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पेपर III · इकाई III · भाग ख (विधि)

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955, धारा 38 से 54A: उत्तराधिकार, बिक्री-बंधक, पट्टा देने की सीमा, अदला-बदली और जोत का विभाजन

काश्तकारी अधिनियम 1955 की धारा 38 से 54A: उत्तराधिकार, बिक्री और बंधक की रोक, पट्टे की पाँच वर्ष की सीमा, अदला-बदली और जोत का विभाजन, कौन क्या कर सकता है की तालिका सहित।

  • उत्तराधिकार
  • बिक्री और गिरवी
  • उप-पट्टा
  • अदला-बदली
  • विभाजन
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर III, इकाई III, भाग ख (विधि): "Rajasthan Tenancy Act, 1955: ... Sections 14-17A, 31-37, 38-54A, 206-232, 239-242." इस पृष्ठ पर धारा 38 से 54A हैं: धारा 38 से 41 (उत्तराधिकार और हस्तांतरण का आधार), 42 से 43A (बिक्री, उपहार, वसीयत और बंधक), 44 से 47A (पट्टे पर देना), 48 से 52 (अदला-बदली), 53 (जोत का विभाजन) और 54, 54A (हटाई जा चुकी)। यह पृष्ठ परीक्षा की तैयारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं है; संशोधनों के लिए देखें: आधिकारिक अधिनियम पाठ।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • इस पृष्ठ की धाराओं पर 2016 से 2024 के पेपरों में सीधा प्रश्न नहीं देखा गया। अधिनियम पर आए पाँच प्रश्नों में से चार धारा 5 की परिभाषाओं के और एक धारा 16 का है। फिर भी ये धाराएँ अधिनियम का सबसे व्यावहारिक हिस्सा हैं: खेत बेचा जा सकता है या नहीं, गिरवी कितने साल के लिए रखा जा सकता है, किसे और कितने साल के लिए पट्टे पर दिया जा सकता है।
  • परीक्षा के लिए इस पृष्ठ में तीन चीज़ें अलग से याद करने लायक हैं: (क) संख्याएँ: पाँच वर्ष (सब-लीज़ और भोग-बंधक), दो वर्ष (अगला पट्टा या बंधक रोकने की अवधि), एक वर्ष (गैर-खातेदार का उप-पट्टा), तीन महीने (भोग-बंधक के बाद कब्ज़ा लौटाना); (ख) अनुसूचित जाति और जनजाति की सुरक्षा वाले प्रावधान (धारा 42, 43, 46A, 49A); (ग) आठ श्रेणियाँ जिन पर पट्टे की सीमा लागू नहीं होती (धारा 46)।
  • यदि भविष्य में 2 अंक या 5 अंक का प्रश्न इन धाराओं से आता है, तो उत्तर "कौन क्या कर सकता है, कितने समय के लिए, किस शर्त पर" के रूप में बनाना सबसे सुरक्षित है। नीचे की तालिकाएँ इसी ढाँचे में हैं।

पहले सरल भाषा में: खेत "बिक" सकता है, पर पूरी तरह नहीं

गाँव में खेत केवल मिट्टी नहीं, कई परिवारों की आजीविका है। इसीलिए अधिनियम ने खातेदार (Khatedar tenant) को भूमि के उपयोग का मज़बूत हक़ तो दिया, पर यह भी तय किया कि वह इसे किन शर्तों पर बेचे, गिरवी रखे या पट्टे पर दे। इन नियमों का मक़सद दो हैं: काश्तकार का खेत महाजन या बड़े भू-स्वामियों के हाथ में न चला जाए, और कमज़ोर वर्ग, विशेषकर अनुसूचित जाति और जनजाति, की भूमि अपने समुदाय में बनी रहे।

धारा 38 मूल सिद्धांत बताती है: "Save as provided in this Act, the interest of a tenant in his holding is heritable but not transferable." यानी जोत में काश्तकार का हित वंशानुगत (heritable) है, पर अंतरणीय (transferable) नहीं, जब तक अधिनियम में अलग से न कहा गया हो। उस "अलग से कहा गया" का सबसे बड़ा अपवाद धारा 41 है: खातेदार का हित उप-पट्टे के अलावा अन्य तरीक़ों से अंतरणीय है, पर धाराओं 42 और 43 की शर्तों के अधीन। इसलिए पूरी रूपरेखा यों बनती है: सब काश्तकारों का हित वंशानुगत; केवल खातेदार का हित सीमित रूप से अंतरणीय; और हर बिक्री, बंधक या पट्टे पर कुछ रोक।

धारा 38 से 41: उत्तराधिकार और अंतरण की नींव

धाराविषयक्या कहती है
38काश्तकार का हित (Interest of tenants)हित वंशानुगत है, अंतरणीय नहीं, जब तक अधिनियम में अन्यथा न कहा गया हो।
39वसीयत (Bequest)खातेदार काश्तकार अपनी जोत या उसके भाग का हित वसीयत (will) से दे सकता है, अपने पर लागू व्यक्तिगत विधि के अनुसार।
40काश्तकार का उत्तराधिकार (Succession to tenants)बिना वसीयत (intestate) मृत्यु पर हित उसकी मृत्यु के समय लागू व्यक्तिगत विधि के अनुसार बँटता है।
41खातेदार के हित का अंतरण (Transferability of Khatedar's interest)उप-पट्टे के अलावा अन्य तरीक़ों से अंतरणीय, पर धारा 42 और 43 की शर्तों के अधीन।

धारा 42: बिक्री, उपहार और वसीयत पर रोक

खातेदार अपनी जोत के पूरे या भाग का हित बेच सकता है, उपहार दे सकता है या वसीयत कर सकता है, पर धारा 42 के अनुसार ऐसा बिक्री, उपहार या वसीयत "void", यानी शून्य होगी यदि वह (b) अनुसूचित जाति के सदस्य द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति के पक्ष में की गई हो जो उस अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं है, या अनुसूचित जनजाति के सदस्य द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति के पक्ष में जो अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है। खंड (bb) एक कदम और जाता है: सहरिया अनुसूचित जनजाति (Saharia Scheduled Tribe) के सदस्य द्वारा ऐसे व्यक्ति के पक्ष में की गई बिक्री, उपहार या वसीयत भी शून्य है जो सहरिया जनजाति का सदस्य नहीं है।

ध्यान दें कि खंड (a) और (c) हटा दिए गए हैं (Omitted), इसलिए आज की धारा 42 में केवल (b) और (bb) हैं। यह भी याद रखें कि शब्द "void" है, "voidable" नहीं: ऐसा अंतरण शुरू से ही निष्प्रभावी माना जाता है। इसके साथ धारा 42A भी हटाई जा चुकी है।

धारा 42B एक संक्रमणकालीन राहत है। यदि संशोधन अधिनियम 22 सन् 1992 (Rajasthan Tenancy (Second Amendment) Act, 1992) से पहले कोई बिक्री, उपहार या वसीयत उस समय की धारा 42 के खंड (a) के उल्लंघन से शून्य थी, तो कलक्टर या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत अधिकारी निर्धारित समय में, रीति से और फ़ीस तथा जुर्माने के भुगतान पर आवेदन आने पर उसे वैध घोषित कर सकता है। चार शर्तें हैं: वह अंतरण अन्यथा वैध हो और खंड (a) को छोड़कर अन्य विधियों के अनुरूप हो; पक्षकार नियमों या आदेशों की सब शर्तें पूरी करें; निर्धारित प्रीमियम या जुर्माना चुकाया जाए; और आवेदक नगरीय निर्धारण (urban assessment) चुकाने का वचन दे।

धारा 43: गिरवी (mortgage) के दो रूप

धारा 43 में दो अलग तरह की गिरवी हैं और दोनों को अलग-अलग पहचानना परीक्षा का सबसे आसान अंक है। पहली, उप-धारा (1), ऋण के लिए गिरवी (hypothecation or mortgage): खातेदार, और राज्य सरकार या उसके अधिकृत अधिकारी की सामान्य या विशेष अनुमति से गैर-खातेदार, अपनी जोत का पूरा या भाग राज्य सरकार, भूमि विकास बैंक (Land Development Bank, जैसा राजस्थान सहकारी समिति अधिनियम, 1965 में परिभाषित है), पंजीकृत सहकारी समिति, किसी अनुसूचित बैंक (Scheduled Bank) या राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित किसी संस्था से ऋण लेने के लिए गिरवी रख सकता है।

दूसरी, उप-धारा (2), भोग-बंधक (usufructuary mortgage): खातेदार अपना हित किसी भी व्यक्ति को भोग-बंधक के रूप में दे सकता है, पर बंधक में यह लिखा होना चाहिए कि बंधक की रकम संपत्ति की उपज से एक निश्चित अवधि में चुकता मानी जाएगी, जो पाँच वर्ष से अधिक नहीं होगी। अवधि न लिखी हो तो बंधक पाँच वर्ष का माना जाएगा। परंतुक: 1970 के संशोधन अधिनियम के राजपत्र में प्रकाशन के बाद अनुसूचित जाति या जनजाति का खातेदार किसी ऐसे व्यक्ति को भोग-बंधक नहीं दे सकता जो अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य नहीं है।

भोग-बंधक का मतलब है कि बंधकदार खेत जोतकर उसकी उपज स्वयं लेता है और वही उसका ब्याज और मूलधन है। उप-धारा (3) कहती है कि अवधि समाप्त होने पर बंधक बिना किसी भुगतान के पूर्ण चुकता माना जाएगा, ऋण समाप्त, भूमि मुक्त, और बंधकदार को कब्ज़ा सब भारों से मुक्त करके लौटाना पड़ेगा। उप-धारा (4) में अधिनियम से पहले के भोग-बंधक के लिए यही बात लिखित अवधि या बंधक के बीस वर्ष, जो भी कम हो, के बाद लागू होती है। उप-धारा (4A) प्रारंभ के बाद बने और 1975 के अध्यादेश के प्रारंभ पर चालू बंधकों के लिए लिखित अवधि या पाँच वर्ष, जो पहले समाप्त हो, की कसौटी देती है।

भोग-बंधक के नियम: उप-धारा (2) से (5) का क्रम

उप-धारानियमसंख्या या शर्त
43(2)खातेदार भोग-बंधक किसी को भी दे सकता हैअवधि पाँच वर्ष से अधिक नहीं; अवधि न लिखी हो तो पाँच वर्ष
43(2) परंतुकअनुसूचित जाति या जनजाति का खातेदार गैर-अनुसूचित व्यक्ति को नहीं1970 के संशोधन अधिनियम के प्रकाशन के बाद
43(3)अवधि पूरी होने पर बंधक चुकताबिना भुगतान; ऋण समाप्त; कब्ज़ा सब भारों से मुक्त
43(4)अधिनियम से पहले का भोग-बंधकलिखित अवधि या बीस वर्ष, जो कम हो
43(4A)प्रारंभ के बाद बना और 1975 के अध्यादेश के प्रारंभ पर चालू बंधकलिखित अवधि या पाँच वर्ष, जो पहले समाप्त हो
43(4B)अगला भोग-बंधक उसी भूमि परपहले बंधक की समाप्ति से दो वर्ष के भीतर नहीं
43(4D)कब्ज़ा, दस्तावेज़ और पुनः अंतरण लौटानामोचन के तीन महीने के भीतर
43(4E)बिना पर्याप्त कारण के विफल रहने पर दंडएक वर्ष तक कारावास या एक हज़ार रुपये तक जुर्माना या दोनों; अपराध संज्ञेय और जमानती; बंधककर्ता द्वारा समझौता योग्य
43(5)कब्ज़ा न लौटाने परधारा 183A के अनुसार बेदखली की ज़िम्मेदारी

धारा 43A: पुराने गैर-भोग बंधकों का बचाव

धारा 43A अधिनियम के प्रारंभ से पहले की उन गिरवी-व्यवस्थाओं की बात करती है जो भोग-बंधक नहीं थीं। उप-धारा (1) कहती है कि प्रारंभ से पहले हुए ऐसे बंधक (धारा 43 के बावजूद) और पक्षकारों के अधिकार तथा दायित्व अपनी शर्तों और प्रारंभ से पहले की विधि के अनुसार चलते रहेंगे। उप-धारा (2) उन्हें लागू कराने का रास्ता देती है: पीड़ित पक्ष सहायक कलक्टर के न्यायालय में वाद ला सकता है, उसी समय-सीमा में और उतनी ही कोर्ट-फ़ीस पर जो पहले की विधि में निर्धारित थी। यह धारा बताती है कि अधिनियम "आगे" की व्यवस्था बदलता है, पर पुराने अधिकार पूरी तरह मिटाता नहीं।

पट्टे पर देने की सीमाएँ: धारा 44 से 46A

धाराकौन और क्यासीमा
44खुदकाश्त-धारक पट्टे पर दे सकता है और काश्तकार उप-पट्टे पर दे सकता है, पूरे या भागअधिनियम की रोकों के अधीन। परंतुक: उप-पट्टा देने से काश्तकार अपने भूधारक के प्रति दायित्व से मुक्त नहीं होता।
45(1)खुदकाश्त-धारक का पट्टा, खातेदार या उसके बंधकदार का उप-पट्टाएक समय में पाँच वर्ष से अधिक नहीं। पहला परंतुक: अनुमोदित कृषि-प्रसंस्करण या कृषि-व्यवसाय उपक्रम के कृषि-कार्य के लिए (और विद्युत-उत्पादन के लिए Prosopis Juliflora जैसे रोपण के लिए) पंद्रह वर्ष का पट्टा या उप-पट्टा, जिसे और पंद्रह वर्ष बढ़ाया जा सकता है। दूसरा परंतुक: भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 90A(5A) के अधीन राज्य सरकार द्वारा विहित प्रयोजन के लिए तीस वर्ष तक का पट्टा या उप-पट्टा, जिसे दस वर्ष और बढ़ाया जा सकता है।
45(2)एक बार पट्टा या उप-पट्टा देने के बाद उसी भूमि पर अगलापहले की समाप्ति से दो वर्ष के भीतर नहीं
45(3)गैर-खातेदार काश्तकार का उप-पट्टाएक वर्ष से अधिक नहीं
45(4)उप-काश्तकार या खुदकाश्त का काश्तकार उप-पट्टा दे सकता है?नहीं, केवल धारा 46 की परिस्थितियों में
46Aअनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्यधाराओं 44, 45 और 46 के बावजूद, अनुसूचित जाति या जनजाति के बाहर के व्यक्ति को पट्टा या उप-पट्टा नहीं दे सकता

धारा 46: आठ श्रेणियाँ जिन पर धारा 45 की सीमा नहीं

खंडश्रेणी (statutory term)
(a)नाबालिग (a minor)
(b)विक्षिप्त (a lunatic)
(c)जड़बुद्धि (an idiot)
(d)अविवाहित, तलाकशुदा या पति से अलग रह रही स्त्री, या विधवा (a woman who is unmarried or divorced or separated from her husband, or is a widow)
(e)अंधेपन या अन्य शारीरिक अशक्तता या दुर्बलता के कारण खेती करने में अक्षम व्यक्ति
(f)संघ की सशस्त्र सेना का सदस्य (a member of the armed force of the Union)
(g)जेल में निरुद्ध या कारावासित व्यक्ति
(h)पच्चीस वर्ष तक की आयु का, मान्यता-प्राप्त संस्था में अध्ययनरत विद्यार्थी

परंतुक: संयुक्त जोत हो तो यह छूट तभी मिलती है जब सभी धारक इन श्रेणियों में से किसी एक या अधिक में हों। उप-धारा (2): जो पट्टा केवल इस छूट से वैध है, वह पट्टादाता की मृत्यु या श्रेणी से बाहर होने के बाद दो वर्ष से अधिक नहीं चलेगा।

धारा 47 और 47A: उत्तराधिकारी पर बंधन और पुराने क्षेत्र

धारा 47 सीधी है: जिस काश्तकार ने उप-पट्टा दिया है, उसका उत्तराधिकारी (successor-in-interest) उप-पट्टे की शर्तों से बँधा रहेगा, जहाँ तक वे अधिनियम से असंगत न हों। यानी उप-पट्टादाता की मृत्यु से उप-काश्तकार बेदखल नहीं हो जाता।

धारा 47A आबू, अजमेर और सुनेल क्षेत्रों के लिए बचत है। राजस्थान राजस्व विधि (विस्तार) अधिनियम, 1957 के प्रारंभ से पहले इन क्षेत्रों में काश्तकार की जोत पर विधिवत हुई बिक्री, बंधक, पट्टे, उप-पट्टे या अन्य अंतरण पर अधिनियम की अंतरण-संबंधी धाराएँ लागू नहीं होतीं, और पक्षकारों के अधिकार तथा दायित्व अंतरण की शर्तों और तत्कालीन विधि से चलते रहेंगे। इनके प्रवर्तन के लिए धारा 43A(2) की प्रक्रिया लागू होगी।

खातेदार, गैर-खातेदार और उप-काश्तकार: कौन क्या कर सकता है

क्रियाखातेदारगैर-खातेदारउप-काश्तकार या खुदकाश्त का काश्तकार
उत्तराधिकार (धारा 38, 40)हाँ, व्यक्तिगत विधि सेहाँ, हित वंशानुगत हैहाँ, हित वंशानुगत है
वसीयत (धारा 39)हाँ, जोत या उसका भागधारा 39 केवल खातेदार को कहती हैधारा 39 केवल खातेदार को कहती है
बिक्री, उपहार (धारा 41, 42)हाँ, पर अनुसूचित जाति और जनजाति पर रोकधारा 41 केवल खातेदार को कहती हैधारा 41 केवल खातेदार को कहती है
ऋण के लिए गिरवी (धारा 43(1))हाँराज्य सरकार या अधिकृत अधिकारी की अनुमति सेधारा 43(1) में उल्लेख नहीं
भोग-बंधक (धारा 43(2))हाँ, अधिकतम पाँच वर्षधारा 43(2) केवल खातेदार को कहती हैधारा 43(2) में उल्लेख नहीं
उप-पट्टा (धारा 45)अधिकतम पाँच वर्षअधिकतम एक वर्षनहीं; केवल धारा 46 की परिस्थितियों में
अदला-बदली (धारा 48, 49)हाँ, धारा 49 की विशेष प्रक्रिया भीधारा 48(1): समान वर्ग के काश्तकारों मेंधारा 48(1): समान वर्ग के काश्तकारों में

धारा 48 से 52: खेतों की अदला-बदली

कई बार एक किसान के खेत अलग-अलग जगह होते हैं और दूसरे के भी, तो दोनों अपने टुकड़े बदलकर एक जगह जमा करना चाहते हैं। धारा 48 से 52 इसी का ढाँचा हैं। धारा 48(1) कहती है कि एक ही वर्ग के काश्तकार अपने खेत आपस में बदल सकते हैं, यदि वे एक ही भूधारक से धारण करते हों तो उसकी लिखित सहमति से, और अलग भूधारकों से धारण करते हों तो सभी भूधारकों की लिखित सहमति से। धारा 48(2) में भूधारक स्वयं काश्तकार के साथ समझौते से उसकी जोत में शामिल भूमि के बदले कोई अन्य भूमि (जो किसी को पट्टे पर नहीं है) दे सकता है। उप-धारा (3) (राजस्थान अधिनियम 23 सन् 2023 से जोड़ी गई) नवीकरणीय ऊर्जा के विद्युत-संयंत्र वाले व्यक्ति, कंपनी या सरकारी इकाई को यह प्रस्ताव राज्य सरकार को देने देती है कि संयंत्र की भूमि से लगी, उसके काश्तकारी कब्ज़े की किसी भूमि को संयंत्र की भूमि में पड़ने वाली सरकारी भूमि से बदला जाए; बदली जाने वाली भूमि का बाज़ार-मूल्य सक्षम प्राधिकारी के निर्धारण से बराबर या अधिक होना चाहिए।

धारा 49 "consolidation" का खास रास्ता है: खातेदार अपनी जोत जमाने के लिए सहायक कलक्टर को आवेदन दे सकता है कि उसकी जोत का कोई भाग दूसरे खातेदार की जोत से बदल दिया जाए। (उप-धारा (1) का छपा वाक्य अधूरा है; आवेदन की बात उप-धारा (2) से स्पष्ट होती है।) सहायक कलक्टर निर्धारित रीति से जाँच करके, यदि उचित आधार पाए तो आवेदन पूरा या आंशिक मंज़ूर कर सकता है और दूसरे काश्तकार को आवेदक की वह भूमि दे सकता है जो मूल्य में लगभग बराबर और उसी गुणवत्ता की हो जो आवेदक को मिली।

धारा 49A सुरक्षा की वही परत जोड़ती है: अनुसूचित जाति या जनजाति का काश्तकार अपनी जोत उस व्यक्ति की जोत से नहीं बदल सकता जो अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य नहीं है, और ऐसा आवेदन धारा 49 में अस्वीकार किया जाएगा। धारा 50 कहती है कि अदला-बदली में मिली भूमि पर काश्तकार के वही अधिकार होंगे जो दी गई भूमि पर थे। धारा 51 के अनुसार यदि अदला-बदली में मिली भूमि पर कोई पट्टा, बंधक या अन्य भार हो, तो वह भार उस भूमि के साथ, या उसके उस भाग के साथ जो सहायक कलक्टर तय करे, स्थानांतरित हो जाता है, और संबंधित व्यक्तियों को सुनवाई का उचित अवसर दिए बिना आदेश नहीं हो सकता। धारा 52: अदला-बदली की प्रविष्टि अधिकार-अभिलेख (record of rights) में की जाएगी।

धारा 53: जोत का विभाजन (Division of Holding)

उप-धाराक्या कहती है
53(1)हटाई जा चुकी (Omitted)।
53(2)जोत का विभाजन दो तरीक़ों से: (i) सह-काश्तकारों के समझौते से, जिसमें जोत का विभाजन और लगान का नए टुकड़ों में वितरण दोनों तय हों; या (ii) सक्षम न्यायालय की डिक्री या आदेश से, किसी सह-काश्तकार के वाद पर।
53(3)हटाई जा चुकी (Omitted)।
53(4)एक या अधिक जोत के विभाजन के हर वाद में सभी सह-काश्तकार और भूधारक पक्षकार बनाए जाएँगे।
53(5)एक से अधिक जोत के विभाजन का वाद तभी हो सकता है जब पक्षकार वही हों।
54, 54Aदोनों हटाई जा चुकी (Omitted)।

धारा 53 का शीर्षक: "Division of Holding"।

बिक्री, उपहार या वसीयत: क्या शून्य है? (धारा 42)

  1. खातेदार का अंतरण

    बिक्री, उपहार या वसीयत (धारा 41)

  2. अनुसूचित जाति का सदस्य, ग्रहीता गैर-अनुसूचित जाति?

    हाँ: शून्य, धारा 42(b)

  3. अनुसूचित जनजाति का सदस्य, ग्रहीता गैर-अनुसूचित जनजाति?

    हाँ: शून्य, धारा 42(b)

  4. सहरिया जनजाति का सदस्य, ग्रहीता गैर-सहरिया?

    हाँ: शून्य, धारा 42(bb)

  5. इनमें से कोई नहीं

    धारा 42 से शून्य नहीं; शेष विधि लागू

आरेख केवल धारा 42 की रोक दिखाता है; अन्य अधिनियमों की शर्तें अलग से लागू हो सकती हैं।

धारा 49: अदला-बदली (consolidation) के चरण

  1. आवेदन

    खातेदार सहायक कलक्टर को, जोत एकत्र करने के लिए

  2. जाँच

    निर्धारित रीति से; उचित आधार हैं या नहीं

  3. आदेश

    पूर्ण या आंशिक मंज़ूरी; दूसरे काश्तकार को समान मूल्य और गुणवत्ता की भूमि

  4. अधिकार (धारा 50)

    प्राप्त भूमि पर वही अधिकार जो दी गई भूमि पर थे

  5. प्रविष्टि (धारा 52)

    अधिकार-अभिलेख में दर्ज

मुख्य तथ्य

धारा 38
काश्तकार का हित वंशानुगत, अंतरणीय नहीं जब तक अधिनियम में अन्यथा न कहा गया हो
धारा 42
अनुसूचित जाति और जनजाति द्वारा बाहर के व्यक्ति के पक्ष में बिक्री, उपहार, वसीयत शून्य; (bb): सहरिया जनजाति
धारा 43(2)
भोग-बंधक: अधिकतम पाँच वर्ष, अवधि न लिखी हो तो पाँच वर्ष
धारा 43(4B)
उसी भूमि पर अगला भोग-बंधक पहले की समाप्ति से दो वर्ष तक नहीं
धारा 43(4D), (4E)
मोचन के तीन महीने में कब्ज़ा; विफल रहने पर एक वर्ष तक कारावास या एक हज़ार रुपये तक जुर्माना या दोनों; संज्ञेय और जमानती
धारा 45
पट्टा या उप-पट्टा पाँच वर्ष; अगला दो वर्ष के बाद; गैर-खातेदार का उप-पट्टा एक वर्ष
धारा 46
आठ श्रेणियाँ (a) से (h); पच्चीस वर्ष तक का विद्यार्थी; उप-धारा (2): छूट से वैध पट्टा पट्टादाता की मृत्यु या श्रेणी से बाहर होने के बाद दो वर्ष से अधिक नहीं
धारा 49A
अनुसूचित जाति या जनजाति के काश्तकार की अदला-बदली बाहर के व्यक्ति की जोत से नहीं
धारा 53
जोत का विभाजन: (1) और (3) हटाई गईं; (2) समझौता या डिक्री; (4) सभी सह-काश्तकार और भूधारक पक्षकार
अंतिम जाँच
2 अक्तूबर 2026

राजस्थान का पहलू

अधिनियम के पाठ से: धारा 42(bb) में राजस्थान की सहरिया अनुसूचित जनजाति का नाम लेकर अलग सुरक्षा है; धारा 43 राजस्थान सहकारी समिति अधिनियम, 1965 (Act 13 of 1965) में परिभाषित भूमि विकास बैंक का नाम लेती है; और धारा 47A आबू, अजमेर तथा सुनेल क्षेत्रों की पुरानी अंतरण-व्यवस्थाओं को बचाती है। स्रोत: अधिनियम का पाठ, इंडिया कोड (देखा गया: 2 अक्तूबर 2026)। यहाँ कोई अन्य सरकारी आँकड़ा नहीं दिया गया है।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • धारा 38 में "heritable but not transferable" को खातेदार पर भी लागू मान लेना: खातेदार का हित धारा 41 से सीमित रूप में अंतरणीय है।
  • धारा 42 में "void" की जगह "voidable" या केवल "अवैध" लिखना: शब्द void ही है।
  • धारा 43 के दोनों रूप एक में मिला देना: (1) ऋण के लिए गिरवी (संस्थाओं से) और (2) भोग-बंधक (किसी भी व्यक्ति को, पाँच वर्ष)।
  • भोग-बंधक की अवधि पाँच वर्ष के बजाय बीस वर्ष या दस वर्ष लिख देना: बीस वर्ष केवल अधिनियम से पहले के बंधकों के लिए उप-धारा (4) में है।
  • धारा 45 में एक वर्ष (गैर-खातेदार) और पाँच वर्ष (खातेदार) की अदला-बदली।
  • धारा 46 की आठ श्रेणियों में से "विधवा" या "विद्यार्थी की आयु पच्चीस वर्ष" भूल जाना।
  • धारा 53 को "omitted" मान लेना: उप-धाराएँ (1) और (3) हटी हैं, पर (2), (4), (5) जीवित हैं; पूरी तरह हटाई गई धाराएँ 42A, 54 और 54A हैं।