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राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956: धारा 142 से 183, बंदोबस्त, लगान-दरें और बंदोबस्त की अवधि

3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (विधि): "Rajasthan Land Revenue Act, 1956: Sections 1, 2; Section 3 interpretation (land record officer, municipality, nazul land, panchayat circle, revenue appellate authority, settlement officer, village); Sections 4-36, 40A, 74-87, 106-137, 142-183." इस पृष्ठ पर धारा 142 से 183 हैं: बंदोबस्त (Settlement) और पुनर्बंदोबस्त, लगान-दरें, लगान का निर्धारण, बंदोबस्त की अवधि, मध्यवर्ती संशोधन और विविध प्रावधान। अधिनियम के छह पृष्ठ: (1) धारा 1 से 3; (2) धारा 4 से 36; (3) धारा 40A और 74 से 87; (4) धारा 106 से 127; (5) धारा 128 से 137; (6) धारा 142 से 183। यह सामग्री परीक्षा की तैयारी के लिए है, क़ानूनी सलाह नहीं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • धारा 142 से 183 से अब तक उपलब्ध छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में कोई सीधा प्रश्न नहीं आया। फिर भी यह अधिनियम का सबसे लंबा, संख्याओं से भरा और प्रक्रिया-आधारित हिस्सा है, इसलिए लघु और वस्तुनिष्ठ प्रश्न यहीं से बन सकते हैं: बंदोबस्त की अवधि, लगान की ऊपरी सीमा, तीस दिन की अवधियाँ।
  • यह भाग बंदोबस्त अधिकारी, बंदोबस्त आयुक्त, राजस्व मंडल और राज्य सरकार की भूमिकाओं का क्रम बताता है। यही क्रम पिछले पृष्ठों के पदक्रम और अपील-सीढ़ी से जुड़ता है।
  • क्रम और संख्या दोनों याद करने हैं, इसलिए पृष्ठ पर तालिकाएँ और प्रवाह-चित्र ज़्यादा हैं।

पहले सरल भाषा में

सरकार किसान से जो लगान लेती है, वह कितना हो और कैसे तय हो? हर साल मनमानी से नहीं, बल्कि एक पूरी प्रक्रिया से, जिसे बंदोबस्त (Settlement) कहते हैं। कल्पना कीजिए कि एक ज़िले की ज़मीनों का आर्थिक सर्वे होता है, मिट्टी की क़िस्में तय होती हैं, इलाक़ों को समूहों में बाँटा जाता है, हर मिट्टी और हर समूह के लिए लगान-दर तय होती है, फिर हर जोत का लगान आँका जाता है, किसान को पर्चा मिलता है, आपत्ति सुनी जाती है और अंत में लगान तय होकर बीस साल के लिए चलता है।

यही कहानी धारा 142 से 183 की है। बंदोबस्त अधिकारी पूरा काम करता है। उसके प्रस्ताव पहले बंदोबस्त आयुक्त के पास जाते हैं, फिर राजस्व मंडल के पास, और अंत में राज्य सरकार उन्हें मंज़ूर करती है। किसान को हर अवस्था में आपत्ति या इनकार का हक़ है, और तय लगान सामान्यतः बंदोबस्त की अवधि भर नहीं बदलता।

बंदोबस्त का प्रारंभ: धारा 142 से 147

धारा 142: राज्य सरकार राजपत्र की अधिसूचना से किसी ज़िले या स्थानीय क्षेत्र को बंदोबस्त या पुनर्बंदोबस्त (settlement or re-settlement) के अधीन ला सकती है। अधिसूचना की तारीख़ से वह क्षेत्र "बंदोबस्त-कार्यवाही" के अधीन माना जाता है, जब तक दूसरी अधिसूचना से कार्यवाही बंद घोषित न हो (धारा 142(2))।

धारा 143: जिस अवधि के लिए किसी क्षेत्र का भू-राजस्व तय हुआ था, वह समाप्त होने को हो, तब सरकार धारा 142(1) की अधिसूचना से पहले पुनर्बंदोबस्त के संभावित परिणामों का पूर्वानुमान तैयार करवा सकती है। धारा 144: पुनर्बंदोबस्त का निर्णय लेते समय राज्य सरकार तीन बातें देखती है: (i) क्या राजस्व में उचित बढ़ोतरी या कमी की संभावना है; (ii) बढ़ोतरी की संभावना हो तो क्या पुनर्बंदोबस्त टालने के संतोषजनक कारण हैं; (iii) क्या मौजूदा निर्धारण असमान या अत्यधिक कठोर हो गया है, या बिना उचित बढ़ोतरी की संभावना के भी पुनर्बंदोबस्त के पर्याप्त कारण हैं। परंतुक: जो बढ़ोतरी दस वर्ष में पुनर्बंदोबस्त का ख़र्च निकाल दे, वह सामान्यतः उचित मानी जाएगी।

धारा 145: अधिसूचना के साथ ही राज्य सरकार बंदोबस्त अधिकारी (Settlement Officer) नियुक्त करती है, जब तक उस क्षेत्र के लिए स्थायी बंदोबस्त अधिकारी पहले से न हो, और चाहे तो जितने ज़रूरी लगें उतने सहायक बंदोबस्त अधिकारी भी। धारा 146: बंदोबस्त-कार्यवाही के दौरान नक़्शे और क्षेत्र-पुस्तिकाएँ बनाए रखने और वार्षिक रजिस्टर तैयार करने का काम राज्य सरकार के आदेश से भूमि अभिलेख अधिकारी से बंदोबस्त अधिकारी को सौंपा जा सकता है। तब बंदोबस्त अधिकारी के पास भूमि अभिलेख अधिकारी की अध्याय VII की सब शक्तियाँ होती हैं। धारा 147: राज्य सरकार बंदोबस्त अधिकारियों की कार्य-पद्धति के नियम बना सकती है।

लगान-दरें तय करना: धारा 148 से 156

धारा 148: क्षेत्र बंदोबस्त के अधीन आते ही बंदोबस्त अधिकारी काश्तकारों की हालत का आर्थिक सर्वेक्षण (economic survey) करता है। विशेष रूप से देखने की सात बातें हैं: (a) सिंचाई से सुरक्षित क्षेत्र और पिछले बंदोबस्त के बाद सिंचाई-सुविधाओं में वृद्धि; (b) खेती का स्तर और खेती-योग्य क्षेत्र में वृद्धि या कमी; (c) खेती का ख़र्च और परिवार का भरण-पोषण; (d) बाज़ारों का अस्तित्व; (e) संचार-साधन और सुधार; (f) जोत का आकार; (g) काश्तकारों में ऋणग्रस्तता और ऋण-सुविधाएँ।

धारा 149: आर्थिक सर्वेक्षण के साथ या कुछ बाद अधिकारी निर्धारण-वृत्त या निर्धारण-समूह (assessment circles or groups) बनाता है। इनमें वह धारा 148 की बातों की और इन बातों की समरूपता देखता है: भौतिक बनावट, जलवायु और वर्षा, जनसंख्या और श्रम की उपलब्धता, कृषि-संसाधन, मुख्य फ़सलों की प्रकृति, मात्रा और बाज़ार-भाव, जोतों पर चल रही लगान-दरें, और पिछले बंदोबस्त के वृत्त या समूह। धारा 150: हर वृत्त या समूह के गाँवों को नियमों के अनुसार मिट्टी की क़िस्मों (soil classes) में बाँटा जाता है। धारा 151: फिर हर वृत्त या समूह की हर मिट्टी-क़िस्म के लिए उपयुक्त लगान-दर (rent-rates) बनाई जाती है।

धारा 152(1): उचित और न्यायसंगत दर तक पहुँचने के लिए अधिकारी नौ बातें देखता है, जिनमें सबसे ऊपर हैं: निपटान से पहले बीस वर्षों में लगान और लगान-जैसे उपकरों का संग्रह, और बीस वर्षों में कृषि-उपज के औसत भाव, दोनों में राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित असामान्य वर्षों को छोड़कर। बाक़ी सात बातें: फ़सलों की प्रकृति और औसत उपज, उपज का औसत भाव पर मूल्य, खेती का ख़र्च, हर साल परती रखा क्षेत्र और फ़सल-चक्र, छूट, स्थगन और कम वसूली की बारंबारता, पिछले बंदोबस्त की दरें, और पड़ोसी क्षेत्रों की समान मिट्टी-क़िस्मों की मंज़ूर दरें। धारा 152(2): बंदोबस्त अधिकारी की तय की हुई दर उपज के मूल्य (खंड (d)) के उस हिस्से के बराबर होगी जो उन क्षेत्रों में चलन में है, पर वह एक-छठे (one-sixth) से अधिक नहीं हो सकती।

धारा 153: अधिकारी हर गाँव के लिए दर्ज करता है कि तय दरें बिना बदलाव लागू होती हैं या गाँव या किसी क्षेत्र या मिट्टी-क़िस्म के लिए कितने बदलाव चाहिए। धारा 154: नियमों के अधीन वह तय और दर्ज करता है कि लगान एक किस्त में देय है या अधिक में, किस्तों की संख्या, हर किस्त का अनुपात और देय तारीख़।

धारा 155: दरें तय होने पर अधिकारी आधार सहित अपने प्रस्ताव निर्धारित ढंग से प्रकाशित करता है, फिर निर्धारित ढंग से सार्वजनिक नोटिस देकर आपत्तियाँ आमंत्रित करता है। आपत्तियाँ विचारकर वह प्रस्ताव संशोधित कर सकता है, और अंत में प्रस्ताव, आपत्तियाँ और अपने आदेश बंदोबस्त आयुक्त को भेजता है। धारा 156: बंदोबस्त आयुक्त प्रस्तावों की जाँच कर अपनी टिप्पणी और सिफ़ारिश के साथ राजस्व मंडल को भेजता है। मंडल आगे जाँच का निर्देश दे सकता है और फिर प्रस्ताव राज्य सरकार को मंज़ूरी के लिए भेजता है, बिना बदलाव या लिखित कारणों से बदलाव के साथ। राज्य सरकार प्रस्ताव को (i) मंज़ूर करे, (ii) और जाँच कराए, (iii) मंडल को पुनर्विचार के लिए लौटाए, या (iv) बदलाव के साथ मंज़ूर करे। ऐसे मंज़ूर दरें "मंज़ूर लगान-दरें" (sanctioned rent-rates) हैं।

लगान-दर तय करने की सीढ़ी: धारा 148 से 156

चरणकौनक्याधारा
1बंदोबस्त अधिकारीआर्थिक सर्वेक्षण, सात बातें148
2बंदोबस्त अधिकारीनिर्धारण-वृत्त या समूह बनाना149
3बंदोबस्त अधिकारीमिट्टी की क़िस्में150
4बंदोबस्त अधिकारीहर मिट्टी-क़िस्म की लगान-दर; बीस वर्षों के आँकड़े; उपज-मूल्य का एक-छठे से अधिक नहीं151, 152
5बंदोबस्त अधिकारीगाँव-वार बदलाव; किस्तें और तारीख़ें153, 154
6बंदोबस्त अधिकारीप्रस्ताव प्रकाशित, आपत्तियाँ, बंदोबस्त आयुक्त को भेजना155
7बंदोबस्त आयुक्तजाँच और राजस्व मंडल को भेजना156(1), (2)
8राजस्व मंडलआगे जाँच; राज्य सरकार को भेजना156(3), (4)
9राज्य सरकारमंज़ूर, और जाँच, लौटाना या बदलाव सहित मंज़ूर156(5)

लगान का निर्धारण: धारा 157 से 163

धारा 157: मंज़ूर दरों के आधार पर बंदोबस्त अधिकारी ज़िले या क्षेत्र की हर जोत का देय लगान आँकता है, चाहे वह मौजूदा लगान में कमी, बढ़ोतरी, परिवर्तन या अन्य रूप में हो। धारा 158: ये भूमियाँ निर्धारण से बाहर रहती हैं: (i) इमारतों वाली भूमि उनके अनुषंगों सहित, (ii) स्थायी खलिहान, (iii) क़ब्रिस्तान, श्मशान और खेल के मैदान, (iv) स्थायी सड़कें और पगडंडियाँ, (v) अकृषि-योग्य भूमि।

धारा 159: काश्तकार ने जोत में या उसके संबंध में अपने ख़र्च पर कोई सुधार वैध रूप से किया हो, तो अधिकारी लगान ऐसे आँकता है कि काश्तकार को उस सुधार का पूरा लाभ सुधार पूरा होने की तारीख़ से कुल बीस वर्ष तक मिले, और इस अवधि में बढ़ी हुई उपज या अन्य कारण से उसका लगान नहीं बढ़ेगा। धारा 160: जोत का लगान आँकते समय अधिकारी वास्तव में दिए जा रहे लगान और उस लगान तथा मंज़ूर दरों पर जोत के मूल्य के अंतर को भी देखता है।

धारा 161: धारा 157 के अनुसार आँका गया लगान मौजूदा लगान से अधिक हो, तो मौजूदा लगान एक-चौथाई (one fourth) से अधिक नहीं बढ़ाया जाएगा, इस शर्त के साथ कि आँका गया लगान किसी हालत में जोत के मंज़ूर दरों पर मूल्य के तीन-चौथाई (three-quarters) से कम न हो। धारा 162: जहाँ आँका गया लगान धारा 161 के साथ पढ़ने पर मौजूदा लगान के एक-चौथाई और मूल्य के तीन-चौथाई से अधिक हो, वहाँ वह अधिकता सालाना किस्तों में प्रभावी होगी, जो तीन वर्ष से अधिक नहीं होंगी (progressive enhancement), और पूरा आँका गया लगान उतने वर्षों की समाप्ति पर देय होगा।

धारा 163: चाही (कुएँ से सिंचित) जोत के लिए धारा 159 से 162 की रीति के साथ पिछले पाँच वर्षों में चाही, सूखी और परती रही भूमि के औसत क्षेत्रफल को भी देखा जाता है, और लगान उन औसत क्षेत्रफलों पर चाही, सूखी और परती भूमि की मंज़ूर दरों का योग होता है (उप-धारा 1)। अगर जोत का क्षेत्र निर्धारण से बचने के इरादे से जानबूझकर परती रखा या सूखी खेती में रखा गया पाया जाए, तो निर्धारण के लिए उसे चाही के रूप में जोता हुआ माना जाएगा (उप-धारा 2)।

लगान-निर्धारण की सीमाएँ: धारा 157 से 163

धाराविषयसीमा या नियम
152(2)लगान-दर की ऊपरी सीमाउपज के मूल्य का एक-छठे (one-sixth) से अधिक नहीं
158निर्धारण से बाहरइमारतें, स्थायी खलिहान, क़ब्रिस्तान-श्मशान-खेल के मैदान, स्थायी सड़कें, अकृषि-योग्य भूमि
159सुधार का लाभसुधार पूरा होने से कुल बीस वर्ष तक लगान नहीं बढ़ेगा
161बढ़ोतरी की सीमामौजूदा लगान का एक-चौथाई; आँका लगान मूल्य के तीन-चौथाई से कम नहीं
162क्रमिक वृद्धिअधिकता सालाना किस्तों में, तीन वर्ष से अधिक नहीं
163चाही जोतपिछले पाँच वर्षों के औसत क्षेत्रफल; जानबूझकर परती रखने पर चाही माना जाएगा

पर्चा, आपत्ति, इनकार और ग्राम-दस्तूर: धारा 164 से 174

धारा 164: लगान आँकने के बाद अधिकारी हर जोत के लिए निर्धारण-पर्चा (assessment parcha) बनवाता है, जिसमें अलग-अलग दर्शाए जाते हैं: जोत का स्वत्व, हर खेत का खसरा नंबर और क्षेत्रफल, हर खेत की मिट्टी-क़िस्म, हर क़िस्म की मंज़ूर दर, अधिकारी द्वारा आँका गया लगान, धारा 159 के सुधार की छूट, और धारा 161 और 162 के समायोजन सहित कुल लगान। पर्चा संबंधित काश्तकार को सौंपा जाता है और भूमिधारक (यदि है) को उसकी प्रति दी जाती है। सारे पर्चे बँटने के बाद अधिकारी उद्घोषणा करके आपत्तियाँ आमंत्रित करता है।

धारा 165: पर्चे बँटने वाले कृषि-वर्ष में अधिकारी को लगे कि भूमिधारकों और काश्तकारों के तनावपूर्ण संबंधों या किसी अन्य पर्याप्त कारण से जिंस-लगान (rent in kind) की वसूली रोकना उचित है, तो वह राज्य सरकार को सिफ़ारिश कर सकता है। सिफ़ारिश बंदोबस्त आयुक्त की टिप्पणी के साथ राज्य सरकार को जाती है। आदेश में निर्देश होता है कि उस कृषि-वर्ष से कोई भूमिधारक जिंस-लगान नहीं वसूलेगा और नकद लगान तय होने तक वह पर्चे में दर्शाया कुल आँका लगान नकद ले सकता है, जो अंतिम तय लगान के अनुसार समायोज्य है। ऐसा आदेश तभी दिया जा सकता है जब उस साल की ख़रीफ़ फ़सल का जिंस-लगान वसूल न हुआ हो।

धारा 166: उद्घोषणा के तीस दिन के भीतर काश्तकार या भूमिधारक आपत्ति दे, तो अधिकारी उसे सुनेगा, विधि के अनुसार निपटाएगा और आदेश दर्ज करके जोत का लगान तय करेगा। धारा 167: यह तय लगान बंदोबस्त की अवधि के प्रारंभ की तारीख़ से देय है, जब तक अधिकारी किसी कारण से किसी पहले की तारीख़ से देय करने का निर्देश न दे (धारा 165 के अधीन रहते हुए)।

धारा 168: जिस काश्तकार की जोत का लगान आदेश से तय हुआ, वह आदेश की तारीख़ से तीस दिन के भीतर लिखित रूप से तय लगान स्वीकार करने से इनकार कर सकता है। धारा 169(1): इनकार करने पर काश्तकार को जोत तुरंत ख़ाली करनी होगी। धारा 170: जोत ख़ाली होने या बेदख़ली के बाद वह किसी अन्य व्यक्ति को काश्तकार के रूप में विधि के अनुसार दी जा सकती है। धारा 171: जो काश्तकार धारा 168 के अनुसार इनकार न करे, वह तय लगान स्वीकार किया हुआ माना जाएगा और धारा 167 के अनुसार उसे चुकाने को बाध्य होगा।

धारा 172: आदेश से तय जोत का लगान बंदोबस्त की अवधि (धारा 175) में, इस अधिनियम और राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 के प्रावधानों के अलावा, बदला नहीं जा सकता। धारा 173: बंदोबस्त अधिकारी हर गाँव का वाजिबुलअर्ज़ या दस्तूर गाँवई (Wajib-ul-arz or Dastoor Ganwai) तैयार करता है, जिसमें नियमों के अनुसार दर्ज होता है: (a) लगान के अलावा काश्तकारों से देय सभी उपकर, (b) गाँव के रीति-रिवाज, यानी साझा भूमि और उसकी उपज, गाँव की आबादी भूमि पर निवासियों के अधिकार, तथा सिंचाई, रास्ते और अन्य सुखाधिकार, और (c) ग्राम-प्रशासन से जुड़े ऐसे अधिकार और रिवाज जो नियमों या राज्य सरकार से अपेक्षित हों।

तैयार होने पर अधिकारी उसे गाँव के निवासियों को पढ़कर सुनाने की तारीख़ और समय तय करता है और कम से कम सात दिन पहले निर्धारित ढंग से सूचित करता है (धारा 173(3)). पढ़े जाने के समय जमा हुए ग्रामीणों के सामने वह पढ़ा जाता है (उप-धारा 4)। पढ़ते समय कोई आपत्ति करे तो अधिकारी उसे दर्ज कर निपटाता है और उसका निर्णय अंतिम होता है (उप-धारा 5)। धारा 174: वाजिबुलअर्ज़ या दस्तूर गाँवई की सब प्रविष्टियाँ तब तक सही मानी जाएँगी जब तक उलटा सिद्ध न हो।

समय-सीमाएँ और परिणाम: धारा 164 से 171

धाराक्याअवधि या परिणाम
164(4)निर्धारण-पर्चे बँटने के बादउद्घोषणा द्वारा आपत्तियाँ आमंत्रित
166आपत्तिउद्घोषणा के तीस दिन के भीतर
167तय लगान कब से देयबंदोबस्त की अवधि के प्रारंभ से, या अधिकारी पहले की तारीख़ तय करे
168काश्तकार का इनकारआदेश से तीस दिन के भीतर, लिखित रूप में
169(1)इनकार का असरजोत तुरंत ख़ाली
170ख़ाली जोतअन्य व्यक्ति को विधि के अनुसार
171इनकार न कियातय लगान स्वीकार माना जाएगा
173(3)दस्तूर गाँवई पढ़नाकम से कम सात दिन पहले सूचना

बंदोबस्त की अवधि: धारा 175 से 177A

धारा 175: हर बंदोबस्त की अवधि बीस वर्ष (twenty years) है। तीन परंतुक हैं: पहला, राज्य सरकार जनसंख्या के दबाव, खेती-योग्य क्षेत्र में खेती की सीमा और लगान की पूर्णता को देखकर अवधि बीस वर्ष से आगे बढ़ा सकती है। दूसरा, दर्ज किए जाने वाले विशेष कारणों से, जैसे गंभीर गिरावट, परिसंपत्तियों की बड़ी छिपावट, या भूमि को जानबूझकर और व्यापक रूप से खेती से बाहर करना, राज्य सरकार किसी स्थानीय क्षेत्र के लिए कम अवधि मंज़ूर कर सकती है। तीसरा, पहले बंदोबस्त के मामले में और अनिश्चित खेती वाले क्षेत्रों तथा जलोढ़ क्षेत्रों के लिए राज्य सरकार कम अवधि मंज़ूर कर सकती और मध्यवर्ती संशोधन के नियम बना सकती है।

धारा 175A: बंदोबस्त की अवधि राज्य सरकार द्वारा राजपत्र की अधिसूचना में निर्देशित तारीख़ से शुरू होती है। धारा 176: राज्य सरकार को लगे कि कीमतों में भारी और भौतिक गिरावट, पड़ोसी क्षेत्रों की मंज़ूर दरों में भारी और भौतिक अंतर, मंज़ूर दरें अनुचित रूप से ऊँची निकलना, या किसी अन्य पर्याप्त कारण से बंदोबस्त की अवधि समय से पहले समाप्त करना ज़रूरी है, तो वह अधिसूचना से तुरंत अवधि समाप्त करने और क्षेत्र को पुनर्बंदोबस्त में लाने का इरादा घोषित कर सकती है। साथ ही या शीघ्र बाद, वैसी ही अधिसूचना से अवधि की समाप्ति घोषित करके क्षेत्र को पुनर्बंदोबस्त में लाने का आदेश दिया जाता है और इस अध्याय के प्रावधान ऐसे लागू होते हैं मानो क्षेत्र बंदोबस्त-कार्यवाही में हो (उप-धारा 3 और 4 निरसित)।

धारा 176A: जब कोई ज़िला या क्षेत्र धारा 142(1) या धारा 176(2) के अधीन पुनर्बंदोबस्त में लाया जाए, तब राज्य सरकार शर्तों पर काश्तकारों को अंतरिम राहत देने का आदेश दे सकती है। धारा 176(2) के अधीन पुनर्बंदोबस्त होने पर वह यह भी आदेश दे सकती है कि बंदोबस्त अधिकारी को धारा 148 का आर्थिक सर्वेक्षण करना ज़रूरी नहीं होगा। धारा 177: बंदोबस्त की अवधि समाप्त या समाप्त की जाने के बाद भी जो लोग भूमि धारण करते रहें, वे धारा 176A(1) के अधीन रहकर, नया बंदोबस्त होने तक उसी बंदोबस्त की शर्तों पर धारण करेंगे।

धारा 177A: राज्य सरकार की नहर से सिंचित, पर असिंचित दरों पर आँकी गई भूमि के काश्तकार को, राजस्थान वित्त अधिनियम 1979 के प्रारंभ से या नहर से सिंचाई शुरू होने की तारीख़ से, जो बाद में हो, नया बंदोबस्त होने तक प्रति बीघा डेढ़ रुपये (Rs. 1.50) बढ़ा हुआ लगान देना होता है। यदि भूमि सिंचाई-परियोजना के कमान में आती है और वहाँ की अन्य भूमियों के लिए नहरी दरें मंज़ूर हैं, तो उस कमान की सबसे कम नहरी दर ली जाएगी। इस उप-धारा के प्रयोजन के लिए "बीघा" एकड़ के पाँच-आठवें हिस्से (5/8th of an acre) के बराबर है। काश्तकार तीस दिन के भीतर लिखित रूप में इसे स्वीकार करने से इनकार कर सकता है, और तब धारा 169 वैसे लागू होगी मानो वह धारा 167 के अधीन बंदोबस्त अधिकारी का तय लगान हो।

मध्यवर्ती संशोधन और विविध: धारा 178 से 183

धारा 178: धारा 175 के दूसरे परंतुक के अधीन किसी स्थानीय क्षेत्र की बंदोबस्त-अवधि पूरे ज़िले की अवधि से कम हो और वह समाप्त हो जाए, तब कलेक्टर, या स्थायी बंदोबस्त अधिकारी वाले ज़िले में वही अधिकारी, नियमों के अनुसार उस क्षेत्र का लगान आँकता है। धारा 179: जोत में जलोढ़ (alluvion) से जुड़ी भूमि का लगान कलेक्टर या स्थायी बंदोबस्त अधिकारी आँक सकता है। नदी की क्रिया या अन्य कारण से जोत का खेती-योग्य क्षेत्र घट जाए तो वे निर्धारण का पुनरीक्षण कर सकते हैं। कृषि से अकृषि या अकृषि से कृषि उपयोग में बदलाव से भूमि का मूल्य बदले तो निर्धारण का पुनरीक्षण और लगान का पुनः निर्धारण नियमों के अनुसार हो सकता है। पर ऐसा कोई पुनरीक्षण बंदोबस्त आयुक्त की मंज़ूरी तक अंतिम नहीं होता (उप-धारा 4)।

धारा 180: इस अधिनियम में कुछ भी हो, राज्य सरकार राजपत्र की अधिसूचना से निर्देश दे सकती है कि राज्य में विकसित किसी भी शहरी क्षेत्र पर नियमों के अनुसार लगान के अतिरिक्त विशेष शहरी दर (special urban rate) लगेगी। धारा 181: जब किसी क्षेत्र में बंदोबस्त-कार्यवाही धारा 142 की अधिसूचना से बंद हो, तब बंदोबस्त अधिकारी के पास लंबित सब आवेदन और कार्यवाहियाँ, जब तक उस क्षेत्र में स्थायी बंदोबस्त अधिकारी नियुक्त न हो, कलेक्टर को अंतरित होती हैं, जिसके पास निपटारे के लिए बंदोबस्त अधिकारी की शक्तियाँ होंगी।

धारा 182: बंदोबस्त अधिकारी स्वप्रेरणा से या अन्यथा किसी त्रुटि या चूक को सुधार सकता है, जो (a) निर्धारण-वृत्त या समूह बनाने, मिट्टी-वर्गीकरण और लगान-दर बनाने में पाई जाए, धारा 156(5) के अधीन उनके प्रस्तावों की मंज़ूरी से पहले किसी भी अवस्था में, और (b) जोतों के लगान के निर्धारण में पाई जाए, धारा 166 के अधीन लगान तय होने से पहले किसी भी अवस्था में। धारा 183: बंदोबस्त-कार्यवाही धारा 142(2) की अधिसूचना से बंद होने से पहले, यदि राज्य सरकार संतुष्ट हो कि वृत्त या समूह बनाने, मिट्टी-वर्गीकरण या किसी मिट्टी-क़िस्म की दर में त्रुटि या चूक की खोज के कारण धारा 156(5) की मंज़ूर दरों में बदलाव चाहिए, तो वह आदेश दे सकती है कि बंदोबस्त अधिकारी दरों का पुनर्विलोकन करे। तब अधिकारी निर्धारित ढंग से संशोधित प्रस्ताव बनाता है और धारा 155 और 156 उन पर लागू होती हैं (उप-धारा 2)।

धारा-वार सार: धारा 142 से 183

धाराविषयमुख्य बात
142बंदोबस्त या पुनर्बंदोबस्तराज्य सरकार की राजपत्र अधिसूचना
143, 144पुनर्बंदोबस्त का निर्णयपूर्वानुमान; तीन विचारणीय बातें; दस वर्ष में ख़र्च की वसूली पर बढ़ोतरी उचित
145 से 147अधिकारी और नियमबंदोबस्त अधिकारी अनिवार्य; सहायक वैकल्पिक; भूमि अभिलेख अधिकारी के काम का हस्तांतरण
148 से 154दरेंआर्थिक सर्वेक्षण; वृत्त; मिट्टी; दर; बीस वर्ष के आँकड़े; एक-छठे की सीमा; किस्तें
155, 156प्रस्ताव और मंज़ूरीअधिकारी से बंदोबस्त आयुक्त, मंडल, राज्य सरकार
157 से 163लगान का निर्धारणबाहर रखी भूमि; बीस वर्ष की सुधार-छूट; एक-चौथाई; तीन-चौथाई; तीन वर्ष; चाही
164 से 171पर्चा, आपत्ति, इनकारतीस दिन आपत्ति; तीस दिन इनकार; ख़ाली करना या स्वीकार माना जाना
172 से 174स्थिरता और दस्तूर गाँवईअवधि भर लगान स्थिर; सात दिन पूर्व सूचना; प्रविष्टियाँ सही मानी जाएँगी
175 से 177Aअवधिबीस वर्ष; बढ़ा या घटा सकते हैं; समय से पूर्व समाप्ति; डेढ़ रुपये प्रति बीघा
178 से 180मध्यवर्ती संशोधनअल्पकालीन बंदोबस्त; जलोढ़; शहरी दर
181 से 183विविधलंबित मामले कलेक्टर को; त्रुटि-सुधार; मंज़ूर दरों का पुनर्विलोकन

लगान-दरों की मंज़ूरी की सीढ़ी: धारा 155 और 156

  1. बंदोबस्त अधिकारी

    प्रस्ताव प्रकाशित, आपत्तियाँ, धारा 155

  2. बंदोबस्त आयुक्त

    जाँच, टिप्पणी और सिफ़ारिश, धारा 156(1), (2)

  3. राजस्व मंडल

    आगे जाँच का निर्देश; लिखित कारणों से बदलाव; धारा 156(3), (4)

  4. राज्य सरकार

    मंज़ूर, और जाँच, लौटाना या बदलाव सहित मंज़ूर; धारा 156(5)

मंज़ूर होने पर दरें "मंज़ूर लगान-दरें" (sanctioned rent-rates) कहलाती हैं।

बंदोबस्त के चरण: धारा 142 से 183

  1. अधिसूचना और अधिकारी

    धारा 142 से 147

  2. दरें

    धारा 148 से 156

  3. लगान का निर्धारण और पर्चा

    धारा 157 से 164

  4. आपत्ति, इनकार, दस्तूर गाँवई

    धारा 165 से 174

  5. अवधि

    धारा 175 से 177A

  6. मध्यवर्ती संशोधन और विविध

    धारा 178 से 183

मुख्य तथ्य

बंदोबस्त की अवधि
बीस वर्ष; राज्य सरकार बढ़ा या घटा सकती है, धारा 175
लगान-दर की ऊपरी सीमा
उपज के मूल्य का एक-छठे से अधिक नहीं, धारा 152(2)
आँकड़ों की अवधि
लगान और भाव के लिए पिछले बीस वर्ष, असामान्य वर्ष छोड़कर, धारा 152(1)
बढ़ोतरी की सीमा
मौजूदा लगान का एक-चौथाई, धारा 161; क्रमिक वृद्धि तीन वर्ष तक, धारा 162
सुधार की छूट
सुधार पूरा होने से कुल बीस वर्ष, धारा 159
आपत्ति और इनकार
आपत्ति उद्घोषणा से तीस दिन (धारा 166); इनकार आदेश से तीस दिन (धारा 168)
दस्तूर गाँवई पढ़ना
कम से कम सात दिन पूर्व सूचना, धारा 173(3)
मंज़ूरी का क्रम
बंदोबस्त अधिकारी, बंदोबस्त आयुक्त, राजस्व मंडल, राज्य सरकार, धारा 155, 156
अंतिम जाँच
2 अक्टूबर 2026

राजस्थान का पहलू

राजस्थान में बंदोबस्त की सीढ़ी राज्य सरकार तक जाती है और बीच में बंदोबस्त आयुक्त और अजमेर का राजस्व मंडल हैं (धारा 156)। धारा 177A में राजस्थान वित्त अधिनियम 1979 के प्रारंभ का उल्लेख है और असिंचित दरों पर आँकी नहर-सिंचित भूमि पर प्रति बीघा डेढ़ रुपये की बढ़ोतरी है; वहाँ बीघा एकड़ के पाँच-आठवें हिस्से के बराबर है। दस्तूर गाँवई (वाजिबुलअर्ज़) राजस्थान की ग्राम-रीति-रिवाज की लिखित पंजी है (धारा 173).

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • बंदोबस्त की अवधि तीस वर्ष लिखना। धारा 175 में बीस वर्ष है, और राज्य सरकार इसे बढ़ा या घटा सकती है।
  • लगान-दर की ऊपरी सीमा उपज-मूल्य का एक-चौथाई या आधा लिखना। धारा 152(2) में एक-छठे से अधिक नहीं है। एक-चौथाई की सीमा धारा 161 में मौजूदा लगान की बढ़ोतरी की है।
  • आपत्ति और इनकार की अवधियाँ गड्डमड्ड करना। दोनों तीस दिन हैं, पर आपत्ति उद्घोषणा से (धारा 166) और इनकार आदेश से (धारा 168) गिनी जाती है।
  • लगान-दरों की मंज़ूरी में राजस्व मंडल को अंतिम प्राधिकारी बताना। अंतिम मंज़ूरी राज्य सरकार की है, मंडल सिफ़ारिश के साथ भेजता है (धारा 156).
  • धारा 159 की बीस वर्ष की सुधार-छूट और धारा 175 की बीस वर्ष की बंदोबस्त-अवधि को एक समझना। दोनों अलग प्रावधान हैं।