राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955, धारा 219 से 232 और 239 से 242: राजस्व अदालतों की सीढ़ी, अपील, पुनरीक्षण और स्वामित्व का प्रश्न
काश्तकारी अधिनियम 1955 की धारा 219 से 232 और 239 से 242: अपील की सीढ़ी, 30/60/90 दिन, रिव्यू, पुनरीक्षण और स्वामित्व या काश्तकारी के प्रश्न का संदर्भ।
- अधीनस्थता
- अपील
- समय-सीमा
- पुनरीक्षण
- स्वामित्व का संदर्भ
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (विधि): "Rajasthan Tenancy Act, 1955: ... Sections 14-17A, 31-37, 38-54A, 206-232, 239-242." इस पृष्ठ पर धारा 219 से 232 (अतिरिक्त शक्तियाँ, मामलों की संस्था, अधीनस्थता, अपील, रिव्यू, पुनरीक्षण) और धारा 239 से 242 (स्वामित्व और काश्तकारी के प्रश्न का संदर्भ) हैं। धारा 206 से 218 पिछले पृष्ठ पर हैं। धारा 233 से 238 और 243 इस सिलेबस-सूची में नहीं हैं और यहाँ नहीं ली गई हैं। यह पृष्ठ परीक्षा की तैयारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं है; संशोधनों के लिए देखें: आधिकारिक अधिनियम पाठ।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- इन धाराओं पर 2016 से 2024 के पेपरों में सीधा प्रश्न नहीं देखा गया; अधिनियम से आए प्रश्न धारा 5 की परिभाषाओं और धारा 16 के हैं। फिर भी "राजस्व अदालतों में अपील की व्यवस्था" एक स्वाभाविक 5 या 10 अंक का प्रश्न है और उसका पूरा उत्तर इसी पृष्ठ में है।
- तीन संख्याएँ पक्की करें: तीस दिन (कलक्टर को अपील), साठ दिन (राजस्व अपीलीय प्राधिकारी को), नब्बे दिन (राजस्व मंडल को), धारा 228। साथ ही द्वितीय अपील के चार आधार (धारा 224(2)) और यह कि धारा 225(2) के अनुसार आदेश से अपील में पारित आदेश की आगे अपील नहीं होती।
- दूसरा बड़ा विषय दीवानी और राजस्व अदालतों की आपसी निर्भरता है: राजस्व वाद में स्वामित्व का प्रश्न उठे तो वह मुद्दा दीवानी अदालत को जाता है (धारा 239), और दीवानी वाद में काश्तकारी का प्रश्न उठे तो वह राजस्व न्यायालय को (धारा 242)।
पहले सरल भाषा में: एक ही मामले की चार सीढ़ियाँ
मान लीजिए तहसीलदार ने किसी वाद में डिक्री दे दी और हारने वाला असंतुष्ट है। वह कहाँ जाए? काश्तकारी अधिनियम में हर अपील का रास्ता बँधा है, ताकि कोई भी अपनी मनमर्ज़ी की अदालत में न जा सके। नियम की पहली पंक्ति धारा 222 में है: राजस्व न्यायालय की किसी डिक्री या आदेश के विरुद्ध अपील तभी हो सकती है जब अधिनियम में लिखा हो।
फिर सीढ़ी का क्रम धारा 223 से 225 बनाती हैं। तहसीलदार की डिक्री की अपील कलक्टर के पास जाती है; सहायक कलक्टर, उप-खंड अधिकारी या कलक्टर की डिक्री की अपील राजस्व अपीलीय प्राधिकारी के पास। कलक्टर के अपीलीय निर्णय की दूसरी अपील राजस्व अपीलीय प्राधिकारी को, और राजस्व अपीलीय प्राधिकारी के अपीलीय निर्णय की दूसरी अपील राजस्व मंडल को, केवल चार आधारों पर। नीचे की तालिकाएँ इसी क्रम में हैं।
अपील के ऊपर पुनरीक्षण (revision) और रिव्यू भी हैं: रिव्यू का अधिकार धारा 229 में है, राजस्व मंडल का पुनरीक्षण धारा 230 में, उच्च न्यायालय का धारा 231 में, और कलक्टर द्वारा मामला मंडल को भेजने का रास्ता धारा 232 में।
धारा 219 से 221: अतिरिक्त शक्तियाँ, संस्था का स्थान, अधीनस्थता
धारा 219 (अतिरिक्त शक्तियाँ): राज्य सरकार (a) नायब तहसीलदार को तहसीलदार की सब या कोई शक्तियाँ, (b) तहसीलदार को सहायक कलक्टर की सब या कोई शक्तियाँ, और (c) सहायक कलक्टर को उप-खंड अधिकारी या कलक्टर की सब या कोई शक्तियाँ दे सकती है (उप-धारा 1)। शक्तियाँ नाम से भी दी जा सकती हैं और अधिकारियों के वर्ग को उनके पदनाम से भी (उप-धारा 2)। यदि नाम से शक्ति पाया अधिकारी उसी प्रकृति के बराबर के पद पर किसी दूसरी तहसील, उप-खंड, ज़िले या क्षेत्र में तबादला पाए, तो राज्य सरकार अन्यथा निर्देश न दे तो उसे वहाँ भी वही शक्तियाँ प्राप्त मानी जाएँगी (उप-धारा 3)।
धारा 220 (किस न्यायालय में कार्यवाही शुरू हो): तीसरी अनुसूची के सब वाद और आवेदन धारा 217 के अनुसार उन्हें निपटाने में सक्षम सबसे निम्न श्रेणी के राजस्व न्यायालय में संस्थित या प्रस्तुत किए जाएँगे। परंतुक: यदि किसी क्षेत्र में सहायक कलक्टर या उप-खंड अधिकारी न हो, तो उनके संज्ञेय वाद या आवेदन उस क्षेत्र के क्षेत्राधिकारी कलक्टर के न्यायालय में संस्थित होंगे।
धारा 221 (राजस्व न्यायालयों की अधीनस्थता): सब राजस्व न्यायालयों का सामान्य अधीक्षण और नियंत्रण राजस्व मंडल (Board) में निहित है और वे सब उसके अधीनस्थ हैं। इसके अधीन: खंड (a) अब "Omitted" है, यानी हटा दिया गया है; (b) ज़िले के सब अतिरिक्त कलक्टर, उप-खंड अधिकारी, सहायक कलक्टर और तहसीलदार कलक्टर के अधीनस्थ; (c) उप-खंड के सब सहायक कलक्टर, तहसीलदार और नायब तहसीलदार उप-खंड अधिकारी के अधीनस्थ; (d) तहसील के सब अतिरिक्त तहसीलदार और नायब तहसीलदार तहसीलदार के अधीनस्थ।
धारा 219 से 221 एक नज़र में
| धारा | शीर्षक | मुख्य बात |
|---|---|---|
| 219 | Additional Powers of revenue courts | राज्य सरकार: नायब तहसीलदार को तहसीलदार की, तहसीलदार को सहायक कलक्टर की, सहायक कलक्टर को उप-खंड अधिकारी या कलक्टर की शक्तियाँ; नाम से या पदनाम से; तबादले पर बराबर के पद में वही शक्तियाँ |
| 220 | Courts in which proceedings to be instituted | सबसे निम्न सक्षम श्रेणी (धारा 217); सहायक कलक्टर या उप-खंड अधिकारी न हो तो कलक्टर के न्यायालय में |
| 221 | Subordination of revenue courts | मंडल का सामान्य अधीक्षण; कलक्टर, उप-खंड अधिकारी और तहसीलदार के अधीनस्थों का क्रम |
धारा 222 से 225: अपील की सीढ़ी
धारा 222: राजस्व न्यायालय की किसी डिक्री या आदेश के विरुद्ध अपील तब तक नहीं होगी जब तक इस अधिनियम में उसका प्रावधान न हो। यानी अपील जन्मसिद्ध अधिकार नहीं, कानून का दिया अधिकार है।
धारा 223 (मूल डिक्री से अपील): (i) तहसीलदार की डिक्री से कलक्टर के पास; (ii) सहायक कलक्टर, उप-खंड अधिकारी या कलक्टर की डिक्री से राजस्व अपीलीय प्राधिकारी (Revenue Appellate Authority) के पास।
धारा 224 (अपीलीय डिक्री से अपील, यानी द्वितीय अपील): उप-धारा (1): कलक्टर द्वारा अपील में पारित डिक्री से राजस्व अपीलीय प्राधिकारी के पास अपील। उप-धारा (2): राजस्व अपीलीय प्राधिकारी द्वारा अपील में पारित डिक्री से राजस्व मंडल (Board) के पास अपील, केवल इन चार आधारों में से किसी पर: (i) निर्णय विधि या विधि का बल रखने वाली किसी प्रथा के विरुद्ध हो; (ii) निर्णय में विधि या प्रथा का कोई महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न तय न हुआ हो; (iii) अधिनियम या किसी अन्य विधि द्वारा बताई प्रक्रिया में कोई सारभूत त्रुटि या दोष हो, जिससे मामले के गुण-दोष पर निर्णय में त्रुटि या दोष संभवतः पैदा हुआ हो; (iv) जहाँ निचली अपीलीय अदालत ने मूल अदालत के किसी तथ्य-संबंधी निष्कर्ष को बदला या उलटा हो, वहाँ निर्णय अभिलेख के साक्ष्य के वज़न के विरुद्ध हो।
धारा 225 (आदेशों से अपील): उप-धारा (1): तीसरी अनुसूची के स्वरूप के आवेदन पर पारित अंतिम आदेश से, और धारा 212 और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 104 में बताए अन्य आदेशों से, अपील होगी: (i) तहसीलदार के आदेश से कलक्टर को; (ii) सहायक कलक्टर, उप-खंड अधिकारी या कलक्टर के आदेश से राजस्व अपीलीय प्राधिकारी को; (iii) राजस्व अपीलीय प्राधिकारी के आदेश से राजस्व मंडल को। उप-धारा (1-A) और (1-B) राजस्व विधि (संशोधन) अध्यादेश, 1975 (अध्यादेश संख्या 13, 1975) के प्रारंभ से संबंधित संक्रमणकालीन प्रावधान हैं: (1-A) उप-धारा (1) का लंबित मामलों पर लागू होना और (1-B) उन आदेशों की लंबित अपीलों का उपशमन (abatement) जिनसे उप-धारा (1) के अंतर्गत अपील नहीं होती। उप-धारा (2): इस धारा के अंतर्गत अपील में पारित किसी आदेश से आगे कोई अपील नहीं होगी।
अपील की सीढ़ी: डिक्री और आदेश, किससे कहाँ (धारा 223 से 225)
| जिसने डिक्री या आदेश दिया | मूल डिक्री से अपील (धारा 223) | आदेश से अपील (धारा 225(1)) | अपीलीय डिक्री से अपील (धारा 224) |
|---|---|---|---|
| तहसीलदार | कलक्टर को | कलक्टर को | कलक्टर की अपीलीय डिक्री से राजस्व अपीलीय प्राधिकारी को (224(1)) |
| सहायक कलक्टर, उप-खंड अधिकारी या कलक्टर | राजस्व अपीलीय प्राधिकारी को | राजस्व अपीलीय प्राधिकारी को | राजस्व अपीलीय प्राधिकारी की अपीलीय डिक्री से राजस्व मंडल को, चार आधारों पर (224(2)) |
| राजस्व अपीलीय प्राधिकारी | धारा 223 में नहीं | राजस्व मंडल को | धारा 224(2): राजस्व मंडल को |
| अपील में पारित आदेश | धारा 223 लागू नहीं | धारा 225(2): आगे कोई अपील नहीं | धारा 224 केवल डिक्री पर |
आदेश की अपील का श्रृंखला-अंत धारा 225(2) से है; डिक्री की द्वितीय अपील धारा 224 से।
धारा 226 से 228: अपील पर राजस्व मंडल की शक्ति, त्रुटि का असर, समय-सीमा
धारा 226: राजस्व मंडल चाहे तो अपील स्वीकार करे या उसे संक्षेप में ख़ारिज कर दे। यानी हर अपील पर पूरी सुनवाई आवश्यक नहीं है।
धारा 227: कोई डिक्री या आदेश पक्षकारों या वाद-हेतुकों के कुसंयोजन या कार्यवाही में किसी त्रुटि या अनियमितता के कारण, जो मामले के गुण-दोष को प्रभावित नहीं करती, अपील में उलटा या सारभूत रूप से बदला नहीं जाएगा और न मामला प्रतिप्रेषित (remand) किया जाएगा। परीक्षा के लिए सूत्र: केवल वही त्रुटि मायने रखती है जो गुण-दोष को छूती हो।
धारा 228 (अपील की परिसीमा): (1) कलक्टर को अपील डिक्री या आदेश की तारीख़ से तीस दिन के बाद नहीं; (2) राजस्व अपीलीय प्राधिकारी को साठ दिन के बाद नहीं; (3) राजस्व मंडल को नब्बे दिन के बाद नहीं। याद रखने का आसान तरीक़ा: जितनी ऊँची अदालत, उतनी लंबी अवधि: 30, 60, 90।
धारा 228: अपील की समय-सीमा
| किसे अपील | अधिकतम अवधि | धारा 228 की उप-धारा |
|---|---|---|
| कलक्टर | तीस दिन | (1) |
| राजस्व अपीलीय प्राधिकारी (Revenue Appellate Authority) | साठ दिन | (2) |
| राजस्व मंडल (Board) | नब्बे दिन | (3) |
अवधि डिक्री या आदेश की तारीख़ से गिनी जाती है। छूट और गणना के लिए परिसीमा अधिनियम की धारा 214(3) (पिछला पृष्ठ) देखें।
धारा 229 से 232: रिव्यू, पुनरीक्षण और संदर्भ
धारा 229 (रिव्यू): सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के प्रावधानों के अधीन, (1) राजस्व मंडल अपनी प्रेरणा से या किसी पक्षकार के आवेदन पर अपने या अपने किसी सदस्य द्वारा बनाई डिक्री या आदेश का रिव्यू कर सकता है, और उसे रद्द, बदल या पुष्ट कर सकता है; और (2) मंडल को छोड़कर हर राजस्व न्यायालय अपने द्वारा पारित डिक्री, आदेश या निर्णय का रिव्यू करने में सक्षम है।
धारा 230 (राजस्व मंडल द्वारा मामले मँगवाना): मंडल किसी अधीनस्थ राजस्व न्यायालय द्वारा निर्णीत ऐसे मामले का अभिलेख मँगवा सकता है, जिसमें न मंडल को और न धारा 239 के अंतर्गत दीवानी अदालत को अपील होती हो, यदि वह न्यायालय (a) ऐसा क्षेत्राधिकार प्रयोग कर चुका हो जो विधि ने उसे नहीं दिया, (b) विधि द्वारा दिया क्षेत्राधिकार प्रयोग करने में विफल रहा हो, या (c) अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग अवैध रूप से या सारभूत अनियमितता से कर चुका हो। मंडल ऐसे आदेश दे सकता है जैसा उचित समझे।
धारा 231 (उच्च न्यायालय द्वारा मामले मँगवाना): उच्च न्यायालय अधीनस्थ राजस्व न्यायालय द्वारा निर्णीत किसी वाद या आवेदन का अभिलेख मँगवा सकता है, जिसमें धारा 239 के अंतर्गत दीवानी अदालत को अपील होती हो पर उच्च न्यायालय को नहीं, यदि वह दीवानी या राजस्व न्यायालय धारा 230 वाली तीन बातों में से कोई कर चुका हो: (a) क्षेत्राधिकार जो विधि ने नहीं दिया, (b) दिया हुआ प्रयोग न करना, या (c) अवैध अथवा सारभूत अनियमितता से प्रयोग। उच्च न्यायालय उचित आदेश दे सकता है।
धारा 232 (अभिलेख मँगवाना और राजस्व मंडल को भेजना): कलक्टर अपने अधीनस्थ किसी राजस्व न्यायालय में निर्णीत या लंबित किसी मामले या कार्यवाही का अभिलेख मँगवाकर यह जाँच सकता है कि आदेश या डिक्री वैध और उचित है और कार्यवाही नियमित है। यदि उसकी राय में आदेश या डिक्री बदली, रद्द या उलटी जानी चाहिए, तो वह अपनी राय सहित मामला राजस्व मंडल को भेजेगा और मंडल उचित आदेश देगा। परंतुक: यह शक्ति धारा 239 के दायरे में आने वाले वादों या कार्यवाहियों पर प्रयोग नहीं होगी।
पुनरीक्षण की तुलना: धारा 230, 231 और 232
| पहलू | धारा 230 (राजस्व मंडल) | धारा 231 (उच्च न्यायालय) | धारा 232 (कलक्टर) |
|---|---|---|---|
| किसके निर्णय का अभिलेख | अधीनस्थ राजस्व न्यायालय | अधीनस्थ राजस्व न्यायालय; जहाँ धारा 239 से दीवानी अदालत को अपील होती हो | अपने अधीनस्थ राजस्व न्यायालय, निर्णीत या लंबित |
| कब | जहाँ मंडल या धारा 239 के अंतर्गत दीवानी अदालत को अपील नहीं होती | जहाँ दीवानी अदालत को अपील होती हो पर उच्च न्यायालय को नहीं | वैधता, औचित्य और कार्यवाही की नियमितता जाँचने के लिए |
| आधार | क्षेत्राधिकार जो नहीं दिया; दिया प्रयोग न किया; अवैध या सारभूत अनियमितता | वही तीन आधार | आदेश या डिक्री बदली, रद्द या उलटी जानी चाहिए |
| क्या कर सकता है | उचित आदेश | उचित आदेश | अपनी राय सहित मामला राजस्व मंडल को भेजना; मंडल आदेश देगा |
| सीमा | धारा 239 वाले मामलों से बाहर | जहाँ उच्च न्यायालय को अपील होती हो, वहाँ नहीं | धारा 239 के दायरे के वाद पर प्रयोग नहीं |
धारा 239 से 242: स्वामित्व और काश्तकारी के प्रश्न का आदान-प्रदान
यह भाग दो अदालतों के बीच का पुल है। राजस्व अदालत स्वामित्व तय नहीं कर सकती और दीवानी अदालत काश्तकारी का अधिकार तय नहीं कर सकती, इसलिए बीच में जो प्रश्न उठे, वह दूसरी अदालत को मुद्दे के रूप में भेजा जाता है।
धारा 239(1): राजस्व न्यायालय के किसी वाद या कार्यवाही में, यदि वाद की भूमि के स्वामित्व अधिकार (proprietary right) का प्रश्न उठे और उसे किसी सक्षम दीवानी अदालत ने पहले तय न किया हो, तो राजस्व न्यायालय स्वामित्व पर एक वाद-बिंदु बनाएगा और केवल उसी बिंदु के निर्णय के लिए अभिलेख सक्षम दीवानी अदालत को भेजेगा। दो स्पष्टीकरण हैं: स्पष्टीकरण I: स्पष्टतः असमर्थनीय और केवल राजस्व न्यायालय का क्षेत्राधिकार हटाने के लिए उठाई दलील को स्वामित्व का प्रश्न नहीं माना जाएगा; स्पष्टीकरण II: भूमि "खुदकाश्त" (Khudhasht) है या नहीं, यह स्वामित्व का प्रश्न नहीं है।
धारा 239(2): दीवानी अदालत, आवश्यक हो तो बिंदु को पुनः बनाकर, केवल उसी बिंदु का निर्णय करेगी और अभिलेख अपने निष्कर्ष सहित राजस्व न्यायालय को लौटा देगी। (3): राजस्व न्यायालय फिर दीवानी अदालत के निष्कर्ष को मानकर वाद का निर्णय करेगा। (4): जिस वाद में स्वामित्व का बिंदु उप-धारा (2) के अंतर्गत दीवानी अदालत ने तय किया, उसकी डिक्री की अपील उस अदालत में होगी जो वाद के मूल्य को देखते हुए उस अदालत की अपीलें सुनने का क्षेत्राधिकार रखती है जिसे बिंदु भेजा गया था। (5): दीवानी अदालत द्वारा अपील में पारित डिक्री या आदेश की द्वितीय अपील उच्च न्यायालय में होगी, सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 100 में बताए आधारों पर।
धारा 240: उप-धारा (4) और (5) के अंतर्गत अपीलों की परिसीमा और कोर्ट फीस वही होगी जो इन अदालतों में दीवानी अपीलों के लिए उस समय निर्धारित हो। धारा 241: धारा 239(4) या (5) की किसी अपील में, यदि अपीलीय न्यायालय के सामने स्वामित्व का प्रश्न तय करने की पूरी सामग्री न हो, तो वह या तो (a) मामला उस दीवानी अदालत को प्रतिप्रेषित कर सकता है जिसने बिंदु तय किया था, या (b) उस प्रश्न पर नया बिंदु बनाकर किसी अधीनस्थ सक्षम दीवानी अदालत को विचारण के लिए भेज सकता है।
धारा 242 (दीवानी अदालत में काश्तकारी का दावा): कृषि भूमि से संबंधित दीवानी वाद में यदि काश्तकारी अधिकारों का कोई प्रश्न उठे और किसी सक्षम राजस्व न्यायालय ने उसे पहले तय न किया हो, तो दीवानी अदालत काश्तकारी की दलील पर बिंदु बनाकर केवल उसी बिंदु के निर्णय के लिए अभिलेख उपयुक्त राजस्व न्यायालय को भेजेगी (उप-धारा 1)। स्पष्टीकरण: स्पष्टतः असमर्थनीय और दीवानी अदालत का क्षेत्राधिकार हटाने के लिए उठाई काश्तकारी की दलील को काश्तकारी का प्रश्न नहीं माना जाएगा। (2): राजस्व न्यायालय केवल उसी बिंदु का निर्णय कर अभिलेख अपने निष्कर्ष सहित लौटा देगा। (3): दीवानी अदालत फिर उस निष्कर्ष को मानकर वाद का निर्णय करेगी। (4): राजस्व न्यायालय का निष्कर्ष अपील के प्रयोजन से दीवानी अदालत के निष्कर्ष का भाग माना जाएगा।
धारा 239 और 242: दो दिशाओं में संदर्भ
| पहलू | धारा 239 (राजस्व से दीवानी को) | धारा 242 (दीवानी से राजस्व को) |
|---|---|---|
| कहाँ मामला चल रहा है | राजस्व न्यायालय | दीवानी अदालत (कृषि भूमि का वाद) |
| कौन-सा प्रश्न उठा | स्वामित्व अधिकार (proprietary right) | काश्तकारी अधिकार (tenancy rights) |
| शर्त | दीवानी अदालत ने पहले तय न किया हो | राजस्व न्यायालय ने पहले तय न किया हो |
| क्या भेजा जाता है | केवल वही वाद-बिंदु और अभिलेख | केवल वही वाद-बिंदु और अभिलेख |
| बाद में | राजस्व न्यायालय दीवानी निष्कर्ष मानकर वाद तय करे | दीवानी अदालत राजस्व निष्कर्ष मानकर वाद तय करे |
| अपील | 239(4), (5); दीवानी अपील जैसी, द्वितीय अपील उच्च न्यायालय, CPC की धारा 100 के आधार | 242(4): राजस्व का निष्कर्ष दीवानी निष्कर्ष का भाग माना जाएगा |
| अस्वीकार्य दलील | स्पष्टतः असमर्थनीय दलील स्वामित्व का प्रश्न नहीं (स्पष्टीकरण I); खुदकाश्त का प्रश्न भी नहीं (स्पष्टीकरण II) | स्पष्टतः असमर्थनीय दलील काश्तकारी का प्रश्न नहीं |
तहसीलदार की डिक्री: अपील का क्रम (धारा 223, 224, 228)
तहसीलदार की डिक्री
धारा 217(2) की सीमा के भीतर का वाद
अपील: कलक्टर
धारा 223(i); तीस दिन, धारा 228(1)
द्वितीय अपील: राजस्व अपीलीय प्राधिकारी
धारा 224(1); साठ दिन, धारा 228(2)
तृतीय अपील: राजस्व मंडल
धारा 224(2); नब्बे दिन; चार आधार; मंडल संक्षेप में ख़ारिज भी कर सकता है (धारा 226)
अन्य रास्ते
रिव्यू (229), पुनरीक्षण (230, 231), कलक्टर का संदर्भ (232)
मुख्य तथ्य
- धारा 219
- नायब तहसीलदार को तहसीलदार की, तहसीलदार को सहायक कलक्टर की, सहायक कलक्टर को उप-खंड अधिकारी या कलक्टर की शक्तियाँ राज्य सरकार दे सकती है
- धारा 220
- संस्था सबसे निम्न सक्षम श्रेणी में; सहायक कलक्टर या उप-खंड अधिकारी न हो तो कलक्टर के न्यायालय में
- धारा 221
- राजस्व मंडल का सामान्य अधीक्षण और नियंत्रण; कलक्टर, उप-खंड अधिकारी और तहसीलदार के अधीनस्थों का क्रम
- धारा 222
- अपील तभी जब अधिनियम में प्रावधान हो
- धारा 223 से 225
- तहसीलदार की डिक्री से कलक्टर; सहायक कलक्टर, उप-खंड अधिकारी, कलक्टर की डिक्री से राजस्व अपीलीय प्राधिकारी; द्वितीय अपील मंडल को, चार आधार; अपील में पारित आदेश की आगे अपील नहीं
- धारा 228
- कलक्टर को तीस दिन, राजस्व अपीलीय प्राधिकारी को साठ दिन, राजस्व मंडल को नब्बे दिन
- धारा 229
- राजस्व मंडल अपनी प्रेरणा से या आवेदन पर; अन्य राजस्व न्यायालय अपने आदेश का रिव्यू
- धारा 230, 231, 232
- मंडल, उच्च न्यायालय और कलक्टर की मामले मँगवाने की शक्तियाँ; धारा 232 में मंडल को संदर्भ
- धारा 239
- स्वामित्व का बिंदु दीवानी अदालत को; अपील और द्वितीय अपील (CPC धारा 100 के आधार पर उच्च न्यायालय)
- धारा 242
- काश्तकारी का बिंदु राजस्व न्यायालय को; निष्कर्ष दीवानी निष्कर्ष का भाग
राजस्थान का पहलू
अधिनियम के पाठ से: राजस्थान में राजस्व मामलों की अपीलों का शिखर राजस्व मंडल (Board of Revenue) है; पुनरीक्षण और स्वामित्व के मामलों में उच्च न्यायालय की भूमिका धारा 231 और 239(5) में है। "राजस्व अपीलीय प्राधिकारी" किस पद-धारक को कहते हैं और बाद के संशोधन क्या हैं, यह अधिनियम के संशोधित पाठ में देखें: आधिकारिक अधिनियम पाठ।
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- अपील की अवधि उलटी लिख देना: कलक्टर को तीस, राजस्व अपीलीय प्राधिकारी को साठ, मंडल को नब्बे दिन।
- धारा 224(2) के चार आधारों में से "तथ्य के निष्कर्ष" वाला चौथा आधार भूल जाना: यह तभी लागू है जब निचली अपीलीय अदालत ने मूल अदालत का तथ्य-निष्कर्ष बदला या उलटा हो।
- धारा 225(2) को छोड़ देना: अपील में पारित आदेश की आगे अपील नहीं होती।
- धारा 239 और 242 की दिशा उलटना: 239 में राजस्व अदालत से स्वामित्व का बिंदु दीवानी अदालत को जाता है; 242 में दीवानी अदालत से काश्तकारी का बिंदु राजस्व न्यायालय को।
- धारा 239 में "पूरा वाद" दीवानी अदालत को चला जाता है, यह लिख देना: केवल स्वामित्व का वाद-बिंदु भेजा जाता है, वाद राजस्व न्यायालय में ही निर्णीत होता है।
- धारा 230 और 231 को एक मान लेना: 230 में मंडल वहाँ जहाँ किसी को अपील नहीं; 231 में उच्च न्यायालय वहाँ जहाँ धारा 239 से दीवानी अदालत को अपील होती है।
- धारा 226 को "मंडल को हर अपील सुननी होगी" पढ़ लेना: मंडल अपील स्वीकार कर सकता है या संक्षेप में ख़ारिज कर सकता है।
स्वामित्व के प्रश्न का रास्ता (कल्पित उदाहरण)
हल सहित उदाहरणबेदखली के वाद में स्वामित्व का दावा
दिया है
- भूधारक अकबर तहसील में एक काश्तकार बाबू के विरुद्ध वाद करता है। बाबू दलील देता है कि ज़मीन का असली स्वामी वह स्वयं है।
- इस प्रश्न को किसी दीवानी अदालत ने पहले तय नहीं किया है, और दलील स्पष्टतः असमर्थनीय नहीं दिखती।
- 1चरण 1 धारा 239(1): राजस्व न्यायालय स्वामित्व पर वाद-बिंदु बनाएगा और केवल उसी बिंदु के लिए अभिलेख सक्षम दीवानी अदालत को भेजेगा।
- 2चरण 2 धारा 239(2): दीवानी अदालत केवल वह बिंदु तय करके अभिलेख और निष्कर्ष लौटाएगी।
- 3चरण 3 धारा 239(3): राजस्व न्यायालय उस निष्कर्ष को मानकर वाद का निर्णय करेगा।
- 4चरण 4 धारा 239(4) और (5): अपील उस अदालत में जो वाद के मूल्य के अनुसार दीवानी अपीलें सुनती है; द्वितीय अपील उच्च न्यायालय में, CPC की धारा 100 के आधारों पर।
निष्कर्ष: राजस्व न्यायालय स्वामित्व स्वयं तय नहीं करता; वह केवल मुद्दा भेजता है और उसका निष्कर्ष मानकर वाद का निर्णय देता है।
अपील की सीढ़ी का एक उदाहरण (कल्पित)
उदाहरण (काल्पनिक)तहसीलदार की डिक्री
यह कल्पित उदाहरण केवल अभ्यास के लिए है। तहसीलदार ने एक वाद में डिक्री दी। हारने वाला पक्ष उसे चुनौती देना चाहता है और यह जानना चाहता है कि कहाँ और कितने दिन में।
- पहली अपील
- धारा 223(i): तहसीलदार की डिक्री से कलक्टर को; तीस दिन में (धारा 228(1))।
- द्वितीय अपील
- धारा 224(1): कलक्टर की अपीलीय डिक्री से राजस्व अपीलीय प्राधिकारी को; साठ दिन में (धारा 228(2))।
- तृतीय अपील
- धारा 224(2): राजस्व अपीलीय प्राधिकारी की अपीलीय डिक्री से राजस्व मंडल को; नब्बे दिन में (धारा 228(3)); केवल चार आधारों पर।
- यदि आदेश हो
- धारा 225(1): अंतिम आदेश की अपील का रास्ता वही; पर धारा 225(2) के अनुसार अपील में पारित आदेश की आगे अपील नहीं।
- अन्य उपाय
- धारा 229: रिव्यू; धारा 230 और 231: जहाँ अपील न हो वहाँ मंडल या उच्च न्यायालय का पुनरीक्षण; धारा 232: कलक्टर का संदर्भ।
सीख
डिक्री और आदेश के रास्ते अलग हैं; और अवधि 30, 60, 90 ऊपर चढ़ने के साथ बढ़ती है।
अभ्यास प्रश्न (अपने)
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
धारा 228 के अनुसार तीनों स्तर की अपील की समय-सीमा बताइए।
आदर्श उत्तर
कलक्टर तीस, राजस्व अपीलीय प्राधिकारी साठ, राजस्व मंडल नब्बे दिन; तारीख़ डिक्री या आदेश से, धारा 228।
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
तहसीलदार की डिक्री की पहली अपील किसके पास जाती है?
आदर्श उत्तर
कलक्टर के पास, तीस दिन के भीतर, धारा 223(i) और धारा 228(1) के अनुसार।
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
धारा 239 में राजस्व न्यायालय स्वामित्व का प्रश्न उठने पर क्या करता है?
आदर्श उत्तर
स्वामित्व पर वाद-बिंदु बनाकर केवल उसी के निर्णय के लिए अभिलेख सक्षम दीवानी अदालत को भेजता है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
राजस्व मंडल को द्वितीय अपील के चार आधार बताइए (धारा 224(2)).
आदर्श उत्तर
राजस्व मंडल को द्वितीय अपील इन आधारों पर होती है: निर्णय विधि या प्रथा के विरुद्ध हो; कोई महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न तय न हुआ हो; प्रक्रिया में सारभूत त्रुटि या दोष हो जिससे गुण-दोष पर त्रुटि संभव हो; और निचली अपीलीय अदालत द्वारा तथ्य-निष्कर्ष बदलने पर निर्णय साक्ष्य के वज़न के विरुद्ध हो।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
धारा 230, 231 और 232 की तुलना कीजिए।
आदर्श उत्तर
धारा 230: जहाँ मंडल या दीवानी अदालत को अपील नहीं, वहाँ मंडल अभिलेख मँगवाता है। धारा 231: जहाँ धारा 239 से दीवानी अदालत को अपील हो, वहाँ उच्च न्यायालय। दोनों के आधार: अनधिकृत क्षेत्राधिकार, क्षेत्राधिकार का प्रयोग न करना, अवैध या सारभूत अनियमितता। धारा 232: कलक्टर अपनी राय सहित मामला मंडल को भेजता है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 में राजस्व न्यायालयों में अपील और पुनरीक्षण की व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
आदर्श उत्तर
धारा 222: अपील तभी जब अधिनियम में हो। धारा 223: तहसीलदार की डिक्री की अपील कलक्टर को, सहायक कलक्टर, उप-खंड अधिकारी या कलक्टर की डिक्री की राजस्व अपीलीय प्राधिकारी को। धारा 224: द्वितीय अपील, मंडल को चार आधारों पर। धारा 225: आदेशों की अपील; अपील के आदेश की आगे अपील नहीं। धारा 226: मंडल संक्षेप में ख़ारिज कर सकता है। धारा 227: गुण-दोष से असंबंधित त्रुटि पर उलट-फेर नहीं। धारा 228: तीस, साठ, नब्बे दिन। धारा 229: रिव्यू। धारा 230, 231: मंडल और उच्च न्यायालय का पुनरीक्षण। धारा 232: कलक्टर का संदर्भ। धारा 239: स्वामित्व का बिंदु दीवानी अदालत को।
उत्तर कैसे लिखें (10 अंक, 100 शब्द)
भूमिका
प्रश्न का नमूना: "राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 के अंतर्गत राजस्व न्यायालयों की अपील और पुनरीक्षण की व्यवस्था की विवेचना कीजिए।" पहली पंक्ति: अधिनियम भूमि-विवादों के लिए एक बँधी हुई अपील-सीढ़ी देता है, जिसमें अपील केवल वहीं है जहाँ अधिनियम अनुमति दे (धारा 222)।
मुख्य भाग
- अपील की सीढ़ी: धारा 223 (मूल डिक्री), 224 (द्वितीय अपील, चार आधार), 225 (आदेश)
- समय-सीमा: धारा 228, 30, 60, 90 दिन
- मंडल की शक्तियाँ: धारा 226 संक्षेप में ख़ारिज, 229 रिव्यू, 230 पुनरीक्षण
- उच्च न्यायालय: धारा 231 पुनरीक्षण, धारा 239(5) द्वितीय अपील
- दीवानी और राजस्व अदालतों का पुल: धारा 239 (स्वामित्व), 242 (काश्तकारी)
निष्कर्ष
निष्कर्ष: यह व्यवस्था भूमि-विवादों को अलग पर नियंत्रित ढाँचे में निपटाती है, जहाँ विशेषज्ञ राजस्व अधिकारी और दीवानी अदालतें अपने-अपने प्रश्न तय करती हैं।
अतिरिक्त मूल्य
- अपील-सीढ़ी का एक छोटा आरेख
- धारा 227: केवल गुण-दोष को छूने वाली त्रुटि मायने रखती है
- धारा 225(2): अपील के आदेश की आगे अपील नहीं
संबंधित विषय
राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955, धारा 1 और धारा 5: परिभाषाएँ (फसलें, सायर, कृषक, अतिचारी सहित)
राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955, धारा 206 से 218: राजस्व न्यायालयों का क्षेत्राधिकार, प्रक्रिया, परिसीमा और शक्तियाँ
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राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956: धारा 128 से 137, वार्षिक रजिस्टर, नामांतरण और उत्तराधिकार
राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956: धारा 142 से 183, बंदोबस्त, लगान-दरें और बंदोबस्त की अवधि
त्वरित पुनरावृत्ति
- धारा 219: राज्य सरकार शक्तियाँ दे सकती है; नाम या पदनाम से; तबादले पर वही शक्तियाँ; धारा 220: निम्नतम सक्षम न्यायालय में संस्था; 221: मंडल का सामान्य अधीक्षण
- धारा 222: अपील तभी जब अधिनियम में हो; धारा 223: तहसीलदार से कलक्टर, बाकी से राजस्व अपीलीय प्राधिकारी
- धारा 224: द्वितीय अपील; कलक्टर के अपीलीय निर्णय की राजस्व अपीलीय प्राधिकारी को; प्राधिकारी की मंडल को, चार आधारों पर
- धारा 225: आदेशों की अपील (तहसीलदार से कलक्टर, सहायक कलक्टर आदि से प्राधिकारी, प्राधिकारी से मंडल); (2): आगे अपील नहीं
- धारा 226: मंडल अपील स्वीकार या संक्षेप में ख़ारिज; धारा 227: गुण-दोष से असंबंधित त्रुटि पर उलट-फेर नहीं
- धारा 228: 30, 60, 90 दिन; धारा 229: रिव्यू (मंडल और अन्य राजस्व न्यायालय)
- धारा 230: मंडल; 231: उच्च न्यायालय; 232: कलक्टर का संदर्भ, धारा 239 के वादों पर नहीं
- धारा 239: स्वामित्व का बिंदु दीवानी अदालत को, अपील और द्वितीय अपील (CPC की धारा 100); 240: परिसीमा और फीस दीवानी अपील जैसी; 241: प्रतिप्रेषण या नया बिंदु; 242: काश्तकारी का बिंदु राजस्व न्यायालय को
याद रखने योग्य शब्द
- Revenue Appellate Authority
- second appeal
- review
- revision
- proprietary right
- tenancy rights
- Board of Revenue
- Collector
- reference