोई भी काश्तकार | यह अवशिष्ट (residual) वर्ग है। |
| 17A | मालिक (Malik) | वह ज़मींदार या बिस्वेदार जिसकी संपदा 1959 के राजस्थान ज़मींदारी और बिस्वेदारी उन्मूलन अधिनियम से राज्य सरकार में निहित हुई | उसके कब्ज़े की खुदकाश्त भूमि के संबंध में वह उसी अधिनियम की धारा 29 के अर्थ में मालिक है। |
वर्गों की तुलना: कौन किस रूप में
कैसे बनता है
खातेदार (Khatedar)धारा 15(1): प्रारंभ पर या बाद में बिठाया गया काश्तकार (उप-काश्तकार और खुदकाश्त के काश्तकार को छोड़कर), आबंटिती, या अन्य विधि से खातेदारी पाने वाला
मालिक (Malik)खुदकाश्त की भूमि पर, ज़मींदारी-बिस्वेदारी उन्मूलन के बाद
खुदकाश्त का काश्तकारसंपदा-धारक की खुदकाश्त भूमि पर विधिवत बिठाया गया
गैर-खातेदार (Gair Khatedar)बाक़ी सभी काश्तकार
उप-काश्तकार (Sub-tenant)काश्तकार से भूमि धारण करने वाला
मुख्य आधार
खातेदार (Khatedar)धारा 15, 15A, 15AA, 15AAA, 15B; रोक: धारा 16
मालिक (Malik)धारा 17A; 1959 अधिनियम की धारा 29
खुदकाश्त का काश्तकारधारा 16A
गैर-खातेदार (Gair Khatedar)धारा 17
उप-काश्तकार (Sub-tenant)धारा 5(41); धारा 14 की सूची में अलग
धारा 31 से 37: हर काश्तकार के सामान्य हक़
धारा 31 से 37 की सूची किसी "काश्तकार हक़ चार्टर" जैसी है। पहले हक़, धारा 31(1), की सरल भाषा: खेत में काम करने वाला काश्तकार गाँव की आबादी में रहने के लिए निःशुल्क भूखंड ले सकता है, बशर्ते राज्य सरकार के नियमों के अधीन हो। यदि उसकी भूमि एक से अधिक गाँव में है तो वह एक ही गाँव चुन सकता है और यह सुविधा एक से अधिक गाँव में नहीं मिलेगी। जिसके पास मकान नहीं, उसे तहसीलदार को आवेदन देना होगा। स्पष्टीकरण में "आवासीय मकान" का अर्थ चौड़ा रखा गया है: मवेशियों का बाड़ा या शेड, बीज-चारा-कृषि उपकरण रखने की जगह और जलाशय या टांके की भूमि भी इसमें आती है।
धारा 31(2) इस हक़ को बढ़ाती है: आबादी में लगातार दस वर्ष या अधिक से रह रहे कृषि-श्रमिक (agricultural worker) या शिल्पी (artisan) को भी निःशुल्क आवासीय भूखंड मिल सकता है। कृषि-श्रमिक वह है जो स्वयं काश्तकार नहीं पर अपने निवास-गाँव में किसी काश्तकार के खेतों पर मज़दूरी करता है; शिल्पी में लोहार, बढ़ई, मोची, कुम्हार और बुनकर शामिल हैं।
धारा 32 लिखित पट्टे का अधिकार देती है: हर काश्तकार अपने भूधारक से निर्धारित प्रारूप और ब्योरों वाला लिखित पट्टा पाने का हक़दार है, और भूधारक उससे प्रतिलिपि (counterpart) पाने का हक़दार है। जिसे वह दस्तावेज़ न मिले, वह वाद करके उसे पा सकता है।
धारा 33 में पंजीकरण का आसान विकल्प है: पक्षकार भारतीय पंजीकरण अधिनियम, 1908 में कुछ भी हो, पट्टे के पंजीकरण की जगह राज्य सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी या व्यक्ति से अनुप्रमाणन (attestation) करा सकते हैं। दस्तावेज़ निष्पादन के चार महीने के भीतर प्रस्तुत करना ज़रूरी है, और राज्य सरकार की ओर से या उसके द्वारा दिए पट्टों पर यह उप-धारा लागू नहीं होती। अनुप्रमाणित दस्तावेज़ को पंजीकरण अधिनियम के अर्थ में पंजीकृत माना जाता है।
धारा 34 से 37: प्रतिबंध और संरक्षण
| धारा | विषय | मुख्य बात |
|---|---|---|
| 34 | प्रीमियम और बेगार पर रोक (Prohibition of premium or Forced Labour) | भूधारक पट्टा देने पर प्रीमियम (premium) नहीं लेगा और काश्तकार से मज़दूरी पर या बिना मज़दूरी कोई सेवा नहीं कराएगा; ऐसी शर्त क़ानून या रिवाज के बावजूद शून्य है। परंतुक: भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 100 या 101 के अधीन बने नियमों से आबंटित भूमि का मूल्य, या इस अधिनियम की धारा 30F के नियमों के अधीन देय भुगतान वसूल करने पर रोक नहीं। |
| 35 | लगान के अलावा भुगतान पर रोक (Prohibition of payment other than rent) | रिवाज या अनुबंध कुछ भी हो, लगान, क़ानून से लगाए गए या राज्य सरकार से अनुमोदित किसी अन्य प्रभार के अलावा किसी नाम से कोई भुगतान काश्तकार से वसूला नहीं जाएगा। |
| 36 | सामग्री का उपयोग (Use of materials) | काश्तकार अपनी जोत की सतह पर या नीचे पड़े या सुधार के दौरान खुदाई में मिले पत्थर या अन्य सामग्री को जोत या आवासीय मकान के काम के लिए निकालकर उपयोग कर सकता है। परंतुक: राज्य सरकार के नियमों से इस हक़ का नियमन हो सकता है। |
| 37 | कुर्की आदि से संरक्षण (Bar to seizure, attachment and sale by process of Court) | जोत में काश्तकार के अधिकार किसी दीवानी न्यायालय की प्रक्रिया से कुर्क, ज़ब्त या नीलाम नहीं किए जा सकते। |
धारा 36A: नालबट के अधिकार का अर्जन
याद करें कि नालबट (धारा 5(47)) वह भुगतान है जो सिंचाई के लिए किसी के कुएँ का उपयोग करने पर कुएँ के मालिक को दिया जाता है। मान लें कि खातेदार की ज़मीन पर कुआँ है पर नालबट वसूलने का अधिकार किसी और (भूधारक के अलावा किसी व्यक्ति) के पास है। धारा 36A उस खातेदार को यह अधिकार अर्जित करने के लिए उपखंड अधिकारी (SDO) को आवेदन देने का रास्ता देती है, यदि वह प्रारंभ से पहले से खातेदार है या धारा 15 या 15B से खातेदारी पाता है।
प्रक्रिया क्रम से: (1) आवेदन उपखंड अधिकारी को, निर्धारित प्रारूप और रीति में, 1959 के संशोधन अधिनियम के प्रारंभ से एक वर्ष के भीतर; पर्याप्त कारण दिखे तो SDO बाद में भी आवेदन ले सकता है। (2) नालबट का अधिकार जिसके पास है, उसे नोटिस, कि विरोध हो तो तीस दिन में लिखित आपत्ति दे। (3) चाहे आवेदन का विरोध हो या नहीं, उसे अपने मुआवज़े के दावे का ब्योरा देना होता है। (4) विरोध होने पर SDO जाँच करके आवेदन खारिज या मंज़ूर करता है। (5) मंज़ूर करने पर वह मुआवज़े की राशि धारा 25 के अनुसार तय करता है और भुगतान पर धाराएँ 27 और 30 लागू होती हैं। (6) और (7) में पुराने आवेदनों के निपटारे की बचत-व्यवस्था है।
धारा 16 की चौदह भूमियाँ: चार समूह
खातेदारी अधिकार नहीं (धारा 16)
अस्थिर या सामूहिक खेती
- चरागाह (i)
- नदी या टैंक के पेटे में आकस्मिक खेती (ii)
- सिंघाड़े वाली जल-भूमि (iii)
- अस्थिर खेती (iv)
राज्य की अपनी भूमि
- राज्य के बाग (v)
- सरकारी वन (x)
- सरकारी कृषि या घास फार्म (xiii)
सार्वजनिक प्रयोजन
- सार्वजनिक प्रयोजन या उपयोगिता (vi)
- सैन्य पड़ाव (vii)
- छावनी (viii)
- रेलवे या नहर (ix)
- नगरपालिका खाई-भूमि (xi)
- शिक्षण संस्थाओं की भूमि (xii)
जलग्रहण
- पेयजल जलाशय या टांके का जलग्रहण (xiv)
मुख्य तथ्य
- धारा 14 के वर्ग
- खातेदार (a), मालिक (aa), खुदकाश्त के काश्तकार (b), गैर-खातेदार (c)
- धारा 15
- खातेदार काश्तकार; परंतुक: गंग नहर, भाखड़ा, चंबल, जवाई या अधिसूचित क्षेत्र में अस्थायी पट्टे पर खातेदारी नहीं; उप-धारा (3): तीन वर्ष में आवेदन
- धारा 15AAA(3) से (5)
- आवेदन की अवधि: 1983 के संशोधन अधिनियम के प्रारंभ से 1426 दिन, अर्थात् 30 जून 1987; आरक्षित मूल्य 25 बीघा सिंचित या 50 बीघा असिंचित से अधिक पर; 16 किस्तें; एकमुश्त पर 25 प्रतिशत कम
- धारा 16
- चौदह प्रकार की भूमि, (i) से (xiv); "notwithstanding anything in this Act or in any other law"
- धारा 31
- निःशुल्क आवासीय भूखंड; दस वर्ष या अधिक से आबादी में रह रहे कृषि-श्रमिक और शिल्पी भी
- धारा 33
- अनुप्रमाणन पंजीकरण के स्थान पर; निष्पादन के चार महीने के भीतर; राज्य सरकार के पट्टों पर लागू नहीं
- धारा 36A
- आवेदन उपखंड अधिकारी को; आपत्ति के लिए तीस दिन; मुआवज़ा धारा 25 के अनुसार
- धारा 37
- जोत के अधिकार दीवानी न्यायालय की प्रक्रिया से कुर्क या नीलाम नहीं
- अंतिम जाँच
- 2 अक्तूबर 2026
राजस्थान का पहलू
अधिनियम के पाठ से: खातेदारी अधिकारों के विशेष प्रावधान राजस्थान की सिंचाई परियोजनाओं के नाम लेकर बने हैं: इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र (धारा 15A और 15AAA), चंबल परियोजना क्षेत्र (धारा 15AA, जिसमें पूर्व कोटा और बूँदी राज्य के कानूनों का उल्लेख है) और आबू, अजमेर तथा सुनेल क्षेत्र (धारा 15B)। धारा 15 का परंतुक गंग नहर, भाखड़ा, चंबल और जवाई परियोजना क्षेत्रों का नाम लेता है। स्रोत: अधिनियम का पाठ, इंडिया कोड (देखा गया: 2 अक्तूबर 2026)। यहाँ कोई अन्य सरकारी आँकड़ा नहीं दिया गया है।
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- धारा 16 की सूची में "कृषि के लिए अनुपयुक्त हर ज़मीन" जैसी सामान्य बात लिखना: सूची के नाम (जैसे pasture land, land within railway or canal boundaries, municipal trenching grounds) अंग्रेज़ी पद सहित लिखें।
- धारा 16 को केवल सरकारी ज़मीन तक सीमित मान लेना: इसमें अस्थिर खेती, नदी-टैंक के पेटे की आकस्मिक खेती और जल-आच्छादित सिंघाड़ा भूमि जैसी निजी-सी दिखने वाली खेती भी है।
- गैर-खातेदार को "सबसे कमज़ोर" लिख देना और उप-काश्तकार को उसी में गिन लेना: धारा 17 उप-काश्तकार को बाहर रखती है।
- धारा 15A और 15AAA को एक ही बात समझ लेना: पहली रोक है, दूसरी पुराने अधिकार-धारकों को खातेदारी देती है।
- धारा 33 में चार महीने को छह महीने या तीन महीने लिख देना।
- धारा 34 में "प्रीमियम" और "बेगार" में से केवल एक लिखना: दोनों पर रोक है।
- धारा 31 को केवल काश्तकार का हक़ बताना: उप-धारा (2) कृषि-श्रमिक और शिल्पी को भी हक़ देती है।
पाँच भूखंड, एक कसौटी: क्या खातेदारी अधिकार बन सकते हैं (कल्पित उदाहरण)
हल सहित उदाहरणधारा 16 की जाँच
दिया है
- भूखंड क: गाँव की चरागाह जिसमें पशु चरते हैं।
- भूखंड ख: नहर की सीमा के भीतर की पट्टी।
- भूखंड ग: एक निजी बाग, जिसका स्वामित्व और रख-रखाव राज्य सरकार के पास नहीं है।
- भूखंड घ: राज्य के कृषि फार्म की सीमा के भीतर की भूमि।
- भूखंड ङ: साधारण निजी खेत जिसे एक काश्तकार वर्षों से जोत रहा है।
- 1चरण 1 पहले धारा 16 की चौदह भूमियों में भूखंड ढूँढें। क चरागाह है (i), ख नहर-सीमा है (ix), घ सरकारी कृषि फार्म की सीमा है (xiii)।
- 2चरण 2 ग को सावधानी से देखें: (v) केवल उन बागों की बात करता है जो राज्य सरकार के स्वामित्व और रख-रखाव में हैं। निजी बाग इस खंड में नहीं आता।
- 3चरण 3 ङ पर कोई वर्जित श्रेणी लागू नहीं होती, इसलिए वह धारा 15(1) की कसौटी से परखा जाएगा: काश्तकार के रूप में बिठाया गया और उप-काश्तकार या खुदकाश्त का काश्तकार नहीं।
निष्कर्ष: क, ख और घ पर खातेदारी अधिकार नहीं बनते; ग पर खंड (v) लागू नहीं होता और ङ पर सूची की कोई श्रेणी लागू नहीं दिखती, इसलिए उनका फैसला धारा 15 और तथ्यों से होगा। 5 अंक के उत्तर में सूची की पाँच श्रेणियाँ नाम और उदाहरण सहित लिखना पर्याप्त है।
एक काश्तकार, सात हक़: धारा 31 से 37 की कसौटी (कल्पित)
उदाहरण (काल्पनिक)दुर्गाराम का पट्टा, मकान और खेत
यह कल्पित उदाहरण केवल अभ्यास के लिए है। दुर्गाराम एक गाँव में खेत का काश्तकार है और उसकी कुछ भूमि दूसरे गाँव में भी है। उसके पास अपने गाँव में रहने का मकान नहीं है। भूधारक ने पट्टे का कोई कागज़ नहीं दिया और पट्टा देते समय एक अलग रकम "नज़राना" के नाम पर ली। फसल के बाद भूधारक ने घर के काम के लिए दुर्गाराम से बेगार कराई। खेत में खुदाई के समय पत्थर निकले जिन्हें दुर्गाराम घर बनाने में लगाना चाहता है। साहूकार के किसी दीवानी डिक्री से उसकी जोत के अधिकार नीलाम कराने की कोशिश भी हुई।
- मकान के लिए भूखंड
- धारा 31(1): आबादी में निःशुल्क भूखंड; दो गाँवों में भूमि हो तो एक ही गाँव चुनना होगा; मकान न हो तो तहसीलदार को आवेदन।
- पट्टे का कागज़
- धारा 32: निर्धारित प्रारूप में लिखित पट्टा माँगने का हक़; न मिले तो वाद। धारा 33: पंजीकरण की जगह अनुप्रमाणन, निष्पादन के चार महीने के भीतर।
- नज़राना और बेगार
- धारा 34: प्रीमियम स्वीकार करना और सेवा कराना मना; शर्त शून्य। धारा 35: लगान के अलावा किसी नाम से कोई भुगतान नहीं।
- पत्थर
- धारा 36: जोत की सतह पर या नीचे मिले पत्थर और सामग्री जोत या आवासीय मकान के काम में ले सकता है, राज्य के नियमों के अधीन।
- साहूकार की डिक्री
- धारा 37: जोत में काश्तकार के अधिकार दीवानी न्यायालय की प्रक्रिया से कुर्क या नीलाम नहीं हो सकते।
सीख
सातों हक़ अलग-अलग धाराओं से आते हैं। उत्तर में हक़ का नाम, धारा-संख्या और एक पंक्ति का अपवाद या शर्त लिखें।
पिछले वर्षों के प्रश्न (हल सहित)
2016RAS मुख्य परीक्षापेपर III5 अंक
राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत कोई पाँच प्रकार की भूमि बताइये, जिन पर खातेदारी अधिकार उत्पन्न नहीं होते हैं।
आदर्श उत्तर
धारा 16 के अनुसार खातेदारी अधिकार इन पर उत्पन्न नहीं होते: चरागाह भूमि; नदी या टैंक के पेटे में आकस्मिक खेती की भूमि; सिंघाड़ा-जैसी उपज वाली जल-आच्छादित भूमि; अस्थिर खेती वाली भूमि; राज्य सरकार के बाग; सरकारी वन; रेलवे या नहर की सीमा की भूमि; छावनी।
अभ्यास प्रश्न (अपने)
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
गैर-खातेदार काश्तकार (Gair Khatedar tenant) कौन है?
आदर्श उत्तर
खातेदार, खुदकाश्त के काश्तकार और उप-काश्तकार से भिन्न भूमि का हर काश्तकार, धारा 17।
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
आवासीय भूखंड पर काश्तकार का हक़ बताइए।
आदर्श उत्तर
नियमों के अधीन गाँव की आबादी में निःशुल्क आवासीय भूखंड, केवल एक गाँव में, धारा 31(1)।
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
धारा 17A के अनुसार "मालिक" (Malik) कौन है?
आदर्श उत्तर
संपदा राज्य में निहित होने पर ज़मींदार या बिस्वेदार कब्ज़े की खुदकाश्त का मालिक है, धारा 17A।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
धारा 33 के अनुसार पट्टे का अनुप्रमाणन (attestation) क्या है? शर्तें बताइए।
आदर्श उत्तर
धारा 33 में पक्षकार पट्टे के पंजीकरण की जगह राज्य सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी से अनुप्रमाणन करा सकते हैं। दस्तावेज़ निष्पादन के चार महीने के भीतर प्रस्तुत हो; राज्य सरकार के पट्टों पर लागू नहीं। अनुप्रमाणित दस्तावेज़ पंजीकरण अधिनियम के अर्थ में पंजीकृत माना जाता है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
धारा 34 और 35 के प्रतिबंध बताइए।
आदर्श उत्तर
धारा 34: भूधारक पट्टे पर प्रीमियम नहीं लेगा और काश्तकार से बेगार या सेवा नहीं कराएगा; ऐसी शर्त शून्य है। धारा 35: रिवाज या अनुबंध के बावजूद लगान और क़ानूनी या सरकार-अनुमोदित प्रभार के अलावा किसी नाम से कोई भुगतान काश्तकार से वसूला नहीं जाएगा।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
धारा 14 से 17A के अनुसार काश्तकारों के वर्ग बताइए और खातेदार बनने का आधार समझाइए।
आदर्श उत्तर
धारा 14 के अनुसार काश्तकार चार वर्ग के हैं: खातेदार, मालिक, खुदकाश्त के काश्तकार और गैर-खातेदार। धारा 15(1) में प्रारंभ पर या बाद में बिठाया गया काश्तकार, जो उप-काश्तकार या खुदकाश्त का काश्तकार न हो, भू-राजस्व अधिनियम की धारा 101 के नियमों से आबंटिती, तथा अन्य विधि से खातेदारी पाने वाला खातेदार है। धारा 16 की चौदह भूमियों पर खातेदारी नहीं बनती। परियोजना क्षेत्रों में अस्थायी पट्टे वाले को भी नहीं। धारा 16A खुदकाश्त के काश्तकार, धारा 17 गैर-खातेदार और धारा 17A मालिक को परिभाषित करती है।
उत्तर कैसे लिखें (10 अंक, 100 शब्द)
भूमिका
प्रश्न का नमूना: "राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 के अंतर्गत खातेदारी अधिकार किन भूमियों पर उत्पन्न नहीं होते? कोई पाँच बताइए।" (5 अंक, 50 शब्द)। पहली पंक्ति में धारा 16 का नाम लें। 10 अंक के रूप में पूछे जाने पर धारा 15 की कसौटी और परियोजना क्षेत्रों के अपवाद भी जोड़ें।
मुख्य भाग
- धारा 16: "notwithstanding anything in this Act or in any other law", चौदह भूमियाँ
- पाँच उदाहरण: pasture land, bed of river or tank में casual cultivation, singhara वाली जल-भूमि, shifting or unstable cultivation, State Government के gardens
- चाहें तो एक-एक और: सरकारी वन, रेलवे या नहर की सीमा, छावनी, सैन्य पड़ाव-भूमि
निष्कर्ष
निष्कर्ष: ये भूमियाँ सार्वजनिक, सामूहिक या अस्थायी उपयोग की हैं, इसलिए उन पर निजी स्थायी हक़ का ढाँचा नहीं बनाया गया।
अतिरिक्त मूल्य
- धारा 15(1) की कसौटी का एक वाक्य
- परंतुक: राज्य सरकार अस्थिर खेती की स्थिति अधिसूचना से बदल सकती है
- चार समूहों वाला आरेख
संबंधित विषय
राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955, धारा 1 और धारा 5: परिभाषाएँ (फसलें, सायर, कृषक, अतिचारी सहित)
राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955, धारा 38 से 54A: उत्तराधिकार, बिक्री-बंधक, पट्टा देने की सीमा, अदला-बदली और जोत का विभाजन
राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955, धारा 206 से 218: राजस्व न्यायालयों का क्षेत्राधिकार, प्रक्रिया, परिसीमा और शक्तियाँ
राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955, धारा 219 से 232 और 239 से 242: राजस्व अदालतों की सीढ़ी, अपील, पुनरीक्षण और स्वामित्व का प्रश्न
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956: धारा 1 से 3, नाम, विस्तार, अप्रभावित क़ानून और परिभाषाएँ
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956: धारा 40A और 74 से 87, अपील, पुनरीक्षण और पुनर्विलोकन
त्वरित पुनरावृत्ति
- धारा 14: खातेदार (a), मालिक (aa), खुदकाश्त के काश्तकार (b), गैर-खातेदार (c)
- धारा 15(1): उप-काश्तकार और खुदकाश्त के काश्तकार के अलावा बिठाया गया काश्तकार या आबंटिती; परंतुक: परियोजना क्षेत्र में अस्थायी पट्टे पर नहीं
- धारा 15(2) से (5): Grow More Food Campaign, चूक करने वाला; तीन वर्ष में सहायक कलक्टर को आवेदन
- धारा 15A: इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में पट्टे अस्थायी; 15AA: चंबल क्षेत्र में खातेदारी नहीं; 15AAA: पुराने अधिकार-धारकों को खातेदारी; 15B: आबू, अजमेर, सुनेल
- धारा 15AAA(3) से (5): 1426 दिन यानी 30 जून 1987; 25 बीघा सिंचित या 50 बीघा असिंचित; 16 किस्तें; एकमुश्त पर 25 प्रतिशत कम
- धारा 16: चौदह भूमियाँ, खातेदारी अधिकार नहीं (2016 का 5 अंक का प्रश्न)
- धारा 16A: खुदकाश्त का काश्तकार; खातेदार बनने पर वह उप-काश्तकार; 17: गैर-खातेदार; 17A: मालिक
- धारा 31: निःशुल्क आवासीय भूखंड; दस वर्ष से रह रहे कृषि-श्रमिक और शिल्पी भी
- धारा 32: लिखित पट्टा और प्रतिलिपि; 33: अनुप्रमाणन, चार महीने
- धारा 34: प्रीमियम और बेगार शून्य; 35: लगान के अलावा भुगतान नहीं; 36: पत्थर आदि सामग्री; 37: कुर्की-नीलामी से संरक्षण
- धारा 36A: नालबट अर्जन के लिए उपखंड अधिकारी को आवेदन; आपत्ति के लिए तीस दिन
याद रखने योग्य शब्द
- Khatedar
- Gair Khatedar
- Khudkasht
- Malik
- pasture land
- attestation
- nalbat